प्रिया का आंख मारना मौलानाओं को नहीं पचा, हैदराबाद में एफआईआर

Dayanand Pandey : मलयाली अभिनेत्री प्रिया प्रकाश वारियर एक आंख मार कर देश भर के लिए क्रश बन कर मौलानाओं को खटक गई है। इसकी वीडियो अलग-अलग तरह से वायरल हो कर पहले वाट्स अप पर मिली थी। अब खबरों में मिल रही है, स्टोरी बन कर। कई हस्तियों के साथ भी इस वीडियो को जोड़ दिया गया है। 18 साल की यह लड़की इसे आई ब्रो डांस बता रही हैं। लेकिन मौलाना लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत हो गई हैं। हैदराबाद में एफआईआर भी दर्ज हो गई है प्रिया के ख़िलाफ़।

मैं तो इस स्वीट प्रिया के साथ हूं। प्रिया का यह आई ब्रो डांस मुझे अच्छा लगा है। नैसर्गिक स्वाभाविकता लिए इस दृश्य में ताज़गी भी लबालब है। आई ब्रो डांस का ऐसा कमाल एक बाइक के विज्ञापन में भी एक माडल ने हलका सा किया है। बाइक के इस विज्ञापन का सारा कमाल ही उस लड़की की आंखें हैं, जिन्हें मटकाते हुए वह अपने साथी की कमीज की कालर उठा कर उसे सुपर बना देती है। लेकिन इस प्रिया की आंखों ने तो कमाल कर दिया है। फैज के लिखे, तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है की याद दिला दी है, प्रिया ने। एक बार इन आंखों की कशिश तो देखिए। खैर, मौलाना लोग चाहे जो ऐतराज और जहर उगलें , लेकिन प्रिया की तो चल पड़ी है।

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार दयानंद पांडेय की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

एक अजनबी बिल्ली से यशवंत यूं लगा बैठे दिल…. देखिए, बिल्ली- एक प्रेम कथा

Yashwant Singh : कल एक अजनबी बिलार आ गई। मच्छी-भात पका रहा था। वो भूखी होने वाली गुहार-आवाज़ लगा रही थी। उसको मच्छी के टुकड़े डालता खिलाता रहा। थोड़ी ही देर में परिचित सी हो गयी। शांत, स्निग्ध और सहज टाइप स्वभाव वाली दिखी। हम दोनों की दोस्ती हो जाने के बाद उसको ससम्मान कटोरी में खिलाया और विदा किया। लगा यूँ ही रास्ता भटक के आ गयी थी और पेट भर खा पीकर चली गयी।

पर महोदया आज दोपहर फिर पधार गईं। वही, भूखी वाली आवाज़ निकालने लगी। फटाफट कटोरी में दूध परोसा। वो खटाखट चट कर गयी। फिर दूध डाला। वो भी पी गयी। दूध पीते हुए शांत रहती। खत्म होते ही म्याऊं…. म्याऊं… शुरू। कल से पूरे हालात पर गहन नज़र रखे बीवी अचानक हड़काने लगीं- ”ये क्या नया रोग पाल लिया। भगाइए इसको। सब दूध यही पी जाएगी तो हम लोग क्या करेंगे।”

बिल्ली और मैं दोनों चुप होकर एक कोना पकड़ लिए।

गृह मंत्रालय का जब सर्कुलर जारी हो रहा हो, उस वक़्त नहीं बोलना चाहिए। बाद में आदेश का पालन करें या न करें, कोई ज्यादा फरक नहीं पड़ता।

बिल्ली को आंखों से शांत यहीं बैठने का इशारा कर मैं मार्केट निकल गया और डॉग शॉप पर जाकर बोला- ए भइया, बिलार खातिर फ़ास्ट फ़ूड बा?

दुकानदार ने 30-30 रुपए के दो पैकेट थमाए।

घर लाकर जब एक पैकेट का थोड़ा सा माल कटोरी में डाल कर बिलार जी को परोसा तो वो कुछ देर सूंघने-सांघने के बाद मेरी तरफ खून भरी आंख से देखने लगीं… जैसे लगा मुझे कह रही हो- ”एकदम्मे लड़बक हो का रे… ई का ले आए ससुर.. अरे मछरी दूध खिलाने के बाद ई टैबलेट टाइप का ज़हर खिलाओगे बे…”.

मैं माफी की मुद्रा में दांत चियारते हुए कहा- ”तुम्हारा टेस्ट डेवलप नहीं है साथी। ये बहुत प्रोटीन वाला माल है। देखो देखो इस बिलार फ़ास्ट फूड के पैकेट पर कितना सुग्घर बिलार का फोटू बना है। सब यम यम करके खाती हैं, पूंछ हिला हिला के।”

मेरी बात सुन के क्रोधित बिलार जी अपनी मूंछ फनफनाते हुए मौके से टसकने लगीं। थोड़ी दूर जाकर गर्दन पीछे मोडीं, फिर डपट पडीं- ”चुप्प बे। वो फोटू वाली बिलार सब गुलाम-रखैल होती हैं, घर में ही जन्मती पनपती हैं। हम उ नहीं हैं, समझे। औकात में रहकर बात करो चिरकुट।”

बिलार जी मुझे धिक्कार के चली गयीं।

मैं एक हाथ से बिलार फ़ास्ट फ़ूड का पैकेट और दूसरे हाथ से कपार पकड़ कर फिलहाल बैठा हूँ।

कल जो बिलार जी का वीडियो बनाया था, उसे नीचे दे रहा हूं… देखिए…

भड़ास के एडिटर यशवंत की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

इन पांच गांवों के लिए ताजमहल अभिशाप, नहीं होती हैं शादियां (देखें वीडियो)

इनके लिए ताजमहल है अभिशाप, कहते हैं इसे कुवारों का गांव… बेपनाह मोहब्बत की निशानी ताज 400 सालों से पर्यटकों को दीवाना बना रहा है। यहां आने वाले पर्यटक इसे प्यार की सबसे बड़ी सौगात मानते हैं। पर यही ताजमहल करीब दो हजार युवक-युवतियों के लिए अकेलेपन का सबब बन गया है। ताजमहल के पूर्वी गेट के पास स्थित गांव अहमद बुखारी, नगला पैमा, गढ़ी बंगस, नगला तल्फी के युवक-युवतियां को कुदरत से शिकायत है कि उन्हें ताजमहल के पास के गांव में क्यों पैदा किया। यहां कुवारों की फौज तैयार हो चुकी है। ताज इस गांव के लिए अभिशाप बन गया है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के कारण ताजमहल की सुरक्षा और प्रदूषण से हो रहे दुष्प्रभाव की वजह से पांच सौ मीटर की दूरी के भीतर बिना अनुमति कोई गाड़ी नहीं आ सकती है। इन गांवों में आने-जाने वालों की कड़ी तलाशी ली जाती है। ऐसे में यहां के ग्रामीणों के घर बाहर से आने वाले रिश्‍तेदारों को डेढ़ से दो किलोमीटर पैदल चलकर जाना पड़ता है। ऐसे में हालत ये है कि कोई भी इन पांच गावों में अपनी बेटी या बेटे की शादी नहीं करना चाहता है। इन पांच गांवों में रास्ते की बंदिशों के चलते दस सालों से शादियां न के बराबर हो रही हैं और जो हुई भी हैं वो गांव से बाहर। लेकिन हर किसी के लिए गांव से बाहर जाकर शादी करना मुमकिन नहीं है। अगर वहां के ग्रामीण तैयार भी होते हैं तो रिश्तेदार इसके लिए तैयार नहीं होता।

ऐसे में इन पांच गांवों में हालात ये है कि हजारों लोग कुंवारे हैं। इसके साथ गांव में करीब दो हजार युवक-युवतियां कुंवारे हैं। ऐसा नहीं है कि इसका हल निकालने के लिए ग्रामीणों ने कोशिश या पहल ना की हो। गांव के लोग स्थानीय प्रशासन से लेकर मुख्यमंत्री तक शिकायत कर चुके हैं, लेकिन समस्या जस की तस बनी हुई है। रास्ते की समस्या की वजह से इन गांवों में न कोई स्कूल है और न ही कोई स्वास्थ्य केंद्र है। कई बार तो सही समय पर इलाज ना मिलने की वजह से कई हादसे भी हो चुके हैं, बावजूद इसके सरकार और प्रशासन की तरफ से कोई कदम नहीं उठाया गया। संबंधित वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

https://youtu.be/YVA9O1Hwl3A

xxx

https://youtu.be/gDUD1HH1L0g

xxx

https://youtu.be/Ued-52UzKbo

xxx

https://youtu.be/of-ysKPewAw

xxx

https://youtu.be/skBypRlycNg

xxx

https://youtu.be/PzKXGUB9ErE

आगरा से farhan khan की रिपोर्ट.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

लड़कियों ने मजनू का यूं भगाया भूत (देखें वीडियो)

ताजनगरी में सरेराह युवतियों ने एक मजनू पर से प्यार का भूत उतार दिया. जमकर की मजनू की पिटाई. लाइव पिटाई कैमरे में हुई कैद. मामला आगरा के थाना एत्मादपुर के बरहन चैराहे के पास का है. एक युवक को चार लड़किया मिल कर मार रही हैं. युवक कई दिनों से एक युवती को परेशान कर रहा था. उससे आये दिन छेड़छाड़ करता था.

जब युवती का धैर्य जवाब दे गया तो युवती ने अपनी सहेलियों के साथ मिल युवक के सिर से आशिकी का भूत उतार दिया. वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

महिला पत्रकार अपने इंजीनियर पति से बोली- बिना इजाजत हाथ लगाया तो जेल में सड़ा दूंगी!

