यात्रा-वृत्तांत : कैलाश-मानसरोवर, जहाँ पर वैचारिक उथल-पुथल का ज्वार शांत

आधुनिकीकरण के इस दौर में वर्तमान समय तथ्य – आधारित है परंतु यह भी सत्य है कि आस्था और तथ्य दो अलग – अलग बातें हैं. विज्ञान की भाषा में प्रकृति का आधार ऊर्जा है तो आस्था का आधार भाव है. आस्था की धुरी का केन्द्रबिन्दु इस भाव पर टिका है कि प्रकृति में एक सर्वशक्तिमान शक्ति है जो प्रकृति की नियंता है, उसे ही भगवान की संज्ञा दी जाती है. भारतीय चिंतन के अनुसार व्यक्ति जिस भाव से भगवान के प्रति अपनी आस्था प्रकट करता है, उसी अनुरूप उसे भगवान का सान्निध्य मिलता है. 

इसी आस्था के चलते हिन्दुओं की ऐसी मान्यता है कि हिमालय के कैलाश – पर्वत पर साक्षात शिव का विश्राम  है. परिणामत: कैलाश – पर्वत हिन्दुओं का एक प्रमुख तीर्थस्थल है और लगभग प्रत्येक हिन्दू अपने जीवन में एक बार कैलाश – मानसरोवर का दर्शन करना चाहता है. कैलाश – पर्वत सुनते ही हमें बर्फ से ढका हुआ एक अर्ध – गोलाकारनुमा – सा एक पर्वत ध्यान में आता है और उस सफेद बर्फ से ढके पर्वत को ध्यान करते ही मन में एक शांति का अनुभव होता है. ऐसी मानसिक शांति, जहाँ पर वैचारिक उथल – पुथल का ज्वार शांत होता हुआ अनुभूत होता है. साक्षात कैलाश के दर्शन करते समय मैने स्वयं एक चमत्कार का अनुभव किया कि कैलाश के चारों तरफ के पर्वतों की चोटियां संभवत: कैलाश से ऊँची थी परंतु मात्र कैलाश पर्वत ही पूर्णत: बर्फ से ढका हुआ है. भले ही इस चमत्कार के पीछे वैज्ञानिक तर्क कुछ भी हो परंतु भगवान के प्रति मेरी व्यक्तिगत आस्था ही मुझे कैलाश तक खींच कर ले गई थी इसलिए यह आलेख भी आस्था केन्द्रित ही है. अनुभूति को न तो शब्दो में संपूर्ण लिखा जा सकता है और न ही उसकी संपूर्ण व्याख्या की जा सकती है क्योंकि अनुभूति को मात्र अनुभूत किया जाता है. परंतु यहाँ पर मैने अपनी कैलाश – मानसरोव यात्रा के दौरान जैसा देखा उसे संक्षेप में लिपिबद्ध करने का प्रयास किया है.

भारत – चीन के एक समझौते के अनुसार भारत का विदेश मंत्रालय प्रत्येक वर्ष जून – सितम्बर के बीच (संभवत: बर्षा का समय होता है) कैलाश – मानसरोवर यात्रा करवाता है. इस वर्ष 18 बैच (अधिकतम 60 लोगों का एक समूह) लिपुलेक दर्रा (सबसे पुराना मार्ग) से और 5 बैच (अधिकतम 50 लोगों का एक समूह) नाथुला दर्रा (नया मार्ग) से भेजा जा रहा है. कैलाश – मानसरोवर जाने के ईच्छुक भारतीय नागरिकों से प्रत्येक वर्ष भारत का विदेश मंत्रालय आनलाईन आवेदन (संभवत: अप्रैल मास) मंगवाता है और उन आवेदनों का चयन कंप्यूटर द्वारा लाट्री प्रणाली से किया जाता है. तदोपरांत चयनित आवेदकों से एस. टी. डी. सी. (सिक्किम टूरिज्म डेवेलप्मेंट कोर्पोरेशन ट्रैवल डिविजन, नाथुला दर्रा के लिए) / के. एम. वी. एन. लि. के बैंक खाते में 5,000 रूपये (लिपुलेक दर्रा के लिए) का पुष्टि शुल्क (कुमाऊँ मंडल विकास निगम, के.एम.वी.एन. लि.) जमा करवाया जाता है. तत्पश्चात सभी चयनित आवेदनों का समूह बनाकर उनके प्रस्थान की तिथि निर्धारित कर दी जाती है.

