जेएनयू के साथियों को पत्र

प्रिय कामरेड,
लाल सलाम।

सबसे पहले तो मैं यह स्पष्ट कर दूं कि मैं आप लोगों के संघर्ष के साथ हूं। जब आप लोग जेल में थे तो मैं भी उन रैलियों का हिस्सा था जो आप लोगों के साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ दिल्ली में निकाली गईं थी। बैनर और पोस्टर के साथ मैं भी मंडी हाउस और अम्बेडकर भवन से जंतर मंतर गया था। यकीनन आप लोग न्याय के पक्ष में खड़े है और हर संवेदनशील व्यक्ति को ऐसा ही करना चाहिए। आज की जरूरत यही है।

फिर भी कामरेड मैं आप लोगों से कुछ बातों में असहमत हूं। मुझे लगता है कि आप लोग भी उसी डिस्कोर्स में फंस से गए हैं जिसमें भारत और दक्षिण एशिया और अब तो यूरोप और अमेरिका की राजनीति भी फंसी हुई है।

आप की लड़ाई में रोटी, कपडा और मकान; स्वास्थ, शिक्षा और रोजगार का सवाल पीछे छूट गया है और ‘जनवाद’ ‘लोकतंत्र’ और  ‘सहभागिता’ जैसे भ्रामक मुद्दे आगे आ गए हैं। मेरे कहने का मतलब यह नहीं है कि उपरोक्त मुद्दे आवश्यक नहीं हैं। ये हैं। लेकिन जनवाद और सहभागिता का सवाल सत्ता/व्यवस्था से जुड़ा सवाल है। बिना व्यवस्था बदलाव के इन सवालों पर उलझे रहना अंततः सत्ता के यथास्थितिवादी विमर्श को चाहे-अनचाहे स्वाकीर करना है।

आप लोग जेएनयू के छात्र हैं। मुझे आप लोगों पर फक्र है। लेकिन आप लोगों की हालत देख कर दुख भी बहुत होता है।

पिछले कुछ साल (तीन साल) मैंने एनजीओ में नौकरी की। पहले माना जाता था कि एनजीओ की नौकरी मुझ जैसे अर्ध-साक्षर लोगों के लिए होती हैं। जेएनयू और अन्य प्रतिष्ठत संस्थान के लोग यहां नहीं होते थे। लेकिन कुछ सालों में दिल्ली के तमाम एनजीओ में जेएनयू के छात्र दिखाई देने लगे हैं। पहले आप लोग शौक से इस क्षेत्र में आते थे। अच्छा काम करते थे और चले जाते थे। लेकिन अब आप लोग मजबूरी में यहां आते हैं और पूरी ताकत से यहां बने रहना चाहते हैं। कारण- आप लोगों पर भी बेरोजगारी की तलवार लटका दी गई है। देर से ही लेकिन आप भी वहीं आ गए जहां मैं बहुत पहले पहुंचा दिया गया था। अपनी मर्जी के खिलाफ।

इन तीन सालों में मेरे कई मित्र बने जो जेएनयू से पीएचडी करने के बाद इस क्षेत्र में आए। वे आना नहीं चाहते थे। उन्हे आना पड़ा। मेरी बगल की सीट में बैठ कर वे वही काम करते हैं जो मैं या और कोई कर रहा है। वे वैसे ही जलील होते हैं जैसा मैं या और कोई जलील होता है और फिर वे वैसे ही लोगों को बेवकूफ बनाने लगते हैं जैसा मैं और कोई बनाता है।

अब से अधिक नहीं सिर्फ पांच या आठ साल पहले जब मैं यूं ही जेएनयू जाया करता था तो लोग एनजीओ पर हंसते थे। तंज कसते थे। इतना तंज कसते थे कि जब मैंने एनजीओ ज्वाईन किया तो अपने दोस्तो को बता भी नहीं सका। फिर कुछ ही सालों में सब बराबर हो गया। तंज कसने वाले मेरे दोस्त मेरी बगल में आ कर बैठ गए। डेवनेट में बायोडाटा भेजने लगे। प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनाने लगे। फंड लाने लगे।

शेयर बाजार में भी ऐसी तीव्र गिरावट कभी देखने को नहीं मिलती जितना हम और आप को गिरना पड़ रहा है।

ऐसे में मेरी उम्मीद यह थी कि आप लोग कुछ रास्ता सुझाएंगे। रोजगार के सवाल को केन्द्र में लाएंगे। संघवाद से आजादी और ब्राह्मणवाद से आजादी हम सभी को चाहिए लेकिन इन आजादियों के साथ रोटी की व्यवस्था भी हो जाती तो कितना मजा आता। कश्मीर, पूर्वोत्तर का मामला महत्वपूर्ण है। मैं आपके साथ हूं लेकिन रोटी भी कम बढ़ी दलील नहीं है।

मुझे पता है कि आप की लड़ाई में रोटी भी शामिल है। लेकिन मैं बस इतना बताना चाहता हूं कि वह दिख नहीं रही है। उसका दिखना बहुत जरूरी है। उसके न दिखने से बहुसंख्यक छात्र और युवा आप से अलग थलग हो गए हैं। आप जैसे होते हुए भी वे आप के दुश्मन बन गए हैं। क्या ये तकलीफ देने वाली बात नहीं है ? जिस शहर से मैं आता हूं वो युवाओं की आत्महत्या दर में कई सालों से शीर्ष में बना हुआ है। उदारीकरण के जबडे़ ने उसकी धमनियों से खून चूस लिया है और अब वह हड्डियों से सूखा गोश्त भी नोच रहा है। लेकिन वही सूखा शरीर राम जी के झण्डे का डंडा बना हुआ है। वे भी क्या करें ? भूख का एक इलाज अफीफ भी तो है। अफीम लोगों को कंकाल में बदल देती है लेकिन उन्हे भूख महसूस नहीं होने देती। यकीन मानीए भारत में नए अफीम युद्ध की पूरी गुंजाइश है लेकिन उसे लिन चेश्वी नहीं मिल रहा। और यह भी यकीन मानीए कि मैं आप लोगों में कई लिन चेश्वी देख पा रहा हूं।

कामरेड, भारत का भविष्य आप के हाथ में है। और सबसे बड़ी बात कि आपके पास मौका भी है। राष्ट्रवादी होने न होने के विमर्श में न उलझ कर, स्वयं को इस संसदीय विमर्श में न फंसा कर रोटी और भूख की लड़ाई को केन्द्र में ले आईए। अपने भटके भाईयों को अफीम की लत से आजाद कराईए। संसदीय राजनीति धुव्रीकरण का खेल है। इस खेल से आजादी दिलाइए। सवाल भारत के भविष्य का है । मिलकर बनाएंगे तो जल्दी बना लेंगे एक आदर्श भारत।

आपका साथी, आपके साथ।
विष्णु
vishnu sharma
simplyvishnu2004@yahoo.co.in

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