जेएनयू में सत्ता और संघ ने सारा जोर लगा दिया पर जीते लाल झंडे वाले, एबीवीपी का सूपड़ा साफ

Sheetal P Singh : JNU भी अजीब शै है! संघी एक युग से परेशान हैं इससे! कुल जमा दस हज़ार स्टूडेंट्स होंगे जिनके दिल दिमाग़ पर क़ब्ज़ा कर पाने में नागपुर से दिल्ली तक के मठ और सल्तनत अनवरत फेल है! वे दुनिया जीत कर आते हैं पर जेएनयू हार जाते हैं! लाल सलाम वालों का छोटा सा अनूठा द्वीप है jnu जो धर्म धन और संकीर्णता को अपने अंदाज में पराजित कर क्रांति के प्रतीक्षित सपने में डूब जाता है, अगले साल तक के लिए!

Continue reading

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार के समर्थन में पिथौरागढ़ में आंदोलन शुरू

पिथौरागढ़, 06 मई 2016 : जे.एन.यू. के छात्रों पर विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा लगाये गए निष्कासन और आर्थिक दंड के फैसले को वापस लिए जाने की माँग को लेकर आज यहाँ भाकपा (माले) ने जिला अधिकारी के माध्यम से केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री को ज्ञापन दिया। भाकपा माले के जिला सचिव गोविंद सिंह कफलिया ने कहा कि जेएनयू छात्र संघ के नेतृत्व में 19 छात्र जे.एन.यू. के छात्रों पर विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा छात्रों के अन्यायपूर्ण निष्कासन और जुर्माना लगाये जाने के फैसले की वापसी की मांग पर 27 फरवरी से आमरण अनशन पर हैं।

जिस जांच कमेटी द्वारा जेएनयू छात्रों के खिलाफ फैसला दिया गया उसकी निष्पक्षता और जरुरत पर जेएनयू के छात्र पहले ही सवाल उठा चुके थे. वैसे भी 9 फरवरी की घटना के बाद जब मामला माननीय न्यायालय के समक्ष है तब अतिरिक्त सक्रियता दिखाकर छात्रों को दण्डित करने में जल्दबाजी सवाल खड़े करती है. साफ़ है कि विश्वविद्यालय के कुलपति ऊपरी दबाव में छात्रों के खिलाफ फैसले ले रहे हैं.

ज्ञापन में मांग की गयी है कि…

1. जेएनयू विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा जेएनयू छात्रों पर लगे सभी निष्कासन– जिसमें हॉस्टल से निष्कासन, कैंपस से निष्कासन, कोर्स से निष्कासन शामिल हैं— वापस लिया जाय व आर्थिक जुर्माना लगाये जाने का फैसला रद्द किया जाय.

2. विश्वविद्यालयों में सरकारी हस्तक्षेप बंद किया जाय क्योंकि इसी अनावश्यक हस्तक्षेप के चलते हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय के छात्र रोहित वेमुला की जान चली गयी और इसी हस्तक्षेप को जेएनयू में भी साफ़ महसूस किया जा सकता है.

3. विश्वविद्यालयों व उच्च शैक्षणिक संस्थाओं में दलित, आदिवासी, सामाजिक रूप से पिछड़े छात्रों नामांकन काफी कम संख्या में हो पाता है. परन्तु इन संस्थाओं में उनका उत्पीड़न आम बात हो गयी है. इसे रोकने के लिए रोहित वेमुला के नाम पर ‘रोहित एक्ट’ बनाया जाय.

ज्ञापन सौंपने वालों में भाकपा (माले) के विमल दीप फिलिप, हेमंत खाती आदि थे। ज्ञापन की एक प्रति कुलपति, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली को भी भेजी गयी है।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

जेएनयू के साथियों को पत्र

प्रिय कामरेड,
लाल सलाम।

सबसे पहले तो मैं यह स्पष्ट कर दूं कि मैं आप लोगों के संघर्ष के साथ हूं। जब आप लोग जेल में थे तो मैं भी उन रैलियों का हिस्सा था जो आप लोगों के साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ दिल्ली में निकाली गईं थी। बैनर और पोस्टर के साथ मैं भी मंडी हाउस और अम्बेडकर भवन से जंतर मंतर गया था। यकीनन आप लोग न्याय के पक्ष में खड़े है और हर संवेदनशील व्यक्ति को ऐसा ही करना चाहिए। आज की जरूरत यही है।

फिर भी कामरेड मैं आप लोगों से कुछ बातों में असहमत हूं। मुझे लगता है कि आप लोग भी उसी डिस्कोर्स में फंस से गए हैं जिसमें भारत और दक्षिण एशिया और अब तो यूरोप और अमेरिका की राजनीति भी फंसी हुई है।

आप की लड़ाई में रोटी, कपडा और मकान; स्वास्थ, शिक्षा और रोजगार का सवाल पीछे छूट गया है और ‘जनवाद’ ‘लोकतंत्र’ और  ‘सहभागिता’ जैसे भ्रामक मुद्दे आगे आ गए हैं। मेरे कहने का मतलब यह नहीं है कि उपरोक्त मुद्दे आवश्यक नहीं हैं। ये हैं। लेकिन जनवाद और सहभागिता का सवाल सत्ता/व्यवस्था से जुड़ा सवाल है। बिना व्यवस्था बदलाव के इन सवालों पर उलझे रहना अंततः सत्ता के यथास्थितिवादी विमर्श को चाहे-अनचाहे स्वाकीर करना है।

आप लोग जेएनयू के छात्र हैं। मुझे आप लोगों पर फक्र है। लेकिन आप लोगों की हालत देख कर दुख भी बहुत होता है।

पिछले कुछ साल (तीन साल) मैंने एनजीओ में नौकरी की। पहले माना जाता था कि एनजीओ की नौकरी मुझ जैसे अर्ध-साक्षर लोगों के लिए होती हैं। जेएनयू और अन्य प्रतिष्ठत संस्थान के लोग यहां नहीं होते थे। लेकिन कुछ सालों में दिल्ली के तमाम एनजीओ में जेएनयू के छात्र दिखाई देने लगे हैं। पहले आप लोग शौक से इस क्षेत्र में आते थे। अच्छा काम करते थे और चले जाते थे। लेकिन अब आप लोग मजबूरी में यहां आते हैं और पूरी ताकत से यहां बने रहना चाहते हैं। कारण- आप लोगों पर भी बेरोजगारी की तलवार लटका दी गई है। देर से ही लेकिन आप भी वहीं आ गए जहां मैं बहुत पहले पहुंचा दिया गया था। अपनी मर्जी के खिलाफ।

इन तीन सालों में मेरे कई मित्र बने जो जेएनयू से पीएचडी करने के बाद इस क्षेत्र में आए। वे आना नहीं चाहते थे। उन्हे आना पड़ा। मेरी बगल की सीट में बैठ कर वे वही काम करते हैं जो मैं या और कोई कर रहा है। वे वैसे ही जलील होते हैं जैसा मैं या और कोई जलील होता है और फिर वे वैसे ही लोगों को बेवकूफ बनाने लगते हैं जैसा मैं और कोई बनाता है।

अब से अधिक नहीं सिर्फ पांच या आठ साल पहले जब मैं यूं ही जेएनयू जाया करता था तो लोग एनजीओ पर हंसते थे। तंज कसते थे। इतना तंज कसते थे कि जब मैंने एनजीओ ज्वाईन किया तो अपने दोस्तो को बता भी नहीं सका। फिर कुछ ही सालों में सब बराबर हो गया। तंज कसने वाले मेरे दोस्त मेरी बगल में आ कर बैठ गए। डेवनेट में बायोडाटा भेजने लगे। प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनाने लगे। फंड लाने लगे।

शेयर बाजार में भी ऐसी तीव्र गिरावट कभी देखने को नहीं मिलती जितना हम और आप को गिरना पड़ रहा है।

ऐसे में मेरी उम्मीद यह थी कि आप लोग कुछ रास्ता सुझाएंगे। रोजगार के सवाल को केन्द्र में लाएंगे। संघवाद से आजादी और ब्राह्मणवाद से आजादी हम सभी को चाहिए लेकिन इन आजादियों के साथ रोटी की व्यवस्था भी हो जाती तो कितना मजा आता। कश्मीर, पूर्वोत्तर का मामला महत्वपूर्ण है। मैं आपके साथ हूं लेकिन रोटी भी कम बढ़ी दलील नहीं है।

मुझे पता है कि आप की लड़ाई में रोटी भी शामिल है। लेकिन मैं बस इतना बताना चाहता हूं कि वह दिख नहीं रही है। उसका दिखना बहुत जरूरी है। उसके न दिखने से बहुसंख्यक छात्र और युवा आप से अलग थलग हो गए हैं। आप जैसे होते हुए भी वे आप के दुश्मन बन गए हैं। क्या ये तकलीफ देने वाली बात नहीं है ? जिस शहर से मैं आता हूं वो युवाओं की आत्महत्या दर में कई सालों से शीर्ष में बना हुआ है। उदारीकरण के जबडे़ ने उसकी धमनियों से खून चूस लिया है और अब वह हड्डियों से सूखा गोश्त भी नोच रहा है। लेकिन वही सूखा शरीर राम जी के झण्डे का डंडा बना हुआ है। वे भी क्या करें ? भूख का एक इलाज अफीफ भी तो है। अफीम लोगों को कंकाल में बदल देती है लेकिन उन्हे भूख महसूस नहीं होने देती। यकीन मानीए भारत में नए अफीम युद्ध की पूरी गुंजाइश है लेकिन उसे लिन चेश्वी नहीं मिल रहा। और यह भी यकीन मानीए कि मैं आप लोगों में कई लिन चेश्वी देख पा रहा हूं।

कामरेड, भारत का भविष्य आप के हाथ में है। और सबसे बड़ी बात कि आपके पास मौका भी है। राष्ट्रवादी होने न होने के विमर्श में न उलझ कर, स्वयं को इस संसदीय विमर्श में न फंसा कर रोटी और भूख की लड़ाई को केन्द्र में ले आईए। अपने भटके भाईयों को अफीम की लत से आजाद कराईए। संसदीय राजनीति धुव्रीकरण का खेल है। इस खेल से आजादी दिलाइए। सवाल भारत के भविष्य का है । मिलकर बनाएंगे तो जल्दी बना लेंगे एक आदर्श भारत।

आपका साथी, आपके साथ।
विष्णु
vishnu sharma
simplyvishnu2004@yahoo.co.in

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

जेएनयू से निकला एक संत, प्रत्यूष पुष्कर को सलाम करो (देखें वीडियो)

Yashwant Singh : जेएनयू से लोग अफसर बनकर निकलते हैं, नेता बनकर निकलते हैं, इतिहासकार बनकर निकलते हैं, शिक्षक बन जाते हैं, पर बहुत कम लोग संत बनते हैं. प्रत्यूष पुष्कर उनमें से एक हैं. ये शुरुआती दिनों में मीडिया में रहे हैं. आशीष खेतान के साथ काम कर चुके हैं. फ्रीलांस फोटो जर्नलिस्ट के बतौर पूरा देश घूम चुके हैं. इन दिनों वे आर्ट और अध्यात्म पर काम कर रहे हैं. 

प्रत्युष पुष्कर को देखकर आप उनकी उम्र का अंदाजा नहीं लगा सकते. किसी को वह बस बीस साल के दिखते हैं तो कोई पैंतीस चालीस से कम का नहीं बताता. मैंने उनसे पूछा भी, लेकिन उन्होंने जन्म की तारीख बताई और चुप लगा गए. उनकी प्रेयसी विदेशी हैं और डाक्टर हैं. आजकल उनकी प्रेयसी की मित्र लिजा उनके यहां रुकी हुई हैं. दिल्ली के हौज खास गांव में स्थित प्रत्युष पुष्कर के ठिकाने पर उनके छोटे भाई और कुछ अन्य पढ़ने लिखने वाले मित्र भी रहा करते हैं. यहां आकर लगता है जैसे आप अपने घर आ गए हों. बेहद सहज माहौल. कहीं कोई तकल्लुफ नहीं.

प्रत्यूष पुष्कर जेएनयू से निकले हैं. वे एबीवीपी और आइसा, दोनों से दुखी हैं क्योंकि इनने जेएनयू के छात्रों को इस ओर या उस ओर लाकर युद्ध की मुद्रा में खड़ा कर दिया है. प्रत्यूष पुष्कर युवा संत हैं. भारत के हर हिस्से को घूम चुके हैं, जी चुके हैं, अब भी घूमते रहते हैं और इन दिनों गंगोत्री जाने की तैयारी में हैं. अंग्रेजी भाषा पर जबरदस्त पकड़ रखने वाले प्रत्युष पुष्कर को अंतरराष्ट्रीय गीत संगीत से लेकर अध्यात्म और भक्ति के हर ओर-छोर का पता है. ओशो हों या बुद्ध, सब पर बतियाने के लिेए उनके पास बहुत कुछ है. कुछ घंटों की अपनी मीटिंग के दौरान प्रत्यूष पुष्कर को कई रूपों में देखा. एक गीतकार, एक संगीतकार, एक ओजस्वी वक्ता, एक ममतामयी संत, एक बेहद तार्किक व्यक्तित्व.

उनके करीबी लोग कहते हैं कि प्रत्यूष दरअसल ओशो के मिशन को पूरा करने के लिए प्रकटे हैं. सच क्या है, यह नहीं पता लेकिन इतना मालूम है कि प्रत्युष पुष्कर में कुछ तो है जो सबको उनकी तरफ खींचता है. चलते वक्त वे गले मिले और देर तक सीने से चिपकाए रखकर अंदर की उर्जा उष्मा को महसूस करने को प्रेरित किया. मुझे निजी तौर पर प्रत्यूष पुष्कर से मिलकर खुशी हुई क्योंकि आज के दौर में जब हर कोई तुरत फुरत शार्टकट अपनाकर सिर्फ और सिर्फ पैसे कमा बना लेना चाहता है वहां प्रत्यूष पुष्कर जैसा व्यक्तित्व अपनी ही मस्ती, अपनी ही स्टाइल और अपनी ही दुनिया में मस्त है. शायद दुनिया को ऐसे लोगों की ज्यादा जरूरत है.

संबंधित वीडियोज देखने के लिए नीचे क्लिक करते जाएं :

जेएनयू वाला संत : प्रत्यूष पुष्कर और जीवन के रंग
https://www.youtube.com/watch?v=ZZXRj_orsxg

जेएनयू वाला संत : प्रत्यूष पुष्कर और अध्यात्म का हालचाल
https://www.youtube.com/watch?v=21HeF4L8Dqc

जेएनयू वाला संत : प्रत्यूष पुष्कर की संगीत भरी दुनिया
https://www.youtube.com/watch?v=iEqmrY8RXfY

जेएनयू वाला संत : प्रत्यूष पुष्कर एक अनूठा व्यक्तित्व
https://www.youtube.com/watch?v=9Rgy5Ir6uJ8

भड़ास एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मुजफ्फरपुर में ‘JNU Speaks’ कार्यक्रम पर एबीवीपी के कार्यकर्ताओं ने किया हमला, देखें वीडियो

बिहार के मुजफ्फरपुर से खबर है कि ‘जेएनयू स्पीक्स’ नामक कार्यक्रम पर भाजपा के छात्र विंग अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के कार्यकर्ताओं ने हमला कर दिया. इसके कार्यक्रम में शामिल कई लोगों को चोटें आई हैं. जेएनयू से जुड़ी रहीं महिलावादी और भाकपा माले नेता कविता कृष्णन ने इस बारे में जानकारी अपने फेसबुक वॉल पर दी है. उन्होंने बोलने के अधिकार पर लोकतांत्रिक तरीके से किए जा रहे कार्यक्रम पर हमला करने की संघी गुंडों की हरकत को बेहद शर्मनाक करार दिया. 

कविता ने फेसबुक पर लिखा है कि पत्थरबाजी और हमले से कार्यक्रम में शामिल एक बुजुर्ग व्यक्ति के सिर पर चोट आई है और वह घायल हुए हैं. प्रबीर पुरकायस्थ और खुद कविता कृष्णन को भी चोटें आई हैं. इस हमले के बावजूद कार्यक्रम में शामिल लोग डटे रहे और एकजुट होकर मुकाबला किया. बाद में सभी लोगों ने इस हमले के विरोध में जुलूस निकाला और प्रदर्शन किया. कविता कृष्णन ने मौके से कई वीडियो अपने एफबी वॉल पर पोस्ट किए हैं.

एबीवीपी कार्यकर्ताओं द्वारा हमले के वीडियो को देखने के लिए नीचे दिए गए यूट्यूब लिंक पर क्लिक करें :

ABVP throwing stones at JNU Speaks program in Muzaffarpur

https://www.youtube.com/watch?v=Q3SsNwHogqg

हमले के विरोध में किए गए प्रदर्शन के वीडियो देखने के लिए नीचे दिए गए यूट्यूब लिंक्स पर क्लिक करें :

‘JNU will speak’ program : march against Sanghi goons (1)

https://www.youtube.com/watch?v=3JwaEvQTm3g

संबंधित अन्य वीडियोज देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें :

https://www.youtube.com/bhadas4media

इस प्रकरण पर कविता ने अपने वॉल पर जो कुछ लिखा है, वह इस प्रकार है….