सभी चयनित आवेदकों द्वारा पुष्टि – शुल्क जमा करवाने के उपरांत उनके प्रस्थान करने की तिथि से तीन दिन पूर्व ही उन्हें दिल्ली – स्थित गुजराती समाज में आना होता है. गुजराती समाज में कैलाश – मानसरोवर यात्रा पर जाने वाले सभी यात्रियों के लिए आवास और भोजन की व्यवस्था दिल्ली सरकार द्वारा नि:शुल्क किया जाता है. पहले दिन तीर्थयात्रियों का मेडिकल टेस्ट (3,100 रू. शुल्क) दिल्ली के Delhi Heart & Lung Institute (DHLI), पंचकुईयां रोड, नई दिल्ली में होता है. इस मेडिकल टेस्ट में तीर्थयात्रियों का बी.पी., टी.एम.टी, शुगर इत्यादि का निरीक्षण किया जाता है. दूसरे दिन DHLI की रिपोर्ट को दिल्ली के तिगडी में स्थित आई. टी. बी. पी. छावनी में आई. टी. बी. पी. के डाक्टर गहन जाँच करते हैं. साथ ही वहाँ के डाक्टर तीर्थयात्रियों को ऊँचे पर्वत पर होने वाली सामान्य बीमारियों की जानकारी और उनसे बचाव की जानकारी देते है. तीसरे दिन भारत के विदेश मंत्रालय के सक्षम अधिकारी तीर्थयात्रियों को संबोधित करते है. तत्पश्चात प्रत्येक तीर्थयात्री को भारत में परिवहन, आवास, भोजन हेतु शुल्क एस. टी. डी. सी. (20,000 रू. नाथुला दर्रा के लिए) / के. एम. वी. एन. (30,000 रू. लिपुलेक दर्रा के लिए) जमा करवाया जाता है. चूँकि मेरा चयन लिपुलेक दर्रा से यात्रा करने के लिए हुआ था अत: आगे की अब सभी जानकारियाँ लिपुलेक दर्रा से संबंधित ही है. पहले इन तीन दिनों की सभी औपचारिकताएँ पूरी करने के उपरांत प्रात: 6 बजे दिल्ली से कैलाश – मानसरोवर यात्रा के लिए उत्तराखंड परिवहन की वोल्वो बस से जत्थे को रवाना किया जाता है. दोपहर का भोजन काठगोदाम स्थित के. एम. वी. एन. गेस्ट हाऊस में होता है. तत्पश्चात दो छोटी बसों में जत्थे को रवाना किया जाता है. अल्मोडा स्थित के. एम. वी. एन. के गेस्ट हाऊस में सांस्कृतिक कार्यक्रम द्वारा स्वागत और रात्रि भोजन के साथ रात्रि ठहरने की व्यवस्था होती है. अगले दिन प्रात: तडके ही जत्थे को रवाना कर दिया जाता है. रास्ते में गोलूजी महाराज मन्दिर  (ऐसी मान्यता है कि न्याय न मिलने पर लोग अपनी – अपनी लिखित अर्जी यहाँ पर चढाते है, और यहाँ पर असंख्य घंटियाँ बँधी हैं) के दर्शनोपरांत सुबह का नाश्ता करवाया जाता है. के. एम. वी. एन. – डीडीहाट में दोपहर का भोजन होता है और वहीं से आई.टी.बी.पी. – मिर्थी की गाडी जत्थे की बस के आगे चलती हुई आई.टी.बी.पी – मिर्थी की छावनी में ले जाती है जहाँ पर आई.टी.बी.पी के कमांडेंट के नेतृत्व में वहाँ के स्थानीय लोक कलाकारों द्वारा भव्य स्वागत किया जाता है. वहीं पर जत्थे के सभी तीर्थयात्रियों के साथ कमांडेंट की उपस्थिति में एक ग्रुप फोटो खींचा जाता है, तत्पश्चात आई.टी.बी.पी. के द्वारा पुन: ब्रीफिंग की जाती है. उसके बाद जत्थे को रवाना कर दिया जाता है. रास्ते में हनुमान मन्दिर के दर्शंनोपरांत वह जत्था के. एम. वी. एन. – धारचुला पहुँच जाता है. धारचुला में यात्री अधिकारी सभी तीर्थयात्रियों को संबोधित करते हैं. तत्पश्चात वहीं पर रात्रि विश्राम  होता है. के. एम. वी. एन. – धारचुला काली नदी के एक तट पर स्थित है और नदी के दूसरे तट पर नेपाल है. धारचुला से ही सामूहिक रूप से सभी यात्रियों का सामान (अधिकतम 20 किलोग्राम) अलग व्यवस्था से ले जाया जाता है. अगले दिन की प्रात: ही नारायण आश्रम के लिए जत्था रवाना होता है. नारायण आश्रम में भगवान विष्णु का भव्य मन्दिर (नारायण स्वामी द्वारा 1936 में स्थापित) है और यहीं से सभी तीर्थयात्री अपने लिए कुली – खच्चर (पोनी – पोर्टर) किराये पर लेते हैं. नारायण आश्रम से लगभग 6 किमी. का पैदल रास्ता तय कर विभिन्न गावों से होता हुआ जत्था के. एम. वी. एन. – सिरखा पहुँचता है, यहाँ पर रात्रि विश्राम  की व्यवस्था है. अगले दिन की प्रात: तडके ही जत्थे को 16 किमी. के पैदल रास्ते पर रवाना कर दिया जाता है. रास्ते में जंगलचट्टी नामक जगह पर जत्थे को नाश्ता करवाया गया और जत्थे को सायंकाल 4  बजे तक गाला पहुँचने के लिए कहा गया. इस रास्ते में बारिश होने की संभावना अधिक रहती है. गाला में रात्रि विश्राम  के उपरांत अगले दिन बुद्धि पहुँचने के लिए प्रात: तडके ही आई.टी.बी.पी. के 4 जवान जत्थे को लेने के लिए आए. आई.टी.बी.पी के जवान और उत्तराखंड पुलिस के जवान जत्थे का हेड और टेल थे. यह 18 किमी. का पूरा रास्ता काली नदी के साथ – साथ बना है और इसी रास्ते में बहुत पुरानी 4444 सीढीयाँ बनी हैं (अभी भी दिखाई देती है), जिनपर से तीर्थयात्री चलते हैं. इस रास्ते में लखनपुर नामक स्थान पर सुबह का नाश्ता और मालपा में दोपहर का भोजन होता है. सनद रहे कि वर्ष 1998 में मालपा में ही कैलाश – मानसरोवर यात्रा के बैच 12 के सभी तीर्थयात्री प्राकृतिक आपदा का शिकार हुए थे. सायंकाल हम सभी तीर्थयात्री बुद्धि पहुँचे. अगले दिन की प्रात: तडके ही 18 किमी. दूर स्थित गुंजी के लिए रवाना हुए. रास्ते में छियालेख नामक फूलों की घाटी आई और वहीं पर हमारा नाश्ता हुआ. आई.ई.बी.पी – छियालेख द्वारा हमारे पासपोर्ट की जाँच कर हमारा प्रवेश रजिस्टर कर लिया गया. तत्पश्चात बहुत पुराने गाँव गबर्यांग (यहाँ पर अधिकतर घर झुके हुए हैं) होते हुए आई.टी.बी.पी – गबर्यांग पहुँचे जहाँ पर हमारे पासपोर्ट की पुन: जाँच की गई और वहाँ पर भी हमारे प्रवेश को रजिस्टर किया गया. सित्ती में दोपहर का भोजन कर सायंकाल को गुंजी पहुँचे. सनद रहे कि गुंजी से ही आदि कैलाश के दर्शन हेतु रास्ता जाता है. आई.टी.बी.पी. – गुंजी के प्रांगण में बहुत सुन्दर – सा मन्दिर है जहाँ पर आई.टी.बी.पी के सैनिकों द्वारा प्रत्येक सायंकाल को संगीतमय भजन कार्यक्रम होता है. हमे भी उस संगीतमय भजन कार्यक्रम में भाग लेने का सौभाग्य मिला. 

