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Sanjaya Kumar Singh : सरकार जब कानून का मजाक उड़ाएगी तो यही होगा। अगर हर फैसला सुप्रीम कोर्ट में होना है और तब तक सरकार मनमानी कर सकती है तो यह अधिकार दूसरों को भी है। दूसरे राजनीतिक दलों को भी होगा।

मेरा मानना है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने जिन सीएए विरोधियों पर देनदारी निकाली है वह अदालत से तय नहीं है। बैंक का कर्जदार और किराएदार भी अदालत में जाता है और अदालत के फैसले के बाद ही कोई कार्रवाई होती है। सीएए विरोधियों से वसूली करना सरकार का निर्णय है पर वसूली सही है कि नहीं – यह तो अदालत से ही तय होगा। संभवतः उसका तरीका भी। लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने उससे पहले ही वसूली की प्रक्रिया शुरू कर दी जो निश्चित रूप से गलत है। तभी इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्वतःसंज्ञान लिया और होर्डिंग हटाने के आदेश दिए।

दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश सरकार के अपने तर्क हैं। जनता के खर्च पर वकीलों की फौज है तो सरकार हार भी क्यों मानें और सुप्रीम कोर्ट ऐसे ही चलताऊ काम करने से रहा।

लिहाजा मामला बिना मतलब विवादास्पद हो गया।

इसका लाभ उठाकर या दूसरे लोगों की कानूनी स्थिति समझाने बताने के लिए अगर यह होर्डिंग लगा है तो उसे गलत कैसे कहा जाए?

पर यह तो मानना पड़ेगा कि शिकार किसी और को करना था हो कोई और गया। इनके समर्थन में भी कोई नहीं आएगा।

क्या सरकार को ऐसे काम करना चाहिए कि आम नागरिक तो छोड़िए अपनी ही पार्टी के पूर्व मंत्री और विधायक इस तरह चौराहे पर होर्डिंग और बैनर के जरिए परिचय पाएं? मुझे लगता है कि इसके लिए सिर्फ औऱ सिर्फ उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार जिम्मेदार है।

वरिष्ठ पत्रकार और अनुवादक संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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