चंदा कोचर के घोटाले से तीन ‘नीरव मोदी’ तैयार हो रहे हैं

दीपक कोचर, चंदा कोचर और वेणुगोपाल धूत चल दिए नीरव मोदी की राह पर

उन्मेष गुजराथी, दबंग दुनिया

मुंबई। आईसीआईसीआई बैंक की सीईओ चंदा कोचर के घोटाले से तीन ‘नीरव मोदी’ तैयार हो रहे हैं। चंदा कोचर पर आरोप है कि उन्होंने बैंकों के नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए अपने पति के दोस्त वीडियोकॉन के वेणुगोपाल धूत को लोन दिया था। लोन के एवज में धूत ने दीपक कोचर की कंपनी में करोड़ों का निवेश किया। आरोप है कि इससे चंदा कोचर और उनके परिवार को बड़ा मुनाफा हुआ। सरकार इस मुद्दे पर यदि गंभीरता से ध्यान नहीं देती है, तो चंदा कोचर, उनके पति दीपक मोदी और धूत फरार हो सकते हैं। कई बड़े मामलों का खुलासा होने की आशंका को देखते हुए तो यह कहा जा सकता है कि अभी कई ‘नीरव मोदी’ भागने की कतार में हैं। Continue reading

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सैनिकों और अर्ध-सैनिक बलों को बलि का बकरा बनाना देश के लिए घातक सिद्ध होगा

श्याम सिंह रावत

नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्री बनना एक बहुत बड़ी राष्ट्रीय आपदा थी, जिसके दुष्परिणाम हर क्षेत्र में एक-एक कर सामने आ रहे हैं। उनकी 56″ की छाती कश्मीरी आतंकवादियों से निपटने में तो नाकाम हो चुकी है लेकिन देश के अन्य हिस्सों में उत्पात मचा रहे उपद्रवियों को सबक सिखाने में भी वे पूरी तरह असफल साबित हो रहे हैं। हालांकि कानून और व्यवस्था राज्यों का मामला है लेकिन जिस तरह कुछ एकदम स्थानीय स्तर के मामलों में स्थिति को नियंत्रित करने के स्थान पर उसे और भी विकराल बनने की छूट देकर देश के दूसरे हिस्सों में भी फैलने दिया गया, उसमें केद्र के हस्तक्षेप की पर्याप्त गुंजाइश होते हुए भी उसका आंख-कान बंद कर लेना किसी भी प्रकार से उचित नहीं ठहराया जा सकता।

गणतंत्र दिवस के राष्ट्रीय त्योहार पर जम्मू-कश्मीर के शोपियां जिले के गनोपोरा गांव में एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत सैकड़ों की संख्या में पत्थरबाजों ने सेना की गढ़वाल यूनिट के एक काफिले पर अचानक हमला बोल दिया। सेना के एक अधिकारी को घेरकर जान से मारने और उनके हथियार छीनने की कोशिश भी की। इस पर सेना ने अपने बचाव में फायरिंग की। जिससे कई लोग घायल हो गए, इनमें से दो जावेद अहमद भट्ट और सुहैल जावेद लोन की बाद में मृत्यु हो गई। आत्म-रक्षा में चलाई गोली के कारण सेना की गढ़वाल यूनिट के 10 सैनिकों के विरुद्ध हत्या और हत्या की कोशिश में धारा–302 का मुकदमा स्थानीय पुलिस ने पंजीकृत कर लिया है। इस मामले में देश के मुख्यधारा के मीडिया ने आश्चर्यजनक रूप से मौन धारण कर रखा है।

इस घटनाक्रम के बाद पत्थरबाजों की मौत पर जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण से बात की और कहा कि एक भी नागरिक की मौत पर घाटी में चल रही शांति वार्ता को झटका लगता है। राज्य सरकार के एक प्रवक्ता के अनुसार, “रक्षा मंत्री ने मुम. मुफ्ती को आश्वस्त किया कि वे इस बारे में विस्तृत रिपोर्ट मांगेंगी और सेना को निर्देश देंगी कि भविष्य में ऐसी घटना दोबारा नहीं होनी चाहिए। मुख्यमंत्री ने जिला प्रशासन को पूरे मामले की जांच के लिए आदेश दिये हैं।”

इस पर सेना के एक प्रवक्ता का कहना था कि ‘सेना के एक काफिले पर करीब 100-150 पत्थरबाजों ने हमला कर दिया, बाद में उनकी संख्या बढ़कर 200-250 तक पहुंच गई। भीड़ ने सेना की चार गाड़ियों को भारी नुकसान पहुंचाया और उन्हें जलाने की कोशिश की। उग्र भीड़ ने सेना के एक अधिकारी को घेरकर जान से मारने और उनके हथियार छीनने की कोशिश भी की। अधिकारी को भीड़ का शिकार होने और सरकारी गाड़ियों को जलने से बचाने के लिए सेना ने कार्रवाई की। इसमें गोली लगने से सात लोग घायल हुए और दो नागरिकों की मौत हो गई। इसके अलावा 11 गाड़ियों को भी नुकसान हुआ है। जम्मू-कश्मीर पुलिस ने इस मामले में सेना की उक्त यूनिट के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा–302 (इरादतन) के तहत मुकदमा दर्ज किया है।’

यह कोई पहला मामला नहीं है जब अपना सैनिक दायित्व निभा रहे सैनिकों के विरुद्द इस संगीन धारा के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है। इससे पहले बारामूला जिले के चंदूशा क्षेत्र में गत वर्ष अप्रैल में अर्द्ध-सैनिक बल बीएसएफ के एक जवान के खिलाफ इसी धारा के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था। उक्त घटना में अर्द्ध-सैनिक बल की गाड़ी को कुछ कश्मीरी युवकों ने रोक लिया और उस पर पत्थरबाजी करने लगे। जवानों के बार-बार मना करने के बाद भी वे नहीं माने तो एक जवान को मजबूरन आत्मरक्षा के लिए गोली चलानी पड़ी। फायरिंग से घायल एक पत्थरबाज सज्जाद हुसैन की मौत हो गई।

इसके बाद स्थानीय लोगों ने सेना और सुरक्षाबलों के खिलाफ मोर्चाबंदी कर उनको घेर लिया। क्षेत्र में अफरा-तफरी का माहौल फैल गया और तमाम व्यापारिक संगठनों ने सुरक्षाबलों के खिलाफ जमकर प्रदर्शन किया। दुकानें बंद हो गईं और लोग धरना करने लगे। इसके बाद कश्मीर पुलिस ने गोली चलाने वाले बीएसएफ जवान के खिलाफ धारा–302 लगा कर मुकदमा दर्ज कर दिया।

यह जग-जाहिर है कि कश्मीर में लम्बे समय से स्थितियां असामान्य हैं और वहां अराजक तत्व जब-तब उपद्रव तथा सैन्यकर्मियों पर सशस्त्र हमले करते रहते हैं। ऐसे में भारी तनाव के बीच सेना, सुरक्षाबलों या पुलिस को स्थानीय अराजक तत्वों, पत्थरबाजों और आतंकवादियों के साथ सख्ती बरतनी पड़ती है। अनेक बार सख्ती में ढील देकर देखा जा चुका है लेकिन इसका फायदा उठा कर उपद्रवी लोग सेना, सुरक्षाबलों या पुलिस को ही निशाना बना डालते हैं। इसलिए सेना, सुरक्षाबलों या पुलिस का सख्त रवैया जरूरी हो जाता है। यदि वे ऐसा न कर उनके साथ नरमी से पेश आयेंगे तो समस्याएं और भी ज्यादा जटिल हो जायेंगी।

देशभर के नौजवान सेना और अर्द्धसैनिक बलों में भर्ती होकर बतौर सैनिक जो कुछ भी करते हैं, वह सब देश की संप्रभुता, सुरक्षा और शांति को बचाए रखने के लिए ही होता है। इस पवित्र उद्देश्य के लिए उनके दायित्व-निर्वहन और बलिदान के बदले उन्हें सेना से बर्खाश्त कर या फिर कोई दूसरी सजा देकर उन्हें दंडित किया जाता है, तो यह बहुत ही दुखद है। निश्चित रूप से इससे देश की सेना और सुरक्षाबलों के जवानों का मनोबल गिरता है। इस प्रकार सरकार द्वारा अपने राजनीतिक लाभ के लिए सैनिकों और अर्ध-सैनिक बलों को बलि का बकरा बनाना देश के लिए घातक सिद्ध होगा।

श्यामसिंह रावत
वरिष्ठ पत्रकार
30-01-2018
ssrawat.nt@gmail.com

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पीएम के गृहनगर में भाजपा फ्लॉप, गुजरात में 6 मंत्री चुनाव हारे, हिमाचल में भाजपा के भावी सीएम हारे

पीके खुराना

जीत-हार के चुनावी सबक : हिमाचल प्रदेश और गुजरात के चुनाव अपने आप में अनोखे रहे। पहली बार ऐसा हुआ कि चुनाव के दौरान और चुनाव के बाद हम सबको गहराई से सोचने पर विवश किया। बहुत से विश्लेषण हुए और विद्वजनों ने अपनी-अपनी राय रखी। सच तो यह है कि हिमाचल प्रदेश और गुजरात विधानसभा के चुनाव परिणामों में मतदाताओं ने सत्तारूढ़ दल, विपक्ष और चुनाव आयोग को अलग-अलग संदेश दिये हैं। आइये, इन संदेशों को समझने का प्रयत्न करते हैं। नरेंद्र मोदी ने गुजरात जीत कर दिखा दिया है लेकिन उनकी जीत में हार का कसैला स्वाद भी शामिल है।

यह एक कटु सत्य है कि भाजपा गुजरात हार चुकी थी और अमित शाह की रणनीति तथा ब्रांड मोदी के प्रभामंडल ने भाजपा को गुजरात वापिस उपहार में दिला दिया। अमित शाह और नरेंद्र मोदी न होते तो गुजरात किसी भी हालत में भाजपा की झोली में न जाता। सौराष्ट्र का जल संकट, किसानों के लिए अलाभप्रद होती जा रही खेती, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में लूट का आलम, बढ़ती बेरोज़गारी और विभिन्न आंदोलनों आदि की गंभीरता को अमित शाह और नरेंद्र मोदी भी तभी समझ पाये जब चुनाव प्रचार के दौरान उनका मतदाताओं से सामना हुआ, अन्यथा वे सिर्फ अपनी नीतियों का ढोल पीटने में ही मशगूल थे। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने जीएसटी के नियमों में तुरत-फुरत परिवर्तन किया और व्यापारियों की नाराज़गी दूर करने में सफल हुए। मोदी ने मणिशंकर अय्यर द्वारा ‘नीचÓ शब्द के प्रयोग को खूब भुनाया।

जमीन पर कांग्रेस का संगठन न होना, पाटीदारों का बंट जाना और नरेंद्र मोदी का गुजराती होना भी उनके काम आया। अमित शाह ने हमेशा की तरह इस चुनाव में भी बूथ-स्तर तक स्वयं को जोड़ा और संगठन शक्ति के कारण सत्ता में वापिस आये। इस बार पहली बार मतदान का प्रतिशत 71.3 प्रतिशत से घटकर 68.5 प्रतिशत पर आ गया, और महिलाओं तथा ग्रामीण क्षेत्रों में इसका स्पष्ट प्रभाव देखने को मिला। भाजपा और कांग्रेस, दोनों के वोट प्रतिशत बढ़े। भाजपा का वोट प्रतिशत सन् 2012 के 47.8 प्रतिशत से बढ़कर 49.1 प्रतिशत हो गया जबकि इसी दौरान कांग्रेस का वोट प्रतिशत 38.9 प्रतिशत से बढ़कर 41.4 प्रतिशत हो गया। लेकिन इसमें जो बड़ा पेंच है, वह यह है कि भाजपा का वोट बैंक शहरी क्षेत्रों में इतना अधिक बढ़ा कि उसने उसके कुछ वोट प्रतिशत को बढ़ा दिया जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में भाजपा को वोट प्रतिशत में जबरदस्त हानि हुई है। यही कारण है कि उसे शहरी क्षेत्र की 85 प्रतिशत सीटों पर जीत मिली जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में कांग्रेस उस पर हावी रही।

दूसरी ओर, किसी बड़े स्थानीय नेता तथा संगठन के अभाव ने कांग्रेस को शहरी क्षेत्रों में मात दिलाई। हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर के समर्थन का कांग्रेस को लाभ मिला। यह कहना सरासर गलत है कि हार्दिक पटेल फैक्टर फेल हो गया। कांग्रेस को हार्दिक पटेल के समर्थन का भी लाभ मिला ही है। गुजरात में कांग्रेस-नीत गठबंधन एक मजबूत विपक्ष के रूप में उभरा है। देखना यह होगा कि अगले पांच सालों में इसकी भूमिका क्या रहती है और वे सत्तारूढ़ पक्ष की नीतियों को जनता के हक में कितना प्रभावित कर पाते हैं।
गुजरात में प्रधानमंत्री के गृहनगर में भाजपा हारी है, भाजपा के 6 मंत्री चुनाव हार गए हैं और हिमाचल प्रदेश में भी भाजपा के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार प्रेम कुमार धूमल चुनाव हार गए हैं।

संदेश स्पष्ट है कि यदि आप अपनी नीतियों को लेकर सिर्फ गाल बजाते रहेंगे और जनता की बात नहीं सुनेंगे तो जनता भी आपको नकार देगी फिर चाहे नेता कितना ही बड़ा क्यों न हो। सन् 2014 के लोकसभा चुनाव के समय राहुल गांधी को अमेठी में इसी स्थिति का सामना करना पड़ा था जब प्रियंका को मैदान में आकर स्थिति संभालनी पड़ी थी, लेकिन उसके बाद कोई और रचनात्मक कार्य न होने के कारण नतीजा यह रहा कि अमेठी में स्थानीय निकायों के चुनाव में कांग्रेस का सफाया हो गया।

राहुल गांधी के लिए जनता का स्पष्ट संदेश है कि वे संगठन मजबूत करें और जनता से संपर्क बनाएं। गुजरात में राहुल ने इसकी अच्छी शुरुआत की है और लगता है कि अब वे संगठन की मजबूती पर भी काम करेंगे। उनकी कार्यशैली ही उनका और कांग्रेस का भविष्य तय करेगी। फिलहाल राहुल गांधी को जो सबसे बड़ा लाभ मिला है वह यह है कि वे न केवल वरिष्ठ कांग्रेसजनों का विश्वास फिर से हासिल करने में कामयाब हुए हैं बल्कि शेष विपक्ष भी अब उन्हें नई निगाह से देखने लगा है और कोई बड़ी बात नहीं कि आने वाले वर्षों में वे यूपीए के चेयरमैन के रूप में भी वैसे ही स्वीकार्य हो जाएं जैसी कि सोनिया गांधी रही हैं।

यह लोकतंत्र का सर्वाधिक दुर्भाग्यपूर्ण क्षण है कि इस देश में पहली बार चुनाव आयोग को शक की निगाह से देखा गया है। खबर यह भी है कि मुख्य चुनाव आयुक्त अरुण कुमार जोती, ईवीएम के चिप बनाने वाली कंपनी से जुड़े रहे हैं। यह लोकतंत्र पर बड़ा धब्बा है। नरेंद्र मोदी सभी संवैधानिक संस्थाओं को प्रभावहीन बनाने की जुगत में हैं जो बहुत खतरनाक है और इसके दूरगामी परिणाम होंगे। चुनाव आयोग को शक के दायरे से बाहर होना चाहिए। तकनीक के इस युग बैलेट पेपर पर वापिस लौटने की जिद बेमानी है लेकिन ईवीएम पर यदि शक की सुई है तो इसे दूर होना ही चाहिए।

मतदाताओं ने स्पष्ट रूप से बता दिया है कि यदि नेता, जनता से कट जाते हैं और अपने बड़े कद की खुमारी में रहते हैं तो जनता भी उन्हें सबक सिखाने में गुरेज़ नहीं करेगी। अमेठी में कांग्रेस की हार, वडनगर में भाजपा की हार और हिमाचल प्रदेश में धूमल की हार का सबक यही है कि जनता किसी को माफ नहीं करेगी, फिर वह चाहे प्रधानमंत्री हो या सबसे बड़े राष्ट्रीय दल का नेता ही क्यों न हो। अमित शाह ने गुजरात में हर स्तर पर मतदाताओं से संपर्क साधा और उन्हें आश्वस्त किया, मोदी ने जीएसटी के नियम ढीले किये, तब जाकर वे सत्ता बनाये रख पाने में सफल हुए। देखना यह है कि मोदी शेष नियम और नीतियां तय करते समय भी गुजरात का सबक याद रखेंगे या नहीं। जनता का एक और संदेश बहुत स्पष्ट है कि घोषणाओं से उसका पेट नहीं भरता, योजनाओं का जमीनी अमल ही परख की एकमात्र निशानी है।

मीडिया लंबे समय से बताता आ रहा है कि घोषणाओं का कार्यान्वयन न के बराबर है। प्रधानमंत्री मोदी की “मेक इन इंडिया”, “स्किल इंडिया”, “स्टार्ट-अप इंडिया”, “स्टैंड-अप इंडिया”, “स्वच्छ भारत अभियान”, “नमामि गंगे”, “स्मार्ट पुलिस”, “स्मार्ट सिटी” आदि घोषणाएं फाइलों की धूल फांक रही हैं और इनकी असफलता ने नरेंद्र मोदी को सही अर्थों में जुमलेबाज बना डाला है।

गुजरात में भाजपा की जीत में उसकी हार छिपी है और कांग्रेस की हार में उसकी जीत छिपी है, लेकिन हिमाचल प्रदेश का सबक स्पष्ट है कि सत्ता में रहते हुए भी यदि आपने जनता से संपर्क नहीं रखा तो जनता आपको सिंहासन से उतार देगी। कांग्रेस के विधानसभा चुनावों में उत्तरोत्तर हार का यह एक बड़ा कारण है। इससे कांग्रेस और भाजपा, दोनों ही सबक सीख सकते हैं। लेकिन वे कितना सीखेंगे, कितना मंथन करेंगे और मंथन का कितना नाटक करेंगे, यह कहना इसलिए मुश्किल है क्योंकि किसी भी राजनीतिक दल में आंतरिक लोकतंत्र नहीं है और बड़े नेताओं के सामने कोई मुंह खोलने की हिम्मत नहीं करता। राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र के बिना असली परिवर्तन की गुंजायश बहुत कम है। हम आशा ही कर सकते हैं कि नेतागण इस स्थिति में सुधार के लिए अहंकार का परित्याग करके कुछ ठोस काम करेंगे। आमीन!

लेखक पी. के. खुराना दो दशक तक इंडियन एक्सप्रेस, हिंदुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण, पंजाब केसरी और दिव्य हिमाचल आदि विभिन्न मीडिया घरानों में वरिष्ठ पदों पर रहे। सन् 1999 में उन्होंने अपनी जनसंपर्क कंपनी “क्विकरिलेशन्स प्राइवेट लिमिटेड” की नींव रखी। उनकी दूसरी कंपनी “दि सोशल स्टोरीज़ प्राइवेट लिमिटेड” सोशल मीडिया के क्षेत्र में है। उनकी एक अन्य कंपनी “विन्नोवेशन्स” राजनीतिज्ञों एवं राजनीतिक दलों के लिए कांस्टीचुएंसी मैनेजमेंट एवं जनसंपर्क का कार्य करती है। एक नामचीन जनसंपर्क सलाहकार, राजनीतिक रणनीतिकार एवं मोटिवेशनल स्पीकर होने के साथ-साथ वे एक नियमित स्तंभकार भी हैं।

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कश्मीर समस्या का एकमात्र हल

पी.के. खुराना

2014 के लोकसभा चुनावों से पहले नरेंद्र मोदी ने कई नारे उछाले थे, उनमें से एक नारा था — “मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सीमम गवर्नेंस”। मोदी ने तब यह नारा देकर लोगों का दिल जीता था क्योंकि इस नारे के माध्यम से उन्होंने आश्वासन दिया था कि आम नागरिकों के जीवन में सरकार का दखल कम से कम होगा। लेकिन आज हम जब सच्चाई का विश्लेषण करते हैं तो पाते हैं कि यह भी एक जुमला ही था। अमित शाह ही नहीं खुद मोदी भी गुजरात के विधानसभा चुनाव के लिए गुजरात में प्रचार कर रहे हैं। अमित शाह के साथ बहुत से विधायक, सांसद, केंद्रीय मंत्री और भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री भी राज्य में दिन-रात एक किये दे रहे हैं। लगता है मानो देश की सारी सरकारें गुजरात में सिमट आई हैं। गुजरात विधानसभा चुनावों के कारण संसद का सत्र नहीं बुलाया जा रहा है ताकि संसद में असहज सवालों से बचा जा सके, वे सवाल मतदाताओं की निगाह में न आ जाएं। इसी प्रकार चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय को प्रभावित करने के सफल-असफल प्रयास न तो गवर्नेंस हैं और न ही “मिनिमम गवर्नमेंट” के उदाहरण हैं।

उद्यम के विस्तार के लिए तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में आयोजित सम्मेलन में मोदी की उपस्थिति आवश्यक थी क्योंकि यह एक ऐसा कार्यक्रम है जो देश की अर्थव्यवस्था की मजबूती में सार्थक भूमिका निभा सकता है। गुजरात के विधानसभा चुनावों के बीच भी मोदी ने हैदराबाद के सम्मेलन के लिए समय निकाला क्योंकि वे अंतरराष्ट्रीय नेताओं से मिलकर बहुत खुश होते हैं, अच्छी खबर बन जाती है और इस सम्मेलन की उपलब्धियों को वे गुजरात के चुनाव में भी भुना सकते हैं। लेकिन गुजरात के विधानसभा चुनावों की आपाधापी में हम सब एक ज्वलंत समस्या, यानी कश्मीर को भुलाए दे रहे हैं।

वोट पाने के लिए भाजपा के काम करने का तरीका बहुत बारीकी से बुना जाता है। गुजरात में नोटबंदी और जीएसटी से व्यापारियों में इस हद तक नाराज़गी थी कि कांग्रेस का एक छोटा-सा ट्वीट “विकास पागल हो गया है” सोशल मीडिया पर वायरल होकर अपने आप में एक बड़ा मुद्दा बन गया। इसके बाद गुजरात में राहुल गांधी की लोकप्रियता और कांग्रेस की स्वीकार्यता बढ़ी। जनता का मूड भांप कर भाजपा ने अपनी रणनीति में परिवर्तन किया और जीएसटी की दरें घटाईं, जीएसटी फाइल करने की कठिनाइयों को दूर करने का प्रयत्न किया और व्यापारी वर्ग को यह संदेश दिया कि भाजपा उनके साथ है। नीतियों में आनन-फानन में परिवर्तन के अलावा अपनी जानी-पहचानी रणनीति के मुताबिक मतदाता सूची पर आधारित पन्ना-प्रमुख, शक्ति केंद्र आदि की संरचना करके संगठन को न केवल मजबूत किया बल्कि उस संगठन के माध्यम से घर-घर पहुंचना सुनिश्चित किया। मतदाताओं तक पहुंचने के भाजपा के विशद कार्यक्रम का लाभ भाजपा को मिलना निश्चित है। अमित शाह की यह कार्य-प्रणाली सचमुच प्रभावशाली है। विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा की जीत इसका प्रमाण है।