बीवी पत्रकार और पति इंजीनियर। शादी के दो साल बाद इनकी कहानी अब पुलिस थाने तक पहुंच गई है। मुरादाबाद के सिविल लाइन थाना क्षेत्र के रहने वाले एक व्यक्ति ने दो साल पहले अपने इंजीनियर बेटे की शादी हिसार हरियाणा में रहने वाली पत्रकार लड़की से की थी। शादी के बाद से ही लड़की ने उसे पति मानने से इनकार कर दिया। जैसे-तैसे ये रिश्ता दो साल तक खिंचा। इंजीनियर का आरोप है कि जब वह उसे पत्नी की तरह मानकर पास जाता है तो वह कहती है- ”मैं पत्रकार हूं… मुझे बिना इजाजत छुआ तो पूरे खानदान को जेल में सड़ा दूंगी”। दुखी पति कहता है कि शादी को दो साल हो गए लेकिन पत्रकार पत्नी ने कभी उसे पति ही नहीं माना। पत्नी को समझाने की कोशिश करने पर वह भड़क उठती है और जेल भिजवाने की धमकी देती है।

मुरादाबाद की अवंतिका कॉलोनी निवासी व्यक्ति का बेटा निजी कंपनी में गुडगांव में इंजीनियर है। नवम्बर 2014 में उन्होंने बेटे की शादी हरियाणा हिसार में एक परिवार में तय की थी। लड़की पत्रकार थी। परिजनों के मुताबिक लड़की शादी के लिए राजी नहीं थी, लेकिन उस समय परिवार वालों के दबाब में उसने हां कर दी थी। यह शादी इंटरनेट पर एक वैवाहिक पोर्टल के जरिए तय हुई थी। शादी के बाद इंजीनियर पति ने जब पत्नी से संबंध बनाने की कोशिश की तो उसने मना कर दिया और कहा कि अगर जबरदस्ती की तो पूरे परिवार समेत सबको जेल भिजवा दूंगी। वह यह भी कहती कि मुझे हाथ लगाया तो खैर नहीं, आपके लिए दूसरी ला दूंगी।

पहले तो परिवार के भीतर मामला सुलझाने की कोशिशें हुई लेकिन जब सब बेकार रहा तो पीड़ित इंजीनयिर युवक ने पत्रकार बीवी, उसके माता पिता समेत कुल सात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कराया है। पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। इंजीनियर के परिजनों का कहना है कि हमने तो बेटे के बेहतर भविष्य की खातिर शादी की थी लेकिन अब पछतावा हो रहा है। इंजीनियर का कहना है कि जब भी वह पत्नी के पास जाने की कोशिश करता वो वह पत्रकार की हनक दिखा कर भगा देती। इंजीनियर का आरोप है कि कई बार पंचायतें हो चुकी हैं और समझौते भी हुए लेकिन पत्नी ने उसे कभी पति नहीं माना। समझाने की कोशिश की तो पत्नी ने यही कहा कि मुझे भूल जाओ, आपके लिए दूसरी ढूंढकर ला दूंगी। फिलहाल गुड़गांव स्थित मल्टीनेशनल कंपनी में काम कर रहे मुरादाबाद के इंजीनियर की यह कथा पूरे देश में चर्चा का विषय है।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

कूड़े की तरह पड़ी मिली दो दिन की इस बच्ची के लिए है कोई इस धरती पर मददगार?

किस पत्थरदिल मां ने पैदा होते ही इस बच्ची को कूड़े की तरह छोड़ दिया!

देहरादून : लोग अपने बच्चों से इतना प्यार करते हैं कि उनके लिए जान न्योछावर कर लेते हैं. लेकिन कुछ ऐसे लोग भी होते हैं कि जो नवजात के पैदा होने के बाद अगर बच्ची हो जाये तो उसे कूड़े की तरह एक किनारे पर रख लेते हैं.

मंगलवार देर शाम करीब 8.30 बजे खुड़बुडा़ पुलिस को झंडा बाजार में शालू गिफ्ट कार्नर के पास एक बच्ची पड़ी हुई मिली. पुलिस द्वारा कार्रवाई करते हुए बच्ची को महिला दून हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया है. इसके बाद बच्ची को एसपी सिटी अजय सिंह के नेतृत्व में महंत इन्दिरेश हॉस्पिटल लाया गया. डॉक्टर के अनुसार बच्ची को उम्र लगभग 1 से 2 दिन है. इस संदेश को अपनी बच्ची समझ कर आगे जरूर भेजें. एक मदद इस मासूम के लिए… कोई मददगार हों तो देहरादून के एसपी से संपर्क करें.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मुस्लिम लड़के से प्यार में धोखा खाई तो मरने के पहले पूरे कौम को कमीना बता गई (पढ़ें पत्र)

Sanjay Tiwari : वह दलित होकर भी वेमुला नहीं थी। न ही अखलाक हो पायी थी। आनंदी होती तो टीवी रोता। सोशल मीडिया भी निंदा ही करता लेकिन उसका दुर्भाग्य यह था कि वह न रोहित थी, न टीवी की आनंदी, इसलिए बिहार के एक जिले में सिंगल कॉलम की खबर बनकर रह गयी। लेकिन पूनम भारती की मौत का एक संदेश है। उसी तरह का संदेश जैसे रोहित वेमुला की मौत में एक संदेश था। पूनम भारती एक ऐसे झूठे फरेब का शिकार हुई जिससे वह प्यार के आवेग में बच नहीं पायी।

बिहार में जहानाबाद की पूनम भारती जिस कोचिंग इंस्टीट्यूट में पढ़ने जाती थी वहां जाल बिछाये एक बहेलिये ने उसे फंसा लिया। “प्यार” के इस फंदे में फंसकर पूनम वहां तक चली गयी जहां कोई लड़की शादी से पहले जाने से बचती है। लेकिन जहांगीर ने तो उसे अपनी पत्नी बता ही दिया था लिहाजा जहांगीर ने उसे बिना शादी के “पेट” से कर दिया। यहां से आगे का रास्ता पूनम के लिए या तो जहांगीर के साथ जाता था, नहीं तो फिर कहीं नहीं जाता था। पूनम ने घर में कुछ भी नहीं बताया था कि वह एक ऐसे लड़के के प्यार में पड़ चुकी है जो उसकी जाति और धर्म का नहीं था। पेट का बच्चा गिराकर जहांगीर उसका साथ पहले ही छोड़ चुका था। इसके बाद वह कहां जाती? उसने एक छोटी सी चिट्ठी लिखी और पटना गया रेलवे लाइन को अपनी जिन्दगी का आखिरी मुकाम बना लिया।

उसने जो चिट्ठी लिखी है उसमें एक पूरी कौम को कसूरवार ठहराया है। “मियां जात कमीना होता है। इसकी जुबान पर कभी भरोसा नहीं करना चाहिए।” रोहित वेमूला की तरह पूनम दलित होकर भी किसी ब्राह्मणवाद का शिकार नहीं हुई है। वह एक और वाद का शिकार हुई है जिसकी बुनियाद में ऐसे मौलवी और उनकी मानसिक संतान बैठे हुए हैं जो एक खास किस्म के “जिहाद” पर है। यह “जिहाद” एक मुशरिक को “पाक” बनाने की प्रक्रिया है। पूनम भारती शायद इसी मानसिकता का शिकार हो गयी। अगर ऐसा न होता तो इतनी बड़ी बात वह कभी न लिखती कि “मियां जात” पर कभी भरोसा मत करना।

लेकिन पूनम भारती की मौत पर सवाल के सारे दरवाजे हमारी बौद्धिक दुनिया ने “लव जिहाद का झूठा प्रलाप” बताकर पहले ही बंद कर दिया है। हमारे समय की त्रासदी यही है कि हमने धोखा, फरेब और मौत का भी मजहबीकरण कर दिया है। ऐसे हालात में पूनमों के हिस्से में भले ही मौत हो लेकिन जहांगीरों के हिस्से में पूरी आजादी है। वे जो चाहें कर सकते हैं उसको बौद्धिक संरक्षण देनेवाले लोग दो मिनट का मौन तो रखेंगे लेकिन श्रद्धांजलि देने के लिए नहीं बल्कि चुप्पी साधने के लिए।

वेब जर्नलिस्ट संजय तिवारी के एफबी वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Shahnawaz Malik : दिल्ली में हर दिन शादी का झांसा देकर रेप और ख़ुदकुशी की कहानी छपती है। आरोपी सारे तिवारी शर्मा होते हैं। ख़ैर नफ़रत कम फैलाएं वरना इतिहास में नफ़रत फ़ैलाने वालों में.

Gaurav Sharma : Shehnawaj ji Delhi main Ek bhi crime ki khabar dikhao Jis main koi musalman na ho.

Shahnawaz Malik : शर्माजी…या तो रिकॉर्ड खंगालिए या फिर योगा करिए

Saurabh Dwivedi : इतिहास में नफरत फ़िलहाल एक ही कौम फैलाती आई और फैलाती रहेगी. रोज़ हज़ारो लाखो मासूमो को अपना निशाना बना कर कभी सुसाइड बॉम्बर बन के तो कभी आतंकवादी हमले करके उससे भी जी नहीं भरा तो लव जिहाद पे उतारू है

Shahnawaz Malik : तिवारीजी की वाल पर ट्रैफिक का स्टैंडर्ड काफी लो है। रेटोरिक कब तक करेंगे।

राकेश कुमार मिश्रा : कोई आवाज़ नहीं उठेगी कहीं से। अगर कोई विरोध करेगा भी तो उसे सेक्यूलर लोग संघी कह कर दो समुदायों में दरार पैदा करने की साज़िश कह कर ख़ारिज कर देंगे। वैसे मुझे इस लड़की के साथ कोई सहानुभूति नहीं है। अवैध सम्बन्ध बनाते समय तो इसने कुछ नहीं सोचा अपने माँ बाप और परिवार की इज़्ज़त के बारे में और लेटर में लेक्चर झाड़ रही है।

Yusuf Ansari : संजय भाई, आपने पूनम की आवाज बुलंद करके अच्छाी काम किया है। मरने वाले का बयान सच्चा माना जाता है। मैं भी चाहता हूं कि पूनम को खुदकुशी के लिए मजबूर करने वाले को सज़ा मिले। मैं भी आपकी पोस्ट शेयर कर रहा हूं।

Shahnawaz Malik : यूसुफ़ साब…दिल्ली समेत पूरे देश में हर दिन इसी तरह के रेप और मर्डर के मामले होते हैं, आप उसे क्यूं नहीं शेयर करते?

