‘प्रयुक्ति’ अखबार के मालिक और संपादक कभी अपनी इस घटिया मानसिकता पर विचार करें

Pankaj Chaturvedi : कोई दो साल पहले दिल्ली से एक दैनिक अखबार प्रयुक्ति प्रारम्भ हुआ। दक्षिण से आये ग़ैरहिन्दी भाषी संपत कुमार सुरिप्पगरी ने सुंदर, नए सलीके जी हैडिंग जे साथ अखबार शुरू किया। संपादक हैं हमारे कई दशक पुराने साथी मुकुंद मित्र। अब 16 पेज का रंगीन अखबार की छपाई, सज्जा, बिजली, स्टाफ का वेतन , चौकीदार का मेहनताना से ले कर हर खर्च को सुरिअप्पा जी नियमित वहन कर रहे हैं।

केवल सम्पादकीय पेज पर लिखने वाले स्वतंत्र चिंतकों का भुगतान एक साल से नहीं किया यह राशि बामुश्किल 2000 प्रति दिन होगी, लेकिन न्याय, शोषण, समानता जैसे नारे उछालने वाले पूंजीपति इसे नज़रंदाज़ कर रहे हैं।

हालांकि इसमें दोष अकेले उस पूंजीपति मालिक का ही नहीं है, हिंदी में ऐसे लोगों की भरमार है जो मुफ्त में लिखने को राजी हैं। वे अपने नाम और फोटो की कटिंग्स ले कर शायद वसूली करते हों। लेकिन जो असल में श्रमजीवी कल्मघिससु है उनके लिए ये हालात दुःखद हैं।

शर्मनाक तो यह भी है कि उनकी डेस्क के लोग पत्रकारों को सूचित नहीं कर रहे कि अब हम केवलः मुफ़्त में ही छापेंगे। ऐसा है तो पहले जिनसे लिखवाया उनका भी तो भुगतान हो।
क्या विडम्बना है कि हर दिन लाखोँ रुपये व्यय कर16 पन्ने छापने वकय, अखबार के सबसे गंभीर और बौद्धिक पेज के लिए सहयोग करने वालों को मानदेय देने में ही खुटका लगाते हैं।

प्रयुक्ति के मालिक, संपादक आदि कभी अपनी इस घटिया मानसिकता पर विचार करें। या फिर न्याय, अधिकार जैसे फ़र्ज़ी नारे उछालना बन्द करें।

वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार पंकज चतु्र्वेदी की एफबी वॉल से.

कुछ प्रमुख प्रतिक्रियाएं…

Tarun Jain Ubi क्या लेख आमन्त्रित करने से पूर्व मानदेय पर चर्चा हुई थी!

Pankaj Chaturvedi जी। एक साल का पैसा भी दिया। आपको क्या लग रहा है कि मैं किसी के जबरिया गले पड़ रहा हूँ??

Tarun Jain Ubi आपकी बात में दम हैं। लेकिन जब फ्री में सब कुछ मिल रहा है तो आपसे वे क्यों काम लेंगे! रही बात पैसे की, जब स्टाफ ही परेशान तो फ्रीलान्स को कौन पूछे!

Pankaj Chaturvedi स्टाफ को नियमित मिल रहा है वहां

Tarun Jain Ubi यह तो स्टाफ ही जाने कि चेहरे की मुस्कान और दिल का दर्द क्या होता है

Sudhanshu Gupt पत्रकारिता में पेमेंट की हालत बहुत खराब है पंकज भाई. और, पेमेंट कितना मिलता है ये भी किसी से छिपा नहीं है.

Pankaj Chaturvedi इस पर आवाज़ जरूर उठाएं। भले ही कुछ हमें छापना बन्द कर दें

Ravi Laitu लेखन क्षेत्र में उससे भी ज़्यादा ….

Ramesh Tiwari ये तो बहुत बुरी हालत है। अन्य कार्यों के लिए सबकी जेब में रुपये हैं, बस लेखक को देने के लिए नहीं हैं। हद है।

Sanjaya Kumar Singh हिन्दी में मुफ्त में लिखने, छापने और किसी-न किसी बहाने पैसे न देने का रिवाज पुराना है। मुझे लिखने के पैसे बहुत कम मिले हैं (मित्र संपादक अपवाद रहे)। पैसे मांगने का असर यह हुआ है कि मैं छपता ही बहुत कम हूं। और मजबूरी का अनुवादक बन गया। हालत यह है कि मित्र संपादक भी पैसे मांगने पर जवाब देना भूल जाते हैं। और फिर छापना।

Vivek Shukla कल आपसे ट्रिब्यून की बात हुई थी। वहां पर मैंने मानदेय का मुद्दा उठाया तो संपादक जी ने बोलना छोड़ दिया। वैसे वो 30 साल पुराने मित्र हैं।

Pankaj Chaturvedi आज भी तीन सौ देते हैं वे

Raman Saini …अखबार हो या रिसाला …पत्र हो या पत्रिका ..उपन्यास हो या जीवनी …कलम की वजह से ही अस्तित्व में आतें हैं….कलम की उपेक्षा कर कागज़ के पीछे भागने वाली छपाईयां धूमिल होती जाती हैं …मिटती जातीं हैं ..और अपना अर्थ खो बैठती हैं ….जानकार लोग जानते ही होंगे …..?…कलम से शब्द रचे जायेंगे तो कागज़ को स्याही द्वारा उकरकर खुराक मिलेगी ….!…जिसने कलम और कलमकार की कद्र नहीं जानी ….तो समझो वह आदमी नहीं….

Vijayshankar Chaturvedi कुछ लोग वर्षों से ठीक इसी तरह मेरे पेट पर भी लात मार रहे हैं भाई साहब!

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