Kavita Krishnan : ABVP throwing stones at JNU Speaks program in Muzaffarpur, yet they could not disperse the crowd. JNU will speak! One person using a helmet to avoid the huge stones being flung. Ashutosh could speak and I too spoke when stones, small bombs were being thrown. One old man injured in the head. Several of us, including Prabir Purkayastha and I got stone injuries on our arms, hands. But we haven’t dispersed!

We marched in protest against Sanghi goons, getting support from Muzaffarpur streets.. Videos of the March below. Comrade Ashutosh and the voice of JNU and HCU was heard on the streets of Muzaffarpur, calling to free Umar, Anirban, Geelani, calling for azaadi… The Nitish Laloo Grand Alliance Govt showed less courage in the face of Sanghi goons than the women and men of Muzaffarpur did, as you can see.

Shame on Bihar Govt, permission for JNU Speaks program in Muzaffarpur cancelled in last minute by Admin under VHP pressure. But JNU will speak to the people of Muzaffarpur nevertheless. Several alumni and students and teachers of JNU are here from many generations – including Kanhaiya’s guide SN Malakar, Prabir Purkayastha, who was picked up during Emergency, Ashutosh Kumar the ex JNUSU President and one of the targeted JNU students, Ish Mishra, Qaiser Shamim and several others are here, and I’m glad to be here with them all. I’m so glad that so many people are here in spite of the Admin cowardliness, and saying they will ensure that JNU Speaks.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

हे सड़े हुए दिमाग वाले भक्तों, कन्हैया के साथ तस्वीर में लड़की कोई प्रोफ़ेसर नहीं, एमफिल स्टूडेंट सौम्या हैं

Samar Anarya : कल 15 साल की बच्ची के सहारे कन्हैया को घेरने की कोशिश करने वाले भक्त आज इस तस्वीर के सहारे यह कोशिश कर रहे हैं। बावजूद इसके कि मुझे समझ ही नहीं आया कि इस तस्वीर में भक्तों के दिमाग़ में भरी यौन कुंठा के सिवा आपत्तिजनक क्या है- कुछ झूठ साफ़ करने की ज़रूरत है। पहला यह कि तस्वीर में मौजूद लड़की कोई प्रोफ़ेसर नहीं बल्कि एक छात्रा हैं, कन्हैया की बहुत अच्छी दोस्त होने के साथ साथ मेरे एक बहुत प्यारे छोटे भाई Shishir Kumar Yadav की भी अच्छी दोस्त हैं। दूसरा यह कि अगर प्रोफ़ेसर भी होतीं तो भी क्या बदल जाता, आपत्तिजनक हो जाता?

क्या है भक्तों कि हम दोस्तों से भी गले मिलते हैं, मिलते रहे हैं। तुम बहनों तक से नहीं मिल पाते- क्यों यह तो समझ ही गये होगे। तुम्हारा सिर्फ़ दिमाग़ ही कुंठित नहीं है, तुम्हारी पूरी देह कुंठा का साकार रूप है! बहन तक को सिर्फ़ स्त्री होने के परे नहीं देख पाता तो दोस्तों की बात ही क्या। कन्हैया से बहस चाहे जितनी कर ले, काश वह बच्ची तुम भक्तों के हाथ न पड़ जाय, कभी भी!  यह तस्वीर साझा करते हुए कोई Chandan Pratihast पूछ रहे हैं ”क्या यही फ्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन है”. तस्वीर में क्या दिक्कत है यह पता नहीं, अपना फ्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन इतना जरूर है कि उनके सहित इस तस्वीर को पसंद करने वाले अपने ‘मित्रों’ को मित्रता के भार से मुक्त कर दूं. सो विदा कर दिया कइयों को.

Anjule Elujna : “वात्सल्य”… मुझे अगर इस तस्वीर को देकर कोई टाईटल देने को बोलता तो मेरा पहला जवाब यही होता. ऐसे ही तो हमारी पड़ोस की चाचियाँ, मामियां, दादीयां, बुआ, मोहल्ले की बड़ी दीदी, घर के मेंबर की हैसियत पा गए टीचर लोग प्यार से हमें पुचकारते हैं, और कभी कभी हमारी शैतानी के लिए अपनी हिटलरगिरी दिखाते हुए, पकड़ कर मरम्मत भी कर देती हैं. ये तस्वीर fb पर शेयर करने वाले ‘चंदन’ जी मुझे पता नहीं क्या ढूढ़ रहे हैं इसमें. हालाँकि इस ‘ढूढ़ने के बहाने’ वो क्या कहना चाहते हैं, सबको अंदाज़ा शायद हो ही गया होगा. कंडोम, बीड़ी, सिगरेट, अय्याशी, गांजा सबकी गिनती करने के बाद अब इनके निशाने पर ‘स्टूडेंट्स-प्रोफ़ेसर’ की ‘तस्वीरें’ हैं.

काश इस तस्वीर में मौजूद सहज ‘वात्सल्य और प्यार’ को, चंदन जी अपने नाम की सार्थकता सिद्ध करते हुए सहजता से ग्रहण कर पाये होते. किसी का विरोधी होना, या विचारधारा का ही विरोधी होना कहाँ बुरा है, ये डेमोक्रेसी के लिए तो अच्छा ही है. लेकिन विरोध का लेवल अगर इस लेवल पर गिर जाये की हमें ‘रिश्तों की मर्यादा और एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के मानवीय संबंध’ को कलंकित करने की कोशिश करनी पड़े तो आपका विरोध ‘अपराध’ हो जाता है. समाज को ऐसे अंध विरोध की भी क़ीमत चुकानी पड़ती है. इंटरनेशनल वुमंस डे पर किसी महिला के वात्सल्य पर सवाल करके ‘चंदन’ जी को मिली ‘शीतलता’ से समाज को ‘आज़ादी’ की शख़्त जरुरत है. नोट- जिसे प्रोफ़ेसर की तस्वीर कह कर प्रचारित किया जा रहा है वो भी स्टूडेंट ही हैं. ना कि प्रोफ़ेसर. ये एमफिल की स्टूडेंट हैं, नाम सौम्या है. ‘पंजाब केसरी’ ने जिस तरह से इसे ख़बर के नाम पर सनसनी बना कर परोसा गया है वो बेहद निंदनीय है. (ये इंफॉर्मेशन मुझे अभी मिली है इसलिए इसे अलग से नोट लिखकर लगा रहा हूं)

जेएनयू से जुड़े Samar Anarya और Anjule Elujna के फेसबुक वॉल से.


इसे भी पढ़ें…

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

कन्हैया कुमार की तरह नरेंद्र मोदी पर ऐसा बड़ा हमला अभी तक कोई भी नहीं कर पाया था

कामरेड कन्हैया में लेकिन आग बहुत है। और लासा भी। ललक और लोच भी बहुत है। लेकिन कुतर्क की तलवार भी तेज़ हो गई है। वह जेल से जे एन यू लौट आए हैं। जैसे आग में लोहा तप कर आया हो। जैसे सोना कुंदन बन कर आया हो। जे एन यू में बोल गए हैं धारा प्रवाह। कोई पचास मिनट। आधी रात में। तेवर तल्ख़ हैं। उम्मीद बहुत दिखती है इस कामरेड में। लोकसभा में बस पहुंचना ही चाहता है। वक्ता भी ग़ज़ब का है। बस हार्दिक पटेल याद आता है। उस का हश्र याद आता है। फिसलना मत कामरेड।

डगर कठिन ही नहीं, चिकनी भी बहुत है। नेक्स्ट लालू प्रसाद यादव की भी गंध आती है बोलने के लबो लहजे में। हंसगुल्ले वाली बात भी बहुत है। हरिशंकर परसाई के व्यंग्य की ताप और धार भी। तोड़ने ही होंगे मठ और गढ़ जैसी मुक्तिबोध की कविता की आंच और कालिदास की कविता की करुणा भी। नरेंद्र मोदी की तरह का स्टोरी टेलर भी है कन्हैया के भीतर। अबकी बार हमले में भावनात्मक सादगी भी है। मां की याद है, ममत्व है, मां की बात है। मुक़ाबला तगड़ा ही नहीं, बहुत महीन भी है। सिपाही है, सिपाही की लाचारी है। और सबसे ऊपर जेएनयू का मान और स्वाभिमान है। लहराता तिरंगा है। तिरंगे के नीचे हुंकार भरी ललकार है।

देशद्रोह का कार्ड डिस्कार्ड हो गया है। जे एन यू में भारी भीड़ के बीच आज कन्हैया के भाषण के दौरान तिरंगा हमला लहराया। कामरेड ही नहीं, जेएनयू भी बहुत बदल गया है। लाल सलाम की यह आग नरेंद्र मोदी, भाजपा और संघ के लिए तेजाबी हमला है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर अभी तक का यह सब से बड़ा हमलावर भाषण है कामरेड कन्हैया का। राहुल गांधी तो लतीफ़ा हैं लेकिन अरविंद केजरीवाल, सोनिया गांधी, नीतीश कुमार जैसे लोग भी कन्हैया कुमार के आगे मोदी विरोध और मोदी विरोधी भाषण में बहुत पीछे हो गए हैं। कन्हैया कुमार की तरह नरेंद्र मोदी पर ऐसा बड़ा हमला अभी तक कोई भी नहीं कर पाया था। नरेंद्र मोदी को आज नींद नहीं आएगी, यह पक्का है। कोई ज़मीनी आदमी पहली बार उन पर चढ़ाई कर गया है। अब उनके सामने कोई राहुल गांधी नाम का पप्पू टाईप लतीफ़ा नहीं, कामरेड कन्हैया कुमार जैसा शेर है।

लेखक दयानंद पांडेय लखनऊ के वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

पूरे देश में लाल सलाम गुंजा देने में मदद का शुक्रिया मोदी, ईरानी और बस्सी जी

जी, मैंने झूम के लाल सलाम के नारे लगाए हैं. न न, सिर्फ जेएनयू में नहीं, हम जी उन चंद लोगों में से हैं जो जेएनयू पहुँचने के बहुत पहले कामरेड हो गए थे. उन्होंने जिन्होंने महबूब शहर इलाहाबाद में लाल सलाम का नारा भर आवाज बुलंद किया है. पर जी तब हम बहुत कम लोग होते थे. तमाम तो हमारे सामने ही कामरेडी कह के मजाक उड़ाते थे हमारा. हम भी समझते थे कि बेचारे वो नहीं समझ रहे हैं जो हम समझ पा रहे हैं- रहने दो तब तक जब तक इनके सपनों की राष्ट्रवादी सरकार अडानी का बैंक कर्जा माफ़ करने के लिए इन मध्यवर्गीय भक्तों की भविष्य निधि पर टैक्स नहीं लगा देते.

फिर जी हम जेएनयू आ गए. अब हम ज्यादा हो गए थे- उनसे जिन्हें हमें न पता था कि कुछ सालों में भक्त कहा जाने वाला है. वही वे जिन्हें श्रीलाल शुक्ल राग दरबारी में चुगद कह गए हैं. हमें तो जी चुगद लोगों का भक्त हो जाना भी विकास ही लगता है (हर हर घर घर अरहर- श्रद्धानुसार जोड़ लें). पर फिर- न तो हम जेएनयू वालों के पीछे पैसा लगाने वाला अडानी था न हमारे खून में व्यापार- भारत माता की जय बोल के भारत माता को बेच देने वाला व्यापार. सो हमने एक किला तो गढ़ रखा था जी पर आगे न बढ़ पा रहे थे. उस आगे जहाँ जाति थी, जमात थी, धर्म था, समाज था. क्या है कि हम मुँह से बोलें रोटी तो लाउडस्पीकर पर रामनवमी जोत दें, हम फिर से रोटी बोलें तो उनके हज में बिछड़े भाई रोजे. तो जनाब, हमारी बात अवाम तक पहुँचे कैसे? मीडिया उनका, चैनल उनके. दिहाड़ी उनके, तिहाड़ी उनके.

बाकी जी, हमको जेएनयू से उनकी नफ़रत पता थी. अब न प्रवीण तोगड़िया जैसे हिंसक इसे मदरसा बताकर बंद करने की वकालत आज से कर रहे थे न सुब्रमणियन स्वामी जैसे अपनी बिटिया को ख़ुशी ख़ुशी दूसरे धर्म में ब्याह लव जिहाद के खिलाफ जिहाद करने वाले पाखंडी. पर फिर वही- मीडिया उनका, चैनल उनके. दिहाड़ी उनके, तिहाड़ी उनके, हमारे पास बस अपने सर और अपनी हिम्मत.

पर फिर जी एक गड़बड़ हो गयी. वे 31% को बेवकूफ बना सत्ता में आ गए. अब सत्ता में ताकत होती है, ताकत में नशा, और नशे में भीतर का सच, हिंसक, नफरत भरा सच बाहर ला देने की कैफियत. सो उन्होंने शुरू किया- डाभोलकर से पंसारे तक, दादरी से कलबुर्गी तक. अब आन्दोलन का हिस्सा सही अकेले रहने वालों को मारना आसान होता है, सो मारा भी उन्होंने. नशा और बढ़ा, हिम्मत भी. फिर वे हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी पर चढ़ गए- वहाँ साजिशों से साथी रोहित वेमुला को शहीद कर दिया. उसके बाद वही होना था जो हुआ. हैदराबाद से शुरू कर पूरा देश उठ खड़ा हुआ. अब इनमें हमेशा की तरह जेएनयू पहली कतार में था कहने की जरुरत नहीं.

अबकी इन्होने जेएनयू को निशाना बनाया #ShutDownJNU- बोले तो बंद करो जेएनयू के सपने के साथ. जी न्यूज़ जैसे मुखबिर चैनलों की मदद ली, तिहाड़ियों से फर्जी वीडिओ बनवाए, फर्जी डिग्रियों वाले वकीलों को भाड़े का गुंडा बनाया. फिर जेएनयू पर टूट पड़े, कामरेड कन्हैया को उठा लिया, ऐसे जैसे पुलिस न हो माफिया के अगवा करने वाले गुंडे हों. जी कहर तोड़ा इसमें कोई शक नहीं. कैंपस से कोर्ट तक. पर फिर कहर तो अंग्रेजों ने भी तोड़ा था, भगत सिंह, बिस्मिल अशफाक जैसे दोस्तों को मार दिया.

जेएनयू  झेलता रहा, खड़ा रहा और फिर चीजें साफ़ होने लगीं. तब तक जब तक तिहाड़ी सुधीर चौधरी के फर्जी वीडिओ का, बिकाऊ अर्नब गोस्वामी के झूठ का, दलाल दीपक चौरसिया का सच बेनकाब न हो गया. लोगों को समझ आने लगा कि उद्योगपतियों का लाखों करोड़ का बैंक कर्जा माफ़ करने के लिए मध्यवर्ग की भविष्य निधि पर टैक्स कौन लगाता है. यह भी कि कौन अफज़ल गुरु के नाम पर नारे लगाने के आरोप में जेएनयू पर कहर तोड़ देने के बाद अफज़ल को शहीद बताने वाली पीडीपी के साथ सरकार बनाता है. उसके बाद जो हुआ आपके सामने है.

कामरेड कन्हैया के लौटने के साथ हवा में गूँज उठे लाल सलाम के नारे, आजादी के नारे. जिसे 1200 ने चुना था उसका इंतज़ार करते 8000 लोग. (उस 31% वाले की तुलना अपने नुकसान पर करिएगा- उसके 56 इंच में बचे 56 मिलीमीटर से कम ही बचे होंगे 31 में). और फिर वही नारे जिनपर खाकी वर्दी भीतर खाकी निकर वालों ने साथियों को उठा लिया था.

बाकी अबकी नारे जेएनयू भर में नहीं थे. वह राष्ट्रीय मीडिया पर थे- सजीव बोले तो लाइव. अबकी खिलखिलाता के अपने ऊपर हुए हमले की बात बताता जेएनयू भर में नहीं, देश भर में सुना जा रहा था. जी- बहराइच की एक लड़की उसे, जेएनयू को लाल सलाम भेज रही थी, यह साफ करके कि वह किसी कम्युनिस्ट पार्टी का हिस्सा नहीं है. देवरिया की एक लड़की बनारस ‘हिन्दू’ विश्वविद्यालय से उसके लाल सलाम का जवाब दे रही है. उसे जिसे बाराबंकी की एक लड़ाई लाल सलाम कहते हुए यह भी बता रही थी कि दो चार बार और सुना तो इश्क हो जायेगा. जी जनाब, जवाब तो लड़कों के भी बहुत आये- पर जिक्र सिर्फ लड़कियों का इसलिए क्योंकि हम जानते हैं कि आप इस बात से कितना डरते हैं. यह भी कि आपको जेएनयू से इतनी नफरत होने की एक वजह यह भी है कि गयी रात लौटे कामरेड कन्हैया के साथ खड़े साथियों में लड़कियों की तादाद लड़कों से ज्यादा न हो तो कम तो नहीं ही थी. हमें पता तो हमेशा से था कि एक दिन हमारे लाल सलाम का ऐसा ही जवाब आएगा पर उसकी वजह में आप भी शरीक होंगे इसका जरा भी अंदेशा न था साहिबान.

सो शुक्रिया जनाब मोदी, मोहतरमा ईरानी और जनाब बस्सी जी. आप न होते, आपका कहर न होता तो भले मीडिया को भी हम तक पहुँचने की फुरसत कहाँ मिलती- बाकी तिहाड़ियों को हम तक आना भी कब था.

