टीवी के एक संपादक ने कायम किया इतिहास, लाइव प्रसारण के दौरान नेताओं के पैर छुए, देखें वीडियो

जी बिहार के संपादक स्वयं प्रकाश : पत्रकारिता के पतित पुरुष

जी ग्रुप के रीजनल न्यूज चैनल ‘जी बिहार’ के संपादक हैं स्वयं प्रकाश. इन्होंने हाल में ही चैनल के संपादक पद को सुशोभित किया है. इन्होंने पिछले दिनों अपने रीजनल चैनल द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम के लाइव प्रसारण में बिहार के सीएम नीतीश कुमार और डिप्टी सीएम सुशील मोदी का पैर छूकर आशीर्वाद लिया.

Know How a Senior Editor is being FORCED to Leave RSTV

Rajya Sabha TV- Deceit, Deception, Dishonesty, Anything but Parliamentary

Rajya Sabha: How to SET Editor-in-Chief selection

The story of war for control at Rajya Sabha TV (RSTV) could make the most intriguing episode of Game of Thrones a run for TRPs. The channel has been in controversy for years now. There have been incessant allegations of misuse of public money, nepotism, corrupt practices in RSTV. There have been reports of CAG objections. Leading media organizations like DNA, Tehelka wrote articles alleging splurging of Rs 1700 crores. It another matter that both the organizations tendered apology for factually incorrect reporting to the Privileges Committee of Rajya Sabha, when nearly all political parties in the House, except BJP, collectively moved privilege motion against wrong reporting.

देखते ही देखते टेलीविजन से मठाधीश संपादकों की एक पूरी पीढ़ी आउट हो गयी…

Yashwant Singh : देखते ही देखते टेलीविजन से मठाधीश संपादकों की एक पूरी पीढ़ी आउट हो गयी… अजित अंजुम, विनोद कापड़ी, आशुतोष, शैलेश, नक़वी, एनके सिंह, सतीश के सिंह, शाज़ी ज़मां, राहुल देव… जोड़ते-गिनते जाइए। इनमें से कुछ का कभी ये जलवा था कि दूसरों का करियर बर्बाद आबाद करने की सुपारी लिया दिया करते थे। आज खुद बेआबरू हुए बैठे हैं। समय बड़ा बेरहम होता है भाआआई….

भड़ास संपादक यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

अमर उजाला के संपादक के खिलाफ बुलंदशहर में एफआईआर दर्ज

बुलंदशहर नगर कोतवाली में अमर उजाला के संपादक के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई है। सिंचाई विभाग के अवर अभियंता की तहरीर पर जिला प्रशासन की तरफ से यह एफआईआर दर्ज कराई गई। संपादक के खिलाफ आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन करने पर यह एफआईआर दर्ज कराई गई है।

छुट्टी मांगने पर उस हृदयहीन संपादक ने कहा- ‘किसी के मरने जीने से मुझे कोई मतलब नहीं है’

Jaleshwar Upadhyay : निष्ठुर प्रबंधन और बेशर्म संपादकों के कारण एचटी बिल्डिंग के सामने धरनारत कर्मचारी की मौत पर मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ। मैंने अपनी जिंदगी में ऐसे बेगैरत और हृदयहीन संपादक देखे हैं कि नाम याद कर घिन आती है। नाम नहीं लूंगा, लेकिन जब मेरी पत्नी मृत्युशैया पर थीं तो मैंने अपने संपादक से छुट्टी मांगी।

हिंदुस्तान वाराणसी के ‘हत्यारा संपादक’ ने एक और जान ली!

दोस्तों,

मैं जो कहने जा रहा हूं, वह कु्द्द लोगों को नागवार लग सकता है। लेकिन यह सत्य है कि हिन्दुस्तान वाराणसी में स्थानीय सम्पादक की प्रताड़ना ने एक और पत्रकार साथी की जान लेने में अहम भूमिका निभाई। कोई शक नहीं कि मंसूर माई अस्वस्थ चल रहे थे, फिर भी यथासम्भव काम कर रहे थे।

संपादक पर ठगी के विज्ञापन का दायित्व क्यों न हो?