Yusuf Ansari : भाई Shahnawaz Malik, मैं न्याय के पक्ष में हूं और अन्याय के ख़िलाफ़। मेरा मानना है कि सबको इंसाफ़ मिलनमा चाहिए। बग़ौर घार्मिक और जातीय भेदभाव के। मैंने पहले भी ऐसी कई पोस्ट शेयर की हैं। आगे भी करूंगा। आपने याद दिलाया है तो और ज़्यादा ध्यान रखूंगा।

Shahnawaz Malik : न्याय के पक्ष में कौन नहीं है। तिवारी की इस पोस्ट में घृणा है और तर्क सारे खोखले। रोहित या अख़लाक़ अपनी पहचान की वजह से मारे गए, जबकि इस मामले में ऐसा नहीं है। रेप और मर्डर के सामान्य केस में जाति और धर्म जोड़ने से न्याय होगा या नहीं लेकिन अन्याय ज़रूर होगा।

Yusuf Ansari : भाई Shahnawaz Malik, आपकी बात सही है। लेकिन क्या सिर्फ़ इसी वजह से हम इंसाफ के लिए आवाज़ छोड़ देें। पूनम को प्यार में धोखा मिला है। ये धोखा उसे जहंगीर की जगह कोई जसबीर भई दे सकता था। उसके साथ नाइंसाफ़ी तो ङुई है।

Shahnawaz Malik : ये एक नॉर्मल क्राइम है जो दिल्ली और देश के हर कोने में हर दिन होता है। आप आवाज़ उठाएंगे तो मैं पूछूँगा कि बाक़ियों के लिए क्यों नहीं उठाया। तिवारी का तो मकसद समझ आता है क्योंकि इसमें आरोपी मुस्लिम है। ये लोग दिनभर यही करते हैं।

Yusuf Ansari : भाई Shahnawaz Malik, सबके लिए इंसा की आवाज उठनी ही चाहिए। हम हिंदू और मुसलमान छोड़कर इंसान की बात करें तो बेहतर है।

Shahnawaz Malik : काश आप जैसा तिवारी महाशय भी सोचते। मैं इस लड़की के लिए आवाज़ फिर भी उठा सकता हूँ लेकिन ये पोस्ट नहीं शेयर करूँगा।

Yusuf Ansari : हमें शुरुआत अपने से करनी चाहिए। हमने शुरुआत कर दी है। इंशाल्लाह नतीजे अच्छे ही होंगे। Shahnawaz Malik भाई, कोई बात नहीं आप आवाज़ उठाइए। पोस्ट शेयर मत कीजिए। आपकी आवाज़ यहीं से दूक तर जाएगी।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

भारतीय मोहतरमा को एक पाकिस्तानी के प्यार में पड़ने की ये सजा मिली, न्यूड तस्वीरें आनलाइन हो गईं

Yashwant Singh : एक भारतीय मोहतरमा ने एक पाकिस्तानी से चैट किया और प्यार में पड़कर अपनी कई न्यूड तस्वीरें भेज डालीं. उन परदेसी भाई साहब ने एक रोज सब कुछ आनलाइन कर दिया. साथ ही मोहतरमा के सारे एफबी मित्रों के पास उस आनलाइन फोटोज के लिंक भेज दिए. मेरे पास भी आई हैं कुछ नंगी तस्वीरें लेकिन मैंने एक आंख से देखा और दूसरी आंख से डिलीट का बटन दबा दिया. सुना है वस्त्र विहीन तस्वीरें देख कुछ करीबियों की जुगलबंदियां टूट गईं और दिल इधर उधर छटपटाते बिखरे पाए गए.

पर सवाल वही है कि अगर मर्द की न्यूड फोटो लीक हो तो मर्दों वाली बात, लेकिन औरत की हो तो वो क्यों हो गई बेसवा? प्यार में सारा खेल शरीर का ही क्यों रखते हो, कुछ दिमाग का भी रखा करो. शरीर दागी हो गया (चलो मान लेते हैं) तो दिमाग तो क्रिएटिव है, सेंसेटिव है, कुछ नया रचेगा, फिर से वो छपेगा और फिर चल निकल सकती हैं जुगलबंदियां.

ये पूरा खारिज और पूरा कुबूल वाला खेल मुझे समझ नहीं आता. जितना अच्छा है, उसे प्यार करो. जो खराब लगे, उसे इगनोर करो. और वैसे भी, पत्थर वो मारे जिसने पाप न किया हो. देह के दायरे में उम्र के आखिरी पड़ाव तक डूबे रहना कहां की होशियारी है. पाप करिए, लेकिन उससे सबक लेकर आगे बढ़िए, रिपीट मत करिए, अटकिए मत.

का कहूं, कछु कहा नहीं जाए. बिन कहे भी रहा नहीं जाए.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

सरहद पार फेसबुक का प्यार : पाकिस्तानी प्रेमी के लिये हिन्दुस्तानी युवक ने कराया लिंग परिर्वतन

अजय कुमार, लखनऊ

प्यार अंधा होता है। उसे कुछ दिखाई-सुनाई नहीं देता है। न वह मजहब के दायरे में कैद होता है न किसी तरह की सीमाएं उसे बांध सकती हैं। न कोई प्यार पर पहरा बैठा सकता है,न ही न इसे जुल्मों-सितम से दबाया जा सकता है।  यह बात सदियों से प्रेम करने वालों के लिये कही जाती रही है। चाहें भगवान कृष्ण की दीवानी राधा हो या फिर मीरा।  लैला हो या मजनू, शीरी-फरहाद,हीर-रांझा,सलीम-अनारकली चंद ऐसे नाम हैं जिनकी बेपनाह मोहब्बत ने प्यार को नई ऊंचाइयां दी।  आजकल भी एक ‘मीरा’ का प्यार चर्चा में हैं। 

यह मीरा लखनऊ की है और उसका ‘कृष्ण’ पाकिस्तान में रहता है। अलग-अलग मुल्कांे में रहने वाले इस आशिक जोड़े का प्यार उस समय परवान चढ़ रहा था जब दोनों मुल्कों के बीच तलवारें खिंची हुई थीं। बात पाकिस्तान के एक युवक की हिन्दुस्तान के दूसरे युवक से प्रेम प्रसंग की हो रही है। दोनों युवक थे और एक-दूसरे को प्यार करते थे, लेकिन यह प्रेम समलैंगिक नहीं था। इस बात से काफी लोग अंजान थे तो जिनको कुछ भनक थी,वह इस लिये परेशान थे क्योकि प्रेम कहानी के दोनों किरदार परस्पर दुश्मन मुल्कों के थे।

भारत और पाकिस्तान के तल्‍ख रिश्तों की कहानी किसी से छुपी नहीं है,लेकिन इसके उलट इन दोनों मुल्कों में रहने वालों लोगों की सोच और एक-दूसरे के प्रति प्यार का नजरिया हमेशा से ही सियासी सरहदों से ऊपर रहा है।  ऐसे ही प्यार की एक बुनियाद पिछले कुछ वर्षो से राजधानी लखनऊ मे अंगड़ाई ले रही थी, जहां कथक डांसर गौरव (जो अपनी डांस कला के चलते ‘मीरा’ के रूप में भी पहचाना जाता था) अपने पाकिस्‍तानी प्रेमी रिजवान के लिए सेक्‍स चेंज ऑपरेशन कर गौरव से खूबसूरत युवती आशना बन गया था।

तकरीबन पांच साल पहले पाकिस्तानी युवक रिजवान से फेसबुक पर हुई फ्रेंडशिप के बाद लखनऊ का कथक डांसर गौरव से आशना बन गया। आशना बनने के लिये उसने मुंबई के डॉक्टरों से अपना लिंग परिवर्तन कराया था। पाकिस्तान के रिजवान से अपनी प्रेम कहानी को सही बताते हुए गौरव इस रिश्ते को रुहानी करार देते हुए कहता है,‘पांच वर्ष पूर्व फेसबुक पर रिजवान की फ्रेंड रिक्वेस्ट आई। रिजवान पाकिस्तान के सिंध के एक सूफी परिवार से ताल्लुक रखता है। मैंने रिक्वेस्ट स्वीकार कर ली।  धीरे-धीरे हमारी बातचीत होने लगी।  अक्सर सूफिज्म पर बात होती।  यह सिलसिला बढ़ा तो पता ही नहीं चला कि कब उसे मुझसे और मुझे उससे मोहब्बत हो गई। दोनों को एक-दूसरे से मोहब्बत हो गई थी,लेकिन हम लोग कभी मिले नहीं थे, स्काइप चैट पर जरूर हम दोनों ने एक-दूसरे को दो बार पहले देखा था।

अतीत के झरोखे में झांकते हुए गौरव ने बताया,‘ 5 मार्च 2012 को उसने फोन किया। कहा- ‘गौरव, मैं तुमसे निकाह करना चाहता हूं। मुझे भी उससे इश्क हो गया था, अंजाम की फिक्र किए मैंने तुंरत बिना बोल दिया- कुबूल है।’

