इश्क़ जुर्म नही तो इसमें अनुचित हस्तक्षेप क्यों?

90 के दशक में जब इंजिनीयरिंग की पढ़ाई करने गया था तब भारत में इन्टरनेट नया नया आया था, उन दिनों याहू मैसेंजर सबसे हिट सोसियल चैट रूम हुआ करता था. उन दिनों इंदिरा जी के सख्त कंट्रोल से निकले और घनघोर  लाल फीताशाही भरे माहौल में जिस तरह  भारत का उद्यमी उद्यम करने की जगह लाटरी खरीद कर अपनी किस्मत बदलने की सोचता था, ठीक वैसे ही सामान्य रंग रूप के ‘नव चैटिये’ याहू मेसेंजर पर  रोमियो बनकर अपने लिए जूलियट ढूंढने की किस्मत आजमाइश करता था.

होस्टलरों की भाषा में हमारे जैसे इन्टरनेट के कीड़े भी दिलचस्पी चैट की जगह राजनीती, टेक्नोलोजी और राष्ट्रवाद में लगी रहती थी.  इन्फोर्मेशन की इतनी बम्बार्डमेंट की उसके सही गलत का कोई एह्साह नहीं था. पोर्न भी सुलभ था. देसीमामा, देसीपापा और तमिलसेक्स हिट साइटें हुआ करती थी. उन दिनों एक बात  जो मुझे समझ आई की उस वक़्त ज्यादातर पोर्न केरल और तमिलनाडु से आता था. आज तो कहाँ से आता है यहा तो पता नहीं पर उसी दबेछुपे आंदलन की एक कड़ी में अब खुले रुप से केरल के कोच्ची में देश में एक ‘किस ऑफ लव’ आन्दोलन  शुरू किया है. डेमोग्राफीक रूप से देखें को कोच्ची  की 40 फीसदी आबादी मुस्लिम है और वे परम्परागत रुप से हिजाब – बुर्का प्रथा का पालन करतें है, जाहिर हैं, किस आफ लव जैसे कार्यक्रम उनके मजहबी अधिकार पर हमला हैं  सो उनकी सामाजिक और मजहबी स्वीकृति ऐसे किसी आन्दोलन के लिए नहीं थी, सो कोच्ची का यह सारा कार्यक्रम अन्य मजहबों (प्रमुखत: हिन्दू व् ईसाई) के लड़के लड़कियों के लिए था.

कोच्ची में  मुस्लिम और अन्य मजहबों के परम्परावादियों की बड़ी आबादी के विरोध के चलते कोच्ची का किस का कार्यक्रम विफल हो गया पर उन्मुक्त-आधुनिक मुंबई में ऐसा संभव नहीं हो पाया. आन्दोलन की पृष्ठभूमि से पहले इसके कारकों का अध्ययन करें तो पायेंगे  की इसका उद्भव मोरल पुलिसिंग के विरोध में हुआ है. अब मोरल क्या है और कैसे उनकी कथित रूप से कुछ लोग पुलीसिंग करते हैं इसको समझा जाय,  उदाहरण के लिए हाल ही में टीवी पर पारले की किसमी टाफी का विज्ञापन बार बार आ रहा था तब अनुभव हुआ की अब विसुअल में चुम्बन दिखाना कितना सहज हो गया है. बगल में बैठे 10 साल के अपने पुत्र के साथ देखने में अब इस तरह के किस के एड मेरे अंदर कोई असहजता का भाव नहीं जगाते, जबकि दशक से ज्यादा समय से विवाहित होने के बावजूद  अपने पिता के समक्ष ऐसे एड देखते ही मैं असहज हो जाउंगा. यह असहजता दो दशक उर्व के मुयं की वजह से है ज आज नही है अब अगर ऐसे में, मैं अपने पुत्र को ऐड देखने के लिए मना करूँ तो वो मुझ पर मोरल पुलिसिंग का आरोप  लगा सकता है.

दरअसल भारतीय समाज के मूल्य पितृसत्तातमक रहें है जिसमे पुरुष को परिवार के पालन पोषण के लिए आय और स्त्री को परिवार के पालन पोषण के लिए सेवाएं देनी पड़ती हैं. वैचारिक लिबरल लोगों को यही भारतीय मूल्य खटकते रहे हैं, वे भारतीय  मन की भावनाएं आहत करने के लिए कभी ‘बीफ फेस्टिवल’ तो कभी  ‘किस ऑफ लव’ जैसे आंदोलन को आगे करते रहते है. दरअसल  इन आंदोलनों का उद्धेश्य समाजिक से ज्यादा राजनीतिक होता है ,अब जब मोदी के नेतृत्व में भारतीय मूल्यों को पुष्ट करने वाली राष्ट्रवादी सरकार चुन कर आई है तो विपक्ष में बैठे वामपंथ ने इन्ही राष्ट्रवादी मूल्यों पर हमले करने के लिए सोची समझी रणनीति के तहत ऐसे आन्दोलन खड़े करने शुरू कर दिए है. वामपंथ ने बड़ी चालाकी से सॉफ्ट पावर इस्तेमाल करते हुए, कांग्रेस सरकारों द्वारा शैक्षणिक संस्थानों में स्थापित किये गए वामपंथी विद्वानों के जरिये ऐसे मुद्दों को चिन्हित कर मॉस मूवमेंट में तब्दील करने के प्रयास हो रहे हैं . ऐसे आंदोलनों में भावावेश दलित आन्दोलन भी जुड़ जाया करता है. दरअसल दलित आन्दोलन के चरमपंथी किसी भी गैर हिन्दू आन्दोलन की सफलता में लग जाते है जो उनके नेतृत्व की परीक्षा करता है.