लेखक अविनाश पांडेय समर उर्फ समर अनार्या जाने माने अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारवादी और सोशल मीडिया एक्टिविस्ट हैं.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

कन्हैया पहले छात्रनेता हैं जिनके पूरे एक घंटे के भाषण का सीधा प्रसारण हुआ

Mahendra Mishra : जब सड़क पड़ी संसद पर भारी। कल प्रधानमंत्री का दिन होना था। उन्हें संसद में राष्ट्रपति अभिभाषण पर बहस के बाद धन्यवाद देना था। लिहाजा उनकी एक-एक बात बहुत महत्वपूर्ण होनी थी । लेकिन मोदी जी देश के प्रधानमंत्री और सदन के नेता के तौर पर कम सत्ता के मद में चूर एक अहंकारी शासक के रूप में ज्यादा दिखे। अहम उनके चेहरे पर बिल्कुल साफ़ था लेकिन परेशानी भी उसी अनुपात में झलक रही थी। जो माथे की लकीरों और उनके लाल चेहरे से स्पष्ट था।

सदन के नेता के तौर पर प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी विपक्ष को भी साथ लेकर चलने की होती है। एक स्वस्थ लोकतंत्र का यही नियम होता है। लेकिन यहां तो अपने मंत्रियों और पार्टी नेताओं को पहले ही बौना बना चुके मोदी जी की पूरी कोशिश विपक्ष को भी बौना साबित कर देने की थी। इसके लिए उन्हें इतिहास के पन्ने खंगालने पड़ रहे थे। जबकि उसका जवाब खुद उनके पास ही सुषमा स्वराज के तौर पर मौजूद था। जिन्होंने अब से तीन साल पहले विपक्ष के सत्र के बहिष्कार और सदन की कार्यवाही में अड़चन को लोकतंत्र का अभिन्न हिस्सा बताया था।

प्रधानमंत्री जी की पूरी कोशिश यही है कि सबको बौना साबित कर खुद को उनके ऊपर बैठाया जा सके। लेकिन प्रधानमंत्री जी ना तो देश बौना हुआ है ना ही उसके लोग। कल आपके कद को जेएनयू के एक छात्रनेता ने नाप दिया। कल उस पहाड़ के सामने आप ऊंट साबित हुए। ये मैं नहीं कह रहा हूं। देश का मीडिया और हर नागरिक बोल रहा है। कन्हैया देश के इतिहास के पहले छात्रनेता हैं जिनके पूरे एक घंटे के भाषण का ना केवल सीधा प्रसारण हुआ बल्कि उसे इलेक्ट्रॉनिक चैनलों ने कई-कई बार दिखाया। अख़बारों ने भी आप के ऊपर कन्हैया को स्थान दिया है। शायद ही कोई पेपर हो जिसने ऐसा ना किया हो।

इतना ही नहीं कन्हैया ने तुर्की बा तुर्की आपके सारे सवालों का जवाब भी दिया। यह देश के लिए ही सिर्फ टर्निंग पॉइंट नहीं है। बल्कि आपके लिए भी यह उल्टी गिनती की शुरुआत जैसा है। कहते हैं कि समाज में कुछ भी होने वाला होता है तो उसकी धड़कन सबसे पहले शैक्षणिक परिसरों में महसूस की जाती है। जेएनयू और हैदराबाद बहुत कुछ कह रहा है। अगर आप उनको सुनने की कोशिश करें तो। युवाओं की इस अंगड़ाई पर अब लगाम लगाना मुश्किल है। परिसरों से बाहर निकल कर अब इसने समाज की अगुवाई का संकल्प ले लिया है। और उसने अपना नेतृत्व भी तैयार करना शुरू कर दिया है। कन्हैया उन्हीं में से एक है। शरीर भले ही कन्हैया की हो लेकिन उसमें आत्मा रोहित वेमुला की है।

कन्हैया का भाषण जो लोग नहीं सुन पाए हैं, वो इस लिंक पर क्लिक करके सुन सकते हैं : https://www.youtube.com/watch?v=i6hY0AhaRfw

पत्रकार महेंद्र मिश्र के फेसबुक वॉल से.


इसे भी पढ़ें…

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

सलाम तुम्हें कन्हैया, तुमने उन चैनलों को भी आइना दिखा दिया जो भक्त हो गये थे

कन्हैया बोला- मीडिया में कुछ लोग ‘वहां’ से वेतन पाते हैं

Sanjay Sharma : वर्षों से इतना बढिया और दिल की गहराइयों से बोलने वाला भाषण नहीं सुना.. जेएनयू और कन्हैया ने इस देश को लूटने वालों के खिलाफ आज़ादी की जो जंग शुरू की है उसके बड़े नतीजे देश भर में जल्दी ही देखने को मिलेंगे.. ग़लत जगह हाथ डाल दिया भक्तों ने. रात के दस बजे कन्हैया के मुँह से निकले कई नारे कई कंसों के पेट में दर्द कर देगे.. कन्हैया ने जेएनयू पहुँच कर सबसे पहले भारत माँ की जय के नारे लगाये और उसके वाद वही नारे लगाये जो सत्ता के लोगों के पेट मे दर्द पैदा करते हैं.. हमको चहिये आज़ादी .. पूँजीवाद से आज़ादी .. मनुवाद से आज़ादी .. ब्राह्मण वाद से आज़ादी ..सलाम तुम्हें कन्हैया.. तुम्हारा भाषण दिल को छू गया.. तुमने उन चैनलों को भी आइना दिखा दिया जो भक्त हो गये थे.. भरोसा है तुम्हारे जैसे नौजवान समाजवाद को सही रूप मे लायेंगे.. जो राजनैतिक दल कन्हैया की विचारधारा का समर्थन कर रहे थे उन्हे कन्हैया को राज्यसभा भेजना चहिये.. इस देश की संसद को कन्हैया जैसे सांसद और उनकी आवाज़ चहिये संसद में.. सारा विपक्ष मिलकर मोदी सरकार की इतनी बैंड नही बजा पाया जितनी अकेले कन्हैया ने बजा दी..

Sanjaya Kumar Singh : कन्हैया कुमार अभी भी आजादी ही मांग रहा है। पिछली बार उसे लगा होगा कि लोग समझ जाएंगे पर नहीं समझने वाले नहीं समझे और लोगों ने वीडियो में डाक्टरी करके ‘देशभक्ति’ कर दी और कन्हैया कुमार को जेल भिजवा दिया। अब कन्हैया ने विस्तार से बताया है कि वह कैसी और किस आजादी की बात कर रहा था। साथ ही मीडिया से भी अपील की है कि देश को बताया जाए कि वह कैसी और किस आजादी की बात कर रहा है। इससे यह भी समझ में आएगा कि, भक्तों को गुस्सा क्यों आता है। देखिए टेलीग्राफ ने भी भाषण का शीर्षक एक ही शब्द में लगाया है, आजादी।

Gyanesh Tiwari : फ़ैन हो गया मैं तुम्हारा कन्हैया! इतनी सी उमर में ऐसी सोच। देश को बहुत से कन्हैयों की ज़रूरत है। विश्वास है कि तुम्हारा संघर्ष रंग लाएगा। एक मज़ेदार बात बताऊँ? …आज तो धो ही डाला मोदी को।

Pankaj Chaturvedi : सालों बाद ऐसा भाषण सुना। उसकी उम्र ही क्या है? बेहद सीमित अनुभव लेकिन शब्दों का सहज चयन, व्यंग्य की तीखी मार, घटनाओं को जोड़ना और एक घंटे से ज्यादा उसी जोश के साथ तक़रीर करना!! कमाल कमाल। अभी तीन दिन पहले जब मैंने लिखा था कि कन्हैया जेल से निकलेगा तो वह एक राष्ट्रीय चेहरा होगा, चिंटू गिरोह ने मुझे बहुत गरिआया था. देख लो — जो मीडिया को एक कप चाय पिलाने की हैसियत भी नहीं रखता, यदि तीन बड़े चैनल रात में अपने विज्ञापनों का नुकसान कर एक घंटे से ज्यादा उसका भासण दिखाते हैं और सुबह होते होते रजत शर्मा और दीपक चौरसिया को भी उसे दिखाना पड़ता है, तो जान लो उसमे कुछ दम होगा, वरना राजनैतिक दलों की रैलियों के पांच मिनट का प्रसारण कैसे होता है, ये सबको पता है. फिर कह रहा हूँ यह आंधी बन गया है और अब इसकी सुरक्षा भी जरूरी है, यह निकलेगा तो कई एक के राजनितिक अस्तित्व पर विराम लग जाएगा। दिल से बोलो आज़ादी।

Vishnu Nagar : जेल से रिहा होकर आज शाम जेएनयू लौटे जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार का एनडीटीवी चैनल पर अभी पूरा भाषण सुना। एक घंटे से ज्यादा वह बोला मगर मजाल है कि एक क्षण के लिए भी उसका भाषण ऊबाऊ लगे। वह चमत्कारिक भाषणकर्ता है और वह विचारधारा के मामले में ही नहीं, भाषणकला के मामले में भी मोदीजी को बेहद कड़ा मुकाबला दे सकता है। उसके भाषण में प्रवाह है, अतिउत्साह है मगर असावधानी नहीं। उसमें विट् है, ह्यूमर है, हाजिरजवाबी है। उसके पास ऐसी भाषा है जिसमें वह साधारण लोगों को भी संबोधित कर सकता है, सिर्फ जेएनयू के छात्रों को नहीं। उसके पास लोगों के व्यापक वर्ग तक पहुँचने वाली भाषा है, जिसके अभाव में वामपंथी आम लोगों तक पहुँच नहीं पा रहे हैं। उसमें अंबेडकरवाद और मार्क्सवाद को साथ लाने की, करीब लाने की स्पष्ट दृष्टि है, जिसका अभी तक वामपंथियों में अभाव रहा है। अगर उसे मौका मिला और वह अंततः लालू प्रसाद यादव की तरह भाषा का खिलाड़ी बनकर नहीं रह गया तो बिहार का यह पूत देश में वामपंथी लहर को लाने में बड़ी भूमिका निभा सकता है, बशर्ते उसकी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी अपनी नींद से जागे और उसका सही इस्तेमाल कर सके, उसे बड़ी भूमिका दे सके, ताकि देश में वामपंथी परिवर्तन लाने मे वह सहायक बने। वैसे भाकपा अपने को बहुत बदल सकेगी या माकपा इसकी संभावना कम है। अभी तो लगता है कि देशद्रोह का फर्जी मामला उठाकर और जेएनयू को छेड़कर भाजपा-संघ ने बहुत बड़ी रणनीतिक गलती कर दी है, जो अंततः देशहित में साबित हो सकती है। जेएनयू में कन्हैया एक हो सकता है मगर वहाँ परिवर्तन की ऊर्जा बहुत है, अगर उसे निजी महत्वाकांक्षाओं में विसर्जित न होने दिया जाए। भाजपा अब और कोशिश करेगी कन्हैया को फँसाने की,जेएनयू पर हमलावर होने की लेकिन उसका नतीजा उसके लिए अंततः और भी बुरा ही साबित हो सकता है मगर वह मानेगी नहीं। राज्यशक्ति का हर तरह से इस्तेमाल करेगी, जिसमें वामपंथियों में आपसी फूट डालना भी एक कदम हो सकता है।

Ajay Prakash : कन्हैया को भाजपा ने कन्हैया बना दिया। इससे पहले कांग्रेस ने केजरीवाल को केजरीवाल बनाया था। केजरीवाल कुछ बन भी गए क्योंकि उनको नया रचना था, अपनी राह खुद बनानी थी। लेकिन क्या कन्हैया बना पाएंगे? इससे बड़ा सवाल कि उनको अपनी राह बनाने दी जाएगी? सैकड़ों मुंडों और दर्जनों पार्टियों में बंटा वामपंथ कन्हैया को अपना सर्वमान्य नेता स्वीकार करेगा? एक नए लौंडे की समाजदृष्टि को वामपंथ नई युगदृष्टि मानकर आगे बढ़ने को तैयार होगा। 1920 से ’13’ तरह की क्रांति ला रही ’73’ कम्युनिस्ट पार्टियां क्या विरेाध और उत्पीड़न के मौकों के अलावा राजनीति को नई दिशा देने के लिए एकजुट हो पाएंगी? क्या सीताराम येचुरी, प्रकाश करात से लेकर सुधाकर रेड्डी तक कन्हैया के नीले और लाल रंग की बातों को व्यवहार में उतरने देंगे? क्या ये पार्टियां देश को एकसूत्र में बांधने वाले तिरंगे को लाल झंडे से उपर रख पाएंगी? क्या वे जयहिंद बोलने में उसी गर्व का अनुभव कर पाएंगी जो लाल सलाम बोलने में उन्हें होता है? क्या वो भारत के गांधी और आंबेडकर को वह सम्मान दे पाएंगी जो उनके मन में मार्क्स, लेनिन और माओ के लिए है? क्या वह फीता काटने को प्रगतिशीलता और नारियल फोड़ने को पोंगापंथ कहने की समझदारी से बाहर निकल पाएंगी? ब्राम्हणों और बूढे नेतृत्वकर्ताओं से भरी कम्यूनिस्ट पार्टियां क्या दलितों—पिछड़ों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं को अपना नेतृत्व देंगी? क्या वह एक गरीब कन्हैया को अपना नेता मानेंगी? अंग्रेजी के प्रति अभिशप्त वामपंथी क्या एक हिंदीभाषी को रोलमॉडल बनने देंगे? मैं इस राजनीति जितना जानता—समझता हूं, उसके हिसाब से इन सभी सवालों का जवाब ‘ना’ में है। इसलिए खुशी की बजाए चिंतित होने का वक्त है। हमें अपने कन्हैया को इनसे बचाना होगा। इससे पहले भी इन्होंने कई युवा तुर्कों को राजनीतिक रूप से मार डाला है। कन्हैया को इनसे बचाइए। देश को कन्हैया की दरकार है।

Amitaabh Srivastava : दिन मोदी के भाषण का था। लोकसभा के भीतर। प्रशंसकों ने कहा मोदी ने राहुल को धो डाला। शाम ढलते ढलते जब रात में बदली तो पूरी तरह कन्हैया कुमार के असर में थी। लोकसभा से बाहर एक जनसभा में। जेएनयू में। छात्रों के जमावड़े में। कन्है़या ने अपने भाषण से सरकार, बीजेपी, संघ परिवार के सारे धुरंधरों को धो डाला। क्या बोला है बंदा। क्या क्या नहीं कहा। आज़ादी के नारे भी लगाये। फिर से। मोदी के ट्वीट पर चुटकी लेते हुए कहा सत्यमेव जयते प्रधानमंत्री का नहीं, देश का है इसलिए मैं भी कहता हूँ सत्यमेव जयते। मोदी ने स्टालिन, ख्रुश्चेव का ज़िक्र किया था। कन्हैया ने कहा- हिटलर, मुसोलिनी का नाम भी ले लेते। बहुत शानदार बोला कन्हैया। बेहद जोशीली तक़रीर दी, लेकिन जोश में कहीं भी होश नहीं खोया। सीमा पर लड़ने वाले जवान और खेत में काम करने वाले किसान को जोड़ दिया । और कहा लड़ने वाले ज़िम्मेदार नहीं, लड़ाने वाले ज़िम्मेदार हैं। तीखा लहजा, साफ़गोई से खूब खरी खरी कही। बोला मीडिया में कुछ लोग “वहाँ” से वेतन पाते हैं। रोहित वेमुला को नहीं भूला। बाबा साहब आंबेडकर का बार बार ज़िक्र किया, लेनिन का ज़िक्र किया- democracy is indispensable to socialism. वामपंथियों और आंबेडकरवादियों को एक साथ आना चाहिये, कहीं ये संकेत भी दिया जेल में मिली लाल और नीली कटोरी के प्रतीक के ज़रिये। कन्हैया का भाषण, नारों की गूँज और जेएनयू के माहौल की तस्वीरें देखने के बाद ये समझ़ना क़तई मुश्किल नहीं कि मोदी सरकार , संघ और समूचे दक्षिणपंथी समुदाय ने अपनी नासमझी, नफरत और जल्दबाज़ी के घालमेल के चलते कैसे छात्रों के बीच एक नायक खड़ा कर दिया है। आज के दौर का- पढ़ा लिखा, समझदार और नाराज़। इस युवा आक्रोश की गूँज सुनी तुमने सरकार?