हाल ही में छत्तीसगढ़ के एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता से बातचीत में एक रोचक तथ्य सामने आया। नाम ज़ाहिर न करने की शर्त पर उन्होंने बताया कि दिल्ली से जो कांग्रेसी नेता छत्तीसगढ़ आते हैं, उनका काफी प्रचार होता है, वे तामझाम के साथ आते हैं, स्वागत करवाते हैं, कुछ बड़े नेताओं से मिलते हैं, प्रेस कांफ्रेंस करते हैं और दिल्ली लौट जाते हैं जबकि भाजपा के केंद्रीय नेता बिना किसी तामझाम के पहुंचते हैं, नेताओं से मिलने के बाद गांवों में जाते हैं, कार्यकर्ताओं से मिलते हैं, उनसे चर्चा करते हैं, उन्हें सुझाव देते हैं और एक स्फूर्तिदायक माहौल बनाकर वापस जाते हैं।

कश्मीर की समस्या पर टिप्पणी करते हुए भाजपा की चुनावी रणनीति का विश्लेषण करना इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि भाजपा इसी रणनीति पर चलकर कश्मीर की समस्या का हल कर सकती है। कश्मीर के लोगों में नाराज़गी है, केंद्र सरकार से उनकी कई अपेक्षाएं हैं जो पूरी नहीं हो रही हैं। बातचीत के कई दौर असफल हो चुके हैं, मोदी सरकार की ओर से कश्मीर के लिए नियुक्त वार्ताकार दिनेश्वर शर्मा का तीन दिन तक विभिन्न प्रतिनिधिमंडलों से मिलकर बातचीत का हालिया दौर भी उससे अलग नहीं है क्योंकि इसके लिए कोई सोची-समझी रणनीति बनाने के बजाए बहुत उथले ढंग से प्रयास किया गया है। अलगाववादी नेताओं की बात तो छोड़िये, मुख्यधारा के बहुत से नेता भी उनसे बेदिली से ही मिले। भारत सरकार ने इंटेलिजेंस ब्यूरो के पूर्व मुखिया दिनेश्वर शर्मा को जम्मू-कश्मीर का मुद्दा सुलझाने के लिए वार्ताकार नियुक्त किया और उन्हें किसी से भी बात करने की स्वतंत्रता दी।
दिनेश्वर शर्मा की वापसी के बाद स्थानीय लोगों की प्रतिक्रिया केंद्र सरकार की आशाओं के अनुरूप नहीं थी। वस्तुत: ऐसी कार्यवाहियों से अविश्वास और बढ़ता है, नाउम्मीदी और बढ़ती है।

इसकी बजाए भाजपा के केंद्रीय नेताओं को कश्मीर जाकर वहां के स्थानीय नेताओं से बातचीत करनी चाहिए और उनके साथ मिलकर कश्मीर के लोगों से अनौपचारिक चर्चा करनी चाहिए। आम लोगों के साथ अनौपचारिक चर्चा में बहुत से छोटे-छोटे मुद्दे उभर कर सामने आयेंगे, जिनका हल बहुत आसान है लेकिन समस्या बने रहने पर वे नाराज़गी के बड़े कारण बन जाते हैं। कश्मीर के लोगों के अनौपचारिक संपर्क की यह प्रक्रिया न तो आसान होगी और न ही अल्पकालिक। यह एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है, लेकिन यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके परिणाम सार्थक होने की संभावनाएं सबसे ज्य़ादा हैं। समस्या यह है कि भाजपा के एजेंडे में कश्मीर प्राथमिकता पर नहीं है और कश्मीर समस्या के हल के लिए भाजपा रचनात्मक ढंग से नहीं सोच रही है।

कश्मीर में हाल ही में एक घटना हुई है जिससे भाजपा कुछ सीख ले सकती है। उत्तरी कश्मीर का निवासी एक नवयुवक उमर खालिक मीर उर्फ समीर इसी वर्ष मई में लश्कर में शामिल होकर उग्रवादी बन गया था। इसी 3 नवंबर को सेना जब एक गांव में तलाशी अभियान चला रही थी तो उन्हें एक घर में इस युवक की मौजूदगी की भनक मिली। बहुत प्रयासों के बाद भी जब उमर खालिक समपर्ण के लिए तैयार नहीं हुआ तो सेना के अधिकारियों ने वहां से 5 किलोमीटर दूर स्थित उसके घर में उसकी मां से संपर्क किया और उन्हें आश्वासन दिया कि यदि उनका बेटा समर्पण कर देगा तो वे उसके साथ नरमी का व्यवहार करेंगे। मां की अपील पर उमर खालिक ने समपर्ण कर दिया। इसके बाद उभरते हुए फुटबॉल खिलाड़ी मज़ीद अर्शद खान द्वारा मुख्यधारा में लौटने के बाद एक और मां ने अपने बेटे को उग्रवाद की राह छोड़ने के लिए अपील जारी की है। कश्मीर की महिला फुटबॉल खिलाड़ी और कोच अफशाना को भी एक बार ऐसे हालात में घिरना पड़ा जहां वे पुलिस पर पथराव में शामिल हो गईं। पत्थरबाजी करते हुए उनकी तस्वीर वायरल हो गई तब उन्हें समझ आया कि उनसे क्या गलती हुई है। वे मानती हैं कि हिंसा उनके मसले का हल नहीं है। यही नहीं, हाल ही में जम्मू-कश्मीर में महिलाओं की 13 क्रिकेट टीमों ने एक साथ अपने हुनर का प्रदर्शन किया।

क्या हम खिलाड़ियों को इन भटके युवाओं का आदर्श बना सकते हैं, क्या हम कश्मीर की फिज़ा बदलने के लिए कुछ उदारवादी धार्मिक नेताओं, समाज सेवकों, शिक्षकों और पत्रकारों आदि की सहायता ले सकते हैं, क्या हम कश्मीर में किसी नये नाम से कोई ऐसा संगठन खड़ा कर सकते हैं जो धीरे-धीरे स्थानीय लोगों में पैठ बनाकर उनका विश्वास जीत सके? मोदी जी के लिए गुजरात जीतना जितना अहम मुद्दा है, कश्मीर में शांति स्थापित करना हम भारतीयों के लिए उससे भी ज्य़ादा अहम मुद्दा है। क्या मोदी जी इस ओर ध्यान देंगे?

लेखक पी. के. खुराना दो दशक तक इंडियन एक्सप्रेस, हिंदुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण, पंजाब केसरी और दिव्य हिमाचल आदि विभिन्न मीडिया घरानों में वरिष्ठ पदों पर रहे। वे एक नामचीन जनसंपर्क सलाहकार, राजनीतिक रणनीतिकार एवं मोटिवेशनल स्पीकर होने के साथ-साथ वे एक नियमित स्तंभकार भी हैं और लगभग हर विषय पर कलम चलाते हैं। संपर्क : pkkhurana@gmail.com

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चार महीने पहले रेल टिकट कटाने वाले इंजीनियर का दिवाली पर घर जाने का सपना ‘वेटिंग’ ही रह गया!

Yashwant Singh : हरिद्वार में कार्यरत इंजीनियर गौरव जून महीने में तीन टिकट कटाए थे, दिल्ली से सहरसा जाने के लिए, अपनी बहनों के साथ। ट्रेन आज है लेकिन टिकट वेटिंग ही रह गया। चार्ट प्रीपेयर्ड। लास्ट मोमेंट में मुझे इत्तिला किया, सो हाथ पांव मारने के बावजूद कुछ कर न पाया। दिवाली अपने होम टाउन में मनाने की उनकी ख्वाहिश धरी रह गई। दिवाली के दिन अपने जिला-जवार में होने की चार महीने पहले से की गई तैयारी काम न आई।

धन्य है अपना देश। धन्य है भारतीय रेल। हां, सत्ता के नजदीकियों के चिंटू पिंटू मिंटू जब चाहें टिकट कटा कर सीधे रेल मंत्रालय से कन्फर्म करा सकते हैं। सरकार चाहें कांग्रेसियों की हो या संघियों की, इस देश में दो देस होने का एहसास बना रहेगा।

भड़ास एडिटर यशवंत की उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आए कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं…

Dushyant Rai प्रभु ने जुलाई में वेटिंग खत्म करने की बात कभी नहीं की थी।वाजपेयी सरकार के मालगाड़ियों के लिए अलग लाइनों (DFC)को अगर यूपीए सरकार ने पूरा किया होता तो आज किसी को टिकट के लिए रोना नहीं पड़ता। इस सरकार को एक साथ कई मोर्चों पर काम करना पड़ रहा है।मालगाड़ी में अधिकतम लोडिंग करने से पुरानी पटरियों की भी हालत गंभीर हो गई थी।हजारों किलोमीटर के ट्रैक पर 2 करोड़ यात्रियों को ढोते हुए भी यह सरकार अगले साल से कई रूटों पर DFC शुरू कर देगी। लगभग 3 साल में सबको बर्थ मिलने लगेगी और यात्रा का समय भी काफी कम हो जाएगा।

Rajiv Tiwari दूर तक साफ दिखाने वाला चश्मा लगाइए, मोदी लेंस को बदलकर।

Dushyant Rai अलीगढ़ से कानपुर की यात्रा ट्रेन यात्रा आम आदमी बन कर कीजिए, काम की गति और क्वालिटी देखकर आप को अपने कमेंट के लिए बड़ी शर्म आएगी।

Rajiv Tiwari शर्म आती है दुष्यंत जी, आप जैसे अंध समर्थकों पर, जो यह मानते है भारत निर्माण केवल 3 वर्षों में हुआ है। वरना पहले तो विशाल बियाबान जंगल था यहां। ट्रेन तो लोगों ने देखी ही नहीं थी…हैं ना सही बात।

Yashwant Singh भाई Rajiv Tiwari, दुष्यंत जी अपने पुराने मित्र और खरे आदमी हैं। रेल मंत्रालय से जुड़े हैं। हम लोगों को इनकी बात को गंभीरता से सुनना चाहिए। दूसरा पक्ष हमेशा महत्वपूर्ण होता है। मालगाड़ी और यात्री रेल की लाइन अलग किए जाने की व्यवस्था से निश्चित रूप से फर्क पड़ेगा।

Rajiv Tiwari सहमत हूँ यशवंत भाई, लेकिन पक्ष को संतुलित तरीके से रखना भी एक कला होती है।

Sanjaya Kumar Singh दुष्यंत राय जी, दो नहीं तीन मोर्चों पर कहिए। यूपीए सरकार ने बुलेट ट्रेन भी चला दी होती तो मोदी जी को उसपर भी मेहनत नहीं करनी पड़ती। और मेट्रो चलाया था तो उसका किराया बढ़ाकर खुश होने का मौका भी नहीं मिलता।

Yashwant Singh और ये भी सच है कि 60 साल में कांग्रेस अगर सबको यात्रा सुविधा प्रदान नहीं कर पाई तो प्राइमरी अपराधी हाथ का पंजा ही है। हां, bjp चीजों को ठीक करने के नारे के साथ आई थी तो इससे उम्मीद ज्यादा है और फिलहाल उम्मीदों पर खरा नहीं उतर सकी है। हो सकता है सही नीति पर अमल करके आगे चीजें ठीक कर दी जाएं, जिसका हम सबको इंतज़ार है।

Rajiv Tiwari संजय जी, बुलेट ट्रेन आने से देश का चहुँमुखी विकास हो जाने वाला है, जैसा पहले की सरकारों ने मेट्रो लाकर किया। चारों ओर सुख शांति, कहीं कोई परेशान नहीं, सर्व सुविधाओं की त्रिवेणी प्रवाहित हो रही है और हर देशवासी उसमें गोते लगाकर पुण्य बटोर रहा है।

Rajiv Tiwari ठीक कहा आपने यशवंत भाई, कांग्रेस ने 60 साल में जो कुछ किया उसका परिणाम उसके सामने है। लेकिन 3 साल में 6 दशकों पुरानी मैली गंगा साफ करने का दावा करने वाले ये बातों के शेर खुद कहाँ खड़े हैं।

Sanjaya Kumar Singh मूल मुद्दा ये है Yashwant Singh जी कि वेटिंग लिस्ट लेने की भी तमीज नहीं है। जब तीन या चार महीने पहले बुकिंग शुरू होती है और छठ के लिए महीने भर बाद ही वेटिंग शुरू हो जाता है तो ये तय होना चाहिए कि वेटिंग कितना बुक करना है, कब तक और जो बुक हो जाए उसे कंफर्म मिलना ही चाहिए। वैसे भी अब जब अंतिम समय पर कैंसल कराने वालों को नहीं के बराबर पैसे मिलते हैं तो कुछ सीटें खाली रह जाएं पर तीन महीने पहले बुक कराने वालों को अंतिम दिन पता चले कि कंफर्म नहीं हुआ और उसे डिफेंड किया जाए कि फलाने ने वो नहीं किया और ढिमाके ने वो नहीं किया – खरा आदमी होना तो नहीं हो सकता। नौकरी हो रही है – उससे मुझे कोई एतराज नहीं है।

Dushyant Rai भाई साहब रेल का नेटवर्क इतना विशाल और इतने बोझ से दबा है कि नई सरकार रेल लाइन बिछाने, विद्युतीकरण और पुरानी लाइन सुधार में लगभग तीन गुना गति से काम कर रही है फिर भी अभी तीन साल लगेगा जनता को अपेक्षित सुविधा मिलने में।

Sanjaya Kumar Singh आप ठीक कह रहे हैं। फिर भी, जब अंतिम समय में कैंसल कराने वाले को टिकट नहीं मिलता है तो क्या यह सुनिश्चित नहीं किया जाना चाहिए (जैसे भी और उसमें छठ स्पेशल ट्रेन में वैकल्पिक आरक्षण मिलने पर चाहिए कि नहीं पूछ लेना शामिल है) कि तीन महीने पहले अपनी जरूरत बताने वाले को निराश नहीं किया जाए। क्या इस जरूरत से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि रेलवे की लाचारी को डिफेंड किया जाए? निश्चित रूप से यह लाचारी 130 करोड़ की आबादी के कारण है और हर कोई नरेन्द्र मोदी होता तो यह स्थिति नहीं आती। पर ये कर दूगां, वो कर दूंगा – कहने से पहले भी यही स्थिति थी।

Shyam Singh Rawat मैं ट्रेन नंबर 15035 व 15036–उत्तरांचल सम्पर्क क्रान्ति एक्सप्रेस का इसकी शुरुआत से ही नियमित यात्री हूं जो काठगोदाम-दिल्ली रूट पर चलती है। यह ट्रेन पहले ISO 9000 तथा ISO 2001-2008 द्वारा प्रमाणित एक अच्छी सेवा थी। अभी 25 सितंबर को इस ट्रेन से दिल्ली जाना हुआ (Coach No.D-9), गाड़ी की हालत बहुत बुरी है। समय-पालन, डिब्बे के भीतर सफाई, कैटरिंग, पानी आदि सब चौपट। यहाँ तक कि मोबाइल चार्जिंग सुविधा भी खत्म। 4 अक्टूबर को इसी ट्रेन नं.–15036 से वापस आने के लिए जब दिल्ली स्टेशन पहुंचा तो नैशनल ट्रेन इक्वायरी सिस्टम पर इसका आगमन-प्रस्थान निर्धारित समय-सारणी के अनुसार ही क्रमश: 15.25 और 16.00 बजे दिखाया जा रहा था। जबकि सच्चाई यह थी कि यह ट्रेन 16.05 पर प्लेट फार्म सं―5 पर पहुंची और वहां से 16.35 पर काठगोदाम के लिए चली। यह ट्रेन अपने गंतव्य पर डेढ़ घंटा विलंब से पहुंची। इसकी शिकायत नये रेल मंत्री पीयूष गोयल से उनके फेसबुक पेज पर की जिसे कुछ ही पलों में डिलीट कर दिया गया था। शायद यह मोदी सरकार की कपटपूर्ण नीति के अनुसार ‘आल इस वैल’ दिखा कर देश में भ्रम का वातावरण बनाने का एक हिस्सा है।

Prashant M Kumar ऐसे में बस यही लगता है कि अपना देश भी परदेस हो गया

Sarwar Kamal इस देश मे दो देश होने का अहसास बना रहेगा

निखिलेश त्रिवेदी भारतीय रेलवे जैसी थी और है वैसी ही आगे भी रहेगी। कायाकल्प की उम्मीद नहीं है।

Pramod Patel यह सरकार भी फेल. . . जनता ने मौका दिया और जनता को ही लुट लिया. . .

Pankaj Kumar अरे बाबा, मैने खुद कोलकाता से मोतिहारी जाने के लिये आज से तीन महीने पहले दो टिकट एसी टू टियर की ली थी। वेटिंग 1 और 2 मिला था। आज तक सीट कंफर्म नहीं हुआ हैं। परिवार को ले जाना है इस हताशे से फ्लाइट से दूसरे रूट से टिकट लिया। जो सबकुछ मिलाकर करीब करीब चौगुना बजट बढ़ गया। सभी रेलवे के मिनिस्टर , अधिकारी कहते फिरते है कि रेलवे घाटे में चल रही है, कोई आदमी बतावें कि जिस दिन उसे यात्रा करना है और उस दिन टिकट उसे आराम से मिल जाये। सभी ट्रेनें सालों भर फ़ूल रहती है। ट्रेन की सीटों से ज्यादा रेलवे के कर्मचारी है। जो दिनभर ऑफिस में गप व डींगें हाँकते और मारते है। सैलरी लेते है सबसे ज्यादा। आखिर क्यों न रेलवे घाटे में जाये।

Sushant Saurav Kya kahein iske liye bjp se jyada congg jimmedar h agar 50 salon m Cong Kam krti to bjp aati hi nhi

Gajendra Kumar Singh प्रभु जी तो जुलाई से वेटिंग खत्म करने की घोषणा की थी । अब तो खुद ही खिसक गये ।

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मोदी को भगवान न बनाओ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर मंदिर बनाने की घोषणा क्रांति की जमीन मेरठ में एक सेवानिवृत्त अधिकारी ने की है। सिचाई विभाग से रिटायर इंजीनियर जेपी सिंह की माने तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जादू लोगों के सिर पर चढ़कर बोल रहा है। ऐसे में उनके नाम का मंदिर बनना चाहिए। ऊपरी तौर पर देखा जाए तो इस ऐलान के पीछे किसी की व्यक्तिगत इच्छा और भावना ही दिखाई देती है। पर रिटायर इंजीनियर की घोषणा एक लोकतांत्रिक देश में किसी नेता को भगवान बनाने की कोशिश भी दिखाई देती है। मामले को राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा जा सकता।

ऐसा नहीं है कि ऐसी घोषणा कोई पहली दफा देश में हुई है। प्रायः दक्षिण भारत से नेताओं और फिल्मी सितारों के मंदिर बनाने और पूजा करने की खबरे आती रही हैं। देश के कई राज्यों में कई लोगों ने अपने पंसदीदा नेताओं, फिल्मी सितारों और खिलाड़ियों के मंदिर बनाये हैं। वहीं अपने पंसदीदा सितारों और नेताओं की तस्वीर की पूजा करने वाले भी बढ़ी संख्या में है।

समर्थकों की ओर से अपने नेताओं के प्रति प्रेम दर्शाने के कइ्र्र मामले प्रकाश में आये हैं। लेकिन बसपा सुप्रीमो मायावती ऐसी नेता हैं जिन्होंने खुद ही अपनी मूर्तियां लगवाई हैं। यूपी की मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने राज्य के पार्कों, स्मारकों में दलित नेताओं, चिंतकों, और सुधारकों के साथ-साथ अपनी प्रतिमाएं भी लगवाई हैं। इन प्रतिमाओं को लेकर यूपी की सियासत भी कई बार गर्मा चुकी है। लेकिन मूर्तियां वहीं की वहीं हैं। मायावती की शान में ‘माया पुराण’ की रचना भी की गई है। जिसमें मायावती को समता मूलक समाज की आराध्य देवी कहा गया है।

मोदी संघर्ष के नेता हैं। स्टेशन पर चाय बेचने से लेकर देश के सबसे शक्तिशाली पद तक का उनका सफर आसान नहीं रहा। एक गरीब परिवार का लड़का आज दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का ध्वजवाहक है। मोदी का जीवन चरित्र और संघर्ष देश के लाखों-लाख देशवासियों के लिये प्रेरणादायी है। उनका जीवन अभाव और गरीबी में बीता। ऐसे में समाज का वंचित, पिछड़ा, गरीब, मजदूर, किसान और अभाव में जीवन यापन करने वाला हिस्सा मोदी को अपना रोल माडल मानता है। आबादी का यह बड़ा हिस्सा मोदी केे जीवन से किसी न किसी तरीके से प्रेरणा पाता है। विधार्थी और युवा विशेषकर बड़ी संख्या में प्रधानमंत्री मोदी को अपना रोल माडल मानते हैं।

भारत में फिल्मी सितारों के नाम पर मंदिर बनाया जाना कोई नई बात नहीं है। पहले इस तरह की खबरें केवल दक्षिण भारत से ही आती थीं। लेकिन अब देश के दूसरे हिस्सों से भी ऐसी खबरें सुनने में आती हैं। अभिनेत्री खुशबू के नाम का मंदिर तमिलनाडु के तिरूचिरापल्ली में मौजूद है और वो इस पर आश्चर्य व्यक्त कर चुकी हैं। खुशबू के अलावा ममता कुलकर्णी, नमीता, पूजा उमाशंकर के नाम पर भी मंदिर बातें की जाती हैं लेकिन अब तक उनकी पुष्टि नहीं हो सकी है। अमिताभ को पसंद करने वालों ने कुछ समय पहले कोलकाता में उनके नाम पर एक मंदिर बनाया था जहां उनकी पूजा होती है। शिवसेवा के संस्थापक बाल ठाकरे का भव्य मंदिर बनाया जा रहा है। चंद्रपुर जिले के भद्रावती में इस मंदिर के निर्माण के लिए भद्रावती नगर परिषद ने करीब पांच एकड़ जमीन दी है।

तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री और डीएमके अध्यक्ष एम करुणानिधि का मंदिर राज्य के वैलूर जिले में उनके समर्थको ने स्थापित किया है। डॉक्टर येदुगुड़ी सनदिंति राजशेखर रेड्डी को वाईएसआर के रूप में जाना जाता रहा. वे आंध्र प्रदेश के एक करिश्माई और लोकप्रिय नेता थे। वाईएसआर कांग्रेस पार्टी की इकाई ने विशाखापटनम में उनकी याद में एक मंदिर का निर्माण कराया। राजगोपालापुरम गांव में बने इस मंदिर को राजशेखरा रेड्डी अलायम नाम दिया गया है। मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले में 15 साल पहले देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजेपयी का मंदिर बनवाया गया था। सत्यनारायण टेकरी नाम की पहाड़ी पर बने इस मंदिर में बाकायदा एक पुजारी भी रखा गया हैै। उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले के एक गांव में मोदी की मूर्ति की रोज पूजा-अर्चना की जाती है। आरएसएस के कारसेवक और विश्व हिंदू परिषद के पदाधिकारी रह चुके बृजेंद्र मिश्र ने भगवानपुर गांव के शिव मंदिर में मोदी की प्रतिमा स्थापित की थी। उसके बाद मंदिर को नाम दिया गया था ‘नमो नमो मंदिर’। इस मंदिर में रोज सुबह और शाम मोदी की आरती और पूजा की जाती है. जिसमें गांव के लोग भी भाग लेते हैं।

