भंसाली को स्वरा की चिट्ठी… आपकी फिल्म देखकर ख़ुद को मैंने महज एक योनि में सिमटता महसूस किया

प्रिय भंसाली साहब,

सबसे पहले आपको बधाई कि आप आखिरकार अपनी भव्य फिल्म ‘पद्मावत’- बिना ई की मात्रा और दीपिका पादुकोण की खूबसूरत कमर और संभवतः काटे गए 70 शॉटों के बगैर, रिलीज करने में कामयाब हो गए. आप इस बात के लिए भी बधाई के पात्र हैं कि आपकी फिल्म रिलीज भी हो गई और न किसी का सिर उसके धड़ से अलग हुआ, न किसी की नाक कटी. और आज के इस ‘सहिष्णु’ भारत में, जहां मीट को लेकर लोगों की हत्याएं हो जाती हैं और किसी आदिम मर्दाने गर्व की भावना का बदला लेने के लिए स्कूल जाते बच्चों को निशाना बनाया जाता है, उसके बीच आपकी फिल्म रिलीज हो सकी, यह अपने आप में बहुत बड़ी बात है. इसलिए आपको एक बार फिर से बधाई.

आप इसलिए भी बधाई के हकदार हैं, क्योंकि आपके सभी कलाकारों- प्रमुख और सहायक, ने गजब का अभिनय किया है. और बेशक, यह फिल्म किसी अतिभव्य, आश्चर्यचकित करनेवाले नजारे की तरह थी. लेकिन बात यह भी है कि हर चीज पर अपनी छाप छोड़ देनेवाले आपके जैसे शानदार फिल्म निर्देशक से यही उम्मीद की ही जाती है. बहरहाल सर, हम दोनों एक दूसरे को जानते हैं. मुझे नहीं पता कि आपको यह याद है या नहीं, लेकिन मैंने आपकी फिल्म गुजारिश  में एक छोटा सा किरदार निभाया था. ठीक-ठीक कहूं, तो उसमें मेरी भूमिका दो दृश्यों की थी. मुझे याद है कि मेरे संवादों को लेकर मेरी आपसे एक छोटी सी बातचीत हुई थी और आपने संवादों को लेकर मेरी राय पूछी थी.

मुझे याद है कि मैं एक महीने तक इस बात पर गर्व महसूस करती रही कि संजय लीला भंसाली ने मुझसे मेरी राय पूछी थी. मैंने एक दृश्य में आपको जूनियर कलाकारों को और दूसरे में जिमी जिब ऑपरेटर को शॉट की बारीकी के बारे में उत्तेजित होकर समझाते हुए देखा. और मुझे याद है, उस समय मेरे मन में ख्याल आया था- ‘वाह, यह आदमी अपनी फिल्म की छोटी सी छोटी बारीकी की वास्तव में परवाह करता है.’’ मैं आपसे काफी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकी थी.

मैं आपकी फिल्मों के उत्साही दर्शकों में से हूं और जिस तरह से आप अपनी हर फिल्म से अपने ही बनाए गए मानकों को और ऊपर उठाते हैं और जिस तरह से आपके समर्थ निर्देशन में सितारे जानदार, गहरे अभिनेताओं में तब्दील हो जाते हैं, वह बात मुझे आश्चर्यचकित करती है. यादगार प्रेम कहानी कैसी होनी चाहिए, इसको लेकर मेरे विचारों को गढ़ने में आपकी भूमिका रही है. मैं उस दिन का सपना देखा करती थी जब आप मुझे किसी फिल्म के मुख्य किरदार के तौर पर निर्देशित करेंगे. मैं आपकी फैन थी और फैन हूं.

और मैं आपको यह बताना चाहूंगी कि मैंने वास्तव में आपकी फिल्म के लिए लड़ाई लड़ी. उस समय जब इसे पद्मावती  से ही पुकारा जा रहा था. मैं बताना चाहूंगी कि मैंने लड़ाई के मैदान में तो नहीं लेकिन ट्विटर टाइमलाइन पर लड़ाई जरूर लड़ी, जहां ट्रॉल्स से मेरा झगड़ा हुआ, लेकिन फिर भी मै आपके लिए लड़ी. मैंने टीवी कैमरा के आगे वे बातें कहीं, जो मुझे लग रहा था कि आप 185 करोड़ रुपये फंसे होने के कारण नहीं कह पा रहे थे. यहां इसका प्रमाण हैः

और मैंने जो कहा, उस पर पूरी सच्चाई के साथ यकीन किया. मैंने पूरी सच्चाई के साथ यह यकीन किया कि और आज भी करती हूं कि इस देश के हर दूसरे व्यक्ति को वह कहानी कहने का हक है, जो वह कहना चाहता है और जिस तरह से कहना चाहता है. वह अपनी नायिका के पेट को जितना चाहे उघाड़ कर दिखा सकता है और ऐसा करते उन्हें अपने सेटों को जलाए जाने का, मारपीट किए जाने, अंगों को काटे जाने, जान जाने का डर नहीं सताएगा.

साथ ही, साधारण शब्दों में कहें, तो लोगों के पास फिल्म बनाने और उसे रिलीज करने की क्षमता बची रहनी चाहिए और बच्चों के सुरक्षित तरीके से स्कूल जाने पर कोई आंच नहीं आनी चाहिए. और मैं चाहती हूं कि आप यह जानें कि मैं सचमुच चाहती थी कि आपकी फिल्म को जबरदस्त कामयाबी मिले. यह बॉक्स ऑफिस पर कामयाबी के सारे रिकॉर्ड तोड़ दे. इस फिल्म की कमाई अपने आप में करणी सेना के आतंकवादियों और उससे सहानुभूति रखनेवालों के चेहरे पर किसी तमाचे की तरह होती. और इसलिए काफी उत्साह और काफी पूरी गर्मजोशी के साथ मैंने पद्मावत के पहले दिन के पहले शो का टिकट बुक कराया और अपने पूरे परिवार और कुक को साथ लेकर फिल्म को देखने गई.

शायद फिल्म के साथ इस जुड़ाव और इस सरोकार के कारण ही इसे देखने के बाद मैं सन्न रह गई. और शायद इसी कारण मैं आपको आजाद होकर लिखने का दुस्साहस कर रही हूं. मैं अपनी बात सीधे और संक्षेप में कहने की कोशिश करूंगी, वैसे तो कहने के लिए काफी कुछ है.

-सर, बलात्कार होने के बाद भी स्त्री के पास जिंदा रहने का अधिकार है.
-पतियों और उनकी यौनिकता के पुरुष रक्षकों, स्वामियों, नियंत्रकों… चाहे जिस रूप में आप पुरुष को देखना चाहें..की मृत्यु के बाद भी स्त्री को जीने का अधिकार है.
-पुरुष जीवित हों या न हों, स्त्रियों को इस तथ्य से स्वतंत्र होकर जीने का अधिकार है.
-स्त्री के पास जिंदा रहने और मासिक धर्म का अधिकार है.

यह वास्तव में काफी बुनियादी बात है. कुछ और बुनियादी बिंदु इस तरह हैं:

-स्त्रियां चलती-फिरती, बतियाती योनियां नहीं हैं.
-हां, स्त्रियां योनियां धारण करती हैं, मगर वे इससे कहीं ज्यादा हैं. इसलिए उनके पूरे जीवन को योनि से बाहर रखकर, उसे नियंत्रित करने, उसकी हिफाजत करने और उसका रख-रखाव करने से बाहर रखकर देखे जाने की जरूरत है. (हो सकता है कि 13वीं सदी में ऐसा होता रहा हो, लेकिन 21वीं सदी में ऐसे विचारों का अनुसरण करने की हमे कोई जरूरत नहीं है. और हमें इसका महिमामंडन तो निश्चित तौर पर नहीं करना चाहिए.)
-यह अच्छा होता अगर योनियों का सम्मान किया जाता, मगर अगर दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से ऐसा न हो, तो भी स्त्रियां अपना जीवन जी सकती हैं. उन्हें सजा के तौर पर इस कारण मृत्यु देने की जरूरत नहीं है कि दूसरे व्यक्ति ने उसकी मर्जी के खिलाफ उसकी योनि का अपमान करने की जुर्रत की.
-योनि के बाहर भी जिंदगी है इसलिए बलात्कार के बाद भी एक जीवन हो सकता है. (मुझे मालूम है कि मैं यह दोहरा रही हूं, लेकिन इस पर जितना जोर दिया जाए, कम है.)
-सामान्य शब्दों में कहें, तो जीवन में योनि के अलावा भी काफी कुछ है.

आप यह सोच कर परेशान हो रहे होंगे कि आखिर मैं इस तरह से योनि में ही क्यों अटक गई हूं… क्योंकि सर, आपकी भव्य फिल्म को देखने के बाद मुझे योनि जैसा होने का एहसास हुआ. मुझे ऐसा लगा कि मैं महज एक योनि में सीमित कर दी गयी हूं. मुझे ऐसा लगा कि पिछले कई वर्षों में स्त्रियों और स्त्री आंदोलनों ने जो ‘छोटी-मोटी’ सफलताएं अर्जित की हैं, जैसे, वोट देने का अधिकार, संपत्ति के स्वामित्व का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, समान काम के लिए समान वेतन का अधिकार, मातृत्व अवकाश, विशाखा फैसला, बच्चे को गोद लेने का अधिकार, ये सारी सफलताएं निरर्थक थीं क्योंकि हम घूम फिर कर बुनियादी सवाल पर पहुंच गए हैं.

हम सब जीवन के अधिकार के बुनियादी सवाल पर पहुंच गए हैं. मुझे ऐसा लगा कि आपकी फिल्म ने हमें अंधकार युग के इस सवाल पर पहुंचा दिया है- क्या स्त्री- विधवा, बलत्कृत, युवा, बूढ़ी, गर्भवती, नाबालिग… को जिंदा रहने का अधिकार है? मैं यह समझती हूं कि जौहर और सती हमारे सामाजिक इतिहास का हिस्सा हैं. ये वास्तविकताएं हैं. मैं यह समझती हूं कि ये सनसनीखेज, डरावनी, नाटकीय घटनाएं हैं, जिन्हें भड़कीले और सम्मोहक दृश्यों में ढाला जा सकता है खासकर अगर इसे आपके जैसे सधे हुए फिल्मकार द्वारा परदे पर उतारा जाए. लेकिन, फिर 19वीं शताब्दी में हत्यारे श्वेत गिरोहों द्वारा अश्वेतों को पीट-पीटकर मार देने का दृश्य भी इसी तरह से सनसनीखेज, डरावनी और नाटकीय सामाजिक घटनाएं थीं. क्या इसका मतलब यह है कि किसी को नस्लवाद की कुरूप सच्चाई को ध्यान में रखे बगैर ही इस विषय पर फिल्म बना देनी चाहिए? या ऐसी फिल्म बना देनी चाहिए, जिसमें नस्लीय नफरत पर कोई टिप्पणी न हो? इससे भी खराब बात कि क्या किसी के गर्म खून, शुद्धता और शौर्य के प्रतीक के तौर पर पीट-पीटकर जान ले लेने को महिमामंडित करनेवाली कोई फिल्म बनानी चाहिए- मुझे नहीं पता है. मेरे लिए यह समझ से परे है कि आखिर कोईऐसे जघन्य अपराध को कैसे महिमामंडित कर सकता है?

सर, मेरा यह पक्का यकीन है कि आप इस बात से इत्तेफाक रखते होंगे कि सती और जौहर की प्रथा महिमामंडित किए जाने की चीजें नहीं हैं. यकीनन, आप इस बात से इत्तेफाक रखते होंगे कि प्रतिष्ठा, त्याग, शुद्धता के चाहे जिस आदिम विचार के कारण स्त्री और पुरुष ऐसी परंपराओं में शामिल होते हैं, मगर सती और जौहर- स्त्री खतने और आॅनर किलिंग की ही तरह गहरे तक पितृसत्तात्मक, स्त्री विरोधी और समस्या से भरे विचारों में डूबा हुआ है. यह वह मानसिकता है, जो यह मानती है कि किसी स्त्री का मूल्य उसके योनि में निहित है, जो यह मानती है कि अगर स्त्रियों पर किसी पुरुष मालिक का नियंत्रण नहीं है या उनके शरीरों को अगर किसी ऐसे पुरुष के स्पर्श या यहां तक कि नजरों से, जिसे समाज ने स्त्री पर स्वामित्व जताने या नियंत्रित करने का अधिकार नहीं दिया है, अपवित्र कर दिया गया हो, तो स्त्री जीवन मूल्यहीन है.

सती, जौहर, स्त्री खतना, ऑनर किलिंग आदि की प्रथाओं को महिमामंडित नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि ये सिर्फ स्त्री से समानता का अधिकार नहीं छीनती हैं, बल्कि, ये किसी स्त्री से उसका व्यक्तित्व भी छीन लेती हैं. वे स्त्रियों को मानवता से रिक्त कर देती हैं. वे स्त्रियों से जीवन का अधिकार छीन लेती हैं. और यह गलत है. हम यह मानकर चल सकते थे कि 2018 में इन बातों पर बात करने की भी जरूरत नहीं होनी चाहिए, लेकिन ऐसा लगता है, इसकी जरूरत बनी हुई है. यकीनन आप स्त्री खतना और ऑनर किलिंग का महिमामंडन करनेवाली फिल्म बनाने पर विचार नहीं करेंगे.

सर, आप कहेंगे कि मैं राई का पहाड़ बना रही हूं. आप कहना चाहेंगे कि मुझे फिल्म को इसके संदर्भ में देखना चाहिए. आप कहेंगे कि ये 13वीं सदी के लोगों के बारे में कहानी है. और 13वीं सदी में जीवन ऐसा ही था- बहुविवाह स्वीकृत था. मुसलमान जानवरों जैसे थे, जो मांस और स्त्री का भोग समान चाव से करते थे. और इज्जतदार महिलाएं खुशी-खुशी अपने पतियों की चिताओं में कूद जाया करती थीं और अगर वे पति के दाह-संस्कार में नहीं पहुंच पाती थीं, तो वे एक चिता तैयार करती थीं और इसमें छलांग लगा देती थीं. आप कहेंगे कि हकीकत में वे सामूहिक आत्महत्या के विचार को इतना पसंद करती थीं कि वे अपने दैनिक साज-श्रृंगार के दौरान इसके बारे में हंसते हुए बातें किया करती थीं. ऐसा संभव था, आप मुझसे कहेंगे.

नहीं सर, अपनी क्रूर प्रथाओं के साथ 13वीं सदी का राजस्थान बस उस महाकाव्य की ऐतिहासिक रंगमंच है, जिसका रूपांतरण आपने अपनी फिल्म पद्मावत में किया है. लेकिन, आपकी फिल्म का संदर्भ 21वीं सदी का भारत है; जहां देश की राजधानी में एक पांच साल की बच्ची का बच्ची के साथ चलती बस के भीतर सामूहिक दुष्कर्म किया गया. उसने अपने सम्मान के अपवित्र हो जाने के कारण खुदकुशी नहीं की. बल्कि सर वह अपने छह बलात्कारियों के साथ लड़ी. उसकी इस लड़ाई में इतनी ताकत थी, कि उनमें से एक दरिंदे ने एक लोहे की छड़ उसके गुप्तांग के भीतर घुसा दी. वह सड़क पर पड़ी मिली, जहां उसकी अंतड़ियां तक बाहर आ गई थीं. यह ब्यौरा देने के लिए मैं माफी चाहूंगी, लेकिन सर, आपकी फिल्म का वास्तविक ‘संदर्भ’ यही है.

आपकी फिल्म के रिलीज होने से एक सप्ताह पहले, एक 15 वर्षीय दलित लड़की के साथ हरियाणा के जींद में बर्बरतापूर्व सामूहिक दुष्कर्म किया गया. यह अपराध खौफनाक तरीके से निर्भया दुष्कर्म से मिलता-जुलता था. आपको यह भली-भंति पता है कि सती और स्त्री के साथ बलात्कार, एक ही मानसिकता के दो पहलू हैं. एक बलात्कारी, स्त्री को नियंत्रित करने के लिए, उस पर वर्चस्व स्थापित करने के लिए या उसके अस्तित्व को मिटा देने के लिए उसके जननांगों पर हमला करने और उसका अनादर करने, उसे क्षत-विक्षत कर देने की कोशिश करता है.

सती-जौहर पर अगर-मगर करनेवाला या उसका कोई समर्थक स्त्री के अस्तिव को ही पूरी तरह मिटा देने की कोशिश करता है, अगर उसके जननांगों का अनादर किया गया हो, या फिर वे उसके ‘वैध’ पुरुष मालिक के नियंत्रण में नहीं रह जाते. दोनों ही स्थितियों में प्रयास और विचार यही होता है कि किसी स्त्री को उसके जननांगों में ही सीमित कर दिया जाए. किसी भी कला का संदर्भ वह समय और स्थान होता है, जहां/जब उसका निर्माण और उपभोग किया जाता है. यही कारण है कि सामूहिक दुष्कर्म से पीड़ित यह भारत, बलात्कारों की अनदेखी करनेवाली मानसिकता, पीड़ित पर ही दोष मढ़नेवाला समाज ही आपकी फिल्म का असली संदर्भ है. सर, निश्चित तौर पर अपनी फिल्म में सती और जौहर की कोई आलोचना पेश कर सकते थे.

आप यह कहेंगे कि आपने फिल्म की शुरुआत में एक डिस्क्लेमर दिया था, जिसमें यह कहा गया था कि फिल्म सती या जौहर का समर्थन नही करती है. ये बात सही है, लेकिन आपने इसके बाद 2 घंटे 45 मिनट तक आप राजपूती आन-बान-शान, चिता में जल कर मर जाने का रास्ता चुननेवाली सम्माननीय राजपूत स्त्रियों के साहस का जयगीत सुनाते रहे. ये स्त्रियां अपने पतियों के अलावा किसी दुश्मन द्वारा छुए जाने, जो संयोग से मुस्लिम थे, की जगह चिता में जल कर मर जाने का रास्ता चुनती हैं. तीन बार से ज्यादा आपकी कहानी के अच्छे चरित्रों ने सती/जौहर को एक सम्मान के लायक विकल्प बताया.

आपकी नायिका, जो सुंदरता और बुद्धि का साक्षात उदाहरण है, अपने पति से जौहर करने की इजाजत मांगती है, क्योंकि वह उसकी इजाजत के बगैर यह भी नहीं कर सकती थी. इसके ठीक बाद, उसने सत्य और असत्य, धर्म और अधर्म के बीच युद्ध को लेकर एक लंबा भाषण दिया और सामूहिक सती को सत्य और धर्म के रास्ते के तौर पर पेश किया. और उसके बाद क्लाइमेक्स में, जिसे बेहद भव्य तरीके से फिल्माया गया है, देवी दुर्गा की तरह लाल रंग के कपड़ों में सजी सैकड़ों स्त्रियां जौहर की आग में छलांग लगा देती हैं.

दूसरी तरफ एक उन्मादी मुस्लिम मनोरोगी खलनायक उनकी ओर देखता रहता है और पीछे से एक फड़कता हुआ संगीत बजता है, जिसमें किसी राष्ट्रगान जैसी शक्ति है- इस दृश्य में दर्शकों को अचंभित कर देने और इस खेल का प्रशंसक बना देने की क्षमता थी. सर, अगर यह सती और जौहर का महिमामंडन करना नहीं है, तो मुझे सचमुच नहीं पता कि आखिर किस चीज को ऐसा कहा जाएगा?

मुझे आपकी फिल्म का क्लाइमेक्स देखते हुए, गर्भवती महिलाओं और छोटी बच्ची को आग में कूदते हुए देख काफी असहजता का अनुभव हुआ. मुझे लगता कि मेरा पूरा अस्तित्व ही गैरकानूनी है, क्योंकि अगर भगवान न करे, मेरे साथ कुछ गलत हो जाता है, तो मैं उस आग के गड्ढे से बाहर निकल आने के लिए कुछ भी करूंगी- भले ही इसका मतलब खिलजी जैसे राक्षस की हमेशा के लिए गुलाम बन कर रहना ही क्यों न हो. लेकिन, उस समय मुझे ऐसा लगा कि मृत्यु के ऊपर जीवन को चुनना मेरी गलती थी. मुझे लगा कि जीवन की इच्छा रखना गलत है. सर, यही तो सिनेमा की ताकत है.

सर, आपक सिनेमा खासतौर पर प्रेरणादायक, भावनाएं जगानेवाला और ताकतवर है. यह दर्शकों को भावुकता के ज्वार-भाटे में धकेल सकता है. यह सोच को प्रभावित कर सकता है और सर, यही कारण है कि आपको इस बात को लेकर पूरी तरह जिम्मेदार रहना चाहिए कि आप फिल्म में क्या कर रहे हैं और क्या कह रहे हैं. 1829 से 1861 के बीच कुछ सुधारवादी सोच रखनेवाले भारतीयों के समूह और ब्रिटिश प्रांतीय सरकारों और रजवाड़ों ने कई फैसलों के द्वारा सती-प्रथा को समाप्त किया और इसे अपराध घोषित किया. आजाद भारत में इंडियन सती प्रिवेंशन एक्ट (1988) ने सती में किसी तरह की मदद पहुंचाने, उसके लिए उकसाने और सती का किसी तरह से महिमामंडन करने को अपराध की श्रेणी में लाया.

आपके द्वारा बिना सोचे-विचारे इस स्त्री विरोधी आपराधिक प्रथा का जिस तरह से महिमामंडन किया गया है, उसके लिए आपको जवाब देना चाहिए. सर, टिकट खरीद कर आपकी फिल्म देखनेवाले दर्शक के तौर पर मुझे आपसे यह पूछने का अधिकार है कि आपने ऐसा कैसे और क्यों किया?  आपको यह बात भली-भांति पता होगी कि आधुनिक भारत में भी जौहर जैसे कृत्यों के ज्यादा ताजा उदाहरण मिलते हैं. भारत और पाकिस्तान के रक्त-रंजित विभाजन के दौरान करीब 75,000 औरतों के साथ बलात्कार, अपहरण किया गया, उन्हें ‘दूसरे’ धर्म के पुरुष द्वारा बलपूर्वक गर्भवती बनाया गया. उस दौर में स्त्रियों द्वारा स्वैच्छिक तरीके से या मदद देकर करवाई गई आत्महत्याओं की कई घटनाएं मिलती हैं. कुछ मामलों में ‘दूसरे’ धर्म के लोग स्त्रियों को छू पाएं, इससे पहले पतियों और पिताओं ने खुद अपनी पत्नियों और बेटियों का सिर कलम कर दिया.

पंजाब के थोआ खालसा में दंगे के भुक्तभोगी बीर बहादुर सिंह ने आत्महत्या करने के लिए औरतों के गांव के कुएं में कूदने के दृश्य का वर्णन किया था. उन्होंने बताया था कि किस तरह से आधे धंटे में वह कुआं पूरा भर गया था. जो औरतें ऊपर थीं, वे बच गईं. उनकी मां भी बचनेवालों में से थीं. सिंह ने उर्वशी बुटालिया की 1998 में प्रकाशित किताब, द अदर साइड ऑफ साइलेंस  में याद करते हुए कहा कि वे अपनी मां के जिंदा रह जाने को लेकर लज्जित थे. यह भारतीय इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक है और इसे शर्म, डर, दुख, आत्मचिंतन, सहानुभूति, सतर्कता के साथ याद किए जाने की जरूरत है, बजाय इसका विचारहीन, सनसनीखेज महिमामंडन करने के.

विभाजन की ये दुखद कहानियां भी भले उतने प्रत्यक्ष रूप में न सही, लेकिन आपकी फिल्म पद्मावत का संदर्भ बनती हैं. भंसाली सर, मैं शांति से अपनी बात खत्म करना चाहूंगी; आपको आपकी इच्छा के अनुसार और फिल्में बनाने, उनकी शूटिंग करने और उन्हें रिलीज करने की शुभकामनाएं दूंगी. मैं चाहूंगी कि आप, आपके अभिनेता, प्रोड्यूसर, स्टूडियो और दर्शक धमकियों और उपद्रवों से महफूज रहें. मैं आपकी अभिव्यक्ति की आजादी के लिए ट्रॉल्स और टीवी टिप्पणीकारों से लड़ने का वादा करती हूं. लेकिन, मैं आपसे यह भी वादा करती हूं कि आप जनता के लिए जो कला रचेंगे, उसके बाबत सवाल पूछने से मैं नहीं चूकूंगी. इसके साथ ही हमें यह उम्मीद भी करनी चाहिए कि करणी सेना या मरणी सेना के किसी उन्मादी सदस्य के मन में सती प्रथा को अपराध की श्रेणी से हटाने की मांग करने का विचार न आये!

आपकी

स्वरा भास्कर


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एनडीटीवी में भयंकर छंटनी पर प्रेस क्लब आफ इंडिया ने लिखा प्रणय रॉय को पत्र

To

Dr. Prannoy Roy,
Founder-Chairperson, NDTV
NEW DELHI

Dear Dr. Roy,

Warm Greetings from the Press Club of India.

As this year comes to an end, there are disturbing reports emanating from the NDTV which refer to massive reduction and lay-offs of employees connected with the news operations of your organisation.

As you are aware, the Press Club of India has been in the lead role of organising protest meets whenever NDTV was targeted by the government or curbs were sought to be put on it. The PCI has led the struggle for upholding the freedom of the press and expression. There is considerable concern among journalistic community over the current reported move of your organisation which might have been taken considering economic viability of running the news channel.

We would like to invite you over to the Press Club of India to address a meet and make the stance of NDTV clear so that the journalistic community can understand the logic and reason behind any such move of large scale retrenchment. As you have been forthcoming in your approach, we are sure you would accept our invitation to address a meet at PCI which we plan to hold over the next few days.

Looking forward to your response.

With Warm Regards

(Gautam Lahiri)
President

(Vinay Kumar)
Secretary General

मूल खबर….

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प्रभात खबर देवघर संपादक के नाम खुला पत्र

संपादक जी!

मैं अपने इस पत्र की शुरुआत जॉन एलिया की इस पंक्ति कि ”बहुत से लोगों को पढ़ना चाहिए मगर वो लिख रहे हैं” के साथ करना चाहता हूँ। आपकी मौजूदगी, जानकारी और सहमति के साथ इन दिनों प्रभात खबर देवघर संस्करण जिस रास्ते की ओर चल रहा है, उस बाबत आपको यह पत्र लिखने के अलावा मेरे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा है। बड़े लोग कहते है सबसे मुश्किल होता है सत्य की रक्षा करना और आज के समय में सबसे आसान होता है अपने आप को दलाल बना लेना।

सच्चाई, अधिकार, कर्तव्य, जागरूकता की बात करते करते अखबार कब धनपशुओं की दलाली करने लगा यह पत्रकारिता के छात्रों के लिए शोध का विषय हो सकता है। बहरहाल आप अपने आपको कहाँ पाते है इसका निर्णय का भी अधिकार आपको ही होना चाहिए। अभी की वर्तमान व्यवस्था को देखकर कुछ मौजूं सवाल है जिसे प्रभात खबर की समृद्ध पत्रकारिता को जिंदा रखने के लिए पूछे जाने जरूरी है।इन सवालों के जवाब की जरूरत नही बल्कि आप अपने मन को टटोल लें तो फिर से ये सवाल पूछना ना पड़े।

झारखंड के कृषि मंत्री रंधीर सिंह पर उन्हीं के विधानसभा क्षेत्र के एक मुखिया ने जातिसूचक शब्द लगाकर गाली गलौज करने संबंधित तहरीर सारठ थाने में दी। आपके संवाददाता द्वारा खबर भी अखबार में भी गयी।फिर देर रात मंत्री आपके कार्यालय पहुंचे और आपने खबर को ड्रॉप करने का निर्णय लिया।मंत्री से मिलने के बाद क्या हुआ जिसकी वजह से पत्रकारिता की हत्या हो गयी।

झारखण्ड के एक चर्चित बड़बोले सांसद के आदेशानुसार आपने लगातार यह फर्जी खबर छापी कि दुरंतो एक्सप्रेस का परिचालन अब जसीडीह होकर किया जाएगा। पत्रकारिता का प्रवेशी छात्र भी यह बता सकता है कि ट्रेन परिचालन संबंधित आधिकारिक जानकारी रेलवे द्वारा दी जाती है।परंतु आपने एक बड़बोले जनप्रतिनिधि को खुश करने के लिए फर्जी खबर लगातार प्लांट की।

झारखंड के एक मंत्री पर निजी सेना बनाने का आरोप लगा।आपको जानकारी दी गयी पर आप फिर उस मंत्री से मिले और नतीजा खबर फिर नहीं छपी।

बड़बोले सांसद का खुमार प्रभात खबर पर इस तरह छाया है कि अखबार ने सूखे जमीन पर पानी का नहर बना दिया और किसानों के चेहरे पर खुशी की लहर फैला दी।चापलूसी के चक्कर में किसी अन्य गांव के किसानों की तस्वीर छाप दी गयी। गांव के लोगों ने प्रभात खबर की प्रतियां जलाई और आपके विरुद्ध नारेबाजी की।पर सांसद के अंधभक्ति में आपने इसे हिकारत भरी नजरों से देखा।

एक सुप्रसिद्ध भजन कलाकार ने अपने देवघर यात्रा के दौरान जब आपके कार्यालय आने के अनुरोध को नम्रता से अस्वीकार कर दिया तब आपने उस कलाकार की खबर को अंडरप्ले कर दिया।

आप कहते है कि डीसी पावर हाउस होता है।इसलिए अखबार के लोगों को उस पावर हाउस से बचना चाहिए।पता नहीं आप क्या सोचकर पत्रकारिता में आये थे?प्रभात खबर पत्रकार हरिवंश के उसूलों पर चलने वाला अखबार रहा है और आपने इसे क्या समझा?

और भी ऐसे दर्जनों सवाल है जो आपसे पूछे जाने जरूरी है।किसी जनप्रतिनिधि की चाकरी आसान रास्ता है कठिन है पत्रकारिता धर्म की रक्षा करना।सांसद, मंत्री, विधायक सब जनता के समस्याओं के लिए हैं। अपने इस खुले पत्र का समापन मीडिया समीक्षक दिलीप मंडल के फेसबुक पोस्ट से करना चाहूंगा जहां वो लिखते हैं सुबह का अखबार है कभी पढ़ लिया कभी पराठा लपेट लिया और कभी कुत्ते का सुसु सुखाने के काम आ गया।

एक पाठक

Anant Jha

anantkumarjha@gmail.com

पढ़ें एंकर असित नाथ तिवारी का प्रधानमंत्री के नाम खुला पत्र… 

प्रधानमंत्री के नाम पहला खुला पत्र

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दैनिक भास्कर ने अपने कर्मियों से कहा- ”10 लाख नए पाठक जोड़ने हैं, प्रति पाठक 150 रुपये मिलेंगे!”

दैनिक भास्कर ग्रुप ने ऑफिशियल लेटर जारी कर अपने कर्मियों को इस साल 10 लाख नये पाठक जोड़ने का टारगेट बताया है और इसके लिए उसने अपने कर्मियों को ऑफर दिया है कि वे नये पाठक जुड़वायें जिसके लिए उन्हें प्रति पाठक 150 रुपये का कमीशन या प्रोत्साहन राशि मिलेगी। बहरहाल इस ऑफर के बाद कुछ कर्मी यह सोच रहे हैं कि क्या अब पत्रकारिता “टारगेट जॉब” तो नहीं बन जायेगी? हो सकता है कस्टमर न लाने वालों का इंक्रीमेंट/प्रमोशन भी कंपनी रोक दे।

खैर खुद का प्रचार प्रसार विस्तार करने का हक हर ब्रांड को होता है लेकिन, 1 साल में 10 लाख पाठक जोड़ने जैसा बड़ा टारगेट बनाने वाला और खुद को देश का नम्बर 1 अखबार कहने वाले भास्कर ग्रुप ने ऑफिशियल लैटर में खुद को करीब 10 हजार कर्मियों की कंपनी होने का दावा किया है। साथ ही लेटर में विश्व का चौथा सबसे अधिक प्रसार संख्या वाला अखबार भी बताया है। तो फिर अपने कर्मियों को पर्याप्त सेलरी या मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ देने की बात उठने पर भास्कर की यही “ब्रांड वैल्यू” कम कैसे हो जाती है, यह सोचने वाली बात है।

आशीष चौकसे
पत्रकार और ब्लॉगर
ashishchouksey0019@gmail.com

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आइसा छात्र नेता नितिन राज ने जेल से भेजा पत्र- ‘रिश्वत देकर रिहाई कतई कुबूल नहीं’

सरकारों का कोई भी दमन और उनके भ्रष्टतंत्र की कोई भी बेशर्मी और बेहयाई क्रांतिकारी नौजवानों के मंसूबों को तोड़ नहीं सकती……

साथियों,

आज शायद भारतीय छात्र आन्दोलन अपने इतिहास के सबसे दमनात्मक दौर से गुजर रहा है, जहाँ छात्रों को अपनी लोकतान्त्रिक माँगो को लेकर की गई छात्र आन्दोलन की सामान्य कार्यवाही के लिए भी राजसत्ता के इशारे पर महीनों के लिए जेल में डाल दिया जा रहा है. छात्र आन्दोलन से घबराई योगी सरकार, जो कि इसे किसी भी शर्त पर कुचल देना चाहती है, हमें इतने दिनों तक जेल में रख कर हमारे मनोबल को तोड़ने की कोशिश कर रही है. लेकिन हम क्रान्तिकारी परम्परा के वाहक हैं हमारे आदर्श भगतसिंह और चंदू हैं, सावरकर नहीं, जो जेल के भय से माफ़ीनामा लिखकर छूटे और अंग्रेजों की दलाली में लग गए. हमें अगर और दिनों तक जेल में रहना पड़ा तब भी हम कमजोर पड़ने वाले नहीं हैं.

कल जब हमारे साथ के सभी आन्दोलनकारी साथियों की रिहाई हो गई और मेरी नही हुई तो पहले कुछ कष्ट हुआ लेकिन जब से पता चला कि मेरी रिहाई BKT थाने में हमारे साथियों द्वारा रिश्वत देने से इंकार करने के चलते रुकी है तब मुझे जानकर ख़ुशी हुई. यदि रिश्वत देकर मेरी रिहाई कल हो गई होती तो मैं छूट तो जाता परन्तु वो भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन, जिसके चलते मैं जेल में आया, शायद हार जाता. जो कि इस आन्दोलन की मुख्य अंतरवस्तु को ही भटका देता. मुझे गर्व है कि मैं भ्रष्टाचार के खिलाफ सही मायने में लड़ रहा हूँ और अपने सिद्धांतों के साथ खड़ा हूँ भले ही मुझे इसके लिए अधिक दिनों तक जेल में क्यों न रहना पड रहा हो. जेल में मैं बस हमारे प्रिय छात्रनेता चंद्रशेखर प्रसाद (चंदू) के शब्दों “ यह मेरी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा है कि मैं चे ग्वेरा की तरह जियूँ और भगतसिंह की तरह मरुँ”, को याद करके खुद को राजसत्ता के दमन से ज्यादा मजबूत पाता हूँ और लड़ने की एक नई उर्जा प्राप्त करता हूँ. 

आज पूरे देश में जिस तरीके से कार्पोरेट फासीवादी ताकतों की सत्ता स्थापित है उसमें लगातार दलितों, अल्पसंख्यकों, महिलाओं व अन्य वंचित तबकों पर हमले बढ़ रहे हैं. पूरे देश में एक ऐसी भीड़ पैदा की जा रही है जो सिर्फ अफवाह के चलते किसी की भी हत्या कर दे रही है. हमारे किसान जब अपने अधिकारों की मांग करते हैं तो उन्हें गोली से उड़ा दिया जा रहा है. अगर छात्र नौजवान शिक्षा और रोजगार की बात करता है तो उसे जेल में ठूंस दिया जा रहा है, जो भी सरकार पर सवाल उठाता है उसे देशद्रोही करार दिया जाता है. इस भयानक दौर में मैं देश के सभी छात्र नौजवानों से अपील करता हूँ कि भगत सिंह के क्रांतिकारी विचारों से प्रेरणा लेते हुए समाज के सभी उत्पीडित तबकों को गोलबंद कर इन जनविरोधी, लोकतंत्र विरोधी सरकारों को उखाड़ फेकने की जिम्मेदारी लें. ये काम सिर्फ छात्र नौजवान ही कर सकते हैं.

अंत में मैं फिर इन सरकारों से कहना चाहता हूँ कि तुम्हारा कोई भी दमन और तुम्हारे भ्रष्टतंत्र की कोई भी बेशर्मी और बेहयाई क्रांतिकारी नौजवानों के मंसूबों को तोड़ नहीं सकती. 

इंकलाब जिंदाबाद!!

द्वारा-

नितिन राज
छात्र नेता
आइसा
लखनऊ

उपरोक्त पत्र की ओरीजनल प्रति यूं है…

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पत्रकारिता दिवस मनाने प्रेस क्लब जा रहे उत्तराखंड के सीएम को देहरादून के पत्रकारों की एक पाती

सीएम साहब के नाम पत्रकारों की पाती

आदरणीय मुख्यमंत्री जी, सुना है आप पत्रकारिता दिवस मनाने प्रेस क्लब जा रहे हैं। महोदय जाना न जाना आपका विवेकपूर्ण निर्णय होना चाहिए। कुछ तथ्य आपके ध्यानार्थ हैं।

1- उत्तरांचल प्रेस क्लब विवाद और कलह में घिरी संस्था है। यह पत्रकारों की नहीं चंद मठाधीशों की संस्था है, जिनका अपना कोई आधार नहीं है। चंद बैनरों की आड़ में व्यक्तिगत मंसबे पूरे करने के लिए प्रेस क्लब को ‘अड्डा’ बनाया गया है।

2- पत्रकारों के हितों, सामाजिक सरोकरों और राज्य के विषयों पर इस संस्था का कोई योगदान नहीं है। प्रेस क्लब  की आड़ में अवैध कब्जा, दलाली और ठेकेदारी इसका मुख्य मकसद है।

3- चंद मठाधीश किसी भी हाल में इस संस्था पर कब्जा नहीं छोड़ना चाहते, चाहे इसके लिए उन्हें किसी भी हद तक क्यों न जाना पड़े। आठ साल तक यह संस्था बंद पड़ी रही।

4- वर्तमान में संस्था में 197 सदस्य हैं, लेकिन बीते वर्ष सरकार के साथ सांठगांठ कर मात्र 34 लोगों में कार्यकारिणी का चुनाव कराया गया। पत्रकारों ने विरोध किया तो पुलिस लाठीचार्ज करवाया गया। लाठीचार्ज में दर्जनभर से ज्यादा पत्रकारों को गंभीर चोटें आईं।

5- उच्च न्यायालय नैनीताल में प्रेस क्लब का मामला विचाराधीन है। राज्य मानवाधिकार आयोग ने लाठीचार्ज की घटना पर पुलिस को कठघरे में लिया है। घटना की मजिस्ट्रेट स्तर की जांच तत्कालीन सीडीओ  हरिद्वार, डाक्टर एमएस बिष्ट को सौंपी गई थी।

6- प्रेस क्लब के नाम पर सरकार पर सिर्फ दबाव बनाया जाता है। सच यह है कि प्रेस क्लब की आड़ में  सरकारी जमीन पर कब्जा हो रहा है।

7- राजधानी में पांच सौ से ज्यादा पत्रकार हैं, मगर प्रेस क्लब के कर्ता-धर्ताओं से यह पूछा जाना चाहिए कि वर्तमान में कितने पत्रकारों को क्लब की सदस्यता प्राप्त है? किसी कार्यक्रम में भीड़ बढ़ाने के लिए सदस्यों की जगह अपने परिजनों और कालेजों में पढ रहे युवाओं को प्रेस क्लब बुलाया जाता है।

8- मुख्यमंत्री जी, आपको जाना है आप शौक से जाएं पर पिछली सरकार ने जो किया उस पर बैठी जांच की बात करें। क्यों नहीं रिपोर्ट सामने आ रही है, इसका पता करवाएं।

9- शिलान्यास का पत्थर लगाएं, तो यह जरूर पूछें कि क्लब जिस जमीन पर शिलान्यास करवा रहा है, उसका मालिक कौन है? कृपया यह भी कर्ता-धर्ताओं से पूछें कि पंद्रह साल से मंजूर लाखों रूपया खर्च क्यों नहीं हुआ?

10- मुख्यमंत्री जी यह भी पूछें कि पिछले साल 30 दिसंबर को प्रेस क्लब गेट पर रजिस्ट्रार का कथित मुंह काला क्यों हुआ? लाठीचार्ज क्यों हुआ? ‘सरकार मुर्दाबाद’ का नारा क्यों लगा? चुनाव के दिन क्लब के सदस्यों को प्रेस क्लब परिसर में क्यों नहीं आने दिया गया?

11- हां, यह भी जरूर पूछिएगा कि कितने पुराने पत्रकार इस संस्था के सदस्य हैं? कितने नए युवा पत्रकार इसके सदस्य हैं? उत्तरांचल प्रेस क्लब क्या पूरे मीडिया का क्लब है?

12- यह जानने की कोशिश भी जरूर कीजिएगा कि क्यों प्रेस क्लब पर चंद कथित बड़े मीडिया समूह में काम करने वाले तथाकथित पत्रकारों का प्रभुत्व है?

13- मुख्यमंत्री जी आप खुद पत्रकारिता से जुड़े रहे हैं लिहाजा आप भली भांति जानते हैं कि, मीडिया सिर्फ चंद अखबारों में काम करने वाले मुट्ठीभर लोग नहीं, बल्कि बहुत बड़ा है। आप यह भी जानते हैं कि मीडिया षडयंत्रकारी नहीं होता, जिम्मेदार और जवाबदेह होता है।

14- सरकार निश्चत रूप से एक ‘ताकत’ है। सरकार को यह सोचना चाहिए कि इस ताकत का सही इस्तेमाल हो रहा है या दुरूपयोग?

मुख्यमंत्री जी, हम सब उन तथाकथित बड़े मीडिया घरानों में काम करने वाले ऊंची पहुंच वाले ‘बड़े’ पत्रकार नहीं, जिनकी आप तक आसानी से पहुंच है। फिर भी उम्मीद के साथ पत्र के माध्यम से आप तक अपनी बात पहुंचा रहे हैं। उम्मीद है आप तक हमारी बात अवश्य पहुंचेगी और आप इन सभी तथ्यों पर विचार करेंगे।

सादर

हम सब राजधानी के पत्रकार

(भड़ास को एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.)

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पत्रकार राजीव रंजन नाग की सामंती मानसिकता और घटिया हरकत से नाराज विपिन धूलिया ने लिखा खुला पत्र, पढ़ें

Mr. Rajiv Ranjan Nag

President

Press Association, New Delhi

Lounge, P.I.B., Shastri Bhavan, New Delhi

Dear Friend

As a senior member and old voter and as a working journalist for over three decades, I was shocked and pained when you told me that you will not renew my membership for the Press Association, New Delhi. While finalizing the voters list last month you deleted many names of senior voters and also denied new membership. There are more than 4000 accredited correspondents. But your members are less than 400. This means 90% are out of the Press Association list. Thus you sought to manipulate voters list to secure your re-election. This smacks of your feudal mindset. The Association is not your fiefdom.

I can easily gauge your chagrin. I have been persuading you for long that you must, as secretary, recover the legal status of the Press Association. You refused to pay any attention. Now see what happened due to your lethargy. The Press Association has lost its status as a legal entity. The Registrar of Societies, NCT of Delhi Government, has terminated our Registration, only because you repeatedly failed to file before him the statutory annual returns. An official statement (in reply to an RTI query) from the NCT-Delhi government confirms this.

You know very well that under Rule 4 of the Societies Registration Act, 1860, the registered society has to file in every January its annual returns, which include the audited accounts (approved by the general body), minutes of all meetings, list of managing  / governing body members etc. The designated authority of the Delhi Government says that you have not filed even a single paper all these years to update/renew the registration number: S-2887. When you got into the Press Council for the second consecutive term in 2014, you knew that you were committing an illegality by seeking nomination from an organization dead under the statute. Still you did nothing to rectify the error. For your information the reply under an RTI query from the Delhi Registrar of Societies is enclosed.

Mr.Nag, I need not tell you, a seasoned organization man, that if a registered society loses its legal status, upon the lapse of registration, it loses recognition of the statutory bodies like the Press Council, CPAC (P.I.B.) and also the right to operate the Bank account and occupy government-allotted office place.

A registered society must have a registered office for communication, including legal notice. The Registrar of Societies in reply to the RTI query has said that the Press Association has not given any address. Only the Lounge of the P.I.B. is mentioned as its office. How can a public/Government place be a registered office of a private society? Moreover, the objective (c) in your constitution underlines the need to maintain “Independence of the Press”. Can you do this from the P.I.B. lounge?

You became smug after you got into the Press Council for the second consecutive term in 2014. You and your cohorts had wilfully destroyed a noble and democratic tradition of the Press Council. The scrutiny sub-committee always had as its members the nominees of the University Grants Commission, Sahitya Akademi and the Chairman Bar Council of India. The Chairman of the Press Council, (a retired Supreme Court judge) was its president.

These unattached members used to examine each and every claim honestly and dispassionately. But you and your partners forced yourself on the Council and gatecrashed into the scrutiny sub-committee. Thus you settled your intra-organisational scores with fellow media bodies. You even went to the extreme in the Press Council meeting on 17th January 2017 when you forced the Chairman and Secretary to leave the hall. And then you got yourself included in the new scrutiny sub-committee for the 13th term of 2017-20. You have thus denigrated the entire Press Council of India for your own selfish purpose.

As you were judge of your own claim application in the scrutiny sub-committee, you thought you can repeat your illegal acts without being noticed. The consequence is that now the Delhi High Court is examining the whole matter. A judgment is awaited soon on the 12th Press Council which ends in October 2017, eight months more.

(Your fraudulent nomination is challenged in this writ petition No:3384/2014.)   

You were complacent that by getting your manufactured documents, attested by the Notary Public (in November 2016), you can legitimise your fake submissions to the 13th Press Council. Your lawyer will tell you that a Notary Public attests what you (Deponent) tell him. A Notary has no machinery to verify what you tell him. The simple issue, you must know, is who is legally authentic: the designated authority like the Registrar of Societies of Delhi-NCT Government, or a private vakeel, nominated just for two years as a Notary. The Notary will even attest if you tell him that you are the Chief Editor of the Washington Post in Delhi.

You know that a false Affidavit invites penal action for perjury, forgery, fraud and impersonation. Already lawyer Parmanand Pandey has during the last two years had convinced the Delhi High Court that the Press Association was dead.

You have seen how another fraternal body, the Indian Journalists Union, a registered Trade Union, has been since 2011 battling in the Patiala House District Court. The IJU factions are led by Mr. Suresh Aukhori and Mr. K.B. Pandit versus Mr. S.N. Sinha and Mr. D. Amar. The Registrar of Trade Unions, Canning Lane, New Delhi, has received in 2016, the annual returns from both the groups but he has not recorded in his official register either Suresh Aukhori or S.N. Sinha as IJU President.

The I.J.U. is no more a legal entity as per Section 28 (2) of the Indian Trade Unions Act, 1926. The membership of the Press Association includes members of the Indian Journalists Union, the National Union of Journalists (I), the Indian Federation of Working Journalists (IFWJ) etc. But you acted on your own very arbitrarily by openly aligning with the I.J.U. (Mr. S.N. Sinha faction) in the Press Council nominations. Thus you destroyed the basic neutrality of the Press Association in intra-union rivalries of the journalist trade unions.

Mr.Nag, the Press Council has asked applicants to submit detailed lists of their members, residing in 12 states with their surname first, residential addresses etc. You have shown that the Press Association members live in 12 states. How can it be? Your constitution says that only those accredited to the P.I.B. alone can become its members. The P.I.B. rule No:6.2 says : ( pib.in/prs/ accreditionguidelines.pdf ) “Accreditation will be granted only to those residing in Delhi or its periphery”. So how do you reconcile this contradiction? The Press Association has been trotting an argument that its members work for various newspapers of different states, though living in Delhi, so it has an all-India character. This is plainly ridiculous. The Press Association nominees belong to Section 5(3)(a) of the Press Council Act, 1978, for the working journalists. Newspapers come under Section 5(3)(b) owners/managers of newspapers.

I wait for your action.

Yours sincerely

Vipin Dhuliya
9818627033

N.B.: I am circulating this letter among our members because it concerns the entire Association. Thanks.

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Zee News वाले Sudhir को एक पत्र : ये डिज़ाइनर पत्रकार क्या होता है चौधरी साब?

ज़ी न्यूज़ के एक प्रोग्राम डीएनए में सुधीर चौधरी बार बार डिज़ाइनर पत्रकार और सच्ची पत्रकारिता का जिक्र कर रहे थे. मन में उनसे कुछ पूछने की इच्छा जागी है. अगर आपके माध्यम से मेरी बात उन तक पहुँच सके तो आभारी रहूँगा.

Regards,
Karamvir Kamal
Editor
The Asian Chronicle
editor.theasianchronicle@gmail.com

ये डिज़ाइनर पत्रकार क्या होता है चौधरी साब?

मैं ज़ी न्यूज़ को उस समय से जानता हूँ जबसे वीरप्पन को जाना। दूरदर्शन के दौर में डीडी-1 पर आने वाले समाचार के बाद कुछ देखा तो ‘आज तक मे पेश है अभी तक की खबरें’ वाला ‘आज तक’ और ‘आँखो देखी’। वैसे तो वीरप्पन और ज़ी न्यूज़ का कोई आपस में लेना देना है नहीं, परंतु चैनल बदलते बदलते कब जी न्यूज के एक न्यूज शो ‘इनसाइड स्टोरी’ में चलाई जा रही वीरप्पन की जीवन गाथा पर जा रुका, पता ही नहीं चला। स्टोरी इंट्रेस्टिंग थी, सो पूरी देखी और जाना की कौन है वीरप्पन। तो इस तरह ज़ी न्यूज़ से मेरी पहचान हुई।

अब बात ज़ी न्यूज़ वाले चौधरी साहब आपकी। काफी समय से बल्कि कई सालों से आपका ये डीएनए रेगुलर ही देख रहा था। न्यूज़ के मामले में डीएनए के अलावा सिर्फ पुण्य प्रसून बाजपेयी का 10 तक ही पसंद है। रवीश की रिपोर्ट भी अच्छी ही लगती है। कभी मुझे ये तीनों ही न्यूज़ प्रोग्राम बेहतरीन लगते थे। चौधरी साहब पिछले काफी समय या शायद कुछ ही सालों से आप पत्रकारिता क्या होती है, अपने इस शो के माध्यम से सभी को सिखा रहे हैं। आपका ये तकिया कलाम था कि अब जी न्यूज़ बताएगा की सच्ची पत्रकारिता क्या होती है।

जरा कोई खबर आपने चालाई तो बोलने लगे कि अब ज़ी न्यूज़ दिखाएगा सच्ची पत्रकारिता। सुधीर जी, क्या होती है सच्ची पत्रकारिता? बाकी चैनल को भी तो सिखाओ। कैसे होती है सच्ची पत्रकारिता? आजकल आपने नए शब्द की खोज की है… “डिज़ाइनर पत्रकार।” क्या होता है ये डिज़ाइनर पत्रकार? ज़रा बताओ तो, है क्या इसकी परिभाषा। आज भी जब आपके शो मे ये डिज़ाइनर पत्रकार बार बार सुन रहा था को बड़ा चुभ रहा था।

कभी मुझे आपकी निष्पक्ष खबरें अच्छी लगती थीं, पर आजकल जबसे बड़े साहब कमल पर बैठ कर राज्य सभा गए हैं (ये और बात है कि इसमें विवाद हो गया है, और मामला जांच में चल रहा है) आप एक तरफा हो गए हो। बात बात पर पत्रकारिता सिखाने लगते हो, पाकिस्तान भेजने लगते हो।

ऐसा क्या हो गया कि आप बात बात पर सच्ची पत्रकारिता का जिक्र करने लगते हो? आपको बार बार ये क्यूँ साबित करना पड़ता है कि आप ही सच्ची पत्रकारिता करते हो या कर सकते हो। आपने भारत के पत्रकारों को पाकिस्तान में जा कर रिपोर्टिंग करने को बोला है। पत्रकारों की तो भारत में भी हत्या होती है सर जी। 2015 में 110 के करीब जर्नलिस्ट की हत्या हुई थी। भारत पत्रकारिता के लिहाज से खतरनाक देशों की सूची में खतरनाक पायदान पर है। आप भी आरएसएस और बीजेपी नेताओं की तरह बात बात पर लोगों को पाकिस्तान भेजने लगे हो। कोई ट्रांसपोर्ट का बिज़नस है तो…?? खैर छोड़िए इस बात को। मेरे पास पासपोर्ट नहीं है, बनवा दो और वीज़ा दिला दो तो देख लें हम भी गांधी जी के उस वक्त के हिंदुस्तान के उस हिस्से को भी, भगत सिंह के लाहोर को भी। भारत के बिछड़े और बिगड़े उसके भाई को भी।

बार बार डिज़ाइनर पत्रकार और सच्ची पत्रकारिता आपको याद आ रही है। कहीं ऐसा तो नहीं आपके दिल से अभी साल 2012 गया नहीं। जब कोल की कालिख के बीच 100 करोड़ी पत्रकारिता का डिज़ाइन चेंज हो गया था। सुधीर जी, पांचों उंगलिया एक समान नहीं होती, इसीलिए आप बार बार ये डिज़ाइनर पत्रकारिता और सच्ची पत्रकारिता का आलाप करना छोड़ दे, बाकी लोग भी आप ही की तरह मेहनत करते हैं।

कभी था आपका प्रशंसक
कर्मवीर कमल
Editor
The Asian Chronicle
editor.theasianchronicle@gmail.com

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खबर से भड़के डीएम ने जारी किया आदेश : ‘हिंदुस्तान’ अखबार के इस उगाहीबाज रिपोर्टर को आफिस में घुसने न दें!

Dinesh Singh : मैं नहीं जानता कि बाका के जिलाधिकारी के दावे में कितनी सच्चाई है। बिहार में हिन्दुस्तान की स्थापना के समय से जुड़े होने के चलते मैंने देखा है कि रिमोट एरिया में ईमानदारी के साथ काम करने वाले पत्रकार भी भ्रष्ट अधिकारियों के किस तरह भेंट चढ़ जाते हैं। मैं यह नहीं कहता कि सारे पत्रकार ईमानदार हैं मगर मैं यह भी कदापि मानने के लिए तैयार नहीं हूं कि सारे पत्रकार चोर और ब्लैकमेलर ही होते हैं।

सच यह है कि बिहार में मध्याह्न भोजन के नाम पर जहां भी हाथ डालिए और खास कर बाका, मुंगेर और जमुई जिले में, केवल लूट और बदबू ही मिलेगा। यदि किसी पत्रकार से शिकायत थी तो सबसे पहले संपादक से शिकायत करनी चाहिए थी। संपादक द्वारा कार्रवाई नहीं होने पर प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया का रास्ता खुला था। मगर नहीं। डीएम ने सीधे तुगलकी फरमान जारी कर दी।

भागलपुर के संपादक बदले हैं और सुना है ऐसे मामलों में तत्काल कार्रवाई भी करते हैं। किन्तु लगता है अनुभवहीन जिला अधिकारी ने भ्रष्ट अधिकारियों के प्रभाव में आकर कोई बड़ा बवंडर कर दिया हो। अखबार के संपादक से मैं निवेदन करना चाहता हूं कि वे इस मामले मे तत्काल कार्रवाई करें ताकि पत्रकारिता की मर्यादा बिहार में अक्षुण्ण बनी रहें।

हिंदुस्तान अखबार के विशेष संवाददाता रह चुके पत्रकार दिनेश सिंह की एफबी वॉल से.

नीचे वो खबर है जिससे भड़के बांका के जिलाधिकारी ने रिपोर्टर को उगाहीबाज करार देते हुए आफिसियल लेटर जारी कर दिया…. खबर को साफ-साफ पढ़ने के लिए नीचे दी गई न्यूज कटिंग के उपर ही क्लिक कर दें :

उपरोक्त स्टटेस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं….

Niraj Ranjan अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला है. चौथे स्तंभ को हिलाना मुश्किल है.

Uday Murhan मीडिया संस्थानों और पत्रकारिता जगत पर भी सवाल है . दूसरे क्या करेंगे और करना चाहिये दूसरे जानें .मीडिया जगत सोचे .

Brajkishor Mishra सत्यप्रकाश जी को बधाई। एक जिला अधिकारी को आपके कारण इस ओछेपन पर आना पड़ा। डीएम द्वारा लिखे गए डिपार्टमेंटल लेटर के सेंटेंस से स्पष्ट है कि मामला मध्यान भोजन की रिपोर्टिंग का नहीं है। कही न कही आपकी किसी और रिपोर्टिंग से डीएम की फटी पड़ी है। जिसका खुन्नस वो मध्यान भोजन की रिपोर्टिंग के नाम पर निकल रहा है। यदि मामला उगाही का होता तो डीएम एफआईआर भी दर्ज करा सकता था। लेकिन शायद कोई सबूत नहीं। डीएम साहब मध्यान भोजन आप नहीं खाते। वो देश के भविष्य, बच्चो के विकास के लिए है। पत्रकार छोड़िये, यदि मध्यान भोजन के गुणवत्ता में किसी भी व्यक्ति को शक होता है तो रसोई देखना उसका अधिकार है। बांका के पत्रकार बंधुओ का आग्रह हैं की पता करें इस डीएम को मंथली उगाही कौन-कौन से विभाग से कितनी पहुँचती है। अखबार में खबर नहीं लग पाती तो इनकी ईमानदारी की सबूत सोशल मीडिया पर डालिये।

Jayram Viplav डीएम के लिखने का अंदाज दाल में काला है ।

Dinesh Singh उदय जी, सवालो के घेरे मे आज कौन नही है। कस्बाई पत्रकारिता की स्थिति जानिए । दस रुपये प्रति खबर पर काम करता है और महीने मे दस खबर नही छपती है। मिलता है एक खबर पर दस रुपये मगर खर्चा पड़ता है 50 रु। अखबार को उसी के माध्यम से विज्ञापन भी चाहिए । वह भ्रष्ट और चोरी नेताओ की चाकरी मे लगा रहता है कि कुछ ऐड मिलेगा । उसे परिवार भी चलाना है। कठिनाई तब हो जाती है जब ओहदा और सैलरी मिल जाने के बाद भी गंदगी फैलाते हैं। धुआं वही से उठता है जब कही आग लगा होता है । विशेश्वर प्रसाद के समय मे हिन्दुस्तान भागलपुर मे कंट्रोवर्सी मे रहा और खबर छापने के लिए पैसे मांगने के खिलाफ बहुत सारे होल्डिंग्स भी टंगे । मै नही जानता की उस आरोप मे कितनी सच्चाई थी मगर चुने हुए बदनाम पत्रकारो को मिला संरक्षण और शहर के धंधेवाजो से उनके रिश्ते उनकी बदनामी को हवा देता रहा। मगर आप ही बताइए विशेश्वर प्रसाद और अक्कु श्रीवास्तव जैसे लीग जो कभी -कभी संपादक बन जाते है वही पत्रकारिता के चेहरे बनेगे या ईमानदार संपादको की भी चर्चा होगी? मैं दावे के साथ कहा सकता हू की आज भी पत्रकारिता मे ईमानदारी अन्य सभी क्षेत्रो की तुलना मे ज्यादा बची हुई है।

Uday Murhan एकदम सहमत . मेरा आशय आप से भिन्न नहीं है .

Brajkishor Mishra दिनेश सर, पत्रकारिता में सबसे बड़ी दिक्कत है की एक पत्रकार ही दूसरे पत्रकार की लेने में लगा हुआ है … अपने गिरेबाँ देखना किसी को पसंद नहीं।
Jayram Viplav पत्रकारिता और राजनीति “सेवा” के क्षेत्र है यहाँ कदम कदम पर नैतिकता और मूल्यों का तकाजा है लेकिन जब लोग इसे पैशन की जगह प्रोफेशन बना लेंगे तो क्या होगा? और हां यदि जिला ब्यूरो से नीचे प्रखंडों में काम करना हो तो आर्थिक रूप से मजबूत हो।

Dinesh Singh जिला अधिकारी के खिलाफ सत्यप्रकाश मानहानि का मुकदमा करें । मैं हर तरह से मदद के लिए तैयार हूं ।

Brajkishor Mishra विशेश्वर कुमार सर के साथ 12 साल पहले मुझे 2 साल काम करने का मौका मिला था, बड़े ही खड़ूस संपादक थे। जर्नलिज्म को छोड़ कर अपनापन नाम की कोई चीज ही नहीं। बड़े ही सेल्फिश संपादक हैं। सिर्फ खबर से मतलब रखते हैं। एक बार तो दूसरे संस्थान में किसी कारण परेशान हो उनसे नौकरी मांगा था सीधे ना कर बैठे। भविष्य में भी उनसे किसी फेवर की उम्मीद नहीं। लेकिन ये दावे के साथ कह सकता हूँ उनके जैसे पत्रकार और संपादक होना आसान नहीं। अकेले वो दस पत्रकार पर भाड़ी हैं। पत्रकार के सम्मान की सुरक्षा के लिए हमेशा सबसे आगे रहे है। वो कभी-कभी नहीं मेरे सामने बीते डेढ़ दशक में तीन जगहों पर स्थानीय संपादक के रूप में अपना कार्यकाल पूरा किये हैं। मैंने बोल्ड जर्नलिज्म उनसे ही सीखा है।

Dinesh Singh पत्रकारिता केवल खबरों का लेखन नहीं है। यह एक आन्दोलन भी है । भारत मे पत्रकारिता का जन्म ही राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन से हुआ है। शहर का एक बड़ा व्यापारी शहर मे होर्डिन्ग लगाकर पैसा माँगने का आरोप लगाए और संपादक खामोश रहे यह कैसा वोल्डनेस है? काम करना और स्वाभिमान के लिए चट्टान से टकरा जाना अलग -अलग बात है। पत्रकारिता मे ईमानदारी और निर्भिकता बाहर से भी दिखनी चाहिए। यह मानहानि का मुकदमा बनता था। कुछ नही होने से पूरी टीम का सर शर्म से झुका रहा। मै मानता हूं कि आरोप गलत थे जैसे सत्यप्रकाश पर लगे आरोप गलत हैं। मगर चुप रह जाओगे तो लोग तरह -तरह के मतलब निकालेगे ही।
अजय झा ऐसे पत्रकार को सलाम जिसके लेखन से प्रशाशन की….

Sanjay Kumar Singh मैं भी एक पत्रकार हूँ। दो दशक से अधिक समय से इससे जुड़ा हूँ। मैंने कभी नहीं सोचा था कि पत्रकारिता कभी चाटुकारिता में बदलेगी लेकिन कुछ अपवादों को छोड़ दे तो यह अब इससे भी नीचे दलाली में बदल गई है। हर कोई अपना एजेंडा लेकर चल रहा है। जिसमे पत्रकारिता मुखौटा बना हुआ है। सिवान, छपरा, बांका से लेकर पटना तक ऐसे मुखौटाधारि बैठे हुए हैं। ऐसे लोगों को कौन बेनकाब करेगा, शायद कोई नहीं, क्योंकि ये लोग अब सिस्टम में शामिल हो चुके हैं। दिनेश जी को बधाई… सिवान की ईमानदारी भी सीबीआई जरूर सामने लाएगी

Hari Prakash Latta आँख मूँदकर किसी को समर्थन देना या झुटला देना गलत है। बिना सत्यता जाने किसी एक व्यक्ति , घटना को केंद्रित कर सैद्धान्तिक बहस का कोई अर्थ नहीं होता है। हिंदुस्तान के सम्पादक को इन्क्वारी कर उचित निर्णय लेना चाहिए

Kumar Rudra Pratap मैंने देवरे को जाना है गया कार्यकाल के दौरान, ईमानदार और निडर अब तक।

Omprakash Yadav दिनेश जी जिलाधिकारी बाँका का तुगलकी भी कह सकते है और महाराष्ट्रीय फरमान भी कह सकते है आज के दौर का।जिस तरह महाराष्ट् में उत्तर भारत के लोगो को घुसने पर पावंदी हो गया है, चुकी बाँका के जिलाधिकारी महाराष्ट्रा के हैं और बाँका में उसी तर्ज पर काम कर रहे हैं। दिनेश जी आपने सही अनुमान लगाया की मध्यान भोजन बाला मामला बहाना है। एक समाचार पर जिलाधिकारी भड़के हैं।

Neel Sagar यदि सत्यप्रकाश जी पर आरोप गलत लगा है जो सत्य से परे है तो तत्काल उन्हे राय दिजिए कि डी0एम0 के खिलाफ भा0द0सं0 की धारा 499 के आधार पर मान-प्रतिष्ठा के साथ खेलने के लिए 25 लाख रूपया का मानहानि दायर करें।-सम्पादक-नील सागर दैनिक पटना -9835482126

Dinesh Singh अब तुगलकी फरमान जारी करने वाले बाका के जिला अधिकारी का असलियत सामने आ चुका है। —खबर पढ़कर बौखलाए जिला अधिकारी और कुछ नहीं बल्कि अहंकार का नाजायज पैदाइस है। –बिहार मे रहकर बिहारी को गाली देने वाले को तत्काल प्रभाव से सरकार निलम्बित करे। — पूरा बिहार सत्यप्रकाश के साथ है। अब बात साफ हो गई है कि माजरा क्या है । हमारी पत्रकार विरादरी कुछ आदत से लाचार है। ईमानदारी का सार्टिफिकेट हम मुफ्त मे बाटते है। यार पहले अपनी विरादरी पर गर्व करना सीखो। मै पहले ही कह चुका हूं कि पत्रकार विरादरी मे आज भी ईमानदारी बहुत हद तक कायम है। तुम बिहार की जनता की गाढ़ी कमाई पर पलते हो और बिहारी को ही गाली बकते हो। यहा का आदमी जब महाराष्ट्र काम की तलाश मे जाता है तो नपुंसको की परवरिश बनकर हमला करते हो और बिहार आकर बिहारी पर ही रोब गाठते हो। कम से कम सत्यप्रकाश जैसे पत्रकार के रहते यह नही चलने वाला है । सत्यप्रकाश की रिपोर्टिंग यह साबित करता है कि वह पत्रकारिता का हीरो है। सत्यप्रकाश को तुम सरकारी कार्यालय जाने से नही रोक सकते । तुम अपना देखो की तुम कैसे जाओगे । वक्त आ गया है पत्रकार विरादरी अपनी एकजुटता दिखाए।

Amit Roy सत्यप्रकाश जी दुर्गापूजा के बाद इस दिशा में कोई ठोस निर्णय ले।हमलोग आपके हर कदम पर साथ है।

Guddu Rayeen मेरा एक ही हिसाब है ऐसे कलकटर को बिहार से उठा कर बाहर फेक देना चाहिऐ

Himanshu Shekhar Hahaha sir ne article 19 Ni padhe Kya.??? Kabhi bihari word use krte hai kabhi Kuch ? Bhagwan bharose hai Banka zila soch samjhdar kr cmnt kijye sir PTA Ni it act me jail daal Diya jaye

Ashish Deepak इस प्रकार का फरमान पुर्वाग्रह से प्रेरित लगता है। कहीं पत्रकार महोदय ने कड़वा सत्य तो नही लिख डाला ।

Nabendu Jha इस बात को रखने का यह तरीका सही नहीं। बल्कि ,इसके लिए एक जिम्मेदार अधिकारी को बात रखने की सही जगह की जानकारी होनी चाहिए । इसे वापस ले।

Pushpraj Shanta Shastri जिलाधीश ने किसी साक्ष्य के बिना जो निर्देश जारी किया है, यह आश्चर्यजनक नहीं है। हमारी पत्रकारिता ने डीएम से लेकर सीएम की आलोचना की आदत छोड़ दी है। जिलाधीश के पास अगर संवाददाता के द्वारा रिश्वत मांगने के साक्ष्य थे तो उन्हें किसने प्राथमिकी दर्ज कराने से रोका था? मुझे इस फरमान की भाषा में जिलाधीश प्रथम दृष्टया दोषी प्रतीत हो रहे हैं। बिहार के वरिष्ठ पत्रकारों को इस घटनाक्रम को गंभीरता से लेना चाहिए। मैं इस मसले के तथ्यान्वेषण में अपनी भूमिका निभाने के लिए तैयार हूँ, शर्त यह है कि अपने कुछ बंधु साथ शरीक हों। पत्रकारिता कथ्य के बावजूद तथ्य की मांग करता है। जिलाधीश के पक्ष-विपक्ष में तत्काल कोई राय प्रकट करना अनुचित है। महाराष्ट्र-बिहार के प्रदेशवाद की चर्चा फूहड़ता है। जिलाधीश का पत्र तथ्य के बिना कथ्य पर आधारित है इसलिए कथ्य के भीतर की हकीकत के पड़ताल की जरुरत है।

Dinesh Singh जिला अधिकारी किसी वजह से इस तुगलकी हरकत पर उतरे वह प्रकाशित खबर तथ्य बनकर सामने है।

Awadhesh Kumar arajak bihar ka namuna. Jab rajneeti fail karte hi to yehi hota hi.ek dm bihar mei…

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टीवी संपादक प्रसून शुक्ला ने कश्मीर मामले पर पीएम को लिखे संतोष भारतीय के पत्र का यूं दिया जवाब

प्रधानमंत्री जी,

जम्मू-कश्मीर की सैर पर गये चंद संपादक और बुद्धिजीवी यह साबित करने पर तुले हैं कि मसला पाकिस्तान नहीं बल्कि कश्मीर है. इतिहास और भूगोल की सलाह देने वाले कथित स्टोरी राइटर्स से आपको इससे ज्यादा उम्मीद भी नहीं करनी चाहिए. भारत का इतिहास साक्षी है कि यह धरती केवल चंद्रगुप्त मौर्य, साम्राट अशोक, पृथ्वीराज चौहान जैसे वीरों की ही जननी नहीं रही बल्कि जयचंद जैसे कंलक भी इसी की कोख से जन्म लेते रहे हैं. मोदी जी, जनता को शुरू से मालूम है कि आप नेहरू नहीं हैं, गांधी भी नहीं हैं. इसीलिए ही जनता ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री चुना है. आपको करोड़ों-करोड़ लोगों ने जाति-धर्म बंधन को तोड़कर जन आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए चुना है. इसीलिए आपकी एक भी गलती की माफी नहीं होगी. आप आकांक्षाओं के पहाड़ के नीचे हैं. लेकिन इससे आप मुकर नहीं सकते.

प्रधानमंत्री जी, कुछ कथाकार कश्मीर के विलय को दो देशों की संधि बताते हैं. वो जानना ही नहीं चाहते कि कश्मीर भी आजादी के समय भारत के 662 रियासतों में से एक थी. जो गंगा जामुनी तहजीब का एक अहम हिस्सा रही है. भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की पहचान है. जिसे भारत या पाकिस्तान में मिलना ही था. राजा हरिसिंह ने सैद्धांतिक रूप से इसे अपनी मंजूरी पाकिस्तान के आक्रमण के समय दे दी थी. असल में कटी-फटी आजादी देने की मंशा के चलते अंग्रेजों ने आजादी के समय प्रावधान रखा था कि रियासतें भारत या पाकिस्तान में विलय कर लें या अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाये रखें. आजादी के समय गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने अपने सहयोगियों की मदद से एक एक करके भारतीय परिसंघ में शामिल करा लिया था. सबसे बाद में भोपाल रियासत को शामिल किया गया.

प्रधानमंत्री जी, खास बात यह रही कि भारत राष्ट्र के एकीकरण में धर्म की जगह सभ्यता और संस्कृति को तरजीह दी गई. लेकिन सेक्युलरवादियों को यह बात भी नहीं पचती है. सेक्युलरिज्म की पश्चिमी धारणा कभी भी धर्म के सार्वजनिक पहचान को मान्यता नहीं देती है, धर्म को घर के अंदर की चीज मानी जाती है. लेकिन इन्हीं छद्म धर्मनिरपेक्षतावादियों की बदौलत सेक्युलरिज्म की धारणा भारत में आते-आते अपना दम तोड़ देती है. बिगड़ी परिभाषा में बहुसंख्यक की धार्मिक आस्था को तोड़ा-मरोड़ा जाता है जबकि हिंसक प्रवृत्ति वाले अल्पसंख्यकों को उनकी धार्मिक पहचान को सार्वजनिक तौर पर बनाये रखने के लिए प्रोत्साहित करते हैं. हिंसक प्रवृत्तियों से निपटने के लिए वैचारिक और जमीनी धरातल पर वास्तविक संघर्ष ही करना पड़ेगा, जिसमें सरकार से ज्यादा जनता की भूमिका अहम होगी. ऐसे हालात भारत में ही नहीं हैं, बल्कि ऐसी ही समस्याओं से दो-चार हो रहे चीन और कई पश्चिमी देश इसी दिशा में कड़े कदम उठा रहे हैं. धर्म के सार्वजनिक पहचान को कड़ाई से दबाकर राष्ट्र प्रथम का नारा दिया जा रहा है.

प्रधानमंत्री जी, देश आज अपने तक्षशिला की सलामती मांग रहा है. कश्मीरी पंडित अपनी जड़ों में जाना चाहते हैं. उस कश्मीर में, जो कभी तक्षशिला बनकर पूरे विश्व में महका करती थी. जहां पूरे भारतवर्ष से विद्वान आते थे. आज भी लाखों-लाख भारतवासी कश्मीर में बसना चाहते हैं. बर्फ के पहाड़ों पर तपस्या करना चाहते हैं. लेकिन नेहरू काल की भूलों ने कश्मीर को बेगाना सा बना दिया. संकट की घड़ी में सारा देश, जिसका असली प्रतिनिधित्व देश की एक अरब से ज्यादा मध्यमवर्गीय और गरीब जनता करती है, आपके साथ है. देश ने अपने लिए नए युग की कल्पना की, उसका आपको शिल्पकार चुना, सर्वमान्य नेता बनाया. आपका प्रधानमंत्री बनना ही साबित करता है कि लोग कांग्रेसी युग के लिजलिजेपन को त्याग देना चाहते थे.

प्रधानमंत्री जी, पाकिस्तान की करतूतों के चलते जम्मू-कश्मीर में कभी अल्पसंख्यक रहे और अब बहुसंख्यक बन उभरे लोग धार्मिक आधार पर एक और पाकिस्तान बनाने की मांग कर रहे हैं. चंद लोग अपनी सिंधु-हिंदु वाली आदिम पहचान से भी मुंह मोड़ रहे हैं. देश में बिना रीढ़ वाली सरकारों के चलते घाटी से लाखों कश्मीरी पंडितों का पलायन होता रहा. धर्मांतरण होता रहा. इसी विसंगति के चलते आज कश्‍मीर का सच अलग नजर आ रहा है. इस प्रक्रिया को उटलने का वक्त आ गया है क्योंकि अभी तक चारित्रिक दोषों से युक्त सरकार के मुखिय़ाओं में इतना दम नहीं रहा कि वो घाटी को कलंकित होने से बचा पाते. राष्ट्र गवाह है कि देशसेवा के लिए आपने पारिवारिक खुशियों को तिलांजलि दे दी. देश ने भी सही मौके पर अपना सही नेता चुना है. जो तमाम विसंगतियों को दूर कर राष्ट्र को एक सूत्र में पिरो सकता है.

प्रधानमंत्री जी, कश्मीर की समस्या की जड़ धार्मिक अलगाववाद में है. जिसे पाकिस्तान प्रयोजित आतंकवाद की शह मिल रही है. जो सर्वविदित है. धार्मिक अलगाववाद को अपने ही जयचंदों ने हवा दी. नब्बे दशक से ही कश्मीरी नेताओं के रिश्तेदारों के बदले आतंकी छोड़ने की परंपरा ने समस्या को खाद और पानी देने का काम किया. जिसके चलते केंद्र में तत्कालीन गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सैयद की बेटी रूबिया को छोड़ने के 13 आतंकी तो सैफुदीन सौज की बेटी नाहिदा सौज के लिए 7 आतंकी और गुलाम नबी आजाद के साले के बदले 21 आतंकी छोड़े गए. नपुंसक सरकारों ने देश को भी अपाहिज बना दिया. मिलीजुली सरकारों की हैसियत और इच्छाशक्ति की कमी ने कोढ़ में खाज का काम किया. रही सही कसर मलाईखोर बुद्धिजीवियों ने मानवता के लबादे को ओढ़ कर अपने लेखों से पूरी कर दी. बिकाऊ कथाकारों की चले तो देश के हर शहर को मानवता और रेफरेंडम के नाम पर देश को साम्प्रदायिक आग में झोंक देंगे.

पैलेट गन पर बवाल मचाने वाले कश्मीरी पंडितों की हत्याओं पर खामोश रहें. यह हत्यायें एक दिन की घटना नहीं थी, ना ही घाटी में सौ दिनों तक चली सामूहिक कत्ल की कहानी. कश्मीरी पंडितों का कत्ल और उनकी औरतों से बलात्कार सालों साल चला. नपुंसक सत्ता हाथ पर हाथ धरे बैठी रही. पलायन होता रहा. चारित्रिक कमियों से लबरेज सत्ता और कथाकार घाटी की रोमानी स्टोरी छापते और छापवाते रहे. सत्ता से पैसे और भविष्य में सम्मान को आतुर लंपट कथाकर विक्षिप्त कर देने वाली ऐसी विचारधारा के पोषक बन गए, जिसके चलते कभी पाकिस्तान बना था. क्या ये लंपट कथाकार संपूर्ण राष्ट्र की वेदना को सुन रहे हैं? इस समस्या से जल्द से जल्द छुटकारा पाना होगा. जिसे दूर करने के लिए बड़ी सर्जरी की जरूरत है. इसके लिए मोदी जी देशवासी बड़े से बड़े बलिदान के लिए तैयार है. मोदी जी, अब राष्ट्र आपकी ओर देख रहा है…

वरिष्ठ पत्रकार संतोष भारतीय ने पीएम को संबोधित पत्र लिखा था तो उसके जवाब में संपादक प्रसून शुक्ला ने भी पीएम को संबोधित पत्र लिखकर संतोष भारतीय के सारे तर्कों-अवधारणाओं का अपने हिसाब से जवाब दिया. ज्ञात हो कि प्रसून शुक्ला कई चैनलों में संपादक पद पर कार्य कर चुके हैं. प्रसून से संपर्क prasoon001shukla@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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युवा महिला पत्रकार रीवा सिंह का एक खुला ख़त, दुनिया के तमाम सिरफिरे आशिकों के नाम…

Riwa Singh : एक खुला ख़त दुनिया के तमाम सिरफिरे आशिकों के नाम… नासमझ आशिकों, तुम मिलते हो हमें हर गली-सड़क-चौराहे पर। मोहल्ले के हर नुक्कड़ पर किसी न किसी की राह तकते हुए। तुम किसी को पसंद करते हो जिसे ‘बेपनाह मुहब्बत’ कहते हो और फिर इस प्रेम की व्याख्या करने को अपने दोस्तों से यह भी कह देते हो कि वो न मिली तो मर जाऊंगा। प्रेम के इस स्तर की जब अति हो जाती है तो यह सुनने को मिलता है कि वो सिर्फ़ मेरी है। मेरी नहीं हुई तो किसी की नहीं होगी।

इतनी हिम्मत से घर में रखे वीडियो गेम पर भी तुम हक़ नहीं जताते। इतनी हिम्मत तब भी नहीं आती है जब पापा से गाड़ी की चाबी मांगनी हो, पर उस लड़की पर तुम्हारा अचानक ही मलिकाना हक़ हो जाता है और ये भी तब जब उस लड़की को पता भी न हो कि तुम उसे पसंद करते हो।

फिर जब तुम्हारा यह तथाकथित प्रेम पराकाष्ठा तक पहुंच जाता है तो उस लड़की को सबकुछ बताने की ज़हमत उठाते हो। और हां, तुम्हें ‘ना’ सुनना नहीं पसंद। यहां तुम्हारी ही मनमानी चलेगी। पहले उसे खूब एहसास दिलाते हो कि तुमसे ज्यादा खुश उसे कोई नहीं रखेगा। फिर भी अगर लड़की ने मना कर दिया तो देवदास बन जाते हो। पर देवदास बनने के लिए जिगर चाहिए, सबके बस की बात वो भी नहीं। सो तुम अब फिल्म ‘अंजाम’ के विजय बन जाते हो। तुम्हारा ईगो हर्ट होता है और उसके बाद अगर तुम्हारी ही भाषा में कहूं तो तुम ‘अपने बाप की भी नहीं सुनते’।

तुम्हारा निर्माण पंचतत्वों से नहीं हुआ। छठा तत्व भी शामिल है, ईगो। और XXL साइज़ का ये ईगो सर्वोपरि है। इसे तकलीफ़ नहीं होनी चाहिए। हमारा क्या है? ज्यादा से ज्यादा आत्मसम्मान ही तो है। उसे ठेस पहुंचाने से वैसे भी कोई नहीं चूकता इसलिए हमारा आत्मसम्मान तुम्हारे इस ईगो से बहुत छोटा है।

तो तुम्हें वो लड़की चाहिए, हर हाल में। पर क्या करें? उस लड़की को तुम नहीं पसंद। उसकी भी पसंद-नापसंद है न। तुम और तुम्हारे दोस्त उसे चाहें कितना भी कठपुतली समझते रहो पर वो भी ज़िंदा है न! और तुम्हारी बद्किस्मती ये कि वो कहीं बिक भी नहीं रही जो तुम उसे खरीद सको। ख़ैर, कई बार तो तुम जैसे आशिकों की हालत एक बनियान खरीदने की भी नहीं होती पर लड़की वाला मामला साख़ का सवाल बन जाता है। वो साख जो सिर्फ़ तुम्हारी कल्पना में है।

तो अब तुम क्या करोगे? लड़की तुम्हारी हुई नहीं। दोस्त तुम्हें चिढ़ाते हैं। लड़की से ज़बरदस्ती करते हो तो शिकायत भी करती है। लो, उस लड़की ने तुम्हारी इज़्ज़त ख़ाक में मिला दी! अब तुम उसे सबक सिखाओगे। ब्रम्हा ने जब सृष्टि की रचना की थी तब सबक सिखाने का काम तुम्हें ही सौंपा था। तुम्हारे पास विकल्प की कोई कमी नहीं है। चाहो तो रेप कर दो, चाहो तो एसिड फेंक दो। दोनों ही हालत में नैतिकता से लदा ये समाज उसे नहीं पूछेगा और तुम्हारा वो सपना सार्थक हो जाएगा कि तुम्हारी नहीं तो किसी की नहीं।

इससे भी मन न भरे तो मार डालो। उसके जान की कीमत ही कितनी है। टेंशन होती हैं ये लड़कियां! गर्भ में पलती हैं तब भी, देर तक घर से बाहर रहती हैं तब भी। तो तुम उसे जान से मार दो, इसके लिए तुम्हें किसी गली या कोने की ज़रूरत नहीं। बुराड़ी (दिल्ली) में ही देख लो, दिन-दहाड़े सड़क पर उस 22 वर्षीय लड़की को 22 बार चाकू मारा गया। मारने वाला कोई बच्चा नहीं था, 34 वर्ष का आदमी था, सुरेंद्र सिंह। वो लड़की एक ट्रेनिंग सेंटर में कम्प्यूटर क्लासेज़ लेती थी जिसका मालिक सुरेंद्र था। एक साल से ये सब चल रहा था। छः महीने पहले उसने शिकायत भी दर्ज की। पुलिस ने दोनों के परिवारों को बुलाया और मामला सुलझा लिया। अपना काम कम करने के लिए पुलिस अक्सर ही गांधीगिरी का पाठ पढ़ाती है। सुरेंद्र उसके बाद काफी दिनों तक शांत रहा। आज अचानक से मर्दांगी जागी और 22 बार चाकू घोंपकर वीर बन गया।

वो लड़की ज्यादा से ज्यादा तीसरे या चौथे वार में ही मर गई होगी। उसके बाद उसकी लाश को चाकू मारा गया। उसके बाद वो वार नहीं क्षोभ था, हवस थी। उस लड़के की तृष्णा थी जिसकी वो तृप्ति कर रहा था।

सिरफिरे आशिक़ों! तुम्हें क्या लगता है? प्रेम सिर्फ़ तुम करते हो? हमारे हिस्से सिर्फ़ बेवफ़ाई का ठप्पा है? हम कुछ महसूस नहीं करते? तुमने हमें पसंद किया तो हम तुम्हारे हो जाएं, हमें तुम नहीं पसंद तो हमारी इच्छा का कुछ भी नहीं! प्रेम को तो तुम नहीं समझोगे पर अगर इस पसंद को भी समझते हो तो इतना ही समझो कि तुम हमें पसंद कर के पाने के लिए पागल रहते हो तो हम तुम्हें नापसंद कर तुमसे दूर क्यों न रहें? आखिर मामला तो वही है, पसंद-नापसंद का।

मुझे ऋतिक रोशन बहुत-बहुत पसंद हैं। सुशांत सिंह राजपूत की फोटो भी दिख जाए तो बिना छुए नहीं गुज़रती। दोनों में से कोई नहीं मिल सकता बताओ क्या करूं? मैं जिसे पसंद करती हूं वो किसी और को पसंद करता है। बहुत तक़लीफ़ होती है, घुटन होती है। क्या करूं? चाकू मार दूं? एसिड फेंक दूं ताकि वो दूसरी लड़की का ख्याल भी दिमाग से निकाल दे?

हम ऐसा कुछ क्यों नहीं कर पाते? तुम इतने बहादुर कैसे बन जाते हो कि अपने ‘प्रेम’ का ये हश्र कर के उसका त्याग कर दो। प्रेम क्या है ये समझाना नहीं चाहती, तुम वो समझने लायक नहीं हो। पर हम तुम्हारी प्रॉपर्टी नहीं हैं, ये बात समझने में तुम्हें और कितने साल लगेंगे आज ही बता दो। हम उस दिन का इंतज़ार कर लेंगे।

तुम्हारी इन हरकतों से कई बार दो-चार हो चुकी एक लड़की…

युवा महिला पत्रकार रीवा सिंह अमर उजाला डॉट कॉम से संबद्ध हैं. उनका यह लिखा उनकी एफबी वॉल से लिया गया है.

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यूपी में जंगलराज : जेल के चिकित्साधिकारी को क्यों है मौत का अंदेशा, पढ़िए पूरा पत्र

सेवा में
महानिदेशक, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य
महानिदेशालय स्वास्थ्य भवन लखनऊ उ.प्र.
विषय – हत्या से पूर्व का बयान
महोदय

सविनय निवेदन है कि मैं जिला कारागार फिरोजाबाद में चिकित्साधिकारी के पद पर तैनात हूँ। मैं डायबिटीज का मरीज़ हूँ और सुबह-शाम इन्सुलिन लेता हूँ। जनवरी 2016 में जब मैं नवीन प्रा. स्वास्थ्य केंद्र इटौली पर तैनात था, तब मुझे पैनिक एंग्जायटी की समस्या हो गई थी। ढाई महीने तक नियमित दवा लेने और 21 फरवरी से 22 मार्च तक स्वास्थ्य लाभ हेतु अर्जित अवकाश लेने के बाद में पूरी तरह ठीक हो गया।

मैं छुट्टी से वापस लौटा तो मुझे पता चला कि मुख्य चिकित्साधिकारी ने बदले की भावना से मेरा ट्रांसफर जिला कारागार में कर दिया है। जिला कारागार में लेवल तीन की पोस्ट खाली थी जबकि मैं लेवल एक में हूँ। लेवल एक की जिले में 45 पोस्ट खाली हैं और 35 चिकित्साधिकारी कार्यरत हैं और लेवल-2 की ग्यारह पोस्ट हैं और लेकिन सभी भरी हैं। मैंने मुख्य चिकित्साधिकारी को 15.02.16 को आशु लिपिक रामजीलाल गुप्ता के विरुद्ध कार्रवाई करने के लिए पत्र लिखा था जो ACR भेजने के पैसे लेता था और उसके द्वारा ACR न भेजने के कारण 2014 में सात चिकित्साधिकारियों का प्रमोशन लेवल-1 से लेवल -2 में नहीं हो सका। मुख्य चिकित्साधिकारी ने बजाय जांच करने के उसकी पेंशन सुनिश्चित कर दी।

19 मई को मैंने एक पत्र मुख्य चिकित्साधिकारी को लिखा  जिसमें अपनी स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के आधार पर अपनी मूल तैनाती नवीन प्रा. स्वा केंद इटौली पर करने का निवेदन किया। मैंने RTI के माध्यम से आशु लिपिक रामजीलाल गुप्ता पर हुई कार्रवाई के बारे में पूछा। मुख्य चिकित्साधिकारी महोदय ने RTI का जवाब तो आज तक नहीं दिया, तीन दिन बाद जेल से डॉ धर्मेंद्र हरजानी का ट्रांसफर पर दिया। इससे मेरा ड्यूटी सिड्यूल और मुश्किल हो गया और नियमित दवा लेने के बावजूद मेरी स्वास्थ्य समस्या सुधरने के बजाय बढ़ गई। 22 जून को मैंने पुनः चिकित्साधिकारी को पत्र लिखकर अपनी स्वास्थ्य समस्या बताई और चिकित्सा अवकाश के लिए कहा। महोदय ने स्पष्ट शब्दों में कहा – हम तुम्हें चिकित्सा अवकाश नहीं दे सकते।

10 जुलाई को डॉ अमित जिंदल का जेल से ट्रांसफर कर दिया और डॉ संजीव कुमार को उनकी जगह जेल में ट्रांसफर कर दिया। १२ जून को मैंने पुनः जिला अस्पताल के सीनियर कंसलटेंट डॉ अजय अग्रवाल से परामर्श लिया। उन्होंने मुझे दो हफ्ते का रेस्ट लिखा है। दांत में अक्सर दर्द होता रहता है , इसके लिए जिला अस्पताल के डेंटिस्ट ने RCTकराने के लिए लिखा है। मैंने स्वास्थ्य संबंधी नए-पुराने प्रपत्रों के साथ 15 जुलाई को चिकित्सा अवकाश के लिए लिखित फॉर्म भरकर चिकित्साधिकारी को दिया है। मगर महोदय ने अवकाश देने से मना कर दिया है।

बिना किसी वजह के मेरा मार्च के बाद से वेतन भी मुख्य चिकित्साधिकारी ने रोक रखा है। मौखिक रूप से कई बार और 09.06.16 को मैंने लिखित पत्र मुख्य चिकित्साधिकारी को दिया पर मार्च के बाद से मेरा वेतन अभी तक नहीं निकल सका है।

मैं 23.06.16 को अपर निदेशक आगरा व महानिदेशक महोदय को अपने स्वास्थ्य,चिकित्सा अवकाश व वेतन के बारे में लिख चुका हूँ पर कहीं से कोई राहत नहीं मिली। महोदय, इनसोम्निया व एंग्जायटी के लिए सरटालिन, क्लोनेज़ीपाम व ज़ोल्पिडेम मुझे नियमित लेनी पड़ती हैं। रात में नींद बहुत देर से आती है और दिन में दोपहर तक नींद आती रहती है। मैं अकेला  रहता हूँ। जेल शहर से पांच किलोमीटर दूर है। माचिस, आटा, सब्जी तक लेने शहर से पांच किलोमीटर जाना पड़ता है। एंग्जायटी के समय शुगर लेवल तेज़ी से नीचे गिरता है। 15.05.16 को मेरा शुगर लेवल 48 व 23.05.16 को 52 व 10.06.16 को 56 था। ऐसे मैं भी मुख्य चिकित्साधिकारी शाम पांच से सुबह नौ बजे तक कारागार की ड्यूटी। दिन में नौ से पांच तक पोस्टमॉर्टम ड्यूटी और पांच से सुबह नौ बजे तक फिर कारागार ड्यूटी की उम्मीद करते हैं।

29 मई को मैंने सात पोस्टमॉर्टम किए। सड़ी हुई लाशें जहां खड़ा होना दुश्वार था। मोरचरी ऐसी जगह पर है जहां का तापमान 45 डिग्री से ऊपर रहा होगा। बैठ कर खाना खाने तक की जगह नहीं है। पंखा चलवाने के लिए मुख्य चिकित्साधिकारी व चिकित्सा अधीक्षक को कई फोन किए। डेढ़ घंटा पंखा चला कर बंद कर दिया। अगर पानी की बोतल और मीठा मेरे साथ न होता और जब तक आधा किलोमीटर से पानी लेकर व्यक्ति आएगा तब तक किसी भी इन्सुलिन लेने वाले व्यक्ति की हाइपोग्लाइसीमिया से मौत हो सकती है।

मेरी स्वास्थ्य समस्या ऐसी है जिसके साथ मैं काम तो कर सकता हूँ परंतु उससे तात्कालिक रूप से वह मेरे लिए जानलेवा हो सकता है और  लंबे समय में मेरे स्वास्थ्य पर बेहद बुरा असर डाल सकता है। मेरे साथ भी कहीं पर किसी भी तरह से ऐसी दुर्घटना घटती है तो इसके लिए सीधे तौर पर मुख्य चिकित्साधिकारी को ज़िम्मेदार ठहराया जाए। मेरा वेतन निकलवा दिया जाए। मेरा NPS का और ACP का पैसा मेरे माँ-बाप को दे दिया जाए (रामजीलाल गुप्ता द्वारा ACR न भेजने के कारण मेरा प्रमोशन नहीं हुआ और ACP की पहली लिस्ट में मेरा नाम नहीं है ) । 2014 में मेरे जवान भाई की मृत्य के बाद उसकी आठ साल व चार साल की बच्चियां मुझ पर आश्रित हैं सरकार उनके पालन-पोषण व अध्ययन की व्यवस्था करे। जिन – जिन अधिकारियों को मैंने पत्र लिखे हैं वे सब मेरी फाइल में उपलब्ध हैं।

सधन्यवाद

प्रार्थी
डॉ राम प्रकाश
चिकित्साधिकारी
जिला कारागार फिरोजाबाद उ. प्र.
वरिष्ठता क्रमांक – 13517 
मोबाइल – 8273492240

प्रतियां
1. महानिदेशक चिकित्सा एवं स्वास्थ्य लखनऊ        
2. अपर निदेशक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण आगरा
3. मुख्य चिकित्साधिकारी फिरोजाबाद

संलग्नक-
1. 15.02.16 को मुख्य चिकित्साधिकारी को लिखे पत्र की प्रति
2. 19.05.16 को मुख्य चिकित्साधिकारी को लिखे पत्र की प्रति
3. 22.06.16 को मुख्य चिकित्साधिकारी को लिखे पत्र की प्रति
4. पुराने व नए चिकित्सा संबंधी दस्तावेज पृष्ठ

दिनांक-  25.07.2016

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बेटियों के नाम असीमा भट्ट का खुला ख़त

प्यारी बेटियों

आज तुम सब से कुछ ज़रूरी बात करना चाह रही हूँ. राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में ‘छऊ’ सीखते हुये पैर तोड़कर मेसोनिक क्लिनिक, जनपथ दिल्ली के  आर्थोपेडिक से मिली तो हम दोस्त बन गए. उन्हें नाटक देखना बहुत पसंद था इसलिए अक्सर नाटक देखने आते थे. एक दिन डॉक्टर नरेन ने मुझसे पूछा कि अकेली औरत होते हुए क्या दिक्क़तें आईं?

मैंने कहा- वही जो पूरे युनिवेर्स की औरतों को…..

उन्होंने हँसते हुए कहा –  वाह! बहुत आसान जवाब है.

हाँ, जवाब आसान भी है और मुश्किल भी. अकेली औरत और ऊपर से मैंने पत्रकारिता, साहित्य, रंगमंच और सिनेमा सभी क्षेत्र में काम किया है. बहुत कुछ जानती हूँ. तो मेरे अनुभव भी औरों से ज़रा हट के होंगे न ….

एक बार एक नाती-पोते वाले एन.आर.आई. ने प्रस्ताव रखा कि विदेशों में तो अभिनेत्रियाँ अपने से बड़े उम्र के किसी अमीर और फेमस आदमी से शादी कर लेती है. और ज़िन्दगी ऐश से गुज़ारती है. हीरे की अंगूठी मेरे सामने पेश कर दिया.

मैंने कहा –  नहीं ले सकती. आपके प्रस्ताव और सुझाव से पहले ऐसा कर चुकी हूँ.

वे चौंके?

मैंने कहा – हाँ, मैं अपने से उम्र में लगभग 25 साल बड़े मशहूर कवि से शादी करके चुकी हूँ लेकिन ऐश नहीं कर रही. संघर्ष कर रही हूँ और अपना काम कर रही हूँ.  

तुम लोग बड़ी हो रही हो. तुमलोगों के सामने भी कई ऐसे प्रस्ताव आयेंगे/आते होंगे. 

हमारे सामज में कुछ साहित्यकार, पत्रकार, वरिष्ठ रंगकर्मी और फ़िल्म निर्देशकों ने कुछ ऐसे जोड़ों के नाम रट लिए हैं जिनके रिश्ते में उम्र का फ़ासला रहा है. जैसे चेख़व (रशियन लेखक और नाट्यकार) और अभिनेत्री ओल्गानिपर, चार्लिन चैपलिन और ओना ऑलिन, टॉम क्रूज़ और कैटी होल्म्स, दिलीप कुमार और शायरा बानो…. ऐसे नामों को गिना कर लड़कियों से कहते हैं – बहुत अकेला हूँ और  गाना सुनाते हैं – ‘न उम्र की सीमा हो न जन्म का बंधन हो….’

यह नहीं कहती कि ऐसे रिश्ते ग़लत हैं लेकिन सही भी नहीं है. ख़ास कर जब कुछ चालाक प्राणी द्वारा फांसने के लिए सिर्फ़ तुम्हारा ब्रेन वाश करके या हिप्नोटाइज़ करके ऐसे रंगीन/रूमानी रिश्तों के सपने दिखाए जाते हैं.  हकीकत में यह रिश्ते उतने रूमानी नहीं होते…. जितना होना चाहिए. कोई भी फ़ासला इतना आसान नहीं होता कि उसे आसानी से पाटा जाए इसके लिए बहुत समझदारी और परिपक्वता की ज़रूरत होती है.

जब मॉल जाती हो अपने लिए कपड़े लेती हो इतना देखकर, सोच समझकर फ़ैसला लेती हो तो शादी तो ज़िंदगी का सबसे अहम फ़ैसला है. उसके बारे में गंभीरता से सोचोगी न?
लोग रूमानी बातें करके तुम्हें फांस तो लेंगे बहुत कम ही उसे निभा पाते हैं. अभी हाल ही में एक बुद्धिजीवी / पत्रकार / कवि जिनकी मृत्यु हो गयी. लोग कहते हैं – ‘उम्र के आखरी पड़ाव पर उनकी पत्नी ने उनकी भूमिका लिख दी इसलिए मर गए.’

ऐसा भी नहीं है जो शादियाँ बराबरी के उम्र में होती हैं वो नहीं टूटती.  टूटना कुछ भी बुरा होता है…  रिश्ता कोई भी हो खत्म होने के लिए तो जोड़े नहीं जाते….. और जब वो टूटता है या खत्म होता है तो बहुत दर्द होता….. बहुत तकलीफ़ होती है….. ऐसा दंश है जो जीवन भर सालता है…..

गुलज़ार की फ़िल्म ‘इजाज़त’ में अभिनेत्री कहती है – “जब शादी मर जाती है तो उससे बदबू आने लगती है.”

अपनी ज़िन्दगी का हर फैसला लेने के लिए तुम सब आज़ाद हो लेकिन फ़ैसला अपने दिल और दिमाग़ से लेना ऐसा नहीं कि कोई तुमपर ऐसे फ़ैसले के लिए हावी हो रहा है. रूमानी बाते अच्छी लगती है लेकिन यह बातें हैं, बातों का क्या? जब तुम लीक से हट कर चलती हो और अपनी ज़िन्दगी का ऐसा कोई फ़ैसले करती हो तो तुम्हारी जिम्मेदारी और ज़्यादा बढ़ जाती है कि जो तुम मिसाल क़ायम करने जा रही थी उसमें कितनी कामयाब हुई? कहीं मज़ाक़ बनकर न रह जाओ.

मेरी एक बात हमेशा याद रखना ज़िन्दगी में हमसफर ऐसा चुनना जो तुम्हारी इज्ज़त करे. जिस पर तुम्हें तो क्या दुनिया को नाज़ हो वरना लोग यह भी कहेंगे किसे चुन लिया और तुम्हें कभी अपने फ़ैसले पर अफ़सोस न हो ….

प्यार कभी भी, किसी को भी, किसी से हो सकता है. प्यार को प्यार की तरह जिया जाए तो इससे ख़ूबसूरत कोई शय दुनिया में नहीं.  दरअसल इन्सान का जन्म प्यार करने के लिए हुआ है लेकिन प्यार करना भूलकर बाक़ी सब करने लगा.

चालाकी से, धोखा से, झूठ बोल, छल-प्रपंच से किसी को फाँसना….. बस किसी तरह हासिल कर लेना और जब मन भर जाए किसी और की तलाश जारी…. न जाने कितने झूठ…. एक झूठ को छुपाने के लिए कई और झूठ … कितना कुछ याद रखना पड़ता है….. इस एक झूठ के चक्कर में….. प्यार दिल का मुआमला है. इसमें दिमाग़ का इस्तेमाल बिल्कुल वर्जित है…..

हद तो तब देखा जब एक दर्ज़न रिश्ते बनाने वाले/वाली ज़्यादा रोना रोते पाए जाते हैं कि अकेला/अकेली हूँ…. प्यार नहीं मिला….. किसी ने समझा नहीं…… अकेले इसलिए हो कि किसी के साथ नहीं हो….  किसी को समझने की कोशिश नहीं की….. झुप्प्म-झुपायी वाला प्यार बहुत हो रहा है. ….औरत अपने पति बच्चों से झूठ बोल रही है…

पति अपनी पत्नी और बच्चों से झूठ बोल रहा…. सहूलियत वाला प्यार…. तू सबसे छुपा…. मैं दुनिया से छुपाता हूँ…. एक कहानी/कविता छपती है….. फिल्में/वीडियो बनाते हैं तो कूद कूद कर बताते हैं….  पढो-पढो.. देखो-देखो…. अपनी राय दो….. प्यार क्यों छुपाते हो?  क्योंकि मन में चोर है?  ख़ुद आश्वस्त नहीं हो?  पता है कि ग़लत कर रहे हो?

भगवती चरण वर्मा या आचार्य जानकी बल्लभ शास्त्री के उपन्यास में पढ़ा था – पाप क्या है?

“जो छुपाकर किया जाए पाप है.”

जो एक के साथ ईमानदार नहीं वो किसी के भी भरोसे के लायक नहीं.

‘प्यार करना और जीना उन्हें कभी न आएगा
जिन्होंने ज़िन्दगी को बनिया बना दिया”
–  पाश

कबीर की तरह प्यार करो – “हमन है इश्क़ मस्ताना. हमन को होशियारी क्या?”

ख़ुश रहो….

खुल कर जियो…

ज़िन्दगी की हर खुबसूरत चीज़ पर तुम्हारा हक़ है…

प्यार

असीमा भट्ट

कवियत्री और अभिनेत्री

मुंबई

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चीफ रिपोर्टर के नाम पत्र : आपको सिर्फ पुरुषों से प्राब्लम क्यों है?

आदरणीय चीफ रिपोर्टर जी
सन्मार्ग
कोलकाता

आपको प्रणाम।

मुझे तो पहचान ही गये होंगे आप। मैंने 3-4 साल आपके अधीन काम किया था लेकिन आपके रवैये के कारण मुझे सन्मार्ग छोड़कर कम तनख्वाह पर दूसरे अखबार में नौकरी करनी पड़ी। उस वक्त आप चीफ रिपोर्टर ही थे। अभी किस पद पर हैं पता नहीं इसलिए चीफ रिपोर्टर ही संबोधित कर रहा हूँ। मैंने पहले तय किया था कि सन्मार्ग को पत्र लिखूंगा और लिख भी चुका था लेकिन पिछली रात जब अपने पुराने दिन याद कर रहा था तो मुझे खयाल आया कि क्यों न सीधे आपको ही पत्र लिखूं इसलिए सन्मार्ग को लिखे पत्र को अपने लैपटॉप से डिलीट किया और फिर आपको पत्र लिखा।

आपके लिए मेरे पास कई सवाल हैं। गुस्सा भी है और नसीहत भी। आप ठहरे हमारे एक्स बॉस सो आप हम जैसों की नसीहत तो लेंगे नहीं। मत लीजिये लेकिन सवाल पूछने का अधिकार तो मुझे है और मैं पूछूंगा। सबसे पहले तो मैं आपसे यही पूछना चाहता हूँ कि आपको पुरुषों से नफरत क्यों है? दिवंगत लेखक राजेंद्र यादव ने ही शायद अपने उपन्यास ‘सारा आकाश’ में लिखा था कि नारी ही नारी की कष्टों का कारण है लेकिन यह किसने लिखा था कि पुरुष ही पुरुष के कष्टों का कारण है, मुझे नहीं पता। आपको पता हो तो जरूर बताइये।

महिलाएँ पुरुषों से नफरत करें यह भी समझ में आता है लेकिन मेरे पल्ले यह बात नहीं पड़ रही है कि आपको केवल और केवल पुरुषों से ही नफरत क्यों है? सन्मार्ग से पहले आप जहाँ काम करते थे, वहाँ क्या किसी पुरुष ने आपको सताया था? उसी का खुन्नस निकालते हैं? अगर ऐसा है तो हम जैसे दर्जनों कलमघसीट जो आप द्वारा प्रताड़ित किये जाने के कारण सन्मार्ग छोड़ चुके हैं, आप की ही राह पर चल दें? अगर ऐसा होगा तो आप कल्पना कर सकते हैं कि मीडिया हाउस के दफ्तरों का स्वरूप क्या होगा। कहीं ऐसा तो नहीं कि आप हीनता के शिकार हैं इसलिये पुरुषों के साथ ऐसा करते हैं?

सन्मार्ग के बारे में बाहर में चर्चा है कि यह हाउस महिला सशक्तीकरण को बढ़ावा देता है। आपको भी पता है कि ऐसा क्यों कहा जा रहा है। आपके कान तक भी ये बातें पहुँचती होंगी। कभी आपने इस पर विचार किया है कि ऐसा क्यों कहा जाता है। महिला सशक्तीकरण अच्छी बात है। अब तो महिलाओं को हर क्षेत्र में आरक्षण मिल गया है लेकिन आप पुरुषों की जलालत की शर्त पर महिला सशक्तीकरण क्यों कर रहे हैं?

महिलाओं और पुरुषों की प्रतिभा को मापने के लिए आपने अलग-अलग बैरोमीटर क्यों रखा है? जो सिरदर्द होने पर आपके माथे पर अमृतांजन मल दे, बुखार होने पर फफकते हुए दवाई दुकान में जाये और दवाई खरीदकर ला दे, कमजोरी महसूस होने पर गर्म दूध में हॉरलिक्स घोरकर पीने को दे, सुबह-सुबह फोन कर आपकी तबीयत के बारे में पूछे वे महिलाएं आपकी नजर में बहुत अच्छी पत्रकार हो जाती हैं। आपने नहाया कि नहीं यह जो पूछ लेती है उसे एक्स्ट्रा प्वाइंट्स मिल जाते हैं। आधी रात को अखबार का काम निपटाकर महिला पत्रकारों को आप फोन करते हैं। जो तुरंत फोन उठा लें और कम से कम आधे घंटे तक बेमतलब की बातें करें वे अच्छी पत्रकार का तमगा पा जाती हैं और जो फोन नहीं उठातीं, कल को उनकी क्लास लगती है। क्लास लिये जाने के बाद भी नहीं सुधरने वाली महिला पत्रकारों को कोपभाजन बनना पड़ता है।

जब अखबार की छपाई शुरू हो जाती है तब ऐसा कौन-सा जरूरी काम होता होगा जिसके लिए आप इन लड़कियों को फोन करते हैं? क्या आपको पता है कि निम्नमध्यवर्गीय परिवार की लड़कियों को जब आधी रात के बाद फोन आते हैं और उन्हें न चाहते हुए भी कम से कम आधे घंटे तक हंसकर-मुस्कराकर बतियाना पड़ता है तो उसके पिता-माँ-भाई उससे क्या-क्या सवाल पूछते होंगे? या छुट्टी के दिन भी फोन कर एक-एक घंटे तक ऊलजुलूल बातें करते होंगे तो उनके साथ छुट्टी बिता रहे उनके परिजन क्या सोचते होंगे? ये मेरी जिज्ञासाएँ हैं। मैं बस जानना चाहता हूँ कि ये सब करते हुए आपके जेहन कभी इस तरह के सवाल आये की नहीं। मुझे उम्मीद है कि आप नाराज नहीं होंगे बल्कि इस पर विचारेंगे क्योंकि ये गंभीर मसला है। आपके चलते बाहर गलत संदेश जा रहा है।

3-4 वर्ष आपके अंडर में काम करके मैंने यही महसूस किया कि आपको पुरुष पत्रकार ऐसे चाहिए जो लिख भी लेता हो और साथ ही उनके शरीर की संरचना भी अलग हो। संरचना अलग होने को आप कुछ और मत समझिये। संरचना अलग से मेरा आशय है आपको ऐसे पुरुष पत्रकार चाहिए जिनकी रीढ़ की हड्डी बेहद लचीली हो और उनके कान में फिल्टर लगे हों। इसके अपने फायदे हैं। रीढ़ की हड्डी लचीली होने से वे तुरंत झुक जायेंगे और कान  में फिल्टर लगे होने के कारण आपके मुंह से निकलने वाले गुड़ जैसे मीठे बोल छनकर उनके कान तक पहुँचेंगे ताकि उन्हें शूगर का खतरा न रहे। उदाहरण के तौर पर अगर आप पुरुष पत्रकार से कहें कि तुम नाली के कीड़े हो तो उन्हें सुनाई पड़े कि तुम बहुत मेधावी हो। अब इतने मीठे बोल बोलेंगे आप तो पुरुष पत्रकार कहाँ से पचा पायेंगे, इसलिए उन्हें नौकरी छोड़नी पड़ती है। जिनके कान में फिल्टर लगा होगा उन्हें भी यह मीठा ही लगता होगा। हाँ, जो आपके मीठे बोल सुनकर घर जाते होंगे और वहाँ नीम के पत्ते चबाते होंगे, वही लोग लम्बे समय तक आपके साथ काम कर पाते होंगे।

वैसे महिलाओं के चयन के आपके जो नियम हैं उनमें वे लड़कियाँ भी पिस जाती हैं जो सचमुच में पत्रकारिता ही करना चाहती हैं। कारण कि आप इन लड़कियों से भी वैसी ही उम्मीद पाल लेते हैं लेकिन जब वे आपकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरती हैं तो उनके साथ भी वैसा ही सुलूक होता है जो पुरुष पत्रकारों के साथ किया जाता है। आप चाहते हैं कि लड़कियाँ शादी भी अगर करे तो आपसे पूछकर, ये क्या बात हुई? आप इन लड़कियों क्या लगते हैं कि आपसे पूछकर ये शादी करेंगी।

खैर…छोडिये इन बातों को। आपके साथ काम करके मुझे एक नई चीज सीखने को मिली कि महिला पत्रकार का प्रमोशन होता है तो वे अनौपचारिक पर्सनल सेक्रेटरी बन जाती हैं। तब पर्सनल सेक्रेटरी का काम होता है आपका फोन उठाना, टिफिन खोलकर खाने को देना, सर का टेबुल साफ कर सामानों को सजाकर रखना, आप आपिस में आयें तो नीचे उतरकर आपका बैग उठा लाना आदि। मुझे लगता था कि रिपोर्टर का प्रमोशन सीनियर रिपोर्टर, फिर विशेष संवाददाता, फिर चीफ रिपोर्टर वगैरह-वगैरह होता होगा लेकिन अब जाना कि पर्नसल सेक्रटरी भी एक सीनियर पोस्ट होता है महिला पत्रकारों के लिए। यह अच्छा है। मुझे लगता है कि आप पत्रकारिता के क्षेत्र में कुछ नया कर रहे हैं जिसे आने वाली कई पीढ़ियाँ याद रखेंगी। 

आप जिस पद्धति से कर्मचारियों का चयन करते हैं, वह गजब है। निजी कंपनियों को आपसे सीखना चाहिए। चयन के लिए जो परीक्षा आप लेते हैं उसमें जितना अधिक गलत लिखा जाता है मार्क्स उतने अधिक मिलते हैं क्योंकि आपके पास मोलभाव करने का विकल्प रहता है गोया आपको रिपोर्टर नहीं बैगन, गोभी और आलू चाहिए। आप लड़कियों और लड़कों को यह कह पाते हैं कि भई आपकी हिन्दी बहुत खराब है, हम आपको सिखायेंगे इसलिए पैसे कम देंगे। मेरी सलाह मानिये तो आप किसी निजी कंपनी में मानव संसाधन प्रबंधक बन जाइये। आप अपनी प्रतिभा से कंपनी को फर्श से अर्श पर पहुँचा दीजियेगा।

यह अच्छी बात है कि आप वैसी लड़कियों को नौकरी देते हैं जो आर्थिक रूप से कमजोर हों। जरूरत पड़ने पर उनकी आर्थिक मदद भी करते हैं लेकिन ऐसा कर आप उन्हें एहसान तले हमेशा दबाये रखते हैं, यह ठीक नहीं है। असल में निम्नमध्यवर्गीय परिवार से आने वाली इन लड़कियों पर पारिवारिक दबाव होता है जिस कारण वे कई बार मजबूर हो जाती हैं। मुझे लगता है कि ऐसा कर ये महिलाएं पत्रकारिता के पेशे के साथ न्याय नहीं कर रही हैं। पत्र के मार्फत मैं उन लड़कियों से अपील करना चाहता हूँ जो अखबार की नौकरी करना चाहती हैं। प्लीज अगर आप सच में पत्रकारिता करना चाहती हैं तो पहले खुद को टटोल लीजिये, इसके बाद ही इस पेशे में आइये। आपको कोई हक नहीं है कि पत्रकारिता के नाम पर आप कुछ और करने लगें और दूसरी लड़कियाँ जो ईमानदारी से काम करती हैं उन्हें भी आपके जैसा करने पर मजबूर किया जाये।

सर आपने पत्रकारों के लिए अब कई विकल्प खोल दिये हैं। अभी लोग कहते हैं कि आप सन्मार्ग के चीफ रिपोर्टर हैं और प्रमोटर भी। आने वाले समय में दूसरे पत्रकार जो मालिक के कृपापात्र होंगे या नहीं भी होंगे, वे आपके रास्ते पर चलेंगे और तब लोगबाग कहेंगे कि फलां पत्रकार जमीन की दलाली भी करता है, फलां पत्रकार इंश्योरेंस एजेंट भी है, फलां पत्रकार ट्रांसपोर्टर भी है। वे अपने विजिटिंग कार्ड पर लिखेंगे जर्नलिस्ट कम लैंड ब्रोकर, जर्नलिस्ट कम इंश्योरेंस एजेंट वगैरह वगैरह। हमें बस डर इस बात का है कि लोग यह न कह दे कि पत्रकार मोटिया मजदूर भी है या पत्रकार बसों में कंडक्टरी भी करता है। अगर ऐसा होगा तो इसके लिए आप जैसे लोग ही जिम्मेवार होंगे जो ईमानदारी से काम करने वाले पत्रकारों का कायदे से इनक्रीमेंट भी नहीं करवाते हैं। आपको याद है मेरे सन्मार्ग में रहते कितनी बकलोल लड़कियाँ आयीं जिनकी तनख्वाह दो साल में ही मुझसे ज्यादा हो गयी थी। अगर छोटे स्तर के गॉडफादरहीन पत्रकार दोस्तों को अच्छी तनख्वाह नहीं मिलेगी तो वे मजबूर होकर यही सब करेंगे न।

सर आप मालिक के सामने जाकर 5 सेकेंड में 10 बार सर बोलते हैं और अनैतिक काम (मसलन नो पार्किंग में पार्क कर देने पर पुलिस से गाड़ी छुड़वाना, जहाँ पटाखे फोड़ने की इजाजत नहीं वहां पटाखे फोड़ने के लिए पुलिस से एनओसी दिलवाना, हवाई जहाज के शौचालय में साबुन की टिकिया डलवाना आदि) भी अलाउद्दीन के चिराग के जिन्न की तरह चुटकी में करवा देने का आश्वासन दे आते हैं। इन डिमांडों को पूरे करने के लिये जब लड़कियों पर दबाव बनाते हैं तो आपको पता है इन लड़कियों को बड़े अफसरों के आगे कितना गिड़गिड़ाना पड़ता होगा। जब ये पत्रकार महिलाएँ उनके सामने गिड़गिड़ाती होंगी तो कसम से पत्रकारिता के स्तम्भों की दिवंगत रूह जार-जार रोती होगी। आप जरा सोचिये जब ये अफसरों की चिरौरी करती होंगी तो ये अफसर क्या सोचते होंगे? क्या कोलकाता से हिन्दी पत्रकारिता की शुरूआत इसलिए हुई थी कि 21वीं सदी में इसका स्वरूप ऐसा हो जाये?

सुनते हैं कि सन्मार्ग जब बंद होने की कगार पर था तो बाबू रामअवतार गुप्ता (दिवंगत) खुद लोगों को अखबार बांटते थे। क्या यही दिन देखने के लिये उन्होंने सन्मार्ग को खड़ा किया था? आप तो अक्सर कहते थे कि गुप्ता जी (राम अवतार) को आप पर बहुत भरोसा था, क्या आप उस भरोसे को तोड़ नहीं रहे हैं? आप रोज उनके भरोसे का कत्ल नहीं कर रहे हैं? अगर आप सोच सकते हैं तो सोचिये और थोड़ी-सी शर्म कीजिये।

पत्र यहीं समाप्त करता हूँ।

लेखक उमेश राय सन्मार्ग के वरिष्ठ पत्रकार रहे हैं. इन दिनों दिल्ली में पानी की समस्या पर काम करने वाली एक एनजीओ के लिए काम कर रहे है. उन्होंने कोलकाता और सन्मार्ग को जिस लिजलिजेपन से जिया है, उसे फेसबुक पर बयां किया है.

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गुलाब कोठारी जी, इमरजेंसी तो आपने अपने आफिस में लगा रखी है

‘जर्नलिस्ट जयपुर’ नामक एफबी एकाउंट की वॉल पर पोस्ट किया गया पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी के नाम खुला पत्र….

माननीय गुलाब कोठारी जी,

आपका विशेष संपादकीय ‘ये भी इमरजेंसी’ पढ़ा। आपने जिस तरह आपके अखबार ‘राजस्थान पत्रिका’ को दिए जाने वाले सरकारी विज्ञापनों पर रोक लगाने को लेकर मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे पर हमला बोलते हुए इसे “जनता की सुध ना लेने” से जोड़कर आगामी चुनाव में सत्ता ना मिलने का चेताया है, यह मुझे प्रभावित कर गया!! किसी मुद्दे पर आपकी और मुख्यमंत्री की लड़ाई में सरकारी विज्ञापनों पर अघोषित रोक को आपने जिस तरह इमरजेंसी करार दिया है, यह पढ़कर तो जनता भी भौंचक रह गई होगी!! जनता में भी डर समा गया होगा कि कहीं सोशल मीडिया पर सरकार के खिलाफ कुछ लिखने से उनकी कॉलोनी में अघोषित बिजली कटौती शुरू ना हो जाए!! वगैरह-वगैरह!!

आपने इमरजेंसी शब्द का शानदार उपयोग किया है. मुख्यमंत्री की दिवंगत माता विजयराजे सिंधिया की भी स्वर्ग से भावनाएं भांप ली. बहुत ही बढिय़ा! आपके इस विशेष संपादकीय का पूरे दिन सोशल मीडिया, वाट्सएप पर चलाए जाने का अभियान भी रोचक रहा क्योंकि बीच-बीच में कोई ना कोई आपको आईना दिखा ही रहा था। आपके ही अखबार के कर्मी कहते दिखे कि इमरजेंसी तो आपने अपने ऑफिस में लगा रखी है। केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित मजीठिया वेज बोर्ड को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी लागू नहीं करके कर्मचारियों को प्रताडि़त कर रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला नहीं मानने पर कर्मचारियों द्वारा आपके खिलाफ 7 अवमानना याचिकाएं लगाई गई हैं। इस पर आप कई कर्मचारियों को बर्खास्त, निलंबित और दूरदराज तबादले कर चुके हैं। केस नहीं करने वाले बाकी कमजोर कर्मचारियों पर काम का दबाव बढ़ा रहे हैं, जिससे वे आगे भी नतमस्तक रहें। इमरजेंसी तो यह होती है!! हाल ही आपके एक वरिष्ठ अधिकारी ने भरी मीटिंग में पत्रकारों की तुलना कुत्ते से कर दी!! क्या यह इमरजेंसी के हालात नहीं? आपने अपने विशेष संपादकीय में मुख्यमंत्री की दिवंगत माता विजयराजे सिंधिया के बारे में लिखा कि ‘वे भी स्वर्ग से देख रही होंगी कि किस-किस के दबाव में सीएम क्या-क्या गलत निर्णय कर रही हैं।’ क्या आपके पिता कर्पूर चंद्र कुलिश स्वर्ग से नहीं देख रहे होंगे कि बिना किसी दबाव के मेरे उत्तराधिकारी क्या-क्या गलत निर्णय कर रहे हैं?

जर्नलिस्ट जयपुर नामक एफबी एकाउंट की वॉल से.

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कोलकाता के तीन हिंदी अखबारों के स्थानीय संपादकों के नाम एक पूर्व मीडियाकर्मी का पत्र

आदरणीय
रेजिडेंट एडिटर्स जी

प्रभात खबर,
दैनिक जागरण
राजस्थान पत्रिका
कोलकाता

सबसे पहले तो मैं आप लोगों को प्रणाम करता हूँ। सामने होेते तो दिल पर पत्थर रखकर आपके पैर भी छू लेता। बाकी चीजें छूने में मेरी कोई रुचि नहीं है। मेरी वैसे कोई औकात नहीं है कि आप जैसे धुरंधर, पारखी और पत्रकारिता के क्षेत्र में नये मानदंड तय करने वाले महान लोगों को पत्र लिखूं। मैं एक मसिजीवी हूँ और मेरा परिचय बस इतना है कि भारतमित्र से मैंने अपना करियर शुरू किया था। बाद में सन्मार्ग, कलयुग वार्ता और फिर सलाम दुनिया में कलम घिसने का काम किया। फिलहाल दिल्ली में हूँ।

1995 में बिहार से कोलकाता पलायन किया और कोलकाता में 20 साल गुजारने के बाद अब दिल्ली पलायन करने पर मजबूर होना पड़ा।  आप समझते होंगे कि रवीश कुमार या रोहित सरदाना से प्रेरित होकर मैं यह पत्र लिख रहा हूं तो आपको बताना चाहता हूँ कि ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। अगरचे ये बड़े पत्रकार हैं इसलिए प्रेरित कर ही सकते हैं। पत्र लिखने को मैं इसलिए मजबूर हुआ हूँ कि जब से कोलकाता छोड़कर दिल्ली आया हूँ दिल में एक अकुलाहट है। कोलकाता में मैं पिछले 20 वर्षों से रह रहा था लेकिन अब घर-बार परिवार छोड़कर दिल्ली आ गया हूँ। कह लीजिए कि अपनी जड़ें उखाड़कर दिल्ली के बेदिल माहौल में पलने-बढ़ने आया हूँ। मन नहीं कर रहा था कि कोलकाता छोड़ूं लेकिन छोड़ना पड़ा। मजबूर होकर। दिल में खलिस लेकर।

जरा बताइये तो कभी आपको इस तरह अपना घर-बार छोड़कर पलायन करना पड़ा है ? कभी ऐसा हुआ है कि आपके काम की सराहना की गयी हो लेकिन कई दफ्तरों में घूमने के बावजूद आपको अच्छी तनख्वाह वाली नौकरी नहीं मिली हो और आपको अपना शहर छोड़ना पड़ा हो ? अगर ऐसा हुआ था तो कैसा महसूस किया था आपने? मैं जब आपको यह पत्र लिख रहा हूँ तो सिर्फ इसलिए नहीं कि मैं दुःखी हूँ। पिछले 4-5 वर्षों में कोलकाता से पलायन कर चुके पत्रकारों और संप्रति पलायन के लिए छटपटा रहे कोलकाता के दर्जनों पत्रकारों की व्यथा भी इसमें शामिल है। आपलोग तो रेजिडेंट एडिटर के पदों पर आसीन हैं। क्या आपको पता है कि कोलकाता से पत्रकार क्यों पलायन कर रहे हैं? क्या आपको जरा भी इल्म है कि कोलकाता में काम कर रहे ईमानदार पत्रकार अपना घर-बार छोड़कर क्यों दिल्ली, पटना या दूसरे शहरों में जाने के लिए छटपटा रहे हैं?

कोलकाता में हिन्दी पत्रकारिता का जन्म हुआ। सम्प्रति सन्मार्ग, प्रभात खबर, दैनिक जागरण, राजस्थान पत्रिका समेत छोटे बड़े लगभग एक दर्जन अखबार निकल रहे हैं। इसके बावजूद पत्रकार पलायन कर रहे हैं, कभी यह सोचकर आप शर्मिंदा हुए हैं कि नहीं? छोड़िये सर, आपको तो पता ही नहीं होगा कि आपके दफ्तर में काम करने वाले ईमानदार पत्रकारों के दिमाग में क्या चल रहा है। मैं बताता हूँ। वे इस इंतजार में हैं कि जितना उन्हें मिल रहा है उससे 2-3 हजार ज्यादा भी अगर दूसरे शहरों में मिल जाये तो वे कलेजे पर पत्थर रखकर कोलकाता छोड़ देंगे। जो पलायन कर चुके हैं उनका भी यही खयाल था।

आपको सुनने में खराब लग सकता है लेकिन मैं यह कहने के लिये मजबूर हूँ कि आपलोगों ने कोलकाता की हिन्दी पत्रकारिता का जो हाल कर दिया है, आने वाले दिनों में और भी ईमानदार और काबिल पत्रकार पलायन करेंगे क्योंकि आपलोग जीने-खाने लायक तनख्वाह नहीं दिलवाते हैं और जिन लोगों को मिल रही है उनसे गदहों की तरह काम करवा रहे हैं जबकि अपने दत्तक पुत्रों (जिन्हे खबर लिखने तक का सऊर नहीं है लेकिन चमचई कर रेजिडेंट एडिटर व चीफ रिपोर्टर के अजीज हो गये हैं) को आराम दिलवा रहे हैं। इनक्रीमेंट में आप मुहदिखौवल करते हैं। बेचारे काम करने वाले पत्रकारों को कुछ नहीं मिलता और आपके दत्तक पुत्र चांदी काट रहे हैं।

आपको स्ट्रिंगर चाहिए जो लगभग मुफ्त में आपको खबरें दे या आपको चमचे चाहिए जो आपकी दुकानदारी चलाने में हाथ बंटाये। आपके दफ्तरों में जगह तो खाली है लेकिन आप लोगों को रखेंगे नहीं क्यों? क्योंकि प्रबंधन को यह दिखाना है कि आप कम खर्चे में अखबार निकाल रहे हैं। आपने गिनती के पत्रकार रखे हैं उनसे रोज 10-12 खबर लिखवाते हैं। अप्रत्यक्ष तौर पर कहें तो आप पत्रकारों को भी खबर लिखने का टारगेट दे रहे हैं जैसे निजी कंपनियां मार्केटिंग के लोगों को माल बेचने का टारगेट देती हैं। आपने कभी अच्छी खबर लिखी है? आपको पता है कि एक अच्छी रिपोर्ट लिखने में कितना वक्त लगता है और कितने तथ्य जुटाने पड़ते हैं? अगर आपने कभी ऐसा किया होता तो आप समझ पाते। तब आप खबरों का टारगेट नहीं रखते।

आप ये सोचते हैं कि 20 हजार रुपये में एक अच्छे पत्रकार को रखने की जगह 5-6 हजार या उससे भी कम में 3 नये लोगों को रख लेंगे। सर आप अखबार चला रहे हैं कि बनियागीरी कर रहे हैं ? आपने पत्रकारिता की ट्रेनिंग कहाँ से ली है? आपके गुरू कौन थे सर? मुझे आश्चर्य होता है कि आप लोग ये सब कैसे सोच लेते हैं। ये सब सोचते हुए कभी खुद को रेजिडेंट एडिटर कहने में आपको शर्म नहीं आयी? आपको नहीं लगा कि आप रेजिडेंट एडिटर के नाम पर कलंक हैं? शायद आपलोग काम में इतने बिजी रहते होंगे कि इतना सोचने का वक्त ही नहीं मिलता होगा।

बहरहाल आपकी इस कारगुजारी से एक वक्त ऐसा आयेगा कि कोलकाता में कोई ढंग का पत्रकार नहीं बचेगा और तब आप कूड़े में फेंकने वाला अखबार निकालियेगा। आपलोगों से एक और बात पूछना चाहते हैं हम। कोलकाता में रहते हुए मेरे सामने ही 5 नये अखबार आये लेकिन आपलोगों को अपनी कुर्सी से डोलते नहीं देखा जबकि इनमें से कई अखबार अच्छा पैकेज दे रहे थे। आपकी यह अदा मुझे बार-बार चौंका रही है। आपलोग लम्बे से एक ही पद पर कैसे बने हुए हैं? रेजिडेंट एडिटर के ऊपर कोई पद नहीं है क्या अखबारों में? ये हुनर तो कम से कम बता दीजिए कैसे एक ही पदों पर इतने दिनों से बने हैं। साथ ही यह भी बता दीजिए कि एक ही पद पर इतने दिनों तक बने रहने को आपकी काबिलियत समझा जाये या प्रबंधन की चमचागिरी का ईनाम। हमलोग तो 1-2 साल काम करते ही अखबार बदलने की सोचने लगते हैं। लोगबाग कहते हैं कि प्रबंधन के पिट्ठू हैं आपलोग और अपनी नौकरी बचाने के लिए कुछ भी कर सकते हैं। लोग ये भी कहते हैं कि आप में वो काबिलियत ही नहीं है कि दूसरे अखबारों में काम कर सकें। मेरा मानना है कि आपलोगों को ये आशंकाएँ दूर करनी चाहिए। यह मेरा सुझाव है।

सर आप लोगों की कारिस्तानी का खामियाजा कोलकाता के ईमानदार पत्रकारों, हिन्दी पत्रकारिता और अंततः हिन्दी समाज को भुगतना पड़ेगा। आप ने तो अपना घर भर लिया है, रिटायरमेंट के बाद ऐश करेंगे लेकिन आप जिस तरह की पीढ़ी को तैयार कर रहे हैं वे भी आपकी तरह हिन्दी पत्रकारिता को डुबायेंगे ही। अभी भी वक्त है, यह खेल बंद कर दीजिए। नाकाबिल हैं तो पद छोड़ दीजिए, अच्छे लोगों को मौका मिलेगा।

अंत में यही कहना चाहता हूँ कि समय सबका इतिहास लिखता है। नहीं चेतियेगा तो 3-4 दशक बाद जब कोलकाता की हिन्दी पत्रकारिता का इतिहास दुबारा लिखा जायेगा तब आपका नाम जयचंदों में होगा। मैं जानता हूँ मैंने यह लिखकर कोलकाता में अपनी वापसी के अधिकतर रास्ते बंद कर दिये हैं लेकिन क्या करूँ, मेरे पास और कोई विकल्प नहीं था। पलायन का घाव पक गया था। उसमें मवाद भर गया था और घाव चुहचुहा रहा था। मवाद की निकासी जरूरी थी। आगे जो होगा इसके लिए तैयार हूँ।

आप सबको दुबारा प्रणाम!

आपका बदनसीब
उमेश राय


(लेखक उमेश राय सन्मार्ग के वरिष्ठ पत्रकार रहे हैं। इन दिनों दिल्ली में पानी की समस्या पर काम करने वाली एक एनजीओ के लिए काम कर रहे है। उन्होंने कोलकाता और सन्मार्ग को जिस लिजलिजेपन से जिया है, उसे बयां किया है। उन्होंने यह सब कुछ अपनी एफबी वॉल पर लिखा है।)

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भूरिया ने ऐसे अखबार के पक्ष में संसद में आवाज उठाई जिसे कर्मचारी शोषण में गोल्ड मेडल मिलना चाहिए

आदरणीय भूरिया जी,

नमस्कार,

सुबह-सुबह राजस्थान पत्रिका के प्रथम पेज पर आपकी मीडिया के दमन को लेकर चिंता के विषय में पढ़ा। अच्छा लगा। मीडिया के अधिकारों की बात होनी चाहिए। पुरजोर तरीके से मीडिया की दबती आवाज, अभिव्यक्ति, आजादी आदि-आदि के लिए लड़ना चाहिए। पर, आश्चर्यजनक तो यह है कि आप संपूर्ण मीडिया के लिए लड़े नहीं। एक विशेष अखबार की आपको चिंता हुई। कोई विशेष कारण। आखिर क्या मजबूरी थी? आपने कहा, अखबार के विज्ञापन रोकना लोकतंत्र विरोधी है। यह बात हजम नहीं हुई।

आप ही समझाओ लोकतंत्र में कहां उल्लेख है कि अखबार को सरकार का विज्ञापन देना अनिवार्य है? अखबार को सरकार विज्ञापन नहीं देगी तो लोकतंत्र को क्या नुकसान होगा? विज्ञापन रोककर सरकार कैसे मीडिया हाउस पर अंकुश लगा सकती है? क्या सरकार ने अखबार की प्रिंटिंग प्रेस पर ताला लगा दिया या उसके प्रतिनिधियों के सचिवालय में घुसने के पास रद्द कर दिए या रिपोर्टरों को खबर करने से रोका जा रहा है या किसी प्रकार की कानूनी कार्रवाई की है? यदि ऐसा कुछ किया है तो वाकई आपको आवाज ही नहीं उठानी चाहिए, बल्कि सरकार की मुखालफत (आपने खिलाफत शब्द का इस्तेमाल किया, जो गलत है) करनी चाहिए। सर जी सड़क पर उतरकर लड़ें, हम आपके साथ कंधे से कंधा मिलाएंगे।

लेकिन आपने तो ऐसे अखबार के पक्ष में संसद को चुना, जिसे कर्मचारी शोषण में ओलंपिक का गोल्ड मेडल मिलना चाहिए। जो अपना वाजिब हक मांग रहे पत्रकारों का गला घोंटने में अव्वल है। जिसके खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अवमानना के 5 केस चल रहे हैं। 200 से ज्यादा पत्रकार-गैर पत्रकार आप ही की सरकार (यूपीए-2) के लागू मजीठिया वेजबोर्ड को पाने के लिए कोर्ट की शरण में हैं। जिनमें 25 से ज्यादा पत्रकार-गैर पत्रकारों को बिना कारण बर्खास्त किया जा चुका है। 40 से ज्यादा को बेघर किया गया है। यह अखबार अपने कर्मचारियों से अमानवीय व्यवहार की सारी हदें तोड़ रहा है। यहां पत्रकारों की तुलना कुत्तों से हो रही है। अखबार पत्रकार नाम के प्राणी को ही यह विलुप्त बनाने पर आतुर है। आप ही बताएं, ऐसे अखबार ने अपने आर्थिक हितों के लिए आपका तो इस्तेमाल नहीं किया?

आप वरिष्ठ राजनेता हैं। आपका जनता में बहुत सम्मान है। आप भारी मतों से विजयी होकर लोकतंत्र के मंदिर में पहुंचे हो। आपसे छोटा से अनुरोध है, जैसे आपने इस अखबार के लिए संसद में आवाज उठाई, उससे थोड़ा कम इस अखबार द्वारा प्रताड़ित पत्रकार-गैर पत्रकारों की भी आप आवाज बनें। हम आपके बहुत-बहुत आभारी रहेंगे। देर शाम राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत जी ने भी कुछ ऐसा ही किया, यही सवाल गहलोत जी से भी है।

धन्यवाद।
विनोद पाठक

विनोद पाठक के उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं….

Vikas Bokdia : मुझे लगता है की भूरिया ने गुलाब कोठारी का कोई पुराना कर्ज उतारा है ऐसा दुस्साहस करके।। संसद में जो कागज़ पता नहीं कौनसे टेबल की दराज के डस्टबीन में फेंक दिया गया उसकी आत्मप्रशंसा करते हुए ऐसी भ्रामक खबर छापना गुलाब कोठारी के असली व्यक्तित्व को दर्शाता है। आपको बता दूँ की ये खबर छपने के बाद से भूरिया अपना फोन स्विच ऑफ करके किसी दड़बे में छुप गए हैं। देखते हैं वे कब तक हमारे सवालों से बच पाते हैं। इधर सुना है कि कोठारी ने विपक्षी सांसदों को एप्रोच करके इस मुद्दे पर वसुंधरा को घेरने का कोई प्लान बनाया है। मगर मेरा मानना है कि ये दांव कहीं उल्टा न पड़ जाये।। चौबेजी कहीं दुबेजी नहीं बन जाएँ।।।
…तुलसी हाय गरीब की
कबहू ना निष्फल जाय
मरे बैल के चाम सूं
लौह भसम होई जाय।

Parmanand Pandey : Beautiful commentary. You have exposed the duplicity of the gentleman. Shabash.

Amit Mishra : पत्रिका के मालिकानों पर माननीय सुप्रीम कोर्ट की अवमानना के 7 मुकदमे चल रहे

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भास्कर प्रबंधन एक जालसाज-वसूलीबाज को बचाने के लिए ब्रांड इमेज भी दांव पर लगाने को तैयार! (पढ़िए डीएनई आदित्य पांडेय की चिट्ठियां)

मीडिया के साथियों….

मैं आदित्य पांडे इंदौर डीबी स्टार में 3 अगस्त 2008 से कार्यरत हूं और फिलहाल डीएनई की पोस्ट पर हूं. लगभग 3 साल पहले संपादक के तौर पर आए श्री मनोज बिनवाल को मैं कभी भी पसंद नहीं रहा क्योंकि वे कमोबेश हर खबर में पैसा बनाने की राह तलाशने को पत्रकारिता मानते हैं. दिसंबर 2015 में मनोज बिनवाल ने मुझे सूचना दी कि न्यू ईयर टीम के साथ मुझे काम करने के लिए नेशनल एडीटर कल्पेश याग्निक ने चुना है. मैंने इस टीम में काम किया और एक जनवरी 2016 से मैं फिर अपने मूल काम यानी डीबी स्टार में लौट आया.

जनवरी 2016 में अचानक एक दिन मुझे कल्पेश याग्निक ने बुलाकर कहा कि आप न हमारे साथ काम कर रहे हैं और न ही डीबी स्टार में काम कर रहे हैं. मैं इस बात पर चौंक गया क्योंकि मैं लगातार अपना काम कर रहा था और आफिस के रिकार्ड से लेकर वीडियो रिकार्डिंग तक सभी से मेरी बात सही साबित हो रही थी लेकिन बिनवाल ने न जाने मेरे खिलाफ कल्पेश को क्या क्या कहा था कि वे सच सुनने को तैयार ही नहीं थे.

मैंने काफी कहा कि बिनवाल को सामने बुलाकर बात साफ कर ली जाए लेकिन इस पर भी कल्पेश राजी नहीं हुए. इस बीच मुझे पता चला कि बिनवाल ने एचआर के पास भी मेरी काफी शिकायतें की हैं लिहाजा मैंने एचआर की तत्कालीन स्टेट हेड जया आजाद से शिकायतों की जानकारी ली और बिनवाल के सारे झूठों की हकीकत एचआर हेड के सामने खुद बिनवाल की मौजूदगी में बता दी. इससे बिनवाल का बौखलाना स्वाभाविक था और इसी रौ में उन्होंने मुझे कह दिया कि अब मैं इंदौर तो क्या मध्यप्रदेश में भी काम नहीं कर सकता. लगभग एक महीने तक मुझे कोई काम नहीं दिया गया और डीबी स्टार में मेरी जगह एक रिटायर व्यक्ति को लाकर बैठा दिया गया.

मार्च अंत तक आते आते मेरा तबादला रायपुर कर दिया गया और इससे पहले यह देख लिया गया कि मेरे वहां जाने की कोई संभावना तो नहीं है. मैंने बजाए इस्तीफा देने के नेशनल एडीटर और एमडी सुधीर अग्रवाल से मिलकर अपनी बात रखने की राह चुनना बेहतर समझा और इसके लिए आवश्यक था कि मैं संस्थान में बना रहूं, इसलिए मैंने रायपुर में ज्वाइनिंग दे भी दी. पिछले छह महीने के समय में मैं एमडी को ई मेल और रजिस्टर्ड लेटर के जरिए सारी जानकारी भेज चुका हूं और हर बार मिलने के लिए समय की मांग भी कर चुका हूं. यही हालत कल्पेश याग्निक के मामले में है. चूंकि बिनवाल तो कल्पेश के खास आदमी हैं और तमाम हेरफेर व जालसाजी के मामलों की जानकारी होते हुए भी उन्हें बचाते रहे हैं इसलिए मुझे उनसे तो कोई उम्मीद भी नहीं थी लेकिन एमडी की तरफ से भी कोई जवाब मुझे नहीं मिला है.

इस पूरे मामले में एक कमाल की बात यह भी है कि बिनवाल पर अदालती आदेश के बाद पुलिस ने जालसाजी के एक मामले में एफआइआर भी दर्ज कर रखी है और भूमाफियाओं से उनके संबंध को लेकर कई सबूत भी कई स्तरों पर पेश किए जा चुके हैं. खुद भास्कर में बिनवाल पर अंदरूनी जांच हुई थी जिसमें महाशय के खिलाफ कई टिप्पणियां थीं लेकिन इस पर सच के पक्ष में जमकर लिखने वाले कल्पेश याग्निक ने ही कभी कार्रवाई नहीं होने दी. बिनवाल ने मेरे खिलाफ लंबी साजिशें कीं लेकिन एक मामले में भी वे कोई ठोस बात नहीं कह सके इसलिए उन्होंने मैनेजमेंट के गले यह बात उतारी कि यह व्यक्ति मजीठिया को लेकर दूसरे कर्मचारियों को प्रभावित कर सकता है और खुद भी संस्थान पर कानूनी कार्रवाई की ताक में है.

यही वजह है कि बिना किसी वजह के मेरा रायपुर तबादला कर दिया गया जबकि जालसाज और हर खबर के एवज में पैसे बनाने वाला बिनवाल मजे कर रहा है और अब भी रिपोर्टर वगैरह को साफ कह रहा है कितनी भी एफआईआर हो जाए, मेरा कोई कुछ बुरा नहीं होगा. आश्चर्य तो भास्कर प्रबंधन पर होता है जो एक जालसाज और वसूलीबाज को बचाने के लिए इस हद तक उतर जाता है कि ब्रांड इमेज को भी दांव पर लगाने को तैयार है और अपने एक ऐसे कर्मचारी के खिलाफ है जिसका अब तक का पूरा मीडिया का करियर बेदाग रहा है.

आदित्य पांडेय
adityanaditya@gmail.com


कुछ पत्राचार….

Dear Aditya Sir,

As discussed kindly deposit your laptop at Raipur IT department.

@Akash,

Kindly take laptop asset master no 420022353  Lenovo B4080, SN MP09C4RE with cordless mouse and send back to us.

Regards,
Ashok Patidar
ashok.patidar@dbcorp.in
IT – Indore
Extension – 2578 | Mobile – 9669393111

Dear ashok ji

first of all i simply want to mention that i deposited said laptop with wireless mouse, charger and other attachments along with my company ID and access card. infact i prebiously offered to deposit company laptop more than 5 times. as soon as i got transfer letter i contacted my senior mr binwal and talked about laptop also. he asked me to check HR policy about this.

HR persons were unaware of any set guideline of laptop policy in transfer case. they asked me to check it with IT. i talked to you in this reagrd and was assured that my asset ‘ll be transferred and there is no requirement for depositing it. it’s really disturbing and hurting that after assuring me i got mail for depositing laptop and that too with 5 persons in Cc and Bcc. i dont know who was the person behind maligning my image in such manner but for any existing employee such incident is hurting and kind of misbehave.

yours faithfully
aditya pandey
p.aditya@dbcorp.in
DNE, DB STAR, RAIPUR

……

आदरणीय सुधीर जी,
एमडी, दैनिक भास्कर

महोदय

गत 30 जनवरी को मैंने (आदित्य पाण्डे, डीएनई डीबी स्टार ) आपको एक पत्र लिखा था जिसमे मैंने अपने साथ हो रहे बर्ताव के बारे में बताया था और इ्सका भी जिक्र किया था कि डीबी स्टार संपादक श्री बिनवाल जो कुछ कर रहे हैं उसके बारे मे सच सुनने से समूह संपादक श्री कलपेश यागनिक साफ इंकार कर चुके हैं। दरअसल मैंने यह तक कहा कि वे श्री बिनवाल को सामने बुला लें ताकि मैं मामले की हक़ीक़त सार्वजनिक तौर पर बता सकूँ। आपको पत्र भेजने के बाद आपके दफ्तर की ओर से तो कोई कार्रवाई नहीं हुई लेकिन श्री बिनवाल ने यह कहते हुए मेरा रायपुर ट्रान्सफर कर दिया कि अब मैं इंदौर तो क्या एमपी मे भी काम नहीं कर सकता।

बिनवाल एक ऐसे व्यक्ति हैं जिनके खिलाफ कई आरोप हैं कुछ मामलों में तो सबूत भी दिये गए हैं और अब तो हालात यहाँ तक पहुँच गए हैं कि खुद अदालत ने आदेश दिया कि पुलिस एफआइआर दर्ज करे, आपको पता ही होगा कि मामला जालसाज़ी और 420 के अलावा क्रिमिनल कोन्स्पिरेसी का है श्री बिनवाल सिर्फ ऐसे लोगों को पसंद करते हैं जो उनके ऐसे कामों मे साथ खड़े हों… इससे पहले खुद भास्कर ने भी इन महाशय पर भ्रस्टचार को लेकर जांच बैठाई थी कमाल कि बात यह है कि उनके भ्रस्टाचार के खिलाफ बोलने वाले हर व्यक्ति पर कार्रवाई हो चुकी है और यह सूची लंबी है जिसका मैं सबसे ताज़ा उदाहरण हूँ। आश्चर्य है कि व्हिसल ब्लौइंग पॉलिसी के खिलाफ खुद कंपनी ने व्हिसल ब्लौएर्स को प्रताड़ित करने की ताकत ऐसे (बिनवाल जैसे) लोगों को दे रखी है। बात मेरे ट्रान्सफर की नहीं है और मैं उसे लेकर तो कुछ कहना भी नहीं चाहता क्योंकि बिनवाल जी लंबे समय से चाहते रहे हैं कि मैं संस्थान छोड़ दूँ और उनके भ्रस्टाचार के लिए राह खाली कर दूँ।

पिछले दिनों मुझे यह लगने लगा कि शायद भास्कर समूह भी यही चाहता है। जाहिर है कि ऐसा महसूस होने के बाद संस्थान छोडना कोई बहुत बड़ा मुद्दा नहीं रह जाता है लेकिन जिस संस्थान को मैंने अपने जीवन के 10 से ज्यादा साल दिए हों और जिस से मेरा 15 साल से ज्यादा का सतत संपर्क रहा हो, उसके शीर्ष प्रबंधन से मैं यह तो कह ही सकता हूँ कि मैंने कभी पत्रकारीय मूल्यों से समझौता नहीं किया। साथ ही यह भी कि जो भ्रस्टाचारी मेरे दुश्मन बन बैठे हैं वो भी मुझ पर किसी तरह का आक्षेप नहीं लगा सकते हैं। मैंने अपने पिछले पत्र मे भी आपके बहुमूल्य समय में से दो मिनट चाहे थे और आज फिर मैं यही चाहता हूँ कि मुझ जैसे व्यक्ति को संस्थान में रहना चाहिए या नहीं ये खुद आप तय करें। कृपया मुझे दो मिनट का समय दें ताकि मैं अपना पक्ष रख सकूँ और संभव हो तो अपना सक्रिय योगदान संस्थान को देते रहने के बारे मे निर्णय कर सकूँ।

धन्यवाद
आपका स्नेहाकांक्षी
आदित्य पाण्डे (14143)
डीएनई, डीबी स्टार रायपुर

…….

आदरणीय श्री सुधीर अग्रवाल जी
एमडी, दैनिक भास्कर भोपाल

मैं आदित्य पांडे दैनिक भास्कर के डीबी स्टार इंदौर में 1 अगस्त 2008 से यानी इसके प्रकाशन से कुछ पहले से कार्यरत हूं और वर्तमान में डिप्टी न्यूज एडीटर के पद पर हूं। पिछले कुछ समय से मेरे साथ चल रही घटनाओं ने मुझे विचलित किया है और इससे सीधे मेरे कार्यनिष्पादन पर भी असर पड़ रहा है इसलिए मुझे आपको यह पत्र लिखने को मजबूर होना पड़ रहा है। दो महीने पहले मेरे इमीजिएट बॉस और डीबी स्टार(इंदौर मप्र) के मुखिया श्री मनोज बिनवाल किन्हीं संजय मिश्रा नाम के सज्जन को साथ लाए। मुझसे उनका परिचय कराते हुए श्री बिनवाल ने कहा कि मिश्राजी को कल्पेशजी की टीम में काम करने के लिए लाया गया है लेकिन सिटी डीबी स्टार का काम और मेट्रिक्स सॉफ्टवेयर समझाने के लिए उन्हें कुछ समय यहां रखा जाएगा आप इन्हें आवश्यक मदद करते रहें। खुद मिश्राजी का भी यही कथन था जिस पर भरोसा न करने का कोई कारण मेरे पास नहीं था।

दिसंबर के पहले हफ्ते के बाद मुझे श्री बिनवाल की ओर से मेरे वॉट्सएप, मैसेंजर, भास्कर मेल और निजी आईडी और आखिरकार फोन पर बताया गया कि मुझे नए साल के बनाई गई टीम में काम करना है। इस विषय पर मैंने निर्देशों के अनुसार श्री कल्पेश से मुलाकात की और उनसे दो दिन की मोहलत चाही क्योंकि तब मेरी पत्नी को टाइफाइड व कुछ अन्य स्वास्थ्यगत परेशानियां थीं। श्री कल्पेश याग्निक के शब्दों में ‘’मेरे पास काम करने के लिए काफी लोग हैं लेकिन मनोज (बिनवाल ) ने कहा कि डेस्क हेड के तौर पर संजय मिश्रा को रखा जा सकता है इसलिए आदित्य जी का क्या करें। मैंने उन्हें यही कहा है कि मैं आदित्य को कहीं ‘एब्जॉर्ब’ कर सकता हूं।‘’

इस संवाद के बाद मैं नए साल की टीम के सदस्यों के साथ काम में जुट गया जिसमें अमूमन काम के घंटे सामान्य से दोगुना या उससे भी ज्यादा हो जाते थे। यह सिलसिला 31 दिसंबर तक चला। 31 दिसंबर और 1 जनवरी की दरमियानी रात लगभग एक बजे श्री कल्पेश ने पूरी टीम को नए साल की बधाइयां देते हुए अपने अपने कार्यक्षेत्र लौट जाने की इजाजत दे दी। इससे अगले ही कार्यदिवस पर मैं श्री बिनवाल की मौखिक अनुमति के साथ डीबी स्टार में काम पर लौट आया और बाकायदा वे सभी कार्य संपादित करने लगा जो डीएनई के नाते मुझे करने चाहिए। श्री बिनवाल जो कि खबरों के संबंध में लेन देन के विशेषज्ञ माने जाते हैं मुझसे लंबे समय से इस बात को लेकर परेशान हैं कि प्रायोजित खबरें या किसी एक पक्षीय खबर को लेकर मैं कड़ी आपत्ति करता रहा हूं।

नेशनल आइडिएशन रुम में काम करने के बाद श्री बिनवाल का व्यवहार ज्यादा आ्क्रामक हो गया इसी के चलते वो मेरे अधीनस्थों से सीधे संवाद करते हुए मुझे दरकिनार बताने की कोशिश कर रहे थे। यहां तक कि बिटवीन द लाइंस का वह कॉलम जो शुरुआत से अब तक मैंने बिना किसी कांट छांट के स्वयं ही लिखा और इसमें कोई संपादन नहीं किया जाता था वह अब दखलंदाजी का शिकार होने लगा, दुख इ बात का था कि इस प्रक्रिया में काम के स्तर का भी ध्यान नहीं रखा गया। मैं डीबी स्टार में पूरा समय देने व कार्य करने के दौरान कई कई बार श्री बिनवाल से मिलता और संवाद करता रहा और श्री बिनवाल से अनुरोध करता रहा कि वे एचआर को आवश्यक मेल तो डाल दें ताकि यह पता रहे कि मैंने टाइमिंग में कोई कोताही नहीं बरती बल्कि मैं स्पेशल प्रोजेक्ट पर कार्यरत था।

कमाल यह कि नए साल की टीम में चुने जाने की सूचना पांच माध्यमों से देने वाले श्री बिनवाल ने एक भी ऐसा मेल मुझे लेकर एचआर को नहीं किया ताकि मैं प्रताड़ित होता रहूं और एचआर मुझसे सफाई मांगे। मेरे लगातार आने का सिलसिला 16 जनवरी तक चला जबकि मैंने आवश्यक कार्य से मुंबई जाने के लिए तीन दिन अवकाश का आवेदन दिया। श्री बिनवाल से स्वीकार करते हुए यह भी कहा कि इतनी दूर जाने पर यदि एक दो दिन और रुकने की आवश्यकता हो तो मैं अवकाश बढ़ा दूंगा। मैं इसमें उनकी सदाशयता देख रहा था लेकिन बाद में पता चला कि वे इस समय का इस्तेमाल सुनियोजित तरीके से मुझे हटाकर संजय मिश्रा को मेरी जगह लाने पर करना चाहते थे। मुंबई में मुझे वाकई एक दिन अतिरिक्त छुट्‌टी की जरुरत पड़ी जिसे मैंने बिनवाल के आश्वासन के आधार पर ले लिया और उन्हें इस बाबत जानकारी दे दी।

मुझे 20 तारीख को श्री बिनवाल ने कहा कि मुझे नेशनल एडीटर कल्पेश याग्निक से कल ही मिलना है। निर्देशानुसार मैंने श्री कल्पेश से मुलाकात की जो मुझसे पहले किसी व्यक्ति को डांटने के लिए लगभग पूरे न्यूजरूम के लोगों को एकत्र कर चुके थे जिनमें मैं भी एक था। इसके तुरंत बाद जैसे ही कल्पेशजी ने मुझे देखा तो मुझे कहा आप इस्तीफा लिख दें। मैं अवाक रह गया। मैंने उनका गुस्सा शांत करते हुए वजह समझने की कोशिश की लेकिन इस दौरान मुझे सभी के सामने काफी भला बुरा कहते हुए झूठा, कामचोर और स्वेच्छचारिता करने वाला बताया गया। मैंने कहा कि यदि कहीं कोई गलतफहमी हुई है तो श्री बिनवाल को बुलाकर इसे दूर किया जा सकता है लेकिन इस संभावना से साफ इंकार कर दिया गया। लगभग 15 मिनट तक मुझे अपमानजनक तरीके से काफी कुछ कहा गया और इसी दौरान मुझे यह भी कहा गया कि अब डीबी स्टार में आपकी जगह संजय मिश्रा को रख लिया गया है इसलिए आपको अपनी सीट पर बैठने की इजाजत नहीं है। मुझे तनख्वाह न बनने देने की बात भी कही गई।

बाद में मुझे कहा गया कि आप अपनी ओर से पूरी बात एक पत्र में बताएं कि आपने आदेश क्यों नही माना (जबकि कोई आदेश दिया ही नहीं गया था), इसके बाद ही आपके लिए नई जिम्मेदारी के बारे में सोचा जा सकेगा। हकीकत यह है कि मुझे मेरी जिम्मेदारियों में परिवर्तन संबंधी किसी तरह का कोई निर्देश या आदेश नहीं दिया गया था, न लिखित और न ही मौखिक। नए साल की टीम में शामिल किए जाने संबंधी सूचना के बाद से श्री बिनवाल की ओर से मुझे किसी तरह से इस बारे में बताया नहीं गया। इस बाबत जो मेल मैंने श्री कल्पेश और उनके सहयोगी श्री शक्ति को भेजा उसका जवाब मुझे आज तक नहीं मिल सका है जबकि मैं प्रतिदिन ऑफिस पहुंच रहा हूं और उपयुक्त समय भी दे रहा हूं। मुझे डीबी स्टार में बैठने से इंकार किया गया है और नई जगह नहीं दी गई है इसलिए मुझे ऑफिस कैंपस में यायावर की तरह उपस्थित दर्ज करानी पड़ रही है और इससे भी बढ़कर कि मुझ जैसे कर्मठ व्यक्ति को कोई काम नहीं दिया जा रहा है। कृपया इन स्थितियों में मेरा मार्गदर्शन करें। इससे इतर भी कुछ बातें मैं आपसे साझा करना चाहता हूं, यदि आप मुझ अकिंचन के लिए कुछ समय निकाल पाएं तो मैं महज दो तीन मिनट का समय लेना चाहूंगा। धन्यवाद।

दिनांक 28 जनवरी 2016
आपका
आदित्य पांडे
डीएनई, डीबी स्टार इंदौर

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मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के नाम एक खुला ख़त : आप दोबारा उत्तर प्रदेश के सीएम न बनें

आदरणीय अखिलेश यादव जी,
मुख्यमंत्री
उप्र सरकार

सबसे पहले तो मैं आपको अपने बारे में बता दूं। मैं उसी उत्तर प्रदेश का एक साधारण सा नागरिक हूं, जिसके आप मुख्यमंत्री हैं। काम से ‘जर्नलिस्ट’ हूं, आपका प्रशंसक हूं और आज भी इस मुगालते में जी रहा हूं कि मेरा पेशा लोगों की आवाज़ उठाना है। मैंने कभी आपसे सीधे मिलने की कोशिश नहीं की, न ही इस तरह का कोई पत्र कभी लिखा। हालांकि कई बार मेरा मन कहता था कि आपको लिखूं, कभी आपकी प्रशंसा करूं या कभी जोर से चीखूं कि यह क्या तमाशा लगा रखा है!

यकीन मानिये, मैं आपका फैन / प्रशंसक रहा हूं। मैं मानसिक तौर से आपके करीब तब आया जब आप उत्तर-प्रदेश में अपने पिता का मुलायम राज लाने निकले थे। 2012 के उस दौर में मैं ‘जी-न्यूज’ का ब्यूरो-हेड हुआ करता था और गोरखपुर में ही तैनात था। आपकी ‘सवारी’ या कहें ‘रथ’ वहां से भी गुजरा था। पेशा था, तो आपको कवर भी करना था। लेकिन इसी दौरान अपने पढे-लिखे इंजीनियरिंग बैक ग्राउंड, बात-चीत, ईमानदार तेवर, और नयी सोच से आप ने हम सरीखे कई पत्रकारों को भी अपना मुरीद बना लिया था। और फिर प्रदेश को भी। बाद में जब आपने मोहन सिंह (स्व.) और आजम खान सरीखे नेताओं को गलतबयानी पर हद दिखायी, और डीपी यादव सरीखे बाहुबली नेताओं को बाहर का दरवाजा दिखाया, तो हम सब तो आपके लिए ‘जुनूनी’ हो गये थे। यकीन हो चला था कि आप ही हैं जो इस प्रदेश की तस्वीर बदल देंगे।

पर हो क्या गया अखिलेश भइया? आपने हम सब के ‘जुनून’ और ‘उम्मीद’ को मायूस क्यों कर दिया? ऐसी क्या मजबूरी आन पड़ी, कि आप कुछ न कर सके। मुलायम सिंह, शिवपाल यादव, राम गोपाल यादव, आजम खान, आपके दूसरे अजीजों और कुछ भ्रष्ट लोक प्रशासकों ने भी पूरा उत्तर प्रदेश बांट लिया और आप ‘छाया मुख्यमंत्री’ बन कर रह गये। आपको पता नहीं, कि प्रदेश के डीएम-एसपी के पास हर रोज कोई न कोई छुटभइय्या नेता पहुंचता है और ‘भइया का फोन है’ कहकर अपना उल्टा-सीधा काम करा ले जाता है? आपको पता नहीं, कि आपके चाचाओं-भइय्याओं ने अपने-अपने गढ़ बांट लिए हैं, और बेखौफ हर ठेके में लूट कर रहे हैं? आपको पता नहीं, कि आपके थाने-चौकियां बोलियों पर बिकती हैं और फिर छोटे साहब नुकसान पूरा करने के लिए आम लोगों को मारे डाल रहे हैं?

अखिलेश भइया! आप तो चुनाव से पहले साइकिल से ही पूरी यूपी नाप डाले थे। काश, जीतने के बाद हेलीकाप्टर से ही थोड़ा प्रदेश नाप डालते तो जानते, कि आपने हमें मायूस किया है, और आक्रोशित भी! सच बतायें भइया, तो जर्नलिस्ट बनने से पहले हमारा भी सपना था कि आईएएस-आईपीएस बनें। हनक और ताकत देखते थे न, तो दूसरों की तरह हम भी ख्वाब बुन लिए थे, कि यही बनेंगे। पर आपने इनका जो हाल बना दिया, उससे लगने लगा है कि जो हैं ठीक ही हैं।

आप को कभी शर्म नहीं आती कि आपके ही शहर में, एक आईएएस अफसर-डॉ हरिओम को कुछ गुण्डे पीटकर चले जाते हैं और आराम से निजी अस्पताल में आराम करने लगते है। और आप के साथ पूरा का पूरा सरकारी अमला न जाने क्यों बेबस-मजबूर नज़र आता है। आपके शासन में वर्दी पर 1200 से ज्यादा हमले हो जाते हैं, और आप कहते हैं कि ‘इस साल तो हम ट्रेनी मुख्यमंत्री थे’। तब भइय्या, डीपी यादव-आजम-मोहन सरीखे लोगों पर इतना कड़ा बोल-बोलकर आपने हमें धोखा काहे दिया था? कम से कम हम किसी ‘ट्रेन्ड’ मुख्यमंत्री को ही ले आते।

मुजफ्फरगर में आप ऐसे बेबस नजर आये जैसे कोई नाबालिग हमारा ‘शाह’ है। कहीं गाय के नाम पर इंसान मार डाला गया और आप भकुआ बने देखते रहे। मथुरा में जमकर खूनी खेल हुआ, दो दर्जन इंसान लाश बन गये और आपने बेचारों की पहचान भी नहीं जाहिर होने दी। इऩ हालातों पर आप ‘रोते नहीं’ अखिलेश भइय्या?  कभी आपको लगता नहीं कि हथियार भले ही अलग-अलग रहे हों, पर कातिल आप ही हैं।

और, ये जो लखनऊ को जरा रंग-रोगन कर पूरे प्रदेश को फिर से ‘बना रहे’ हैं, ये ठीक नहीं। अच्छी बात कि गोमती-क्रिकेट-मैट्रो-पेड़-गौरैय्या जैसे काम आप किये हैं। पर क्या इतना ही काफी है? इस सब को तो हम तब देखेंगे, जब लखनऊ पहुंचेगे और जिन्दा रहेंगे। आपके ‘प्रचार सचिव’ क्या आपको नहीं बताते कि आप लखनऊ के नहीं, प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं? और एक बात और, ये मुख्तार अंसारी पर अकड़कर आप जो ‘डीपी यादव पार्ट-टू’ का नाटक किये हैं, वो आप पर नहीं अच्छा लगता। और आप तो पढ़ते-लिखते भी हैं, जानते भी होंगे कि ‘काठ की हांडी’ दोबारा नहीं चढ़ती। देश-विदेश में ‘इवेन्ट’ पर सिर्फ ‘साहब’ का ही हक है, उन्हें ही करने दीजिए।  

आप तो पढे लिखे हैं न। हालात नहीं सम्भाल पा रहे, तो किनारे काहे नहीं हो जाते? इंजीनियरिंग की डिग्री है ही, कमा ही लेंगे। डिम्पल भाभी और बच्चे भी आप पर नाज करेंगे। कम से कम ‘कत्ल’ और ‘अपने प्रदेश को बरबाद’ करने की बदनामी तो आपके नाम नहीं दर्ज होगी न। मैं आपका फैन हूं, और जानता हूं कि आप भी किसी न किसी के फैन होंगे। ठेस लगती है, तो दर्द होता है, और फैन-वैन जैसे मामलों में जरा ज्यादा होता है। इसलिए, अगर कहीं कुछ कड़ा कह दिया हो, तो बुरा मत मानिएगा। बुरा लगे तो आइना देखिएगा, खुद को देखिएगा। जानता हूं कि हमारे नेता आपकी जी-हुजूरी करते हैं । इसलिए आपको कुछ नहीं बतायेंगे। पर मैं फिलहाल खुद को ईमानदार खबरनवीस मानता हूं, आपसे कुछ चाहिए भी नहीं, इसलिए यह सब लिखने की हिम्मत कर सका। आप उत्तर प्रदेश के दोबारा मुख्यमंत्री न बनें। इस शुभ कामना के साथ….

आपका ही एक प्रशंसक,
आलोक वर्मा
alokverma_journalist@rediffmail.com
9628844666

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राजस्थान हाईकोर्ट के वकील डॉ. विभूति भूषण शर्मा ने भी दिया रोहित सरदाना के पत्र का जवाब

श्री रोहित सरदाना जी,

जिस तरह से आपने रवीश की चिठ्ठी के जवाब में चिठ्ठी लिखी उससे ये प्रतीत होता है कि रवीश कुमार की चिठ्ठी ने आपके मनो मस्तिष्क में बहुत गहरे से प्रहार किया, आपकी चिठ्ठी पढ़कर ऐसा लगा कि रवीश कुमार की कलम ने आपको नंगा कर दिया और आप तिलमिला उठे। रवीश ने चिठ्ठी लिखी अकबर को और चोट लगी आपको, मामला संदिग्ध है, बहुत कुछ स्वतः ही स्पष्ट हो जाता है क्योंकि अकबर को लिखी चिठ्ठी केवल अकबर के लिए नहीं बल्कि अकबर जैसों के लिए थी, यद्दपि अकबर जैसों में आप बरखा दत्त, राजदीप सरदेसाई, पुण्य प्रसून बाजपेई और आशुतोष को रखते हैं लेकिन आपका दर्द बयान करता है कि आपको ऐसा लगा कि जैसे रवीश कुमार ने ये चिठ्ठी आपको लिखी हो।। रवीश जी ने तो पहले विजय माल्या सहित बहुत लोगों को इसी अंदाज में चिट्ठियाँ लिखी है लेकिन तब आपको टीस नहीं हुई। इस चिठ्ठी को पढ़कर आपका दर्द बड़ा बेदर्द निकला।

“कुछ तो पर्दादारी है”

खैर, कुल मिलाकर रवीश कुमार का उद्देश्य पूरा हो गया। आपने रवीश को चिठ्ठी लिखकर अपने आपको रवीश के मुकाबले का पत्रकार साबित करने का प्रयास किया लेकिन आप जो थे उससे और अधिक बौने साबित हुए। आपकी चिठ्ठी में रवीश द्वारा उठाए गए सवालों का एक भी जवाब नहीं है बल्कि केवल तिलमिलाहट दिखी जैसे किसी व्यक्ति ने किसी की दुम पर पैर रख दिया हो। रवीश कुमार द्वारा उठाए गए सवालों के ऐवज में सवाल पूछना आपकी बचकाना पत्रकारिता को प्रदर्शित करता है।

रवीश कुमार किसे चिठ्ठी लिखें किसे नहीं ये उनका विवेक और उनका विशेषाधिकार है। आपने नरेन्द्र मोदी जी से क्यों नहीं पूछा कि उन्होनें शत्रुघ्न सिन्हा जी जैसे बड़े फिल्म कलाकार को तथा भाजपा के अन्य वरिष्ठ राजनीतिज्ञों को मंत्री क्यों नहीं बनाया जबकि श्रीमती स्मृति ईरानी जी जो नौटंकी की अच्छी कलाकार हैं, कम पढ़ी लिखी हैं, चुनाव हारने के बाद भी अत्यंत महत्वपूर्ण विभाग मानव संसाधन जो कि संपूर्ण भारत की शिक्षा व्यवस्था को तैय करता है का मंत्री क्यों बनाया ? आप श्री मोदी से यह भी पूछ सकते थे कि दुनिया के कथित सबसे बौद्धिक व्यक्ति श्री सुभाष चन्द्रा और स्वघोषित दुनिया के सबसे बड़े हिन्दु सम्राट श्री सुब्रमण्यम स्वामी जिनकी पत्नी रैक्सोना पारसी तथा इकलौती पत्रकार पुत्री श्रीमती सुहाषिनी हैदर जिसने एक मुस्लिम से विवाह किया है, को मंत्री क्यों नहीं बनाया ? आपने श्री मोहन भागवत जी से क्यों नहीं पूछा कि उन्होनें एक ऐसे व्यक्ति को जिसे कोर्ट ने तड़ीपार घोषित किया था को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष क्यों बनाया ? आपने श्री अमित शाह साहब से ये क्यों नहीं पूछा कि आपने उत्तर प्रदेश में अपराधिक पृष्टभूमि के नेता श्री मौर्य को  भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष क्यों बनाया। आप वर्तमान सरकार से ये भी पूछ सकते हैं कि “थूक कर चाटने” के मुहावरे का व्यवहार में प्रयोग कैसे होता है।।

खैर, ये आपका विवेक और विशेषाधिकार है कि आप किस से कैसे सवाल पूछें या ना पूछें, इस पर हमें प्रश्न नहीं उठाना चाहिए।

आपको विधि का एक सामान्य सिद्धांत का ज्ञान होना चाहिए कि अपराधिक और नैतिक दायित्व व्यक्तिगत होता है। बरखा दत्त, राजदीप सरदेसाई, आशुतोष, पुण्य प्रसून बाजपेई या अन्य के किसी कृत्य में आपको नैतिक अपराध दिखाई देते हैं तो उसके लिए रवीश कुमार कैसे जिम्मेदार हैं ? और कौनसा सिद्धांत प्रतिपादित है कि रवीश कुमार अगर एम जे अकबर को चिठ्ठी लिखें तो इन्हें भी लिखें। चलिए रवीश कुमार ने इन्हें नहीं लिखा तो आप लिख देते। आप कुछ सवाल अपने सहयोगी मित्र सुधीर “तिहाड़ी” से भी पूछ लेते। अगर बरखा दत्त जी के किसी कृत्य के लिए रवीश कुमार जिम्मेदार हैं सुधीर “तिहाड़ी” के कृत्य से आप कैसे मुक्त हो सकते हैं?

खैर, इस विषय को भी जाने दो।

रवीश कुमार ने एम जे अकबर को चिठ्ठी इसलिए लिखी की अकबर इतने मौकापरस्त हैं कि वो सत्ता के साथ कभी महाराणा प्रताप बन जाते हैं और कभी अकबर हो जाते हैं दोनों महान शख्सियत थी इसमें कोई दो राय नहीं है लेकिन कोई भी सियार शेर और बाघ की खाल पहन कर शेर या बाघ नहीं हो जाता है बल्कि वो रंगा सियार कहलाता है। मुझे आश्चर्य है कि आप अपने आपको बौद्धिक पत्रकार के रूप मे स्थापित करने का भरसक परन्तु नाकाम प्रयास करते हैं लेकिन आप कभी भी बौद्धिकता के उस स्तर को नहीं छू पाए जहाँ रवीश पंहुच चुके हैं।

आप को राष्ट्रवाद का वास्तविक अर्थ तक नहीं पता, राष्ट्रवाद क्या है इसके लिए नागपुर से ग्रसित ब्रेन को किसी बढ़िया डिटर्जेंट से धोकर रविन्द्र नाथ टैगोर और महात्मा गाँधी को निश्छल भाव से पढ़ना। आप सही मायने में आज तक हिन्दु होने के धर्म से भी अनभिज्ञ हैं हिन्दु कैसा होता है हिन्दु को कैसा होना चाहिए के लिए विवेकानन्द और महात्मा गाँधी को पढ़िए। आपको पता होना चाहिए कि कट्टर राष्ट्रवाद कहीं ना कहीं मानवता पर प्रहार करता है। आपकी पत्रकारिता शुद्ध रूप से नागपुर को प्रभावित करने के इर्द-गिर्द घूमती है।

आपकी यह चिठ्ठी आपकी संकीर्ण मानसिकता का परिचायक है क्योंकि किसी व्यक्ति के सवाल उसकी बौद्धिकता का परिचायक होते हैं। रवीश की चिठ्ठी में एम जे अकबर एक प्रतीकात्मक चरित्र है,  रवीश का प्रहार उन सभी अवसरवादी पत्रकारों पर था जो सुविधा और सत्ता के राष्ट्रभक्त होते हैं जो सुविधा और सत्ता के लिए हिन्दुत्व का चोला पहनते हैं और अचानक अकबर से राणा प्रताप हो जाते हैं। याद रखिए व्यक्ति की महानता उसके चरित्र से देखी जाती हैं ना कि उसके नाम और पद से।

मोदी जी जैसे प्रधानमंत्री के मंत्री एम जे अकबर को रवीश कुमार का इस अंदाज चिठ्ठी लिखना ही रवीश कुमार की बौद्धिकता, सत्यनिष्ठा और कर्तव्यनिष्ठा का परिचायक है। आप पत्रकारिता के पेशे में तो लेखनी की कला को भी समझने का  बोध रखिए, रवीश कुमार की अकबर को ये चिठ्ठी हर उस पत्रकार के नाम है जो कमोबेश एम जे अकबर की शैली में पत्रकारिता करते हैं तथा सत्ता के साथ रंग बदलते रहते हैं। आप एम जे अकबर की श्रेणी में आते हैं या नहीं ये आप स्वयं आईने के सामने खड़े होकर, हिन्दु हो तो ईश्वर को साक्षी मानकर अपने सच्चे हृदय से पूछ कर तैय करना। आपने तो अपनी माँ को उन गालियों से बचा लिया है जो रवीश कुमार रोजाना विवेकशून्य अतार्किक कुंठित विक्षिप्त अंधभक्तों से सुनते अथवा पढ़ते हैं क्योंकि आप रेप्टिलिया प्रजाति (रीढ़विहीन) में अपनी सुविधा के अनुसार ढ़ल जाते हैं। जब जिंदगी रीढ़ विहीन सिद्धांतों पर विचरण करती है तो बहुत सी सुविधाएँ और सत्ता सुख प्राप्त होते हैं लेकिन जमीर खो जाता है।

खैर, आपको जमीर की जरूरत भी क्या है ? हो सके तो अगली चिठ्ठी सुधीर ‘तिहाड़ी’ और एम जे अकबर को आप भी लिखना और पत्रकारिता के कुछ मूलभूत सिद्धांत सीख लेना।

धारे के मुआफिक बहना तो,
तौहीन ऐ दस्तो बाजू है।।

डा विभूति भूषण शर्मा

एडवोकेट

हाईकोर्ट

राजस्थान

Facebook.com/vibhutibhushansharma

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पत्रकारिता में रोजगार की हालत से दुखी मुंबई के एक पत्रकार ने प्रधानमंत्री मोदी जी को खुला पत्र लिखा

Subject: मोदी जी आप से निवेदन, पत्रकारिता क्षेत्र में रोजगार के लिए कुछ कदम उठाएंगे

To:

Prime minister

pmosb@pmo.nic.in

PresidentofIndia

presidentofindia@rb.nic.in

rti-pmo.applications@gov.in

सेवा में
श्रीमान नरेंद्र मोदी जी
प्रधानमंत्री

नमस्कार,

मैं आज एक विश्वास के साथ यह पत्र आप को लिख रहा हूँ कि अन्य विभागों की तरह लोकशाही के चार स्तंभ में से एक पत्रकारिता में युवाओ के रोजगार पर भी ध्यान देंगे। अंग्रेजों से आजादी की लड़ाई से लेकर आज तक देश के विकास में पत्रकारिता का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। समय के साथ पत्रकारिता में बदलाव आया है। जैसे कि आजादी की लड़ाई में पत्रकारिता का उद्देश्य अंग्रेजों से कलम की लड़ाई थी लेकिन आज समय के अनुसार यह बदलकर व्यापार बन गया है। आज के युवा पत्रकारिता की डिग्री लेकर अपना भविष्य बनाने में लगे हैं। डॉ भीमराव आंबेडकर, लोकमान्य गंगाधर तिलक, अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर आज के वरिष्ठ पत्रकारों को अपने आदर्श के रूप में देखते हुए युवा अपना भविष्य पत्रकारिता में बनाने के उद्देश्य से पत्रकारिता में आ रहे हैं।

मैं भी उन्हीं युवाओं की तरह पत्रकारिता में अपना भविष्य बनाने के उद्देश्य से पत्रकारिता की पढाई कर पत्रकारिता की शुरुआत की। पत्रकारिता में तो हमें बहुत कुछ पढ़ाया गया लेकिन वह सब पढाई तक ही अच्छा लगा। लेकिन पत्रकारिता की शुरुवात मैंने नवी मुंबई के वाशी से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक अखबार में 2006 से किया।

पहली बार जब उस अखबार में गया तो संपादक जी ने बकायदा मेरा इंटरव्यू लिया उसके बाद खबर लाने के साथ ही मुझे अखबार भी साथ में पकड़ा दिया कि इसे बाँटते जाना। खैर मुझे सीखना था इसलिए मैंने सोचा कि एकाध दिन कर देते हैं लेकिन बार बार अखबार बाँटने का काम दिए जाने के कारण मैंने वहां काम करना छोड़ दिया। उसके बाद मुंबई से प्रकाशित होने वाले कई अखबारों में 2007 तक काम किया। इस दौरान कई जगह मेरा वेतन भी नहीं मिला। इस बीच 2007 में हमारा महानगर अखबार से जुड़ा और आज तक जुड़ा रहा। कंपनी के कुछ डायरेक्टरों ने मुझे और कुछ स्टाफ का ट्रांसफर कर दिया जिसके कारण हम मुंबई के बाहर ज्वाइन नहीं किये। 2006 से लेकर अभी तक मैंने जितने भी अखबारों में काम किया वहां पत्रकारों का कोई भविष्य नजर नहीं आया। हां इतना जरूर देखा हूं कि जो नेताओं, मालिकों की चापलूसी और पुलिस की दलाली कर सकता है वह सफल है। हम भी मालिक के कई काम किये लेकिन चापलूसी नहीं कर पाये जिसके कारण आज भी चाल में छोटे मकान में रह रहे हैं।

मोदी जी, आप के प्रधानमंत्री बनने के पहले से ही देश के अधिकतर युवाओं और नागरिकों को विश्वास था कि हर क्षेत्र में रोजगार के लिए कदम उठाएंगे। आप कर भी रहे हैं लेकिन पत्रकारिता के क्षेत्र में आ रहे युवाओं के लिए अभी तक कोई कदम नहीं उठाये हैं। पत्रकारिता की पढाई पूरी करने के लिए देश भर में रोज नए- नए, बड़े-बड़े कॉलेज इंस्टीट्यूट खुल रहे हैं। उन कॉलेजों इंस्टीट्यूट में युवाओं को पत्रकारिता के गुण सिखाये जा रहे हैं लेकिन रोजगार के लिए कोई मार्ग नहीं है। कुछ युवाओं का नसीब सही माना जाए या उनका भाग्य माना जाए जो सफल हो जाते हैं नौकरी पाने में लेकिन अधिकतर युवक नौकरी की तलाश में भटकते रहते हैं। नौकरी नहीं मिलने पर अपने आप को कोसते रहते हैं कि आखिर क्यों मैं अपना समय पत्रकारिता में गंवा दिए। लाखों की संख्या में देश के युवक आज अपने आप को उसी तरह कोस रहे हैं। जो नौकरी कर भी रहे हैं उसमें से बहुत कम ही हैं जिन्हें उनके मेहनत के अनुसार मेहनताना मिल पाता है वरना गधे की तरह मजदूरी कर इस उम्मीद में समय बिता रहे हैं कि आज ना कल कुछ अच्छा होगा।

मोदी जी, आप से भी यही उम्मीद है कि पत्रकारिता के क्षेत्र को मजबूत करें जिससे युवाओं को रोजगार मिल सके। अगर नहीं मजबूत कर सकते या पत्रकारिता में रोजगार नहीं उपलब्ध करा सकते तो पत्रकारिता के उन कॉलेजों और इंस्टीट्यूट को बंद कर दे जिससे उन युवाओं के साथ धोखा ना हो सके जो इस क्षेत्र में अपना भविष्य बनाने के उद्देश्य से आना चाहते हैं। मोदी जी आप के सामने मैं बहुत ही छोटा हु ।लेकिन उन लाखों युवाओं की तरफ से यह पत्र लिखा हूं। पता नहीं कि आप इसे पढ़ेंगे भी या नहीं? लेकिन हम उम्मीद लगाये हैं कि विदेश दौरे से वापस आने के बाद जरूर कोई ठोस कदम उठाएंगे ताकि युवाओं का सपना अधूरा ना रहे।

धन्यवाद

एक पत्रकार
नागमणि पाण्डेय
nagmani pandey
9004322982
nagmani4@gmail.com

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अरविंद कुमार सिंह का रोहित सरदाना से सवाल- सुधीर चौधरी को चिट्ठी लिख कभी पूछा कि जिंदल से सौदेबाजी क्यों करनी चाही थी?

Arvind K Singh : रवीश कुमार की चिट्ठी पर चिट्ठी…. रवीश कुमार की चिट्ठी पर एक पत्रकार साथी रोहित सरदाना ( जीन्यूज) ने कुछ सवाल खड़ा किया है। हालांकि ये दोनों पत्रकार साथी ऐसे नहीं है जिनके साथ मैने काम किया हो या कोई गहरा संबंध हो। लेकिन बात मुद्दे की उठी है तो बिना हस्तक्षेप किए रहा नहीं जा रहा है। रवीश कुमार का जहां तक मैने आकलन किया है, उनसे मेरा दूर का संबध है। फिर भी कभी कभार उनको एकाध सलाह दी तो उसे माना और जवाब भी दिया। इसमें कोई संदेह नहीं कि वे ऐसे तमाम मुद्दों को उठाते हैं जिस पर आम तौर पर मुख्यधारा का टीवी शांत रहता है।

यह सही है कि रवीश कुमार ने बरखा दत्त को चिट्ठी नहीं लिखी है। लेकिन मैं साथी रोहितजी से यह जानना चाहता हूं कि क्या उन्होने सुधीर चौधरी जी को चिट्ठी लिख कर कभी पूछा है कि आखिर उन्होने नवीन जिंदल के साथ ऐसी सौदेबाजी क्यों करनी चाही थी औऱ यह भी कि क्या उमा बंसल नामकी शिक्षिका का जीवन बरबाद करते समय उनको पत्रकारिता की नैतिकता का खयाल नहीं रहा था।

मेरे हिसाब से उन्होंने जो सवाल उठाया है वह बेमानी है। रवीश या कोई भी पत्रकार पूरी दुनिया का ठेका लेकर नहीं चल सकता है। जो सवाल झकझोरता है उस पर अगर कोई पत्रकार खुल कर बोलता है तो वह उन पत्रकारों से ज्यादा ईमानदार है जो मन ही मन घुटते हैं। मेरे हिसाब से एक पत्रकार के तौर पर रवीश कुमार अगर कुछ सवाल खड़े कर रहे हैं तो यह एकदम बुरा नहीं है। वे किसान या मजदूर की बात करते हैं तो किसी राजनीतिक दल का समर्थन या विरोध नहीं करते।

कायदे से कोई किसी को संबोधित चिट्ठी लिखता है और अपनी भावनाओं का इजहार करता है तो उसमें किसी और को कूदना नही चाहिए। न ही किसी का प्रवक्ता बनना चाहिए। यह सामान्य शिष्टाचार है। एक पत्रकार होने के साथ चिट्ठी के महत्व को मैं बाकी साथियो से अधिक जानता हूं क्योकि बीते तीन दशकों से मेरे अध्ययन का यह प्रमुख विषय रहा है।

खुली चिट्ठियां लिखने का रिवाज पुराना है। रवीश कुमार की चिट्ठियां बेशक सवाल खड़े करती हैं। सवाल एमजे अकबर पर या अरुण शौरी जैसे एक दौर के दिग्गज पत्रकारों पर उठाना क्यों बुरा है और अखिलेश यादव पर उठाना क्यों अच्छा है। मेरे हिसाब से रवीश कुमार ने सही सवाल उठाया है और ऐसे सवालों को उठाना जारी रखना चाहिेए।

सवाल पूछना और सवाल उठाना लोकतंत्र की आत्मा है। रोहित जी भी सवाल उठाने के लिए आजाद हैं। वे बरखा दत्त से सवाल कर सकते हैं, खुली चिट्ठी लिख सकते हैं। लेकिन किसी और पर सवाल उठाने से कैसे रोक सकते हैं। और यह एजेंडा कैसे तय कर सकते हैं कि रवीश को या किसी को कैसा सवाल पूछना चाहिए और किससे सवाल पूछना चाहिए। बस इतना ही।

राज्यसभा टीवी के वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

मूल खबर….

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एमजे अकबर के नाम रवीश कुमार और रवीश कुमार के नाम रोहित सरदाना के पत्र की सोशल मीडिया पर खूब चर्चा

पहला पत्र रवीश कुमार का एमजे अकबर के नाम…..

आदरणीय अकबर जी,

प्रणाम,

ईद मुबारक़। आप विदेश राज्य मंत्री बने हैं, वो भी ईद से कम नहीं है। हम सब पत्रकारों को बहुत ख़ुश होना चाहिए कि आप भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता बनने के बाद सांसद बने और फिर मंत्री बने हैं। आपने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा। फिर उसके बाद राजनीति से लौट कर सम्पादक भी बने। फिर सम्पादक से प्रवक्ता बने और मंत्री। शायद मैं यह कभी नहीं जान पाऊँगा कि नेता बनकर पत्रकारिता के बारे में क्या सोचते थे और पत्रकार बनकर पेशगत नैतिकता के बारे में क्या सोचते थे? क्या आप कभी इस तरह के नैतिक संकट से गुज़रे हैं? हालाँकि पत्रकारिता में कोई ख़ुदा नहीं होता लेकिन क्या आपको कभी इन संकटों के समय ख़ुदा का ख़ौफ़ होता था?

अकबर जी, मैं यह पत्र थोड़ी तल्ख़ी से भी लिख रहा हूँ। मगर उसका कारण आप नहीं है।आप सहारा बन सकते हैं। पिछले तीन साल से मुझे सोशल मीडिया पर दलाल कहा जाता रहा है। जिस राजनीतिक परिवर्तन को आप जैसे महान पत्रकार भारत के लिए महान बताते रहे हैं, हर ख़बर के साथ दलाल और भड़वा कहने की संस्कृति भी इसी परिवर्तन के साथ आई है। यहाँ तक कि मेरी माँ को रंडी लिखा गया और आज कल में भी इस तरह मेरी माँ के बारे में लिखा गया। जो कभी स्कूल नहीं जा सकी और जिन्हें पता भी नहीं है कि एंकर होना क्या होता है, प्राइम टाइम क्या होता है। उन्होंने कभी एनडीटीवी का स्टुडियो तक नहीं देखा है। वो बस इतना ही पूछती है कि ठीक हो न।अख़बार बहुत ग़ौर से पढ़ती है। जब उसे पता चला कि मुझे इस तरह से गालियाँ दी जाती हैं तो घबराहट में कई रात तक सो नहीं पाई।

अकबर जी, आप जब पत्रकारिता से राजनीति में आते थे तो क्या आपको भी लोग दलाल बोलते थे, गाली देते थे, सोशल मीडिया पर मुँह काला करते थे जैसा मेरा करते हैं। ख़ासकर ब्लैक स्क्रीन वाले एपिसोड के बाद से। फिर जब कांग्रेस से पत्रकारिता में आए तो क्या लोग या ख़ासकर विरोधी दल, जिसमें इन दिनों आप हैं, आपके हर लेखन को दस जनपथ या किसी दल की दलाली से जोड़ कर देखते थे? तब आप ख़ुद को किन तर्कों से सहारा मिलता था? क्या आप मुझे वे सारे तर्क दे सकते हैं? मुझे आपका सहारा चाहिए।

मैंने पत्रकारिता में बहुत सी रिपोर्ट ख़राब भी की है। कुछ तो बेहद शर्मनाक थीं। पर तीन साल पहले तक कोई नहीं बोलता था कि मैं दलाल हूँ। माँ बहन की गाली नहीं देता था। अकबर सर, मैं दलाल नहीं हूँ। बट डू टेल मी व्हाट शूड आई डू टू बिकम अकबर। वाजपेयी सरकार में मुरली मनोहर जोशी जी जब मंत्री थे तब शिक्षा के भगवाकरण पर खूब तक़रीरें करता था। तब आपकी पार्टी के दफ्तर में मुझे कोई नफ़रत से बात नहीं करता था। डाक्टर साहब तो इंटरव्यू के बाद चाय भी पिलाते थे और मिठाई भी पूछते थे। कभी यह नहीं कहा कि तुम कांग्रेस के दलाल हो इसलिए ये सब सवाल पूछ रहे हो। उम्र के कारण जोशी जी गुस्साते भी थे लेकिन कभी मना नहीं किया कि इंटरव्यू नहीं दूँगा और न ऐसा संकेत दिया कि सरकार तुमसे चिढ़ती है। बल्कि अगले दिन उनके दफ्तर से ख़बरें उड़ा कर उन्हें फिर से कुरेद देता था।

अब सब बदल गया है। राजनीतिक नियंत्रण की नई संस्कृति आ गई है। हर रिपोर्ट को राजनीतिक पक्षधरता के पैमाने पर कसने वालों की जमात आ गई। यह जमात धुआँधार गाली देने लगी है। गाली देने वाले आपके और हमारे प्रधानमंत्री की तस्वीर लगाए हुए रहते हैं और कई बार राष्ट्रीय स्वयं संघ से जुड़े प्रतीकों का इस्तमाल करते हैं। इनमें से कई मंत्रियों को फालो करते हैं और कइयों को मंत्री। ये कुछ पत्रकारों को भाजपा विरोधी के रूप में चिन्हित करते हैं और बाकी की वाहवाही करते हैं।

निश्चित रूप से पत्रकारिता में गिरावट आई है। उस दौर में बिल्कुल नहीं आई थी जब आप चुनाव लड़े जीते, फिर हारे और फिर से संपादक बने। वो पत्रकारिता का स्वर्ण काल रहा होगा। जिसे अकबर काल कहा जा सकता है अगर इन गाली देने वालों को बुरा न लगे तो। आजकल भी पत्रकार प्रवक्ता का एक अघोषित विस्तार बन गए है। कुछ घोषित विस्तार बनकर भी पूजनीय हैं। मुझसे तटस्थता की आशा करने वाली गाली देने वालों की जमात इन घोषित प्रतिकारों को कभी दलाल नहीं कहती। हालाँकि अब जवाब में उन्हें भी दलाल और न जाने क्या क्या गाली देने वाली जमात आ गई है। यह वही जमात है जो स्मृति ईरानी को ट्रोल करती है।

आपको विदेश मंत्रालय में सहयोगी के रूप में जनरल वी के सिंह मिलेंगे जिन्होंने पत्रकारों के लिए ‘प्रेस्टिट्यूड’ कहा। उनसे सहमत और समर्थक जमात के लोग हिन्दी में हमें ‘प्रेश्या’ बुलाते हैं। चूँकि मैं एन डी टी वी से जुड़ा हूँ तो N की जगह R लगाकर ‘रंडी टीवी’ बोलते हैं। जिसके कैमरों ने आपकी बातों को भी दुनिया तक पहुँचाया है। क्या आपको लगता है कि पत्रकार स़ख्त सवाल करते हुए किसी दल की दलाली करते हैं? कौन सा सवाल कब दलाली हो जाता है और कब पत्रकारिता इस पर भी कुछ रौशनी डाल सकें तो आप जैसे संपादक से कुछ सीख सकूँगा। युवा पत्रकारों को कह सकूँगा कि रवीश कुमार मत बनना, बनना तो अकबर बनना क्योंकि हो सकता है अब रवीश कुमार भी अकबर बन जाये।

मै थोड़ा भावुक इंसान हूँ । इन हमलों से ज़रूर विचलित हुआ हूँ। तभी तो आपको देख लगा कि यही वो शख्स है जो मुझे सहारा दे सकता है। पिछले तीन साल के दौरान हर रिपोर्ट से पहले ये ख़्याल भी आया कि वही समर्थक जो भारत के सांस्कृतिक उत्थान की आगवानी में तुरही बजा रहे हैं, मुझे दलाल न कह दें और मेरी माँ को रंडी न कह दें। जबकि मेरी माँ ही असली और एकमात्र भारत माता है। माँ का ज़िक्र इसलिए बार बार कह रहा हूँ क्योंकि आपकी पार्टी के लोग ‘एक माँ की भावना’ को सबसे बेहतर समझते हैं। माँ का नाम लेते ही बहस अंतिम दीवार तक पहुँच कर समाप्त हो जाती है।

अकबर जी, मैं यह पत्र बहुत आशा से लिख रहा हूँ । आपका जवाब भावी पत्रकारों के लिए नज़ीर बनेगा। जो इन दिनों दस से पंद्रह लाख की फीस देकर पत्रकारिता पढ़ते हैं। मेरी नज़र में इतना पैसा देकर पत्रकारिता पढ़ने वाली पीढ़ी किसी कबाड़ से कम नहीं लेकिन आपका जवाब उनका मनोबल बढ़ा सकता है।

जब आप राजनीति से लौट कर पत्रकारिता में आते थे तो लिखते वक्त दिल दिमाग़ पर उस राजनीतिक दल या विचारधारा की ख़ैरियत की चिन्ता होती थी? क्या आप तटस्थ रह पाते थे? तटस्थ नहीं होते थे तो उसकी जगह क्या होते थे? जब आप पत्रकारिता से राजनीति में चले जाते थे तो अपने लिखे पर संदेह होता था? कभी लगता था कि किसी इनाम की आशा में ये सब लिखा है? मैं यह समझता हूँ कि हम पत्रकार अपने समय संदर्भ के दबाव में लिख रहे होते हैं और मुमकिन है कि कुछ साल बाद वो ख़ुद को बेकार लगे लेकिन क्या आपके लेखन में कभी राजनीतिक निष्ठा हावी हुई है? क्या निष्ठाओं की अदला बदली करते हुए नैतिक संकटों से मुक्त रहा जा सकता है? आप रह सके हैं?

मैं ट्वीटर के ट्रोल की तरह गुजरात सहित भारत के तमाम दंगों पर लिखे आपके लेख का ज़िकर नहीं करना चाहता। मैं सिर्फ व्यक्तिगत संदर्भ में यह सवाल पूछ रहा हूँ। आपसे पहले भी कई संस्थानों के मालिक राज्य सभा गए। आप तो कांग्रेस से लोकसभा लड़े और बीजेपी से राज्य सभा। कई लोग दूसरे तरीके से राजनीतिक दलों से रिश्ता निभाते रहे। पत्रकारों ने भी यही किया। मुझे ख़ुशी है कि प्रधानमंत्री मोदी ने कांग्रेसी सरकारों की इस देन को बरक़रार रखा है। भारतीय संस्कृति की आगवानी में तुरही बजाने वालों ने यह भी न देखा कि लोकप्रिय अटल जी ख़ुद पत्रकार थे और प्रधानमंत्री बनने के बाद भी अपने अख़बार वीरअर्जुन पढ़ने का मोह त्याग न सके। कई और उदाहरण आज भी मिल जायेंगे।

मुझे लगा कि अब अगर मुझे कोई दलाल कहेगा या माँ को गाली देगा तो मैं कह सकूँगा कि अगर अकबर महान है तो रवीश कुमार भी महान है। वैसे मैं अभी राजनीति में नहीं आया हूँ। आ गया तो आप मेरे बहुत काम आयेंगे। इसलिए आप यह भी बताइये कि पत्रकारों को क्या करना चाहिए। क्या उन्हें चुनाव लड़कर, मंत्री बनकर फिर से पत्रकार बनना चाहिए। तब क्या वे पत्रकारिता कर पायेंगे? क्या पत्रकार बनते हुए देश सेवा के नाम पर राजनीतिक संभावनाएँ तलाश करती कहनी चाहिए?  ‘यू कैन से सो मेनी थिंग्स ऑन जर्नलिज़्म नॉट वन सर’!

मैं आशा करता हूँ कि तटस्थता की अभिलाषा में गाली देने वाले आपका स्वागत कर रहे होंगे। उन्हें फूल बरसाने भी चाहिए। आपकी योग्यता निःसंदेह है। आप हम सबके हीरो रहे हैं। जो पत्रकारिता को धर्म समझ कर करते रहे मगर यह न देख सके कि आप जैसे लोग धर्म को कर्मकांड समझकर निभाने में लगे हैं। चूँकि आजकल एंकर टीआरपी बताकर अपना महत्व बताते हैं तो मैं शून्य टीआरपी वाला एंकर हूँ। टीआरपी मीटर बताता है कि मुझे कोई नहीं देखता। इस लिहाज़ से चाहें तो आप इस पत्र को नज़रअंदाज़ कर सकते हैं। मगर मंत्री होने के नाते आप भारत के हर नागरिक के प्रति सैंद्धांतिक रूप से जवाबदेह हो जाते हैं।उसी की ख़ैरियत के लिए इतना त्याग करते हैं। इस नाते आप जवाब दे सकते हैं। नंबर वन टी आर पी वाला आपसे नहीं पूछेगा कि ज़ीरो टी आर पी वाले पत्रकार का जवाब एक मंत्री कैसे दे सकता है वो भी विदेश राज्य मंत्री। वन्स एगेन ईद मुबारक सर। दिल से।

आपका अदना,
रवीश कुमार

उपरोक्त पत्र के जवाब में रवीश कुमार के नाम जी न्यूज के रोहित सरदाना का पत्र यूं है….

आदरणीय रविश कुमार जी

नमस्कार

सर, ट्विटर, फेसबुक, ब्लॉग, फेस टाइम के दौर में आपने चिट्ठी लिखने की परंपरा को ज़िंदा रखा है उसके लिए आप बधाई के पात्र हैं. हो सकता है कि चिट्ठियां लिखने की वजह ये भी हो कि ट्विटर, फेसबुक पे लोग जवाब दे देते हैं और चिट्ठी का जवाब मिलने की उम्मीद न के बराबर रहती है, इस लिए चिट्ठी लिखने का हौसला बढ़ जाता हो. पर हमेशा की तरह एक बार फिर, आपने कम से कम मुझे तो प्रेरित किया ही है कि एक चिट्ठी मैं भी लिखूं – इस बात से बेपरवाह हो कर – कि इसका जवाब आएगा या नहीं.

ये चिट्ठी लिखने के पहले मैंने आपकी लिखी बहुत सी चिट्ठियां पढ़ीं. अभी अभी बिलकुल. इंटरनेट पर ढूंढ कर. एनडीटीवी की वेबसाइट पर जा कर. आपके ब्लॉग को खंगाल कर. एम जे अकबर को लिखी आपकी हालिया चिट्ठी देखी. पीएम मोदी को लिखी चिट्ठी देखी. मुख्यमंत्रियों के नाम आपकी चिट्ठी देखी. विजय माल्या के नाम की चिट्ठी देखी. पुलिस वालों के नाम भी आपकी चिट्ठी देखी.

सर लेकिन बहुत ढूंढने पर भी मैं आपकी वरिष्ठ और बेहद पुरानी सहयोगी बरखा दत्त के नाम की खुली चिट्ठी नहीं ढूंढ पाया, जिसमें आपने पूछा होता कि नीरा राडिया के टेप्स में मंत्रियों से काम करा देने की गारंटी लेना अगर दलाली है – तो क्या आपको दलाल कहे जाने के लिए वो ज़िम्मेदारी लेंगी?

बहुत तलाशने के बाद भी मैं आपके किसी ठिकाने पर वरिष्ठ पत्रकार और संपादक रहे आशुतोष जी (जो अब आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं) के नाम आपकी कोई खुली चिट्ठी नहीं ढूंढ पाया, जिसमें आपने पूछा होता कि साल-डेढ़ साल तक स्टूडियो में हॉट-सीट पर बैठ कर , अन्ना के पक्ष में किताब लिखना और फिर उस मेहनत कूपन को पार्टी प्रवक्ता की कुर्सी के बदले रिडीम करा लेना अगर दलाली है – तो क्या आपको दलाल कहे जाने के लिए वो ज़िम्मेदारी लेंगे?

सर मैंने बहुत ढूंढा, लेकिन मैं आपके पत्रों में आशीष खेतान के नाम कोई चिट्ठी नहीं ढूढ पाया, जिसमें आपने पूछा होता कि सवालों में घिरे कई स्टिंग ऑपरेशनों, प्रशांत भूषण जी के बताए पक्षपातपूर्ण टू जी रिपोर्ताजों के बीच निष्पक्ष होने का दावा करते अचानक एक पार्टी का प्रवक्ता हो जाना अगर दलाली है – तो क्या वो आपको दलाल कहे जाने की ज़िम्मेदारी शेयर करेंगे?

सर मैं अब भी ढूंढ रहा हूं. लेकिन राजदीप सरदेसाई के नाम आपका कोई पत्र मिल ही नहीं रहा. जिसमें आपने पूछा हो कि 14 साल तक एक ही घटना की एक ही तरफ़ा रिपोर्टिंग और उस घटना के दौरान आए एक पुलिस अफसर की मदद के लिए अदालत की तल्ख टिप्पणियों के बावजूद, वो हाल ही में टीवी चैनल के संपादक होते हुए गोवा में आम आदमी पार्टी की रैली में जिस तरह माहौल टटोल रहे थे, अगर वो दलाली है, तो क्या राजदीप जी आपको दलाल कहे जाने की ज़िम्मेदारी लेंगे?

सर मैंने बहुत तलाशा. लेकिन मैं उन सब पत्रकार (पढ़ें रिपोर्टर) दोस्तों के नाम आपकी कोई चिट्ठी नही ढूंढ पाया, जिन्हें दिल्ली सरकार ने ईनाम के तौर पर कॉलेजों की कमेटियों का सम्मानित सदस्य बना दिया. सर जब लोग आ कर कहते हैं कि आपका फलां साथी रसूख वाला है, उससे कह के दिल्ली के कॉलेज में बच्चे का एडमिशन करा दीजिए. आपका मन नहीं करता उनमें से किसी से पूछने का कि क्या वो आपको दलाल कहे जाने की ज़िम्मेदारी आपके साथ बांटेंगे?

पत्रकारों का राजनीति में जाना कोई नई बात नहीं है. आप ही की चिट्ठियों को पढ़ के ये बात याद आई. लेकिन पत्रकारों का पत्रकार रहते हुए एक्टिविस्ट हो जाना, और एक्टिविस्ट होते हुए पार्टी के लिए बिछ जाना – ये अन्ना आंदोलन के बाद से ही देखा. लड़ाई भ्रष्टाचार के खिलाफ़ थी. मैं भी जाता था अपनी 3 साल की बेटी को कंधे पर ले कर. मैं भीड़ में था. आप मंच पर थे. तब लगा था कि क्रांतिकारी पत्रकार ऐसे होते हैं. लेकिन फिर इंटरव्यू में किरण बेदी को दौड़ाते और अरविंद केजरीवाल को सहलाते आपको देखा तो उसी मंच से दिए आपके भाषण याद आ गए.

क्रांतिकारी से याद आया, आपकी चिट्ठियों में प्रसून बाजपेयी जी के नाम भी कोई पत्र नहीं ढूंढ पाया. जिसमें आपने पूछ दिया हो कि इंटरव्यू का कौन सा हिस्सा चलाना है, कौन सा नहीं, ये इंटरव्यू देने वाले से ही मिल के तय करना अगर दलाली है – तो क्या वो आपको दलाल कहे जाने की ज़िम्मेदारी लेंगे?

सर गाली तो लोग मुझे भी देते हैं. वही सब जो आपको देते हैं. बल्कि मुझे तो राष्ट्रवादी भी ऐसे कहा जाता है कि जैसे राष्ट्रवादी होना गाली ही हो. और सर साथ साथ आपसे सीखने की नसीहत भी दे जाते हैं. पर क्या सीखूं आपसे ? आदर्शवादी ब्लॉग लिखने के साथ साथ काले धन की जांच के दायरे में फंसे चैनल की मार्केटिंग करना?

सर कभी आपका मन नहीं किया आप प्रणय रॉय जी को एक खुली चिट्ठी लिखें. उनसे पूछें कि तमाम पारिवारिक-राजनीतिक गठजोड़ (इसे रिश्तेदारी भी पढ़ सकते हैं) के बीच – आतंकियों की पैरवी करने की वजह से, देश के टुकड़े करने के नारे लगाने वालों की वकालत करने की वजह से, लगभग हर उस चीज़ की पैरवी करने की वजह से जो देश के बहुसंख्यक समुदाय की भावनाओं को आहत करती हो – अगर लोग आपको दलाल कहने लगे हैं तो क्या वो इसकी ज़िम्मेदारी लेंगे?

उम्मीद करता हूं आप मेरे पत्र को अन्यथा नहीं लेंगे. वैसे भी आपकी चिट्ठी की तरह सारे सोशल मीडिया ब्लॉग्स और अखबार मेरे लिखे को हाथों हाथ नहीं लेंगे. लेकिन आपकी राजनीतिक/गैर राजनीतिक सेनाएं इस चिट्ठी के बाद मेरा जीना हराम कर देंगी ये मैं जानता हूं. जिन लोगों का ज़िक्र मेरी चिट्ठी में आया है – वो शायद कभी किसी संस्थान में दोबारा नौकरी भी न पाने दें. पर सर मैं ट्विटर से फिर भी भागूंगा नहीं. न ही आपको ब्लॉक कर दूंगा (मुझे आज ही पता लगा कि आपने मुझे ब्लॉक किया हुआ है, जबकि मेरे आपके बीच ये पहला संवाद है, न ही मैंने कभी आपके लिए कोई ट्वीट किया, नामालूम ये कड़वाहट आपमें क्यों आई होगी, खैर).

सर आप भगवान में नहीं मानते शायद, मैं मानता हूं. और उसी से डरता भी हूं. उसी के डर से मैंने आप जैसे कई बड़े लोगों को देखने के बाद अपने आप को पत्रकार लिखना बंद कर दिया था, मीडियाकर्मी लिखने लगा. बहुत से लोग मिलते हैं जो कहते हैं पहले रवीश बहुत अच्छा लगता था, अब वो भी अपने टीवी की तरह बीमार हो गया है. शायद आप को भी मिलते हों. वो सब संघी या बीजेपी के एजेंट या दलाल नहीं होते होंगे सर. तो सबको चिट्ठियां लिखने के साथ साथ एक बार अपनी नीयत भी टटोल लेनी चाहिए, क्या जाने वो लोग सही ही कहते हों?

आपका अनुज
रोहित

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बिना सहमति इंटरव्यू छापे जाने से नाराज रामबहादुर राय ने आउटलुक को लिखा लेटर, एडिटर्स गिल्ड में मुद्दा उठाएंगे

केंद्र सरकार द्वारा वित्त पोषित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आइजीएनसीए) के अध्‍यक्ष और वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय का इंटरव्यू एक साप्ताहिक पत्रिका ‘आउटलुक’ ने छापा है जिसमें राम बहादुर राय को यह कहते हुए दिखाया गया है कि संविधान निर्माण में डॉ बीआर आंबेडकर की कोई भूमिका नहीं थी. आरएसएस से जुड़े छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के पूर्व महासचिव राय के ‘आउटलुक’ को दिए साक्षात्कार के अनुसार राय ने कहा कि आंबेडकर ने संविधान नहीं लिखा था. आंबेडकर की भूमिका सीमित थी और तत्कालीन प्रशासनिक अधिकारी बीएन राऊ जो सामग्री आंबेडकर को देते थे, वे उसकी भाषा सुधार देते थे. इसलिए संविधान आंबेडकर ने नहीं लिखा था. अगर संविधान को कभी जलाना पड़ा तो मैं ऐसा करने वाला पहला व्यक्ति होऊंगा. 

जब पूछा गया कि क्या तब अंबेडकर की भूमिका मिथक थी तो उन्होंने कहा, हां, मिथक है, मिथक है, मिथक है…। यह पहचान की राजनीति का हिस्सा है। देश में कुछ मिथक गढ़े गए हैं और इनमें से एक है कि संविधान ‘मंदिर की प्रतिमा’ की तरह है जिसे कोई नहीं छू सकता। उन्होंने कहा, कुछ लोगों को लगता है कि अगर संविधान से छेड़छाड़ हुई तो बाबा साहब आंबेडकर के सपनों का क्या होगा। लेकिन बाबा साहब के सपनों का प्रतिनिधित्व करने के लिए लोग इस संसद में हैं, इसलिए यह खतरा नहीं है।

राय के बयान के बाद तत्काल उनकी आलोचना शुरू हो गई और भाजपा के अनुसूचित जाति मोर्चा के अध्यक्ष दुष्यंत कुमार गौतम ने विवादास्पद टिप्पणी की निंदा करते हुए कहा कि यए बयान आंबेडकर के अपमान के समान हैं और दलितों से संपर्क साधने के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयासों में बाधक है। गौतम ने राय पर निशाना साधते हुए कहा, जो ऐसा कह रहे हैं, वे बिना सोच के ऐसा कह रहे हैं और ऐसा लगता है कि वे अनुसूचित जातियों और सामाजिक न्याय की अवधारणा के खिलाफ दुर्भावना और शत्रुता रखते हैं। उन्होंने कहा, अगर आंबेडकर ऊंची जाति से होते तो वे ऐसे बयान नहीं देते।

इस बारे में रामबहादुर राय का कहना है कि उन्होंने ऐसा कोई साक्षात्कार दिया ही नहीं। उन्होंने कहा कि यह ‘पत्रकारीय नैतिकताओं का उल्लंघन’ है। राम बहादुर राय जी ने बताया कि उनके पास कुछ शख्स मिलने के लिए आए थे। उन्होंने न तो आने का इस तरह का कोई मकसद बताया, न ही ये बताया कि वो किसी पत्रिका या अखबार से हैं। राय के मुताबिक उन्होंने ये भी नहीं कहा कि वो इंटरव्यू लेने के लिए आए हैं। न ही इस बात का जिक्र किया कि वो इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्‍यक्ष के तौर पर उनका इंटरव्यू छापने वाले हैं। राम बहादुर राय ने साफ कहा कि भोलेपन से ये लोग उनसे बातचीत करते रहे। तस्वीरें खींची और फिर उसे शरारत करते हुए गलत तरीके से इंटरव्यू बनाकर छाप दिया। राम बहादुर राय जी ने ये भी बताया कि उन्होंने आउटलुक पत्रिका को एक लंबी चिट्ठी लिखी है, साथ ही वो एडिटर्स गिल्ड में भी इस मुद्दे को उठाएंगे।

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पीएमओ को लेटर लिखने पर ‘जनसंदेश टाइम्स’ पत्रकार विनायक राजहंस को पीएफ राशि देने को मजबूर हुआ

Vinayak Rajhans : पिछले करीब दो साल से अपने पीएफ की राशि को पाने के लिए मेरा संघर्ष रंग लाया. मेरे पूर्व नियोक्ता ‘जनसंदेश टाइम्स’ और पीएफ ऑफिस लखनऊ की उदासीनता के चलते इनके खूब चक्कर लगाने पड़े. मेरे पीएफ खाते में पैसे ही नहीं जमा किए गए थे जबकि वेतन से काटा गया था.

इस संबंध में मुझे अंतिम उम्मीद के तौर पर ‘प्रधानमंत्री कार्यालय’ को लिखना पड़ा. अंततः पीएमओ के हस्तक्षेप से मेरे दावे का निस्तारण हुआ. इस संघर्ष में लगातार मेरे साथ रहे मेरे तत्कालीन सहकर्मी Shyamal Tripathi और Shivani Sudirgh. बाकी लोग शायद संघर्ष या फिर पहल करने से डरते रहे.

रायबरेली निवासी पत्रकार विनायक राजहंस के एफबी वॉल से.

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जेएनयू के साथियों को पत्र

प्रिय कामरेड,
लाल सलाम।

सबसे पहले तो मैं यह स्पष्ट कर दूं कि मैं आप लोगों के संघर्ष के साथ हूं। जब आप लोग जेल में थे तो मैं भी उन रैलियों का हिस्सा था जो आप लोगों के साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ दिल्ली में निकाली गईं थी। बैनर और पोस्टर के साथ मैं भी मंडी हाउस और अम्बेडकर भवन से जंतर मंतर गया था। यकीनन आप लोग न्याय के पक्ष में खड़े है और हर संवेदनशील व्यक्ति को ऐसा ही करना चाहिए। आज की जरूरत यही है।

फिर भी कामरेड मैं आप लोगों से कुछ बातों में असहमत हूं। मुझे लगता है कि आप लोग भी उसी डिस्कोर्स में फंस से गए हैं जिसमें भारत और दक्षिण एशिया और अब तो यूरोप और अमेरिका की राजनीति भी फंसी हुई है।

आप की लड़ाई में रोटी, कपडा और मकान; स्वास्थ, शिक्षा और रोजगार का सवाल पीछे छूट गया है और ‘जनवाद’ ‘लोकतंत्र’ और  ‘सहभागिता’ जैसे भ्रामक मुद्दे आगे आ गए हैं। मेरे कहने का मतलब यह नहीं है कि उपरोक्त मुद्दे आवश्यक नहीं हैं। ये हैं। लेकिन जनवाद और सहभागिता का सवाल सत्ता/व्यवस्था से जुड़ा सवाल है। बिना व्यवस्था बदलाव के इन सवालों पर उलझे रहना अंततः सत्ता के यथास्थितिवादी विमर्श को चाहे-अनचाहे स्वाकीर करना है।

आप लोग जेएनयू के छात्र हैं। मुझे आप लोगों पर फक्र है। लेकिन आप लोगों की हालत देख कर दुख भी बहुत होता है।

पिछले कुछ साल (तीन साल) मैंने एनजीओ में नौकरी की। पहले माना जाता था कि एनजीओ की नौकरी मुझ जैसे अर्ध-साक्षर लोगों के लिए होती हैं। जेएनयू और अन्य प्रतिष्ठत संस्थान के लोग यहां नहीं होते थे। लेकिन कुछ सालों में दिल्ली के तमाम एनजीओ में जेएनयू के छात्र दिखाई देने लगे हैं। पहले आप लोग शौक से इस क्षेत्र में आते थे। अच्छा काम करते थे और चले जाते थे। लेकिन अब आप लोग मजबूरी में यहां आते हैं और पूरी ताकत से यहां बने रहना चाहते हैं। कारण- आप लोगों पर भी बेरोजगारी की तलवार लटका दी गई है। देर से ही लेकिन आप भी वहीं आ गए जहां मैं बहुत पहले पहुंचा दिया गया था। अपनी मर्जी के खिलाफ।

इन तीन सालों में मेरे कई मित्र बने जो जेएनयू से पीएचडी करने के बाद इस क्षेत्र में आए। वे आना नहीं चाहते थे। उन्हे आना पड़ा। मेरी बगल की सीट में बैठ कर वे वही काम करते हैं जो मैं या और कोई कर रहा है। वे वैसे ही जलील होते हैं जैसा मैं या और कोई जलील होता है और फिर वे वैसे ही लोगों को बेवकूफ बनाने लगते हैं जैसा मैं और कोई बनाता है।

अब से अधिक नहीं सिर्फ पांच या आठ साल पहले जब मैं यूं ही जेएनयू जाया करता था तो लोग एनजीओ पर हंसते थे। तंज कसते थे। इतना तंज कसते थे कि जब मैंने एनजीओ ज्वाईन किया तो अपने दोस्तो को बता भी नहीं सका। फिर कुछ ही सालों में सब बराबर हो गया। तंज कसने वाले मेरे दोस्त मेरी बगल में आ कर बैठ गए। डेवनेट में बायोडाटा भेजने लगे। प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनाने लगे। फंड लाने लगे।

शेयर बाजार में भी ऐसी तीव्र गिरावट कभी देखने को नहीं मिलती जितना हम और आप को गिरना पड़ रहा है।

ऐसे में मेरी उम्मीद यह थी कि आप लोग कुछ रास्ता सुझाएंगे। रोजगार के सवाल को केन्द्र में लाएंगे। संघवाद से आजादी और ब्राह्मणवाद से आजादी हम सभी को चाहिए लेकिन इन आजादियों के साथ रोटी की व्यवस्था भी हो जाती तो कितना मजा आता। कश्मीर, पूर्वोत्तर का मामला महत्वपूर्ण है। मैं आपके साथ हूं लेकिन रोटी भी कम बढ़ी दलील नहीं है।

मुझे पता है कि आप की लड़ाई में रोटी भी शामिल है। लेकिन मैं बस इतना बताना चाहता हूं कि वह दिख नहीं रही है। उसका दिखना बहुत जरूरी है। उसके न दिखने से बहुसंख्यक छात्र और युवा आप से अलग थलग हो गए हैं। आप जैसे होते हुए भी वे आप के दुश्मन बन गए हैं। क्या ये तकलीफ देने वाली बात नहीं है ? जिस शहर से मैं आता हूं वो युवाओं की आत्महत्या दर में कई सालों से शीर्ष में बना हुआ है। उदारीकरण के जबडे़ ने उसकी धमनियों से खून चूस लिया है और अब वह हड्डियों से सूखा गोश्त भी नोच रहा है। लेकिन वही सूखा शरीर राम जी के झण्डे का डंडा बना हुआ है। वे भी क्या करें ? भूख का एक इलाज अफीफ भी तो है। अफीम लोगों को कंकाल में बदल देती है लेकिन उन्हे भूख महसूस नहीं होने देती। यकीन मानीए भारत में नए अफीम युद्ध की पूरी गुंजाइश है लेकिन उसे लिन चेश्वी नहीं मिल रहा। और यह भी यकीन मानीए कि मैं आप लोगों में कई लिन चेश्वी देख पा रहा हूं।

कामरेड, भारत का भविष्य आप के हाथ में है। और सबसे बड़ी बात कि आपके पास मौका भी है। राष्ट्रवादी होने न होने के विमर्श में न उलझ कर, स्वयं को इस संसदीय विमर्श में न फंसा कर रोटी और भूख की लड़ाई को केन्द्र में ले आईए। अपने भटके भाईयों को अफीम की लत से आजाद कराईए। संसदीय राजनीति धुव्रीकरण का खेल है। इस खेल से आजादी दिलाइए। सवाल भारत के भविष्य का है । मिलकर बनाएंगे तो जल्दी बना लेंगे एक आदर्श भारत।

आपका साथी, आपके साथ।
विष्णु
vishnu sharma
simplyvishnu2004@yahoo.co.in

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एसएमबीसी इनसाइट चैनल का लाइसेंस रद्द करने के लिए मंत्रालय के सचिव को भेजा पत्र

सेवा में,
सचिव
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय
ए विंग, शास्त्री भवन
नई दिल्ली

विषय : एसएमबीसी इनसाइट चैनल द्वारा अपलिंकिंग/डाउनलिंकिंग दिशानिर्देशों के उल्लंघन के संदर्भ में

महाशय,

उपरोक्त विषय के संदर्भ में सूचित करना है कि सी मीडिया सर्विस प्रा. लि. द्वारा संचालित न्यूज चैनल एसएमबीसी इनसाइट लगातार सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार के अपलिंकिंग/ डाउनलिंकिंग के लिए तय दिशा निर्देशों का उल्लंघन कर रहा है। इस संदर्भ में मैं आपका ध्यान निम्न बिन्दुओं की तरफ दिलाना चाहता हूं…

1. सी मीडिया सर्विस प्राइवेट लिमिटेड को पूर्व में वॉयस ऑफ सेंट्रल इंडिया के नाम से न्यूज चैनल शुरू करने की अनुमति दी गई थी। बाद में सी मीडिया प्रा. लि. ने इसका नाम बदलकर एसएमबीसी इनसाइट कर दिया।

2. एसएमबीसी इनसाइट का रजिस्टर्ड कार्यालय फर्स्ट फ्लोर, ओबरॉय कॉम्पलेक्स, गोरखपुर रोड, जबलपुर दर्ज है। मंत्रालय को दी गई सूचना के अनुसार चैनल का प्रसारण भी जबलपुर से ही किया जा रहा है। जबकि हकीकत यह है कि इस चैनल का प्रसारण पिछले एक साल से एच-61, सेक्टर- 63 से किया जा रहा है। इस संदर्भ में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को किसी प्रकार की सूचना नहीं दी गई, जो कि अपलिंकिंग के तय सरकारी दिशानिर्देशों ( धारा 3.1.4) का उल्लंघन है।

3. अपलिंकिंग / डाउनलिंकिग दिशानिर्देशों के तहत सी मीडिया सर्विस को एसएमबीसी इनसाइट के नाम से चैनल चलाने की अनुमति दी गई है, लेकिन चैनल पिछले 15 दिनों से एसएमबीसी इनसाइट के साथ साथ न्यूज एक्सप्रेस लाइव के लोगो के साथ चल रहा है, जिससे दर्शकों के बीच भ्रम फैल रहा है। इसके लिए संबंधित विभाग को किसी भी प्रकार की सूचना नहीं दी गई है। इसकी पुष्टि आप अपने मॉनिटरिंग विभाग से करा सकते हैं।

4. चैनल को एनएसपीटीएल, ग्रेटर नोएडा से अपलिंक किया जा रहा है। एनएसपीटीएल ने भी इस संबंध में सी मीडिया सर्विस प्रा. लि. से कोई स्पष्टीकरण नहीं मांगा। ऐसे में एनएसटीपीएल भी सीधे तौर से सरकार के दिशानिर्देशों के उल्लंघन का जिम्मेदार है।

5. एसएमबीसी इनसाइट इससे पहले भी इस तरह के दिशानिर्देशों का उल्लंघन करता रहा है। चैनल को इसी साल 31.07.2015 को एक चेतावनी पत्र दिया गया था।

6. एमएमबीसी इनसाइट सरकार के उस निर्देश का पालन भी नहीं कर रहा है, जिसके तहत चैनल के लिए यह जरूरी है कि कम से कम 90 दिनों तक प्रसारित कार्यक्रमों का रिकॉर्ड रखे। इसकी पुष्टि चैनल से 15 दिन की रिकॉर्डिंग मांग कर की जा सकती है।

7. अत : आप से विनम्र निवेदन है कि इस संदर्भ में जांच कर चैनल का लाइसेंस रद्द करने की दिशा में कार्रवाई करें।

भवदीय
निशी पासवान
स्वतंत्र पत्रकार
nishipaswan@gmail.com

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ये एसएमबीसी चैनल में क्या चल रहा है भाई, दनादन गिर रहे हैं नोटिस और लेटर….

सी मीडिया सर्विसेज प्राइवेट लिमिेटेड नामक कंपनी एसएमबीसी नामक एक न्यूज चैनल चलाती है. इस चैनल में अंदरखाने जबरदस्त बवाल चल रहा है. चैनल के सीएमडी श्रीराम तिवारी ने सुशील खरे को एक मेल भेजा है. सुशील खरे का पद इस मेल में आनरेरी सीईओ का दिखाया गया है. यानि सुशील खरे ऐसे सीईओ हैं जो अवैतनिक हैं. पत्र में क्या लिखा गया है, आप खुद पढ़ लीजिए. उधर, सुशील खरे ने सी मीडिया प्राइवेट लिमिटेड जबलपुर मध्य प्रदेश और डा. प्रकाश शर्मा मैनेजिंग डायरेक्टर सी मीडिया सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड को तीन पन्ने का लीगल नोटिस भिजवाया है. सारे लेटर व लीगल नोटिल नीचे है, पढ़िए और बूझिए…

 

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वेतन मांगने पर बाहर कर दिए गए सहाराकर्मी का एक खुला पत्र उपेंद्र राय के नाम

प्रतिष्ठार्थ
श्री उपेंद्र राय,
एडिटर इन चीफ
सहारा मीडिया
नोएडा

विषय- आपकी कथनी और करनी में अंतर के संर्दभ में

महोदय

मैं सहारा राष्ट्रीय सहारा देहरादून से विगत आठ साल से जुड़ा एक कर्मचारी हूं। इस दौर में मैंने देखा जो मौज सहारा के अफसर और उनके चमचे लेते रहे हैं, वह किसी की नहीं है। हम कुछ लोग खच्चर की तरह सहारा के लिए काम करते रहे और बाकी मौज लेते रहे। महोदय, यह सही है कि पहले सहारा में नौकरी को सरकारी माना जाता था और एक तारीख को वेतन एकाउंट में आ जाता था। विगत डेढ़ साल से सहारा में वेतन भुगतान संबंधी समस्या है। तर्क दिया जा रहा है कि कंपनी संकट में है तो कृपया आप हमें बता दें कि जब कंपनी संकट में नहीं थी तो प्रबंधन ने कितनी बार हमारी सेलरी बढ़ाई?

इसके अलावा कुछ सवाल हैं जिनके उत्तर आपको देने चाहिए ताकि सहारा में कार्यरत लोगों का मनोबल बढ़े। ये सवाल निम्न हैं…

-आपने प्रेरणा सम्मेलन किया। बसपा सुप्रीमो मायावती की तर्ज पर आप अकेले डायस पर बैठे और जमकर भाषण दिया। इसमें आपने जरा भी जिक्र नहीं किया कि किस तरह से कर्मचारियों का जीवन यापन हो रहा है और पिछले बकाया वेतन का भुगतान होगा कब?

-आपने अपने भाषण जिसे आप प्रेरणा कहते हैं, में टीवी सीरियल सम्राट अशोक का जिक्र किया, उसमें आपने कई बातों का उल्लेख किया, लेकिन एक भी बात ऐसी नहीं बतायी कि सम्राट अशोक ने अपनी जनता के लिए अपनी जान हथेली पर रख दी थी। पर आपने क्या ऐसा किया? उल्टे जब हम सेलरी के संकट से जूझ रहे थे तो आपने अपनी मां के निधन को ऐतिहासिक बना दिया। ऐसे प्रचार किया जैसे वो जगत जननी हों। वेतन के लिए पैसे नहीं, लेकिन मां के निधन पर अखबारों में लाखों रुपये का वेतन फूंक दिया गया। यह पैसा कहां से आया?

-महोदय, क्या मां और मां में अंतर होता है? देहरादून में तैनात एक कर्मचारी की मां बीमार थीं तो वह पैसों के अभाव में डाक्टर से सलाह के लिए सरकारी अस्पताल में घंटों अपनी मां को लेकर लाइन में लगा रहा। देहरादून के एक कर्मचारी की 11वीं कक्षा में पढ़ रही बेटी ने स्कूल में दम इसलिए तोड़ दिया कि उसका पिता पैसों के अभाव में इलाज नहीं करा सका। वह कर्मचारी खुद भी दिल का मरीज है और उसकी ओपन हार्ट सर्जरी भी हो चुकी है। महोदय, देहरादून के पटेल नगर में जहां राष्ट्रीय सहारा का आफिस है, वहां स्थित एक पेट्रोल पंप पर सहारा से निकाला गया एक कर्मचारी महज 50 रुपये रोजाना के हिसाब से नौकरी कर रहा है क्योंकि उसके पास बच्चे की फीस देने के लिए पैसे नहीं हैं। वह 1991 से सहारा में कार्यरत था। उसे महज इसलिए निकाल दिया गया कि वह वेतन मांग रहा था। सहारा अपने को विश्व का सबसे बड़ा परिवार कहता है, क्या परिवार ऐसा होता है?

-सहारा में कार्यरत सब जानते हैं कि आपने सहारा में अपनी खोई कुर्सी हासिल करने के लिए कर्मचारियों के एक गुट को भड़काया। नोएडा व अन्य स्थानों पर हड़ताल करवायी। फिर जेल में बंद सहाराश्री को भ्रमित कर नया पद व रुतबा भी हासिल कर लिया। हड़ताल का नेतृत्व करने वाले को संपादक बना दिया और जो बेचारे अपने वेतन की मांग कर रहे थे, उन्हें यूनियनिस्ट कहकर नौकरी से निकलवा दिया। यह कैसा इंसाफ है?

-आपके झूठ का पुलिंदा नोटिस बोर्ड पर चिपका हुआ है। आपने मार्च माह में दस तारीख तक वेतन देने की बात कही, लेकिन वेतन मिला 21 मार्च को। इसी तरह से उसी पत्र में कहा गया था अप्रैल में वेतन पहले सप्ताह में दे दिया जाएगा लेकिन अब तक नहीं मिला। आखिर कब मिलेगा वेतन?

-जिन लोगों को आपने कथित यूनियन (अपना वेतन मांगना यूनियनबाजी हो गया] के आधार पर नौकरी से हटा दिया, उन्हें भी आज तक पैसा नहीं दिया। क्यों?

-सेफ एक्जिट प्लान के तहत नौकरी छोड़ने वालों, कांट्रेक्ट समाप्त होने वाले कर्मचारियों व जो पहले ही नौकरी से इस्तीफा दे चुके हैं, उन्हें भी आपने अब तक हिसाब नहीं दिया। क्यों?

-महोदय, यदि वेतन संकट को छोड़ भी दिया जाए तो सहारा के अफसर आज भी मौज कर रहे हैं। यदि सहारा के अफसरों की संपत्ति सार्वजनिक करने की बात हो तो पता लगेगा कि सहारा को जितना भुगतान करना है उसका आधा तो अफसरों ने हड़पा है। कर्मचारी तो पहले भी कई साल में इंक्रीमेंट पाते थे और आज तो वेतन के भी लाले हैं। तो आप बताएं सजा कर्मचारियों को ही क्यों?

-महोदय, मैं आपको यह भी याद दिलाना चाहता हूं कि आप सहारा में मात्र एक स्टिंगर ही थे। आपकी लाइजनिंग का कोई जवाब नहीं है। यह आपकी योग्यता है कि आप इतने बड़े पद पर जा पहुंचे। लेकिन उन कर्मचारियों का क्या जो रात तीन बजे तक अखबार छापने का काम करते हैं और बदले में धेला भी नहीं मिल रहा?

-महोदय, आप यह बताने का कष्ट जरूर करें कि आपकी कथनी और करनी में अंतर क्यों है। सब जानते हैं कि आपने निजी स्वार्थ के लिए इतनी बड़ी जिम्मेदारी ली है। इसकी आड़ में आपने महज अपना फायदा सोचा, सहारा का नहीं। यदि सोचा होता तो सहारा मीडिया को और बेहतर बनाते, न कि पतन के रास्ते पर ले जाते।

आपसे विनम्र अनुरोध है कि यदि आपकी अंतरआत्मा आपको जरा भी कचोटती हो तो आप उन कर्मचारियों का दर्द महसूस करें जो सहारा से जुड़े हुए हैं। 

ये तो आप जानते ही होंगे कि मुझे भी अपना वेतन मांगने पर बाहर का रास्ता दिखाया गया.

भवदीय
सुनील परमार
देहरादून
9897593345
sun_parmar@rediffmail.com

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भगत सिंह का अंतिम पत्र

साथियों,

स्वाभाविक है कि जीने की इच्छा मुझमें भी होनी चाहिए, मैं इसे छिपाना नहीं चाहता. लेकिन मैं एक शर्त पर जिंदा रह सकता हूँ, कि मैं क़ैद होकर या पाबंद होकर जीना नहीं चाहता.

मेरा नाम हिंदुस्तानी क्रांति का प्रतीक बन चुका है और क्रांतिकारी दल के आदर्शों और कुर्बानियों ने मुझे बहुत ऊँचा उठा दिया है – इतना ऊँचा कि जीवित रहने की स्थिति में इससे ऊँचा मैं हर्गिज़ नहीं हो सकता.

आज मेरी कमज़ोरियाँ जनता के सामने नहीं हैं. अगर मैं फाँसी से बच गया तो वो ज़ाहिर हो जाएँगी और क्रांति का प्रतीक-चिन्ह मद्धिम पड़ जाएगा या संभवतः मिट ही जाए. लेकिन दिलेराना ढंग से हँसते-हँसते मेरे फाँसी चढ़ने की सूरत में हिंदुस्तानी माताएँ अपने बच्चों के भगत सिंह बनने की आरज़ू किया करेंगी और देश की आज़ादी के लिए कुर्बानी देनेवालों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी कि क्रांति को रोकना साम्राज्यवाद या तमाम शैतानी शक्तियों के बूते की बात नहीं रहेगी.

हाँ, एक विचार आज भी मेरे मन में आता है कि देश और मानवता के लिए जो कुछ करने की हसरतें मेरे दिल में थी, उनका हजारवाँ भाग भी पूरा नहीं कर सका. अगर स्वतंत्र, ज़िंदा रह सकता तब शायद इन्हें पूरा करने का अवसर मिलता और मैं अपनी हसरतें पूरी कर सकता.

इसके सिवाय मेरे मन में कभी कोई लालच फाँसी से बचे रहने का नहीं आया. मुझसे अधिक सौभाग्यशाली कौन होगा? आजकल मुझे ख़ुद पर बहुत गर्व है. अब तो बड़ी बेताबी से अंतिम परीक्षा का इंतज़ार है. कामना है कि यह और नज़दीक हो जाए.

आपका साथी,
भगत सिंह
22 मार्च, 1931

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