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केजरीवाल को खुला खत : ‘आप की टोपी रखी मेरे पास, जरा सुन लो अरज हमारी’

दिल्ली : प्रदेश सरकार के काम काज से असंतुष्ट आम आदमी देवेश वशिष्ठ ने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को रोष भरा पत्र लिखते हुए उन्हें अवगत कराया है कि अब आपसे और आपके मंत्रियों से मिलना बहुत मुश्किल हो गया है और हमारे विधायक कभी न घर मिलते हैं, न फोन उठाते हैं। इसलिए आपको ये खुला खत लिखना पड़ रहा है।

दिल्ली : प्रदेश सरकार के काम काज से असंतुष्ट आम आदमी देवेश वशिष्ठ ने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को रोष भरा पत्र लिखते हुए उन्हें अवगत कराया है कि अब आपसे और आपके मंत्रियों से मिलना बहुत मुश्किल हो गया है और हमारे विधायक कभी न घर मिलते हैं, न फोन उठाते हैं। इसलिए आपको ये खुला खत लिखना पड़ रहा है।

देवेश वशिष्ठ लिखते हैं – ”हमें आपने कहा कि आप ईमानदार हैं, इसलिए दिल खोलकर आपको वोट दिये। यहां तक कि आस पड़ौस के लोगों से भी कहा कि उस आदमी को चुनें जो कहता है कि उसके राज में दिल्ली का हर आदमी खुद को मुख्यमंत्री समझे। केजरीवाल जी आपके कहे पर मुझे इतना भरोसा है कि अब तो कभी कभी सोते वक्त ये सपना भी आ जाता है कि मैं भी मुख्यमंत्री बन गया हूं। लेकिन पिछले चार दिन से पूर्वी दिल्ली की एक घनी बस्ती न्यू अशोक नगर जहां मैं रहता हूं वहां रात भर बिजली लुका छिपी का खेल खेलती रहती है। लगता है कि आपके खिलाफ साजिश है क्योंकि चिपचिपी गर्मी में मुख्यमंत्री का सपना नहीं दिखता।

”केजरीवाल जी मुख्यमंत्री तो आप ही हैं। हमारे इतने बड़े सपने नहीं है। आपने भी तो कहा था कि मुझ जैसे आम आदमी की मांगें भी बहुत छोटी छोटी होती हैं। पत्नि बता रही थी कि सुबह बच्चे को टीका लगवाने के लिए नजदीक के स्वास्थ्य केन्द्र गई तो वहां बताया कि बहुत दिन से वहां दवाएं नहीं आ रहीं। रोटा वायरस का टीका भी नहीं था वहां। बच्चा रोता है रात को गर्मी में। कहीं उल्टी दस्त न लग जाएं। इंटरनेट पर पढ़ रहा था कि रोटा वायरस का टीका इसी काम का होता है। आप तो जनता के मुख्यमंत्री हैं, कुछ व्यवस्था करवा देते तो ठीक रहता।

”मैं भी आम आदमी ही हूं। आपकी टोपी दस रुपये देकर खरीदी थी, पर्ची भी कटाई थी। रखी है मेरे पास। मुझे यकीन है कि आप पिछले मुख्यमंत्रियों जैसे नहीं है… लेकिन पहले कभी कभी नालियों की सफाई के लिए कुछ लोग जो आते थे, वो अब नहीं आते… मच्छर बहुत हो गए हैं ना इसलिए परेशानी ज्यादा हो गई है। मुझे पता है कि ये आपके खिलाफ साजिश है… लेकिन कुछ करवा देते तो ठीक रहता।

”एक और छोटा सा काम है आपसे… वो मेरी पत्नी है ना, राजकीय कन्या विद्यालय में गेस्ट टीचर थी… उसकी तीन महीने की सैलरी बाकी है… जब आप पिछली बार आए थे तो बजट नहीं मिलने से नहीं मिल पाई थी। उस बेचारी ने तो उम्मीद ही छोड़ दी है.. लेकिन मैं उसे समझाता हूं कि हमारे मुख्यमंत्री ईमानदार हैं… वो ऐसा थोड़े करेंगे.. वैसे मामला साल भर पुराना हो गया है। अब तो उसकी नौकरी भी छूट गई है… अगर पैसे दिलवा देते तो ठीक रहता…

”हां एक और बात है… मेरे बाल बहुत झड़ रहे हैं…। तो ऐसे ही झ़ड़ते रहे तो गंजा हो जाऊंगा। इसलिए वो सरकारी वाला अच्छा पानी भिजवा देते तो कृपा होती… लोग बताते हैं ग्राउंड वाटर से बाल टूट रहे हैं। पीने के लिए 20 रुपये का मंगवा लेता हूं..। लेकिन बाल धोने भर को सरकारी वाला अच्छा पानी मिल जाता तो ठीक रहता। बहुत छोटी छोटी सी परेशानियां हैं। आपकी स्वराज भी पढ़ी थी मैंने। 45 रुपये की खरीद कर लाया था। क्या लिखा है आपने। वाह।

”आम आदमी की तो ज्यादा डिमांड नहीं होती। बस इतनी सी बात थी कि हमारी गली पक्की होनी थी। दो साल पहले काम भी शुरू हो गया था। वैसे हमें वहां रहने की आदत हो गई है, पर काम रुक गया तो गिट्टी पत्थर से बाइक निकालने में भी परेशानी होती है। पत्नि को साथ ले जाते वक्त डर लगता है, कहीं गिर ऊबड़-खाबड़ में गिर न जाए। काम शुरू करवा देते तो ठीक रहता…

”बाकी सब बहुत अच्छा है। बहुत तरक्की हो ही रही है। आपका दिल्ली का विकास करने के लिए शुक्रिया। 

देवेश वशिष्ठ, आपका आम आदमी

 

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