आंध्र प्रदेश के महबूब नगर में एक कांग्रेसी नेता ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की एक बड़ी मूर्ति बनवाई। नौ फीट की इस मूर्ति को तेलंगाना टाल्ली नाम दिया गया। जिसका अर्थ होता है तेलंगाना की माता। इस काम को अंजाम दिया कांग्रेस नेता पी. शंकर राव ने. अलग तेलंगाना राज्य बनाने के पार्टी के फैसले के बाद सोनिया गांधी की यह मूर्ति स्थापित की गई। इसके अलावा कई बार सोनिया के देवी रूप वाले पोस्टर भी चर्चाओं में रहे हैं। बिहार के भभुआ जिले में भोजपुरी फिल्मों अभिनेता मनोज तिवारी ने पूजा-पाठ के साथ साल 2013 में क्रिकेट खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर की मूर्ति का अनावरण किया था। उनका मंदिर कैमूर जिले में बनवाया गया है। राजस्थान में बीजपी नेता और मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की पूजा करने वाले भी बहुत हैं। जोधपुर जिले में एक भाजपा नेता ने शहर के एक मंदिर में राजे का बड़ा सा पोस्टर लगाकर उनकी पूजा करनी शुरू कर दी। उस पोस्टर में वसुंधरा राजे को अन्नपूर्णा देवी के रुप में दिखाया गया है।

गुजरात के राजकोट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मंदिर एक स्थानीय संगठन ओम युवा समूह ने बनवाया है। करीब 300 लोगों के इस संगठन ने आपस में चंदा एकत्र कर मंदिर बनाने का सारा खर्च उठाया। मंदिर बनाने में 4-5 लाख रुपये का खर्च आया है। मंदिर का उद्घाटन एक केंद्रीय मंत्री को करना था लेकिन मोदी की नाराजगी के बाद कार्यक्रम रद्द हो गया।
मीडिया खबरों के मुताबिक यह मंदिर मेरठ के सरधना क्षेत्र में मेरठ-करनाल हाईवे पर बनेगा। इसके लिए पांच 5 एकड़ की जमीन भी तय कर ली गई है। इसमें मोदी की 100 फीट ऊंची मूर्ति लगेगी। मंदिर निर्माण में दस करोड़ का खर्च आएगा। मंदिर बनाने में आने वाली लागत मोदी भक्तों से चंदे के रूप में लिया जाएगा। मंदिर का भूमि पूजन 23 अक्टूबर को होगा। इसको बनने में करीब 2 वर्ष का समय लगेगा। इस मंदिर के उद्घाटन के लिए बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को बुलाने की कोशिश की जा रही है। उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में भी पुष्पराज सिंह यादव नाम के एक व्यक्ति ने जलालपुर में मोदी का मंदिर बनाने का काम शुरू किया था। करुणानिधि का भक्त कहने वाले एक व्यक्ति ने वेल्लूर में उनका मंदिर बनाया है।

किसी की पसंद-नापंसद और भावनाओं को रोका नहीं जा सकता। पर सवाल यह है कि इस सबसे क्या होगा, क्या देश का कुछ भला होगा? मोदी समर्थकों को शायद यह मालूम नहीं होगा कि मोदी खुद कभी ऐसा नहीं चाहेंगे। जिस देश में आज भी करीब 20 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन जीने को मजबूर हैं, करोड़ों लोगों को सिर ढकने के लिए एक अदद छत का सहारा नसीब नहीं है, न जाने कितने ही लोग भूखे पेट सोते हैं, वहां ऐसे मंदिरों की क्यों जरूरत पड़ने लगी।

इससे पूर्व भी गुजरात के राजकोट में 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मंदिर बनवाने की कोशिश की गई थी। ये कोशिश प्रधानमंत्री के समर्थकों की ओर से की गई थी। इस पर प्रधानमंत्री मोदी ने नाखुशी जताते हुए खबर को ‘स्तब्धकारी’ और ‘भारत की महान परंपराओं’ के खिलाफ बताया था। उन्होंने ट्वीट कर कहा था कि ‘किसी इंसान का मंदिर बनाना हमारी सभ्यता नहीं है, मंदिर बनाने से मुझे दुख हुआ है। मैं लोगों से ऐसा नहीं करने का आग्रह करता हूं।’ प्रधानमंत्री के ट्वीट के बाद राजकोट प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए वहां से मोदी की मूर्ति को हटवा दिया था। लेकिन उस प्रकरण से भी कोई सीख ना लेते हुए अब उत्तर प्रदेश के मेरठ में प्रधानमंत्री मोदी का भव्य मंदिर बनाने की बात कही जा रही है। हालांकि अभी तक मेरठ में मंदिर बनाए जाने के ऐलान पर पीएम मोदी की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन संभावना है कि प्रधानमंत्री जल्द ही इस पर पिछली बार की तरह कोई ठोस कदम उठाएंगे।

लोकतंत्र में किसी नेता को भगवान का दर्जा देना उसका सम्मान बढ़ाना कतई नहीं हो सकता। जनप्रिय नेता तो प्रत्येक देशवासी के दिल में बसता है। उसके लिये किसी मंदिर या पूजा स्थल की जरूरत नहीं होती है। जब जनता अपने प्रिय नेता के कंधे से कंधा मिलाकर देश विकास के कार्यों में जुटती है तो ज्यादा सकारात्मक परिणाम हासिल होते हैं। पीएम मोदी का मंदिर बनाने वाला रिटायर अधिकारी अगर उनका मंदिर बनाने की बजाय गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा देने के लिये विधालय, भूखों के लिये अन्न सेवा, पर्यावरण बचाने की मुहिम, नदियों की सफाई, स्वच्छता अभियान या विभिन्न सामाजिक कुरीतियों की दिशा में काम करे तो देशवासियों व प्रधानमंत्री को ज्यादा खुशी होगी।

मोदी पहले से ही 15 लाख वाले कोट के कारण काफी आलोचना झेल चुके हैं और अब यह मंदिर। ऐसे शगूफे वे नेता, समर्थक या प्रशंसक छोड़ते हैं जो जनता की सेवा करने में तो विफल रहते हैं, लेकिन अपने आकाओं की सेवा करना और चापलूसी का कोई अवसर गंवाना नहीं चाहते हैं। मोदी को भगवान बनाने से बेहतर है कि उन्हें सुशासन देने में ये नेता मदद करें। स्वयं प्रधानमंत्री खुद को प्रधान सेवक बता चुके हैं। इससे पूर्व जिन नेताओं या अभिनेताओं की मूर्तियां लगी या मंदिर उनके चाहने वालों न बनाएं, लेकिन यह जरूरी नहीं कि किसी गलत परिपाटी को लगातार आगे बढ़ाया जाए। समाज में इस चेतना का संचार भी जरूरी है। ऐसी प्रवृति पर रोक लगनी चाहिए, किसी लोकतांत्रिक देश में किसी नेता का मंदिर बनना शुभ लक्ष्ण नहीं है। क्योंकि इससे नेता या लोकतंत्र दोनों में से किसी एक का नुकसान होना लाजिमी है।

डॉ. आशीष वशिष्ठ
स्वतंत्र  पत्रकार
लखनऊ, उ0प्र0, (भारत)
मोबाइल: (+91) 94 5100 5200  
E-mail : avjournalist@gmail.com

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नए साल में मोदी सरकार के खिलाफ क्यों बिगुल बजाएंगे अन्ना हजारे, पढ़िए उनके दिल की बात

सरकार या प्रधानमंत्री ही जनता के साथ धोखाधडी करने लगे तो इस देश और समाज का क्या होगा : अन्ना हजारे लोकपाल, लोकायुक्त जैसे कानून जो कानून जनता को जलद गतीसे किफायतशीर न्याय दे सके। शासन-प्रशासन मे बढ़ते भ्रष्टाचार को नियंत्रण में लाये। शासन-प्रशासन में बढ़ते अनियमितताओं और मनमानी को प्रतिबंध लगे। स्वच्छ शासन और प्रशासन निर्माण हो। शासन और प्रशासन जनता को जवाबदेही हो। क्यों की जनता इस देश कि मालिक है। शासन-प्रशासन में बैठे सभी लोग जनता के सेवक है। शासन-प्रशासन व्यवस्था लोकतांत्रिक हो। इसलिए सरकार के काम मे जनता का सहभाग ऐसे ना कहते हुए लोगों के काम मे सरकार का सहभाग हों। यह परिवर्तन लाने की शक्ती शक्ती लोकपाल, लोकायुक्त कानून में हैं।

साथ साथ लोकपाल, लोकायुक्त पर सरकार का नियंत्रण ना रहते हुए जनता का नियंत्रण रहे। इसलिए प्रधानमंत्री सहित सभी मंत्री, सांसद, विधायक, सभी अधिकारी, कर्माचारी लोकपाल, लोकायुक्त के दायरे में होने चाहिए। अगर जनता ने सबुत के साथ शिकायत कि तो लोकपाल इन सबकी जाँच कर सकता है। दोषी मिलने पर सजा हो सकती है। इसलिए किसी भी पक्ष-पार्टी लोकपाल, लोकायुक्त कानून लाना नहीं चाहती।

हमारी टीम ने लोकपाल, लोकायुक्त कानून का बहुत अच्छा मसौदा बनाया था। उससे देश के भ्रष्टाचार पर सौ प्रतिशत नहीं लेकिन 80 प्रतिशत से जादा रोक लगनी थी। इसलिए 2011 में पुरी देश की जनता लोकपाल, लोकायुक्त कानून की मांग को ले कर रास्ते पर उतर गई थी। और तत्कालीन प्रधानमंत्री, उनकी सरकार और संसद ने जनता को लिखित आश्वासन दिया था की, हम लोग जल्द ही एक सशक्त लोकपाल, लोकायुक्त कानून पारित करेंगे। उस वक्त लोकसभा का अधिवेशन चल रहा था। जनता की तरफ से हमारी टीम ने जनता की सनद, हर राज्योंमें लोकायुक्त और क्लास 1 से 4 तक सभी अधिकारी, कर्मचारी लोकपाल, लोकायुक्त के दायरे में लाना, इन तीन मुद्दों को संसद में पारित किजिए, तब मै मेरा अनशन वापस लेता हूँ ऐसा बताया था। उसके बाद रात को एक बजे तक संसद का सत्र चलाया गया। बहस कर के इन तिनों मुद्दों पर संसद के दोनो सदनों में सर्व सम्मतीसे रिज्योलेशन पारित कर दिया। प्रधानमंत्रीजी ने लिखित आश्वासन दिया कि, तीनो मुद्दे दोनों सदनों ने सर्व सम्मती से पारित किए है। उसके बाद देश की जनता ने आंदोलन वापस लिया और मैने अपना अनशन तोड दिया।

संसद के दोनों सदनों ने सर्व सम्मती से रिज्योलेशन पारित हो किया था। लेकिन सरकार कार्यवाही नहीं कर रही थी। यह इस सरकार और प्रधानमंत्री कि पहली धोखाधडी रही।  इसलिए मैने 10 दिसंबर 2013 को रालेगणसिद्धी में फिर से आंदोलन शुरू किया। उसके बाद सरकार जाग गयी। और 17 दिसंबर 2013 को लोकपाल लोकायुक्त विधेयक को राज्यसभा में रखा गया। दोनों सदनों ने सर्व सम्मतीसे पारित भी किया गया। वास्तविक रूप से बिल को राज्यसभा में फिर से रखने कि जरूरत नहीं थी। फिर भी बिल को सदन में रखते हुए राज्योंमें लोकायुक्त स्थापना से संबंधित सभी धारायें हटा दी गई। और उस सरकारने लोकायुक्त कानून को कमजोर कर दिया। देश की जनता के साथ धोखाधडी किया। क्या यह दोनों संसद का अपमान नहीं है? उन्होंने भी जनता को बार बार बताया था कि भ्रष्टाचार मुक्त भारत के लिए हमारी सरकार प्रतिबद्ध है, कटीबद्ध है। फिर भी जनता के साथ धोखाधडी किया।

2014 में अब आज की नई सरकार सत्ता में आई। पहले सरकार ने लोकपाल, लोकायुक्त कानून कमजोर किया था। लेकिन जो कुछ बचा हुआ कानून था वह नई सरकार लागू करेगी ऐसे लगा था। लेकिन नई सरकारने भी 18 दिसंबर 2014 को और एक संशोधन बिल संसद में पेश किया। वह सिलेक्ट कमिटी के पास भेजा गया। सिलेक्ट कमिटीने अच्छे सुझाव देने के बाद भी यह बिल अब तक प्रतिक्षित रखा गया हैं। वह तुरन्त पारित करना चाहिए था। लेकिन नही किया गया। सिलेक्ट कमेटी के अच्छे सुझावओंको नहीं लेते हुए सिर्फ धारा 44 में बदलाव किया गया।

उसके बाद 27 जुलाई 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी ने अपने विशेषाधिकार के जरिए लोकसभा में लोकपाल, लोकायुक्त (संशोधन) बिल 2016 पेश किया। कानून की धारा 44 में बदलाव कर के इस कानून को कमजोर करने की और एक कोशिश की गयी। विशेषता यह हैं की, बिल 27 जुलाई को लोकसभा मे रखा और कोई बहस ना करते हुए केवल ध्वनी मत से एक दिन में पास किया गया। दुसरे दिन 28 जुलाई 2016 को राज्यसभा में रखा और फिर बिना बहस ध्वनी मत से पारित किया गया।  29 जुलाई 2016 को राष्ट्रपतीजी के पास भेजा और राष्ट्रपतीजी ने तुरन्त उसी दिन बिल पर हस्ताक्षर किए। इस तरह लोकपाल, लोकायुक्त कानून को तोडमोड करनेवाला कानून सिर्फ तीन दिन में बनाया गया।

लोकपाल, लोकायुक्त कानून बनाने में पांच साल में नहीं हो सकता। लेकिन इस कानून को तोडमोड करनेवाला बिल तीन दिन में बनता है। यह देशवासियों के साथ बहुत बडी धोखाधडी है। इस प्रकार को देखते हुए लगता है कि, प्रधानमंत्री हम जनता को कह रहे हैं कि भ्रष्टाचार मुक्त भारत का संकल्प करो। ऐसे स्थिती में जनता उनपर कैसे विश्वास करें? फोर्बज् का रिपोर्ट कहता हैं कि, आज की तारिख में भारत भ्रष्टाचार में पुरे एशिया में पहले स्थान पर हैं। मेरा तो इस प्रधानमंत्रीजी के बातों पर का विश्वास ही उड़ गया है। बड़ी आशा से मैं इनकी तरफ देख रहा था। इसलिए तीन साल में इनके बारे में कुछ बोला नहीं। सिर्फ चिठ्ठी लिखते रहा। याद दिलाते रहा। इन सभी बातों को देशवासियों के सामने रखने के लिए मैं नए साल में जनवरी के आखरी सप्ताह में या फरवरी के पहले सप्ताह में दिल्ली में आंदोलन करने जा रहा हूँ।

धन्यवाद।

कि. बा. तथा अन्ना हजारे

रालेगणसिद्धी

दि. 10/10/2017

Behalf of Anna Hazare Office,

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At & Post- Ralegansiddhi, Tal- Parner,

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अमित शाह की ओर से पीयूष गोयल ने ‘द वायर’ पर 100 करोड़ का आपराधिक मुकदमा ठोकने की बात कही

‘द वायर’ की पड़ताल ने कांग्रेस से लेकर बीजेपी तक को हिला दिया है

Nitin Thakur : अमित शाह के बेटे की कमाई का हिसाब किताब जान लीजिए। जब आपकी नौकरियां जा रही थीं, तब कोई घाटे से 16 हज़ार गुना मुनाफे में जा रहा था। द वायर की पड़ताल ने कांग्रेस से लेकर बीजेपी तक को हिला दिया है।

Nitesh Tripathi : जब लगभग अधिकांश मीडिया हाउस सरकार के चरणों में लोट रही हैं ऐसे में ‘द वायर’ की एक स्टोरी ने सरकार के नाक में दम कर दिया. हालांकि इस खबर पर कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी लेकिन सरकार इतना तो जाने ले कि सब कुछ पक्ष में होने के बाद भी कोई तो ऐसा है जो अब भी धारा के विपरीत चलने का माद्दा रखता है. अमित शाह की ओर से पीयूष गोयल ने प्रेस कांफ्रेंस कर ‘वायर’ पर 100 करोड़ का आपराधिक मुकदमा ठोकने की बात कही है.

Abhishek Parashar : भक्तों ने मोटा भाई के बेटे की कंपनी में रातों रात हुई बेतहाशा बढ़ोतरी की खबर सामने लाने वाली रोहिणी सिंह के खिलाफ अपना काम शुरू कर दिया है. अभी कुछ लंपट यह कह रहे हैं कि उन्होंने ईटी से निकाल दिया गया, हो सकता है कल को यह बात कहीं और पहुंच जाए. लेकिन इन मूर्खों को यह समझ में नहीं आएगा, यह वही रोहिणी सिंह हैं, जिन्होंने वाड्रा के खिलाफ भी स्टोरी की थी. वही स्टोरी, जिसकी दम पर सवार होकर बीजेपी सत्ता में आई. भक्त भूलते बहुत तेजी से हैं, उन्हें याद नहीं रहता कुछ भी.

Manish Shandilya : न्यूज़ वेबसाइट ‘द वायर’ की ख़बर में दावा किया गया कि भारतीय जनता पार्टी के नेता अमित शाह के बेटे जय अमितभाई शाह की कंपनी का टर्न-ओवर नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री और उनके पिता के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद बेतहाशा बढ़ा है. ये ख़बर सोशल मीडिया में बहुत तेज़ी से फैली और ट्विटर और फ़ेसबुक पर टॉप ट्रेंड्स में शामिल हो गई. @ishar_adv नाम के हैंडल ने लिखा, ”बीजेपी ने अपना स्लोगन बदल लिया है. विकास की जय के बजाय जय का विकास. कोई ज्यादा अंतर नहीं है. अब हमें समझ आया कि आख़िर विकास कहां छिपा बैठा है.”

पत्रकार नितिन ठाकुर, नीतेश त्रिपाठी, अभिषेक पराशर और मनीष शांडिल्य की एफबी वॉल से.

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तुम्हारे पास रॉबर्ट वाड्रा है, हमारे पास जय शाह!

Atul Chaurasia : जिनको लगता है कि मोदीजी ने भ्रष्टाचार मुक्त, स्वच्छ सरकार दे रखी है देश को उसे अमित शाह के बेटे जय शाह का प्रकरण जानना चाहिए. साथ ही आनंदी बेन पटेल के बेटे और बेटी का भी मामला जोड़ लीजियेगा। पिछली सरकार में दामादों की चांदी थी इस बार गुजरातियों के हाथ सोना-चांदी है।

Thakur Gautam Katyayn :  तुम्हारे पास रॉबर्ट वाड्रा है तो हमारे पास जय शाह है। दोनों इतने प्रतिभावान हैं कि अपने -अपने सरकार के दौरान एक -दो साल में हीं इनकी कंपनी ने कई हज़ार गुना कमाई कर ली। रॉबर्ट वाड्रा को DLF ने unsecured लोन दिया था और अमित भाई शाह जी के बेटे जय शाह को रिलायंस के करीबी सांसद परिमल नाथवानी के समधी ने 15 करोड़ का लोन दिया। दोनों उद्योगपतियों ( रॉबर्ट और जय ) को प्राकृतिक संसाधनों से बहुत प्यार है। रॉबर्ट वाड्रा जमीन के धंधे में थे और जय शाह अनाज की खरीद- बिक्री और अक्षय ऊर्जा के कारोबार में। दोनों को खुद सामने आकर सफाई देने की कोई जरूरत नहीं है , उनके बिना कहे हजारों- लाखों लोग उनके वकील और चार्टर्ड एकॉउंटेंड बन कर उन्हें सही ठहराने में जुटे मिलेंगे। (नोट- संविधान के मुताबिक जब तक दोषसिद्ध नहीं हो जाता , व्यक्ति निर्दोष माना जायेगा। उपरोक्त विचार वरिष्ठ पत्रकार श्री मनीष झा जी के हैं। मुझे व्यक्तिगत रूप से अच्छा लगा तो साझा कर रहा हूँ।)

Mayank Saxena : भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के बेटे के पक्ष में देश का रेलमंत्री प्रेस कांफ्रेंस कर के, उनकी कम्पनी की आय और काम के तरीके के आंकड़े समझा रहा है…आपको और अच्छे दिन चाहिए तो इस बार अमित शाह को ही प्रधानमंत्री बनाने की मांग कीजिए क्योंकि दाउद तो पीएम बनने भारत आने से रहा….

Rohini Gupte : अमि‍त शाह के सुपुत्र की कारस्‍तानी देख ली ना? शि‍वराज सिंह के सुपुत्र पर भी ध्‍यान रखि‍एगा। इसी साल से पट्ठे ने भोपाल में खोमचा खोलकर ‘फूल’ बेचना शुरू कि‍या है, र्स्‍टाटअप के नाम से…

पत्रकार अतुल चौरसिया, ठाकुर गौतम कात्यायन, मयंक सक्सेना और रोहिणी गुप्ते की एफबी वॉल से.

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अडानी के खदानों पर रिपोर्टिंग करने आई आस्ट्रेलियाई पत्रकारों की टीम को गुजरात पुलिस ने भगाया

आस्ट्रेलिया से ‘4कॉर्नर’ मीडिया हाउस की एक टीम अडानी के खदानों पर रिपोर्टिंग करने के लिए गुजरात आई थी. दरअसल आस्ट्रेलिया में सबसे बड़ी कोयला खदान परियोजना पर अडानी ग्रुप काम कर रहा है. इसी परियोजना के लिए पर्यावरण तथा अन्य ट्रैक रिकॉर्ड की जांच करने आस्ट्रेलिया की मीडिया टीम भारत आई थी. Continue reading

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क्या वाकई नरेंद्र मोदी ने देश की अर्थव्यवस्था को चौपट कर दिया है?

