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हाथ से निकलता हेडलाइन मैनेजटमेंट, अंत में डूबते को तिनके का सहारा, ईडी मेहरबान

आज दिख रहा है हेडलाइन मैनेजमेंट का असर। दरअसल दिल्ली के अखबारों ने आज दिल्ली की खबर को तो पूरा महत्व दिया है लेकिन प्रधानमंत्री की खबर सिंगल कॉलम में छपी है। या पहला पन्ने से गायब है। प्रधानमंत्री ने कहा है, विपक्ष सत्ता में आया तो राम मंदिर पर बुलडोजर चला देगा। यह बहुत गंभीर खबर है लेकिन आज वैसे नहीं छपी है जैसी छपनी चाहिये। यह हेडलाइन मैनेजमेंट का असर है और इसे देखने वालों का काम है कि इधर ध्यान दें। हालांकि, चुनावी मैनेजमेंट की जरूरत का बड़ा हिस्सा निकल गया है। प्रधानमंत्री की खबर का यह हश्र टेम्पो वाली खबर से हुआ है। फिर भी, खजुराहो, सूरत, इंदौर के बावजूद किसी ने तेज बहादुर को याद नहीं किया जबकि अब उसका पर्चा रद्द होना भी साजिश लग रही है। ईडी का तो ठीक है, स्वाति मालीवाल के मामले में मीडिया में जो हंगामा है वह ना बंगाल के राज्यपाल और राजभवन के समय था और ना तब हुआ जब संदेशखली की कथित पीड़िताओं ने अपने आरोप वापस लिये और भाजपा ने कहा कि दबाव में ले रही हैं। यही नहीं, वीडियो (और स्टिंग) भाजपा के खिलाफ हो तो एडिटेड है भले सीसीटीवी का हो। लेकिन जिसपर मामला बना वह कोर्ट में नहीं टिका।

संजय कुमार सिंह

आज के अखबारों में आम आदमी पार्टी के खिलाफ दो-दो बड़ी खबरें हैं। इंडियन एक्सप्रेस, द हिन्दू और टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर भले एक ही खबर है लेकिन इंडियन एक्सप्रेस ने खूब जगह दी है। ज्यादातर अखबारों में दोनों खबरें पहले पन्ने पर है। दिल्ली में 25 मई को मतदान है। सभी सीटों पर कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के साझा उम्मीदवार हैं। दूसरी ओर भाजपा ने अपने ज्यादातर उम्मीदवार बदल दिये हैं। भोजपुरी अभिनेता और गायक मनोज तिवारी को रखा था तो उनके मुकाबले कन्हैया कुमार उम्मीदवार हैं और वे मनोज तिवारी के मुकाबले ज्यादा ही बिहारी हैं, राजनीतिक तो हैं हीं। ऐसे में यह एक सीट भी मुश्किल में है और भाजपा को सीटों का अनुपात विधानसभा जैसा रखने के लिए भी काफी मशक्कत करनी पड़ रही है। ऐसे में प्रमुख विरोधी दलों में एक का खाता फ्रीज होना और दूसरे के प्रमुख प्रचारक का जेल में होना कुछ राहत की बात थी। ऐसे में मुख्यधारा की मीडिया की भूमिका और चुनाव आयोग के गठन तथा उसकी कार्यशैली से सत्तारूढ़ दल को जितना सहयोग मिल रहा हो, हेडलाइन मैनेजमेंट की उसकी कोशिशों से खस्ता हालत का पता चलता है। आम आदमी पर ईडी का आरोप और स्वाति मालीवाल का मामला इसी कारण अखबारों में महत्व पा रहा है। आइये पहले दोनों मामलों में आज के शीर्षक देख लें।