अगले दिन आई.टी.बी.पी. – गुंजी द्वारा DHLI मेडिकल टेस्ट की रिपोर्ट के आधार पर आई.टी.बी.पी. के डाक्टरों द्वारा पुन: मेडिकल टेस्ट होता है. मेडिकल टेस्ट पास करने के उपरांत जत्था अगले दिन की प्रात: तड्के ही नवीढांग़ के लिए रवाना हुआ. 9 किमी. चलने के उपरांत के. एम. वी. एन. – कालापानी द्वारा सुबह का नाश्ता करवाया गया. सनद रहे कि कालापानी ही काली नदी का उद्गम स्थान है और यहाँ पर आई.टी.बी.पी – कालापानी ने एक भव्य मन्दिर बनाया है. कालापानी में ही हमारे पासपोर्ट पर इमीग्रेशन मुहर लगाई जाती है. नियत समय पर 10 किमी. का पैदल रास्ता तय कर हम नवीढांग पहुँचे. मौसम साफ ओने के कारण यहाँ पर ऊँ – पर्वत और नाग पर्वत का भव्य दर्शन हुआ. पर्वत पर “ऊँ” देखकर ऐसा लगने लगा कि प्रकृति की ऐसी अनूठी रचना संभवत: दुनियाँ में कही नही मिलेगी. नवीढांग में रात्रि विश्राम  करने के उपरांत प्रात: 2 बजे रात्रि को ही जत्थे को चलने के लिए कहा गया क्योंकि किसी भी कीमत पर प्रात: 6 बजे लिपुलेक दर्रे को पारकर चीन – क्षेत्र में पहुँचना होता है. नियत समय पर हमने लिपुलेक दर्रे को पार किया. लिपुलेक दर्रे पर ही हमारी मुलाकात 7वें बैच के तीर्थयात्रियों के साथ हुई क्योंकि कैलाश – मानसरोवर की यात्रा कर 7वाँ बैच लिपुलेक दर्रे से भारत वापस आ रहा था और हम कैलाश – मानसरोवर की यात्रा करने हेतु चीन जा रहे थे. 