गौरव बताता हैं, ‘मैं हमेशा से ऐसा नहीं था। मेरी परवरिश एक लड़के की तरह हुई थी। यहां तक कि एक लड़के की तरह ही मैं लड़कियों के साथ अफेयर्स भी करता था। मेरी  पीएचडी चल रही थी। पीएचडी के सिलसिले में मैं सोशल नेटवर्किंग साइट के जरिए पाकिस्‍तान के रिजवान से मिला।  उनका भी टॉपिक सूफीजम से संबंधित था।  इस दौरान दोनों एक दूसरे की काफी मदद करने लगे। समय बीतने के साथ ही रिजवान और मेरे बीच वर्चुअल दोस्ती लंबी चैट से बढ़ती गई।  कुछ वीडियो कॉल के साथ हम लोग एक दूसरे के काफी करीब आ गए।  इस दौरान हम दोनों को ऐसा फील होने लगा कि हम लोग दो शरीर एक आत्मा बन चुके थे।

गौरव अपने प्यार को पाकीजा करार देते हुए कहता हैं कि हमारा रिश्ता जिस्मानी नहीं, रुहानी था, जिसे ज्यादातर लोग नहीं समझ पाते।  वे हमें ‘गे’ ‘समलैंगिक कहेंगे।  ‘रिश्ते की शक्ल’ पर हमारी रिजवान से अक्सर बात होती।  इन सब बातों से मेरा परिवार अंजान था। मैं जानता था कि घर में बताने का मतलब अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना।  इस बीच, मां ने मेरी शादी के लिए लड़की तलाशनी शुरू कर दी।  मैं परेशान रहने लगा।  तब मैने रिजवान से ही इसका हल पूछा तो वो बोला , ‘ हममें से किसी एक को अपना वजूद छोड़कर लड़की बनना होगा।  पहले तो अजीब लगा,काफी सोचा-विचारा। बाद में इंटरनेट पर सेक्स चेंज से संबंधित जानकारियां ढूंढने लगा।  शुरुआती जानकारियों से मैं घबराया तो रिजवान ने कहा तुम परेशान न हो मैं अपना सेक्स चेंज करवा लूगा।

तब मैंने सोचा कि रिजवान क्यों, मैं क्यों नहीं ऑपरेशन करवा सकता हॅू ? लिंग परिवर्तन कराने के लिए घरवालों को मनाना जरूरी था।  इसलिए मैने अपनी बहन अदिति शर्मा (बदला हुआ नाम) से बात की। वह भी कथक की बेहतरीन डांसर थी। उसने पहले तो मुझे समझाया, लेकिन मेरी जिद्द के आगे उसकी एक नहीं चली। मेरी दशा देखकर बाद में वह मेरे से सहमत हो गई और मेरा हौसला भी बढ़ाया।  मां को मनाने की जिम्मेदारी भी उसी ने ले ली।  किसी तरह उन्हें मनाया गया।  गौरव कहता है जब एक बार फैसला हो गया तो फिर उसके बाद मैं इंटरनेट पर डॉक्टर की तलाश में जुट गया।  मुंबई के दो डॉक्टरों से सम्पर्क हुआ। डॉ. मिथिलेश मित्रा जो कि सर्जन थे और दूसरे डॉक्टर अम्या जोशी जो कि हार्मोन ट्रीटमेंट के एक्सपर्ट। उनसे मैंने इस बारे में बात की। बाद में डा0 मिथिलेश से मैंने अपना आपरेशन कराया।

गौरव के शब्दों में, ‘पूरे ऑपरेशन के प्रोसेस में तकरीबन डेढ़ साल का वक्त और करीब आठ लाख रुपये का खर्च आया।  सबसे पहले काउंसलिंग सेशन हुआ।  वहां से हरी झंडी मिलने के बाद सर्जन ने अपना काम शुरू किया। पहली ही काउंसलिंग में डॉक्टर ने इजाजत दे दी, तो ट्रीटमेंट शुरू हो गया।  लिंग बदलवाने के लिये नौ महीने में मेरे तीन मेजर ऑपरेशन हुए।  तीसरा और फाइनल ऑपरेशन नवंबर या दिसंबर 2015 में होना था पर मेरे रिजल्ट अच्छे थे, इसलिए 10 अक्तूबर 2015 को ही अंतिम ऑपरेशन हो गया।  गौरव कहता है,‘यह इत्तेफाक है कि उनका जन्मदिन 10 अक्तूबर को पड़ता है। आशना भी उसी दिन बनी।

गौरव को आशना बनाने वाले मुंबई के सर्जन डॉ. मिथिलेश मित्रा ऑपरेशन के बात स्वीकार करते हुए कहते हैं कि लिंग परिवर्तन के प्रोसेस को मेडिकल साइंस में ‘जेंडर रिअसाइनमेंट सर्जरी’ कहा जाता है।  ऐसे ऑपरेशन आसान नहीं होते, क्योंकि इंसान जिस रूप में पैदा होता है, उसमें संतुष्ट होता है।  कुछ ही लोग ऐसे होते हैं जो अपने शरीर से खुश नहीं होते।  मेडिकल साइंस इतनी एडवांस हो चुकी है कि ऐसे लोगों का ऑपरेशन कर सेक्स चेंज किया जा सकता है।  हालांकि ऐसे केस बहुत रेयर हैं।  मैंने भी अपने कॅरिअर में ऐसे चार-पांच ऑपरेशन ही किए हैं।  जहां तक गौरव की बात है, तो जब वह मेरे पास आए तो मानसिक रूप से लड़की बनने के लिए पूरी तरह से तैयार था।  यही वजह है कि उनका रिजल्ट सबसे कम समय में सबसे अच्छा रहा।  वे काफी अवेयर था।  वह डॉक्टरों की हर बात सुनता और उस पर फॉलो भी करता था।

खैर, बात दोनों के बीच समानताओं की कि जाये तो गौरव और रिजवान की सोच और शौक लगभग एक जैसे हैं। सेक्‍स चेंज कराने के बाद गोपाल से आशना बनी अपनी प्रेमिका से मिलने के लिये रिजवान के मार्च के महीने में पाकिस्‍तान से हिन्दुस्तान आने की संभावना है। गौरव और रिजवान ने फैसला ले लिया है लेकिन गौरव से आशना बनने वाले इस कथक डांसर को लेकर हर कोई काफी चिंतित है। उसके साथी परेशान हैं। आखिर रिजवान और उसके बीच ये रिश्‍ता कैसा होगा? रिजवान कब तक आशना का साथ देगा? यह ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर हर कोई तलाश रहा है।

भले ही गौरव के भविष्य को लेकर उसके घर वाले और यार-दोस्त चिंतित नजर आ रहे हों लेकिन गौरव निश्चिंत है। वह कहता है, ‘रूह तो कब की मिल चुकी है, बस अब तो प्यार को जिस्मानी और सामाजिक मान्यता मिलना बाकी रह गया है।” वह साथ ही जोड़ देता है कि ”मियां-बीवी राजी तो क्या करेगा काजी।” 

उम्मीद की जानी चाहिए कि गौरव आशना बनकर भी खुश रहेगा, लेकिन गौरव के आशना बनने से लखनऊ को बड़ा नुकसान हुआ है। गौरव न केवल कथक का बेहतरीन डांसर है, बल्कि वह इस पर कई किताबें भी लिख चुका हैं। प्यार होने से पहले तक गौरव लखनऊ के कथक घराने पर रिसर्च की तैयारी में था। जिंदगी में आए इस नए मोड़ ने उसकी इस योजना को फिलहाल विराम दे दिया है। आशना बने गौरव का प्रेमी रिजवान जो वजीर आबरू कराची सखर सिंध में रहता है, का कहना था, ‘‘इंशा अल्लाह मैं मार्च में हिंदुस्तान आऊंगा, पूरी कोशिश करूंगा लखनऊ की उस पाक जमीन को चूम सकूं जहां मेरा महबूब पैदा और बड़ा हुआ।”

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

प्यार नहीं, आपकी पॉलिटिक्स कुछ और है बॉस… प्यार है तो धर्मांतरण की जरूरत क्यों?

हाल ही में आया इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला न्याय व तर्क के हर पहलू पर फिट बैठता है. कितनी बेहतरीन बात कही न्यायालय ने… अगर धर्म में आस्था ही नहीं, तो धर्म परिवर्तन क्यों? सही बात है, इसे तो धर्मगुरु भी मानेंगे कि धर्म को एक दांव की तरह तो नहीं इस्तमाल किया जा सकता न कि शादी करनी हो या तालाक लेना हो तो धर्म का दांव खेल दिया. इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने जिन मामलों की सुनवाई करते हुए फैसला दिया, आईये उन पर गौर करते हैं. दरअसल एक ही विषय पर पांच अलग-अलग याचिकाएं न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की गईं. इन सभी में हिन्दू लड़कियों ने मुसलमान लड़कों से शादी करने के खातिर इस्लाम कुबूल किया फिर निकाह किया व न्यायालय के समक्ष अपनी शादी को वैधता देने और सुरक्षा की मांग की. सभी याचिकाकर्ताओं ने मजिस्ट्रेट के समक्ष जो बयान दिए थे उनकी विषय वस्तु कमोबेश एक ही थी.

“मेरा नाम XYZ है, मेरे पिता जी का नाम ABC है. मैं जंगलीपुर जिला सिद्धार्थनगर की रहने वाली हूं. मैं इंटरमीडिएट तक पढी हूं. मेरा निकाह अब्दुल रहीम ने बब्लू उर्फ इरफान के साथ करा दिया. यह निकाह अकबरपुर जिला इलाहाबाद में कराया गया था. मेरा धर्म परिवर्तन अब्दुल रहीम ने कराया था. यह धर्म परिवर्तन उन्होंने शादी करने के लिए कराया था. धर्म परिवर्तन बब्लू उर्फ इरफान के कहने पर कराया गया था. मैं इस्लाम के विषय में कुछ नहीं जानती.”