Dilip Khan : हार्ड वर्क वाले अर्थशास्त्री मोदी जी जब सत्ता में आए तो इन्होंने आर्थिक सलाह परिषद को ख़त्म कर दिया। जब अर्थव्यवस्था की बैंड बजने लगी तो दो दिन पहले यूटर्न लेते हुए परिषद को फिर से बहाल कर दिया। अर्थशास्त्री नरेन्द्र मोदी ने आंकड़ों को ‘खुशनुमा’ बनाने के लिए GDP गणना के पुराने नियम ही ख़त्म कर दिए। लेकिन गणना के नए नियमों के मुताबिक़ भी GDP दर तीन साल के न्यूनतम पर आ गई है। पुराना नियम लागू करे तो 3% का आंकड़ा रह जाता है।

अनुपम खेर समेत कई सहिष्णु अर्थशास्त्रियों ने जब नोटबंदी का समर्थन किया तो मोदी-जेटली फूलकर कुप्पा हो गए। अब ख़ुद सरकारी एजेंसियां दावा कर रही है कि इससे अर्थव्यवस्था की कमर टूट गई है। अमित शाह भले ही ‘तकनीकी कारण’ का जुमला फेंके, देश का सबसे बड़ा बैंक SBI परेशान है। खुलेआम अपना दयनीय हाल बता रहा है। निर्यात गिर गया, विनिर्माण क्षेत्र बैठ गया, रोज़गार पांच साल के निचले स्तर पर है। लघु-मध्यम उद्योग वाले रो रहे हैं। छोटे कारोबारी खस्ताहाल हैं। जो नोटबंदी से रह गई थी, वो कसर जीएसटी ने पूरी कर दी।

RBI में लगभग 100% नोट जमा हो गए। इसका क्या मतलब निकाला जाएगा? अनुमान के मुताबिक़ देश में क़रीब 6% कालाधन कैश में था। ज़्यादातर बड़े नोटों में। अब, जब क़रीब-क़रीब सारा पैसा जमा होकर एक्सचेंज हो गया है तो ज़ाहिर है कि ये कालाधन वैध धन बन गया। यानी नोटबंदी ने बाक़ी नुकसानों के साथ-साथ सबसे बड़ा काम ये किया कि कालेधन को वैध बना दिया। जो चालाक थे, उन्होंने सेटिंग कर कई खातों में पैसे जमा करवाए, कई लोगों के मार्फ़त पैसे बदले। जो कच्चे थे, उन्होंने अपने खाते में पैसे डाल लिए। पैसे से यहां मेरा मतलब कालाधन से है। अब क्या हो रहा है? ऐसे कई लोग आयकर विभाग की निगरानी में हैं। आयकर इंस्पेक्टर इनसे मिलकर घूस खाकर ओके कर दे रहा है। यानी कालाधन तो सफ़ेद हुआ ही, भ्रष्टाचार भी बढ़ गया। और मोदी जी ने जो इंस्पेक्टर राज ख़त्म करने की बात कही थी, वो वादा अरब सागर में डूब गया।

इंस्पेक्टर राज को ख़त्म करने का जुमला फेंकने वाले प्रधानमंत्री ने नोटबंदी के बाद आयकर इंस्पेक्टरों को सांढ़ बना दिया है। जिसके खाते में हेर-फेर है, सब आयकर अधिकारियों से सेटिंग कर रहे हैं। नोटबंदी से भ्रष्टाचार रोकने की बात कही गई थी, देख लीजिए बढ़ गया है। काला धन ख़त्म करने की बात कही गई थी। लगभग 100% पुराने नोट बैंक पहुंचकर अब वैध करेंसी बन गए हैं। मोदी जी, और डुबोइए देश को। काम पूरा नहीं हुआ है।

Chandan Srivastava : इंडियन एक्सप्रेस में आज यशवंत सिन्हा का जो आर्टिकल छपा है, वह पढ़ा जाना चाहिए। रोहिंग्या, बीएचयू, जेएनयू आदि तो ठीक है लेकिन अर्थव्यवस्था ही दम तोड़ देगी तो क्या बचेगा? अरूण जेटली को लेकर भाजपा का कोर वोटर कभी कम्फर्टेबल नहीं रहा। लेकिन उन्होंने मोदी को भाजपा का चेहरा बनने में सहयोग किया था, यही वजह है कि उनका हर पाप मोदी जी गले लगाने को तैयार हैं। लेकिन पापी को किसी भी प्रकार का समर्थन करने वाला और यहां तक कि उसके कृत्यों से नजरें फेर लेने वाला भी बराबर का पापी होता है। कुछ ऐसा ही कृष्ण ने गीता में भी कहा था जब अर्जुन भीष्म, द्रोण आदि के प्रति आसक्त हो रहे थे।

यशवंत सिन्हा से कांग्रेस जैसी पार्टियों को सीखना चाहिए कि आलोचना कैसे की जाती है। रोहिंग्या और भारत तेरे टुकड़े होंगे का समर्थन करके वे कभी मोदी से पार नहीं पा सकते। इतनी साधारण सी बात न जाने क्यों कांग्रेस के पल्ले नहीं पड़ रही। बहरहाल बात यशवंत सिन्हा के लेख की। पूर्व वित्त मंत्री लिखते हैं कि निजी निवेश में आज जितनी गिरावट है उतनी दो दशक में नहीं हुई। औद्योगिक उत्पादन का बुरा हाल है, कृषि क्षेत्र परेशानी में है, बड़ी संख्या में रोजगार देने वाला निर्माण उद्योग भी संकट में है। नोटबंदी फेल रही है, गलत तरीके से GST लागू किए जाने से आज कारोबारियों के बीच खौफ का माहौल है। लाखों लोग बेरोजगार हो गए हैं।

वह आगे लिखते हैं, पहली तिमाही में विकास दर गिरकर 5.7 पर पहुंच गई जो तीन साल में सबसे कम है। सरकार के प्रवक्ता कहते हैं कि नोटबंदी की वजह से मंदी नहीं आई, वो सही हैं क्योंकि इस मंदी की शुरुआत पहले हो गई थी। नोटबंदी ने सिर्फ आग में घी डालने का काम किया। आर्टिकल के अंत में वह एक पंच लाइन देते हैं, ‘pm claims dat he has seen poverty from close quarters. His fm is working over time to make sure dat all indians also see itfrom equally close quarters.’ माने- ‘प्रधानमंत्री दावा करते हैं कि उन्होंने काफी करीब से गरीबी देखी है। अब उनके वित्त मंत्री यह सुनिश्चित करने के लिए ओवरटाइम कर रहे हैं कि देश का हर नागरिक भी करीब से गरीबी देखे।’

Vikas Mishra : 27 अप्रैल, 2012 को संसद में उस वक्त के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ये शेर पढ़ा था- ”मेरे जवाब से बेहतर है मेरी खामोशी, न जाने कितने सवालों की आबरू रख ली।” उन दिनों यूपीए सरकार हर मोर्चे पर फेल हो रही थी। घोटाले पर घोटाले उजागर हो रहे थे, विपक्ष मनमोहन सिंह को बार-बार बोलने के लिए उकसा रहा था, उनकी चुप्पी पर सवाल उठ रहे थे, उन्हें ‘मौन’मोहन सिंह का खिताब दिया जा रहा था। फिर भी इस सरदार की चुप्पी नहीं टूटी। जब टूटी तो वही शेर पढ़ा, जो मैंने ऊपर लिखा है।
मनमोहन सिंह जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी के बाद देश में सबसे ज्यादा वक्त तक प्रधानमंत्री रहे। देश के सबसे ताकतवर पद पर रहे, लेकिन कमजोर प्रधानमंत्री के तौर पर सबसे ज्यादा बदनाम भी हुए। एक ऐसे प्रधानमंत्री, जिनकी खामोशी को विपक्ष ने चुनावों में मुद्दा तक बना लिया। पहली बार ऐसा हुआ कि प्रधानमंत्री कार्यालय को बाकायदा प्रेस कान्फ्रेंस करके बताना पड़ा कि प्रधानमंत्री रहते हुए मनमोहन सिंह ने कितनी बार चुप्पी तोड़ी है।

मनमोहन सिंह न तो कभी राजनीति में रहे और न ही राजनीति से उनका कोई खास लेना-देना रहा। हालात की मजबूरियों ने उन्हें प्रधानमंत्री पद तक पहुंचाया तो मजबूर और कमजोर प्रधानमंत्री का तमगा उनके नाम के आगे से बीजेपी ने कभी हटने नहीं दिया। दस साल की सत्ता में मनमोहन सिंह ने बहुत कुछ देखा। देश को विकास की राह पर चलते देखा तो अपनी ही सरकार को भ्रष्टाचार की गर्त में जाते देखा। कॉमनवेल्थ गेम में करोड़ों का वारा न्यारा करने वाला कलमाड़ी देखा तो किसी राजा का अरबों का टूजी घोटाला देखा। ‘कोयले’ की कालिख ने तो मनमोहन सिंह का भी दामन मैला कर दिया।

तो क्या भारत के राजनीतिक इतिहास में मनमोहन सिंह को सबसे मजबूर और कमजोर प्रधानमंत्री के तौर पर आंका जाएगा? क्या सबसे भ्रष्टाचारी सरकार चलाने वाले प्रधानमंत्री के तौर पर याद किए जाएंगे? क्या रिमोट कंट्रोल से चलने प्रधानमंत्री के तौर पर इतिहास याद करेगा मनमोहन सिंह को? ये सवाल मनमोहन सिंह को भी भीतर से चाल रहे थे। तभी तो सत्ता के आखिरी दिनों में उन्होंने कहा था-मुझे उम्मीद है कि इतिहास उदारता के साथ मेरा मूल्यांकन करेगा। मनमोहन में काबीलियत की कमी नहीं थी। उनकी ईमानदारी को लेकर कभी कोई सवाल नहीं उठा। उनके कमिटमेंट पर कोई सवाल नहीं उठा। मनमोहन सिंह, जो रिजर्व बैंक के गवर्नर रहे, चंद्रशेखर ने जिन्हें प्रधानमंत्री बनने के बाद अपना वित्तीय सलाहकार बनाया। राजीव गांधी ने जिन्हें प्लानिंग कमीशन का उपाध्यक्ष बनाया, नरसिंह राव ने जिन्हें बुलाकर देश का वित्तमंत्री बनाया था।

दरअसल नरसिंह राव कुशल कप्तान थे, मनमोहन सिंह उनकी टीम के ‘सचिन तेंदुलकर थे’। वो 1991 का साल था, जब मनमोहन सिंह देश के वित्त मंत्री बने थे। तब अर्थव्यवस्था गर्त में जा रही थी। देश का सोना गिरवी रखने की नौबत आ चुकी थी। महंगाई चरम सीमा पर थी। मनमोहन ने जब आर्थिक सुधारों की छड़ी घुमाई तो कायापलट होने लगा। विपक्ष मनमोहन पर सवालों की बारिश कर रहा था, लेकिन मनमोहन के सिर पर छतरी ताने नरसिंह राव खड़े थे। मनमोहन सिंह ने विदेशी निवेश का रास्ता खोल दिया था। जिस तरह से आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खोल रहे हैं। नतीजा ये हुआ कि आर्थिक सुधार रंग लाने लगे। देश का गिरवी रखा सोना भी वापस आया। अर्थव्यवस्था भी पटरी पर लौटी। 1991-92 में जो जीडीपी ग्रोथ सिर्फ 1.3 थी, वो 1992-93 में 5.1 और 1994-95 तक 7.3 हो गई। उदारीकरण के चलते इन्फार्मेशन टेक्लनोलॉजी और टेलिकॉम सेक्टर में क्रांति हुई और उन दिनों इस क्षेत्र में करीब 1 करोड़ लोगों को रोजगार मिला। ये मनमोहन सिंह की बतौर खिलाड़ी जीत थी तो उससे बड़ी जीत नरसिंह राव की कप्तानी की भी थी।

2004 में मनमोहन सिंह जब खुद कप्तान (प्रधानमंत्री) बने तो पहले पांच साल उनकी सरकार बड़े मजे में चली। कई मोर्चे फतेह किए, सड़कें बनीं, अर्थव्यवस्था को पंख लगे, जीडीपी ग्रोथ 8.1 तक पहुंची। मनमोहन सरकार ने सूचना का अधिकार देकर जनता के हाथों में एक बहुत बड़ी ताकत थमाई। लालकृष्ण आडवाणी शेरवानी पहने खड़े रह गए, 2009 में देश की जनता ने फिर मनमोहन को सत्ता के सिंहासन पर बिठा दिया।ये मनमोहन सिंह के काम का इनाम था। लेकिन दूसरी पारी में मनमोहन न खुद संभल पाए और न सरकार संभाल पाए। बस रिमोट कंट्रोल पीएम बनकर रह गए।

यूपीए-1 में मनमोहन सिंह ने जितना कमाया था, यूपीए-2 में सब गंवा दिया। घोटालों की झड़ी लग गई, महंगाई आसमान छूने लगी। पाकिस्तानी सैनिक हमारे सैनिकों के सिर तक काट ले गए। चीन भारत की सीमा में कई बार घुस आया। मनमोहन सिंह की कई बार कांग्रेस के भीतर भी बेइज्जती हुई, लेकिन उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया, बाकायदा पद पर बने रहकर वफादारी की कीमत चुकाई। तमाम आरोपों का ठीकरा उनके सिर फोड़ा गया, वे खामोश रहे। ये मनमोहन सिंह की चुप्पी नहीं थी, वे चुपचाप सत्ता का ‘विष’ पी रहे थे। जुबान खोलते तो उनके ही आसपास के कई खद्दरधारी जेल में होते, चुप रहे, बहुतों की इज्जत बचा ली।

मनमोहन सिंह बद नहीं थे, लेकिन बदनाम ज्यादा हो गए। मनमोहन सिंह की जिंदगी नाकामियों और कामयाबियों की दास्तानों से भरी पड़ी है। इतिहास भी उन पर फैसला करने में हमेशा कश्मकश में रहेगा। उनकी आलोचना तो हो सकती है, लेकिन उन्हें नजरअंदाज करना उनके साथ बेईमानी होगी। वैसे बता दें कि आज पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का जन्मदिन है।

तीन पत्रकारों दिलीप खान, चंदन श्रीवास्तव और विकास मिश्र की एफबी वॉल से. दिलीप खान राज्यसभा टीवी में लंबे समय तक कार्यरत रहे हैं. चंदन श्रीवास्तव लखनऊ में पहले पत्रकार थे और अब वकालत कर रहे हैं. विकास मिश्र आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर हैं.

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पत्रकारों को मिल रही गौरी लंकेश जैसा हश्र होने की धमकियां

Anil Jain : गौरी लंकेश की हत्या के बाद जैसी आशंका जताई गई थी, वैसा ही हो रहा है। त्रिपुरा में शांतनु भौमिक की हत्या इसकी पहली मिसाल है। पत्रकारों और लेखकों को धमकाने का सिलसिला शुरू हो चुका है। नीचे दिया गया स्क्रीन शॉट मेरे मित्र और पुराने सहकर्मी अनिल सिन्हा को मिले वाट्सएप मैसेज का है।

अज्ञात व्यक्तियों की ओर से चार अलग-अलग फोन नंबरों (9984825094, 8874856328, 9984482860, 9984162349) से भेजे गए एक ही तरह के इस मैसेज में साफ तौर स्वीकार किया गया है कि गौरी लंकेश हिंदुत्ववादियों के हाथों इसलिए मारी गई, क्योंकि वह भाजपा और आरएसएस के खिलाफ लिखती थीं। मैसेज में गौरी को गद्दार, राष्ट्रविरोधी और हिंदू विरोधी करार दिया गया है। इसी के साथ मैसेज के आखिरी में धमकी दी गई है कि देश में जो भी व्यक्ति मोदी जी, भाजपा या संघ के खिलाफ लिखने की हिम्मत करेगा, उसे बख्शा नहीं जाएगा। मुसलमानों के नाम के साथ-साथ ऐसे गद्दारों को भी मिटा दिया जाएगा।

यह मैसेज अनिल सिन्हा के अलावा कुछ अन्य लोगों को भी मिला है। मैसेज में भले ही प्रधानमंत्री श्री मोदी और भाजपा की तरफदारी की गई हो, लेकिन फिर भी यह कतई नहीं माना जा सकता कि इस तरह के धमकी भरे मैसेज प्रधानमंत्री या भाजपा की सहमति से भेजे जा रहे हो। हो सकता है कि कोई व्यक्ति या समूह भाजपा, संघ और मोदी जी का नाम लेकर इस तरह की शरारतपूर्ण कारस्तानी कर रहा हो।

जो भी हो, मामला गंभीर तो है ही। जिन लोगों को यह मैसेज प्राप्त हुआ है वे तो इस बारे में पुलिस में शिकायत दर्ज करा ही रहे हैं, प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, प्रेस एसोसिएशन और अन्य पत्रकार संगठन भी इस मामले को अपने स्तर पर उठाएंगे ही। लेकिन सरकार को भी ऐसे मामले का संज्ञान लेकर उचित कार्रवाई करना चाहिए, क्योंकि पत्रकारों और लेखकों को धमकाने का यह काम प्रधानमंत्री और सत्तारूढ दल के नाम पर हो रहा है।

वरिष्ठ पत्रकार अनिल जैन की एफबी वॉल से.

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‘पेट्रो लूट’ का पैसा चुनावों में आसमान से बरसेगा और ज़मीन पर शराब बनकर वोट ख़रीदेगा : रवीश कुमार

Ravish Kumar : सजन रे झूठ मत बोलो, पेट्रोल पंप पर जाना है… पेट्रोल के दाम 80 रुपये के पार गए तो सरकार ने कारण बताए।  लोककल्याणकारी कार्यों, शिक्षा और स्वास्थ्य पर ख़र्च करने के लिए सरकार को पैसे चाहिए। व्हाट्स अप यूनिवर्सिटी और सरकार की भाषा एक हो चुकी है। दोनों को पता है कि कोई फैक्ट तो चेक करेगा नहीं। नेताओं को पता है कि राजनीति में फैसला बेरोज़गारी, स्वास्थ्य और शिक्षा के बजट या प्रदर्शन से नहीं होता है। भावुक मुद्दों की अभी इतनी कमी नहीं हुई है, भारत में।

बहरहाल, आपको लग रहा होगा कि भारत सरकार या राज्य सरकारें स्वास्थ्य और शिक्षा पर ख़र्च कर रही होंगी इसलिए आपसे टैक्स के लिए पेट्रोल के दाम से वसूल रही हैं। इससे बड़ा झूठ कुछ और नहीं हो सकता है। आप किसी भी बजट में इन मदों पर किए जाने वाले प्रावधान देखिए, कटौती ही कटौती मिलेगी। स्वास्थ्य सेवाओं के बजट पर रवि दुग्गल और अभय शुक्ला का काम है। आप इनके नाम से ख़ुद भी करके सर्च कर सकते हैं।

भारत ने 80 के दशक में स्वास्थ्य सेवाओं पर अच्छा ख़र्च किया था, उसका असर स्वास्थ्य सेवाओं पर भी दिखा लेकिन नब्बे के दशक में उदारवादी नीतियां आते ही हम 80 के स्तर से नीचे आने लगे। स्वास्थ्य सेवाओं का बजट जीडीपी का 0.7 फीसदी रह गया। लगातार हो रही इस कटौती के कारण आम लोग मारे जा रहे हैं। उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा महंगे इलाज पर ख़र्च हो रहा है।

यूपीए के राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (NRHM) के कारण हेल्थ का बजट वापस जीडीपी का 1.2 प्रतिशत पर पहुंचा। इस योजना से ग्रामीण क्षेत्रों में संसाधन तो बने मगर डाक्टरों और कर्मचारियों की भयंकर कमी के कारण यह भी दम तोड़ गया। अब तो इस योजना में भी लगातार कमी हो रही है और जो बजट दिया जाता है वो पूरा ख़र्च भी नहीं होता है। तो ये हमारी प्राथमिकता का चेहरा है।

12 वीं पंचवर्षीय योजना में तय हुआ कि 2017 तक जीडीपी का 2.5 प्रतिशत हेल्थ बजट होगा। मोदी सरकार ने कहा कि हम 2020 तक 2.5 प्रतिशत ख़र्च करेंगे। जब संसद में नेशनल हेल्थ राइट्स बिल 2017 पेश हुआ तो 2.5 प्रतिशत ख़र्च करने का टारगेट 2025 पर शिफ्ट कर दिया गया। ये मामला 2022 के टारगेट से कैसे तीन साल आगे चला गया, पता नहीं। रवि दुग्गल कहते हैं कि हम हकीकत में जीडीपी का 1 फीसदी भी स्वास्थ्य सेवाओं पर ख़र्च नहीं करते हैं। सरकार के लिए स्वास्थ्य प्राथमिकता का क्षेत्र ही नहीं है। ( डी एन ए अख़बार में ये विश्लेषण छपा है)

गोरखपुर में कई सौ बच्चे मर गए। हाल ही में इंडियन एक्सप्रेस में अभय शुक्ला और रवि दुग्गल ने एक लेख लिखा। कहा कि यूपी ने जापानी बुखार और एंसिफ्लाइटिस नियंत्रण के लिए 2016-17 में केंद्र से 30.40 करोड़ मांगा, मिला 10.19 करोड़। 2017-18 में तो मांगने में भी कटौती कर दी। 20.01 करोड़ मांगा और मिला मात्र 5.78 करोड़। तो समझे, बच्चे क्यों मर रहे हैं।

रही बात कुल सामाजिक क्षेत्रों के बजट की तो अभय शुक्ला ने हिन्दू अख़बार में लिखा है कि 2015-16 में जीडीपी का 4.85 प्रतिशत सोशल सेक्टर के लिए था, जो 2016-17 में घटकर 4.29 प्रतिशत हो गया। प्रतिशत में मामूली गिरावट से ही पांच सौ हज़ार से लेकर दो तीन हज़ार करोड़ की कटौती हो जाती है। स्वास्थ्य सेवाओं के हर क्षेत्र में भयंकर कटौती की गई।

महिला व बाल विकास के बजट में 62 फीसदा की कमी कर दी गई। ICDS का बजट 2015-16 में 3568 करोड़ था, ,2016-17 में 1340 करोड़ हो गया। जगह जगह आंगनवाड़ी वर्करों के प्रदर्शन हो रहे हैं। हर राज्य में आंगनवाड़ी वर्कर प्रदर्शन कर रहे हैं।

मिंट अख़बार ने लिखा है कि यूपीए के 2009 में सोशल सेक्टर पर 10.2 प्रतिशत ख़र्च हुआ था। 2016-17 में यह घटकर 5.3 प्रतिशत आ गया है, कटौती की शुरूआत यूपीए के दौर से ही शुरु हो गई थी। सर्व शिक्षा अभियान, इंटीग्रेटेड चाइल्ड डेवलपमेंट स्कीम, मिड डे मील का बजट कम किया या है।

वही हाल शिक्षा पर किए जा रहे ख़र्च का है। आंकड़ों की बाज़ीगरी को थोड़ा सा समझेंगे तो पता चलेगा कि सरकार के लिए स्वास्थ्य और शिक्षा महत्वपूर्ण ही नहीं हैं। बीमा दे दे और ड्रामा कर दो। दो काम है। 31 मार्च 2016 के हिन्दुस्तान टाइम्स की ख़बर है कि संघ ने शिक्षा और स्वास्थ्य का बजट कम करने के लिए मोदी सरकार की आलोचना की है। सरकार ने इन क्षेत्रों में बजट बढ़ाया होता तो समझा भी जा सकता था कि इनके लिए पेट्रोल और डीज़ल के दाम हमसे आपसे वसूले जा रहे हैं।

दरअसल खेल ये नहीं है। जो असली खेल है, उसकी कहानी हमसे आपसे बहुत दूर है। वो खेल है प्राइवेट तेल कंपनी को मालामाल करने और सरकारी तेल कंपनियों का हाल सस्ता करना। ग़रीब और आम लोगों की जेब से पैसे निकाल कर प्राइवेट तेल कंपनियों को लाभ पहुंचाया जा रहा है। दबी जुबान में सब कहते हैं मगर कोई खुलकर कहता नहीं। इसका असर आपको चुनावों में दिखेगा जब आसमान से पैसा बरसेगा और ज़मीन पर शराब बनकर वोट ख़रीदेगा। चुनाव जब महंगे होंगे तो याद कीजिएगा कि इसका पैसा आपने ही दिया है, अस्सी रुपये पेट्रोल ख़रीदकर। जब उनका खजाना भर जाएगा तब दाम कम कर दिए जाएँगे। आप जल्दी भूल जाएँगे । इसे ‘control extraction of money and complete destruction of memory’ कहते हैं।

एनडीटीवी इंडिया न्यूज चैनल के चर्चित एंकर रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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मोदी राज में भी महंगाई डायन बनी हुई है!