Vishnu Rajgadia : संपादक पर ठगी के विज्ञापन का दायित्व क्यों न हो? किसी राज्य में भूख से किसी एक इंसान की मौत होने पर राज्य के मुख्य सचिव को जवाबदेह माना गया है। जबकि मुख्य सचिव का इसमें कोई प्रत्यक्ष दोष नहीं। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने सीधे मुख्य सचिव पर दायित्व सौंपा है ताकि राज्य की मशीनरी दुरुस्त रहे।

मेरठ से छपने वाले बड़े अखबारों के संपादकों में आपस में डील क्या हुई थी, उन्हें बताना पड़ेगा

Yashwant Singh : कल एक फोटो जर्नलिस्ट का फोन मेरठ से आया. वो बोले- भाई साहब, प्रिंट मीडिया के संपादकों ने मीडिया की इज्जत बेच खाई है, आप ही कुछ करो. मैं थोड़ा चकित हुआ. पूरा मामला जब उनने बताया तो सच कहूं, मैं खुद शर्म से गड़ गया. मेरठ में हिंदुस्तान अखबार के फोटोग्राफर को ड्यूटी करने के दौरान पुलिस वालों ने पकड़कर हवालात में बंद कर दिया, फर्जी मुकदमें लिख दिए. लेकिन एक लाइन खबर न तो हिंदुस्तान अखबार में छपी और न ही दूसरे स्थानीय अखबारों में.

देख लीजिए, कैसे-कैसे लोग पत्रकारिता में आकर संपादक बन गए…

Shambhunath Shukla : हमारे एक परिचित पत्रकार थे। पहले चाकूबाज़ के रूप में उनकी प्रतिष्ठा हुआ करती थी फिर एक संपादक की नज़र उन पर पड़ी वे पर पड़ी। उस समय वे किसी को चाकू मार कर भाग रहे थे। संपादक ने पकड़ लिया बोले बेटा मेरे साथ काम कर, चाकू भी चला और कलम भी। पुलिस तुझे छू नहीं सकती। चाकूबाज़ मान गया। फिर एक मालिक ने उसकी काबिलियत को पहचाना और एक ऐसे राज्य में उसे रेजीडेन्ट संपादक बना दिया जहाँ का मुख्यमंत्री घोटालेबाज़ जोकर था।

शोभा की वस्तु बना संपादक

“आने वाले वर्षों में अखबार बहुत सुंदर होंगे, लेटेस्ट कवरेज होगी, अच्छी छपाई होगी, पर किसी संपादक की हिम्मत नहीं होगी कि वह मालिक की आंख में आंख मिलाकर बात कर सके”।

-बाबूराव विष्णुराव पराड़कर
संपादक हिंदी दैनिक आज
(एक कार्यक्रम के दौरान उनका वक्तव्य)

इन संपादकों की वजह से जाने कितने मीडियाकर्मियों के घर बर्बाद हो रहे हैं

भड़ुआगिरी करनी है तो अखबार में नहीं कोठे पर करो… : मजीठिया मांगने पर अभी तक दैनिक जागरण व राष्ट्रीय सहारा में बर्खास्तगी का खेल चल रहा था अब यह खेल हिन्दुस्तान में शुरू हो गया है। इस खेल में मालिकों से ज्यादा भूमिका निभा रहे हैं वे संपादक जो बड़ी-बड़ी बातें करते हैं और लिखते हैं। कमजोरों की लड़ाई लड़ने का दावा करने वाले ये लोग कितने गिरे हुए हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिन कनिष्ठों के बल पर इन लोगों न केवल मोटी कमाई की बल्कि नाम भी रोशन किया अब ये लोग न केवल उनका उत्पीड़न कर रहे हैं बल्कि नौकरी तक से भी निकाल दे रहे हैं। किसके लिए ? मालिकों का मुनाफा व इनकी दलाली कम न हो जाए। आपके कनिष्ठों के बच्चे भले ही भूखे मर जाएं पर आप और आपके मालिकों की अय्याशी में कोई कमी नहीं होनी चाहिए। मीडिया की हालत देखकर मुझे बहुत तल्ख टिप्पणी करनी पड़ रही है।  मजबूर हूं। अरे यदि भड़ु्रआगिरी ही करनी है तो किसी वैश्या के कोठे पर जाकर करो। कम से कम मुहर तो लगी रहेगी।

लीजिए, तैयार हो गया ‘संपादक चालीसा’ …मीडिया में श्योर शाट सफलता की कुंजी

हिंदी मीडिया में कुछ साल काम करने के बाद मैंने अनुभव के आधार पर हनुमान चालीसा की तर्ज पर यह संपादक चालीसा लिखी है… इसके नियमित वाचन से वे कनफ्यूज लोग जो नहीं समझ पाते कि आखिर उनका दोष क्या है, सफलता के पथ पर निश्चित ही अग्रसर हो सकेंगे… यह संपादक चालीसा मीडिया में श्योर शाट सफलता की कुंजी है इसलिए इसका रोजाना वाचन और तदनुसार पालन अनिवार्य है… आइए इस रचना के पाठ के पहले सामूहिक रूप से कहें- आदरणीय श्री संपादक महाराज की जय….

