संजय सिन्हा-
ईमान की कमाई और रिश्वत का गणित…
मैं भले पत्रकार रहा हूं, लेकिन मैं पला बढ़ा हूं ब्यूरोक्रेटिक परिवार में। मैंने अपने आसपास वरिष्ठ सरकारी अधिकारी देखे हैं।
मतलब कोई मुझे यह नहीं कह सकता कि संजय सिन्हा, आपको एक आला सरकारी अधिकारी की सैलरी नहीं पता, इसलिए आप सरेराह किसी आईएएस पति और आईपीएस पत्नी के नाम 40 विला और कॉटेज होने की खबर पर ऐसी टिप्पणी नहीं कर सकते।
40 विला? क्या सैलरी मिलती होगी इन्हें? क्या इतनी सैलरी कि राजस्थान कैडर के आईएएस पति और उनकी आईपीएस पत्नी के पास एक दो विला नहीं, बल्कि चालीस विला हो जाएं?
खबर क्योंकि अखबारों में छप गई है और सोशल मीडिया पर तैर रही है, इसलिए इसमें संजय सिन्हा की ओर से कोई आरोप नहीं है। बस सिर्फ हैरानी है। ऐसी हैरानी, जो एक साधारण आदमी के गणित से पैदा होती है।
मैंने कहा न कि मैं भले पत्रकार रहा हूं, लेकिन मेरा लालन-पालन ब्यूरोक्रेटिक परिवार में हुआ है।
मैं सोचता हूं कि मेरे रिश्तेदारों की सैलरी पता नहीं क्यों इतनी कम थी कि वे एक फ्लैट तक नहीं बना पाए।
पिताजी तो बिना एक कमरे का मकान बनाए संसार से चले गए। अपने बेटे को सरकारी स्कूल से आगे पढ़ा तक नहीं पाए।
आईपीएस रहे मामा भी अपने तीनों बच्चों को केंद्रीय विद्यालय के आगे नहीं भेज पाए। और मकान? मत ही पूछिए तो बेहतर रहेगा। क्योंकि जब उनके महकमे का एक इंस्पेक्टर भी कोठी का मालिक हो गया था, तब भी बेचारे मामा, जो एसपी रहे, डीआईजी रहे, आईजी रहे, डीजी रहे चार मिट्टी की ईंटें नहीं जोड़ पाए।
मैं तो उनके साथ रहा। उनके पास रहकर पढ़ा और देखा कि महीने के अंत में कैसे दस, बीस, पचास रुपये के लिए हम बच्चों के गुल्लक खोलने पड़ जाते थे। इतना तो मैंने अपनी आंखों से देखा है।
वैसे मैंने विलाओं वाले अधिकारी भी देखे हैं और बच्चों के गुल्लक से दस, बीस रुपये निकालकर साबुन मंगाने वाले मामा और पिता जी को भी देखा है।
तो आज इतना लिखने के पीछे आपको सिर्फ यह बताना है कि मेरा लिखा सिर्फ कागजी बात नहीं है। यह खुद देखा और भोगा हुआ यथार्थ है। मेरा गणित किसी किताब में छपा हुआ गणित नहीं, जिंदगी में देखा हुआ गणित है।
मैंने बार-बार कहा है और आज फिर दोहरा रहा हूं कि भारत में सबसे बड़ी नौकरियों में से एक आईएएस की नौकरी पाने वाला कोई अधिकारी अगर नाक के नीचे मूंछ उगते ही पहले ही प्रयास में आईएएस बन जाए और फिर तय कर ले कि वह जिंदगी भर अपनी सैलरी का एक पैसा भी खर्च नहीं करेगा, सब जमा करेगा, तो भी अगर वह कैबिनेट सेक्रेटरी के पद तक पहुंचकर साठ में रिटायर हो जाए, तब भी केवल अपनी वेतन की कमाई से दस करोड़ रुपये जुटा लेना आसान नहीं है।
वास्तविक रकम उसकी सेवा अवधि, वेतनमान, कर, निवेश और अन्य परिस्थितियों पर निर्भर करेगी, लेकिन बात का सार यही है कि वेतन की एक सीमा होती है।