अजय कुमार, लखनऊ
2014 के लोकसभा चुनाव समय बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेन्द्र मोदी ने तत्कालीन यूपीए की मनमोहन सरकार के खिलाफ मंहगाई को बड़ा मुद्दा बनाया था। चुनाव प्रचार के दौरान सबसे पहले हिमाचल प्रदेश की रैली में महंगाई का मुद्दा छेड़कर मोदी ने आम जनता की नब्ज टटोली थी। मंहगाई की मार झेल रही जनता को मोदी ने महंगाई के मोर्चे पर अच्छे दिन लाने का भरोसा दिलाया तो मतदाताओे ने मोदी की झोली वोटों से भर दी। आम चुनाव में दस वर्ष पुरानी यूपीए सरकार को जड़ से उखाड़ फेंकने में मंहगाई फैक्टर सबसे मोदी का सबसे कारगर ‘हथियार’ साबित हुआ था, लेकिन आज करीब साढ़े तीन वर्षो के बाद भी मंहगाई डायन ही बनी हुई है।

मंहगाई नियंत्रण करने की नाकामी मोदी सरकार पर भारी पड़ती जा रही है। ऐसा लगता है कि अब तो जनता ने भी यह मान लिया हैकि कम से कम मंहगाई के मोर्चे पर मोदी और मनमोहन सरकार में ज्यादा अंतर नहीं हैं। बस, फर्क है तो इतना भर कि मनमोहन सरकार की नाकामी का ढ़िढोरा बीजेपी वालों ने ढोल-नगाड़े के साथ पीटा था, जबकि कांग्रेस और विपक्ष मंहगाई को मुद्दा ही नहीं बना पा रहा है।

शायद यही वजह है, जनता के बीच अब मंहगाई पर चर्चा कम हो रही है। एक समय था जब प्याज या टमाटर के दाम में जरा सी भी वृद्धि होती थी तो बीजेपी वाले पूरे देश में हाहाकार मचा देते थे, लेकिन आज हमारे नेतागण और तमाम बुद्धिजीवी मोदी सरकार को घेरने के लिये मंहगाई को मुद्दा बनाने की बजाये साम्प्रदायिकता, विचारधारा की लड़ाई, राष्ट्रवाद की बहस में ही उलझे हुए हैं।

हाल ही में टमाटर सौ रूपये किलो तक बिक गया, मगर यह सरकार के खिलाफ मुद्दा नहीं बन पाया। इसी प्रकार आजकल प्याज भी गृहणियों को रूला रहा है। पिछले वर्ष दाल के भाव आसमान छूने लगे थे, उरद सहित कुछ अन्य दालें तो 200 रूपये किलो तक बिक गई। गरीब की थाली से दाल गायब हुई, मगर विपक्ष गरीबों का दर्द नहीं बांट सका।
इन दिनों सोशल मीडिया जैसे फेसबुक, ट्वीटर आदि पर एक पुरानी तस्वीर वायरल हो रही है जिसमें दिखाया जा रहा है कि कांग्रेस के समय जब रसोई गैस के दाम बढ़ते थे तो किस तरह से बीजेपी के नेता अरुण जेटली एवं सुषमा स्वराज आदि धरने पर बैठ जातै थें।

अभी, रसोई गैस के दाम बढ़ते ही स्‍मृति ईरानी की पुरानी तस्वीर और ट्विट सोशल मीडिया पर वायरल होने लगी थी,जिसमें वह मनमोहन सरकार के समय एलपीजी सिलेंडर के दाम बढ़ने पर सिलेंडर को लेकर सड़क पर प्रदर्शन करती नजर आ रही हैं,लेकिन कांग्रेस की तरफ से ऐसा नजारा नहीं देखने को मिलता है।

बीते अगस्त महीने की बात है केंद्र की मोदी सरकार ने बिना सब्सिडी वाले एलपीजी गैस सिलेंडर के दाम में 86 रुपये की बढ़ोतरी कर दी थी। सरकार ने इसके पीछे अंतर्राष्‍ट्रीय बाजार में एलपीजी के दाम बढ़ना वजह बताया। जो बिना-सब्सिडी वाला एलपीजी सिलेंडर 466.50 रुपए का था। उसके बाद से छह किस्तों में यह 271 रुपए यानी 58 प्रतिशत महंगा हो चुका है। तेल कंपनियों ने सब्सिडीशुदा रसोई गैस सिलेंडर का दाम भी मामूली 13 पैसे बढ़ाकर 434.93 रुपए प्रति सिलेंडर कर दिया। इससे पहले इसमें 9 पैसे की वृद्धि की गई। दो मामूली वृद्धि से पहले सब्सिडीशुदा गैस के दाम आठ बार बढ़े हैं और हर बार करीब दो रुपए की इसमें वृद्धि की गई। मगर कहीं कोई हाय-तौबा नहीे हुई।

बात 2014 से आज तक बढ़ती मंहगाई की कि जाये तो 26 मई 2014 को एक किलो आटा देश के विभिन्न शहरों में 17 से 43 रुपये के बीच मिल जाता था जबकि मई 2017 में आटे की कीमत 19 से 50 रुपये प्रतिकिलो के बीच है। चावल के दाम 20 से 40 रुपये की जगह 18 से 47 रुपये प्रति किलो हैं। अरहर की दाल पहले 61 से 86 रुपये प्रति किलो पर मिल रही थी जबकि अब ये कीमत 60 से 145 रुपये के बीच है. बीच में ये 200 रु. प्रतिकिलो तक जा पहुंची थी। 31 से 50 रुपये के बीच मिलने वाली चीनी अब 34 से 56 रुपये प्रतिकिलो मिल रही है। दूध की कीमत 25 से 46 रुपये से बढ़कर 28 से 62 रुपये प्रति लीटर है. यानि खाने पीने की प्रमुख वस्तुओं की महंगाई कम होने के बजाय बढ़ गई है।

हालांकि महंगाई का सरकारी आंकड़ा मनमोहन सरकार के मुकाबले राहत भरा है। मई 2014 में खुदरा महंगाई दर जहां 8.2 प्रतिशत के आसपास थी तो अप्रैल 2017 का आंकड़ा 2.99 प्रतिशत रहा। इसी तरह खाने पीने की चीजों की खुदरा महंगाई दर 8.89 फीसदी से घटकर 0.61 पर आ गई। दिल्ली में सब्सिडी वाला रसोई गैस का सिलिंडर मई 2014 के 414 रुपये के मुकाबले अब 442.77 रुपये में मिल रहा है। जबकि डीजल और पेट्रोल के दामों में अंतर नहीं आया है, लेकिन विरोधियों की दलील है कि दुनिया के बाजार में तेल-डीजल बनाने का कच्चा माल पहले की अपेक्षा जितना सस्ता हुआ है मोदी सरकार उस अनुपात में पेट्रोल डीजल सस्ता नहीं कर रही है।

अगस्त में खुदरा महंगाई दर भी थोक महंगाई दर की तरह चार महीने की ऊंचाई पर पहुंच गई। अगस्त में थोक महंगाई की दर जुलाई के 1.88 फीसद से बढ़कर 3.24 फीसदी के स्तर पर पहुंच गयी। अगस्त 2016 में थोक महंगाई सूचकांक में 1.09 फीसद की वृद्धि दर्ज की गई थी। अगस्त में थोक महंगाई में आई इस तेजी की वजह खाद्य पदार्थो और ईंधन की कीमतों में आई तेजी है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में महंगाई में और इजाफा हो सकता है, ऐसे में ब्याज दरों में कटौती के लिए अभी इंतजार करना पड़ सकता है। थोक महंगाई सूचकांक में आई तेजी की सबसे बड़ी वजह सब्जियों के दामों में हुई बढ़ोतरी रही है। जुलाई में सब्जियों की महंगाई दर्शाने वाले सूचकांक में 21.95 फीसद की वृद्धि हुई थी। लेकिन अगस्त में यह वृद्धि 44.91 फीसद के स्तर पर पहुंच गयी। इसके पीछे बड़ी वजह प्याज की कीमतों में आई तेजी रही।

प्याज की कीमत अगस्त महीने में 88.46 फीसद की दर से बढ़ी जो जुलाई में 9.50 फीसद के स्तर पर थी। इसके अलावा फल, सब्जियों, मीट, मछली की कीमतों में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। ईधन जनित महंगाई भी अगस्त में दोगुनी हो गई। जुलाई में फ्यूल एंड पावर सेगमेंट में महंगाई दर 9.99 फीसद रही जो जुलाई 1016 में 4.37 फीसद पर थी। पेट्रोल और डीजल की लगातार बढ़ रहीं कीमतें और पावर टैरिफ में की गई बढ़ोतरी ही फ्यूल एंड पावर सेगमेंट में आई तेजी का असली कारण है।

लेखक अजय कुमार यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क ajaimayanews@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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प्रधानमत्री नरेंद्र मोदी पर गुजराती में बन रही है फिल्म ‘हू नरेंद्र मोदी बनवा मांगू छू’

बॉलीवुड निर्देशक अनिल अनिल नरयानी का कहना है कि प्रधानमत्री नरेंद्र मोदी पर आधारित उनकी आने वाली गुजराती फिल्म ”हूं नरेन्द्र मोदी बनवा मांग छू” बच्चों के लिये बेहद प्रेरणाश्रोत होगी। अनिल नरयाणी इन दिनों फिल्म ”हू नरेंद्र मोदी बनवा मांगू छू” बना रहे हैं। अनिल नरयानी ने फिल्म की चर्चा करते हुये कहा, “‘हू नरेंद्र मोदी बनवा मांगू छू’ हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बचपन की कहानी पर आधारित है।

इसकी कहानी मोटिवेशनल है। इस कहानी को खास कर बच्‍चों और युवाओं को ध्‍यान में रखकर हमने तैयार किया है। हम इस फिल्‍म में उनकी कहानी को इस तर‍ह से पेश कर रहे हैं, जिससे फिल्‍म को देखने और समझने वाले दर्शक मोटिवेट हो। और उन्‍हें ये भी समझ में आये कि नरेंद्र मोदी देश की भलाई के लिए क्‍या चाहते हैं, क्‍यों चाहते हैं और कैसे चाहते हैं।

उन्‍होंने कहा कि मुझे लगता है कि आज देश का हर बच्‍चा नरेंद्र मोदी बनना चाहता है। वास्‍तव में जो रियल है, फिल्‍म में हमने वही दिखाने की कोशिश की है। मेरा मानना है कि नरेंद्र मोदी फिल्‍म के नहीं, पूरे देश के हीरो हैं। वे अभी देश के लिए बहुत अच्‍छा कर रहे हैं। क्‍योंकि वे मेरे भी हीरो हैं, इसलिए मुझे लगा कि उनके जीवन के संघर्ष को पर्दे पर लाना चाहिए। इसमें मुझे कोई परेशानी या डर जैसा कुछ नहीं लगा। मैं मानता हूं कि नरेंद्र मोदी जी के व्‍यक्तिव से भारत की नई पीढ़ी को प्रेरणा मिलेगी।

इस फिल्‍म में मुख्‍य रूप से तीन गाने हैं, जो मोटिवेशनल हैं। फिल्‍मकार ने कहा,“ ‘हू नरेंद्र मोदी बनवा मांगू छू’ फिलहाल गुजरात के दर्शकों के लिए बना रहा हूं। इसका किसी राजनीतिक दल से कोई वास्‍ता नहीं है। हम चाहते हैं नरेंद्र मोदी की इंस्‍पायरिंग कहानी देश भर में जाये। पहले तो इसे टारगेट के अनुसार 17 नंवबर को गुजरात में ही रिलीज करने की योजना है। बाद अन्‍य भाषाओं में डब करने की कोशिश होगी।

काव्‍या मूवीज और श्रीअर्थ प्रोडक्‍शन  के बनैर तले बन गुजराती फिल्‍म ‘हू नरेंद्र मोदी बनवा मांगू छू’ बनी है। इस फिल्‍म की शूटिंग मुख्‍य रूप से गुजरात के अहमदाबाद, वडोदरा और सूरत में हुई है, जहां पीएम नरेंद्र मोदी का बचपन बीता। अनिल नारायणी गुजराती भाषा में ही ‘बे यार धक्‍को मार’ बना चुके हैं, जिसे लोगों ने खूब पसंद किया था। इसके अलावा वे 6-7 हिंदी फिल्में भी कर चुके हैं।

फिल्म की ‘हू नरेंद्र मोदी बनवा मांगू छू’ प्रोड्यूसर तान्या शर्मा हैं जबकि को- प्रोड्यूसर राजीव अरोड़ा हैं। फिल्‍म में ओंकार दास, अनेशा सैयद, करण पटेल और हीराल मुख्‍य भूमिका में नजर आयेंगे। फिल्‍म के प्रचारक संजय भूषण पटियाला हैं। फिल्‍म में फरीद दाबरी और दिव्‍या कुमार ने गाने गाये हैं। लिरिक्‍स आर जे रौशन, म्‍यूजिक डायरेक्‍टर आर बी कमाल, एक्‍शन अब्‍बास सईद और डीओपी अद्दी भार्गव का है।

प्रेस रिलीज

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जंगल से आदिवासियों को बेदखल कर कारपोरेट को बसाने का अभियान मोदी सरकार ‘नक्सल सफाया’ के नाम पर चला रही है : वरवर राव

1940 में आंध्र-प्रदेश के वारंगल में जन्मे वरवर राव ने कोई 40 सालों तक कॉलेजों में तेलुगू साहित्य पढ़ाया है और लगभग इतने ही सालों से वे भारत के सशस्त्र माओवादी आंदोलन से भी जुड़े हुए हैं। वैसे वरवर राव को भारतीय माओवादियों के संघर्ष का प्रवक्ता माना जाता है, सरकारी दावे के अनुसार वे सशस्त्र माओवादियों के नीतिकार भी हैं, परंतु वरवर राव अपने को क्रांतिकारी कवि कहलाना ज्यादा पसंद करते हैं। सत्ता के खिलाफ लिखने-पढ़ने, संगठन बनाने और पत्र-पत्रिकायें प्रकाशित करने वाले वरवर राव टाडा समेत देशद्रोह के आरोप में लगभग 10 वर्षों तक जेल में रहे हैं और अभी लगभग 50 मामलों पर विभिन्न कोर्टों में सुनवाई चल रही है तो कुछ मामलों पर जमानत पर हैं।

2001-02 में तेलुगू देशम और 2004 में कांग्रेस पार्टी ने जब माओवादियों से शांति वार्ता की पेशकश की तो वरवर राव को मध्यस्थ बनाया गया था। नक्सलबाड़ी आंदोलन की 50वीं वर्षगांठ पर झारखंड के गिरिडीह में आयोजित समारोह में शिरकत करने आए क्रान्तिकारी कवि, लेखक, पूर्व शिक्षक, क्रान्तिकारी लेखक संघ के संस्थापक एवं आरडीएफ के अध्यक्ष 76 वर्षीय कामरेड वरवर राव का विशद कुमार से एक बातचीत :—

विशद कुमार:— नक्सलबाड़ी आंदोलन के 50 वर्ष पूरे हो रहे हैं, आप इसे कैसे देखते हैं?

वरवर राव:— दुनिया के आंदोलनों के इतिहास में नक्सलबाड़ी आंदोलन का इतिहास सबसे लंबा रहा है। भारत में तेलंगाना का आंदोलन भी 1946 से 1951 तक मात्र पांच साल ही टिक पाया था। जिसका कारण यह था कि वह मात्र दो जिलों तक ही सिमट कर रह गया था। जबकि नक्सलबाड़ी आंदोलन आज लगभग पूरे देश में अपनी उपस्थिति दर्ज कर चुका है, आपने देखा होगा पूरे देश में विभिन्न संगठनों द्वारा इसका 50वां वर्षगाठ मनाया जा रहा है।

विशद कुमार:— आपको लगता है कि नक्सलबाड़ी आंदोलन का रास्ता सही है?

वरवर राव:— एकदम सही है, जनता का शासन स्थापित करने बस यही एक रास्ता है और यह आंदोलन तब तक जारी रहेगा जब तक जनता का शासन पूरे देश पर कायम नहीं हो जाता। हम सरकार बनाने का सपना नहीं देख रहे हैं बल्कि आदिवासी, दलित, शोषित, पीड़ित एवं छोटे मझोले किसानों के हक अधिकार के लिए आंदोलित हैं।

विशद कुमार:— इस आंदोलन की अब तक की सफलता क्या है?

वरवर राव :— ग्राम राज्य की सरकार का हमने सारंडा, जंगल महल, नार्थ तेलंगाना और ओडीसा के नारायण पटना में गठन कर दिया है। दण्डकारण्य में जनताना सरकार पिछले 12 वर्षों से काम कर रही है। जहां एक करोड़ लोग रह रहे हैं। जिनके समर्थन से पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी बना है। जनताना सरकार आदिवासियों, दलितों, छोटे व मझोले किसानों का मोर्चा है और इस सरकार ने वहां बसने वाले सभी परिवारों को बराबर-बराबर जमीन बांट दी है। जिसका नतीजा यह है कि जो आदिवासी पहले केवल प्रकृति पर निर्भर था, कभी खेती के बारे जानता तक नहीं था, वह अब तरह-तरह की सब्जियां व अनाज की उपज कर रहा है। इन किसानों द्वारा मोबाइल स्कूल, मोबाइल हॉस्पिटल चलाया जा रहा है। जनताना सरकार की क्रांतिकारी महिला संगठन में एक लाख से अधिक सदस्य हैं, सांस्कृतिक टीम चेतना नाट्य मंच में 10 हजार सदस्य हैं, जो एक मिसाल है, क्योंकि किसी भी बाहरी महिला संगठन एवं सांस्कृतिक टीम में इतनी बड़ी संख्या में सदस्य नहीं हैं। वहां अंग्रेजों से लड़ने वाले क्रांतिकारी गुण्डादर के नाम पर पीपुल्स मिलिशिया (जन सेना) है। जनताना सरकार माओत्से तुंग के तीन मैजिक वीपन्स — पार्टी, यूनाइटेड फ्रंट और सेना की तर्ज पर चल रही है। अत: माओवादी आंदोलन ही क्रांति ला सकता है।

विशद कुमार:— इस आन्दोलन ​में आपका वाम जनवादी भागीदारी पर भी कोई स्टैड है?

वरवर राव :— माओवादी आंदोलन के साथ वाम जनवादी भागीदारी में वे लोग आ सकते हैं जो सत्ता से दूर हैं, उनके साथ हम फ्रंट बना सकते हैं। जैसे हमने आंध्रा व तेलंगाना में तेलंगाना डेमोक्रेटिक फोरम में सीपीआई, सीपीएम, एमएल के अलग अलग ग्रुप सहित आदिवासी, दलित, अल्पसंख्यक, छात्र आदि के 10 संगठन शामिल किया है।

विशद कुमार:— चीन की कम्युनिस्ट सरकार पर आपका नजरिया?

वरवर राव :— दुनिया में कहीं भी समाजवाद नहीं है। रूस व चीन साम्राज्यवादी देश बन गए हैं, नेपाल से आशा थी वह भी समाप्त हो गया है, वह भी भारत का उपनिवेश बन गया है। भारत का अमेरिका के साथ गठबंधन यहां के आदिवासियों व दलितों के लिए काफी खतरनाक है। अमेरिका की नजर हमारे जंगल, पहाड़ व जमीन पर है, जहां काफी प्राकृतिक संपदाएं हैं। जिसे लूटने की तैयारी में अमेरिका मोदी सरकार को हथियार और जहाज दे रहा है जिससे आसमान से जंगलों को निशाना बनाकर वहां से आदिवासियों को भगाया जा सके और उस पर कब्जा करके मल्टीनेशनल और कारपोरेट कंपनियों को दिया जा सके। जंगल से आदिवासियों को बेदखल करने का अभियान मोदी सरकार नक्सल सफाया के नाम पर चला रही है। मेरा मानना है कि देश को नवजनवाद की जरूरत है, ऐसी स्थिति में नवजनवाद केवल नक्सल आंदोलन से ही आ सकता है, जो सशस्त्र संघर्ष से ही संभव है।

विशद कुमार:— हाल में यूपी में आक्सीजन के अभाव में 72 बच्चे मर गए, आपकी प्रतिक्रिया?

वरवर राव :— आजादी के 71 वर्षों बाद भी जिस देश में बच्चों के लिये आक्सीजन नहीं हो जो प्राकृतिक है। मॉ के पेट में बच्चों का पूर्ण विकास होता है और उनके विकास के लिये सारी मौलिक चीजें मॉ के पेट में मिलती हैं। जबकि बाहर आने पर आक्सीजन के बिना वे मरे जा रहे हैं, यह कितना शर्मनाक है अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है। अजीब कॉम्बिनेशन है कि आजादी के 71 साल 72 बच्चों की मौत और झारखण्ड में 70 इंडस्ट्रीज को जमीन आवंटन और आनलाईन उद्घाटन करने की योजना।

विशद कुमार:— देश में उद्योग लगेगा तभी न लोगों को रोजगार मिलेगा, फिर इन कंपनियों से परहेज क्यों?

वरवर राव :— मल्टीनेशनल कम्पनियां या कॉरपोरेट कम्पनियां पूरी तरह हाई टेक्नोलॉजी पर आधारित हैं। एक प्रतिशत श्रम पर काम करवाएंगी यानी कम से कम श्रम और अधिक से अधिक मुनाफे का इनकी थ्योरी है, ऐसे में रोजगार की संभावना कहां है। अत: साफ है कि इनके आने से श्रम बेकार पड़ जायेगा और जो आदिवासी, दलित छोटे किसान अपने श्रम को कृषि में लगाकर अपना और अपने परिवार का भरण पोषण करते रहे हैं वे बेकार हो जाएंगे, भूखे मरने की नौबत आ जएगी। मतलब कि श्रमिक वर्ग की रोटी का जुगाड़ समाप्त हो जायेगा। यह कौन सा विकास है।

विशद कुमार:— मोदी सरकार को आप कैसे देखते हैं?

वरवर राव :— सब तो साफ दिख रहा है, किस तरह गौ हत्या, बीफ, देशभक्ति का नाटक करके संघ के इशारे पर लोगों को आपस में लड़वाने का काम हो रहा है। देश के टुकड़े करने की योजना पर मोदी के लोग काम कर रहे हैं और यही लोग आरोप लगा रहे हैं दूसरों पर।

विशद कुमार:— इस संसदीय व्यवस्था पर आपकी टिप्पणी?

वरवर राव :— मैं ऐसे लोकतंत्र के संसदीय रास्ते पर कतई भरोसा नहीं कर सकता जिस लोकतंत्र के संसदीय रास्ते के ही कारण 4000 लोगों की हत्या करवाने वाला मोदी आज देश का प्रधानमंत्री बना हुआ है। वहीं इतिहास गवाह है कि इन्दिरा की हत्या के बाद 3 से 4 हजार सिखों की हत्या का ईनाम राजीव गांधी को प्रधानमंत्री रूप में मिला। यह इसी लोकतंत्र की संसदीय प्रणाली की देन है। फिर हम ऐसी लोकतांत्रिक व्यवस्था की संसदीय प्रणाली पर कैसे भरोसा करें?

