देख लीजिए, कैसे-कैसे लोग पत्रकारिता में आकर संपादक बन गए…

Shambhunath Shukla : हमारे एक परिचित पत्रकार थे। पहले चाकूबाज़ के रूप में उनकी प्रतिष्ठा हुआ करती थी फिर एक संपादक की नज़र उन पर पड़ी वे पर पड़ी। उस समय वे किसी को चाकू मार कर भाग रहे थे। संपादक ने पकड़ लिया बोले बेटा मेरे साथ काम कर, चाकू भी चला और कलम भी। पुलिस तुझे छू नहीं सकती। चाकूबाज़ मान गया। फिर एक मालिक ने उसकी काबिलियत को पहचाना और एक ऐसे राज्य में उसे रेजीडेन्ट संपादक बना दिया जहाँ का मुख्यमंत्री घोटालेबाज़ जोकर था।

कलकत्ता में वे पत्रकार महोदय मुझसे मिलने आए। मैंने उन्हें बधाई दी कि उन्होंने अपनी मेहनत से अपना अख़बार चमका दिया। उनका जवाब था कि अख़बार उनकी मेहनत से नहीं लाल लंगोट वाले की कृपा से चमका। मैं समझा नहीं तो वे बोले दरअसल वे भी उसी लाल लंगोट वाले के भक्त हैं और वह जोकर सीएम भी। बस ट्यूनिंग बन गई। उसने मेरा अख़बार चमकाया और मैंने उस जोकर की छवि। ऐसे पत्रकारों और लाल लंगोट वाले को नमन तो करना ही चाहिए।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल की उक्त एफबी पोस्ट पर उत्तर प्रदेश शासन के पूर्व सहायक निदेशक सूचना अशोक कुमार शर्मा की टिप्पणी इस प्रकार है : 

देश में इसी तरह के कई लोग बड़े पत्रकार बने। एक सज्जन मुजफ्फरनगर में गुंडागर्दी किया करते थे बड़े हाहाकारी संपादक बन गए। एक सज्जन मेरठ में सट्टे का कारोबार करते थे बड़े संपादक बन गए। बनारस के एक खलीफा मफलर पहनकर लोगों के रुके हुए काम कराने की सुपारी लेते थे। एक और सज्जन टेंपो चलाया करते थे और उन्हें हिंदी उर्दू का कोई ज्ञान नहीं था वह भी कई अखबार निकालने लगे। एक प्रसिद्ध राजनेता के दोस्त बन गए। एक बड़े अंग्रेज़ी अखबार के दफ्तर के मुख्य द्वार पर सरे आम लंच के वक्त एक मुस्लिम पत्रकार को चाकू घोंपकर मार देने वाले एक साधारण गुंडे ने ब्लैकमेलिंग के लिए मशहूर दो अखबार चलाये और कई पुलिस उच्चाधिकारियों को सम्मानित किया। एक आकर्षक युवक पत्रकार लखनऊ में एक बड़े पत्रकार की मालिश किया करते थे। मौका मिला और खुद भी एक बड़े अखबार के सर्वेश्वर बन गए। जहां तक इन लोगों के उत्थान की बात है फ़क़त मालिकों की कृपा से नहीं बने। अखबारी मालिक की कृपा से कभी कोई टिकाऊ तरक्की नहीं होती सिर्फ ब्रेक मिला करते हैं। मैं अनगिनत पत्रकार गिना सकता हूं। होटल या ढाबा चलाते थे। ड्राई क्लीनिंग किया करते थे। सूनी सड़कों पर रिक्शे तांगे लूटते थे। उठाईगिरी किया करते थे। कालांतर में पत्रकारिता में खलीफा बने। कहीं ना कहीं उन सभी में वह कला मौजूद थी जो पत्रकारिता में कामयाबी दिलाती है। आज की विज्ञापन, कमीशन और दलालीमयी अखबारनवीसी ख़ास जीवट का काम है। इसमें जीदार लोग ही कामयाब हुआ करते हैं। बहुत रोचक बात यह है ना केवल उन सभी लोगों की पत्रकारिता पर भी उनके पुराने धंधों की छाप नजर आती थी। मगर उनसे पत्रकारिता के कई मौजूदा खलीफाओं ने कार्यशैली में गुंडागर्दी, वेश्यावृत्ति, जिस्मफरोशी, उठाईगिरी और मालिशबाजी की कला सीखी है।

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