1. इंडियन एक्सप्रेस

आबकारी नीति की जांच में अपना मामला बनाने के लिए ईडी ने कदम उठाया (फ्लैग शीर्षक) दोहरा झटका : मालीवाल मामला बढ़ गया, आबकारी मामले में केजरीवाल  और आम आदमी पार्टी का नाम। (इंट्रो है) पहली बार ईडी ने पार्टी और मुख्यमंत्री को नामजद किया है; संज्ञान लेने पर अदालत को विचार करना है। इसके साथ दो खबरें हैं। सिंगल कॉलम की खबर का शीर्षक है, ईडी ने सुप्रीम कोर्ट से कहा : हमारे पास केजरीवाल और एक हवाला ऑपरेटर की सीधी बातचीत है। दो कॉलम की दूसरी खबर का शीर्षक है, केजरीवाल के सहायक के खिलाफ एफआईआर में स्वाति मालीवाल : तमाचा मारा, सीने पर, टांगों के बीच में लात मारी। इंडियन एक्सप्रेस में इस मामले में एक और खबर है। दो कॉलम की इस खबर का शीर्षक है, विभव दोषी है, कहने के बाद आम आदमी पार्टी ने यू टर्न लिया : स्वाति भाजपा की साजिश का चेहरा हैं

आम आदमी पार्टी और स्वाति मालीवाल के मामले को मैं भाजपा के हेडलाइन मैनेजटमेंट की तरह देखता हूं और उसपर बात करने से पहले सभी अखबारों के शीर्षक की चर्चा में इंडियन एक्सप्रेस पहला है और इसके साथ यह बताना अप्रासंगिक नहीं होगा कि आज अखबार के पहले पन्ने पर भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा का इंटरव्यू है। 2014 से पहले अखबार (सरकारी मीडिया भी) सभी दलों को स्थान और समय देते थे। अब स्थिति बदली हुई है। प्रधानमंत्री प्रेस कांफ्रेंस नहीं करते, अखबारों से बात नहीं करते और अखबार उनका (पार्टी या सरकार का) पक्ष आम तौर पर नहीं ले सकते हैं फिर भी इस समय सत्तारूढ़ दल के नेताओं का इंटरव्यू छाप रहे हैं और फुटेज दे रहे हैं। इसमें विपक्षी नेता नहीं के बराबर हैं हालांकि मुझे यह नहीं पता है कि मौका अखबार ने उन्हें नहीं दिया या नेताओं ने अखबार को नहीं दिया। जो भी हो, कल विपक्षी नेताओं के भाषण के शब्द बदलने की चर्चा थी और यह भी कि प्रधानमंत्री मीडिया से बात नहीं करते हैं क्योंकि वे न्यूट्रल नहीं हैं। अब क्यों कर रहे हैं यह मैं नहीं जानता। पूछने-बताने का रिवाज अब नहीं रहा।

2. टाइम्स ऑफ इंडिया

दोनों खबरें लीड हैं। स्वाति मालीवाल की खबर पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर है। शीर्षक है, मालीवाल ने अदालत में बयान दर्ज कराया, पुलिसवाले दिल्ली के मुख्यमत्री के घर पहुंचे। इंट्रो – ड्राइग रूम (बैठक) में कोई सीसीटीवी कैमरा, पुलिस ने पीएस को तलाशा। दूसरी खबर का शीर्षक है, सांसद झूठ बोल रही हैं, अतिशी ने कहा, भाजपा की साजिश का चेहरा। खबर के साथ मारपीट का विवरण और कुछ अन्य खबर हैं। एक का शीर्षक है, ‘बहस’ के बाद का वीडियो है, स्वाति ने कहा गुंडे को बचाने की कोशिश। इसके बराबर में खबर है वैभव ने पुलिस से शिकायत की कहा, मालीवाल फंसा रही हैं।