विशद कुमार:— आप माओवाद के समर्थक हैं और माओवाद जनता के शासन की बात करता है, दूसरी तरफ बड़ी बड़ी कंपनियों से लेवी वसुलने का माओवादियों पर आरोप है, अप क्या कहेंगे?

वरवर राव :— लेवी के पैसे से संगठन चलता है। उससे हथियार खरीदे जाते हैं। आंदोलन के लिए पैसों की जरूरत होती है जो सारे संगठन करते हैं। सत्ता में बैठे लोग इसे चंदा कहते हैं। हमारे और उनमें मौलिक फर्क यह है कि वे लोग कारपोरेट की दलाली के लिये, उनकी ही सुरक्षा के लिए उनसे पैसा लेते हैं और माओवादी उनसे लेवी लेकर उनके ही खिलाफ जनता की हक की लड़ाई लड़ते हैं। हमें भगत सिंह की विरासत के रास्ते पर चलना होगा, तभी देश में जनता का शासन सम्भव है।

विशद कुमार: – मोदी सरकार कह रही है माओवादी कमजोर हुए है। आप क्या कहना चाहेंगे?

वरवर राव : – अगर ऐसा यह मान रहे हैं तो फिर वे आन्दोलनकारी जनता के बीच पारा मिलिट्री फोर्स क्यों भेज रहे हैं ? यह इस तरह के बयान देकर ऐसे क्रांतिकारी विचारों को भयभीत करके जिनसे अप्रत्यक्ष हमें समर्थन मिलता है उसे समाप्त करना चाह रहे हैं।

विशद कुमार

स्वतंत्र पत्रकार

9234941942

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मोदी सरकार के लिए रवीश कुमार ने कहा- ”असफल योजनाओं की सफल सरकार, अबकी बार ईवेंट सरकार”

Ravish Kumar : असफल योजनाओं की सफल सरकार- अबकी बार ईवेंट सरकार… 2022 में बुलेट ट्रेन के आगमन को लेकर आशावाद के संचार में बुराई नहीं है। नतीजा पता है फिर भी उम्मीद है तो यह अच्छी बात है। मोदी सरकार ने हमें अनगिनत ईवेंट दिए हैं। जब तक कोई ईवेंट याद आता है कि अरे हां, वो भी तो था,उसका क्या हुआ, तब तक नया ईवेंट आ जाता है। सवाल पूछकर निराश होने का मौका ही नहीं मिलता।

जनता को आशा-आशा का खो-खो खेलने के लिए प्रेरित कर दिया जाता है। प्रेरना की तलाश में वो प्रेरित हो भी जाती है। होनी भी चाहिए। फिर भी ईमानदारी से देखेंगे कि जितने भी ईवेंट लांच हुए हैं, उनमें से ज़्यादातर फेल हुए हैं। बहुतों के पूरा होने का डेट 2019 की जगह 2022 कर दिया गया है। शायद किसी ज्योतिष ने बताया होगा कि 2022 कहने से शुभ होगा। ! काश कोई इन तमाम ईवेंट पर हुए खर्चे का हिसाब जोड़ देता। पता चलता कि इनके ईवेंटबाज़ी से ईवेंट कंपनियों का कारोबार कितना बढ़ा है। ठीक है कि विपक्ष नहीं है, 2019 में मोदी ही जीतेंगे, शुभकामनाएं, इन दो बातों को छोड़ कर तमाम ईवेंट का हिसाब करेंगे तो लगेगा कि मोदी सरकार अनेक असफल योजनाओं की सफल सरकार है। इस लाइन को दो बार पढ़िये। एक बार में नहीं समझ आएगा।

2016-17 के रेल बजट में बड़ोदरा में भारत की पहली रेल यूनिवर्सिटी बनाने का प्रस्ताव था। उसके पहले दिसंबर 2015 में मनोज सिन्हा ने वड़ोदरा में रेल यूनिवर्सिटी का एलान किया था। अक्तूबर 2016 में खुद प्रधानमंत्री ने वड़ोदरा में रेल यूनिवर्सिटी का एलान किया। सुरेश प्रभु जैसे कथित रूप से काबिल मंत्री ने तीन साल रेल मंत्रालय चलाया लेकिन आप पता कर सकते हैं कि रेल यूनिवर्सिटी को लेकर कितनी प्रगति हुई है।

इसी तरह 2014 में देश भर से लोहा जमा किया गया कि सरदार पटेल की प्रतिमा बनेगी। सबसे ऊंची। 2014 से 17 आ गया। 17 भी बीत रहा है। लगता है इसे भी 2022 के खाते में शिफ्ट कर दिया गया है। इसके लिए तो बजट में कई सौ करोड़ का प्रस्ताव भी किया गया था।

2007 में गुजरात में गिफ्ट और केरल के कोच्ची में स्मार्ट सिटी की बुनियाद रखी गई। गुजरात के गिफ्ट को पूरा होने के लिए 70-80 हज़ार करोड़ का अनुमान बताया गया था। दस साल हो गए दोनों में से कोई तैयार नहीं हुआ। गिफ्ट में अभी तक करीब 2000 करोड़ ही ख़र्च हुए हैं। दस साल में इतना तो बाकी पूरा होने में बीस साल लग जाएगा।

अब स्मार्ट सिटी का मतलब बदल दिया गया है. इसे डस्टबिन लगाने, बिजली का खंभा लगाने, वाई फाई लगाने तक सीमित कर दिया गया। जिन शहरों को लाखों करोड़ों से स्मार्ट होना था वो तो हुए नहीं, अब सौ दो सौ करोड़ से स्मार्ट होंगे। गंगा नहीं नहा सके तो जल ही छिड़क लीजिए जजमान।

गिफ्ट सिटी की बुनियाद रखते हुए बताया जाता था कि दस लाख रोज़गार का सृजन होगा मगर कितना हुआ, किसी को पता नहीं। कुछ भी बोल दो। गिफ्ट सिटी तब एक बडा ईवेंट था, अब ये ईंवेट कबाड़ में बदल चुका है। एक दो टावर बने हैं। जिसमें एक अंतर्राष्ट्रीय स्टाक एक्सचेंज का उदघाटन हुआ है। आप कोई भी बिजनेस चैनल खोलकर देख लीजिए कि इस एक्सचेंज का कोई नाम भी लेता है या नहीं। कोई 20-25 फाइनेंस कंपनियों ने अपना दफ्तर खोला है जिसे दो ढाई सौ लोग काम करते होंगे। हीरानंदानी के बनाए टावर में अधिकांश दफ्तर ख़ाली हैं।

लाल किले से सांसद आदर्श ग्राम योजना का एलान हुआ था। चंद अपवाद की गुज़ाइश छोड़ दें तो इस योजना की धज्जियां उड़ चुकी हैं। आदर्श ग्राम को लेकर बातें बड़ी बड़ी हुईं, आशा का संचार हुआ मगर कोई ग्राम आदर्श नहीं बना। लाल किले की घोषणा का भी कोई मोल नहीं रहा।

जयापुर और नागेपुर को प्रधानमंत्री ने आदर्श ग्राम के रूप में चुना है। यहां पर प्लास्टिक के शौचालय लगाए गए। क्यों लगाए गए? जब सारे देश में ईंट के शौचालय बन रहे हैं तो प्रदूषण का कारक प्लास्टिक के शौचालय क्यों लगाए गए? क्या इसके पीछ कोई खेल रहा होगा?

बनारस में क्योटो के नाम पर हेरिटेज पोल लगाया जा रहा है। ये हेरिटेज पोल क्या होता है। नक्काशीदार महंगे बिजली के पोल हेरिटेज पोल हो गए? ई नौका को कितने ज़ोर शोर से लांच किया गया था। अब बंद हो चुका है। वो भी एक ईवेंट था, आशा का संचार हुआ था। शिंजो आबे जब बनारस आए थे तब शहर के कई जगहों पर प्लास्टिक के शौचालय रख दिए गए। मल मूत्र की निकासी की कोई व्यवस्था नहीं हुई। जब सड़ांध फैली तो नगर निगम ने प्लास्टिक के शौचालय उठाकर डंप कर दिया।

जिस साल स्वच्छता अभियान लांच हुआ था तब कई जगहों पर स्वच्छता के नवरत्न उग आए। सब नवर्तन चुनते थे। बनारस में ही स्वच्छता के नवरत्न चुने गए। क्या आप जानते हैं कि ये नवरत्न आज कल स्वच्छता को लेकर क्या कर रहे हैं।

बनारस में जिसे देखिए कोरपोरेट सोशल रेस्पांसबिलिटी का बजट लेकर चला आता है और अपनी मर्ज़ी का कुछ कर जाता है जो दिखे और लगे कि विकास है। घाट पर पत्थर की बेंच बना दी गई जबकि लकड़ी की चौकी रखे जाने की प्रथा है। बाढ़ के समय ये चौकियां हटा ली जाती थीं। पत्थर की बेंच ने घाट की सीढ़ियों का चेहरा बदल दिया है। सफेद रौशनी की फ्लड लाइट लगी तो लोगों ने विरोध किया। अब जाकर उस पर पीली पन्नी जैसी कोई चीज़ लगा दी गई है ताकि पीली रौशनी में घाट सुंदर दिखे।

प्रधानमंत्री के कारण बनारस को बहुत कुछ मिला भी है। बनारस के कई मोहल्लों में बिजली के तार ज़मीन के भीतर बिछा दिए गए हैं। सेना की ज़मीन लेकर पुलवरिया का रास्ता चौड़ा हो रहा है जिससे शहर को लाभ होगा। टाटा मेमोरियल यहां कैंसर अस्पताल बना रहा है। रिंग रोड बन रहा है। लालपुर में एक ट्रेड सेंटर भी है।

क्या आपको जल मार्ग विकास प्रोजेक्ट याद है? आप जुलाई 2014 के अख़बार उठाकर देखिए, जब मोदी सरकार ने अपने पहले बजट में जलमार्ग के लिए 4200 करोड़ का प्रावधान किया था तब इसे लेकर अखबारों में किस किस तरह के सब्ज़बाग़ दिखाए गए थे। रेलवे और सड़क की तुलना में माल ढुलाई की लागत 21 से 42 प्रतिशत कम हो जाएगा। हंसी नहीं आती आपको ऐसे आंकड़ों पर।

जल मार्ग विकास को लेकर गूगल सर्च में दो प्रेस रीलीज़ मिली है। एक 10 जून 2016 को पीआईबी ने जारी की है और एक 16 मार्च 2017 को। 10 जून 2016 की प्रेस रीलीज़ में कहा गया है कि पहले चरण में इलाहाबाद से लेकर हल्दिया के बीच विकास चल रहा है। 16 मार्च 2017 की प्रेस रीलीज़ में कहा गया है कि वाराणसी से हल्दिया के बीच जलमार्ग बन रहा है। इलाहाबाद कब और कैसे ग़ायब हो गया, पता नहीं।

2016 की प्रेस रीलीज़ में लिखा है कि इलाहाबाद से वाराणसी के बीच यात्रियों के ले जाने की सेवा चलेगी ताकि इन शहरों में जाम की समस्या कम हो। इसके लिए 100 करोड़ के निवेश की सूचना दी गई है। न किसी को बनारस में पता है और न इलाहाबाद में कि दोनों शहरों के बीच 100 करोड़ के निवेश से क्या हुआ है।

यही नहीं 10 जून 2016 की प्रेस रीलीज़ में पटना से वाराणसी के बीच क्रूज़ सेवा शुरू होने का ज़िक्र है। क्या किसी ने इस साल पटना से वाराणसी के बीच क्रूज़ चलते देखा है? एक बार क्रूज़ आया था, फिर? वैसे बिना किसी प्रचार के कोलकाता में क्रूज़ सेवा है। काफी महंगा है।

जुलाई 2014 के बजट में 4200 करोड़ का प्रावधान है। कोई नतीजा नज़र आता है? वाराणसी के रामनगर में टर्मिनल बन रहा है। 16 मार्च 2017 की प्रेस रीलीज़ में कहा गया है कि इस योजना पर 5369 करोड़ ख़र्च होगा और छह साल में योजना पूरी होगी। 2014 से छह साल या मार्च 2017 से छह साल?

प्रेस रिलीज़ में कहा गया है कि राष्ट्रीय जलमार्ग की परिकल्पना 1986 में की गई थी। इस पर मार्च 2016 तक 1871 करोड़ खर्च हो चुके हैं। अब यह साफ नहीं कि 1986 से मार्च 2016 तक या जुलाई 2014 से मार्च 2016 के बीच 1871 करोड़ ख़र्च हुए हैं। जल परिवहन राज्य मंत्री ने लोकसभा में लिखित रूप में यह जवाब दिया था।

नमामि गंगे को लेकर कितने ईवेंट रचे गए। गंगा साफ ही नहीं हुई। मंत्री बदल कर नए आ गए हैं। इस पर क्या लिखा जाए। आपको भी पता है कि एन जी टी ने नमामि गंगे के बारे में क्या क्या कहा है। 13 जुलाई 2017 के इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने कहा है कि दो साल में गंगा की सफाई पर 7000 करोड़ ख़र्च हो गए और गंगा साफ नहीं हुई। ये 7000 करोड़ कहां ख़र्च हुए? कोई सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगा था क्या? या सारा पैसा जागरूकता अभियान में ही फूंक दिया गया? आप उस आर्डर को पढ़ंगें तो शर्म आएगी। गंगा से भी कोई छल कर सकता है?

इसलिए ये ईवेंट सरकार है। आपको ईवेंट चाहिए ईवेंट मिलेगा। किसी भी चीज़ को मेक इन इंडिया से जोड़ देने का फन सबमें आ गया जबकि मेक इन इंडिया के बाद भी मैन्यूफैक्चरिंग का अब तक का सबसे रिकार्ड ख़राब है।

नोट: इस पोस्ट को पढ़ते ही आईटी सेल वालों की शिफ्ट शुरू हो जाएगी। वे इनमें से किसी का जवाब नहीं देंगे। कहेंगे कि आप उस पर इस पर क्यों नहीं लिखते हैं। टाइप किए हुए मेसेज अलग-अलग नामों से पोस्ट किए जाएंगे। फिर इनका सरगना मेरा किसी लिखे या बोले को तोड़मरोड़ कर ट्वीट करेगा। उनके पास सत्ता है, मैं निहत्था हूं। दारोगा, आयकर विभाग, सीबीआई भी है। फिर भी कोई मिले तो कह देना कि छेनू आया था।

एनडीटीवी के चर्चित एंकर रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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मोदी की नीतियों से महिलाओं की सेविंग पर पड़ रही तगड़ी मार, पढ़िए ये खुलासा

Vikas Mishra : मेरी पत्नी का सेविंग अकाउंट था इंडियन ओवरसीज बैंक में। गुप्त खाता। जिसमें जमा रकम का मुझे घर में लिखित कानून के मुताबिक पता नहीं होना था, लेकिन श्रीमतीजी के मोबाइल में बैंक से अक्सर खातों से कुछ रुपये निकलने के मैसेज आने लगे। कभी एसएमएस चार्ज के नाम पर, कभी एटीएम चार्ज के नाम पर। बीवी आगबबूला। मैं बैंक पहुंचा तो पता चला कि सेविंग अकाउंट में ब्याज घटकर 3 फीसदी हो गया है। एसएमएस चार्ज हर महीने देना है, हर छह महीने में एटीएम चार्ज देना है। दूसरे बैंक के एटीएम से पैसे निकाले तो उसका चार्ज। चाहे एटीएम का इस्तेमाल हो या न हो उसका भी चार्ज। खैर, मैंने पत्नी का वो अकाउंट बंद करवा दिया।

खाता तो बंद हुआ, नए खाते के लिए बैंक की तलाश हुई। मैंने कहा पोस्ट ऑफिस में खुलवा लो। पोस्ट ऑफिस गए, वहां एक तो ब्याज 6 फीसदी से घटकर 4 फीसदी हो गया था। सर्वर ऊपर से डाउन। वहीं के एक कर्मचारी ने धीरे से कहा-भाई साहब कहां फंस रहे हो, झेल नहीं पाओगे। खैर, यस बैंक में सबसे ज्यादा 6 फीसदी ब्याज का विज्ञापन देखा था, वहां संपर्क किया, कंडीशन अप्लाई में देखा तो पता चला कि जो लोग एक करोड़ रुपये खाते में रखेंगे, उन्हें 6 फीसदी ब्याज मिलेगा। एक लाख रुपये से कम रखने वालों को 4 फीसदी। चार्जेज यहां भी कटेंगे। सभी बैंकों में कटेंगे। हां, एक शर्त और, दस हजार रुपये से कम हुआ बैलेंस तो भी चार्जेज कटेंगे। सभी बैंकों का ये नियम है।

इससे पहले कि आप गलत अनुमान लगा लें, मैं स्पष्ट कर दूं कि पत्नी की कुल जमा राशि 10 हजार रुपये से ऊपर है और 15 हजार से नीचे। बाकी तो मेरे ऊपर उन्हीं का उधार रहता है। उन्हें एक गुप्त अकाउंट रखने का शौक है, जिस पर अच्छा ब्याज मिले, पति को पता न हो कि कितना जमा है। अब वो पति को दौड़ा रही थीं, पति के पास दौड़ने के अलावा कोई चारा भी नहीं।

मैं अच्छा खासा कमाता हूं, मेरे लिए पत्नी का खाता खुलवाना एक मनोरंजक खेल हो सकता है, लेकिन मुझे फिक्र हो रही है करोड़ों उन महिलाओं की, जो बड़े जतन से कुछ सौ रुपये, सौ भी क्यों 40-50 रुपये तक बैंक में जमा करवाती हैं। उनकी फिक्र हो रही है, जिनके पास अकाउंट में 10 हजार रुपये मेंटेन कर पाने की क्षमता नहीं है। वो तो ये सोचकर बैंक में पैसे रखती होंगी कि ब्याज मिलेगा, जरूरत पड़ने पर पैसा काम आएगा, लेकिन बैंक ब्याज देना तो दूर, चार्जेज के नाम पर उनके खातों में दीमक छोड़ दे रहा है, जो एक रोज उनका अकाउंट चालकर जीरो बैलेंस पर छोड़ देगा। मेंटीनेंस चार्ज का नाम सुनकर ही मेरा खून खौलता है।

मेरी भानजी रुचि Ruchi Shukla का एचडीएफसी बैंक में खाता था। एक बार 10 हजार से कम बैलेंस हुआ, बैंक ने 1 हजार रुपये काट लिए। अगले महीने फिर कटे। उसने कुछ पैसे निकाल लिए। कुछ सौ रुपये छोड़े। अब हर महीने मैसेज आने लगा कि अकाउंट में माइनस इतने रुपये है। मैं बैंक मैनेजर से मिला। बताया कि सेविंग अकाउंट में माइनस 4 हजार रुपये का बैलेंस हो गया है। वो बोला- खाता चलाना हो तो इसे चुकाना पड़ेगा। नहीं चलाना, तो चुपचाप रहिए, एक रोज अपने आप बंद हो जाएगा।

बीए में अर्थशास्त्र मेरा विषय था। उसमें बैंकिंग का पाठ भी था। बताया गया था कि अगर आप 100 रुपये जमा करते हैं तो बैंक मानता है कि आप महीने में 15 रुपये से ज्यादा नहीं निकालेंगे, अब बैंक 85 रुपये को बाजार में लगाएगा, लोन देगा, ब्याज कमाएगा। आपको सेविंग अकाउंट पर ब्याज देगा। यही बैंकिंग है। यानी अगर बैंक में एक लाख करोड़ रुपये जमा हैं तो वो 85 हजार करोड़ रुपये का व्यापार करेगा, उधारी देगा, ब्याज से कमाएगा। दुनिया के किसी भी बैंक की इतनी औकात नहीं जो अपने सभी ग्राहकों का पूरा पैसा एक दिन में लौटा सके।

बैंक भी करें तो क्या करें। नोटबंदी के बाद बैंक तो मालामाल हैं, पैसे ठसे पड़े हैं, लेकिन कोई कर्ज लेने के लिए तैयार नहीं है। रियलिटी सेक्टर का भट्ठा बैठा हुआ है। लोन लेकर फ्लैट लेने वाले गूलर के फूल हो रहे है। पैसा उगलती जमीनों के ग्राहक गायब हो गए हैं। पर्सनल लोन तो होम लोन की दर पर मिल रहा है, लेने के लिए लोग तैयार नहीं हैं, बैंक वाले लोन के लिए फोन कर करके आजिज कर दे रहे हैं। और हां, जिन्हें वाकई लोन की जरूरत है, उनके पास इतनी संपत्ति नहीं, जिसे गिरवी रखकर लोन लें।

बैंकों में पैसा फंसा है, बैंक व्यापार कर नहीं पा रहे हैं। इसकी गाज गिर रही है उन गरीबों पर, जो एक एक पैसा जोड़कर बैंक में जमा कर रहे हैं। सरकारी हों या प्राइवेट बैंक, पीएफ हो या पीपीएफ, हर जगह जमा पर ब्याज दर घट चुकी है, घट रही है। सरकार चाहती ही नहीं कि कोई बैंक में पैसा जमा करे, लेकिन ये भी नहीं चाहती कि लोग नकद पैसा अपने पास रखें, क्योंकि उसे तो कैशलेस इंडिया बनाना है।

डिजिटल पेमेंट का हाल देखिए, एलपीजी गैस नकद खरीदने पर सस्ती है, क्रेडिट कार्ड से खरीदने पर महंगी। क्योंकि उसका अलग से चार्ज है। बिजली बिल क्रेडिट कार्ड से चुकाना, ट्रेन का टिकट कटाना महंगा हो गया है। नोटबंदी और जीएसटी ने व्यापारियों और दुकानदारों की बैंड बजा दी, लेकिन अब भी वो क्रेडिट कार्ड या किसी और माध्यम से डिजिटल पेमेंट लेने को तैयार नहीं हैं। कार्ड दो तो कहते हैं 2 फीसदी अलग से देना होगा। कोई रोकथाम नहीं। अब आपको गरज हो तो कैश दीजिए, सौदा लीजिए, वरना भाड़ में जाइए। कैश का हाल ये है कि छोटे शहरों और कस्बों में बैंकों ने सीमा रख दी है कि अकाउंट से बस इतनी ही रकम निकाल पाएंगे। मैं अर्थशास्त्र का ज्ञानी नहीं हूं, लेकिन मुझे लगता है कि कहीं कुछ गड़बड़ हो रही है। अर्थव्यवस्था तो अड़ियल घोड़ी की तरह अटकी सी दिख रही है।

आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार विकास मिश्र की एफबी वॉल से.

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रिजर्व बैंक के आंकड़े दे रहे गवाही, कालाधन रखना अब ज्यादा आसान हुआ!

