रंगनाथ सिंह-

मैं इस मसले पर लिखना नहीं चाहता था क्योंकि पोलिटिकल पोलराइजेशन की गर्म हवा में ऐसे मसलों पर लिखना, अपने बरामदे में बबूल बोने जैसा है, लेकिन पिछली पोस्ट पर एक सज्जन से वादा किया था इसलिए लिख रहा हूँ। यह जरूर है कि कमेंट बॉक्स में कोई सवाल जवाब नहीं करूँगा। जिसे पसन्द आए ठीक, न पसन्द आए तो ठीक।
करण थापर और प्रशांत किशोर के बीच हिमाचल चुनाव के पूर्वानुमान को लेकर तूतू-मैंमैं हो गयी। थापर ने अपने पक्ष में किशोर का मई 2022 एक ट्वीट दिखाया। इसी ट्वीट के आधार पर बनी कुछ खबरों के स्क्रीनशॉट भी दिखाए। यानी रेफरेंस के तौर पर कुल जमा यही एक ट्वीट था। करण थापर ने इस एक ट्वीट का हवाला दिया लेकिन उन्होंने सवाल पूछते हुए हिमाचल बोला लेकिन गुजरात का नाम ड्राप कर दिया क्योंकि गुजरात में वही हुआ था, जिसका अनुमान प्रशांत किशोर ने व्यक्त किया था।
हिमाचल में क्या हुआ था? कांग्रेस भाजपा से मात्र 0.90 प्रतिशत ज्यादा वोट पाकर सरकार बनाने में सफल रही! रोचक यह है कि भाजपा के वोट प्रतिशत में 5.79 की कमी आयी थी लेकिन कांग्रेस के वोट प्रतिशत में केवल 2.22 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई और वह 0.90 प्रतिशत अधिक वोट पाकर विजयी बनी। किसी नतीजे पर पहुंचने से पहले यह भी याद रखें कि यह ट्वीट उदयपुर चिंतन शिविर के सन्दर्भ में किया गया था और हिमाचल और गुजरात चुनाव इस ट्वीट के छह महीने बाद हुए थे। छह महीना अच्छा खासा वक्त है। इतने वक्त बाद भी कांग्रेस गुजरात में खुद को शर्मनाक हार से नहीं बचा सकी और हिमाचल में बाल बराबर अंतर से जान बचाने में कामयाब रही।
इसके उलट योगेंद्र यादव जैसों को याद कीजिए जो चुनाव परिणाम आने से चंद रोज पहले 2019 में अपनी दुश्मन पार्टी को 180 सीटें दे रहे थे, 2022 में यूपी में सूपड़ा साफ करा रहे थे। यादव जी प्रोफेशनल सेफोलॉजिस्ट रहे हैं। लगभग सभी नेता चुनाव से पहले बड़े-बड़े दावे करते हैं। गोयनका और टोयनका पुरस्कार प्राप्त पत्रकार भी अपने-अपने निजी अनुमान शेयर करते रहे हैं। क्या आपको याद है कि ऐसे किसी अनुभवी पत्रकार या सेफोलॉजिस्ट को दो-चार साल पुराने चुनावी अनुमान के लिए इस तरह ऑन-कैमरा ग्रिल किया गया हो! यहाँ तो कोई ग्राउंड रिपोर्ट, सर्वे या विश्लेषण भी नहीं था। केवल एक कंडीशनल ट्वीट किया गया था, वह भी चुनाव होने से छह महीने पहले!
न जाने क्यों, प्रशांत किशोर सवाल को ठीक से सुने-समझे बिना ईगो ट्रैक पर चले गये। वो अड़ गये कि उन्होंने ऐसा बयान नहीं दिया था। जाहिर है कि उनका आशय सीधे तौर पर मीडिया को दिये बयान से था। करण थापर ने मिसकोट करते हुए कहा कि ये बयान मीडिया में रिपोर्ट हुआ था। जिसे थापर खबर बता रहे थे, वह उसी एक कंडीशनल और सिचुएशनल ट्वीट की मीडिया कवरेज के स्क्रीनशॉट थे, न कि डायरेक्ट मीडिया को दिए किसी बयान की रिपोर्ट। थापर ने खुद अपनी रिसर्च नहीं की होगी इसलिए वह भी बिना समझे यह कह गये कि जरूरी नहीं कि आपने वीडियो पर ऐसा बयान दिया हो, किसी अखबार को बयान दिया हो तो! इस लिहाज से किशोर शायद सही हों कि उन्होंने डायरेक्ट मीडिया को हिमाचल चुनाव पर ऐसा बयान नहीं दिया होगा। कम से कम करण थापर के वीडियो में ऐसी किसी स्वतंत्र रिपोर्ट की तस्वीर देखने को नहीं मिली। ट्विटर पर कुछ अन्य लोगों ने तेलंगाना चुनाव को लेकर किशोर के अनुमान का हवाला दिया है लेकिन उसपर इस वीडियो में कोई बात नहीं हुई। प्रशांत किशोर और करण थापर के बीच वॉकआउट शब्द के प्रयोग को लेकर भी जिच हुई। किशोर सही थे कि थापर ने इस शब्द का प्रयोग किया था लेकिन बाद में उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया।
आप में से कितने लोग यह मानेंगे कि छह महीने पहले के एक कंडीशनल ट्वीट को छह महीने बाद हुए चुनाव से इस तरह जोड़ना जायज है। उस ट्वीट में भी आधी बात अक्षरशः सच हुई थी। बाकी आधी बात सच से बस 1% प्रतिशत दूर थी। अगर प्रशांत किशोर टेंपर लूज करने के बजाय यह कहते कि मुझे वह बयान दिखाइए तो वह आराम से अपना बचाव कर सकते थे। वह कह सकते थे कि उदयपुर चिंतन शिविर का हश्र देखकर मुझे ऐसा ही लगा था। उसके बाद छह महीने में कांग्रेस ने कुछ हाथ-पैर चलाकर चार लोकसभा सीटों वाले राज्य में किसी तरह जान बचा ली, लेकिन 26 लोकसभा सीटों वाले राज्य में उनका सूपड़ा साफ हो गया था!
करण थापर ने कभी प्रणय राय या योगेंद्र यादव जैसे प्रोफेशनल सेफोलॉजिस्ट को उनके पुराने चुनावी अनुमानों के लिए इस तरह ग्रिल किया हो तो, मुझे याद नहीं आता है! प्रशांत किशोर के एक कंडीशनल ट्वीट का इस्तेमाल करके वे अपना ईगो तुष्ट करना चाह रहे थे। प्रशांत किशोर ने सही पकड़ा कि थापर के करियर का हाई प्वाइंट ये है कि कुछ लोग उनका इंटरव्यू छोड़कर चले गये थे! और फिर एक ये वक्त आ गया कि थापर ने लेख लिखकर रोना रोया कि फलाँ पार्टी का कोई नेता उन्हें इंटरव्यू नहीं दे रहा है! इंटरव्यू देने वाले भी जानते हैं कि सामने वाली दुकान उनकी कृपा से चल रही है इसलिए वह खुद को इंटरव्यू लेने वालों से ऊपर समझते हैं। ऐसे में जिसका ट्रैक रिकॉर्ड इंटरव्यू में बुलाकर बुली और पब्लिकली बेइज्जत करने का रहा हो, उसे अपने ईकोसिस्टम से बाहर के गेस्ट मिलना एक न एक दिन बन्द हो जाना स्वाभाविक है।
प्रशांत किशोर ने करण थापर को जिस तरह दुत्कारा कि आप जैसे चार लोगों….वह अशोभनीय था और उससे यह भी जाहिर हो गया कि अब वह खुद को करण थापर जैसे लुटियन इलीट से बेहतर या बराबर समझने लगे हैं। यह सच है कि प्रशांत किशोर का अहंकार उनके निजी उपबल्धियों की देन है। करण थापर का अहंकार उनकी निजी उपलब्धियों की कम और उनके डैडी, आंटी, अंकल, ग्रैंडपा इत्यादि के कनेक्शन की देन ज्यादा है। दो रसूखदार लोगों के अहंकार का टकराव अपनी जगह है। केवल फैक्ट के आधार पर देखें तो करण थापर ने जो किया वह कहीं से पत्रकारिता नहीं थी लेकिन वह लम्बे समय से अपने गेस्ट को इसी तरह बुली और ऑन कैमरा ह्यूमिलिएट करते आ रहे हैं। प्रशांत किशोर ने जो किया वह अमर्यादित व्यवहार था जो उनके व्यक्तित्व से बिल्कुल मेल नहीं खाता।
अब इस मुद्दे पर और नहीं। फिर याद दिला दूँ, कमेंट बॉक्स में कोई सवाल-जवाब नहीं करूँगा। जिसे जो सर्टिफिकेट देना हो, बिन्दास दे, कोई परवाह नहीं।


