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सियासत

हिंदू राष्ट्रवाद दस-बारह साल पहले तक तीन बूढ़ों का तमाशा जान पड़ता था!

चंद्रभूषण-

सामाजिक एजेंडे पर काम करे ‘इंडिया’ गठबंधन

आम चुनाव का सेमीफाइनल कहे जाने वाले पांच विधानसभा चुनावों में अपनी पार्टी के बहुत अच्छे प्रदर्शन से उत्साहित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्ष को कमोबेश धमकी के लहजे में यह नेक सलाह दी कि राजनीतिक लाभ के लिए वे ऐसा कुछ भी न करें जिससे देश की जनता का बंटवारा हो और राष्ट्र विरोधी ताकतों को मजबूती मिले। जाहिर है, उनकी बात का संदर्भ जाति जनगणना के आंकड़े जारी करने और सीएए-एनपीआर जैसी अल्पसंख्यकों को डराने वाले कदमों को वापस लेने की मांग से जुड़ा है। नीतीश कुमार ने कुछ समय पहले बिहार में जाति के आंकड़े जारी करके माहौल बनाया लेकिन राहुल गांधी ने विधानसभा चुनावों में यह मुद्दा उठाया और मुंह की खाई।

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सवाल यह है कि इन अहम मसलों पर विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ का रुख आगे कैसा रहेगा? जाति जनगणना से प्रमुदित होकर देश भर का पिछड़ा समुदाय उसके लिए ईवीएम भर डालेगा, ऐसी कोई गुंजाइश इतनी जल्दी बननी होती तो हाल के विधानसभा चुनावों में इसके कुछ लक्षण जरूर दिख जाते। लेकिन जिन समुदायों को जाति के आंकड़े सामने आने से अपना नुकसान दिख रहा है, यानी कथित तौर पर ऊंची जातियां, वे जरूर बीजेपी के पक्ष में जोर-शोर से एकजुट दिखाई देने लगी हैं। मामले का दूसरा पहलू देश के विकास में रोड़े अटकाने, चलती गाड़ी को पटरी से उतारने के आरोप का है, जिसका सामना सामाजिक न्याय के तर्क को हमेशा ही करना पड़ता रहा है।

किसका विकास, कैसा विकास

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विश्वनाथ प्रताप सिंह ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद गुजरे पांच वर्षों में भारत के बौद्धिक मंचों से लेकर हार्वर्ड तक अपनी मंडल पहलकदमी को एक बड़ा संदर्भ देने का प्रयास किया था। लेकिन स्थितियां कुछ ऐसी बनती गईं कि उनकी दलीलों पर बड़े दायरे में कोई बात ही नहीं हो पाई। उनका कहना था कि विकास किसका हो रहा है और किस तरह का हो रहा है, इन सवालों को छोड़कर किसी अमूर्त विकास की माला जपने से बात नहीं बनेगी। हाल में नीतीश कुमार ने जाति जनगणना के आंकड़े जारी करते हुए कुछ ऐसे संकेत भी दिए थे कि वीपी सिंह की बहस को वे नए सिरे से उठाना चाहते हैं। लेकिन फिर पता नहीं क्या हुआ, वे विधानसभा में दिए गए अपने वक्तव्यों में उलझ गए और कांग्रेस ने ‘इंडिया’ पर कुछ देर के लिए ढक्कन ही लगा दिया, तो बात जहां की तहां पड़ी रह गई।

अगले आम चुनाव में छह महीने भी नहीं बचे हैं और विधानसभा नतीजों से लहालोट मोदी सरकार इस काम में जल्दी का रास्ता भी अपना सकती है, लिहाजा बीजेपी के उद्धत हिंदू राष्ट्रवाद के मुकाबले विपक्ष कोई समग्र विचारधारा लेकर अगले आम चुनाव में उतर सकेगा, इसकी उम्मीद कम है। लेकिन विपक्ष शासित राज्यों में गवर्नरों के जरिये विधानसभाओं में पारित विधेयकों पर चलाए जा रहे बुलडोजर से लेकर मणिपुर में चलते ही जा रहे जातीय संघर्ष और दुनिया भर में सरकार प्रायोजित हत्याओं को लेकर हो रही बदनामी से अगर कोई सीधा संकेत निकलता है तो यही कि दिल्ली में मोदी सरकार का तीसरी बार शपथ ग्रहण भारतीय लोकतंत्र के लिए बहुत खतरनाक होगा। भारतीय विपक्षी गुट इतने पर भी अपने दड़बों से बाहर न निकल सके तो अपना मर्सिया उन्हें खुद पढ़ लेना चाहिए।