Anil Singh : 2000 के नोट 1000 पर भारी, कालाधन रखना आसान! आम धारणा है कि बड़े नोटों में कालाधन रखा जाता है। मोदी सरकार ने इसी तर्क के दम पर 1000 और 500 के पुराने नोट खत्म किए थे। अब रिजर्व बैंक का आंकड़ा कहता है कि मार्च 2017 तक सिस्टम में 2000 रुपए के नोटों में रखे धन की मात्रा 6,57,100 करोड़ रुपए है, जबकि नोटबंदी से पहले 1000 रुपए के नोटों में रखे धन की मात्रा इससे 24,500 करोड़ रुपए कम 6,32,600 करोड़ रुपए थी।

यानि, रिजर्व बैंक ने सालाना रिपोर्ट के आंकड़े पेश किए हैं इससे साफ पता चलता है कि पहले सिस्टम में 1000 के नोट में जितना धन था, वह अब 2000 के नोट में रखे धन से 24,500 करोड़ रुपए कम है। तो, कालाधन खत्म हुआ या कालाधन रखने की सहूलियत बढ़ गई?

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नोटबंदी के ज़रिए कालेधन को खत्म करने का नहीं, बल्कि अपनों के कालेधन को सफेद करने का सरंजाम-इंतजाम किया गया था। सच एक दिन सामने आ ही जाएगा। ठीक जीएसटी लागू के 48 घंटे पहले जिन एक लाख शेल कंपनियों का रजिस्ट्रेशन खत्म किया गया है, उनके ज़रिए नोटबंदी के दौरान कई लाख करोड़ सफेद कराए गए हैं। मुश्किल यह है कि डी-रजिस्टर हो जाने के बाद इन एक लाख कंपनियों का कोई ट्रेस नहीं छोड़ा है मोदी एंड जेटली कंपनी ने। लेकिन सच एक न एक दिन सामने आ ही जाएगा। हो सकता है सुप्रीम कोर्ट के जरिए या सीएजी की किसी रिपोर्ट में।

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आईटीआर रिटर्न पर किसको उल्लू बना रहे हैं जेटली जी! वित्त मंत्री अरुण जेटली का दावा है कि नोटबंदी का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ है कि देश में वित्त वर्ष 2016-17 के लिए भरे गए इनकम टैक्स ई-रिटर्न की संख्या 25% बढ़ गई है। आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2016-17 के लिए कुल दाखिल आईटीआर 2.83 करोड़ रहे हैं। यह संख्या ठीक पिछले वित्त वर्ष 2015-16 के लिए 2.27 करोड़ थी। इस तरह यह 24.7% की वृद्धि है। अच्छी बात है। लेकिन गौर करने की बात है कि इससे पहले वित्त वर्ष 2014-15 के लिए यह संख्या 2.07 करोड़ थी। अगले साल 2015-16 में यह 9.7% बढ़कर 2.27 करोड़ हो गई। वहीं, पिछले साल 2013-14 से 8.7% कम (2.25 करोड़ से घटकर 2.07 करोड़) थी। आईटीआर दाखिल करनेवालों की संख्या वित्त वर्ष 2010-11 के लिए 90.50 लाख, 2011-12 के लिए 1.64 करोड़ और 2012-13 के लिए 2.15 करोड़ रही थी। इस तरह वित्त वर्ष 2010-11 से लेकर वित्त वर्ष 2013-14 के दौरान आईटीआर दाखिल करनेवालों की संख्या क्रमशः 82.22%, 31.10% और 4.65% बढ़ी थी। अतः जेटली महाशय! वित्त मंत्री के रूप में आप किसी कॉरपोरेट घराने की वकालत नहीं कर रहे, बल्कि देश का गुरुतर दायित्व संभाल रहे हैं। इसलिए झूठ बोलने की कला यहां काम नहीं आएगी। जवाब दीजिए कि वित्त वर्ष 2010-11 और 2011-12 में कोई नोटबंदी नहीं हुई थी, फिर भी क्यों आईटीआर भरनेवालों की संख्या 82 और 31 प्रतिशत बढ़ गई? इसलिए नो उल्लू बनाइंग…

कुल दाखिल आईटीआर रिटर्न की संख्या

वित्त वर्ष  : संख्या (लाख में) : पिछले साल से अंतर (%)

2016-17 : 283 : +24.67

2015-16 : 227 : +9.66

2014-15 : 207 : (-)8.69

2013-14 : 225 : +4.65

2012-13 : 215 : +31.10

2011-12 : 164 : +82.22

2010-11 : 90.5 : +78.39

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वित्त मंत्रालय = भारत = भारतीय नागरिक! गुरुवार को इकनॉमिस्ट इंडिया समिट में एक पत्रकार ने वित्त मंत्री अरुण जेटली से पूछा कि क्या ऐसा नहीं है कि नोटबंदी वित्त मंत्रालय के लिए अच्छी थी, लेकिन भारतीय नागरिकों के लिए नहीं, जिन्हें जान से लेकर नौकरी तक से हाथ घोना पड़ा और मुश्किलें झेलनी पड़ीं। इस पर जेटली का जवाब था, “मैं मानता हूं कि जो भारत के लिए अच्छा है, वही भारतीय नागरिकों के लिए अच्छा है।” धन्य हैं जेटली जी, जो आपने ज्ञान दिया कि सरकार और देश एक ही होता है। यही तर्क अंग्रेज बहादुर भी दिया करते थे। अच्छा है कि आम भारतीय अब भी सरकार को सरकार और अपने को प्रजा मानता है। वरना, जिस दिन वो इस मुल्क से सचमुच खुद को जोड़कर देखने लगेगा, उस दिन से आप जैसी सरकारों का तंबू-कनात उखड़ जाएगा, जिस तरह अंग्रेज़ों की सरकार का उखड़ा था। तब तक अंग्रेज़ों के बनाए औपनिवेशिक शासन तंत्र और कानून की सुरक्षा में बैठकर मौज करते रहिए, वित्त मंत्रालय के हित को भारत का हित बताते रहिए और विदेशी व बड़ी पूंजी का हित साधते रहिए।

मुंबई के वरिष्ठ पत्रकार और आर्थिक मामलों के जानकार अनिल सिंह की एफबी वॉल से. अनिल सिंह अर्थकाम डाट काम नामक चर्चित आर्थिक पोर्टल के संस्थापक और संपादक भी हैं.

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जगदीश चंद्रा ने मोदी मंत्रिमंडल में भारी फेरबदल को लेकर कई चौंकाने वाली जानकारी दी (देखें वीडियो)

जी ग्रुप के रीजनल न्यूज चैनलों के सीईओ जगदीश चंद्रा ने अपने ‘अ डायलाग विथ जेसी’ में मोदी मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर कई चौंकाने वाली जानकारी दी है. जगदीश चंद्रा के मुताबिक रेल और जहाज वाले मंत्रालय मिलाकर एक किए जा सकते हैं ताकि टूरिज्म को समुचित बढ़ावा दिया जा सके और इन दोनों प्रमुख परिवहन के यात्रियों को ज्यादा से ज्यादा सुविधाएं दी जा सके. जेसी का तो यहां तक कहना है कि इन दोनों एकीकृत मंत्रालयों के मंत्री नितिन गडकरी बनाए जाएंगे.

जगदीश चंद्रा का कहना है कि मोदी कैबिनेट में 2 सितंबर को विस्तार हो सकता है. इसको लेकर तीन दिन पहले प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह में लंबी चर्चा हो चुकी है. दो दर्जन मंत्री इस फेरबदल से प्रभावित होंगे. एक जैसे कई मंत्रालयों का आपस में विलय हो सकता है. रेलवे और सिविल एविशन की तरह एग्रीकल्चर और फर्टीलाइजर को भी एक में मिलाया जा सकता है. ये सारी कवायद 2019 के चुनावों को ध्यान में रख कर की जा रही है.

कलराज मिश्रा, लालाजी टंडन, विजय कुमार मल्होत्रा समेत सात लोगों को राज्यपाल बनाया जा सकता है. जेसी तो यहां तक संभावना जताते हैं कि 2019 के चुनावों के बाद नीतीश कुमार बिहार के सीएम पद से रिजाइन करके डिप्टी पीएम बन सकते हैं. ताजे फेरबदल में राधा मोहन सिंह, उमा भारती और राजीव प्रताप रूडी को कैबिनेट से हटाने की बात जेसी ने कही. चंद्रा ने राम माधव और भूपेंद्र यादव को भी मोदी सरकार में शामिल किए जाने की संभावना जताई.

जगदीश चंद्रा का यह चर्चित शो देखने के लिए नीचे दिए वीडियो पर क्लिक करें :

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‘विकास संवाद’ विमर्श : मोदी में सम्मोहन पैदा करने की निरंतर कोशिशें कर रहा है भारतीय मीडिया!

विकास संवाद संस्था द्बारा प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी एक ऐसे ही महीन विषय पर तीन दिवसीय संगोष्ठी राजा राम की नगरी ओरछा (अमर रिसार्ट) में 18 से 20 अगस्त तक आयोजित हुई। यह 11वां राष्ट्रीय मीडिया संवाद था। विषय ‘मीडिया, बच्चे और असहिष्णुता’ रखा गया। इसमें देश के मूर्धन्य पत्रकारों सहित तकरीबन 125 पत्रकारों ने सहभागिता निभाई। सर्वप्रथम सभी के परिचय के साथ विकास संवाद के राकेश दीवान ने इसकी भूमिका रखते हुए बच्चों के स्कूली बोझिल वातावरण का जिक्र किया जोकि न सिर्फ शिक्षा बल्कि उनके स्वास्थ्य पर भी बुरा असर डाल रहा है।

इस मसले को लेकर मीडिया कितना सजग व सरकार एवं समाज कितना सहिष्णु है, की बात रेखांकित की। स्वागत उदबोधन में पूर्व स्थानीय विधायक बृजेन्द्र सिंह राठौर ने कहा कि ओरछा ऐतिहासिक विरासत, धार्मिक-सांस्कृतिक धरोहर और खनिज संसाधनों की सम्पन्नता के बाद भी क्यों विपन्न रह गया? आप सभी विद्वान पत्रकार जरूर इस पर यहां विचार करेंगे। दतिया के डॉ. रामप्रकाश भोन्गुला ने इस इलाके के इतिहास को विस्तार से रेखांकित किया जो उपयोगी था, मगर अधिक विस्तारित होने से उबाऊ हो गया था।

बहरहाल, पहले दिन का विषय ‘असहिष्णुता और हम सब’ था जिसके लिए आमंत्रित विद्वान सिद्धार्थ वरदराजन ने असहिष्णुता के सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक बिन्दुओं पर प्रकाश डालते हुए बताया कि कैसे असहिष्णुता पसर रही है। उन्होंने इसके पक्षों को उदाहरणों के जरिए रखा। वरदराजन ‘वायर’ नाम से वेब पोर्टल चलाते हैं। एक दूसरे टीवी पत्रकार विनोद शर्मा ने असहिष्णुता की राजनीति को पड़ोसी मुल्कों के माध्यम से हमारे असहिष्णु होते जाने और अतिरेक में जीने के मुगालते का जिक्र किया। लेकिन उनके उदबोधन में अंतरद्वंद्व नजर आया। उन्होंने कहा जब वे पाकिस्तान में थे और मुस्लिम बस्तियों के घिरे इलाके में थे तो उन्हें बतौर हिन्दू ऐसी कोई कठिनाई नजर नहीं आई जिसको भारत में पैदा किया जाता है। लेकिन जब उन्होंने भारतीय समाज की बात रखी तो सरकार को आड़े हाथों लेते हुए यह कहा कि ‘हम पाकिस्तान होना क्यों चाहते हैं’ यानि कट्टरता ओढ़ना चाहते हैं। सवाल है कि वे एक तरफ पाकिस्तानी समाज को सहिष्णु बताने की वकालत करते नजर आये तो वहीं भारत के पाकिस्तान बनने की खिल्ली उड़ाते भी। यानि ‘उसी से ठंडा उसी से गरम’ मगर उन्होंने जब कहा ‘यह मेरा सत्य है और सबका अपना-अपना सत्य होता है’ तो बात भी गले उतरने वाली नहीं थी, क्योंकि सत्य तो सत्य होता है। सत्य निरपेक्ष और अंतिम होता है। हां वे इसे अपना अनुभव बताते तो और बात होती।

बहरहाल, उनके वक्तव्य से सदन चायकाल के दौरान अधिकतर असहमत दिखा। बाद में इसी मुद्दे पर राकेश दीक्षित और चंद्रकांत नायडू ने हस्तक्षेप किया। राकेश दीक्षित ने बताया कि कैसे वे कम्युनिष्ट विचारधारा की ओर बढ़े फिर जुड़े। मूलत: वे वैसे नहीं थे। भारत का डोकलाम में चीन के विरुद्ध खड़ा रहना और टीवी चैनलों पर रिटायर्ड सेना के अफसरों द्बारा चीन से निपट लेने की बात दोहराना अपनी क्षमता सही आंकलन नहीं होना है। हमें सहिष्णु होना चाहिए। बातचीत ही संवाद का रास्ता है। सवाल है कि चीन सीमा समझौते का अतिक्रमण करते हुए अड़ा है तो वह सहिष्णु है और भारत उसका प्रतिरोध कर रहा तो वह असहिष्णु कैसे हो जाएगा? युद्ध से क्या किसका फायदा होगा यह और बात है, लेकिन चीन के राष्ट्रपति सेना की वर्दी पहन सेना की परेड़ कराते दिखें, उनका सरकारी अखबार रोज आंख तरेरता दिखाई दे तो क्या हम चीन जो चाहे वो करने दें यही उचित होगा? सवाल है कि आखिर सहिष्णुता की कोई सीमा नहीं होनी चाहिए क्या?

अगले दिन का विषय था ‘असहिष्णुता और बच्चे’ इस पर पत्रकार पीयूष बबेले ने बच्चों के साथ हो रहे असंवेदनशील व्यवहार को रेखांकित किया और कहा कि उनके साथ संवाद उनके अनुसार नहीं बल्कि हम पेरेंटस और प्राध्यापक अपने मन का करना चाहते हैं। एक उदाहरण से बच्चों के प्रति समाज के व्यवहार को उदृत किया कि बसों में आधी सवारी यानि बच्चों को सीट न देने की लिखित घोषणा चस्पा रहती है। क्या इस विषय पर उच्च न्यायालय में पीआईएल नहीं लगनी चाहिए, ताकि बच्चों के प्रति ऐसे असहिष्णु व्यवहार को रोका जा सके। पश्चात चिन्मय मिश्र ने बहुत ही मार्मिक उदबोधन में बच्चों के प्रति समाज की असहिष्णुता को विभिन्न उदाहरणों के जरिए सदन में रखा जिससे चर्चा ने गंभीर और सार्थक दिशा पा ली।

बच्चों के साथ बड़ी असहिष्णुता उनके स्कूली शिक्षा के माध्यम को लेकर हो रही है। जो बच्चा हिन्दी में सारे बोध जानता समझता है उसे शिक्षा हासिल करने के लिए अंग्रेजी माध्यम में पढ़ने के लिए क्यों झोंका जा रहा है। स्कूल ही वह संस्थान है जहां से बच्चे के व्यक्तित्व का बड़ा हिस्सा बनता बिगड़ता है। लेकिन अंग्रेजी माध्यम की रंटत विद्या में वह कहीं का नहीं रह जाता। स्कूलों के बोझिल वातावरण की तस्दीक करनी हो तो छुट्टी होने पर बच्चों के चेहरों को गौर से देखिए तो उनमे स्कूल के दौरान सर्वाधिक प्रसन्नता झलकती है, जो इस बात की गवाही कि कितने बोझिल वातावरण में बच्चे अध्ययन कर रहे हैं। बकौल शकील जमाली-

”सफर से लौट जाना चाहता है, परिंदा आशियाना चाहता है,
कोई स्कूल की घंटी बजा दो, ये बच्चा मुस्कुराना चाहता है।’’

इसके दूसरे हिस्से का विषय था ‘रचा जाता सत्य’ यानि कैसे फेक न्यूज के जरिए ‘पोस्ट ट्रुथ’ को पेश कर भ्रम फैलाया जा रहा है। इस पर अरविंद मोहन ने कहा कि मीडिया कॉन्सेप्ट का उदय ही हिटलर के दौर में जर्मनी में हुआ जहां हिटलर को बेहतर बता कर पेश किया जा रहा था। उन्होंने कहा कि भले पूर्व पीएम मनमोहन सिंह में सम्मोहन नहीं था लेकिन मीडिया मोदी में सम्मोहन पैदा करने की निरंतर कोशिशें कर रहा है। अर्थनीति को भी बतौर सम्मोहन देश के सामने पेश किया जा रहा है। अरुण त्रिपाठी जो गांधी विश्वविद्यालय वर्धा प्रोफेसर हैं ने लोकपाल की हिमायत करने वाली भाजपा अब सत्ता में है फिर भी 3 साल बीत गए लोकपाल का रता-पता नहीं। आनंद प्रधान ने भी ‘पोस्ट ट्रुथ’ पर कहा कि कैसे मीडिया के एक हिस्से द्वारा उत्तरसत्य रचा जा रहा है। प्रकाश हिन्दुस्तानी ने भी महत्वपूर्ण विचार और अनुभव साझा किए। न्यूज इंडिया18 चैनल के एंकर सुमित अवस्थी ने बड़ी साफगोई से मीडिया के पीछे का सत्य उदघाटित किया कि कैसे कई बार न चाहते हुए भी खबरों को आर्थिक हितों के मद्देनजर लेना-छोड़ना पड़ता है। सुबह-सबेरे के संपादक गिरीश उपध्याय ने पूरे सेमिनार के दूसरे पहलू को भी देखने की वकालत की जिससे चर्चा को संतुलित दृष्टि देने में सहायता मिली। यशवंत, संदीप नाईक, सूर्यकांत पाठक ने भी अपना दृष्टिकोण रखा।

विकास संवाद के सचिन जैन आखिरी दिन संवाद में उपजे कुछ वैचारिक अंतर्विरोधों पर अपनी दृष्टि रखी. इस दरमियान वे तब भावुक हो उठे जब उन्होंने अपने दो वरिष्ठ सहयोगियों राकेश दीवान और चिन्मय मिश्र के अप्रतिम सहयोग व साथ का जिक्र किया।

श्रीश पांडेय
Shrish Pandey
फीचर सम्पादक
मध्य प्रदेश जनसंदेश
smspandey@gmail.com


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जानिए, पीएम के आज के भाषण की क्यों हो रही है आलोचना…

Priyabhanshu Ranjan : नोटबंदी से कितना काला धन पकड़ में आया, उस पर ऐसा आंकड़ा दिया जिस पर भरोसा नहीं किया जा सकता। RBI तो अब तक नोट गिन ही नहीं सका है। ऊपर से मोदी ने एक निजी संस्था के आंकड़े बताए हैं। नोटबंदी से तबाह हुए छोटे और मझौले व्यापारियों की समस्या सुलझाने पर कुछ नहीं बोला। गोरखपुर में बच्चों की मौत और गुंडे गौरक्षकों के आतंक पर गोल-मोल बोल कर निकल लिए। पर ‘तीन तलाक’ पर खुलकर बोलना नहीं भूले, जैसे कि तलाक दिलवाना ही सरकार की प्राथमिकता हो।

कर्ज पर ब्याज दरें घटने की बात तो बताई, पर ये नहीं बताया कि बचत खाते से लेकर PPF, RD, NSC etc. जैसी छोटी बचत योजनाओं पर ब्याज दरें घटा दी गई जिससे आम आदमी अब इन बचत योजनाओं में पैसे लगाना बेकार समझने लगा है। मंगलयान मिशन नौ महीने में पूरे होने पर सफेद झूठ बोला। वैसे भी मंगलयान मनमोहन सरकार की उपलब्धि है।

ISRO की ‘नाविक’ परियोजना को अपनी उपलब्धि बता दी, जबकि काम मनमोहन सरकार ने शुरू कराया था। सिर्फ ‘नाविक’ नाम रखने का श्रेय मोदी को जाता है। डोकलाम के मुद्दे पर देश को ताजा स्थिति से अवगत नहीं कराया। खुद को भ्रष्टाचार से लड़ने वाले मसीहा के तौर पर पेश किया, लेकिन ये नहीं बताया कि लोकपाल का गठन कब कर रहे हैं और RTI कानून को कमजोर करने की कोशिश क्यों हो रही है। GST की सफलता का सर्टिफिकेट खुद ही ले लिया, लेकिन इससे महंगे हुए सामानों पर कुछ नहीं बोला। ‘आधार’ पर भी श्रेय लेने की कोशिश की। फिर भी कुछ लोग इस भाषण को 10 में 10 नंबर दे रहे हैं।

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Sadhvi Meenu Jain : देश के इतिहास में यह पहली बार हुआ है कि देश का प्रधानमंत्री एक प्रायवेट संस्था ‘मार्ग’ के आंकड़े पेश करके बता रहा है कि नोटबंदी से कितना कालाधन बाहर आया, वह भी स्वाधीनता दिवस पर राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में! प्रधान मंत्री जी, रिज़र्व बैंक क्यों बिल में छिपा बैठा है? क्यों नहीं बताता क़ि नोटबंदी से कितना काला धन बाहर आया? जनता को बिलकुल ही मूर्ख समझ रक्खा है क्या!

पत्रकार प्रियभांशु रंजन और साध्वी मीनू जैन की एफबी वॉल से.

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महेश शर्मा का मंत्रालय बाबुओं के कब्जे में!

केंद्रीय संस्कृति एवं कला मंत्री महेश शर्मा का मंत्रालय कला एवं संस्कृति के सिवा सभी कार्य दक्षता से कर रहा है। चर्चा है कि इस दक्षता के लिए अवार्ड वापसी के नेता अशोक वाजपेयी से चुपके से हाथ मिलाकर शांति का समझौता कर लिया है। संस्कृति मंत्रालय के सभी स्वायत्त संसथान जैसे संगीत नाटक अकादमी, ललित कला अकादेमी, साहित्य अकादमी पर मंत्रालय के बाबू अशोक वायपेयी के फॉर्मूले से कब्ज़ा जमा कर बैठे हैं और मंत्री साहब किसी के खिलाफ कोई कार्यवाही करने को तैयार नहीं हैं।

पूर्व काल में इन सभी संस्थानों में करोड़ों के घपले हुए हैं और इस सम्बन्ध में जाँच करने की बात तो कई बार हुई पर ढाक के तीन पात। मंत्री महोदय ने संसदीय समिति के समक्ष 2014 में कई बड़े वादे किये थे- जैसे सभी गांवों से कला एवं संस्कृति का जुड़ाव, भारतीय सांस्कृतिक धरोहरों का वर्गीकरण, कला का मानचित्र इत्यादि। कई लुभावने वादों के साथ शुरू की गयी मुहिम मंत्रालय की फाइलों में उलझ कर रह गयी हैं और कोई भी कार्य शुरू नहीं हो पाया है।

यह अत्यंत ही दुखद है कि राष्ट्रवादी पार्टी का दावा करने वाली भारतीय जनता पार्टी सांस्कृतिक क्षेत्र में कुछ भी कर पाने में असमर्थ है। संस्कार भारती जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से सांस्कृतिक विधा पर काम करती है, वह भी मंत्री से खासी नाराज है। हाल में सिर्फ कल्याण चक्रवती के खिलाफ ही सीबीआई कार्यवाही शुरू की गयी है पर अशोक वाजपेयी के खिलाफ कुछ भी नहीं। संगीत नाटक अकादमी की सचिव हेलेन आचार्य जी का साठ हजार का मोबाइल का बिल, लीला सैमसन द्वारा नाट्यशाला पर ६ करोड़ खर्च करके उसको तुड़वाना, क्षेत्रीय कला केन्द्रों पर पूर्ववत खुली लूटपाट चल रही है। कलाकारों को दिया जाने वाला मानदेय अधिकारियों द्वारा कमीशन में लूटा जा रहा है। मंत्री महोदय इन बातों से अनभिज्ञ हैं।

पहले संयुक्त सचिव को बदला गया। फिर सचिव को बदला गया। पर बात वहीं के वहीं है। सभी बाबू एकजुट होकर मंत्री को नियमावली का ऐसा पाठ पढ़ाते हैं कि मंत्री बेचारे उलझ कर रह जाते हैं। इस तरह संस्कृति मंत्रालय पर कब्ज़ा बाबुओं के हाथ में रह जाता है। संघ से जुड़े कलाकार एवं कार्यकर्ता, जो दरकिनार हैं, धीमे स्वर में मंत्रीजी की कारगुजारियों पर नाराजगी जताते हैं। परन्तु मंत्री जी लगता है चैन की बांसुरी बजा रहें हैं। इस सांठगांठ में विशेष अधिकारी महोदय नवनीत सोनी की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। इन्हें मंत्रीजी ने नियमों को ताक पर रख कर नियुक्त किया हुआ है। सोनी के मूल नियोक्ता द्वारा से अभी भी अनापत्ति नहीं ली गयी है जो कार्मिक विभाग के नियमों का सीधा उल्लंघन है।

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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जब केजरी पार्टी ‘पीटी’ जा रही थी तो कांग्रेसी उपदेश देते थे, अब कांग्रेसी ‘मारे’ जा रहे तो आपिये आइना दिखाने लगे!