दूसरी खबर अखबार की लीड है। शीर्षक है, आबकारी नीति की नई चार्जशीट में ईडी ने दिल्ली के मुख्यमंत्री, आम आदमी पार्टी को अभियुक्त के रूप में नामजद किया। इंट्रो है, पीएमएलए मामले में आरोपित पहली पार्टी है। जवाब में पार्टी ने कहा है, एजेंसी अब हमारी संपत्ति, खाते जब्त करेगी। मामले का विवरण देने वाले बॉक्स का शीर्षक है, क्या पार्टी पर चुनाव आयोग की कार्रवाई हो सकती है। आप जानते हैं कि चुनाव के समय बैंक खाता फ्रीज करना और प्रचार करने वाले प्रमुख नेताओं को जेल में रखना चुनाव के लिए लेवल प्लेइंग फील्ड देने की जरूरत के खिलाफ है। इस मामले में चुनाव आयोग भी कार्रवाई कर सकता था पर नहीं हुई। तब सुप्रीम कोर्ट ने केजरीवाल को विशेष जमानत दी है और इससे भाजपा की परेशानी दिख रही है। यहां तक कि गृह मंत्री भी सार्वजनिक टिप्पणी कर चुके हैं। अब चुनाव आयोग को उसका अधिकार बताया जा रहा है और यह सब खबर माहौल बनाने का काम तो करेगी ही जबकि सुप्रीम कोर्ट में केजरीवाल की गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कल पूरी हुई और फैसला  सुरक्षित रख लिया गया है। 

3. हिन्दुस्तान टाइम्स

दोनों खबरें लगभग बराबर में एक-दूसरे के आमने-सामने है। पहले या बाईं ओर, लीड की जगह हमले की खबर है। शीर्षक है, मालीवाल ने ‘बर्बर हमले’ का विवरण दिया;  भाजपा एजेंट : आप”। दूसरी खबर इसके बराबर में, पर तीन कॉलम में है। शीर्षक है, नया आरोप पत्र केजरीवाल को एक आरोपी के रूप में दर्ज करता है। पहली खबर के साथ बॉक्स में मालीवाल की एफआईर के अंश हैं दूसरे में आप का जवाब। तीसरा हिस्सा वीडियो का भी है। इसके अनुसार नाराज मालीवाल सोफा पर बैठी हैं, कर्मचारियों को धमका रही हैं वे उनसे जाने के लिए कह रहे हैं पर वे कह रही हैं कि वे पुलिस का इंतजार कर रही हैं और वे जो करना चाहें कर सकते हैं। जाहिर है यह पूरा नहीं है पर कहानी से लगता है कि जबरन मुद्दा बनाने की कोशिश है। और इसी को हेडलाइन मैनेजमेंट कहा जाता है। इस चक्कर में आज प्रधानमंत्री का यह आरोप दब गया है जो हिन्दुस्तान टाइम्स में दोनों खबरों के बीच में सिंगल कॉलम है। दूसरे अखबारों में भी वैसे नहीं है जैसे छपता रहा है। और यह टेम्पो के समय से हुआ है।  

4. द हिन्दू

स्वाति मालीवाल की खबर यहां पहले पन्ने पर नहीं है। यहां सिर्फ खबर अंदर होने की सूचना है। पहले पन्ने पर ईडी वाली खबर है। इसका शीर्षक है, ईडी ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि उसके पास केजरीवाल के हवाला लिंक के सबूत हैं।

5. द टेलीग्राफ

मालीवाल का मामला लीड है। ईडी की खबर पहले पन्ने पर नहीं है। इस खबर का फ्लैग शीर्षक है, “पार्टी का ‘यू- टर्न’  पीटने का आरोप निराधार है”। मुख्य शीर्षक है, “मालीवाल भाजपा की साजिश का चेहरा हैं : आप”।  

6.नवोदय टाइम्स

आधा पन्ना विज्ञापन है। इसलिए आज दो पहले पन्ने हैं। पहले पर स्वाति छाई हुई हैं। लीड का शीर्षक है, “लड़ती आई हूं, अपने लिये भी लड़ूंगाी : मालीवाल”। उपशीर्षक है, न्यायालय में बयान दर्ज कराया, पुलिस ने घटना को रीक्रियेट किया। दूसरी खबर का फ्लैग शीर्षक है, आबकारी नीति मामले में चार्जशीट। मुख्य शीर्षक है, आप और मुख्यमंत्री को बनाया आरोपी। इसके साथ एक सिंगल कॉलम की खबर का शीर्षक है, “केजरीवाल को फंसाने की साजिश : आप”। हाईलाइट किया हुआ अंश है, पहली बार किसी सीएम और पार्टी को बनाया गया आरोपी। इससे दोनों संकेत जाते हैं, 1) भाजपा अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी को कुचलने में कितनी ताकत से लगी है और नामुमकिन मुमकिन कर रही है जो पहली बार है। 2) भाजपा अपने इस  प्रतिद्वंद्वी से निपटने में क्या-क्या झेल रही है।