मैं यहां तक मानकर चल रहा हूं कि वह अधिकारी अपने बच्चों की फीस नहीं देगा, घर का खर्च नहीं उठाएगा, बीमार नहीं पड़ेगा, घूमने नहीं जाएगा, कपड़े नहीं खरीदेगा, किसी शादी में शगुन नहीं देगा और चाय तक अपनी जेब से नहीं पिएगा। यानी एक मनुष्य की तरह नहीं, पैसे जमा करने वाली मशीन की तरह जिंदगी गुजारेगा।
तब भी सवाल यही है कि आखिर चालीस विला कहां से आएंगे? आईएएस पति और आईपीएस पत्नी दोनों कमाते हैं। दोनों की सैलरी जुड़ जाए, दोनों जीवन भर बचत करें, तब भी संपत्ति का हिसाब लगाते समय जमीन आसमान का अंतर समझना होगा।
कमाई और बचत दो अलग चीजें हैं। वेतन से पहले घर चलता है, बच्चों की पढ़ाई होती है, माता पिता की जिम्मेदारी होती है, जीवन की दूसरी जरूरतें होती हैं। जो बचता है, वही बचत है। और बचत से जो संपत्ति बनती है, उसका भी अपना हिसाब होता है।
ऐसे में सवाल उठेगा ही कि विला खरीदने के लिए पैसा कहां से आया? किसी के पास चालीस विला हैं तो मुझे उससे जलन नहीं है। किसी के पास चार सौ मकान हैं तो भी मुझे कोई शिकायत नहीं है। किसी ने सच में मेहनत, कारोबार, विरासत से इतनी संपत्ति बनाई है तो उसे सौ बार सलाम।
लेकिन कोई सरकारी कुर्सी पर बैठकर जनता के पैसे से अपनी निजी सल्तनत खड़ी करता है, तो फिर उसकी संपत्ति सिर्फ उसकी निजी खुशी का मामला नहीं रह जाती। वह उस व्यवस्था के चरित्र का सवाल बन जाती है, जिसे जनता अपने टैक्स के पैसे से चलाती है।
सरकारी अधिकारी की सैलरी जनता के पैसे से आती है। उसका बंगला जनता के पैसे से चलता है। उसकी गाड़ी का ईंधन, उसके कार्यालय का खर्च और उसकी सुरक्षा तक पर जनता का पैसा लगता है। बदले में जनता उससे क्या चाहती है? बस इतना कि वह कानून के मुताबिक काम करे, अपनी कुर्सी का इस्तेमाल निजी कारोबार की तरह न करे और उस भरोसे को न बेचे, जिसके दम पर उसे अधिकार दिए गए हैं।
मुश्किल यह है कि हमारे यहां ईमानदार अधिकारी को उसकी सादगी से पहचाना जाता है और बेईमान अधिकारी को उसके रुतबे से। जिसके पास बड़ा बंगला है, लंबी गाड़ी है, आगे-पीछे लोग चलते हैं, उसे समाज बड़ा आदमी मान लेता है। जिसके पास अपना घर तक नहीं है, वह कई बार अपने ही रिश्तेदारों के सामने छोटा पड़ जाता है।
यही समाज की सबसे बड़ी विडंबना है। जो आदमी नियम से कमाता है, वह हिसाब लगाकर खर्च करता है। जो आदमी नियम तोड़कर कमाता है, वह खर्च करके अपना रुतबा दिखाता है। एक के लिए महीने की आखिरी तारीख बजट का सवाल होती है, दूसरे के लिए महीने की आखिरी तारीख सिर्फ अगली रकम आने का इंतजार।
और फिर हम बच्चों से कहते हैं कि ईमानदार बनो। बच्चे भी बड़े होकर पूछेंगे कि पिताजी, ईमानदार बनकर क्या मिला? एक कमरा भी नहीं बना पाए? और वह दूसरा अधिकारी देखिए, जिसकी सैलरी भी सरकारी थी, कुर्सी भी सरकारी थी, लेकिन उसके नाम पर विला की पूरी कतार है। फिर हमें बच्चों को ईमानदारी का पाठ पढ़ाने से पहले उस व्यवस्था का हिसाब भी देना होगा, जिसने ईमानदार आदमी को अभाव में और बेईमान आदमी को वैभव में खड़ा कर दिया।