Sheetal P Singh : अनुभवी लोग… अहमद पटेल पर बन आई तो अब बहुतों को लोकतंत्र याद आ रहा है ………आना चाहिये पर शर्म भी आनी चाहिये कि जब बीते ढाई साल यह बुलडोज़र अकेले केजरीवाल पर चला तब अजय माकन के नेतृत्व में कांग्रेसी राज्यपाल के अधिकारों के व्याख्याकारों की भूमिका में क्यों थे? जब एक बेहतरीन अफ़सर राजेन्द्र कुमार को सीबीआई ने बेहूदगी करके सिर्फ इसलिये फँसा दिया कि वह केजरीवाल का प्रिंसिपल सेक्रेटरी था तब भी लोकतंत्र की हत्या हुई थी कि नहीं? जब दिल्ली के हर दूसरे आप विधायक को गिरफ़्तार कर करके पुलिस और मीडिया परेड कराई गई तब भी यमुना दिल्ली में ही बह रही थी! तब कांग्रेसी बीजेपी के साथ टीवी चैनलों में बैठकर केजरीवाल को अनुभवहीन साबित कर रहे थे! अब अनुभव काम आया?

मोदी जी व अमित शाह की जोड़ी इस देश के हर मानक को चकनाचूर करके एक तानाशाह राज्य के चिन्ह स्थापित कर रही है। इनकम टैक्स ई डी सीबीआई आदि नितांत बेशर्मी से स्तेमाल किये जा रहे हैं। फिलवक्त इनकम टैक्स ने कर्नाटक के उस मंत्री के यहाँ छापा मारा है जिसके यहाँ गुजरात के कांग्रेसी विधायकों को पोचिंग से बचाकर रक्खा गया है! इंदिरा / संजय की तानाशाही का भी एक दौर था! कांग्रेस को वहाँ तक पहुँचने में कई दशक लग गये थे ये डिजिटल पार्टी है सो बुलेट स्पीड से हर पड़ाव पार कर रही है।

पत्रकार से उद्यमी फिर आम आदमी पार्टी के नेता बने शीतल पी. सिंह की एफबी वॉल से.

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2019 में मोदी के लिए असली सिरदर्द केजरीवाल बनेंगे!

Vikram Singh Chauhan : अरविंद केजरीवाल बहुत बहादुर है, शेर हैं। वे मोदी के सामने झुके नहीं। दिल्ली में रहकर मोदी के 56 इंच के सीने पर मूंग दल रहे हैं। मोदी जहाँ गए वहां जाकर चुनाव लड़ने की चुनौती दी और बिना पहले के जनाधार और संगठन के चुनाव लड़कर मोदी का होश उड़ा दिया, हिंदुत्व ने उसे हरा दिया। वे भारत के एक अकेले ऐसे मुख्यमंत्री होंगे जिसके साथ वर्तमान ने अन्याय किया पर इतिहास न्याय करेगा। मीडिया पहले दिन से उनकी सुपारी ली हुई है।

एक आम आदमी को देश का मीडिया और केंद्र सरकार किस हद तक परेशान कर सकता है पूरे देश ने देखा। आज मीडिया पर जो सवाल उठाया जा रहा है इसकी शुरुआत केजरीवाल ने ही की। उनके ऊपर कीचड़, स्याही उछाला गया लोगों ने लात और घूंसे मारे। कोर्ट ने भी उनके खिलाफ मानहानि के सभी मामले स्वीकार किया ,अमूमन कोर्ट सभी नेताओं के मामले स्वीकार नहीं करती। आज केजरीवाल चुपचाप अपना काम कर रहे हैं, वे मीडिया को मसाला भी नहीं देते हैं। केजरीवाल मोदी के सामने बिके नहीं और डरे नहीं, बावजूद आज इज्जत से मुख्यमंत्री के पद पर बैठे हैं। नीतीश जैसे लोग दो कौड़ी के होते हैं। इनकी विचारधारा और सिद्धांत कभी भी ख़रीदा बेचा जा सकता है। 2019 में केजरीवाल फिर मोदी का सिरदर्द बनेंगे। दो साल में गंगा में बहुत पानी बहना बाकी है।

यूएनडीपी से जुड़े और रायपुर के निवासी विक्रम सिंह चौहान की एफबी वॉल से.

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अमित शाह की संपत्ति और स्मृति इरानी की डिग्री वाली खबरें टीओआई और डीएनए से गायब!

Priyabhanshu Ranjan : स्मृति ईरानी भी कमाल हैं। 2004 के लोकसभा चुनाव के वक्त अपने हलफनामे में अपनी शैक्षणिक योग्यता B.A बताती हैं। 2017 के राज्यसभा चुनाव में अपने हलफनामे में खुद को B. Com. Part 1 बताती हैं। 2011 के राज्यसभा चुनाव और 2014 के लोकसभा चुनाव में भी उन्होंने खुद को B. Com. Part 1 ही बताया था। बड़ी हैरानी की बात है कि 2004 में खुद को B.A बताने वाली स्मृति जी 2011, 2014 और 2017 में खुद को B. Com. Part 1 बताती हैं।

इससे भी बड़ी हैरानी की बात ये है कि इतने साल के बाद भी B. Com पूरा नहीं कर सकी हैं। खैर, आपको असल में बताना ये था कि ‘अमित शाह की संपत्ति में 5 साल में 300 फीसदी इजाफा’ वाली खबर की तरह स्मृति ईरानी के हलफनामे में झोल वाली खबर भी न्यूज वेबसाइटों ने हटा ली है। अब सोचना आपको है कि ये खबरें आखिर किसके दबाव में हटाई जा रही हैं। इसी मुद्दे पर द वॉयर ने एक खबर की है। नीचे तस्वीर में स्मृति ईरानी की ओर से 2004 में दायर हलफनामे की प्रति है।

पीटीआई में कार्यरत प्रतिभाशाली पत्रकार प्रियभांशु रंजन की एफबी वॉल से.

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एक अपने भारत में हैं ‘शरीफ’ नेता मोदी जी, पनामा पेपर्स खा-चबा गए!

Yashwant Singh : एक अपने भारत में हैं ‘शरीफ’ नेता मोदी जी. पनामा पेपर्स ऐसे खा चबा गए, जैसे कुछ हुआ ही न हो. भाजपाई सीएम रमन सिंह के बेटे से लगायत अमिताभ, अडानी आदि की कुंडली है वहां, लेकिन मजाल बंदा कोई जांच वांच करा ले. और, बनेगा सबसे बड़ा भ्रष्टाचार विरोधी. पड़ोसी पाकिस्तान से सबक ले लो जी.

कोई है जो सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल दायर करके पनामा पेपर्स में भारतीयों के शामिल होने की सच्चाई सामने लाने की पहल करे और इसमें भारत सरकार को भी पार्टी बनाए कि ये लोग अब तक चुप क्यों हैं और इनने अब तक क्या कार्रवाई की. कांग्रेस वाले इसलिए चुप हैं इस मसले पर कि अव्वल तो ये खुदे महापापी और चोरकट हैं. दूसरे पनामा पेपर्स में कांग्रेसियों के भी तो नाम हैं.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से सर्वोंत्तम यूं है :

Shyam Singh Rawat पनामा पेपर्स मामले में अपने यहाँ भी सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई थी, जिससे सम्बंधित दस्तावेजों को अपर्याप्त बताते हुए खारिज कर दिया गया था। एक मुख्यमंत्री आत्महत्या करने से पहले 42 पृष्ठों में लंबा-चौड़ा स्युसाइड नोट लिख कर इस आशा में छोड़ जाता है कि देश में कहीं कोई सकारात्मक कार्रवाई होगी। चूंकि उसमें सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्तियों पर रिश्वतखोरी के आरोप थे, इसलिए उसे मृत्युपूर्व लिखित बयान नहीं मानते हुए रद्दी की टोकरी में फेंक दिया गया। जबकि आमतौर पर ऐसे स्युसाइड नोट को पक्का सबूत माना जाता रहा है और शायद आगे भी माना जाएगा।

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भारतीय राजनीति का निहायत खूंखार और ‘किलर इंस्टिंक्ट’ वाला मोदी-शाह युग!

Amitaabh Srivastava : कांग्रेस कमाल की पार्टी हो गई है। हमेशा दूसरों पर आरोप, आत्ममंथन से सख्त परहेज़। बीजेपी पर आरोप लगा रही है कि गुजरात में 10-10 करोड़ में उसके विधायक खरीद रही है। आपके विधायकों का ईमान इतना ढुलमुल है, यह ज़्यादा बड़ी चिंता नहीं होनी चाहिए? कितने जहाजों में कितनी बार फेरे लगेंगे टोली बचाये रखने के लिए? कहां गयीं वो वफादारी की बातें? राहुल गांधी फिर कह देंगे हमें सब पहले से ही मालूम था।

दरअसल परमहंसों की जिस गति तक पहुंचने के लिए बड़े-बड़े संत बहुत जप-तप, योग-ध्यान वगैरह करते हैं फिर भी तरसते रह जाते हैं, राहुल में वह भाव बड़े सहज रूप से व्यापता है। इस अर्थ में वह अपने परिवार ही नहीं, पार्टी के भी तमाम पूर्ववर्तियों से अलग और विलक्षण हैं। भारतीय राजनीति के निहायत खूंखार और ‘किलर इंस्टिंक्ट’ वाले मोदी-शाह युग में इस तरह का विदेहवादी निर्लिप्त विपक्ष भी इतिहास में दुर्लभ के तौर पर दर्ज किया जाएगा।

वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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मोदी राज में हगने पर भी जीएसटी!

Yashwant Singh : शौचालय जाने पर जीएसटी वसूलने वाले आज़ादी के बाद के पहले प्रधानमंत्री बने मोदी। पंजाब में रोडवेज बस स्टैंड पर सुलभ शौचालय की रसीद है ये। 5 रुपये शौच करने का चार्ज और एक रुपया जीएसटी। कुल 6 रुपये। महंगाई इतनी, गरीब खा न पाए, और, अगर हगने जाए तो टैक्स लिया जाए। उधर बिहार में हगने गए कई सारे गांव वालों को गिरफ्तार कर लिया गया, क्या तो कि खेत मे, खुले में, क्यों हग के गन्दगी फैला रहे हो। बेचारे सोच रहे होंगे कि इससे अच्छा तो अंग्रेजों और मुगलों का राज था। कम से कम चैन से, बिना टैक्स के, हग तो पाते थे।

हमारे बड़े भाई और चिंतक Rajiv Nayan Bahuguna जी सही लिखते हैं–

”यह धरती मनुष्य अथवा मवेशियों के मल से नहीं, अपितु पोइलथिन, पेट्रोल, डीज़ल, कारखानों के धुएं अथवा वातानुकूलित संयंत्रों की गैस से दूषित होती है। और भी कई कारक हैं, मैने कुछ गिनाए। इन प्रदूषक तत्वों के लिए अमेरिका, चीन जैसे देश और भारत मे अम्बानी, अडानी जैसे उत्तरदायी हैं। खुले में शौच जाने वालों से पहले इन पर रोक लगाओ। बात बाहर या भीतर शौच जाने की नहीं , अपितु टट्टी के सदुपयोग की है हंसिये मत। गांधी जी यही करते थे। वह मैले से खाद बनाते थे। पुरानी कहावत भी है :-

गोबर, टट्टी और खली
इससे खेती दुगनी फली

गोबर और मल से गैस, ऊर्जा बनाने की तकनीक कब की आ चुकी। लेकिन ध्यान कौन दे। भारत के साथ एक पड़ोसी देश के युद्ध के समय एक नेता ने बयान दिया था- ”हमारी पूरी आबादी अगर एक साथ हग दे, तो वह लघु राष्ट्र उसी में दब जाएगा।” मैं संशोधन कर कहना चाहता हूं कि 120 करोड़ आबादी के मल मूत्र का अगर उपयोग हो जाये टिहरी जैसे 6 बांधों से अधिक ऊर्जा पैदा हो सकती है। किसी बस्ती, शहर अथवा गांव के शौचालयों का मल एक टैंक में इकट्ठा कर गैस निकाल ली जाए, और शेष उच्चिष्ट से खाद बने। लेकिन यह काम पैसा लेकर शौचालय चलाने वाले किसी गू माफिया के सुपुर्द न हो, बल्कि ग्राम एवम नागर समाज को दीक्षित किया जाए। मनुष्य, मवेशी, पशु तथा पखेरू की टट्टी इस धरती की धरोहर है।

आदरणीय शीश राम कंसवाल जी बताते हैं कि रेतीले इस्राइल को उपजाऊ बनाने के लिए विश्व भर से टट्टी खरीद कर खेतों में डाली गई , और आज इस्राइल खेती का सिरमौर है। इस पृथ्वी नामक उपग्रह के लिए विष है धन पशु की टट्टी। यह धन पशु कौन है? यह वही है जो खरबों की सार्वजनिक सम्पदा का गोलमाल कर विदेश में जा छुपता है, अथवा अपने पाप की कमाई से एक एक कर सारे चैनल खरीद डालने में जुटता है। और धन पशु की टट्टी क्या है? कारखानों से निकला रासायनिक कचरा एवं धुंआ, पॉलीथिन की पन्नी, पेट्रो केमिकल का कबाड़, शराब और कपड़े की मिल से निकला खलदर, खेतों को शनैः बांझ बनाने वाली रसायनिक खाद इत्यादि। धनपशु खुले में शौच करता है। इसकी टट्टी से जल, थल नभ अधमरे हो रहे हैं। इसे खुले में शौच से रोको। मनुष्य और मवेशी की मल सम्पदा का सदुपयोग करो। इससे धरती की सेहत सुधारो और ऊर्जा बनाओ।”

भड़ास एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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यूपी में बीजेपी की सियासी बेचैनी : अखिलेश, माया और राहुल मिल कर दे सकते हैं मात!

संजय सक्सेना, लखनऊ

उत्तर प्रदेश में बीजेपी लगातार जीत का परचम फहराती जा रही है। यूपी में उसकी सफलता का ग्राफ शिखर पर है, लेकिन शिखर पर पहुंच कर भी बीजेपी एक ‘शून्य’ को लेकर बेचैन नजर आ रही है। उसे चुनावी रण में हार का अंजाना सा डर सता रहा है। इस डर के पीछे खड़ी है अखिलेश-माया और राहुल की तिकड़ी, जो फिलहाल तो अलग-अलग दलों से सियासत कर रहे हैं, मगर मोदी के विजय रथ को रोकने के लिये तीनों को हाथ मिलाने से जरा भी गुरेज नहीं है। बीजेपी का डर लखनऊ से लेकर इलाहाबाद तक में साफ नअर आता है। असल में 2014 के लोकसभा चुवाव मे मिली शानदार जीत का ‘टैम्पो’ बीजेपी 2019 तक बनाये रखना चाहती है।

यह तभी हो सकता है जब बीजेपी के किसी सांसद के इस्तीफे की वजह से बीजेपी को उप-चुनाव का सामना न करना पड़ जायें। बात यहां यूपी के उप-मुख्यमंत्री और फूलपुर से सांसद केशव प्रसाद मौर्या की हो रही है। मौर्या को अगर डिप्टी सीएम बने रहना है तो छह माह के भीतर (नियुक्ति के समय से) उन्हें विधान सभा या विधान परिषद का सदस्य बनना पड़ेगा। इसके लिये सबसे पहले केशव को संासदी छोड़ना पड़ेगी। सांसदी छोड़ेगें तो जिस (फूलपुर) लोकसभा सीट का केशव प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, वहा चुनाव भी होगा और चुनाव में बीजेपी को जीत नहीं हासिल हुई तो विपक्षी ऐसा माहौल बना देंगे मानों यूपी में बीजेपी शिखर से शून्य पर पहुंच गई है। बात यहीं तक सीमित नहीं रहेगी। मोदी ने यूपी में जो चमत्कार किया था, उस पर भी सवाल खड़े होंगे? ऐसे में पूरे देश में गलत संदेश जायेगा, जिसका असर 2019 के लोकसभा चुनाव तक पर पड़ सकता है।

फूलपुर लोकसभा चुनाव के पुराने नतीजे भी बीजेपी में भय पैदा कर रहे हैं। फूलपुर संसदीय सीट से तीन बार पंडित जवाहर लाल नेहरू, दो बार विजय लक्ष्मी पंडित से लेकर पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह तक चुनाव जीत चुके हैं। 1952 से लेकर 2009 तक बीजेपी का यहां कभी खाता नहीं खुला। 2009 के लोकसभा चुनाव में तो यहां से बीजेपी को पांयवें नबर पर ही संतोष करना पड़ा था और उसे मात्र 8.12 प्रतिशत वोट ही मिले थे। यहां तो कभी राम लहर तक का असर नहीं दिखा। हॉ, 2014 के चुनाव में जरूर चमत्कारिक रूप से मोदी लहर में यह सीट बीजेपी की झोली में आ गई थी। इसी लिये यह कयास लगाये जा रहे हैं कि बीजेपी आलाकमान केशव को सासदी से इस्तीफा दिलाने की बजाये उन्हें डिप्टी सीएम के पद से इस्तीफा दिलाकर दिल्ली में कहीं समायोजित कर सकती है।

वैसे, तमाम कयासों के बीच कहा यह भी जा रहा है कि बीजेपी की चिंता बेकार की नहीं है। असल में यहां चुनाव की नौबत आती है तो गैर भाजपाई दल यहां अपना संयुक्त प्रत्याशी उतार सकती है। फूलपुर संसदीय सीट पर चुनाव की नौबत आती है तो बसपा सुप्रीमों मायावती भी विपक्ष की संयुक्त प्रत्याशी बन सकती हैं। मायावती के राज्यसभा से इस्तीफे को भी इसी से जोड़कर देखा जा रहा है। वह लोकसभा पहुंच कर मोदी को दलितों सहित सामाजिक समरसता के तमाम मुद्दों पर आमने-सामने खड़े होकर घेरना चाहती हैं, जिसका सीधी असर यूपी की भविष्य की सियासत पर पड़ेगा। कुछ लोग इससे इतर यह भी तर्क दे रहे है कि बीजेपी आलाकमान योगी को पूरी स्वतंत्रता से काम करने की छूट देने का विचार कर रही है। मगर इसके लिये वह पिछड़ा वोट बैंक को नाराज नहीं करना चाहता है। पार्टी नेतृत्व का केशव पर भरोसा और पिछड़े वर्ग से होने के नाते भी उनके दिल्ली जाने की खबरों को बल मिलता दिख रहा है।

केशव प्रसाद के भविष्य को लेकर एक-दो दिन में तस्वीर साफ हो जाएगी। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह 29 जुलाई को तीन दिवसीय प्रवास पर लखनऊ आ रहे हैं। वह अपने प्रवास के दौरान एक तरफ सरकार और संगठन के बीच समन्वय बैठाने की कोशिश करेंगे तो दूसरी तरफ 2019 के लोकसभा चुनाव के अभियान की बुनियाद भी रखेंगे। शाह पहली बार तीन दिन के प्रवास पर आ रहे है। इसके कई संकेत हैं। तीन दिन में शाह 25 बैठकें करेंगे। बताते चलें की हाल में पीएम मोदी से मुलाकात के दौरान सांसदों ने योगी के मंत्रियों की शिकायत की थी। मोदी ने इसे काफी गंभीरता से लिया थां। इसका प्रभाव भी शाह के दौरे पर दिखाई पड़ सकता है।

उधर, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के चुनाव को लेकर यही संभावना जताई जा रही है कि वह अपने संसदीय क्षेत्र गोरखपुर में ही विधानसभा की किसी सीट से चुनाव लड़ेंगे। दूसरे डिप्टी सीएम डॉ. दिनेश शर्मा को विधान परिषद भेजा जा सकता है। इस समय योगी, मौर्य और डॉ.शर्मा सहित परिवहन राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार स्वतंत्र देव सिंह और वक्फ व विज्ञान प्रौद्योगिकी राज्यमंत्री मोहसीन रजा भी विधानमंडल के किसी सदन के सदस्य नहीं है।

योगी और मौर्य की सांसदी फिलहाल उप-राष्ट्रपति चुनाव तक तो बरकरार रहेगी ही, लेकिन 19 सितंबर से पहले दोंनो को विधानमंडल के किसी सदन की सदस्यता लेनी ही पड़ेगी, लेकिन विधान सभा और विधान परिषद की मौजूदा स्थिति को देखते हुए वर्तमान सदस्यों से त्याग पत्र दिलाए बिना इन सबके समायोजन की स्थिति दिखाई नहीं दे रही। भाजपा विधायक मथुरा पाल और सपा एमएलसी बनवारी यादव के निधन के चलते हालांकि विधानसभा और विधान परिषद में एक- एक स्थान रिक्त है, पर इन सीटों की स्थिति देखते हुए यहां से मुख्यमंत्री, उप मुख्यमंत्री या राज्यमंत्रियों मंे किसी को लड़ाने की संभावना दूर- दूर तक नहीं दिखती। ऐसे में संभावना यही है कि भाजपा नई सीटें खाली कारकर इन सबका समायोजन कराएगी।

अखिलेश की चुटकी
केशव के दिल्ली भेजे जाने की चर्चा के बीच सपा अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने चुटकी लेते हुए कहा कि अभी तो तीनों मिले नहीं, फिर क्यों घबरा गए। अखिलेश ने केशव प्रसाद मौर्य का नाम लिए बगैर कहा,सुना हैं कि आप लोग किसी को दिल्ली भेज रहे है। अभी तो समझौता नहीं हुआ है फिर क्यों घबरा गए। अगर हम तीनों (सपा, बसपा व कांग्रेस) एक हो जाएं तो आप कहां ठहरोगे, यह आप समझ सकते हो।

लेखक संजय सक्सेना लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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