लिपुलेक दर्रे से चीन की तरफ 3 किमी. उतरने के पश्चात हमे ले जाने के लिए लैंड – क्रूजर नामक छोटी गाडियाँ खडी थी. उन छोटी गाडियों में बैठकर हम लगभग 7 किमी. की यात्रा कर एक स्थान पर पहुँचे जहाँ पर हमारा इंतज़ार चीन की 2 बडी बसें कर रहीं थी. चीन के अधिकारियों द्वारा हमारा पासपोर्ट जमा कर लिया गया. उन बसों में बैठकर हम तकलाकोट पहुँचे. तकलाकोट में चीन के कस्टम अधिकारियों द्वारा हमारी सुरक्षा जाँच की गई. तत्पश्चात ब्रीफिंग हुई और 901 डालर फीस जमा करवाया गया तथा खच्चर – कुली (पोर्टर – पोनी) के लिए अलग से पैसा जमा करवाया गया. एक दिन हमें तकलाकोट में रखा गया. उसके पश्चात हमे दार्चिन ले जाया गया. रास्ते में राक्षसताल का दर्शन करवाया गया. दार्चिन में हमें रात्रि विश्राम  करवाया गया. उसके अगले दिन प्रात: हमें कैलाश की परिक्रमा हेतु यमद्वार ले जाया गया. यमद्वार से हमारी परिक्रमा शुरू हुई. पहले दिन यमद्वार से 9 किमी. पैदल चलने के उपरांत डेरापुक में रात्रि विश्राम  के लिए रोका गया. 

सनद रहे कि डेरापुक नामक स्थान “चरण – स्पर्श” की तलहटी में ही स्थित है. अगले दिन की प्रात: 2 बजे ही जत्थे को कैलाश की परिक्रमा करने के लिए चलाया गया. प्रात: 7 बजे तक 12 किमी. पैदल यात्रा करने के उपरांत हम सभी डोलमा पास (सर्वाधिक ऊँचाई) पहुँच गए. रास्ते में सुनहरा कैलाश (प्रात: सूर्य की किरणों से अल्पकाल के लिए कैलाश सुनहरा हो जाता है) का दर्शन हुआ. डोलमा पास पर “गौरीकुंड” नामक स्थान है, यहाँ से लोग जल भरते हैं. सनद रहे कि गौरीकुंड तक जाने का रास्ता बहुत तंग, संकरा और खतरनाक है. रास्ते में बौद्ध मत को मानने वाले लोग घडी की सुई की उल्टी दिशा में कैलाश की परिक्रमा करते हुए मिले. डोलमा पास से 12 किमी. की पैदल यात्रा कर जुनझुई पु पहुँचे और वहाँ पर रात्रि विश्राम किया. अगले दिन की प्रात: 9 किमी. पैदल चलकर कुगु ले जाने के लिए खडी बस तक पहुँचे. इस प्रकार हमारी सकुशल कैलाश की परिक्रमा पूरी हुई और हमलोग मानसरोवर के तट पर स्थित कुगू गेस्ट हाऊस में पहुँचे. यहाँ हम दो रात रूके. दिन में मानस में स्नान करने से पूर्व मानस के तट पर फैले कूडा – करकट को साफकर स्नान किया. तत्पश्चात मानस के तट पर पूजन – हवन किया. 

