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सियासत

पत्रकारिता के सिद्धांत, नैतिक मूल्य और उनकी सच्चाई

एक दिन मैं विश्वविद्यालय से घर के लिए निकल रहा था। थोड़ी ही दूर पहुंचा तो देखा कि जाम लगा था। मैंने अपनी गाड़ी को सड़क किनारे लगाया और पास ही बनी चाय की दुकान पर चाय पीने लगा। ट्रैफिक जाम ज्यादा बड़ा तो नहीं था लेकिन सबको जल्दी थी इसलिए साफ नहीं हो रहा था। मैं चाय पी ही रहा था कि अचानक से एक एंबुलेंस बहुत तेजी में आई। उसे देखकर समझ आ गया कि कोई इमरजेंसी है। लेकिन लोग उस एंबुलेंस को निकलने ही नहीं दे रहे थे।

एक दिन मैं विश्वविद्यालय से घर के लिए निकल रहा था। थोड़ी ही दूर पहुंचा तो देखा कि जाम लगा था। मैंने अपनी गाड़ी को सड़क किनारे लगाया और पास ही बनी चाय की दुकान पर चाय पीने लगा। ट्रैफिक जाम ज्यादा बड़ा तो नहीं था लेकिन सबको जल्दी थी इसलिए साफ नहीं हो रहा था। मैं चाय पी ही रहा था कि अचानक से एक एंबुलेंस बहुत तेजी में आई। उसे देखकर समझ आ गया कि कोई इमरजेंसी है। लेकिन लोग उस एंबुलेंस को निकलने ही नहीं दे रहे थे।

जब मैंने ये देखा तो अपनी चाय रखी और एंबुलेंस को निकालने में मदद करने लगा। मेरी देखा-देखी कई लोग और आ गए मदद करने। लेकिन अचानक एक पत्रकार महोदय भी वहां अपना कैमरा लिए आ गए और एंबुलेंस की फोटो लेने लगे। मैंने और मेरे साथ कई लोगों ने मिलकर जाम को थोड़ा साफ किया ताकि वो एंबुलेंस निकल जाए। लेकिन जैसे ही जाम साफ हुआ और एंबुलेंस निकलने लगी तो उस पत्रकार ने एक गाड़ी वाले को आगे बुलाया और उसको एंबुलेंस के सामने खड़ा करा दिया और वो फिर एंबुलेंस की फोटो लेने लगा।

ये देखकर हम सबको बहुत गुस्सा आया और उस पत्रकार से थोड़ी बहस भी हुई और फिर वो पत्रकार वहां से चला गया। इस घटना के बाद मेरे मन में कई सवाल आ रहे थे। मैं सोच रहा था कि समाजोत्थान और समाज के विकास के लिए बनी पत्रकारिता वाकई आज निजी स्वार्थ का साधन बन गई है। मुझे बहुत बुरा लग रहा था कि मैं भी पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहा हूं और शायद कल को मुझे भी अपना स्वार्थ पूरा करने के लिए ऐसी ही कोई हरकत करनी पड़े।

मैं जबसे पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहा हूं तभी से मुझे पढ़ाया और सिखाया गया है कि हमें कभी भी ऐसा कोई काम नहीं करना है जिससे समाज को कोई नुकसान पहुंचे। ये बात मुझे या किसी पत्रकारिता की पढ़ाई करने वाले विद्यार्थी को ही नहीं बल्कि सभी को पढाई और सिखाई जाती है।

लेकिन इस घटना ने मुझे झकझोर कर रख दिया। मेरा मन अशांत सा रहने लगा और मैं सोच में पड़ गया कि जो बात हमें पत्रकारिता में पढाई और सिखाई गई है वैसा कुछ भी नहीं है। बल्कि पत्रकारिता के सिद्धांत और मूल्यों के ठीक विपरीत एक पत्रकार समाज में काम करता है।

 

प्रियांक द्विवेदी पत्रकारिता के छात्र हैं। प्रस्तुत लेख उनके ब्लॉग से साभार से लिया गया है।

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1 Comment

1 Comment

  1. संजय सतोईया पत्रकारिता विभाग बी यू झाँसी

    June 1, 2016 at 2:23 am

    इस आर्टिकल को पड़ने के बाद मुझे भी अपनी जिम्मेदारी का एहसास हाउस है कोसिस करूँगा की आगे जिंदगी में इस पढ़ाई का में अच्छा ही रिस्पॉन्स दू थैंक्स मेम आपके आर्टिकल की सच्चाई और लेखन से हमको पिरेर्ण मिलती

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