पढ़िए टीवी चैनलों के संपादकों ने राजनाथ सिंह को जो ज्ञापन सौंपा, उसमें क्या लिखा है….

Press Release

BEA Delegation Meets Home Minister Over Manhandling of Journalists

New Delhi : Delegation of Editors of TV channels met the Home Minister Rajnath Singh and gave this memorandum.Those present included: Ms. Barkha Dutt, Ms. Sonia Singh, Mr. NK Singh, Mr. Shazi Zaman, Mr. Dibang, Mr. Vinay Tewari, Mr. QW Naqvi, Ms. Navika Kumar, Mr. Deepak Chaurasia, Mr. Satish K Singh, Mr. Supriya Prasad and Mr. Sanjay Bragta.

संपादक नाम के प्राणी…. आखिर तुम कहां खो गए हो!

एक जमाना था जब किसी भी अख़बार या पत्रिका की पहचान उसके संपादक के नाम से होती थीl  धर्मवीर भारती धर्मयुग की पहचान थे तो साप्ताहिक हिंदुस्तान यानी श्याम मनोहर जोशी थेl सारिका कमलेश्वर के नाम से जानी जाती थी तो दिनमान की पहचान रघुवीर सहाय के नाम से होती थीl यही हाल अखबारों का था। इंडियन एक्सप्रेस को अरुण शौरी के नाम से पहचान मिलती थी तो टाइम्स ऑफ़ इंडिया में दुआ साहब ही सब कुछ थेl बहुत पहले बंद हो गई इलस्ट्रेटेड वीकली का तो वजूद ही खुशवंत सिंह के नाम पर थाl पराग के संपादक कन्हैया लाल नंदन थे तो कादम्बिनी राजेन्द्र अवस्थी के नाम से जानी और पहचानी जाती थीl किसी अखबार या पत्रिका के मालिक को कोई जाने या न जाने पर उसके संपादक की पहचान किसी की मोहताज नहीं थीl उस ज़माने में मालिक संपादक से बात करने में भी हिचकिचाते थे, उनके काम में दखलंदाजी की बात तो दूर की बात हैl

उम्रदराजी की छूट अगर नीलाभ को मिली तो वागीश सिंह को क्यों नहीं?

Amitesh Kumar : हिंदी का लेखक रचना में सवाल पूछता है, क्रांति करता है, प्रतिरोध करता है..वगैरह वगैरह..रचना के बाहर इस तरह की हर पहल की उम्मीद वह दूसरे से करता है. लेखक यदि एक जटिल कीमिया वाला जीव है तो उसका एक विस्तृत और प्रश्नवाचक आत्म भी होगा. होता होगा, लेकिन हिंदी के लेखक की नहीं इसलिये वह अपनी पर चुप्पी लगा जाता है. लेकिन सवाल फिर भी मौजूद रहते हैं.

ज़ी मीडिया के अंग्रेजी चैनल के मुख्य संपादक बने रोहित गाँधी

ज़ी मीडिया कॉर्पोरेशन लिमिटेड ने घोषणा की है कि वह अंग्रेजी न्यूज़ ब्रॉडकास्टिंग के क्षेत्र में भी प्रवेश करेगा। रोहित गाँधी अंग्रेजी न्यूज़ ब्रॉडकॉस्टिंग व इससे जुड़े कार्यक्रमों के प्रमुख संपादक होंगे। रोहित गाँधी बिज़नेस हेड व रेवन्यू रिसोर्सेस के साथ कार्य करते हुए, इससे जुड़ी सभी गतिविधियों की जिम्मेदारी वहन करेंगे और पुनीत गोयनका …

धनबाद प्रभात खबर के स्थानीय संपादक को पितृशोक

प्रभात खबर के स्थानीय संपादक अनुराग कश्यप के पिता अशोक कुमार सिंह (65) का शनिवार को हृदय गति रुकने से निधन हो गया. बेचैनी की शिकायत के बाद परिजन उन्हें डॉक्टर के पास ले जा रहे थे. इसी क्रम में धनबाद के गया पुल के समीप उनकी तबीयत बिगड़ गयी और निधन हो गया. 

वाराणसी सहारा के संपादक को गुस्साए कर्मियों ने घंटों उनके केबिन में घेरा, जमकर नोकझोक

वाराणसी राष्ट्रीय सहारा के संपादक स्नेह रंजन के उत्पीड़न से आजिज आये संपादकीय विभाग के कर्मचारियों का गुस्सा आखिरकार फूट ही पड़ा। आक्रोशित कर्मचारियों ने घंटों संपादक को उनके ही केबिन में घेरे रखा। इस दौरान दोनों पक्षों में जमकर नोकझोक हुई। गनीमत यह रही की मारपीट नहीं हुई। कर्मचारियों ने पूरे मामले की जानकारी मीडिया हेड राजेश सिंह को दे दी है । 

राजस्थान पत्रिका लखनऊ के संपादक बने महेंद्र सिंह

राजस्थान पत्रिका रायपुर (छत्तीसगढ़) के संपादक महेंद्र प्रताप सिंह का तबादला यूपी में हो गया है। उनको लखनऊ का संपादक बनाया गया है।

न्यायालय का चाबुक चला न संपादकजी! तो आप भी ‘त्राहिमाम’ करते नजर आएंगे

प्रदेश में नंबर वन का दावा करने वाले अखबार के पहले कॉलम में छपे एक लेख का शीर्षक है- त्राहिमाम् ! लेख में पत्रकारिता के स्वयंभू पुरोधा कहलाने वाले इन महोदय ने जिस प्रकार से सरकार और सरकारी कर्मचारियों पर तंज कसे हैं, काबिले तारीफ है। 

सम्पादकजी क्या वाकई इतनी महिलाओं के साथ सोए भी होंगे या सिर्फ बहबही में झूठ बोले!

परसों पूरे देश में राष्ट्रीय शोक था। संयोग से परसों ही साहित्य के राष्ट्रीय धरोहर नामवर सिंह जी का जन्मदिन भी था। राजकमल प्रकाशन द्वारा इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में डॉ नामवर सिंह के जन्मदिन को डॉ कलाम के शोक से बड़ा साबित करते हुए एक रंगीन और तरल-गरल पार्टी रख दिया गया। कई पहुंचे, क्या पत्रकार एवं क्या साहित्यकार। शायद नामवर जी नहीं पहुंचे या पहुंचे भी हों तो थोड़े समय के लिए ही पहुचे हों। 

संपादक ने ना ढूंढा तिन पाइयां, इंटरव्यू में रिपोर्टर फेल

बहुत सोचा कि इस पोस्ट को लिखूं या न लिखूं। पर दिल नहीं माना, शेयर करता हूं। वाकया हमारे एक पत्रकार मित्र से जुड़ा है। इंटरव्यू देने गए थे, एक नामचीन संस्था में। एक नामी गिरामी संपादक ने इंटरव्यू लिया। भाई रिजेक्ट हो गए। वजह उनमें वह बात नहीं थी जो संपादक ढूढ़ रहे थे। अब वह संपादक तलाश क्या रहे थे सुनिए, इधर उधर के सवालों के बाद मुख्य सवाल-राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय एक ब़ड़े नेता के संदर्भ में –

भोपाल हरिभूमि के संपादक बने प्रमोद भारद्वाज

भोपाल : शाम के लीडिंग अग्निबाण समाचार पत्र समूह में इंदौर के संपादक प्रमोद भारद्वाज ने चार साल की लंबी पारी के बाद इस्तीफा दे दिया है। वे चार महीने पहले ही पूरे ग्रुप की कमान संभालने के लिए भोपाल से इंदौर कॉरपोरेट आफिस भेजे गए थे। पर उनका मन नहीं रमा। वे सुबह के अखबार में वापसी चाहते थे। अग्निबाण को उन्होंने ही भोपाल में एक ब्रांड के रूप में स्थापित किया था।

भास्कर के बूढ़े एडिटर अपने इंतजाम में व्यस्त, रिपोर्टर मस्त, काम-काज ध्वस्त

दैनिक भास्कर के अजमेर संस्करण में पिछले कई महीनों से पत्रकारों की मौज हो रही है। इसका कारण बुजुर्ग संपादक रमेश अग्रवाल का दूसरे कामों में व्यस्त होना है। संपादक अग्रवाल ऐसे तो करीब दो साल पहले ही रिटायर हो चुके हैं, मगर वो अब एक्सटेंशन पर हैं। 

 

‘दबंग दुनिया’ के संपादक ने आपरेटरों को दी गालियां, कार्य बहिष्कार, मानहानि का दावा करेंगे

भोपाल : दबंग दुनिया भोपाल के संपादक विजय शुक्ला जब से आए हैं कर्मचाारियों को लगातार परेशान कर रहे हैं। उनकी इस हरकत से कई लोग पहले ही छोड़कर जा चुके हैं। आज तो हद हो गई। विजय शुक्ला ने अचानक किसी बात पर आपरेटरों के साथ बदतमीजी पूर्ण व्यवहार कर दिया। गालियां भी दीं।

जिसने ‘जनसंदेश’ की धज्जियां उड़ाईं, आज वही संपादक

सतना (मप्र) : जनसंदेश जब बाजार में आया तो उन दिनों सतना में ये कहा जाता था कि ये दिल्ली का अखबार हैं. उसके पीछे का कारण बताया जाता था कि पेपर के संपादक और पूरी टीम बाहर की है. 16 नंबर पेज को लेकर बवाल होता था. जिसे लोकल करने की मांग होती थी. जैसा वहां के पेपरों का 16 नंबर पेज लोकल था. जनसंदेश में काम करने वाले रिपोर्टर दिमाग कहीं और से लेते थे. पेपर को डुबाने की पूरी तैयारी थी . या मालिकों तक यह संदेश जाये कि बाहर की टीम बेकार है, काम नहीं कर पा रही है. 

अमर उजाला के संपादक तो धीरज को देखने तक नहीं गए, जगदंबिका पाल बने मुसीबत में मददगार

अमर उजाला के पत्रकार धीरज पांडेय तो इस दुनिया से चले गए लेकिन उनके जाने का दर्द बहुतो से बर्दाश्त नहीं हो रहा। सबसे दुखद रहा अमर उजाला के गोरखपुर संपादक प्रभात सिंह और न्यूज एडिटर मृगांक सिंह का अमानवीय रवैया। धीरज इतने दिन से अस्पताल में मृत्यु से जूझ रहे थे, ये दोनो शख्स उन्हें देखने तक नहीं पहुंचे। उनके इलाज पर घर वालों के लगभग तीन लाख रुपए खर्च हो गए। 

‘दबंग दुनिया’ में संपादक की कुर्सी संभालते ही पत्रकारों की नौकरी से खेलने लगे विजय शुक्ला

भोपाल : एजेंट से संपादक बने विजय शुक्ला इस समय भोपाल के ‘दबंग दुनिया’ अखबार में संपादक बन गए हैं। संपादक बनने के बाद से ही वह वर्षों से काम कर रहे पत्रकारों को परेशान करने लगे हैं। उनके कारण संस्थान से कई लोग बाहर जा चुके हैं। बाहर जाने वालों में प्रशासनिक संवाददाता राजेंद्र वर्मा, विजेंद्र उपाध्याय, मनोहर पाल, सकुर्लेशन हेड प्रवीण शर्मा, अजय द्विवेदी, आरबी सिंह आदि हैं। अमित देशमुख, जो शुरूआत से काम कर रहे हैं, उन्होंने किसी तरीके से अपना ट्रांसफर दिल्ली कराकर अपनी नौकरी बचाई है। 

संपादक का तुगलकी फरमान, खबरदार जो कुर्ता-पायजामा पहन कर कार्यालय आया

हिन्दुस्तान मेरठ अपने तुगलकी फरमानों के कारण फिर चर्चा में है। इस बार वरिष्ठ स्थानीय संपादक अनिल भास्कर ने पत्रकारों को कुर्ता-पायजामा और चप्पल-सैंडल पहनकर कार्यालय नहीं आने का फरमान सुना दिया है। इसके लिए बाकायदा सभी को ईमेल भेजकर सूचित किया गया है कि आफिस में केवल जूते पहनकर ही आए। ऐसा नहीं करने पर आफिस में नहीं घुसने दिया जाएगा।