न्यायालय ने इन्हीं शपथ पत्रों के आधार पर कहा कि मात्र शादी के लिए धर्म परिवर्तन कैसे जायज ठहराया जा सकता है. जबकि धर्म परिवर्तन की तो आवश्यक शर्त है आस्था में बदलाव. ऐसा नहीं है कि यह पहली बार है जब न्यायालयों ने किसी खास मकसद के लिए किए गए धर्म परिवर्तन को अवैध ठहराया हो. ऐसे ही एक मामले लिलि थॉमस बनाम यूनियन ऑफ इंडिया में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि अगर कोई गैर मुस्लिम व्यक्ति मात्र दूसरी शादी करने के लिए मुस्लिम धर्म अपना लेता है, जबकि उसके धार्मिक आस्था में वास्तविक तौर पर कोई बदलाव नहीं हुआ है तो ऐसा धर्मांतरण शून्य होगा. ऐसे मामले जब बहुतायत में आने लगते हैं तो न्यायालयों को अपेक्षाकृत अधिक स्पष्ट रुख अपनाना ही पड़ता है.

लव जिहाद की बहस गरम होने के बाद न्यायालय परिसरों में भी इस बहस ने जोर पकड़ा कि क्या वाकई हिन्दू लड़कियों को प्रेम जाल में फंसा कर मुसलमान बनाया जा रहा है. ज्यादातर वकीलों का तो यही मानना है कि जिस मात्रा में मुस्लिम लड़का व हिन्दू लड़की की शादी के मामले आते हैं उसकी आधी मात्रा में भी हिन्दू लड़का व मुस्लिम लड़की के मामले नहीं ही आते हैं. न्यायालयों के रुख से भी लगता है कि इन मामलों पर स्पष्ट व्यवस्था अब वे देना चाहती हैं. अभी पिछले दिनों इलाहाबाद उच्च न्यायालय की ही लखनऊ खंडपीठ ने निकाह के मामलों में काजी को पार्टी बनाए जाने व निकाह की पूरी प्रक्रिया को आगे से स्पष्ट करने को कहा है. हैबियस कार्पस (बंदी प्रत्यक्षीकरण) का एक मामला चावली बनाम राज्य सरकार पर भी लखनऊ खंडपीठ में बहस पूरी हो चुकी है, फैसला सुरक्षित कर लिया गया है, उम्मीद है जल्दी ही एक और बड़ा बड़ा फैसला सुनाया जाएगा. इस मामले के साथ भी दर्जनों प्रेम विवाह के मामले कनेक्ट किए गए हैं. उधर एटा के शहर काजी बदूद अहमद ने न्यायालय के फैसले को मानने से इंकार कर दिया है. उन्होंने कहा कि धर्म परिवर्तन शरीयत का हिस्सा है. तो क्या काजी साहब ये कहना चाहते हैं कि कोई भी व्यक्ति कलमा पढ ले भले वो इस्लाम के नियमों को न माने वह मुसलमान हो सकता है? बल्कि मैं समझता हूं कि न्यायालय ने तो धर्मों का मजाक बनने से ही बचाया है.

बात लम्बी होती जा रही है. दरअसल मेरी समझ में एक महत्वपूर्ण मुद्दा आता है. अगर लड़का-लड़की में प्रेम है तो धर्म कैसे बीच में आ जाता है? नहीं, धर्म को बीच में कोई और नहीं खुद लड़का लेकर आता है. आखिर क्यों लड़की का धर्म परिवर्तन करा के ही विवाह या निकाह कराया जाता है? जबकि कानून ने स्पेशल मैरिज एक्ट की सुविधा दे रखी है. जिसमें दो अलग-अलग मजहब को मानने वाले भी शादी कर सकते हैं. फिर लड़कों के लिए क्यों जरूरी होता है अपने वाले मजहब में ही शादी करना. माफ कीजिएगा, समाज धर्मान्ध है लेकिन ऐसे लड़के क्या कुछ कम धर्मान्ध हैं? आपको पता है लखनऊ में इस साल मात्र 13 जोड़ों की स्पेशल मैरिज एक्ट में शादियां हुईं जिसमें अलग-अलग मजहब को मानने वाले लड़के और लड़्की थे. प्यार करते समय स्थिति चाहे जो होती हो लेकिन शादी के वक्त तो आपके प्यार पर आपका मजहब भारी ही पड़ जाता है, मिस्टर. इन तथ्यों से तो यही लगता है कि प्यार नहीं आपकी पॉलिटिक्स कुछ और ही है बॉस.

लेखक चन्दन श्रीवास्तव लखनऊ से प्रकाशित हिंदी दैनिक कैनविज टाइम्स में बतौर वरिष्ठ संवाददाता कार्यरत हैं और लीगल बीट कवर करते हैं. चंदन से संपर्क chandan2k527@yahoo.co.in के जरिए किया जा सकता है.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

हिंदी अखबार के उप संपादक छोकरे और अंग्रेजी अखबार की कन्या का लव जिहाद!

साल 1988 की बात है। मैं तब जनसत्ता में मुख्य उप संपादक था और उसी साल संपादक प्रभाष जोशी ने जनसत्ता के राज्यों में प्रसार को देखते हुए एक अलग डेस्क बनाई। इस डेस्क में यूपी, एमपी, बिहार और राजस्थान की खबरों का चयन और वहां जनसत्ता के मानकों के अनुरूप जिला संवाददाता रखे जाने का प्रभार मुझे सौंपा। तब तक चूंकि बिहार से झारखंड और यूपी से उत्तराखंड अलग नहीं हुआ था इसलिए यह डेस्क अपने आप में सबसे बड़ी और सबसे ज्यादा जिम्मेदारी को स्वीकार करने वाली डेस्क बनी। अब इसके साथियों का चयन बड़ा मुश्किल काम था। प्रभाष जी ने कहा कि साथियों का चयन तुम्हें ही करना है और उनकी संख्या का भी।

मैंने आठ लोग रखे- Sunil Shah (संप्रति अमर उजाला हल्द्वानी के स्थानीय संपादक) Sanjaya Kumar Singh, Arihan Jain (इस समय वे बिजनेस स्टैंडर्ड में संपादकीय प्रभारी हैं), अजय शर्मा (संप्रति एनडीटीवी में संपादक हैं) Sanjay Sinha (आजतक समूह के में संपादक हैं) अमरेंद्र राय बहुत दिनों से मिले नहीं पर वे विजुअल मीडिया के बिग गन हैं। सातवां साथी प्रभाष जी ने दिया प्रदीप पंडित। वे चंडीगढ़ जनसत्ता से आए थे और पद में तो मुझसे ऊपर थे ही पैसा भी अधिक पाते थे। अब प्रभाष जी की इच्छा। कौन किन्तु-परन्तु करे इसलिए स्वीकार किया। उनसे मुझे भी कुछ कहने में संकोच होता पर वे थे सज्जन आदमी कभी भी कोई भी काम सौंपा ऐतराज नहीं किया बस जिम्मेदारी लेने से कतराते थे इसलिए इस डेस्क पर डिप्टी इंचार्ज मैने बेहद पढ़ाकू और जिम्मेदार तथा जिज्ञासु पत्रकार सुनील शाह को बनाया। अब बाकी का तो ठीक था लेकिन संजय सिन्हा और संजय सिंह से काम कराना बहुत कठिन।

ऐसा नहीं कि वे नाकारा थे अथवा काम नहीं करना चाहते थे बल्कि वे सबसे ज्यादा काम करते लेकिन अपनी मर्जी से। एक घंटे काम किया और दो घंटे एक्स्प्रेस बिल्डिंग के पीछे टीटू की दूकान में जाकर अड्डेबाजी करने लगे। अथवा शाम आठ बजे पीक आवर्स में जामा मस्जिद के पास वाले करीम होटल में चले गए। कभी-कभी वे अपने साथ सुनील शाह को भी ले जाते। डांट-डपट से उन्हें भय नहीं था और उन दोनों के बीच कोई भेद उत्पन्न करना भी संभव नहीं था। मेरा सारा कौशल और श्रम उनकी मान-मनौवल में चला जाता। यह देखकर मेरे समकक्ष साथी मजे लेते क्योंकि इस डेस्क का भौकाल देखकर सभी उसमें आना चाहते थे। यह एक ऐसी डेस्क थी जिसमें किसी की कुछ न चलती सिवाय मेरे व संपादक श्री प्रभाष जोशी जी के। बड़े-बड़े जनसत्ताई तीसमार खाँ इस डेस्क से बेजार थे। इसलिए ऐसे में उनके पास एक उपाय था डेस्क के साथियों को फोड़ लेना। तब मैने एक आखिरी दांव फेंका संजय सिंह और संजय सिन्हा के पास। संजय सिन्हा नरम थे और जल्दी समझाए जा सकते थे। मैने कहा कि संजय देखो मैं भी चला करूंगा तुम लोगों के साथ करीम। अकेले-दुकेले जाते हो कुछ झगड़ा वगड़ा कर बैठे तो मुश्किल होगा। एक गार्जियन नुमा कद-काठी में भारी आदमी रखना जरूरी है। संजय सिन्हा ने यह बात संजय सिंह को बताई और दोनों राजी हो गए। अब दस साढ़े दस बजे जब मैं फारिग होता तो कहता चलो। तब तक वे भी थक जाते और टाल जाते तथा कहते कि शंभू जी अब सारा काम निपटा ही लेते हैं। इस तरह मैं उनको काम पर वापस लाया।