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रही बात वंचित समुदायों के हक की आवाज उठाने और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को राजनीतिक मुद्दा बनाने की, तो ऐसा कब था, जब हिंदू राष्ट्र के अलमबरदारों ने इसे जनता को बांटने की साजिश और राष्ट्रविरोधी शक्तियों के हाथों में खेलने की कसरत न बताया हो। वीपी सिंह और वामपंथियों की बात ही छोड़ दें, इन आरोपों का सामना गांधी तक को करना पड़ा था। खैर, सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता की राजनीति करने वालों की एक बड़ी समस्या यह है कि अभी उनके पास सिद्धांतकारों का अभाव है, और इससे भी बड़ी यह कि सिद्धांत को ही वे खुद में एक समस्या की तरह देखने लगे हैं। ‘मेरा परिवार’ और ‘मेरे खास लोग’ की सोच में जकड़े नेतृत्व का ‘सिद्धांत’ भला सुनेगा कौन?

ऐसे फिरी नजर

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यहां याद दिलाना जरूरी है कि फिलहाल हर तरफ छाया हिंदू राष्ट्रवाद भी कोई शाश्वत चीज नहीं है। अभी दस-बारह साल पहले तक यह तीन बूढ़ों का तमाशा जान पड़ता था, जिनके पीछे कुछ महत्वाकांक्षी अधेड़ों की सिरफुटौअल ही नजर आती थी। फिर कांग्रेस का अति-आत्मविश्वास रंग लाया। क्षेत्रीय दलों के साथ उसका संतुलन बिगड़ना शुरू हुआ। सरकार के नाम पर एक तरफ एनजीओ और दूसरी तरफ खाते संभाले नौकरशाह नजर आने लगे। उनकी मेहरबानी से भ्रष्टाचार अचानक बड़ा मुद्दा बन गया। बात-बात में ‘पॉलिसी पैरालिसिस’ का मुहावरा चलने लगा। बड़े पूंजी घरानों की नजर बदल गई और वे 2002 के गुजरात दंगों से उभरे नए हिंदू राष्ट्रवाद पर जान छिड़कने लगे।

एक विचारधारा के रूप में हिंदू राष्ट्रवाद की शक्ल 1930 के दशक में उभरनी शुरू हुई थी, लेकिन बीच में धर्म के आधार पर देश का बंटवारा हो जाने के बावजूद अगले पचास वर्षों में, यानी अस्सी के दशक तक इसे कोई ट्रैक्शन नहीं मिल पाया था। 1984 के आम चुनाव में, जब चार साल पहले ‘गांधीवादी समाजवाद’ के नाम पर बनाई गई भारतीय जनता पार्टी को सिर्फ दो सीटें हासिल हुईं और अटल बिहारी वाजपेयी की जगह लाल कृष्ण आडवाणी इसके अध्यक्ष बने, तब जल्द ही बौद्धिकों में चर्चा शुरू हो गई कि वे अपने दल को जर्मनी की क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक पार्टी की तर्ज पर ले जाना चाहते हैं, या इस प्रयास का अंत हिटलर की नेशनल सोशलिस्ट पार्टी जैसा होगा?

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शबरी और निषादराज

ऐसी कोई बहस अभी की बीजेपी को लेकर कहीं भी नहीं है। न तो उसकी शक्ल क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक पार्टी जैसी बन रही है, न ही नेशनल सोशलिस्ट पार्टी की तरह उसकी दिशा उल्कापिंड की तरह चमक कर नष्ट हो जाने की है। काफी हद तक व्यक्ति केंद्रित स्वरूप वाला यह एक ऐसा वैचारिक-सांगठनिक ढांचा है, जो लोकतंत्र के ऊपरी सरंजाम बनाए रखते हुए उसकी अंतर्वस्तु को नष्ट कर देने पर आमादा है। भारत अभी आर्थिक दृष्टि से रूस के बाद दुनिया का सबसे विषमतापूर्ण समाज है, जबकि सामाजिक स्तर पर जन्मजात विषमता को यहां धर्म का वरदान प्राप्त है। ऐसे में शबरी और निषादराज के रूप में हर निर्णायक मौके पर न जाने कितने लोगों को उपकृत करने की क्षमता हमारे ढांचे में है, जिसका अभी से कहीं ज्यादा फायदा मोदीफाइड बीजेपी को आने वाले दिनों में मिल सकता है।

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इतनी विषम परिस्थिति का सामना आप छोटे-मोटे फायदों में मगन रहने और रोज कुआं खोदने, रोज पानी पीने वाले नजरिये से नहीं कर सकते। पांच विधानसभा चुनावों में इंडिया गठबंधन की अनुपस्थिति से जो नुकसान होना था वह हो चुका, अगले एक महीने में कांग्रेस नेतृत्व इतना तो करे कि प्रधानमंत्री की धमकी पर ध्यान दे और उन शक्तियों को खुलकर बोलने का मौका दे जो जीत-हार से परे अगले आम चुनाव का एक सामाजिक एजेंडा बनाना चाहती हैं।

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