7. अमर उजाला

लीड है, ईडी का मामला। शीर्षक है, दिल्ली शराब घोटाले में ईडी ने आप और केजरीवाल को बनाया आरोपी। उपशीर्षक है, पहली बार … किसी मौजूदा सीएम पर मनी लांड्रिंग के आरोप, कोई सियासी दल आरोपी। बुलेट प्वाइंट – विशेष अदालत में ईडी ने दाखिल किया 200 पेज का आठवां आरोप पत्र। अब तक 18 गिरफ्तारी। आम आदमी पार्टी के खिलाफ दूसरी खबर यहां लीड के नीचे है। इसका शीर्षक है, “सीएम आवास के सीसीटीवी से की गई छेड़छाड़ : स्वाति’। यह सब इस तथ्य के बावजूद है कि गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई हो चुकी है। फैसला सुरक्षित रख लिया गया है। इससे पहले न्यूजक्लिक के संस्थापक संपादक की गिरफ्तारी को अवैध ठहराया जा चुका है और उन्हें रिहा कर दिया गया है। तमाम कारणों से यह विपक्षी दल को कुचलने की साजिश लग रही है और अगर मान लिया जाये कि मामला है तथा अपराध हुआ है तो इलेक्टोरल बांड का मामला बिल्कुल साफ है। लेकिन उसमें कार्रवाई नहीं हो रही है। जो भी हो, अखबारों की भी मजबूरी है। खबर है आरोप या एफआईआर है तो खबर छापनी ही पड़ेगी। हेडलाइन मैनेजमेंट के दौर में विवेक एक तरफ झुका लगता है। खबरें पेश करने के नियम होते हैं और कई खबरें छोटी सी नहीं छाप सकते हैं। पैडिंग उसी के लिए है और वह भी खबरें प्रस्तुत करने में काम आता है।

कुल मिलाकर, दिल्ली में जिन खबरों की जरूरत है उन्हें ज्यादा प्रमुखता दी गई है। खबरें तो सरकार ही रचती है, अखबार तो महत्व के अनुसार प्रकाशित करते हैं। हेडलाइन मैनेजमेंट का असर है कि भाजपा के फायदे की खबर को प्रमुखता मिलती है। नुकसान वाली हो तो कहीं दब जाती है या छूट जाती है। वरना आज प्रधानमंत्री का यह आरोप साधारण नहीं है कि विपक्ष सत्ता में आया तो राम मंदिर पर बुलडोजर चला देगा। निश्चित रूप से यह बहुत बड़ा खुलासा है जो लाखों लोगों को प्रभावित करेगा। कहने की जरूरत नहीं है कि अंबानी-अडानी से टेम्पो में बोरे में भरकर काला धन कांग्रेस को भेजने और शहजादे द्वारा माल उठाने के उनके आरोप की जांच ईडी से कराने की चुनौती नहीं दी गई होती तो आज का आरोप भी बड़ा था। लेकिन अब जब पिछला आरोप हवा हवाई लग रहा है तो आज यह आरोप दब गया है। विरोधियों को कमजोर करने के लिए कोई भी आरोप लगाना पुराना मामला रहा है। मीडिया ने इनका सच नहीं बताकर समाज को बिल्कुल खराब कर दिया है।  