राजनीतिक  दखल का सबसे पुख्ता प्रमाण पिंक चड्ढी आन्दोलन के रूप में दिखता है जब  नीता सुसान ने कुछ लड़कों के द्वारा मयखाने में से निकल रही स्त्रियों के साथ हाथापाई को हिन्दू संगठनों के खिलाफ देशव्यापी मुहीम छेड़ दी थी.  पिंक चड्ढी आन्दोलन का सृजन यूँ ही नहीं कर दिया था, वो चुनावों का वक्त था तो कांग्रेस के समर्थन और वामपंथी बौद्धिकों ने  पिंक चड्ढी आन्दोलन को हाथों हाथ ले  लिया.  जिसका नतीजा  पिंक चड्डी आन्दोलन का नेतृत्व करने वाली नीता सुसान ने उस आन्दोलन से क्या प्राप्त  किया यह तो पता नहीं अलबत्ता कांग्रेस की तरफ से उसे हवा देने वाली रेणुका  चौधरी की राष्ट्रीय चर्चांऔ से बने माहौल से भाजपा करीब 25 शहरी युवाओं की बहुलता  वाली सीटें लोकसभा में हार गयी, यानि आन्दोलन समाजिक रूप से विफल रहा और राजनीती सफल हो गयी.

‘किस ऑफ लव’ आन्दोलन अब दिल्ली पहुंचा है,दिल्ली की एकमात्र अल्पसंख्यक (मुस्लिम बहुल ) विश्वविद्यालय जामिया मिलिया इस्लामिया से इस आन्दोलन को कोई समर्थन नहीं मिलने के बावजूद यह आन्दोलन दिल्ली विश्वविद्यालय और जवाहरलाल नेहरु विश्विद्यालय के कुछ लोगो द्वारा दिल्ली में लाया जा रहा है. दिल्ली में भी यह चुम्बन का कार्यक्रम मुस्लिमो द्वारा अस्वीकार कर दिया गया है तो सवाल यह उठता है की यह आन्दोलन है किसके लिए ?
इस सवाल का उत्तर यह है की यह उन्मुक्त चुम्बन का कार्यक्रम मुख्यतः हिन्दू व सिख लड़के लड़कियों के लिए है.कहने को तो ‘किस ऑफ लव’ आंदोलन युवाओं से जुड़ा है, और इसे स्वयम स्फुटित विरोध की तरफ पेश किया जा रहा है जबकि इसको मनाने वाला वर्ग वही गैर मुस्लिम -वामपंथी विचारक है.

 दिल्ली में यह आन्दोलन बहुसंख्यको की राष्ट्रवादी संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यालय के समक्ष करना तय हुआ है. सहूलियत के हिसाब से देखें तो दिल्ली का सेंट्रल प्लेस बहादुरशाह जफ़र मार्ग पर है जिसे प्रेस स्ट्रीट भी कहते है जहाँ देश के सारे बड़े अखबारों का दफ्तर है फिर दिल्ली में मुस्लिम संस्थाएं इस आन्दोलन को समर्थन नहीं दे रही, सो उनकी प्रतिनिधि सभा के रूप में जमाते इस्लामी का कार्यालय भी यहीं है, लगे लगे में सुप्रीम कौर्ट , दिल्ली पुलिस भी है साथ ही कम से कम चार बड़े कालेज/संस्थान भी यही है. किस ऑफ लव’ आंदोलन ऐसी जगह होने से  इस आन्दोलन को ज्यादा बेहतर कवरेज मिलता और जिससे गली, मोहल्ले, नुक्कड़, मेट्रोरेल, बसों में लड़के लड़कियों को खुले आम चुम्बन करने का अधिक से अधिक प्रोत्साहन मिलता पर उसको छोड़ यह आन्दोलन पूरी तरह से राजनीतिक हो गया है. देश की सरकार चला रही भाजपा के गुणसूत्र यानि डीएनए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से आते है ऐसे में यह इस कथित रूप से युवाओं के आन्दोलन को वामपंथ ने  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आर हमले के लिए चुना है . कूटनीति भी बड़ी उच्च कोटि की है युवाओं को भडका कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ  से भिड़ा दिया जाय और खुद यह लोग परदे के पीछे से संचालन करते रहेंगे. 

हमें समझना पडेगा की बदलाव प्रकृति का नियम है हिंदी सिनेमा में दो फूलों के मिलन से चल कर आज सुहागरात के इंटिमेट दृश्यों तक भारतीय समाज काफी खुला है. सुप्रभात की जगह गुडमार्निंग और ग्धुली के वक्त संध्या वन्दन करने की जगह इवनिंग टी इन तक के बदलाव आचार विचार संस्कारों के बदलाव का क्रम निरंतर जारी है पर भूल से भी इसकी प्रक्रिया या गति से छेड़छाड़ यकीनन अनावश्यक प्रतिक्रियाएँ  व् प्रतिकूल परिणाम लायेंगे.

लेखक प्रवीण शुक्ल ‘पृथक’ नया मीडिया मंच के सह संस्थापक और सोसियल मीडिया एक्टिविस्ट है. संपर्क: 8506070898



भड़ास व्हाट्सअप ग्रुप- BWG-10

भड़ास का ऐसे करें भला- Donate






भड़ास वाट्सएप नंबर- 7678515849

Leave a Reply

Your email address will not be published.

*

code