इसी बीच बेहद दर्शनीय, मनोहारी और लड़कियों के बीच बहुत लोकप्रिय संजय सिन्हा ने शादी करने की ठानी इंडियन एक्सप्रेस की उप संपादक दीपशिखा सेठ से। अब दोहरी मुसीबत लड़का खाँटी बिहारी और कन्या ठेठ पंजाबी। ऊपर से तुर्रा यह कि लड़का हिंदी अखबार में उप संपादक और कन्या अंग्रेजी अखबार में। यह अलग बात है कि बिहार के एक अभिजात्य कायस्थ परिवार में जन्में संजय सिन्हा का पारिवारिक माहौल अंग्रेजी दां था। उनके दादा ब्रिटिश काल में कानपुर के एडीएम थे और पिता बिहार बिजली बोर्ड के निदेशक, मामा मध्यप्रदेश के पुलिस महानिदेशक। संजय की पढ़ाई विदेश में हुई थी। पर अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकारों को लगा कि अंग्रेजी पत्रकार कन्या हिंदी अखबार के पत्रकार से ब्याही जाए यह तो उनके लिए लव जिहाद टाइप का मामला हो गया। तत्काल इंडियन एक्स्प्रेस और जनसत्ता की डेस्क के बीच दीवाल चिनवा दी गई। लेकिन “जब मियाँ-बीवी राजी तो क्या करेगा काजी” सो शादी तो होकर रही। चोरी-चोरी घर से छिपाकर भी और दफ्तरी लोगों से भी। फिर भी वह शादी ऐतिहासिक थी। शादी तो हुई आर्य समाज मंदिर में और भात हुआ नेशनल स्पोट्स क्लब आफ इंडिया (एनएससीआई) के लान में। खूब खाया भी गया और पीया भी। बाद में इंडियन एक्सप्रेस वालों ने वह दीवाल खुद ही तुड़वा दी।

कल दिल्ली के छतरपुर स्थित जी समूह के मालिक श्री जवाहर गोयल के फार्म हाउस में संजय सिन्हा का पुनर्विवाह हुआ। मैं तब भी मौजूद था और कल भी। चौंकिए नहीं दरअसल मौका था उन्हीं संजय सिन्हा की फेसबुक पुस्तक रिश्ते का जब विमोचन हुआ तो वहां एकत्र करीब हजार के आसपास फेसबुक मित्रों और उनके मित्रों को बताया गया कि यह साल संजय व दीपशिखा सेठ की शादी के 25 साल पूरा होने का है तो सब ने कहा कि तिथि की कौन जाने आज ही संजय सिन्हा और दीपशिखा सेठ का फिर से जयमाल कार्यक्रम हो। और हुआ। मैं ये दोनों फोटो अपनी पुरानी यादों के साथ रख रहा हूं। संजय सिंह और मेरे अलावा वहां वे लोग ही थे जिन्होंने संजय व दीपशिखा का वह जयमाल कार्यक्रम नहीं देखा था जो 24 साल पहले हुआ था पर यकीनन यह आयोजन ज्यादा भव्य और ज्यादा उत्साह के साथ मनाया गया। संजय सिन्हा और दीपशिखा सेठ के नवजीवन की बधाई और शुभकामनाएं कि अचल रहे अहिवात तुम्हारा जब लौं गंग-जमन की धारा।

मित्रों मेरा यहां यह चिठठा लिखने का आशय यह है कि अगर आप चाहते हो कि परस्पर प्रेम के बीच आने वाले अवरोधों और दीवालें तोड़नी हैं तो पहली क्रांति सामाजिक रिश्तों की करो। रिश्ते बनाओ प्रेम से, स्नेह से परस्पर के मेल-मिलाप से। खुदा तो सिर्फ मां-बाप ही देता है और बाकी के रिश्ते तो इंसान खुद तलाशता है। रिश्तों के अवरोधों को ध्वस्त करो।

लेखक शंभूनाथ शुक्ल वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. उनका यह लिखा उनके फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

इश्क़ जुर्म नही तो इसमें अनुचित हस्तक्षेप क्यों?

90 के दशक में जब इंजिनीयरिंग की पढ़ाई करने गया था तब भारत में इन्टरनेट नया नया आया था, उन दिनों याहू मैसेंजर सबसे हिट सोसियल चैट रूम हुआ करता था. उन दिनों इंदिरा जी के सख्त कंट्रोल से निकले और घनघोर  लाल फीताशाही भरे माहौल में जिस तरह  भारत का उद्यमी उद्यम करने की जगह लाटरी खरीद कर अपनी किस्मत बदलने की सोचता था, ठीक वैसे ही सामान्य रंग रूप के ‘नव चैटिये’ याहू मेसेंजर पर  रोमियो बनकर अपने लिए जूलियट ढूंढने की किस्मत आजमाइश करता था.

होस्टलरों की भाषा में हमारे जैसे इन्टरनेट के कीड़े भी दिलचस्पी चैट की जगह राजनीती, टेक्नोलोजी और राष्ट्रवाद में लगी रहती थी.  इन्फोर्मेशन की इतनी बम्बार्डमेंट की उसके सही गलत का कोई एह्साह नहीं था. पोर्न भी सुलभ था. देसीमामा, देसीपापा और तमिलसेक्स हिट साइटें हुआ करती थी. उन दिनों एक बात  जो मुझे समझ आई की उस वक़्त ज्यादातर पोर्न केरल और तमिलनाडु से आता था. आज तो कहाँ से आता है यहा तो पता नहीं पर उसी दबेछुपे आंदलन की एक कड़ी में अब खुले रुप से केरल के कोच्ची में देश में एक ‘किस ऑफ लव’ आन्दोलन  शुरू किया है. डेमोग्राफीक रूप से देखें को कोच्ची  की 40 फीसदी आबादी मुस्लिम है और वे परम्परागत रुप से हिजाब – बुर्का प्रथा का पालन करतें है, जाहिर हैं, किस आफ लव जैसे कार्यक्रम उनके मजहबी अधिकार पर हमला हैं  सो उनकी सामाजिक और मजहबी स्वीकृति ऐसे किसी आन्दोलन के लिए नहीं थी, सो कोच्ची का यह सारा कार्यक्रम अन्य मजहबों (प्रमुखत: हिन्दू व् ईसाई) के लड़के लड़कियों के लिए था.

कोच्ची में  मुस्लिम और अन्य मजहबों के परम्परावादियों की बड़ी आबादी के विरोध के चलते कोच्ची का किस का कार्यक्रम विफल हो गया पर उन्मुक्त-आधुनिक मुंबई में ऐसा संभव नहीं हो पाया. आन्दोलन की पृष्ठभूमि से पहले इसके कारकों का अध्ययन करें तो पायेंगे  की इसका उद्भव मोरल पुलिसिंग के विरोध में हुआ है. अब मोरल क्या है और कैसे उनकी कथित रूप से कुछ लोग पुलीसिंग करते हैं इसको समझा जाय,  उदाहरण के लिए हाल ही में टीवी पर पारले की किसमी टाफी का विज्ञापन बार बार आ रहा था तब अनुभव हुआ की अब विसुअल में चुम्बन दिखाना कितना सहज हो गया है. बगल में बैठे 10 साल के अपने पुत्र के साथ देखने में अब इस तरह के किस के एड मेरे अंदर कोई असहजता का भाव नहीं जगाते, जबकि दशक से ज्यादा समय से विवाहित होने के बावजूद  अपने पिता के समक्ष ऐसे एड देखते ही मैं असहज हो जाउंगा. यह असहजता दो दशक उर्व के मुयं की वजह से है ज आज नही है अब अगर ऐसे में, मैं अपने पुत्र को ऐड देखने के लिए मना करूँ तो वो मुझ पर मोरल पुलिसिंग का आरोप  लगा सकता है.

दरअसल भारतीय समाज के मूल्य पितृसत्तातमक रहें है जिसमे पुरुष को परिवार के पालन पोषण के लिए आय और स्त्री को परिवार के पालन पोषण के लिए सेवाएं देनी पड़ती हैं. वैचारिक लिबरल लोगों को यही भारतीय मूल्य खटकते रहे हैं, वे भारतीय  मन की भावनाएं आहत करने के लिए कभी ‘बीफ फेस्टिवल’ तो कभी  ‘किस ऑफ लव’ जैसे आंदोलन को आगे करते रहते है. दरअसल  इन आंदोलनों का उद्धेश्य समाजिक से ज्यादा राजनीतिक होता है ,अब जब मोदी के नेतृत्व में भारतीय मूल्यों को पुष्ट करने वाली राष्ट्रवादी सरकार चुन कर आई है तो विपक्ष में बैठे वामपंथ ने इन्ही राष्ट्रवादी मूल्यों पर हमले करने के लिए सोची समझी रणनीति के तहत ऐसे आन्दोलन खड़े करने शुरू कर दिए है. वामपंथ ने बड़ी चालाकी से सॉफ्ट पावर इस्तेमाल करते हुए, कांग्रेस सरकारों द्वारा शैक्षणिक संस्थानों में स्थापित किये गए वामपंथी विद्वानों के जरिये ऐसे मुद्दों को चिन्हित कर मॉस मूवमेंट में तब्दील करने के प्रयास हो रहे हैं . ऐसे आंदोलनों में भावावेश दलित आन्दोलन भी जुड़ जाया करता है. दरअसल दलित आन्दोलन के चरमपंथी किसी भी गैर हिन्दू आन्दोलन की सफलता में लग जाते है जो उनके नेतृत्व की परीक्षा करता है.

राजनीतिक  दखल का सबसे पुख्ता प्रमाण पिंक चड्ढी आन्दोलन के रूप में दिखता है जब  नीता सुसान ने कुछ लड़कों के द्वारा मयखाने में से निकल रही स्त्रियों के साथ हाथापाई को हिन्दू संगठनों के खिलाफ देशव्यापी मुहीम छेड़ दी थी.  पिंक चड्ढी आन्दोलन का सृजन यूँ ही नहीं कर दिया था, वो चुनावों का वक्त था तो कांग्रेस के समर्थन और वामपंथी बौद्धिकों ने  पिंक चड्ढी आन्दोलन को हाथों हाथ ले  लिया.  जिसका नतीजा  पिंक चड्डी आन्दोलन का नेतृत्व करने वाली नीता सुसान ने उस आन्दोलन से क्या प्राप्त  किया यह तो पता नहीं अलबत्ता कांग्रेस की तरफ से उसे हवा देने वाली रेणुका  चौधरी की राष्ट्रीय चर्चांऔ से बने माहौल से भाजपा करीब 25 शहरी युवाओं की बहुलता  वाली सीटें लोकसभा में हार गयी, यानि आन्दोलन समाजिक रूप से विफल रहा और राजनीती सफल हो गयी.