इसका उदाहरण आज के अखबारों की एक खबर है जिसका वीभत्स रूप सोशल मीडिया पर है। अमर उजाला की खबर के अनुसार, कन्हैया कुमार पर हमला, एक युवक ने जड़ा थप्पड़ दूसरे ने फेंकी स्याही”। कन्हैया कुमार के साथ चल रहे लोगों ने दोनों की पिटाई कर दी। एक के सिर में चोट आई है। खबर के अनुसार, हमला करने वालों ने वीडियो जारी कर कहा है कि हमने भारतीय सेना के अपमान का बदला लिया है। कन्हैया ने पूरे देश की भावना को आहत किया था और देश तोड़ने की बात की थी। आप जानते हैं कि कन्हैया पर आपत्तिजनक भाषण का आरोप है, उसका वीडियो समाचार चैनलों पर चला था लेकिन कार्रवाई नहीं हुई है। शक है कि वीडियो फर्जी था वरना कार्रवाई होनी चाहिये थी और मीडिया को सही तस्वीर बताना चाहिये। इस तरह के हमले से अगर भाजपा उम्मीदवार जीत जायें या कन्हैया कुमार डर जायें तो यह देश हित में नहीं है।

सरकार बदल गई तो उनका कैरियर भी खत्म हो सकता है। नहीं हो तो भाजपा के साथ नेतागिरी करके भी वे क्या कर लेंगे जब उनका भविष्य डॉक्टर हर्षवर्धन या संतोष गंगवार जैसा हो सकता है या फिर जब उनके समकक्ष बांसुरी स्वराज और उज्जवल निकम जैसे लोग होंगे। मेरा मानना है कि नारा लगाना गलत है या गलत नारे लगाये गये थे तो उसका वीडियो टीवी पर चलाना भी गलत है और अगर वह संपादित था तो और गलत है। जो भी हो, व्यवस्था यह है कि इतने समय में ना कार्रवाई हुई ना वीडियो की सत्यता प्रमाणित है। फिर भी कोई उस नारे के लिए कन्हैया पर हमला कर रहा है और बहादुर बनकर वीडियो जारी कर रहा है। ऐसा ही एक मामला सेना के समर्थन वाला, आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स ऐक्ट (एएफएसपीए) है। कन्हैया समेत तमाम लोग इसका विरोध करते हैं क्योंकि आरोप है कि इसकी सुरक्षा में सेना के जवान बलात्कार करते हैं।

यह एक राजनीतिक और प्रशासनिक मुद्दा है और इसका विरोध सेना का अपमान नहीं है। और फैसला सड़क पर नहीं हो सकता है। लेकिन कन्हैया कुमार पर हमला करने वालों का एक मुद्दा यह भी था। मीडिया ने समाज को शिक्षित करने का अपना काम लगभग नहीं किया है और यह सत्तारूढ़ दल का अंधाधुंध समर्थन के कारण है। इसी क्रम में बरखा दत्त को बदनाम किया जा चुका है और इसकी चर्चा ध्रुव राठी ने अपने वीडियो में की है और मामले को समझाने का प्रयास किया है जो मुख्य धारा की मीडिया को भी करना चाहिये पर नहीं किया गया है। वैसे भी हिंसा से नतीजा नहीं निकलेगा उसके लिए बैठकर बात करनी ही होगी। अगर सेना के अपमान की ही चिन्ता है तो बीएसएफ में खराब खाने को लेकर आवाज उठाने वाले तेज बहादुर जैसों की चिन्ता की जानी चाहिये जिसे नौकरी से निकाल दिया गया था। उसने ‘फौजी एकता कल्याण मंच’ बनाया था।

आपको याद होगा कि 2019 में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में नरेन्द्र मोदी को चुनौती देने मैदान में उतरे थे। बाद में समाजवादी पार्टी ने अपना उम्मीदवार भी घोषित किया था पर वे चुनाव नहीं लड़ पाये और उनका पर्चा खारिज हो गया था। इस बार पर्चा खारिज होने के इतने मामलों में भी किसी ने तेज बहादुर को याद नहीं किया और कन्हैया पर हमला हो गया तो यह वह लोकतांत्रिक समाज है जो पिछले 10 वर्षों में बना है।

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