Om Thanvi : कन्हैया ने बड़ी सहजता से एक बात कही कि जेएनयू से कुछ भारी शब्दावली निकलती है जो संप्रेषण की मुश्किलें बढ़ाती है। मेरा खयाल है, शब्दावली से ज्यादा बड़ी पेचीदगी भाषा की है। अंगरेजी को बौद्धिकता का पर्याय क्यों समझा जाय? गौर करें, अगर कन्हैया की तकरीर अंगरेजी में हुई होती तो क्या इतना गहरा और व्यापक असर पैदा कर सकती थी? दिल्ली में हिंदी, हैदराबाद में तेलुगु, चेन्नई में तमिल, अहमदाबाद में गुजराती, नागपुर में मराठी, त्रिवेंद्रम में मलयालम, कोलकाता में बांग्ला – अपनी भाषाओं का जलवा ही निराला होता है। पराए परिवेश में अंगरेजी में तो शायद गाली भी वह असर न करती होगी! प्रसंगवश, जेएनयू में मैं अपनी क्लास हिंदी में ही लेता हूँ; पूर्वोत्तर के छात्र तक की सहमति पाने के बाद। अंगरेजी का इस्तेमाल तो कभी-कभार यह दरसाने के लिए करता हूँ कि थोड़ी-बहुत गिट-पिट अपन को भी आती है! मुझे लगता है अब संपर्क भाषा के बतौर हिंदी देश में अंगरेजी के मुकाबले कहीं ज्यादा समझी जाती है – दक्षिण तक में मैंने खुद इसे आजमा कर देखा है। बहरहाल, कन्हैया को लोग हिंदी की ताकत (अनजानों को) बताने और भाषा की शान बढ़ाने के लिए भी याद रखेंगे।

Yashwant Singh : रिहा होने के बाद जेएनयू में दिया गया भाषण भक्तों और भाजपा के लोगों को जरूर सुनना चाहिए. साथ ही मीडिया वालों को भी. इस लड़के से कुछ ज्ञान हासिल कर सकेंगे. भाषण का लिंक ये है : https://www.youtube.com/watch?v=i6hY0AhaRfw

(फेसबुक से)


इसे भी पढ़िए…

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

जेएनयू में वाकई गलत हुआ क्योंकि रिपोर्टिंग के नाम पर मीडिया के एक वर्ग ने नंगा नाच किया

Sanjaya Kumar Singh :  कुछ लोग अभी भी कह रहे हैं कि, “जेएनयू में जो हुआ वो गलत था।” लेकिन जेएनयू में हुआ क्या? रिपोर्टिंग के नाम पर मीडिया के एक वर्ग का नंगा नाच। ऐसा फर्जीवाड़ा जिसकी पोल इतनी जल्दी पूरी तरह खुल गई। ऐसा फर्जीवाड़ा जिसे संभाल नहीं पाए। ऐसा शर्मनाक कृत्य जिसका साथ वालों ने ही विरोध कर दिया – खुले आम। नौकरी छोड़ने की कीमत पर। पत्रकारिता में जो पहले कभी नहीं हुआ वो करवा लिया। फिर भी किसी को मीडिया के इस तरह नंगे होने का अफसोस नहीं है तो उसे भारत के खिलाफ या पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगाने वालों के खिलाफ कार्रवाई से किसने रोका है। जब पुलिस कमिश्नर जैसा बड़ा अधिकारी अपने रिटायरमेंट के बाद के जुगाड़ में लगेगा और ऐसे ही जुगाड़ होते रहेंगे तो पाकिस्तान के पक्ष में नारा लगाने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जरूरत कहां रहेगी।

जरूरत तो विरोधियों का मुंह बंद करने की हो जाएगी। उन्हें किसी तरह फंसाने और सबक सीखाने की होगी। कार्रवाई दोषी के खिलाफ नहीं होगी। सेवा करने के लिए, देश भक्ति के नाम पर स्वामी भक्ति दिखाने के लिए होगी। जो अपनी सेवाएं देगा – ली जाएगी कुछ टुकड़े उसे भी मिल जाएंगे। ऐसे में जेएनयू में जो हुआ बिल्कुल गलत हुआ। हर गलती के दोषी और अपराधी पकड़े जाएं, सबको सजा हो। किसी के साथ पक्षपात नहीं हो।

देश के खिलाफ या पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगे तो उसे किसने, कब, कहां कहा कि सही है। अगर बाहर के लोगों ने नारे लगाए तो शुरू से ही कहा जा रहा है कि वह गलत है। किसी ने उसका समर्थन नहीं किया है। और अगर किसी ने किया है तो उसके खिलाफ कार्रवाई कौन करेगा? क्यों नहीं हुई। किसने मना किया। उसके बदले किसी निर्दोष को पकड़ना। फर्जी फोटो और वीडियो फैलाना, साबित हुए बिना टीवी चैनलों पर किसी को देशद्रोही कहना और अदालत में पेशी के दिन पुलिस कमिश्नर का टीवी चैनल पर कहना कि पर्याप्त सबूत है और फिर पुलिस के तय किए अपराधी को वकीलों की भीड़ द्वारा पीटा जाना और इसके बाद पुलिस आयुक्त का कहना कि हम जमानत का विरोध नहीं करेंगे। इसके बावजूद लोगों को नहीं समझ में आ रहा है कि जेएनयू में क्या हुआ। जेएनयू का मामला बहुत आगे बढ़ गया है।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

बिना प्रणव राय की मर्जी के रवीश कुमार एनडीटीवी में सांस भी ले सकते हैं?

: सच यह है कि रवीश कुमार भी दलाल पथ के यात्री हैं : ब्लैक स्क्रीन प्रोग्राम कर के रवीश कुमार कुछ मित्रों की राय में हीरो बन गए हैं। लेकिन क्या सचमुच? एक मशहूर कविता के रंग में जो डूब कर कहूं तो क्या थे रवीश और क्या हो गए हैं, क्या होंगे अभी! बाक़ी तो सब ठीक है लेकिन रवीश ने जो गंवाया है, उसका भी कोई हिसाब है क्या? रवीश कुमार के कार्यक्रम के स्लोगन को ही जो उधार ले कर कहूं कि सच यह है कि ये अंधेरा ही आज के टीवी की तस्वीर है! कि देश और देशभक्ति को मज़ाक में तब्दील कर दिया गया है। बहस का विषय बना दिया गया है। जैसे कोई चुराया हुआ बच्चा हो देशभक्ति कि पूछा जाए असली मां कौन?  रवीश कुमार एंड कंपनी को शर्म आनी चाहिए।

आपको क्या लगता है कि बिना प्रणव राय की मर्जी के रवीश कुमार एनडीटीवी में सांस भी ले सकते हैं?  एक समय था कि इंडियन एक्सप्रेस में अरुण शौरी का बड़ा बोलबाला था। उनकी न्यूज़ स्टोरी बड़ा हंगामा काटती रहती थीं। बाद के दिनों में वह जब इंडियन एक्सप्रेस से कुछ विवाद के बाद अलग हुए तो एक इंटरव्यू में डींग मारते हुए कह गए कि मैं अपनी स्टोरी के लिए कहीं जाता नहीं था, स्टोरी मेरी मेज़ पर चल कर आ जाती थी। रामनाथ गोयनका से पूछा गया अरुण शौरी की इस डींग के बारे में तो गोयनका ने जवाब दिया कि अरुण शौरी यह बात तो सच बोल रहा है क्योंकि उसे सारी स्टोरी तो मैं ही भेजता था, बस वह अपने नाम से छाप लेता था। अब अरुण शौरी चुप थे।

लगभग हर मीडिया संस्थान में कोई कितना बड़ा तोप क्यों न हो उस की हैसियत रामनाथ गोयनका के आगे अरुण शौरी जैसी ही होती है। बड़े-बड़े मीडिया मालिकान ख़बरों के मामले में एडीटर और एंकर को डांट कर डिक्टेट करते हैं। हालत यह है कि कोई कितना बड़ा तोप एडीटर भी नगर निगम के एक मामूली बाबू के ख़िलाफ़ ख़बर छापने की हिमाकत नहीं कर सकता अगर मालिकान के हित वहां टकरा गए हैं। विनोद मेहता जब पायनियर के चीफ़ एडीटर थे तब उन्हें एलएम थापर ने दिल्ली नगर निगम के एक बाबू के ख़िलाफ़ ख़बर छापने के लिए रोक दिया था। सोचिए कि कहां थापर, कहां नगर निगम का बाबू और कहां विनोद मेहता जैसा एडीटर! लेकिन यह बात विनोद मेहता ने मुझे ख़ुद बताई थी। तब मैं भी पायनियर के सहयोगी प्रकाशन स्वतंत्र भारत में था। मैं इंडियन एक्सप्रेस के सहयोगी प्रकाशन जनसत्ता में भी प्रभाष जोशी के समय में रहा हूं। इंडियन एक्सप्रेस, जनसत्ता के भी तमाम सारे ऐसे वाकये हैं मेरे पास। पायनियर आदि के भी। पर यहां बात अभी क्रांतिकारी बाबू रवीश कुमार की हो रही है तो यह सब फिर कभी और।

अभी तो रवीश कुमार पर। वह भी बहुत थोड़ा सा। विस्तार से फिर कभी। रवीश कुमार प्रणव राय के पिंजरे के वह तोता हैं जो उन के ही एजेंडे पर बोलते और चलते हैं। इस बात को इस तरह से भी कह सकते हैं कि प्रणव राय निर्देशक हैं और रवीश कुमार उनके अभिनेता। प्रणव राय इन दिनों फेरा और मनी लांड्रिंग जैसे देशद्रोही आरोपों से दो चार हैं। आप यह भी भूल रहे हैं कि प्रणव राय ने नीरा राडिया के राडार पर सवार रहने वाली बरखा दत्त जैसे दलाल पत्रकारों का रोल माडल तैयार कर उन्हें पद्मश्री से भी सुशोभित करवाया है। अब वह दो साल से रवीश कुमार नाम का एक अभिनेता तैयार कर उपस्थित किए हुए हैं। ताकि मनी लांड्रिंग और फेरा से निपटने में यह हथियार कुछ काम कर जाए।

रवीश कुमार ब्राह्मण हैं पर उनकी दलित छवि पेंट करना भी प्रणव राय की स्कीम है। रवीश दलित और मुस्लिम कांस्टिच्वेन्सी को जिस तरह बीते कुछ समय से एकतरफा ढंग से एड्रेस कर रहे हैं उससे रवीश कुमार पर ही नहीं मीडिया पर भी सवाल उठ गए हैं। रवीश ही क्यों रजत शर्मा, राजदीप सरदेसाई, सुधीर चौधरी, दीपक चौरसिया आदि ने अब कैमरे पर रहने का, मीडिया में रहने का अधिकार खो दिया है, अगर मीडिया शब्द थोड़ा बहुत शेष रह गया हो तो। सच यह है कि यह सारे लोग मीडिया के नाम पर राजनीतिक दलाली की दुकान खोल कर बैठे हैं। इन सबकी राजनीतिक और व्यावसायिक प्रतिबद्धताएं अब किसी से छुपी नहीं रह गई हैं। यह लोग अब गिरोहबंद अपराधियों की तरह काम कर रहे हैं। कब किस को उठाना है, किस को गिराना है मदारी की तरह यह लोग लगे हुए हैं। ख़ास कर प्रणव राय जितना साफ सुथरे दीखते हैं, उतना हैं नहीं।

अव्वल तो यह सारे न्यूज चैनल लाइसेंस न्यूज चैनल का लिए हुए हैं लेकिन न्यूज के अलावा सारा काम कर रहे हैं। चौबीस घंटे न्यूज दिखाना एक खर्चीला और श्रम साध्य काम है। इस लिए यह चैनल भडुआगिरी पर आमादा हैं।  दिन के चार-चार घंटे मनोरंजन दिखाते हैं। रात में भूत प्रेत, अपराध कथाएं दिखाते हैं। धारावाहिकों और सिनेमा के प्रायोजित कार्यक्रम , धर्म ज्योतिष के पाखंडी बाबाओं की दुकानें सजाते हैं। और प्राइम टाइम में अंध भक्ति से लबालब  विचार और बहस दिखाते हैं। देश का माहौल बनाते-बिगाड़ते हैं। और यहीं प्रणव राय जैसे शातिर, रजत शर्मा जैसे साइलेंट आपरेटर अपना आपरेशन शुरू कर देते हैं। फिर रवीश कुमार जैसे जहर में डूबे अभिनेता, राजदीप सरदेसाई जैसे अतिवादी, सुधीर चौधरी जैसे ब्लैकमेलर, अभिज्ञान प्रकाश जैसे डफर, दीपक चौरसिया जैसे दलाल, चीख़-चीख़ कर बोलने वाले अहंकारी अर्नब गोस्वामी जैसे बेअदब लोग सब के ड्राईंग रूम, बेड रूम में घुस कर मीठा और धीमा जहर परोसने लगते हैं।

लेकिन सरकार इतनी निकम्मी और डरपोक है कि मीडिया के नाम पर इस कमीनगी के बारे में पूछ भी नहीं सकती। कि अगर आप ने साईकिल बनाने का लाईसेंस लिया है तो जहाज कैसे बना रहे हैं?  ट्यूब बनाने का लाईसेंस लिया है तो टायर कैसे बना रहे हैं। दूसरे, अब यह स्टैब्लिश फैक्ट है कि सिनेमा और मीडिया खुले आम नंबर दो का पैसा नंबर एक का बनाने के धंधे में लगे हुए हैं । तीसरे ज़्यादातर मीडिया मालिक या उनके पार्टनर या तो बिल्डर हैं या चिट फंड के कारोबारी हैं। इनकी रीढ़ कमज़ोर है। लेकिन सरकार तो बेरीढ़ है । जो इन से एक फार्मल सवाल भी कर पाने की हैसियत नहीं रखती।  सरकार की इसी कमज़ोरी का लाभ ले कर यह मीडिया पैसा कमाने के लिए देशद्रोह और समाजद्रोह पर आमादा है। रवीश कुमार जैसे लोग इस समाजद्रोह के खलनायक और वाहक हैं । लेकिन उन की तसवीर नायक की तरह पेश की जा रही है। रवीश कुमार इमरजेंसी जैसा माहौल बता रहे हैं। पहले असहिष्णुता बताते रहे थे। असहिष्णुता और इमरजेंसी उन्होंने देखी नहीं है। देखे होते तो मीडिया में थूक नहीं निकलता, बोलना तो बहुत दूर की बात है। हमने देखा है इमरजेंसी का वह काला चेहरा। वह दिन भी देखा है जब खुशवंत सिंह जैसा बड़ा लेखक और उतना ही बड़ा संजय गांधी का पिट्ठू पत्रकार इलस्ट्रटेटेड वीकली में कैसे तो विरोध के बिगुल बजा बैठा था। अपनी सुविधा, अपना पॉलिटिकल कमिटमेंट नहीं, मीडिया की आत्मा को देखा था। रवीश जैसे लोग क्या देखेंगे अब? इंडियन एक्सप्रेस ने संपादकीय पेज को ख़ाली छोड़ दिया था। खैर वह सब और उस का विस्तार भी अभी यहां मौजू नहीं है।

बैंक लोन के रूप में आठ लाख करोड़ रुपए कार्पोरेट कंपनियां पी गई हैं। सरकार कान में तेल डाले सो रही है। किसानों की आत्म हत्या, मंहगाई, बेरोजगारी, कार्पोरेट की बेतहाशा लूट पर रवीश जैसे लोगों की, मीडिया की आंख बंद क्यों है। मीडिया इंडस्ट्री में लोगों से पांच हज़ार दो हज़ार रुपए महीने पर भी कैसे काम लिया जा रहा है? नीरा राडिया के राडार पर इसी एनडीटीवी की बरखा दत्त ने टू जी स्पेक्ट्रम में कितना घी पिया, है रवीश कुमार के पास हिसाब? कोयला घोटाला भी वह इतनी जल्दी क्यों भूल गए हैं। रवीश किस के कहे पर कांग्रेस और आप की मिली जुली सरकार बनाने की दलाली भरी मीटिंग अपने घर पर निरंतर करवाते रहे? बताएंगे वह? रवीश के बड़े भाई को बिहार विधान सभा में कांग्रेस का टिकट क्या उनकी सिफ़ारिश पर ही नहीं दिया गया था? अब वह इस भाजपा विरोधी लहर में भी हार गए यह अलग बात है। लेकिन इन सवालों पर रवीश कुमार ख़ामोश हैं। उन के सवाल चुप हैं।

अब ताज़ा-ताज़ा गरमा-गरम जलेबी वह जे एन यू में लगे देशद्रोही नारों पर छान रहे हैं। जनमत का मजाक उड़ा रहे हैं। देश को मूर्ख बना रहे हैं। हां, रवीश के सवाल जातीय और मज़हबी घृणा फैलाने में ज़रूर सुलगते रहते हैं। कौन जाति हो? उन का यह सवाल अब बदबू मारते हुए उनकी पहचान में शुमार हैं। जैसे वह अभी तक पूछते रहे हैं कि कौन जाति हो? इन दिनों पूछ रहे हैं, देशभक्त हो? गोया पूछ रहे हों तुम भी चोर हो? दोहरे मापदंड अपनाने वाले पत्रकार नहीं, दलाल होते हैं। माफ़ कीजिए रवीश कुमार आप अब अपनी पहचान दलाल पत्रकार के रूप में बना चुके हैं। दलाली सिर्फ़ पैसे की ही नहीं होती, दलाली राजनीतिक प्रतिबद्धता की भी होती है। सुधीर चौधरी और दीपक चौरसिया जैसे लोग पैसे की दलाली के साथ राजनीतिक दलाली भी कर रहे हैं। आप राजनीतिक दलाली के साथ-साथ अपने एनडीटीवी के मालिक प्रणव राय की चंपूगिरी भी कर रहे हैं। और जो नहीं कर रहे हैं तो बता दीजिए न अपनी विष बुझी हंसी के साथ किसी दिन कि प्रणव राय और प्रकाश करात रिश्ते में साढ़ू  लगते हैं। हैS हैS ऊ अपनी राधिका भाभी हैं न, ऊ वृंदा करात बहन जी की बहन हैं। हैS हैS, हम भी क्या करें?