प्रात:काल 3 से 5 बजे के बीच मानस में हो रहे चमत्कार को हमने अनुभूत किया. उसके बाद अगले दिन हम तकलाकोट के लिए रवाना हुए. रास्ते में एक ऐसी जगह आई जहाँ से चारों पवित्र तीर्थस्थलों का दर्शन (कैलाश, मानसरोवर, राक्षसताल और सप्तऋषि) एक साथ होता है. वीर जोरावर सिंह की समाधि और राम मन्दिर का दर्शन करते हुए हम तकलाकोट पहुँचे. तकलाकोट में एक दिन रूकने के पश्चात अगले दिन की प्रात: 3 बजे लिपुलेक दर्रे के लिए रवाना हुए. नियत समय पर लिपुलेक दर्रा पार्कर भारत पहुँच गए. रास्ते में कैलाश मानसरोवर यात्रा पर जाते हुए 11वें बैच के यात्रियों को शुभकामना देते हुए हम भारत पहुँच गए. भारत में हमे नाविढांग़, कालापानी होते हुए सीधा गुंजी में रात्रि विश्राम करवाया गया. अगले दिन की प्रात: गुंजी से बुद्धि ले जाया गया और बुद्धि में रात्रि विश्राम की व्यवस्था थी. अगले दिन की प्रात: बुद्धि से से सीधा के.एम.वी.एन. – धारचुला ले जाया गया और वहाँ रात्रि विश्राम करवाया गया. अगले दिन के.एम.वी.एन. – पिथौरागढ में रात्रि विश्राम करवाया गया. तत्पश्चात अगले दिन जागेश्वर धाम ले जाया गया और वहाँ पर हमारे रात्रि विश्राम की व्यवस्था थी. 

अगले दिन प्रात: हमलोग के.एम.वी.एन. – काठगोदाम के लिए रवाना हुए. के.एम.वी.एन. – काठगोदाम में दोपहर का भोजन करवाकर उत्तराखंड परिवहन की वोल्वो बस से दिल्ली के लिए रवाना हुए. उसी दिन की सायंकाल 6 बजे हम दिल्ली गुजराती समाज पहुँचे. यहाँ पर हमें विदेश मंत्रालय का सर्टिफिकेट दिया गया. इससे पूर्व तकलाकोट में चीन सरकार का सार्टिफिकेट, भारत में आई.टी.बी.पी. – मिर्थी, के.एम.वी.एन. का सार्टिफिकेट भी दिया गया था. इस सारी यात्रा में मुझे दो व्यक्तिगत अनुभव हुए – कैलाश मानसरोवर की यात्रा से खच्चर – कुलियों के साथ – साथ चीन सरकार को आर्थिक लाभ होता है, व्यक्ति की व्यक्तिगत आस्था के अनुरूप उसे भगवान का सान्निध्य मिलता है. हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि कैलाश – मानसरोवर सांस्कृतिक भारत का अभिन्न अंग है अत: प्रत्येक व्यक्ति को भारतीय सांस्कृतिक एकता हेतु अपने जीवन काल में एक बार कैलाश – मानसरोवर का दर्शन अवश्य करना चाहिए.

लेखक राजीव गुप्ता से संपर्क : 9811558925   

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Comments on “यात्रा-वृत्तांत : कैलाश-मानसरोवर, जहाँ पर वैचारिक उथल-पुथल का ज्वार शांत

  • Kashinath Matale says:

    Dear, Rajiv Gupta ji Dandvat/Pranam,
    Aapne Kailash Manas Sarovar Yatra ka varnan is prakar kiya ki sakshat hame bhi Akhoke samne manas sarovar dikhneka ahsas hua.
    Aap khush nashib ho, ki aapki yatra saphal hui aur aapne aapka anubhav aur anubhuti prastut ki.
    Aaj ke modern yug me ionternet me bhi jankari milti hai, parntu anubhuti ka ahsas aapke yatra varnan se hua hai.

    Aapko dhanyawad!

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