‘किस ऑफ लव’ आन्दोलन अब दिल्ली पहुंचा है,दिल्ली की एकमात्र अल्पसंख्यक (मुस्लिम बहुल ) विश्वविद्यालय जामिया मिलिया इस्लामिया से इस आन्दोलन को कोई समर्थन नहीं मिलने के बावजूद यह आन्दोलन दिल्ली विश्वविद्यालय और जवाहरलाल नेहरु विश्विद्यालय के कुछ लोगो द्वारा दिल्ली में लाया जा रहा है. दिल्ली में भी यह चुम्बन का कार्यक्रम मुस्लिमो द्वारा अस्वीकार कर दिया गया है तो सवाल यह उठता है की यह आन्दोलन है किसके लिए ?
इस सवाल का उत्तर यह है की यह उन्मुक्त चुम्बन का कार्यक्रम मुख्यतः हिन्दू व सिख लड़के लड़कियों के लिए है.कहने को तो ‘किस ऑफ लव’ आंदोलन युवाओं से जुड़ा है, और इसे स्वयम स्फुटित विरोध की तरफ पेश किया जा रहा है जबकि इसको मनाने वाला वर्ग वही गैर मुस्लिम -वामपंथी विचारक है.

 दिल्ली में यह आन्दोलन बहुसंख्यको की राष्ट्रवादी संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यालय के समक्ष करना तय हुआ है. सहूलियत के हिसाब से देखें तो दिल्ली का सेंट्रल प्लेस बहादुरशाह जफ़र मार्ग पर है जिसे प्रेस स्ट्रीट भी कहते है जहाँ देश के सारे बड़े अखबारों का दफ्तर है फिर दिल्ली में मुस्लिम संस्थाएं इस आन्दोलन को समर्थन नहीं दे रही, सो उनकी प्रतिनिधि सभा के रूप में जमाते इस्लामी का कार्यालय भी यहीं है, लगे लगे में सुप्रीम कौर्ट , दिल्ली पुलिस भी है साथ ही कम से कम चार बड़े कालेज/संस्थान भी यही है. किस ऑफ लव’ आंदोलन ऐसी जगह होने से  इस आन्दोलन को ज्यादा बेहतर कवरेज मिलता और जिससे गली, मोहल्ले, नुक्कड़, मेट्रोरेल, बसों में लड़के लड़कियों को खुले आम चुम्बन करने का अधिक से अधिक प्रोत्साहन मिलता पर उसको छोड़ यह आन्दोलन पूरी तरह से राजनीतिक हो गया है. देश की सरकार चला रही भाजपा के गुणसूत्र यानि डीएनए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से आते है ऐसे में यह इस कथित रूप से युवाओं के आन्दोलन को वामपंथ ने  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आर हमले के लिए चुना है . कूटनीति भी बड़ी उच्च कोटि की है युवाओं को भडका कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ  से भिड़ा दिया जाय और खुद यह लोग परदे के पीछे से संचालन करते रहेंगे. 

हमें समझना पडेगा की बदलाव प्रकृति का नियम है हिंदी सिनेमा में दो फूलों के मिलन से चल कर आज सुहागरात के इंटिमेट दृश्यों तक भारतीय समाज काफी खुला है. सुप्रभात की जगह गुडमार्निंग और ग्धुली के वक्त संध्या वन्दन करने की जगह इवनिंग टी इन तक के बदलाव आचार विचार संस्कारों के बदलाव का क्रम निरंतर जारी है पर भूल से भी इसकी प्रक्रिया या गति से छेड़छाड़ यकीनन अनावश्यक प्रतिक्रियाएँ  व् प्रतिकूल परिणाम लायेंगे.

लेखक प्रवीण शुक्ल ‘पृथक’ नया मीडिया मंच के सह संस्थापक और सोसियल मीडिया एक्टिविस्ट है. संपर्क: 8506070898

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

साइनाइड ढूंढते ढूंढते उनमें प्यार हो गया और मरने का कार्यक्रम कैंसिल कर आपस में विवाह कर लिया

Sanjay Sinha : मैने ये कहानी कब, कहां और कैसे पढ़ी है मुझे जरा भी याद नही। कहानी भी लगता है कुछ कुछ ही याद है। लेकिन जितनी कहानी याद है उससे मेरी आज की बात पूरी हो जाएगी। कहानी इस तरह है – एक लड़का किसी लड़की के प्रेम में धोखा खाकर ज़िंदगी से निराश हो गया। उसे लगने लगा कि अब ज़िंदगी में कुछ बचा नहीं, और मन ही मन तय कर लिया कि अब मर जाना चाहिए। उसने मरने की सबसे आसान विधा के बारे में पढ़ा और ये समझ पाया कि अगर पोटैशियम साइनाइड जैसा जहर कहीं से मिल जाए तो मौत बेहद आसान हो जाएगी। पोटैशियम साइनाइड मतलब जुबां पर रखो और सबकुछ सदा के शांत।

लड़के ने बहुत जगह ढूंढा लेकिन उसे कहीं पोटैशियम साइनाइड नहीं मिला। उसने बहुत सोचा और एक कॉलेज की केमेस्ट्री लैब में उसने नौकरी करनी शुरू कर दी। उसे पूरी उम्मीद थी कि यहां उसे साइनाइड नामक ज़हर मिल जाएगा।

जब सारे बच्चे और स्टाफ घर चले जाते तो वो अक्सर लैब में साइनाइड ढूंढता। एकदिन उसने देखा कि सबके घर चले जाने के बाद भी एक लड़की उसी लैब में कुछ तलाश रही है। वो लड़की के पास गया और उसने उससे पूछा कि तुम इतनी देर लैब में क्या कर रही हो? पहले तो लड़की घबरा गई, फिर उसने बहुत हिम्मत करके उसे बताया कि वो यहां साइनाइड की तलाश कर रही है।

लड़का बहुत हैरान हुआ। उसने पूछा कि तुम साइनाइड का क्या करोगी?

लड़की ने कहा कि वो किसी के प्रेम में धोखा खा चुकी है, और अब उसे जीने की इच्छा नहीं रही। मरने के लिए सबसे आसान तरीका उसने जो ढूंढा है, वो साइनाइड जहर ही है।

लड़के ने कहा कि ये भी खूब रही। उसने आगे बताया कि वो भी साइनाइड ही ढूंढ रहा है। उसे भी प्रेम में धोखा मिला है, और वो भी जीना नहीं चाहता।

दोनों की कहानी एक जैसी थी। दोनों ने तय कर लिया कि अब दोनों मिल कर मरने के लिए इस ज़हर को ढूंढेंगे। दोनों हर शाम अकेले उस लैब में रुक कर साइनाइड ढूंढते। कई दिन बीत गए। धीरे-धीरे साइनाइड ढूंढते-ढूंढते उनमें आपस में प्यार हो गया। और फिर एक दिन दोनों ने मरने का कार्यक्रम कैंसिल कर आपस में विवाह कर लिया।

इस तरह सूंढ़ और पूंछ का मिलन हुआ और दोनों के मिलन से बना हाथी।

यही है रिश्तों का फलसफा। अगर हर आदमी मिल कर, एक दूसरे का साथ देते हुए किसी काम को अंजाम देता है तो उसकी ताकत से जिसका जन्म होता है वो हाथी होता है। मतलब एकता की थोड़ी सी ताकत भी हाथी जितनी शक्ति को जन्म दे सकती है। मैं चाहता हूं कि 15 अगस्त का मौका देख कर आज इस कहानी को राजनीति के अखाड़े में कूदा दूं, अपने और अपने पड़ोसी देश, दोनों को ये संदेश दे दूं हूं कि तुम भी साइनाइड ही ढूंढ रहे हो, हम भी साइनाइड ही ढूंढ रहे हैं, तुम उस साइनाइड को हमें मिटाने के लिए ढूंढ रहे हो, हम उस साइनाइड तो तुम्हें मिटाने के लिए ढूंढ रहे हैं, तो क्यों नहीं हम आपस में मिल जाएं और नफरत की साइनाइड को रिश्तों के अमृत में बदल दें।

बहुत साल हो गए। करीब 68 साल हो गए हैं। हमें अपनी ताकत दिखाते, तुम्हें अपनी ताकत दिखाते। अब और कितनी ताकत देखेंगे और दिखाएंगे?

68 साल बहुत होते हैं, नफरत की लकीर के मिट जाने के लिए, कई पीढ़ियों के मिट जाने के लिए। आओ हम दोनों मिल कर एक हो जाएं, और पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी की दीवार जैसे तोड़ दी गई, नफरत की साइनाइड जैसे अमृत रस में बदल गया वैसे ही हम भी एक दूसरे को गले लगा लें। हमें तुमसे मिलने के लिए अटारी की सीमा पर सैनिकों के बूट की आवाज़ की जगह तुम्हारी खिलखिलाहट सुनाई पड़नी चाहिए, और तुम्हें हमारी खिलखिलाहट।

मैं संजय सिन्हा, मैंने दिल्ली में चांदनी चौक पर कराची का हलवा खाया है, मैं संजय सिन्हा, अब कराची आकर वहां का हलवा सीधे खाना चाहता हूं। तुम्हें भी चांदनी चौक में पराठे वाली गली के पराठे के स्वाद याद होंगे, तुम भी आओ पराठे के साथ दही खाओ हमारे साथ।

छोड़ो भी अब उस बात को, किसने किसे धोखा दिया। हम प्यार में धोखा खा कर मरने मारने पर उतारू थे, तुम भी प्यार में धोखा खाकर ही मरने मारने पर उतारू थे।

अब भूलो उस बात को। जैसे साइनाइड ढूंढता वो लड़का मरना भूल गया, जैसे साइनाइड ढूंढती वो लड़की भी मरना भूल गई।

आओ मिल कर हम हाथी बनें। दुनिया को दिखा दें कि हमने भी जर्मनी की दीवार की तरह अपनी कंटीली तारों को उखाड़ फेंका है। हम अब बकरी नहीं रहे। हम मिल कर हाथी बन गए हैं। ऐसा मुमकिन हुआ है, सूंढ़ और पूंछ के मिलन से।
आओ, सोचो, करो। क्या पता मेरी ये कल्पना हकीकत में ही तब्दील हो जाए।

क्या पता तुम्हारे घर के आपसी रिश्तों में भी कहीं कड़ावाहट हो तो भी खत्म हो जाए।

सुनो। दुनिया का हर कारोबारी अपने ‘बिल बुक’ पर लिखता है, भूल-चूक लेनी देनी माफ हो।

आज हम सब अपने रिश्तों के ‘दिल बुक’ पर लिख देते हैं, भूल-चूक लेनी देनी माफ हो। और इस माफीनामे को आकार दें रिश्तों की ‘सूंढ़ और पूंछ’ को मिला कर एक ताकतवर ‘हाथी’ की कल्पना को साकार करके।

टीवी टुडे ग्रुप में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार संजय सिन्हा के फेसबुक वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

वो अपनी पत्नी को विधवा होते हुए देखना चाहता है!

संजय सिन्हासंजय सिन्हा

Sanjay Sinha : हमारे फेसबुक परिवार के एक सदस्य ने गज़ब की इच्छा जाहिर की है। उन्होंने मेसेज बॉक्स में आकर मुझे लिखा है कि उनकी दिली तमन्ना है कि वो अपनी पत्नी को विधवा होते हुए देखें। वाह! रिश्ता हो तो ऐसा हो। यही खासियत है रिश्तों की। रिश्ता जो कभी आपको जीने के लिए प्रेरित करता है, तो कभी मर जाने के लिए उकसाता है। लेकिन इन दोनों स्थितियों से परे भी एक स्थिति होती है और उसी स्थिति की कल्पना हमारे फेसबुक परिवार के इस सदस्य ने की है। वो जीना नहीं चाहते, वो शायद मरना भी नहीं चाहते, वो चाहते हैं अपनी पत्नी को विधवा होते हुए देखना।

ये रिश्तों की पराकाष्ठा है। ऐसी चाहत जब आप दूसरों की तबाही देखना चाहें, बेशक उसे देखने के लिए आप स्वयं मौजूद न रहें, रिश्तों की सबसे जटिल चाहत है। जाहिर है ऐसी चाहत बदले की भावना से पैदा होती है। हम में से बहुत से लोगों के मन में कभी न कभी ऐसी चाहत जरूर होती है जब हमें लगता है कि अब ये ज़िदगी न रहे तो अच्छा है। और ऐसी चाहत भी कभी-कभी होती है कि काश ये पल कभी हमारी ज़िंदगी से कभी जुदा ही न होता। मतलब हर आदमी इस गाने को कभी न कभी गुनगुनाता है, “आज फिर जीने की तमन्ना है, आज फिर मरने का इरादा है।”

यही ज़िंदगी कभी पहाड़ लगती है, तो कभी समंदर बन जाती है। आदमी वही होता है पर मन बदल जाता है।

मुझसे निजी चैट बॉक्स में चैट करते हुए तो कई लोग कहते हैं कि उनका मूड बहुत खराब था, पर अब ठीक हो गया है। इसका मतलब हुआ कि बातचीत से, एक दूसरे से अपने मन को साझा करने से मूड बदल जाता है। कई बार उदास और अकेला पड़ा मन जरा सी बातचीत से खिल उठता है। मैं उन सभी महिला परिजनों से माफी मांगते हुए और ये वादा करते हुए आज यहां लिख रहा हूं कि कभी उनकी निजता की हत्या यहां नहीं करूंगा पर, कई महिलाओं ने मुझसे पहली बात में रोते हुए अपने दुखों को बयां किया है। कइयों ने कहा कि सबके रहते हुए भी उनकी ज़िंदगी इतनी अकेली और वीरान है कि उन्हें जीने की कोई चाहत ही नहीं।

ऐसी परिस्थिति में फंसी कई महिलाओं से जब मैंने बात करनी शुरू की तो सबसे पहले उन्हें यही समझाया कि आप दुनिया की परवाह मत कीजिए, खुद की कीजिए। अपनी खुशियों को टटोलिए उसे पुकारिए, उसे सहलाइए। अपनी खुशी के लिए आप किसी और पर निर्भर हैं, इसीलिए खुशी आपसे दूर है। आप सबसे पहले खुद से दोस्ती कीजिए फिर बाहर दोस्त तलाशिए। और मेरा भरोसा कीजिए मर जाने की चाहत वाली तमाम महिलाएँ आज मेरी दोस्त हैं, मुझसे अपनी खुशियंा साझा करती हैं, और अब कभी-कभी मैं उन्हें छेड़ता हूं कि क्या हुआ आपके मर जाने का इरादा, तो इठताली हुई पूछती हैं, अभी उन्होंने देखा ही क्या है अभी तो दो पल जीने का मौका मिला है।

यही है मन की गति। जीवन रूपी गाड़ी को चलाते हुए कई बार हम उसके रिश्ता रूपी मीटर पर से अपनी आंख हटा लेते हैं, और हमें पता ही नहीं चलता कि जीवन की गा़ड़ी दरअसल चल किस रफ्तार से रही है।

पहले लोगों की ज़िदगी ऐसी थी कि उन्हें उसकी गति का अंदाज़ा होता था। दरअसल मन के सफर में कभी ड्राइवर अकेला ही नहीं पड़ता था। जीवन के सफर में हमेशा कोई न कोई सह यात्री होता था। पति काम पर चला गया तो मां, बहन, भाई, सास, देवरानी, जेठानी, पड़ोसी कोई न कोई मन की यात्रा वाली गाड़ी पर सवार हो जाता था। उनमें से कोई एक यात्री मन लायक न हुआ तो भी कोई एक मन लायक मिल ही जाता था। समय की बात है कि आज ज्यादातर आदमी को अपने मन की यात्रा में अकेला या फिर इक्का-दुक्का यात्रियों के साथ यात्रा करनी पड़ती है। शुरू में तो उसे ये सफर अच्छा लगता है लेकिन जैसे-जैसे यात्रा आगे बढ़ती जाती है उन इक्का-दुक्का यात्रियों से नहीं बनी तो यात्रा मुश्किल जान पड़ने लगती है। कहने का मतलब ये कि आदमी का अकेले चलना जितना मुश्किल होता है, उससे ज्यादा मुश्किल हो जाता है उसका उसके साथ चलना, जिसका साथ उसे नापसंद है।

ये जरा गूढ़ मामला है, पर है बहुत खतरनाक। मुझे लगता है कि जैसे ़सरकार ने सिगरेट के डिब्बों पर लिखना अनिवार्य कर दिया है कि सिगरेट पीने से स्वास्थ्य को नुकसान होता है, वैसे ही मन रूपी जीवन के डिब्बे पर लिखवा देना चाहिए कि बुरे रिश्ते जानलेवा होते हैं। जिस तरह सिगरेट छोड़ कर जीवन जीने के लिए प्रेरित किया जाता है, उसी तरह मैं आप सबको प्रेरित कर रहा हूं कि अगर आपकी ज़िदगी में एक भी ऐसा रिश्ता है जो आपको जीने से रोकता है, तो उसे छोड़ कर आगे बढ़ जाएं। ऐसे रिश्ते जिसमें आप खुद को मिटा कर उसकी तबाही देखने का ख्वाब पाले बैठे हैं उसे छोड़ दीजिए।

अपनी पत्नी को विधवा देखने की चाहत कुछ ऐसी ही है जैसे अपने ही सिगरेट पीने वाले लत में आप खुद को कैंसर से मरते हुए देखना चाहते हैं। अपनी पत्नी को सफेद साड़ी में सुबकते हुए देखने की चाहत रखने से अच्छा है उसे न देखने की चाहत।

अगर आपके मन की गति अपने सहयात्री के साथ यात्रा करते हुए इतनी बिगड़ गई है तो उससे खुल कर बात कर लीजिए। उसे बता दीजिए कि इस सफर में उसकी मौजूदगी आपको और अकेला कर रही है, ऐसे में दोनों यात्रियों के लिए जुदा हो जाना बेहतर विकल्प है, बजाए इसके कि अपनी मौत के बाद उसकी बर्बादी के जश्न को जीने की चाहत रखने के। फिर भी अगर ऐसी चाहत हो ही जाए तो बेशक अपना सफर बदल लीजिए, हम सफर बदल लीजिए।

जीवन की यात्रा जितने दिन की भी है मस्ती से काटिए। अगर आपके जीवन रूपी कोच में कोई यात्री इतना बुरा आ ही गया है कि आप उसके साथ आगे की यात्रा नहीं कर सकते तो टीटीई से संपर्क कीजिए। क्या पता टीटीई आपकी सीट बदल दे। आपको कोई ऐसा सहयात्री मिल जाए जिसके संपर्क में आपकी यात्रा अति सुखद हो जाए। उम्मीद मत छोड़िए। किसी ने यूं ही तो नहीं कहा न कि जहां उम्मीद है, वहीं ज़िंदगी है।

चलते-चलते एक डॉयलाग सुना देता हूं, जो आज आपको अच्छा लगेगा और कभी न कभी आपके काम आएगा –

दो लोगों के बीच कोई भी रिश्ता सबसे सुखद तब होता है, जब दोनों को ऐसा महसूस होता है कि उसे जो मिला है वो उसकी उम्मीद और योग्यता से ज्यादा है।

आप भी अपने रिश्तों में एक बार झांक कर देखिए तो सही, क्या पता वो आपकी उम्मीद और योग्यता से ज्यादा ही हो!

आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत संजय सिन्हा के फेसबुक वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें: