अवधेश कुमार-
बीते दिनों IANS में काम करने वाले दो साथियों के फोन आए. आज फिर से कॉल आने के बाद मुझे लगा कि लिखना चाहिए. दोनों ने रोजमर्रा की बातचीत से ज्यादा इस बात पर जोर दिया कि वे किस तरह संस्थान में मानसिक दबाव और शोषण का सामना कर रहे हैं. उनका कहना है कि रिपब्लिक से हाल ही में IANS आए उनके बॉस का व्यवहार बेहद खराब है और वह उन्हें लगातार टॉर्चर कर रहा है.
वे बताते हैं कि इस मानसिक दबाव और ट्रॉमा के चलते कई कर्मचारियों को अस्पताल के चक्कर काटने पड़ रहे हैं. एक कर्मचारी के अस्पताल में भर्ती होने और मेडिकल लीव पर होने की जानकारी ऑफिस में सबको थी. बावजूद इसके अगर कोई खबर छूट गई तो उसे ग्रुप में सुनाया गया कि तुम्हें बीट से हटाया जाता है. तुम्हारा रहना न रहना बराबर है. कंपनी को तुम्हारी जरूरत नहीं है. उसने बताया कि उसकी बीमारी की वजह भी उसके बॉस द्वारा लगातार की जा रही मानसिक प्रताड़ना ही है.
बताते हैं कि IANS में लगातार ANI से तुलना की जाती है. जबकि IANS में स्टाफ ANI की तुलना में काफी कम है, लेकिन उनसे उसी स्तर के काम की उम्मीद की जाती है. 9 घंटे की शिफ्ट के बजाय रोज 12 से 16 घंटे तक काम कराया जाता है. 12-13 घंटे काम करना तो सामान्य बना दिया गया है. शिफ्ट खत्म होने के बाद भी रिपोर्टरों को रोका जाता है. छुट्टी लेने के लिए भी कई बार गिड़गिड़ाना पड़ता है.
उनकी शिकायत सिर्फ अतिरिक्त काम को लेकर नहीं, बल्कि व्यवहार को लेकर भी है. ग्रुप में देशभर के ब्यूरो के पत्रकारों के सामने इस तरह डांटा-फटकारा जाता है कि उन्हें रोज अपमान का घूंट पीकर रहना पड़ता है.
रोज सुनते हैं कि तुम निकम्मे हो, नई नौकरी ढूंढ लो. यह मानसिक दबाव रोज का है और लगातार बढ़ रहा है. फोन रखते समय उसने कहा कि कभी-कभी मन करता है कि आत्महत्या कर लूं. लेकिन फिर परिवार का ख्याल आ जाता है.
रिपब्लिक से IANS आया यह बॉस यहां भी वही कल्चर चाहता है. चीखना-चिल्लाने वाला. कहता है कि तुमसे कोई नेता बात नहीं करता, तुम्हें कोई बाइट नहीं देता. तुम कंपनी पर बोझ हो.
ANI किसी रैंडम व्यक्ति की भी बाइट कर ले, जिससे खबर के लिहाज से बहुत कुछ खास न निकलता हो तब भी IANS के ग्रुप में सवाल किया जाता है कि ANI के पास है, तुम्हारे पास क्यों नहीं है? यानी खबर के महत्व या उस बाइट पर आने वाले व्यूज से ज्यादा सवाल सिर्फ इतना होता है कि ANI ने किया तो तुमने क्यों नहीं?
इनका कहना है कि सुबह जल्दी उठने से लेकर देर रात तक फोन बजता रहता है. 24 घंटे उपलब्ध रहने का दबाव है. रिपोर्टरों के साथ वरिष्ठ अधिकारियों और डेस्क के बीच आए दिन बहस की स्थिति बनती है.
जॉइनिंग से पहले पत्रकारों को बेहतर कार्य परिस्थितियों, दो साप्ताहिक अवकाश और कई दूसरी सुविधाओं का भरोसा दिया जाता है. लेकिन नौकरी शुरू होने के बाद तस्वीर बिल्कुल अलग होती है. यहां तक कि जो एक साप्ताहिक अवकाश मिलता भी है वह भी कई बार नहीं मिल पाता.
IANS में काम कर रहे उन पत्रकारों के लिए दुआ कीजिए. दुआ कीजिए कि जो लोग हर दिन इतने दबाव और मुश्किल हालात के बीच पत्रकारिता कर रहे हैं, उन्हें जल्द ऐसी जगह मिले, जहां उन्हें अपने काम के लिए सम्मान मिले, मानसिक सुकून मिले और बेहतर कार्य-परिस्थितियां.
उन्हें ऐसी नौकरी मिले, जहां सुबह से देर रात तक फोन की घंटी के साथ डर नहीं बल्कि अपने काम को लेकर सुकून हो. जहां पत्रकार को उसकी मेहनत के लिए सम्मान मिले, अपमान नहीं.
दोस्तों, मैं तुम्हारे लिए बस इतना ही कर सकता हूं. इसके अलावा शायद मेरे पास देने के लिए कुछ नहीं. हां, किसी शाम या वीकेंड पर साथ बैठकर चाय जरूर पी जा सकती है. तुम्हें थोड़ा हौसला दे सकता हूं, तुम्हारा दर्द सुन सकता हूं, उसे बांट भी सकता हूं. शुक्रिया.


