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सुख-दुख

जिस दिल में प्यार ना हो उस दिल में क्यों रहूँ…

यशवंत सिंह-

‘जिस दिल में प्यार ना हो उस दिल में क्यों रहूँ, मैं ग़म का आंसू क्यों बनूँ आँखों से बहता क्यूँ रहूँ’…

ये गाना पहली बार सुना आज। अब तक कहाँ छिपा था ये, सोच रहा हूँ और इसे फिर से सुन रहा हूँ।

इसी टाइप का एक गाना है – मोहब्बत अब तिजारत बन गई है… इसे टीन एज में सुना था। ग़ज़बे लगा था और आज भी सुनता हूँ तो आनंद आता है।

ऐसे ही एक गाना है- तुझे अपना साथी बनाने से पहले मेरी जान मुझको बहुत सोचना है… इस गाने को खूब पसंद किया जब ये आया।

अक्सर लगता है कि अपन ऐबी आदमी हैं। टेढ़े मेढ़े दुखी उदास गाने ही क्यों पसंद है… अब जो है सो है.. पचास की उमर में आदतों को बदलने की नहीं बल्कि आदतों से मुक्त होने का प्रयास शुरू कर देना चाहिए… अंत में सब कुछ से मुक्त ही तो होना है… तो उसका अभ्यास जल्दी शुरू कर लेने से जीवन आनन्दमय रहता है..

फ़िलहाल तो नया नया सुना पुराना गाना सुन रहा हूँ… भीतर की ये लाइन देखिए…

… सदियों से ज़िंदगी में कुछ आग ऐसी सुलगी
पीकर ज़हर भी देखा नहीं प्यास बुझी मेरे दिल की
इस प्यास में हमेशा मैं तड़पता क्यों रहूँ
मैं ग़म का आंसू क्यों बनूँ आँखों से बहता क्यूँ रहूँ…

इसके सुर ताल लय किशोर कुमार की गायकी सब कुछ परफ़ेक्ट है… भा गया दिल को… अगली बार माइक गरम इसी गाने के लिए किया जाएगा, दो पेग मार कर!

वैसे गंभीरानों को बता दूं… जीवन में तलछट क़िस्म का जीव रहा हूँ और तलछट चीजों को प्यार करता हूँ.. वो गाना हो या ख़ाना हो या लोग…

गाने का लिंक-

Jis dil mei pyar na ho us dil mei kyu rahu

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