सच यह है कि जो काम, जो राजनीतिक दलाली बड़ी संजीदगी और सहजता से बिना लाऊड हुए रजत शर्मा इंडिया टीवी में कर रहे हैं, जो काम आज तक पर राजदीप सरदेसाई कर रहे हैं, जो काम ज़ी न्यूज़ में सुधीर चौधरी, इण्डिया न्यूज़ में दीपक चौरसिया आदि-आदि कर रहे हैं, ठीक वही काम, वही राजनीतिक दलाली प्रणव राय की निगहबानी में रवीश कुमार जहरीले ढंग से बहुत लाऊड ढंग से एनडीटीवी में कर रहे हैं। हैं यह सभी ही राजीव शुक्ला वाले दलाल पथ पर। किसी में कोई फर्क नहीं है। है तो बस डिग्री का ही।

निर्मम सच यह है कि रवीश कुमार भी दलाल पथ के यात्री हैं। अंतिम सत्य यही है। आप बना लीजिए उन्हें अपना हीरो, हम तो अब हरगिज़ नहीं मानते। अलग बात है कि हमारे भी कभी बहुत प्रिय थे रवीश कुमार तब जब वह रवीश की रिपोर्ट पेश करते थे। सच हिट तो सिस्टम को वह तब करते थे। क्या तो डार्लिंग रिपोर्टर थे तब वह। अफ़सोस कि अब क्या हो गए हैं! कि अपनी नौकरी की अय्यासी में, अपनी राजनीतिक दलाली में वह देशभक्त शब्द की तौहीन करते हुए पूछते हैं देशभक्ति होती क्या है? आप तय करेंगे? आदि-आदि। जैसे कुछ राजनीतिज्ञ बड़ी हिकारत से पूछते फिर रहे हैं कि यह देशभक्ति का सर्टिफिकेट क्या होता है?

लेखक दयानंद पांडेय लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार हैं.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

जेएनयू पर एक कविता : यस, आई स्टेंड विद जेएनयू ….

यस, आई स्टेंड विद जेएनयू
यह जानते हुये भी कि
वानरसेना मुझको भी
राष्ट्रद्रोही कहेगी।
काले कोट पहने
गुण्डों की फौज
यह बिल्कुल भी
नहीं सहेगी।
तिरंगा थामे
मां भारती के लाल
मां बहनों को गरियायेंगे।
दशहतगर्द देशभक्त
जूते मारो साले को
चीख चीख चिल्लायेंगे।
जानता हूं
मेरे आंगन तक
पहुंच जायेगा,
उन्मादी राष्ट्रप्रेमियों के
खौफ का असर।
लम्पट देशप्रेमी
नहीं छोड़ेंगे मुझको भी।
फिर भी कहना चाहता हूं
हॉ, मैं जेएनयू के साथ खड़ा हूं।

क्योंकि जेएनयू
गैरूआ तालिबानियों
की तरह,
मुझे नहीं लगता
अतिवादियों का अड्डा
और देशद्रोहियों का गढ़।
मेरे लिये जेएनयू सिर्फ
उच्च शिक्षा का इदारा नहीं है।
मुझे वह लगता है
भीड़ से अलग एक विचार।
कृत्रिम मुल्कों व सरहदों के पार।
जो देता है आजादी
अलग सोचने,अलग बोलने
अलग दिखने और अलग
करने की।
जहां की जा सकती है
लम्बी बहसें,
जहां जिन्दा रहती है
असहमति की आवाजें।
प्रतिरोध की संस्कृति का
संवाहक है जेएनयू।
लोकतांत्रिक मूल्यों का
गुणगाहक है जेएनयू।
यहां खुले दिमाग
वालों का डेरा है।
यह विश्व नागरिकों का बसेरा है।

मैं कभी नहीं पढ़ा जेएनयू में
ना ही मेरा कोई रिश्तेदार पढ़ा है।
मैं नहीं जानता
किसी को जेएनयू में।
शायद ही कोई
मुझे जानता हो जेएनयू में।
फिर भी जेएनयू
बसता है मेरे दिल में।
दिल्ली जाता हूं जब भी
तीर्थयात्री की भांति
जरूर जाता हूं जेएनयू।
गंगा ढ़ाबे पर चाय पीने,
समूहों की बहसें सुनने
वहां की निर्मुक्त हवा को
महसूस करने।
जेएनयू में मुझको
मेरा भारत नज़र आता है।
बस जेएनयू से
मेरा यही नाता है।

रही बात
देशविरोधी नारों की
अफजल के प्रचारों की
यह करतूत है
मुल्क के गद्दारों की।
बिक चुके मीडिया दरबारों की।
चैनल चाटुकारों की,
चीख मचाते एंकर अय्यारों की।
वर्ना पटकथा यह पुरानी है।
बुनी हुई कहानी है।
नारे तो सिर्फ बहाना है।
जेएनयू को सबक सिखाना है।
स्वतंत्र सोच को मिटाना है।
रोहित के मुद्दे को दबाना है।
अकलियत को डराना है।
दशहतगर्दी फैलाना है।
राष्ट्रप्रेमी कुटिल गिद्दों ,
तुम्हारी कही पर निगाहें
कहीं पर निशाना है।
असली मकसद
मनुवाद को वापस देश में लाना है।

पुरातनपंथियों,
वर्णवादी जातिवादियों,
आजादी की लड़ाई से
दूर रहने वाले
अंग्रेजों के पिठ्ठुओं,
गोडसे के पूजकों,
गांधी के हत्यारों,
भगवे के भक्तों,
तिरंगे के विरोधियों,
संविधान के आलोचकों,
अफजल को शहीद
कहनेवाली पीडीपी के प्रेमियों,
हक ही क्या है तुमको
लोगों की देशभक्ति पर
सवाल उठाने का?

बिहार के एक
गरीब मां बाप का बेटा
जो गरीबी, भुखमरी,
बेराजगारी, बंधुआ मजदूरी,
साम्प्रदायिकता और जातिवाद
से चाहता है आजादी

फासीवाद समर्थक
आधुनिक कंसों!
तुम्हें संविधानवादी
एक कन्हैया भी बर्दाश्त ना हुआ।
तुम्हें कैसे बर्दाश्त होंगे
हजारों कन्हैया,
जो किसी गांव, देहात
दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक
या पिछड़े वर्ग से आते हो,
और पढ़ते हो जहां रह कर,
वो जगह ,कैसे बरदाश्त होगी तुमको?
मनुस्मृति और स्मृति ईरानी
दोनों को नापसंद है यह तो।
इसलिये शटडाउन
करने का मंसूबा पाले हो।
वाकई तुम बेहद गिरी
हरकतों वाले हो।

जेएनयू को तुम
क्या बंद कराओगे?
जेएनयू महज
किसी जगह का नाम नहीं।
मात्र यूनीवर्सिटी होना ही
उसकी पहचान नहीं।
जेएनयू एक आन्दोलन है,
धमनियों में बहने वाला लहू है।
विचार है जेएनयू
जो दिमाग ही नहीं
दिल में भी बस जाता है।
इसे कैसे मारोगे?
यह तो शाश्वत है,
जिन्दा था, जीवित है
जीवंत रहेगा सदा सर्वदा।
तुम्हारे मुर्दाबादों के बरक्स
जिन्दाबाद है जेएनयू
जिन्दाबाद था जेएनयू
जिन्दाबाद ही रहेगा जेएनयू।
उसे सदा सदा
जिन्दा और आबाद
रखने के लिये ही
कह रहे है हम भी
स्टेंड विद जे एन यू।

जेएनयू
अब पूरी दुनिया में है मौजूद
हर सोचने वाले के
विचारों में व्यक्त हो रहा है जेएनयू।
शिराओं में रक्त बन कर
बह रहा है जेएनयू।
लोगों की धड़कनों में
धड़क रहा है,
सांसे बन कर
जी रहा है जेएनयू।
वह सबके साथ खड़ा था
आज सारा विश्व
उसके साथ खड़ा है
और कह रहा है –
वी स्टेंड विद जेएनयू।

मैं भी
अपनी पूरी ताकत से
चट्टान की भांति
जेएनयू के साथ
होकर खड़ा
कह रहा हूं,
यस, आई स्टेंड विद जेएनयू
फॉरएवर।
डोन्ट वरी कॉमरेड कन्हैया
वी शैल कम ओवर।
वी शैल फाईट
वी शैल विन।

मुझे यकीनन यकीन है
जेएनयू के दुश्मन
हार जायेंगे।
मुंह की खायेंगे।
दुम दबायेंगे
और भाग जायेंगे।
जेएनयू तो
हिमालय की भांति
तन कर खड़ा रहेगा
अरावली की चट्टानों पर,
राजधानी के दिल पर,
लुटियंस के टीलो की छाती पर….

-भंवर मेघवंशी
स्वंतत्र पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता
व्हाटसएप -9571047777
सम्पर्क -bhanwarmeghwanshi@gmail.com

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

जेएनयू के बारे में पी साईंनाथ के इस वीडियो को नहीं सुना तो आप अंबानी अडानी के टुकड़खोर हैं!

Shamshad Elahee Shams : एक दो कौड़ी के पशुपुत्र ने मेरी जेएनयू आन्दोलन सम्बंधित पोस्ट पर अपनी मानसिक विकलांगता का प्रदर्शन करते हुए कहा था कि ये संस्थान ब्ल्यू फिल्म बनाने वालों के लिए जाना जाता है. इस वीडियों पर अपने जीवन के 59 मिनट खर्च करें और पता चल जायेगा कि जेएनयू क्या है? Continue reading

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

‘शटडाउन जेएनयू’ की जगह ‘शटडाउन जी न्यूज’ का मुहिम चलाना चाहिए!

जेएनयू और रोहित वेमुला के मसले पर एबीवीपी के नेताओं के इस्तीफ़ा-पत्र का हिन्दी अनुवाद

मित्रों,

हम लोग, प्रदीप, संयुक्त सचिव एबीवीपी, जे एन यू यूनिट, राहुल यादव , अध्यक्ष सामाजिक अध्ययन संसथान एबीवीपी यूनिट, जे एन यू, और अंकित हंस , सचिव, सामाजिक अध्ययन संसथानएबीवीपी यूनिट, जे एन यू, एबीवीपी से इस्तीफा दे रहे हैं और खुद को एबीवीपी के अगले किसी भी एक्टिविटी से अलग करते है. हम यह निर्णय निम्नांकित कारणों से ले रहे हैं.

1. जेएनयू के हालिया घटनाक्रम
2. संगठन के साथ रोहित वेमुला और मनुस्मृति जैसे मुद्दों पर लम्बे समय से असहमति

9 फरवरी को कैम्पस में राष्ट्रविरोधी नारे बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण और दुखद थे. जो भी इस कृत्य के लिए दोषी है उसे क़ानून के अनुसार सजा दी जानी चाहिए, लेकिन एनडीए सरकार का पूरे मुद्दे से निपटने के तरीके, शिक्षकों को प्रताड़ित करने और मीडिया तथा कन्हैया पर बार-बार कोर्ट परिसर में हमले किये जाने को उचित नहीं ठहराया जा सकता है. हम समझते हैं कि सवाल किये जाने और किसी विचारधारा को दबाने या पूरे वामपंथ को देशद्रोही सिद्ध करने के बीच बहुत बड़ा अंतर है.

लोग ‘शटडाउन जेएनयू’ की मुहिम चला रहे हैं. पर हमें लगता है कि उन्हें ‘शटडाउन जी न्यूज’ का मुहिम चलाना चाहिए, जिसने अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त संस्थान को अप्रतिष्ठित किया है. पूर्वग्रह से ग्रस्त ‘जी न्यूज’ मीडिया ने कुछ लोगों के द्वारा किये गये कृत्य का सामान्यीकरण किया है और उसे पूरे जेएनयू के छात्र समुदाय से जोड़ दिया है.

जेएनयू प्रगतिशील और लोकतांत्रिक संस्थानों में से एक माना जाता है जहां हम निम्न से लेकर उच्च आय वर्ग के लोगों को समता के साथ आपस में घुलते-मिलते देखते हैं. हम लोग ऐसी सरकार के प्रवक्ता नहीं हो सकते जिसने विद्यार्थी समुदाय के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. या ओपी शर्मा जैसे विधायक के प्रवक्ता नहीं हो सकते. या फिर ऐसी सरकार के हिमायती नहीं हो सकते, जिसने पटियाला कोर्ट और और जे एन यू नार्थ गेट के सामने दक्षिणपंथी फासीवादी ताकतों के कृत्यों को उचित ठहराया है. हम प्रतिदिन देख रहे हैं कि लोग भारतीय झंडे के साथ जेएनयू के में गेट के सामने हम विद्यार्थियों को पीटने के लिए इकट्ठे हो रहे हैं. यह गुंडागर्दी है, न कि राष्ट्रवाद. आप राष्ट्र के नाम पर कुछ भी नहीं कर सकते हैं. राष्ट्रवाद और गुंडागर्दी में बड़ा अंतर है.

राष्ट्रवाद विरोधी नारे कैम्पस या देश के किसी भी हिस्से में बर्दाश्त नहीं किये जा सकते हैं. जे एन यू एस यू और कुछ वामपंथी संगठन कह रहे हैं कि कैम्पस में कुछ भी नहीं हुआ है, लेकिन हम यहाँ जोर देकर कहना चाहते हैं कि कुछ पर्दाधारी लोगों ने डी एस यू के पूर्व सदस्यों के द्वारा आयोजित कार्यक्रम में ‘भारत तेरे टुकडे होंगे’ के नारे लगाये थे. इसके ठोस सबूत वीडियो में हैं भी. इसलिए हम मांग करते हैं कि नारा लगाने वालों को क़ानून के अनुसार सजा दी जानी चाहिए. इसी क्रम में हम मीडिया ट्रायल की भी निंदा करते हैं, जो धीरे-धीरे देश भर में जे एन यू विरोधी भावनाओं में तब्दील हो गया.

आज हम सब को जे एन यू को बचाने के लिए एक साथ खडा होना चाहिए, जिसने हमें पहचान दी है. हम सबको पार्टी लाइन से ऊपर उठकर इस संस्थान की प्रतिष्ठा बचाने के लिए , जे एन यू समुदाय के भविष्य को बचाने आगे आने चाहिए, क्योंकि 80 % से अधिक विद्यार्थी किसी राजनीतिक संगठन से सम्बद्ध नहीं है.

हम सब जे एन यू संस्कृति को बचाने के लिए इकट्ठे हों!

वन्दे मातरम् !
जय भीम !!
जय भारत !!!

सोशल एक्टिविस्ट Sanjeev Chandan के फेसबुक वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

जेएनयू को टैंकों से कुचलने का सुझाव दौड़ रहा है!

-डॉ राकेश पाठक-

आइये जान लीजिये हम किस तरफ बढ़ रहे हैं। जेएनयू में कुछ अलगाववादियों  के नारों पर देश भर में उफान आया हुआ है। एक पक्ष है जो बिना किसी जाँच पड़ताल , मुकदमा अदालत , सबूत गवाही के नारे लगाने वालों की जीभ काटने , सीधे गोली मारने या फांसी पर लटका देने की मांग कर रहा है।ऐसे लोगों में उन्मादी भीड़ के साथ पूर्व मंत्री और सांसद तक शामिल हैं।सोशल मीडिया ऐसे बयानों और मांगों से अटा पड़ा है।

अब जैसे इतने पर ही तसल्ली नहीं हुयी तो सरहद पर तैनात बंदूकों के मुंह भीतर की ओर मोड़ने की मांग दो दिन से चल रही है। और अब जेएनयू को टैंकों से कुचलने का सुझाव दौड़ रहा है। चीन की राजधानी बीजिंग में “थ्येन आन मन चौक” पर फौजी टैंकों से हज़ारों छात्रों को कुचलने का हवाला दिया जा रहा है। और ये सुझाव बहुत ज़िम्मेदार लोगों का है। पूरा सुझाव उपर स्क्रीन शॉट में है।

कुछ बहुत ही सादा सवाल-

1) क्या चंद देशद्रोहियों की सजा पूरी यूनिवर्सिटी को दी जायेगी?
2) क्या टैंकों से विचार को कुचला जा सकता है?
3) क्या सचमुच ये इतना बड़ा मामला है कि सेना के बेलगाम टैंक हज़ारों बेगुनाह छात्रों को कुचल दिया जाये?

और इन सवालों के जवाब भी दीजिये~

* जम्मू कश्मीर में ऐसे ही नारे हर हफ्ते लग रहे हैं।दशकों से लगते रहे हैं लेकिन अब ज्यादा लगते हैं। तो वहां अब तक कितनी बार टैंक भेजे?
* पिछले बरस वहां की सरकार ने मसर्रत आलम को जेल से छोड़ दिया था। बाहर आते ही उसने बड़ी रैली की। पाक झंडे लहराये। “मेरी जान पाकिस्तान” के नारे ही नहीं लगाये बल्कि चैनलों के कैमरे पर गाल बजाता रहा।बहुत हल्ला मचा तब दुबारा जेल में डाला।भूले तो न होंगे तब किसकी सरकार थी?
क्या तब टैंक भेजे ??
* उत्तर पूर्व के कई राज्यों में दशकों से हिंसक अलगाववादी आंदोलन चल रहे हैं।सरकार बरसों बरस समझौता वार्ताएं चलाती है। अब भी चल रही है। कहाँ कहाँ टैंक से कुचले गए देशद्रोही…? नागालैंड के घोषित विद्रोहियों से इसी सरकार का समझौता होने वाला है। और हां सरकार उनके प्रथक झंडे पर भी राज़ी है।
* हद ये है कि उग्र राष्ट्रवाद के बुखार में तपते लोग ऑपरेशन ब्लू स्टार और हज़रत  बल का हवाला दे रहे हैं। क्या इन उन घटनाओं से इसकी तुलना उचित है?
* देश के आधा दर्जन से ज्यादा राज्यों में नक्सलियों ने सशस्त्र संघर्ष छेड़ रखा है। आज तक किसी सरकार ने न उन पर बम बरसाए न टैंक भेजे।

सबसे ज़रूरी बात-
जिस दिन टैंक बैरकों से निकलेंगे उसके बाद वे आसानी से लौट कर नहीं जायेंगे। वे सिर्फ जेएनयू तक नहीं रुकेंगे। अगले दिन वे बीएचयू पहुंचेंगे और उसके बाद जीवाजी या बरकतुल्लाह यूनिवर्सिटी। वे यहीं नहीं रुकेंगे, किसी दिन आपके घर दफ़्तर को कुचलने आ जायेंगे

हां अनदेखा नहीं किया जा सकता
आज सुबह जब टैंकों की मांग की पहली इत्तला दी तो कुछ सुधिजनों की राय सामने आई कि ऐसी मांगों या बातों को अनदेखा या इग्नोर करना चाहिए।किसे के चाचाजी ने उससे कहा कि इग्नोर करो तो किसे के अब्बू ने। नहीं बिलकुल नहीं, इग्नोर नहीं करना चाहिए। ऐसी उन्मादी बातें बिना पैरों के दौड़तीं हैं और बहुत जल्द समाज की सामूहित चेतना में घर करने लगतीं हैं। स्वतन्त्र चेता लोगों की ज़िम्मेदारी है कि समय पर आगाह करें कि क्या ठीक है क्या नहीं? सिर्फ इग्नोर करने से काम नहीं चलेगा। फिर भी अगर आपको लगता है कि जेएनयू को टैंकों से कुचलना सही है तो आप ऐसा करके देख लीजिये।

बार बार ये लिखना ज़रूरी नहीं है कि JNU में जिन लोगों ने भी देशद्रोही काम किया है उनको माफ़ नहीं किया जा सकता। उनकी सही जगह काल कोठरी ही है।

लेखक डॉ राकेश पाठक डेटलाइन इंडिया के प्रधान सम्पादक हैं.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

दीपक चौरसिया जैसे पत्रकारों के लिए भारतीय संविधान की जगह नागपुरी संविधान ने ले ली है!

दीपक चौरसिया का ‘उन्माद’ और फ़ासीवाद के ख़ूनी पंजों में बदलता मीडिया! जेएनयू में चंद सिरफिरों की नारेबाज़ी को राष्ट्रीय संकट के तौर पर पेश कर रहे न्यूज़ चैनल और अख़बार आख़िर किसका काम आसान कर रहे हैं। हर मोर्चे पर नाकाम मोदी सरकार, संकट से ख़ुद को निकालने के लिए ऐसा करे तो समझ में आता है, लेकिन संपादकों का आलोचनात्मक विवेक कहाँ चला गया ? ऐसा क्यों लग रहा है कि उन्होंने तर्क और विवेक के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ दिया है?

जेएनयू छात्रसंघ का अध्यक्ष कन्हैया एआईएसएफ से जुड़ा है। यह सीपीआई का छात्र संगठन है। कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग मानना और संविधान पर पूरी आस्था रखना, इस पार्टी का घोषित स्टैंड है। ऐसे में कन्हैया के भारत विरोधी नारों का क्या लक्ष्य हो सकता है? यही बात आइसा और एसएफआई के के बारे में भी कही जा सकती है।

लेकिन जेएनयू शिशु मंदिर नहीं है। यहाँ देश में हर तरह की विचारधाराएँ और उनके प्रतिनिधि मौजूद थे। यहाँ दूर-दराज के उन क्षेत्रों से आये विद्यार्थी भी पढ़ते हैं जहाँ अलगाववादी आंदोलनों का असर है। इस विश्वविद्यालय में उन्हें भी अपनी बात कहने का हमेशा से हक़ रहा है। सभा-सेमिनार के ज़रिये वे भी अपनी बात कहते रहे हैं। लेकिन कभी भी वे जेएनयू की मुख्यधारा में शामिल नहीं हो पाये। यह वाद-विवाद और संवाद की वह प्रक्रिया है जिससे कोई लोकतंत्र परिपक्व होता है। यह बिलकुल मुमकिन है कि कश्मीर की आज़ादी को ही एकमात्र विकल्प मानने वाले चंद छात्रों ने ऐसी नारेबाज़ी की हो (बाहरी भी हो सकते हैं, इसकी जाँच होनी चाहिए), लेकिन उनकी बात को समझने और उन्हें समझाना पुलिस नहीं, विश्वविद्यालय की ज़िम्मेदारी है जहाँ वह ज्ञान प्राप्त करने आए हैं।

अमेरिका ने जब वियतनाम पर हमला किया था तो अमेरिकी छात्र अपनी सरकार और सेना के ख़िलाफ़ न्यूयार्क की सड़कों पर नारे लगा रहे थे। इसमें एक नारा वियतनाम के नेता हो ची मिन्ह को भी समर्पित था- हो-हो, हो ची मिन्ह ! अमेरिका में इतनी तमीज़ थी कि उसने इन छात्रों को देशद्रोही नहीं माना। भारत में स्वतंत्र तमिलनाडु की माँग आज़ादी के काफ़ी बाद तक जारी रही। मसला बंदूक से नहीं संवाद से हल हुआ। नगालैंड से लेकर बोडोलैंड तक की स्वतंत्रता की लड़ाई छेड़ने वालों से बातचीत हुई। खालिस्तान को लक्ष्य और इंदिरागाँधी के हत्यारों को शहीद बताने वाले म्यूज़ियम उसी पंजाब में हैं जहाँ बीजेपी सत्ता में बैठी हुई है। गाहे-बगाहे खालिस्तान के नारे भी लगते रहते हैं। अफ़ज़ल गुरु को शहीद मानने वाली पीडीपी के साथ भी बीजेपी कश्मीर में सत्ता चलाती है । वह ऐसा कोई शर्त नहीं रखती कि पहले मुफ़्त़ी लालचौक पर खड़े होकर ‘भारत माता की जय’ कहें फिर उसके विधायक शपथ लेंगे।

याद आता है कि भारत में टीवी पत्रकारिता के पितामह की हैसियत पा चुके एस.पी.सिंह ने गणेश जी को दूध पिलाने के कुचक्र का पर्दाफाश करने में ‘आजतक’ को हासिल तकनीक और मेधा का किस तरह इस्तेमाल किया था। लेकिन उन्हीं के ‘चयनित पत्रकार’ दीपक चौरसिया जब एबीवीपी नेता के कहने पर हिस्टीरियाई अंदाज़ में कन्हैया कुमार को ‘भारत माता की जय” कहने की चुनौती देते हैं (कन्हैया ने भारत की माता, पिता, भाई, बहन ..सबकी जय बोला) तो दयनीय ही नहीं लगते, उन फ़ासीवादी ताकतों के औज़ार में बदलते दिखते हैं जो भारत माता के जयकारे को देशभक्ति की एकमात्र कसौटी बता रहे हैं। वे इस जयकारे को अदालतों में घुसकर पत्रकारों की पिटाई करने का लाइसेंस मानते हैं। कभी हिटलर के हत्यारे भी ‘हेल हिटलर’ को जर्मनी के प्रति वफादारी की एकमात्र कसौटी मानते हुए क़त्ल-ओ-ग़ारत करते थे।

तो क्या दीपक चौरसिया जैसे पत्रकारों के लिए भारतीय संविधान की जगह नागपुरी संविधान ने ले ली है। क्या लट्ठपाणियों की शाखाओं में पढ़ाया जाने वाले पाठ्यक्रम से ही देश चलेगा। मान लीजिए कोई भारत को माता नहीं पिता के रूप मे देखता हो तो क्या उसे देशद्रोही कहा जाएगा? क्या देश काग़ज़ में छपे किसी नक्शे का नाम है या फिर इसका अर्थ यहाँ के लोगों से है!

हे पत्रकारों! देशद्रोही वह है जो स्वतंत्रता संग्राम के संकल्पों के साथ दग़ा कर रहा है। जो संविधान में दर्ज सेक्युलर,समाजवादी और लोकतांत्रिक गणतंत्र के मर्म को बदलने की कोशिश मे जुुटा है। जो एक चुनाव जीतने के लिए दो दंगे करवाने से ग़ुरेज़ नहीं करता ! जो दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों और स्त्रियों को उनका हक़ देने की राह मे हर मुमकिन अड़ंगा लगाता है और रोहित वेमुला जैसे ‘भारत माँ के लाल’ को ख़ुदकुशी के लिए मजबूर कर देता है ! … ग़ौर से देखो, ऐसा हर अपराधी ज़ोर-ज़ोर से भारत माँ का जयकारा लगाता है। दंगों के दौरान भारत की बेटियों का गर्भ चीरने वाले हैवान भी इसी जयकारे पर उल्लासनृत्य करते नज़र आते हैं । माफ़ करना ! ये देशभक्त नहीं, देश के दुश्मन हैं। तुम अपने बारे में सोचो!

पत्रकार पंकज श्रीवास्तव की फेसबुक वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

भिंडरावाले और गोडसे के कितने पूजने वालों को देशद्रोह में जेल भेजा!

जेएनयू प्रकरण पर कुछ सवाल हैं जो मुंह बाए जवाब मांग रहे हैं। मालूम है कि जिम्मेदार लोग जवाब नहीं देंगे, फिर भी। लेकिन उससे पहले नोट कर लें-

1. देश को बर्बाद करने की कोई भी आवाज़, कोई नारा मंजूर नहीं। जो भी गुनाहगार हो कानून उसे माकूल सजा देगा।
2. कोई माई का लाल या कोई सिरफिरा संगठन न देश के टुकड़े कर सकता है न बर्बाद कर सकता है। जो ऐसी बात भी करेगा वो यकीनन “देशद्रोही” है।
3. किसी नामाकूल से या देशभक्ति के किसी ठेकेदार से कोई सर्टिफिकेट नहीं चाहिए।
4. कोई भी किसी भी मुद्दे पर असहमत है तो ये उसका हक़ है। हां कोई भी। कोई माई का लाल असहमति को “देशद्रोह” कहता है तो ये उसकी समझ है।

आइये अब जेएनयू पर बात कर ली जाये। आज़ाद भारत के इतिहास में आधी रोटी पर दाल लेकर दौड़ पड़ने का ये सबसे जीवंत नज़ारा है। उस पर भी दाल में उन्माद का तड़का लग गया है।

1. जेएनयू में एक संगठन ने एक सभा की जिसका वीडियो एक चैनल के पास आया। हंगामाखेज नारेबाजी में पाकिस्तान ज़िंदाबाद और देश की बर्बादी के सुर सुनाई दे रहे हैं।
2. हल्ला मचा और मचना ही चाहिए।उन्माद के ताप में जलती भीड़ ने पूरे जेएनयू को देशद्रोही बता कर हांका लगाना शुरू कर दिया।
3. दूसरे दिन एक और वीडियो आया जिसमें दूसरा पक्ष पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगा रहा है। अगर पहले वीडियो पर इतना भरोसा है तो इस पर भी कर लीजिये।
4. जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज़ हो जाता है जो कि न आयोजक था न भारत विरोधी नारे लगा रहा था।उसका बाद का भाषण कल से अनकट चल रहा है चैनलों पर सुन लीजिये क्या कह रहा है।
5. जिसने भी भारत की बर्बादी के नारे लगाये उसे पकड़ कर मुकदमा चलाइये लेकिन चार, चालीस या चार सौ के किये के लिए पूरी यूनिवर्सिटी को देशद्रोह का अड्डा किस आधार पर कहा जा सकता है?
6. झूठ का सहारा लेकर आग में घी के लिए हाफिज सईद के फ़र्ज़ी ट्विटर से ट्वीट करवा दिया। हद ये है कि दिल्ली पुलिस ने फ़ौरन आगाह कर दिया कि ये ट्वीट फ़र्ज़ी है। देश भर को अलर्ट भी किया।
7. गृह मंत्री शायद इसी फ़र्ज़ी ट्वीट पर भरोसा कर जेएनयू के पीछे हाफिज का हाथ बता रहे हैं। क्या विडम्बना है।

अब ज़रा कुछ और सवाल-

a) देशभक्ति के रंग में ऊभ-चूभ हो रही पार्टी अभी कल तक इस पीडीपी के साथ कश्मीर में सत्ता में थी जो ऐलानिया अफज़ल की आरती उतारती है। महबूब मुफ़्ती और उनके साथ पूरे कश्मीरी अवाम को भी देशद्रोह के मुक़दमे में बंद कब करेंगे? वहां आये दिन पाकिस्तान का झंडा कुछ ज्यादा ही फहरा रहा है। लेकिन फिर भी हर कश्मीरी देशद्रोही नहीं है न, कहा जाना चाहिए।

b) एक मोहतरमा हैं आसिया अंद्राबी। कश्मीर में दुख्तराने- मिल्लत की मुखिया। अभी बीते साल आसिया ने पाकिस्तान का जश्ने आज़ादी मनाया और मोबाइल से ही पाकिस्तान को तकरीर की। क्या हुआ, क्या कोई मुकदमा दर्ज़ हुआ? आपकी ही सरकार थी वहां और कल अगर महबूब एक जरा सा इशारा कर दें तो आप फिर शपथ लेने को उतावले बैठे हैं। तब भूल जायेंगे ये मोहतरमा भी अफज़ल को शहीद मानतीं हैं?

c) जरनैल सिंह भिंडरावाले का नाम याद है क्या ..! आज़ाद भारत का सबसे खतरनाक विद्रोह करने वाला। सबसे बड़ा देशद्रोही। पता है आपको कि पंजाब में आज भी तमाम लोग उसे पूजते हैं।लोग ही क्यों अब तो पंजाब सरकार ने अपने खजाने से उसके नाम पर स्टेडियम भी बनवा दिया है। तो क्या पूरे पंजाब को देशद्रोही मान लेंगे? कुछ किया क्या? एक भी देशद्रोह का मुकदमा? नहीं ना…। क्योंकि वहां भी आप सरकार में हैं।

d) और वो जो गोडसे की पूजा करते हैं ..! उसकी पिस्तौल की फोटू की आरती उतारते हैं ..! 26 जनवरी को काला दिवस मनाते हैं। कितने लोग जेल भेजे गए बताइये तो…! वो देशद्रोह नहीं है क्या?? आप अफज़ल की फांसी के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हैं उसी सुप्रीम कोर्ट ने गौडसे को फाँसी दी थी तो गौडसे को पूजना देशद्रोह नहीं है..?

अरे भाई ये देशद्रोह का ठप्पा भी आप इतना चीन्ह चीन्ह कर चस्पा करेंगे तो ठीक नहीं है…!

तुरंता न्याय पर आमादा भीड़…

अर्द्ध सत्य की आधी रोटी पर उन्माद की दाल लेकर लपलपाती दौड़ रही भीड़ तुरंता न्याय चाहती है। कोई जाँच नहीं, कोई सुनवाई नहीं ,कोई सबूत गवाही नहीं। बस भीड़ के एक अगुआ ने कह दिया है कि नारे लगाने वालों की जीभ काट ली जाये तो दूसरे ने फ़तवा जारी कर दिया है कि गोली मार दी जाये। बस..! एक बार फिर साफ़ कर दिया जाये कि देश की कीमत पर कोई नारा मंज़ूर नहीं है लेकिन झूठ और फरेब से गढ़े जा रहे किसी भी ज़हरीले जाल में फंस कर उन्मादी होना भी गलत ही है। कोई भी ये न भूले कि तुरंता न्याय करने को बौरा रही भीड़  किसी अफवाह से हरहरा कर जिस दिन आपकी घर की सांकल बजाएगी तब आपकी गुहार सुनने वाला कोई नहीं होगा।

लेखक डॉ राकेश पाठक डेटलाइन इंडिया न्यूज पोर्टल के प्रधान संपादक हैं. उनसे संपर्क rakeshpathak0077@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

विकास पाठक ने आरएसएस क्यों छोड़ा और बीबीसी ने इसे अपने यहां क्यों छापा?

विकास पाठक जेएनयू से पढ़े हैं. पत्रकार रहे हैं. इन दिनों शारदा यूनिवर्सिटी में सहायक प्रोफ़ेसर के रूप में कार्यरत हैं. बीबीसी संवाददाता सलमान रावी ने विकास पाठक से उनके संघ से जुड़ने से और अलग होने को लेकर विस्तार से बात की. फिर उस बातचीत को विकास पाठक की तरफ से बीबीसी की वेबसाइट पर प्रकाशित करा दिया. ऐसे दौर में जब मोदी, भाजपा और संघ को हरओर महिमामंडित करने का दौर चल पड़ा है, बीबीसी ने संघ को लेकर एक शख्स की जुड़ाव व विलगाव यात्रा को प्रकाशित कर यह साबित किया है कि चारण-भाट बनने के इस दौर में कुछ सच्चे मीडिया ग्रुप भी हैं. कम्युनिस्ट हों या संघी हों, दोनों को लेकर क्रिटिकल खबरें सामने आनी चाहिए ताकि जनता को, पाठकों को खुद फैसला करने में सहूलियत हो और उन्हें दोनों अच्छे बुरे पहलू पता रहे. नीचे बीबीसी में छपी खबर है.

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया


मैंने संघ क्यों छोड़ा

-विकास पाठक-

मैं अपने परिवार को ‘राष्ट्रवादी’ इसलिए कहता हूँ कि मेरे पिता अर्धसैनिक बल में थे और मैं उसी परिवेश में पला और बड़ा हुआ. पहले इस बात में यक़ीन करता था कि लोग किसी विचारधारा से सहमत होने के बाद ही उससे जुड़ते हैं. मैं उत्तर भारत के एक उच्च जाति के हिंदू परिवार से हूँ. मेरी किशोरावस्था के दौरान रामजन्मभूमि आंदोलन और मंडल आंदोलन अपने चरम पर था. समाज भारतीय जनता पार्टी की ओर झुक रहा था. ख़ासकर वो समाज, जिससे मैं आता हूँ. ‘राष्ट्रवाद’ मेरे परिवार के अंदर था.

स्नातक की पढ़ाई के दौरान संसद में अटल बिहारी वाजपेयी के भाषणों से मैं काफ़ी प्रभावित रहा. लेकिन, जब मैं एमए करने के लिए जेएनयू पहुँचा तो मुझे बड़ा सांस्कृतिक झटका लगा. जेएनयू में कश्मीरी अलगाववादियों को भी बुलाया जाता था, जो मेरे लिए झटके जैसा था. मुझे लगता था कि ऐसा करना राष्ट्रविरोधी है. मुझे यह भी लगने लगा कि साम्यवादी आंदोलन राष्ट्रविरोधी है. इससे मेरा झुकाव अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की ओर होता चला गया. 1998 में ऐसा मौक़ा भी आया जब मैं इसमें पूरी तरह सक्रिय हो गया. धीरे-धीरे मेरी अपनी पहचान विद्यार्थी परिषद के सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में होनी शुरू हो गई. मैं पाँच-छह साल तक विद्यार्थी परिषद से जुड़ा रहा. इस दौरान मैं विद्यार्थी परिषद के वैचारिक पर्चे लिखा करता था. मेरी सक्रियता वैचारिक ही थी. परिषद से जुड़े आंदोलनों से मुझे भावनात्मक समर्थन मिल रहा था और मेरी जान-पहचान भी इससे जुड़े लोगों से ही हो रही थी.

एमफिल और पीएचडी के दौरान मैंने बीसवीं सदी की शुरुआत में हिंदू राष्ट्रवादी आंदोलनों पर अध्ययन करना शुरू किया. इस पर गहन अध्ययन के दौरान बौद्धिक स्तर पर मुझे दो चीज़ें समझ में आईं. पहली ये कि भारतीय राष्ट्रवाद में जनसंघ या भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की कोई भूमिका नहीं थी. हक़ीक़त यह है कि भारतीय राष्ट्रवाद में सबसे अहम भूमिका कांग्रेस की ही थी. शोध के दौरान मुझे भारत की आज़ादी के आंदोलन में संघ की सक्रिय भूमिका का कोई प्रमाण नहीं मिल पाया. बौद्धिक स्तर पर मेरी राष्ट्रवाद की शुरुआती समझ को उसी समय बड़ा झटका लगा. शोध के बाद मैं इस नतीजे पर पहुँचा कि संघ राष्ट्रवाद का एकमात्र प्लेटफॉर्म नहीं है. मगर इसका मतलब क़तई यह नहीं है कि ‘राष्ट्रवाद’ में संघ की भूमिका का हवाला देकर आज भाजपा पर सवाल उठाए जाएं.

शोध के बाद संघ की कमजोरियाँ और ताक़त मेरे सामने खुलकर आने लगीं. मूल रूप से यह आंदोलन हिंदुओं को एकजुट करने का था. हालांकि मैंने संघ से दूरी इस ज्ञान के मिलने के बाद नहीं बनाई. मैं 2004 में संघ से दूर हुआ. जेएनयू से निकलने के बाद मैंने पत्रकारिता की पढ़ाई शुरू की. जेएनयू से संपर्क टूटने के बाद मेरी विचारधारा का संदर्भ भी बदलना शुरू हो गया. जब मैं जेएनयू में था तब विद्यार्थी परिषद मेरे लिए सब कुछ थी. लेकिन अब मैं एक पत्रकार बन रहा था. इससे विद्यार्थी परिषद के साथ जुड़े रहने की मेरी बौद्धिक, वैचारिक और भावनात्मक ज़रूरतें नहीं रहीं. धीरे-धीरे मैं परिषद से दूर होता गया. हालांकि मैं किसी और विपक्षी विचारधारा से भी नहीं जुड़ा.

मैं गांधी की विचारधारा और सावरकर की विचारधारा के बीच के फ़र्क को समझने लगा था. एक की विचारधारा मतभेदों को नज़रअंदाज़ करके जोड़ने वाले बिंदु खोजने की है. महात्मा गांधी का एजेंडा मतभेदों को दूर करने का था. जबकि दूसरे की विचारधारा अपने समुदाय को मजबूत करने की थी. ये एक समुदाय के विकास का मॉडल है जबकि गांधी की विचारधारा सभी समुदायों को साथ लेकर चलने की लगती है. मुझे लगता है कि भारत जैसे विविधताओं वाले देश में साथ चलना वक़्त की ज़रूरत है. मैं गांधीवादी विचारधारा से पूरी तरह प्रभावित हो गया. वक़्त के साथ मेरी रुचि भी बदली और मैं संघ से अलग हो गया.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

कविता कृष्णन मार्का नारीवाद : यौन उत्पीड़न की शिकार पीड़ित छात्रा अगर शिकायत करे तो मार के उसका हाथ तोड़ दो

Samar Anarya : कविता कृष्णन ने सिखाया अपने संगठन को नया नारीवाद। यौन उत्पीड़न करो और पीड़ित शिकायत करने की हिम्मत करे तो मार के उसका हाथ तोड़ दो कि फिर कोई कभी हिम्मत न करे. यही सीख लेकर आइसा नेताओं के खिलाफ यौन शोषण की शिकायत करने वाली छात्रा को आइसा कार्यकर्ताओं ने पीटा। शर्मनाक है यह. वामपंथ के नाम पर सबसे बदनुमा धब्बा। देखें खबर… http://goo.gl/yGnxtW

कथित कामरेड कविता कृष्णन : पाखंडी नारीवाद का पर्दाफाश


 

Samar Anarya : भगवा सलाम श्रीमती कविता कृष्णन और उनकी राजनीति को… जो मामला कामरेड खुर्शीद अनवर के खिलाफ कभी पुलिस तक न गयी, शिकायत में मधु किश्वर का बनाया वीडिओ बंटवा के तो अपने कामरेडों पर यौन उत्पीड़न करने के बाद शिकायत करने की हिम्मत करने वाली लड़कियों पर हमला कर परवान चढ़ती है. आज के नवभारत टाइम्स में प्रतिबद्ध साथी Shahnawaz Malik की स्टोरी…

JNU : झड़प में तीन लड़कियां घायल, इनमें आइसा की दो वर्कर और एनएसयूआई की एक एक्टिविस्ट

शाहनवाज मलिक, नई दिल्ली

जेएनयू के स्कूल ऑफ लैंग्वेज में जनरल बॉडी मीटिंग के दौरान मारपीट हुई है। इसमें आइसा की दो वर्कर और एनएसयूआई की एक एक्टिविस्ट घायल हुई हैं। दोनों पार्टियों ने एक-दूसरे के खिलाफ वसंत विहार पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज करवाई है। एनएसयूआई की चोटिल कार्यकर्ता वही हैं, जिन्होंने जेएनयूएसयू के एक्स प्रेजिडेंट अकबर चौधरी और जॉइंट सेक्रेटरी सरफराज हामिद के खिलाफ जीएसकैश में शिकायत दर्ज करवाई थी। गुरुवार तक जेएनयू के 13 स्कूलों में कनविनर रिपोर्ट पेश की जा चुकी थी। शुक्रवार को कनविनर रिपोर्ट पेश करने के लिए स्कूल ऑफ लैंग्वेज में आखिरी मीटिंग बुलाई गई। वहीं आइसा और एनएसयूआई के बीच भिड़ंत हो गई। एनएसयूआई कार्यकर्ता का आरोप है कि आइसा के वर्करों ने उनपर बदले की भावना से हमला किया है। रात 8:30 बजे आइसा की शहला राशिद ने उनपर फब्तियां कसीं। फिर शहला, विशाखा, चिंटू कुमारी समेत आठ वर्करों ने बाल पकड़कर उनकी पिटाई की। उनके हाथ और पांव में चोट लगी है। शिकायतकर्ता के मुताबिक उन्होंने फौरन पीसीआर और एंबुलेंस को कॉल किया। एम्स ट्रॉमा सेंटर में रात 12 बजे उनका मेडिकल हुआ। शनिवार की सुबह वसंत विहार पुलिस स्टेशन ने आइसा के 8 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई। आरोपियों में चिंटू कुमारी, विशाखा सिंह, रितिका, शहला राशिद, आशुतोष कुमार, अनंत, शशिभूषण आजाद और ओम प्रसाद शामिल हैं। कथित हमले के बाद एबीवीपी ने रात 10 बजे वसंत विहार थाने के बाहर आइसा के खिलाफ प्रोटेस्ट भी किया। एबीवीपी सचिव अभिजीत पांडेय ने कहा है कि लगातार यूनियन इलेक्शन जीत रही आइसा के खिलाफ इस बार इंटी इनकमबेंसी का माहौल है। इस बात से भड़के वर्कर मारपीट पर उतारू हो गए हैं। वहीं आइसा ने एनएसयूआई शिकायतकर्ता के आरोपों को झूठा करार दिया है। ओम प्रसाद के मुताबिक चिंटू कुमारी और शहला राशिद पर एनएसयूआई कार्यकर्ताओं ने हमला किया।

Samar Anarya : आइसा वाले GSCASH का हवाला दे रहे हैं? तब कहाँ चली गयी थी ये नैतिकता जब प्रेजिडेंट और ज्वाइंट सेक्रेटरी ने सरे नियम तोड़ते हुए ‘हमारे ऊपर आरोप है’ वाला पोस्टर जारी कर दिया था. वाह. प्रेजिडेंट और सह सचिव GSCASH के सारे नियम तोड़ पोस्टर जारी कर दें, शिकायतकर्ता पर दबाव बनाने की कोशिश करें और आइसा वाले कहें कि माफ़ी मांग ली गलती के लिए तो क्या इससे बात खत्म? प्रेजिडेंट साहब को नियम पता नहीं थे? या टाडा ने समझाया था कि इससे लड़की डर जायेगी।

क्या खूब हैं कविता कृष्णन के कुत्सित कुतर्क : यौन उत्पीड़क इनकी पार्टी का हुआ तो उसके सौ खून माफ! 


Madan Tiwary : साम्यवादियो को आत्मनिरिक्षण की जरुरत है। कविता कृष्णन ने जेएनयू के आइसा (माले का छात्र संगठन) के दो छात्र नेताओं पर लगे छेड़खानी के आरोप में उनका बचाव किया था.. परिणाम लंपटों की हिम्मत बढ़ गई.. उन्होंने आरोप लगाने वाली लड़की के साथ मारपीट की… मामला थाने पहुंचा और केस भी दर्ज हुआ। देखें खबर… http://goo.gl/yGnxtW

Yashwant Singh : ये वही क्रांतिकारी छात्र संगठन है जिसकी सबसे बड़ी नेता कविता कृष्णन कही जाती हैं और ये कविता कृष्णन टीवी चैनलों पर नारीवाद के पक्ष में लेक्चर देती हुई पाई जाती हैं… वो कहते हैं न, खुद के घर नहीं दाने, अम्मा चलीं भुनाने… चैनल वाले कविता कृष्णन जैसे हिप्पोक्रेट्स को मंच क्यों देते हैं जिनके हाथ खुद महिला शोषण-उत्पीड़न में रंगे हुए हैं… कम से कम यह खबर तो यही साबित करती है कि यौन उत्पीड़न की शिकायत करने वाली छात्रा का जानबूझ कर और साजिशन उत्पीड़न किया जा रहा है ताकि वह हार मान ले और चुप बैठ जाए… देखें खबर… http://goo.gl/yGnxtW

Satyaprakash Gupta हाथों को हवा में उड़ा -उड़ा कर और हथेलियों को बंद मुठ्ठियों में तब्दील कर ज़ोर-ज़ोर से नारा लगाने का काम JNU परिसर में हम सबने किया है ! बहुत दुख होता है की ऐसी शर्मनाक घटना होती है और उसे कम्यूनल रंग दिया जाता है ! मैने अपने समय में कयी ऐसे cadres को देखा है, जिन्होनें गलतियाँ की और संगठन ने तुरंत उन्हें निलंबित कर दिया या बाहर का रास्ता दिखा दिया ! एक वामपंथी क्रांतिकारी संगठन को ऐसे लोगों को बचाने के लिये मार-पीट करना पड़े, पीड़िता को trauma-centre जाना पड़े, पूरे प्रसंग को साम्प्रदायिक रंग दे दिया जाये …ना बाबा ना ..ये तो JNU नहीं है लगता है देश का कोई कस्बाई कॉलेज बन गया हो ! भाई लोग, ये वही campus है जहां कुत्तों या उनके पिल्लों को लात से मारने या उनपर चिल्लाने पर pamphlet निकलता हो, वहा मारपीट होती है और उस पर भी पीड़िता को. AISA इस campus को दक्षिणपंथियों के हाथ सौंप देगा ..अब अहसास हो गया है ! JNU को जानदार लेफ्ट-डेमॉक्रेटिक, हिंसा-मुक्त और निर्भीक परिसर में तब्दील करने में बहुत ही प्रगतिशील, जनवादी, जनतांत्रिक और आधुनिक छात्र-छात्रों, शिक्षकों का हाथ रहा है, वो दूर से देख रहे हैं और हम भी देख रहे हैं की किस तरह से AISA इस मूविंग campus को fossilized campus में तब्दील कर दिया है ! किस तरह इसके क्रांतिकारी पोलित ब्यूरो के सदस्य कविता कृष्णन ने इस campus से alumni कॉमरेड खुर्शीद अनवर की जान ले ली ! दिल्ली में मुम्बई कहाँ है तो हम गर्व से कहते हैं, चले जाओ JNU CAMPUS, छात्र-छात्राएं CAMPUS में निर्भीकता से रात-रात भर घूमते हैं, सब महफूज़ लेकिन AISA ने इसे एक गिरोह में तब्दील कर दिया है जिसे दक्षिणपंथ के हाथों में देने की सारी तैयारियां कर दी गयी है! कुछ लोग कहते हैं कि Is this conspiracy against AISA? The victim was an AISA member when she was sexually molested by the great ultra-leftist President and Jt Secretary. Later on, she left AISA and joined NSUI. So politics will prevail over it and AISA has initiated this trend only. AISA has given entire episode a communal colour too. I got information from Campus and that’s why, I am writing it over here.

साभार- फेसबुक

जेएनयू के यौन उत्पीड़न प्रकरण को जानने और कथित नारीवादी कविता कृष्णन की असलियत को समझने के लिए इसे भी पढ़ें…

छेड़छाड़ करने वालों को बचाने में जुटी कविता कृष्णन की असलियत बयान की जेएनयू के सत्यप्रकाश ने

xxx

आइसा नेताओं के खिलाफ यौन शोषण की शिकायत करने वाली छात्रा को आइसा कार्यकर्ताओं ने पीटा

xxx

मदन ने कविता कृष्णन से चैट को एफबी पर डाला तो भड़क उठी पाखंडी नारीवादी, किया ब्लॉक

 xxx

यशवंत पर लड़की छेड़ने का एफआईआर कराया इसीलिए वह मेरा विरोधी बन गया है : कविता कृष्णन

xxx

कविता कृष्णन और गैंग का असल सच

xxx

‘तहलका’ में पेशेवर आंदोलनकारियों पर निशाना, पढ़िए कविता कृष्णन की दास्तान

xxx

श्रुति और उत्पला के सवालों का जवाब देने से डर क्यों रही भाकपा माले लिबरेशन की कविता कृष्णन?

xxx

जेएनयू यौन शोषण कांड : कुछ तो है जो Kavita Krishnan गैंग छुपा रहा है…

xxx

यौन प्रताड़ना के आरोपी जेएनयू अध्यक्ष अकबर चौधरी और संयुक्त सचिव सरफराज हामिद को पद छोड़ना पड़ा

xxx

क्या आपने इस मुद्दे पर कम्युनिस्टों की सुपारी किलर Kavita Krishnan का कोई बयान सुना?

xxx

Kavita Krishnan जैसी तथाकथित नारीवादियों का स्टैंड उनकी असलियत बेनकाब कर देता है : समर

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

आइसा नेताओं के खिलाफ यौन शोषण की शिकायत करने वाली छात्रा को आइसा कार्यकर्ताओं ने पीटा

Samar Anarya : आइसा नेताओं के खिलाफ यौन शोषण की शिकायत करने वाली छात्रा को आइसा कार्यकर्ताओं ने पीटा? वह भी इतना कि लड़की ट्रामा सेंटर में भर्ती है. स्तब्ध हूँ इस खबर से. कोई सच बतायेगा? जागरण की वेबसाइट पर यह खबर अभी दिख रही है-

यौन शोषण का आरोप लगाने वाली जेएनयू छात्रा की पिटाई

जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। देश के प्रतिष्ठित जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में एक छात्रा के साथ ऑल इंडिया स्टूडेंट एसोसिएशन (आइसा) के कार्यकर्ताओं द्वारा शुक्रवार देर शाम मारपीट का मामला सामने आया है। लड़की को एम्स के ट्रामा सेंटर में भर्ती कराया गया है। बताया जाता है कि यह वही लड़की है, जिसने छात्र संघ पदाधिकारी अकबर चौधरी व सरफराज पर यौनशोषण का आरोप लगाया था, जिसकी जांच विश्वविद्यालय की आंतरिक समिति जेंडर सेंसटाइजेशन कमेटी अगेंस्ट सेक्सुअल हेरासमेंट में चल रही है।

आइसा के एक पदाधिकारी का कहना है कि एनएसयूआइ के कार्यकर्ताओं ने उनके कार्यकर्ता चिंटू, शहला व दो और को पीटा था। चिंटू को भी ट्रामा सेंटर ले जाया गया है। इस बीच, आइसा व एबीवीपी के कार्यकर्ता देर रात तक वसंतकुंज थाने के सामने एफआइआर के लिए डटे रहे। छात्रा के साथियों ने बताया कि जब से छात्रा ने छात्र संगठन पदाधिकारियों के ऊपर यौन शोषण का आरोप लगाया है, तभी से आइसा के कार्यकर्ता लगातार उसे परेशान कर धमकी दे रहे थे।

xxx

Samar Anarya : खबर सही है. जेएनयूएसयू अध्यक्ष और संयुक्त सचिव पर शिकायत दर्ज कराने वाली महिला पर हमला करने के जुर्म में आइसा के 8 कार्यकर्ताओं पर एफआईआर. क्रान्ति का यह नया रास्ता है कोई शायद। लड़की पे हमला! यह तो लेफ्ट का काम नहीं बनता। और एनएसयूआई और एबीवीपी तो करते ही रहे हैं। हम भी उन जैसे हो जायेंगे?

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारवादी अविनाश पांडेय ‘समर’ के फेसबुक वॉल से.

संबंधित खबर…

छेड़छाड़ करने वालों को बचाने में जुटी कविता कृष्णन की असलियत बयान की जेएनयू के सत्यप्रकाश ने

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

छेड़छाड़ करने वालों को बचाने में जुटी कविता कृष्णन की असलियत बयान की जेएनयू के सत्यप्रकाश गुप्ता ने

Satyaprakash Gupta : Please do not communalize JNU Campus for the sake of saving alleged molesters. JNU Campus is in state of turmoil because of sexual harassment of a fellow girl by JNUSU President and Joint-Secretary. Student Community is raising a series of poignant questions before AISA , a student outfit of CPI(ML),regarding molestation and this has enlivened the case of late Khurshid Anwar who was not given a chance to prove himself clean.

CPI(ML) ‘s top ranking genuine feminist leader Kavita Krishnan and her fellow ideologues created such an unbearable situation through TV Channels and social sites against Khurshid. But JNU administration has put up this heinous case to varasity’s most popular legal organ GENDER SENSITISATION COMMITTEE AGAINST SEXUAL HARRASMENT(GSCASH).

JNUSU, JNUTA, STAFFS,AISA, SFI ,AISF, and other student political outfits and student community have been trusting in the verdict of GSCASH but all of a sudden, AISA and its political boss have communalized the issue by alleging that President and Joint-Secretary belong to minority community and that’s why, the case of molestation has been framed, plotted against its organization and opponents are making effort of maligning the image of AISA. This doubt may exist but let these two top office – bearers of JNUSU go through the proceedings of GENDER SENSITISATION COMMITTEE AGAINST SEXUAL HARRASMENT( GSCASH). Let them come out clean but do not doubt this committee and do not communalize the democratic and secular campus.

The student community and AISF councillor Rahila Khan have asked AISA and its supreme patron leader Kavita Krishnan as to why these two allegedly accused molesters should not die as Kavita remarked in case of late Khurshid Anwar who lodged a case of defamation with Police. Late Khurshid Anwar’s request these ultra-leftists for not tarnishing his prestige but they did not give him respite time to go through legal proceedings. Khurshid had been critical of hypocrisy of AISA and its patron like Kavita Krishnan and few more. His death by suicide was aggravated by a mental revenge of radical feminist comrade Kavita Krishnan. Is this a communist character of members of ultra –communist party ?

JNU campus is stunned as to how harbingers of revolution would commit such an undignified act against woman. A cyclone is blowing and uprooting the base of AISA. AISA is trying to save its face to make this sensitive issue communal. This is really an heinous and sordid happening and it has tattered the dignity of JNU and JNUSU too .

This new game of AISA has infuriated the students in the campus. The victim girl was an AISA member and at the time of sexual harassment, the victim was in AISA. Later on, she left organization when she did not get justice. She brought this case to the notice of campus .As a result, campus is agitating against AISA and alleged sexual offenders.

AISF leader and councillor RAHILA KHAN brought out pamphlet against the pseudo – secularism of AISA . Muslim students are also not happy with AISA ‘s new step of saving its office-bearers.

AISA keeps weakening the Left student organizations everywhere in India , claiming that it is a real frontrunner leftist revolutionary that will bring about radical change in Indian state. Student leader Chandrashekhar was in AISF. He joined AISA that has never mentioned in a book or in film on him that his political journey had begun from AISF and he joined CPI in Bihar. Chandrashekhar was a AISF leader in Bihar.

I had never paid any heed of confiscation of votes of minority community in the campus to make AISF win in Election of student union of JNU. I remember a case of barbarous assault upon Pro-vice Chancellor Professor Mushirul Hasan by Muslim fanatics in Jamia Milia University,New Delhi when he manifested his view on the ban of Salman Rushdee’s book SATANIC VERSUS . Professor Hasan was escorted to JNU Campus by secular, leftist and democratic students but all the left Student outfits and other student outfits kept mum over this issue except AISF. Because they did not want to lose three hundred minority votes. I brought out a pamphlet supporting professor Hasan that opponent had right to ask questions in stead of assaulting upon him. AISF lost its General Secretary post in forthcoming JNUSU election instead of losing its left and secular character. AISF opposed Puja( Prayer) celebrations at various places in the campus, that led to sense of regionalism and one month long healthy post-dinner discussion took place on religion and culture to shun down regionalism . During my time of Jawaharlal Nehru University, New Delhi, I worked for the construction labourers whose wages were not paid to them by contractors in the campus and as an AISF member, I fought against them with the help of student community, AISF and SFI. But ultra-independent Left had never recognized my struggle against exploiters.

I have seen the mercurial role of AISA during Mandal agitation in the campus in particular and in country in general. This was a feudal feature of AISA that attracted anti-Mandalites of Left student outfits.
Now communalization of the gender harassment case has stunned me. I feel ashamed of being a left supporter. CPI(ML) General Secretory Dipankar Bhattacharya must take care of such sensitive issue, who has just participated into a centenary celebration of late comrade C.Rajeshwar Rao who fought against landlords of Telangana, freeing thousands of bonded labourers.Thousands of acre farming land were distributed to landlord. Comrade Dipankar addressed the huge gathering for formation of broader Left Front. But my question is how Left Unity or Broader left front will emerge if Left party or its mass organization will weaken to each other.

Khurshid will not come back but do not weaken left and democratic fervour of JNU Campus by infusing communal venom to protect alleged molesters.

जेएनयू के सत्यप्रकाश गुप्ता के फेसबुक वॉल से.

उपरोक्त स्टेटस पर बिहार के गया जिले के वकील मदन तिवारी लिखते हैं…

Madan Tiwary : सत्यप्रकाश गुप्ता जी के इस पोस्ट देश के उन सभी बुद्धिजीवियों को पढ़ना चाहिए जिन्हें इस बात की चिंता है कि आखिर क्यों सर्वहारा की बात करने वालों का समर्थन कम होते जा रहा है। चूंकि यह पोस्ट अंग्रेजी में है इसलिए थोड़ी दिक्कत हो सकती है। मैं इसका हिंदी अनुवाद कल शाम तक देने का प्रयास करूंगा। वैसे संक्षेप में दो बातों का जिक्र इन्होंने किया है। वोट के लिए सांप्रदायिक चरित्र अपनाना और अपने दल से जुड़े लोगों का बचाव करना। दीपांकर के लिये भी यह लेख चुनौती है, उन्हें जवाब देना पड़ेगा।

संबंधित अन्य खबरें…

मदन ने कविता कृष्णन से चैट को एफबी पर डाला तो भड़क उठी पाखंडी नारीवादी, किया ब्लॉक

 xxx

यशवंत पर लड़की छेड़ने का एफआईआर कराया इसीलिए वह मेरा विरोधी बन गया है : कविता कृष्णन

xxx

कविता कृष्णन और गैंग का असल सच

xxx

‘तहलका’ में पेशेवर आंदोलनकारियों पर निशाना, पढ़िए कविता कृष्णन की दास्तान

xxx

श्रुति और उत्पला के सवालों का जवाब देने से डर क्यों रही भाकपा माले लिबरेशन की कविता कृष्णन?

xxx

जेएनयू यौन शोषण कांड : कुछ तो है जो Kavita Krishnan गैंग छुपा रहा है…

xxx

यौन प्रताड़ना के आरोपी जेएनयू अध्यक्ष अकबर चौधरी और संयुक्त सचिव सरफराज हामिद को पद छोड़ना पड़ा

xxx

क्या आपने इस मुद्दे पर कम्युनिस्टों की सुपारी किलर Kavita Krishnan का कोई बयान सुना?

xxx

Kavita Krishnan कविता कृष्णन जैसी तथाकथित नारीवादियों का स्टैंड उनकी असलियत बेनकाब कर देता है : समर

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

कविता कृष्णन और गैंग का असल सच

Samar Anarya : तरुण तेजपाल और खुर्शीद अनवर मामले में तथ्यों की, तर्क की बात करने वाले सेकुलर रेप के समर्थक थे और शिकायतकर्ता (उनके लिए ‘पीड़िता”) का बयान अंतिम सत्य – कविता कृष्णन और गैंग। अब उनकी पार्टी के अकबर चौधरी और सरफ़राज़ हामिद के ऊपर यौन हिंसा का आरोप लगने पर श्रीमती कविता कृष्णन उनके बचाव में उतर आई हैं, ‘पीड़िता’ को शिकायतकर्ता बता रही हैं, उसके दूसरी पार्टी से जुड़े होने को लेकर उसके ऊपर अनर्गल आरोप लगा रही हैं. और उनकी समर्थक ‘नारीवादियां’ इस मुद्दे को उठा देने वालों को मानहानि की धमकी दे रही हैं. जाने दो जी, तुमसे न हो पायेगा, हो पाता तो मैंने कोई सच छोड़ा है? मुझ पर कर न पाये। जाओ, अपने सेकुलर रेपिस्टों को बचाओ, उन्हें जिन्होंने यौन हिंसा के लिए इस्तीफ़ा देकर जेएनयूएसयू की शानदार परम्परा को चार (लाल?) चाँद लगा दिए हैं. ( अविनाश पांडेय समर के फेसबुक वॉल से.)

Shashwat Mishra : पहले नए उपजे धर्मनिरपेक्ष राजनीतिज्ञों ने हमें धर्मनिरपेक्षता सिखाई अब कविता कृष्णन और मधु किश्वर नारीवाद की नयी परिभाषा गढ़ रहीं हैं। डर है कहीं अकबर चौधरी और शाहनवाज़ साहब के लिए वो यौन हिंसा और पीडिता बनने के नए नियम न जारी कर दें। एक नियम का उलंघन तो वो पहले ही कर चुकी हैं अब तक चौधरी साहब की “मार्मिक” सीडी मार्किट में नहीं आई। (शाश्वत मिश्रा के फेसबुक वॉल से)

इन्हें भी पढ़ सकते हैं…

क्या आपने इस मुद्दे पर कम्युनिस्टों की सुपारी किलर Kavita Krishnan का कोई बयान सुना?

xxx

‘तहलका’ में पेशेवर आंदोलनकारियों पर निशाना, पढ़िए कविता कृष्णन की दास्तान

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

जेएनयू यौन शोषण कांड : कुछ तो है जो Kavita Krishnan गैंग छुपा रहा है…

Samar Anarya : जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष और संयुक्त सचिव पर आरोपों के बारे में कुछ खरी खरी… कल तक लोगों पर पीड़िता का चरित्रहनन करने का आरोप लगाने वाली कविता कृष्णन जैसी फर्जी टीआरपी खोर नारीवादी इस मामले में शिकायतकर्ता को दूसरी पार्टियों का सदस्य बता के उसका चरित्रहनन कर रही हैं. सच यह है कि वह लेफ्ट सर्कल्स की ही नहीं,बल्कि उनकी पार्टी आइसा की ही करीबी रही है. दूसरी बात यह कि GSCASH शिकायत लेने के पहले स्क्रीनिंग करता है और प्रथम दृष्टया सबूत होने पर ही केस स्वीकार करता है. फिर अध्यक्ष और संयुक्त सचिव को इस्तीफ़ा क्यों देना पड़ा? कुछ तो है जो कविता कृष्णन गैंग छुपा रहा है?

Kavita Krishnan

तीसरी यह कि कामरेड खुर्शीद अनवर के मामले में मधु किश्वर का बनाया वीडिओ देश भर बंटवाने वाली ही नहीं बल्कि इंडिया टीवी के शो में मधु किश्वर के साथ बैठने वाली कविता कृष्णन अब खामोश क्यों हैं? भारत में बलात्कार करने का लाइसेंस देने प्राधिकार उन्हीं के पास है क्या? माने उनके साथ हो तो बलात्कार करो, मैडम बचा लेंगी? ठीक वैसे जैसे इसके पहले भी हिंदी के एक प्रोफ़ेसर को पार्टी मेंबर होने के चलते बचाया था? भरी यूजीबीएम में? और अंत में, कितने कामरेडों की हत्या करेगा यह गैंग? इलाहाबाद में पति के दूसरी वामपंथी पार्टी ज्वाइन कर लेने की वजह से एक महिला कामरेड को उनके पार्टी ऑफिस से धक्के मार के निकाल देने से लेकर पोलित ब्यूरो तक में मर्दवादी लोगों का बचाव करने तक कहाँ तक जायेगा यह गैंग? [यह पूरी जिम्मेदारी से बोल रहा हूँ. कविता कृष्णन गैंग और उसके मुख्य गुर्गे दिल्ली यूनिवर्सिटी के जहरीले प्रोफ़ेसर आशुतोष कुमार तक को मेरे ऊपर आपराधिक मानहानि के मुकदमे की चुनौती के साथ. कामरेड खुर्शीद का न्याय लेने के लिए मुझे कुछ भी गँवाना मंजूर है हत्यारों, बाकी तुमसे मुकदमा हो न पायेगा]

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारवादी अविनाश पांडेय ‘समर’ के फेसबुक वॉल से.

संबंधित खबरें…

कविता कृष्णन जैसी तथाकथित नारीवादियों का स्टैंड उनकी असलियत बेनकाब कर देता है : समर

xxx

क्या आपने इस मुद्दे पर कम्युनिस्टों की सुपारी किलर Kavita Krishnan का कोई बयान सुना?

xxx

जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष अकबर चौधरी और संयुक्त सचिव सरफराज पर यौन शोषण का आरोप

xxx

यौन प्रताड़ना के आरोपी जेएनयू अध्यक्ष अकबर चौधरी और संयुक्त सचिव सरफराज हामिद को पद छोड़ना पड़ा

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

क्या आपने इस मुद्दे पर कम्युनिस्टों की सुपारी किलर Kavita Krishnan का कोई बयान सुना?

Samar Anarya : जेएनयूएसयू के अध्यक्ष और संयुक्त सचिव ने यौन हिंसा का आरोप लगने के बाद इस्तीफा दिया. मगर आपने इस मामले में जहरीले प्रोफ़ेसर आशुतोष कुमार और टीवी नारीवादी और कम्युनिस्टों की सुपारी किलर कविता कृष्णन का कोई बयान सुना? कामरेड खुर्शीद अनवर मामले में तो ये दोनों देश भर में आरोपों की सीडी का प्रदर्शन प्रायोजित और फंड कर रहे थे. इस बार ऐसी चुप्पी क्यों? इसलिए कि आरोपी इनकी पार्टी के सदस्य हैं?

अगर आपकी फेसबुक फ्रेंड लिस्ट में हों तो इन दोनों हत्यारों से इनकी चुप्पी का राज पूछें. आपको इनका असली चेहरा दिखाई देगा. विद्रूप, घटिया और संघी दलाल चेहरा. [बाकी निश्चिन्त रहिएगा, मैं इनकी ऐसी मानहानि करता रहूँगा, मुझे खुद पर मुकदमे का इन्तेजार तो है पर इनसे हो न पायेगा].

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारवादी अविनाश पांडेय ‘समर’ के फेसबुक वॉल से.

इसे भी पढ़ें…

यौन प्रताड़ना के आरोपी जेएनयू अध्यक्ष अकबर चौधरी और संयुक्त सचिव सरफराज हामिद को पद छोड़ना पड़ा

xxx

कविता कृष्णन जैसी तथाकथित नारीवादियों का स्टैंड उनकी असलियत बेनकाब कर देता है : समर

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें: