वामपंथी पत्रकारों की तगड़ी घेरेबंदी से भाजपाई सीएम खंडूड़ी को भागना पड़ गया था! (किस्से अखबारों के : पार्ट छह)

मीडिया में विचार की कद्र रही है, ऐसा हमेशा से माना जाता रहा है। इस धंधे में विचार कोई बुरी चीज नहीं रही। एक दौर रहा है जब पूंजीवादी मालिक अपनी दुनिया में रहते थे और अखबारों में वामपंथी रुझान के पत्रकार, संपादक अपना काम करते रहते थे। नई आर्थिक नीतियों के अमल में आने के बाद संभवतः पहली बार मालिकों का ध्यान विचार की तरफ गया। ये दक्षिणपंथ के उभार का दौर था। मालिकों और दक्षिणपंथ के बीच के गठजोड़ ने प्रारंभिक स्तर पर विचार के खिलाफ माहौल बनाना शुरु किया। इसके बाद धीरे-धीरे उन लोगों को दूर किया जाने लगा जो किसी विचार, खासतौर से प्रगतिशील विचार के साथ जुड़े थे। उन्हें सिस्टम के लिए खतरे के तौर पर चिह्नित किया जाने लगा। ढके-छिपे तौर पर पत्रकारों की पृष्ठभूमि की पड़ताल होने लगी। जो कभी जवानी के दिनों में किसी वामपंथी या प्रगतिशील छात्र संगठन से जुड़े रहे थे, उनकी पहचान होने लगी।

अयोध्या मंदिर आंदोलन के दौर में दक्षिणपंथी पत्रकारों की बड़ी संख्या मीडिया में आ गई थी और अखबारों का चरित्र बदलने का दौर आरंभ हो गया था। इसमें सरकारें भी भूमिका निभा रही थी। कांग्रेस सरकारें आमतौर से पत्रकारों को उनकी दुनिया में जीने के लिए छोड़कर रखती थी, लेकिन भाजपा का जोर उनके नियमन पर था। भाजपा इस काम को कर भी सकती थी, खासतौर से उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य में। उत्तराखंड में भाजपा के सत्ता में आने पर भुवनचंद्र खंडूड़ी मुख्यमंत्री बने तो उनके मीडिया सलाहकारों ने परोक्ष मीडिया नियमन पर जोर दिया। इसके लिए अचानक ही एक आधार भी मिल गया। पायनियर के पत्रकार प्रशांत राही को माआवादी गतिविधियों में शामिल होने के शक में गिरफ्तार किया गया और सरकारी तंत्र को यह प्रचार करने का अवसर प्राप्त हो गया कि माओवादी मीडिया में घुस आए हैं।

उस समय उत्तराखंड के पत्रकारों में यह आम चर्चा थी कि सरकार उन लोगों के बारे में छिपे तौर पर पड़ताल करा रही है जो किसी वामपंथी संगठन से जुड़े हैं या जुड़े हुए थे। किसी की पहचान के मामले में खबरों तक को आधार बनाया जाने लगा। उन दिनों अमर उजाला में अरविंद शेखर ने एक ब्रेकिंग-स्टोरी की जो ऑल एडिशन छपी थी। ये स्टोरी अतिवादी कम्युनिस्ट संगठनांे के एकीकरण के जरिए अखिल भारतीय पार्टी बनाने को लेकर थी। तब एमसीसी के साथ दो अन्य संगठनों का विलय हुआ था। इस खबर के छपने के बाद अरविंद शेखर को काफी समय तक निशाने पर रखा गया। असल में सत्ता में बैठे लोग मीडियाकर्मी की लिखने की आजादी, विचार की आजादी को किसी पार्टी या दल विशेष के लिए कार्य करने के तौर पर परिभाषित कर रहे थे।

उन्हीं दिनों डीएवी पीजी कॉलेज में एक मामला हुआ। वामपंथी छात्र संगठनों ने मोर्चा बनाकर अभाविप के खिलाफ चुनाव लड़ा, चूंकि कॉलेज के प्राचार्य भाजपा के सक्रिय नेता थे इसलिए वे इस स्थिति से सहज नहीं थे। कॉलेज में छात्र राजनीति का संघर्ष वामपंथ और दक्षिणपंथ के बीच तय हो गया। उन दिनों जो खबरें छपी, उन्हें लेकर भाजपा के लोग सहज नहीं थे। अमर उजाला के तत्कालीन संपादक प्रताप सोमवंशी जी तक इस बारे में शिकायत पहुंची और उन्होंने रिपोर्टरों को बुलाकर कहा कि जिन्हें विचार की राजनीति करनी है वे मीडिया छोड़ दें। जबकि, प्रताप सोमवंशी जी खुद प्रगतिशील विचार से जुड़े रहे थे। असल में, ये पूरा वक्त संतुलन के संघर्ष का वक्त था। अयोध्या आंदोलन के पहले तक अमर उजाला के भीतर कोई बड़ा दक्षिणपंथी समूह नहीं था, लेकिन इसके बाद के दस सालों में विचार का संतुलन गायब हुआ और दक्षिणपंथी झुकाव साफ-साफ दिखने लगा था। मालिकों ने अपने संपादकों के जरिये सरकारांे से सीधे रिश्ते बना लिए थे और उत्तराखंड में अखबारांे को बिजनेस देने वाली सबसे बड़ी संस्था भी सरकार ही थी, इसलिए सरकार के संकेतों के अनुरूप ही ज्यादातर चीजें तय हो रही थी।

धीरे-धीरे ऐसी स्थिति आ गई थी जब अखबार के पूरे चरित्र पर इस बात का फर्क पड़ना भी बंद हो गया था कि अखबार का संपादक कौन है। दूसरे अखबारों के साथ-साथ अमर उजाला भी एक प्रॉडक्ट बनने की ओर आगे बढ़ चला था। जैसा कि कुछ बरस पहले नवभारत टाइम्स के मालिक समीर जैन ने अपने अखबार को प्रॉक्डट घोषित किया था, उसी राह पर सब चल पड़े थे। लेकिन, इस बंद दुनिया के बाहर पत्रकारों की एक और दुनिया थी जो किसी मालिक की मोहताज नहीं थी और जिसका कोई सरकार नियमन नहीं कर सकती थी। इसका नजारा प्रशांत राही की गिरफ्तारी के कुछ समय बाद हुई मुख्यमंत्री भुवनचंद्र खंडूड़ी की प्रेस वार्ता में देखने को मिला। सरकार की उपलब्धियां गिनाने के लिए बुलाई गई इस पत्रकार वार्ता में पूरे प्रदेश के दिग्गज पत्रकार जमा थे। मुख्यमंत्री आवास में पत्रकार वार्ता शुरू हुई।

राजीव लोचन शाह ने सवाल दागा कि सरकार ने प्रदेश में किन किबातों को प्रतिबंधित किया है, खासतौर से वामपंथ से जुड़ी किताबों को लेकर ताकि, पत्रकारों को पता चल सके कि उन्हें अपनी निजी लाइब्रेरी में कौन-सी किताबें रखनी हैं और कौन-सी नष्ट कर देनी हैं! मौके पर मौजूद मुख्य सचिव और डीजीपी ने ऐसी किसी सूची से इनकार किया। इसके बाद राजीव नयन बहुगुणा और जयसिंह रावत ने मोर्चा संभाल लिया। उनके साथ राजू गुसाईं और दूसरे प्रगतिशील पत्रकार भी जुड़ गए। कुछ ही देर में पत्रकार वार्ता का सिराजा बिखर गया और मुख्यमंत्री उठकर चले गए। उन दिनों प्रो. देवेंद्र भसीन सरकार की ओर से मीडिया को संभाल रहे थे, लेकिन विचार का मुद्दा का इतना बड़ा साबित हुआ कि प्रो. भसीन भी कुछ नहीं कर सके।

पत्रकार मोटे तौर पर दो गुटों पर बंट गए थे। एक वे जिन्हें सरकार संदिग्ध मान रही थी ओर दूसरे वे जो वक्त की नजाकत भांपते हुए सरकार के साथ हो लिए थे। सरकार के साथ खड़े होने वालों की संख्या काफी बड़ी थी। इनमें कुछ ऐसे नाम भी थे जो पूर्व में प्रगतिशील विचारों के वाहक माने जाते रहे थे। इस घटना के बाद पत्रकारों, खासतौर से नए पत्रकारों को इस बात का संबल जरूर मिला कि उनके पीछे सीनियर पत्रकार भी खड़े हैं। यूं भी विचार को सामने रखकर जब बात करते हैं तो उत्तराखंड काफी आगे खड़ा नजर आता है। भले ही राज्य में भाजपा की दो-दो सरकारें और चार-चार मुख्यमंत्री रह चुके हैं, लेकिन प्रदेश की पत्रकारिता में विचार का सवाल अपने स्थान पर मजबूती के साथ जिंदा रहा।

भाजपा की सरकारों के दौर में पत्रकारों के लिहाज से सबसे मुश्किल दौर वही था जब खंडूड़ी मुख्यमंत्री थे, रमेश पोखरियाल निशंक के आने के बाद एक हद तक स्थितियां बदली क्योंकि निशंक निजी पसंद-नापसंद के आधार पर व्यक्तियों का चयन करते थे, सापेक्षिक तौर पर वे उदार भी थे। ऐसा ही एक किस्सा अमर उजाला में मेरे इंटरव्यू के साथ भी जुड़ा हुआ है। उन दिनों राधेश्याम शुक्ल जी अमर उजाला मेरठ में संपादकीय पृष्ठ के इंचार्ज थे। वे घोर ब्राह्मणवादी और पुराने विचारों के वाहक थे। मैं उनके कक्ष में इंटरव्यू के लिए हाजिर हुआ, मुझे उनके वैचारिक धरातल के बारे में कुछ भी जानकारी नहीं थी। उस साल उत्तर कोरिया के राष्ट्र-प्रमुख किम इल सुंग की मौत हुई थी और कम्युनिस्ट पार्टी उनके बेटे किम इल जोंग को उत्तराधिकारी घोषित किया था। मुझ से पहला सवाल इसी बारे में पूछा गया। मेरे उत्तर से शुक्ल जी खिन्न हुए और मुझे पांच मिनट में ही चलता कर दिया। शुक्ल जी ने मुझे रिजेक्ट कर दिया था, लेकिन वक्त कुछ और करने जा रहा था।

…जारी…

सुशील उपाध्याय ने उपरोक्त संस्मरण फेसबुक पर लिखा है. सुशील ने लंबे समय तक कई अखबारों में विभिन्न पदों पर काम करने के बाद अब शिक्षण का क्षेत्र अपना लिया है. वे इन दिनों सीनियर असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में हरिद्वार के उत्तराखंड संस्कृत यूनिवर्सिटी में कार्यरत हैं. सुशील से संपर्क gurujisushil@gmail.com के जरिए किया जा सकता है. इसके पहले का पार्ट पढ़ने के लिए नीचे दिए गए शीर्षकों पर क्लिक करें.

 

अप्लीकेशन भेजा दैनिक जागरण को, पहुंची शशि शेखर के पास (किस्से अखबारों के : पार्ट पांच)

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प्रताप सोमवंशी ने रिपोर्टरों को बुलाकर कहा- जिन्हें विचार की राजनीति करनी है वे मीडिया छोड़ दें (किस्से अखबारों के : पार्ट-चार)

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मैंने पहली बार अमर उजाला का कंपनी रूप देखा था (किस्से अखबारों के : पार्ट-तीन)

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मीडिया का कामचोर आदमी भी सरकारी संस्था के सबसे कर्मठ व्यक्ति से अधिक काम करता है (किस्से अखबारों के – पार्ट दो)

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सूर्यकांत द्विवेदी संपादक के तौर पर मेरे साथ ऐसा बर्ताव करेंगे, ये समझ से परे था (किस्से अखबारों के – पार्ट एक)

 

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