जब किसी सरकारी अधिकारी की घोषित आय और संपत्ति के बीच असाधारण अंतर दिखाई दे, तो सवाल पूछना जनता का अधिकार है। जांच करना एजेंसियों का काम है। दोष साबित करना अदालत का काम है। और जवाब देना उस व्यक्ति की जिम्मेदारी है, जिसकी संपत्ति पर सवाल उठा है।
मेरी शिकायत उस सोच से है, जो सरकारी नौकरी को सेवा नहीं, संपत्ति बनाने का लाइसेंस समझती है। जो कुर्सी पर बैठते ही यह हिसाब लगाने लगती है कि किस फाइल से कितना फायदा उठाया जा सकता है, किस ठेके में किसका हिस्सा है और किस फैसले से किसकी तिजोरी भरी जा सकती है।
भ्रष्टाचार का सबसे खतरनाक चेहरा सिर्फ वह नहीं है, जो रिश्वत लेते हुए पकड़ा जाता है। उससे भी खतरनाक वह है, जो अपने वैभव को योग्यता का प्रमाणपत्र बनाकर समाज में घूमता है। जिसके आसपास लोग उसकी संपत्ति देखकर झुकते हैं, उसकी पहुंच देखकर डरते हैं और उसके रुतबे को देखकर उसे ईमानदार मान लेते हैं। जबकि असली सवाल तो यह है कि उस रुतबे की कीमत किसने चुकाई?
देश का गरीब आदमी अपनी कमाई का हिसाब देता है। नौकरीपेशा आदमी टैक्स देता है। छोटा दुकानदार हर बिक्री का हिसाब रखता है। किसान अपनी फसल बेचकर कर्ज चुकाता है। लेकिन जिस अधिकारी को जनता के पैसे की रखवाली करनी है, उसकी संपत्ति का हिसाब पूछना भी अगर किसी को बुरा लगने लगे तो समझिए बीमारी सिर्फ भ्रष्टाचार की नहीं, हमारी सामूहिक मानसिकता की भी है।
मैंने अपने घर में अधिकारियों को महीने के आखिर में बच्चों के गुल्लक खोलते देखा है। मैंने ऐसे अधिकारी भी देखे हैं, जिनकी संपत्ति देखकर आम आदमी की आंखें खुली रह जाती हैं। इसलिए जब मैं चालीस विला की बात करता हूं तो मेरे दिमाग में सिर्फ एक खबर नहीं आती। मेरे सामने दो तस्वीरें खड़ी हो जाती हैं। एक तस्वीर उस पिता की, जो पूरी जिंदगी सरकारी नौकरी करके अपने बेटे के लिए एक कमरा तक नहीं बना पाया। दूसरी तस्वीर उस सरकारी अधिकारी की, जिसके नाम पर चालीस विला होने की चर्चा है।
इन दोनों तस्वीरों के बीच खड़ा होकर संजय सिन्हा सिर्फ एक सवाल पूछते हैं।
क्या सरकारी नौकरी की सैलरी इतनी बड़ी हो गई है कि उससे 40 विला बन सकते हैं, या फिर सरकारी कुर्सी पर बैठकर कमाई करने के कुछ ऐसे रास्ते भी खुल जाते हैं, जिनका जिक्र वेतन की पर्ची पर नहीं होता?
नोट-
- ईमानदार होना कोई एहसान नहीं है, यह उस नौकरी की बुनियादी शर्त है, जिसकी तनख्वाह जनता देती है।
- सरकारी नौकरी में सैलरी मिलती है, सल्तनत बनाने का ठेका नहीं।
और हां आज की मेरी सबसे खतरनाक पंचलाइन सुनिए-
किसी अधिकारी के पास चालीस विला देखकर सिर्फ उसकी हैसियत मत पूछिए, उसकी कमाई का हिसाब भी पूछिए। पूछना ही चाहिए। किसी भी सरकारी अधिकारी के पास जो है वो जनता की ओर से दिया गया टैक्स का हिस्सा है।
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