‘सरबजीत’: एक अच्छे विषय पर बुरी फिल्म

Sushil Upadhyay : ज्यादातर अखबारों ने फिल्म ‘सरबजीत’ को पांच में से तीन स्टार दिए हैं। कल मेरे पास खाली वक्त था, फिल्म देख आया। इस फिल्म के बारे में कुछ बातों को लेकर जजमेंटल होने का मन कर रहा है। आखिर इस फिल्म को क्यों देखा जाए? खराब पंजाबी के लिए! बुरी उर्दू जबान के लिए! जो लोग पंजाबी नहीं जानते, उन्हें भी पता है कि ‘न’ को ‘ण’ में तब्दील करने से पंजाबी नहीं बन जाती। पाकिस्ताण, हिन्दुस्ताण, हमणे….जैसे शब्दों को बोलते हुए ऐश्वर्या राय निहायत नकली लगती हैं। उनकी तुलना में रणदीप और ऋचा के संवाद ज्यादा सधे हुए और भाषा का टोन पंजाबियों वाला हैं। ऐश्वर्या के ज्यादातर संवाद उपदेश की तरह लगते हैं। वे सरबजीत की बहन दलबीर के तौर पर किसी भी रूप में प्रभावी नहीं हैं।

जिन्हें पाकिस्तान का विरोध पसंद है, वे इस फिल्म को जरूर देख सकते हैं। क्योंकि पुरानी फिल्मों की तरह ही यह फिल्म भी पाकिस्तान के नकारात्मक चेहरे पर फोकस करती है। फिल्मकार ने कुछ ‘मासूम‘ गलतियां भी की हैं। पंजाब के अमृतसर के भिक्कीविंड गांव की दलबीर पाकिस्तान में अपने भाई को हिंदी में चिट्ठी लिखती है और वो सही पते पर पहुंच भी जाती है! पाकिस्तानियों के हिंदी जानने की दाद देनी होगी।

इस फिल्म की बजरंगी भाईजान से तुलना करें तो वहां पर पाकिस्तान का ज्यादा स्वाभाविक चित्रण था। इस फिल्म में सब कुछ नकली जैसा लगता है। ये सवाल लगातार उठता है कि ये फिल्म किस श्रेणी की है-आर्ट मूवी, बायोपिक, फीचर फिल्म, डाक्युड्रामा, पालिटिकल या कोई और श्रेणी? मुझे लगा कि ये ‘यूं ही टाइप’ की फिल्म है। किसी फिल्म में संभवतः पहली बार ऐसा देखा जब पंजाब के मुख्यमंत्री को गैर-सिख के तौर पर दिखाया गया। आखिर तक यह समझ में नहीं आता कि ‘रवींद्र ंिसह‘ केंद्र का मंत्री है, पंजाब का मुख्यमंत्री है, किसी पार्टी का नेता है या कुछ और?

अमृतसर में तैनात पुलिस इंसपैक्टर पंजाबी की बजाय बिहारी ज्यादा लगता है। जहां तक मेरी जानकारी है 1998 र्में ZEE NEWS पर सुधीर चैधरी वैसे नहीं दिखते थे जैसे कि आज नजर आते हैं। उनकी लेटेस्ट फुटेज को 18 साल पहले की प्रस्तुत करना हास्यास्पद लगता है। तब और भी हास्यास्पद लगत है जब ZEE NEWS पर अंग्रेजी बुलेटिन का प्रसारण दिखने लगता है। और हां, पाकिस्तान से जुड़ी फिल्मों में जब तक कोई दरगाह/मजार और उस पर कव्वाली न हो तो निर्माताओं को लगता है कि फिल्म अधूरी है। इसमें भी एक दरगाह/मजार पर कव्वाली का जुगाड़ किया गया है। मेरी टिप्पणी ये है कि ‘सरबजीत’ एक अच्छे विषय पर बुरी फिल्म है।

पत्रकार और शिक्षक रहे सुशील उपाध्याय के एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

जो लोग एनडीटीवी पर रवीश कुमार के मुरीद हैं, उन्हें एक बार राज्यसभा टीवी पर आरफा खानम शेरवानी को भी देखना चाहिए

Sushil Upadhyay : राज्यसभा टीवी, केरल, आरफा और हिंदी… कल रात साढ़े आठ बजे राज्यसभा टीवी पर आरफा खानम शेरवानी का कार्यक्रम देखकर मन खुश हो गया। जो लोग एनडीटीवी पर रवीश कुमार के मुरीद हैं, उन्हें एक बार राज्यसभा टीवी पर आरफा खानम शेरवानी को भी देखना चाहिए। खासतौर से, उनकी भाषा को। वे अपनी प्रस्तुति में रवीश कुमार की तुलना में ज्यादा संतुलित, शालीन और बौद्धिक नजर आती हैं। कल वे केरल में थीं, वहां से चुनावी मुहिम पर शो प्रस्तुत कर रही थीं। उनके पैनल के नाम देखकर एक पल के लिए मुझे लगा कि शायद आज का शो अंग्रेजी में होगा। पैनल में सीपीएम के वी. शिवदासन, आरएसएस के डॅा. के.सी. अजय कुमार, ईटीवी के प्रमोद राघवन, पत्रकार गिलवेस्टर असारी और केरल से प्रकाशित कांग्रेस के दैनिक अखबार के संपादक (जिनका नाम याद नहीं रहा) शामिल थे।

जब आरफा ने कार्यक्रम की भूमिका शुरू की तो मेरी उत्सुकता बढ़ गई क्योंकि जब कोई दक्षिण या पूर्वाेत्तर का व्यक्ति हिंदी कार्यक्रमों का हिस्सा बनता है तो उसे सुनने का मन करता है। मुझे लगा कि ये कार्यक्रम आरफा के लिए चुनौती होगा क्योंकि उनके अलावा पांचों लोग ऐसे हैं जिनकी भाषायी पृष्ठभूमि न हिंदी की है और न ही उत्तर भारत की। वैसे भी जब आरफा बोलती हैं तो उनकी भाषा सुष्ठु, परिष्कृत और प्रांजल (उर्दू में शायद इसे नफीस कह सकते हैं!) होती है। दूर दक्षिण में उनकी भाषा को कौन समझेगा! पर, मैं गलत साबित हुआ। बहस शुरू हुई तो भाषा गौण हो गई। राघवन, असारी और के.सी. अजय कुमार को सुनकर लगा ही नहीं कि वे अपनी मातृ-भाषा से अलग कोई भाषा बोल रहे हैं।

बेहद सधे हुए, प्रभावपूर्ण, तार्किक और खूबसूरत हिंदी बोलने वाले दक्षिण भारतीय लोग पूरे कार्यक्रम में आरफा की बराबरी पर नजर आए। कहीं-कहीं शिवदासन अंग्रेजी-ट्रैक पर चले जाते थे, लेकिन कुछ ही अंतराल में हिंदी पर लौट आते थे। इक्का-दुक्का वाक्यों में लिंग संबंधी दोष दिखता था, लेकिन इससे भाषा के प्रवाह, लयात्मकता और उसकी अंतर-बद्धता पर कोई असर नहीं दिखा। कुछ उच्चारण तो उत्तर भारतीय से बेहद अच्छे थे क्योंकि ज्यादातर उत्तर भारतीय ‘और’ को ‘ओर’ की तरह बोलते हैं। केरल के चुनाव पर केरल के विशेषज्ञों को हिंदी में सुनना अपने आप में सुखद अनुभव रहा। और ऐसा नहीं है कि मैं इसलिए खुश हूं कि, देखो दक्षिण वाले भी हिंदी बोल रहे हैं, मुझे तब भी वैसी ही खुशी होती है, जब कर्नाटक में नौकरी करने गए मेरे एक परिचित धाराप्रवाह कन्नड़ में बात करते हैं। विषयांतर न हो जाए इसलिए इस कार्यक्रम के लिए आरफा खानम शेरवानी को बधाई प्रेषित करता हूं।

सुशील उपाध्याय पत्रकार और मीडिया शिक्षक रहे हैं. इन दिनों सरकारी नौकरी में हैं. उनका यह लिखा उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

वामपंथी पत्रकारों की तगड़ी घेरेबंदी से भाजपाई सीएम खंडूड़ी को भागना पड़ गया था! (किस्से अखबारों के : पार्ट छह)

मीडिया में विचार की कद्र रही है, ऐसा हमेशा से माना जाता रहा है। इस धंधे में विचार कोई बुरी चीज नहीं रही। एक दौर रहा है जब पूंजीवादी मालिक अपनी दुनिया में रहते थे और अखबारों में वामपंथी रुझान के पत्रकार, संपादक अपना काम करते रहते थे। नई आर्थिक नीतियों के अमल में आने के बाद संभवतः पहली बार मालिकों का ध्यान विचार की तरफ गया। ये दक्षिणपंथ के उभार का दौर था। मालिकों और दक्षिणपंथ के बीच के गठजोड़ ने प्रारंभिक स्तर पर विचार के खिलाफ माहौल बनाना शुरु किया। इसके बाद धीरे-धीरे उन लोगों को दूर किया जाने लगा जो किसी विचार, खासतौर से प्रगतिशील विचार के साथ जुड़े थे। उन्हें सिस्टम के लिए खतरे के तौर पर चिह्नित किया जाने लगा। ढके-छिपे तौर पर पत्रकारों की पृष्ठभूमि की पड़ताल होने लगी। जो कभी जवानी के दिनों में किसी वामपंथी या प्रगतिशील छात्र संगठन से जुड़े रहे थे, उनकी पहचान होने लगी।

अयोध्या मंदिर आंदोलन के दौर में दक्षिणपंथी पत्रकारों की बड़ी संख्या मीडिया में आ गई थी और अखबारों का चरित्र बदलने का दौर आरंभ हो गया था। इसमें सरकारें भी भूमिका निभा रही थी। कांग्रेस सरकारें आमतौर से पत्रकारों को उनकी दुनिया में जीने के लिए छोड़कर रखती थी, लेकिन भाजपा का जोर उनके नियमन पर था। भाजपा इस काम को कर भी सकती थी, खासतौर से उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य में। उत्तराखंड में भाजपा के सत्ता में आने पर भुवनचंद्र खंडूड़ी मुख्यमंत्री बने तो उनके मीडिया सलाहकारों ने परोक्ष मीडिया नियमन पर जोर दिया। इसके लिए अचानक ही एक आधार भी मिल गया। पायनियर के पत्रकार प्रशांत राही को माआवादी गतिविधियों में शामिल होने के शक में गिरफ्तार किया गया और सरकारी तंत्र को यह प्रचार करने का अवसर प्राप्त हो गया कि माओवादी मीडिया में घुस आए हैं।

उस समय उत्तराखंड के पत्रकारों में यह आम चर्चा थी कि सरकार उन लोगों के बारे में छिपे तौर पर पड़ताल करा रही है जो किसी वामपंथी संगठन से जुड़े हैं या जुड़े हुए थे। किसी की पहचान के मामले में खबरों तक को आधार बनाया जाने लगा। उन दिनों अमर उजाला में अरविंद शेखर ने एक ब्रेकिंग-स्टोरी की जो ऑल एडिशन छपी थी। ये स्टोरी अतिवादी कम्युनिस्ट संगठनांे के एकीकरण के जरिए अखिल भारतीय पार्टी बनाने को लेकर थी। तब एमसीसी के साथ दो अन्य संगठनों का विलय हुआ था। इस खबर के छपने के बाद अरविंद शेखर को काफी समय तक निशाने पर रखा गया। असल में सत्ता में बैठे लोग मीडियाकर्मी की लिखने की आजादी, विचार की आजादी को किसी पार्टी या दल विशेष के लिए कार्य करने के तौर पर परिभाषित कर रहे थे।

उन्हीं दिनों डीएवी पीजी कॉलेज में एक मामला हुआ। वामपंथी छात्र संगठनों ने मोर्चा बनाकर अभाविप के खिलाफ चुनाव लड़ा, चूंकि कॉलेज के प्राचार्य भाजपा के सक्रिय नेता थे इसलिए वे इस स्थिति से सहज नहीं थे। कॉलेज में छात्र राजनीति का संघर्ष वामपंथ और दक्षिणपंथ के बीच तय हो गया। उन दिनों जो खबरें छपी, उन्हें लेकर भाजपा के लोग सहज नहीं थे। अमर उजाला के तत्कालीन संपादक प्रताप सोमवंशी जी तक इस बारे में शिकायत पहुंची और उन्होंने रिपोर्टरों को बुलाकर कहा कि जिन्हें विचार की राजनीति करनी है वे मीडिया छोड़ दें। जबकि, प्रताप सोमवंशी जी खुद प्रगतिशील विचार से जुड़े रहे थे। असल में, ये पूरा वक्त संतुलन के संघर्ष का वक्त था। अयोध्या आंदोलन के पहले तक अमर उजाला के भीतर कोई बड़ा दक्षिणपंथी समूह नहीं था, लेकिन इसके बाद के दस सालों में विचार का संतुलन गायब हुआ और दक्षिणपंथी झुकाव साफ-साफ दिखने लगा था। मालिकों ने अपने संपादकों के जरिये सरकारांे से सीधे रिश्ते बना लिए थे और उत्तराखंड में अखबारांे को बिजनेस देने वाली सबसे बड़ी संस्था भी सरकार ही थी, इसलिए सरकार के संकेतों के अनुरूप ही ज्यादातर चीजें तय हो रही थी।

धीरे-धीरे ऐसी स्थिति आ गई थी जब अखबार के पूरे चरित्र पर इस बात का फर्क पड़ना भी बंद हो गया था कि अखबार का संपादक कौन है। दूसरे अखबारों के साथ-साथ अमर उजाला भी एक प्रॉडक्ट बनने की ओर आगे बढ़ चला था। जैसा कि कुछ बरस पहले नवभारत टाइम्स के मालिक समीर जैन ने अपने अखबार को प्रॉक्डट घोषित किया था, उसी राह पर सब चल पड़े थे। लेकिन, इस बंद दुनिया के बाहर पत्रकारों की एक और दुनिया थी जो किसी मालिक की मोहताज नहीं थी और जिसका कोई सरकार नियमन नहीं कर सकती थी। इसका नजारा प्रशांत राही की गिरफ्तारी के कुछ समय बाद हुई मुख्यमंत्री भुवनचंद्र खंडूड़ी की प्रेस वार्ता में देखने को मिला। सरकार की उपलब्धियां गिनाने के लिए बुलाई गई इस पत्रकार वार्ता में पूरे प्रदेश के दिग्गज पत्रकार जमा थे। मुख्यमंत्री आवास में पत्रकार वार्ता शुरू हुई।

राजीव लोचन शाह ने सवाल दागा कि सरकार ने प्रदेश में किन किबातों को प्रतिबंधित किया है, खासतौर से वामपंथ से जुड़ी किताबों को लेकर ताकि, पत्रकारों को पता चल सके कि उन्हें अपनी निजी लाइब्रेरी में कौन-सी किताबें रखनी हैं और कौन-सी नष्ट कर देनी हैं! मौके पर मौजूद मुख्य सचिव और डीजीपी ने ऐसी किसी सूची से इनकार किया। इसके बाद राजीव नयन बहुगुणा और जयसिंह रावत ने मोर्चा संभाल लिया। उनके साथ राजू गुसाईं और दूसरे प्रगतिशील पत्रकार भी जुड़ गए। कुछ ही देर में पत्रकार वार्ता का सिराजा बिखर गया और मुख्यमंत्री उठकर चले गए। उन दिनों प्रो. देवेंद्र भसीन सरकार की ओर से मीडिया को संभाल रहे थे, लेकिन विचार का मुद्दा का इतना बड़ा साबित हुआ कि प्रो. भसीन भी कुछ नहीं कर सके।

पत्रकार मोटे तौर पर दो गुटों पर बंट गए थे। एक वे जिन्हें सरकार संदिग्ध मान रही थी ओर दूसरे वे जो वक्त की नजाकत भांपते हुए सरकार के साथ हो लिए थे। सरकार के साथ खड़े होने वालों की संख्या काफी बड़ी थी। इनमें कुछ ऐसे नाम भी थे जो पूर्व में प्रगतिशील विचारों के वाहक माने जाते रहे थे। इस घटना के बाद पत्रकारों, खासतौर से नए पत्रकारों को इस बात का संबल जरूर मिला कि उनके पीछे सीनियर पत्रकार भी खड़े हैं। यूं भी विचार को सामने रखकर जब बात करते हैं तो उत्तराखंड काफी आगे खड़ा नजर आता है। भले ही राज्य में भाजपा की दो-दो सरकारें और चार-चार मुख्यमंत्री रह चुके हैं, लेकिन प्रदेश की पत्रकारिता में विचार का सवाल अपने स्थान पर मजबूती के साथ जिंदा रहा।

भाजपा की सरकारों के दौर में पत्रकारों के लिहाज से सबसे मुश्किल दौर वही था जब खंडूड़ी मुख्यमंत्री थे, रमेश पोखरियाल निशंक के आने के बाद एक हद तक स्थितियां बदली क्योंकि निशंक निजी पसंद-नापसंद के आधार पर व्यक्तियों का चयन करते थे, सापेक्षिक तौर पर वे उदार भी थे। ऐसा ही एक किस्सा अमर उजाला में मेरे इंटरव्यू के साथ भी जुड़ा हुआ है। उन दिनों राधेश्याम शुक्ल जी अमर उजाला मेरठ में संपादकीय पृष्ठ के इंचार्ज थे। वे घोर ब्राह्मणवादी और पुराने विचारों के वाहक थे। मैं उनके कक्ष में इंटरव्यू के लिए हाजिर हुआ, मुझे उनके वैचारिक धरातल के बारे में कुछ भी जानकारी नहीं थी। उस साल उत्तर कोरिया के राष्ट्र-प्रमुख किम इल सुंग की मौत हुई थी और कम्युनिस्ट पार्टी उनके बेटे किम इल जोंग को उत्तराधिकारी घोषित किया था। मुझ से पहला सवाल इसी बारे में पूछा गया। मेरे उत्तर से शुक्ल जी खिन्न हुए और मुझे पांच मिनट में ही चलता कर दिया। शुक्ल जी ने मुझे रिजेक्ट कर दिया था, लेकिन वक्त कुछ और करने जा रहा था।

…जारी…

सुशील उपाध्याय ने उपरोक्त संस्मरण फेसबुक पर लिखा है. सुशील ने लंबे समय तक कई अखबारों में विभिन्न पदों पर काम करने के बाद अब शिक्षण का क्षेत्र अपना लिया है. वे इन दिनों सीनियर असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में हरिद्वार के उत्तराखंड संस्कृत यूनिवर्सिटी में कार्यरत हैं. सुशील से संपर्क gurujisushil@gmail.com के जरिए किया जा सकता है. इसके पहले का पार्ट पढ़ने के लिए नीचे दिए गए शीर्षकों पर क्लिक करें.

 

अप्लीकेशन भेजा दैनिक जागरण को, पहुंची शशि शेखर के पास (किस्से अखबारों के : पार्ट पांच)

xxx

प्रताप सोमवंशी ने रिपोर्टरों को बुलाकर कहा- जिन्हें विचार की राजनीति करनी है वे मीडिया छोड़ दें (किस्से अखबारों के : पार्ट-चार)

xxx

मैंने पहली बार अमर उजाला का कंपनी रूप देखा था (किस्से अखबारों के : पार्ट-तीन)

xxx

मीडिया का कामचोर आदमी भी सरकारी संस्था के सबसे कर्मठ व्यक्ति से अधिक काम करता है (किस्से अखबारों के – पार्ट दो)

xxx

सूर्यकांत द्विवेदी संपादक के तौर पर मेरे साथ ऐसा बर्ताव करेंगे, ये समझ से परे था (किस्से अखबारों के – पार्ट एक)

 

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

अप्लीकेशन भेजा दैनिक जागरण को, पहुंची शशि शेखर के पास (किस्से अखबारों के : पार्ट पांच)

अखबारी दुनिया चरम विरोधाभासों की दुनिया है। ये विरोधाभास भी ऐसे हैं जिनमें कोई सामंजस्य या संतुलन आसानी से नहीं बनता। ये दुनिया ऐसी कतई नहीं है जिसे किसी सरलीकृत सूत्र से समझा जा सके। कोई भी बात कहने-बताने के लिए कई तरह के किंतु-परंतु का इस्तेमाल करना पड़ता है। किसी भी मीडियाकर्मी की पर्सनेलिटी में ऐसे दो चित्र होते हैं जो हमेशा एक-दूसरे से न केवल टकराते हैं, वरन उन्हें खारिज भी करते हैं।

पहला चित्र वो है जिसे बाहर की दुनिया देखती है-जिससे हर कोई भय खाता है, उसे दुनिया का ताकतवर प्राणी माना जाता है और हर कोई उससे बचकर निकलता है। उसका दूसरा चित्र वो है जो अखबार के भीतर दिखाई देता हैं-हमेशा डरा हुआ, तनावग्रस्त, बिखरी हुई कड़िया जोड़ता हुआ और सायास विमन्र दिखता हुआ। हर किसी को ऐसा होना ही पड़ता है, जो होना नहीं चाहते, उनकी नियती टूटकर बिखर जाना है। अब, सोचिये कितना मुश्किल होता होगा इस संतुलन को साध पाना। एक तरफ आप किसी मंत्री, अफसर या बदमाश को उसकी हैसियत याद दिलाते रहते हैं और दूसरी तरफ अपने संपादक या ऐसे ही किसी इंचार्जनुमा बॉस की सतत फटकार खाते रहते हैं।

बाहरी लोगों के लिए इस बात पर यकीन करना भी मुश्किल होगा कि औसतन हर दूसरा संपादक अपने मातहतों से गाली-गलौच की भाषा में बात करता है। जो थोड़े शालीन हैं, वे मनोवैज्ञानिक तरीकों का उपयोग करते हैं। एक रोचक घटना का जिक्र करता हूं। (आज यह घटना मुझे रोचक लगती है, लेकिन जिस दिन हुई थी उस दिन मैंने खुद को बेहद अपमानित, पीड़ित, प्रताड़ित महसूस किया था।) अमर उजाला में करीब चार साल ऐसे बीते जब वहां शशि शेखर जी समूह संपादक थे। भले ही मैं जिलों में रिपोर्टिंग कर रहा था, लेकिन मै अखबारों के मुख्यालयों के चक्कर खूब लगाता था। मेरा अवचेतन मुझे यह बताता रहता था कि अगर एक बार मुख्यधारा से कट गए तो फिर नौकरी नहीं बच पाएगी और एक बार चली गई तो फिर दूसरी मिलना संभव नहीं होगा। आदतन ऐसे ही चक्कर काटते रहने के कारण मैं शशि शेखर जी के पूर्ववर्ती राजेश रपरिया जी के निकट था। शशि जी आए तो राजेश रपरिया जी का जाना तय हो गया।

शशि जी ने ज्वाइन करने के बाद अमर उजाला के सभी प्रमुख केंद्रों के रिपोर्टरों से मीटिंग्स का दौर शुरू किया। कई चरणों की मीटिंग के दौरान मेरी उनसे एक बार मेरठ, एक बार रुड़की और दो बार हरिद्वार में सीधी मुलाकात हुई। तभी पता चला कि उनके सामने कोई बात कहना या नया विचार रखना खतरे से खाली नहीं है। उनकी शैली यह है कि वे जो कहें, आप उसे न केवल स्वीकार करें, वरन उसे श्रेष्ठ विचार या पहल बताने का उद्घोष भी करें। शशि जी का भय मुझ पर इस कदर तारी हो गया कि मैंने अमर उजाला छोड़ने के लिए हाथ-पांव मारने शुरु कर दिए। ये 2002 की बात है। अमर उजाला में मेरे सीनियर रहे कुशल कोठियाल जी ने दैनिक जागरण ज्वाइन कर लिया था। उन दिनों दैनिक जागरण देहरादून में अशोक पांडेय जी संपादक हुआ करते थे। मैंने कोठियाल जी के जरिये पांडेय जी से बात की तो उन्होंने सकारात्मक संकेत दिए और एप्लीकेशन भेजने को कहा।

एप्लीकेशन भेजने के एक सप्ताह बाद अचानक प्रताप सोमवंशी जी का फोन आया कि शशि जी हरिद्वार आ रहे हैं, उनसे जाकर मिलो। मैं मन बनाकर गया था कि आज शायद नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा। शशि जी अपने एक दोस्त के साथ आए थे। सुबह का वक्त था, उन्होंने मेरे लिए भी नाश्ता लाने को कहा।

फिर अचानक बोले-कितना पढ़े-लिखे हो ?

मैंने अपनी कागजी-योग्यता दोहराई।

उन्होंने एक लंबी सांस ली और बोले-अखबार छोड़कर क्या करोगे ?

मैंने कहा-टीचिंग में जाने की तैयारी कर रहा हूं।

शशि जी बोले, ऐसा तो नहीं किसी और अखबार में जा रहे हो ?

मैं, समझ गया कि शशि जी को सब पता है। मैंने कहा- अमर उजाला छोड़ रहा हूं, दैनिक जागरण में अप्लाई किया है।

मैं, उनकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा कर रहा था। दम साधकर बैठा हुआ था। एकदम निश्वास!

उन्होंने एक कागज निकाला और बोले- यही एप्लीकेशन भेजी थी जागरण में?

मैंने, सहमति में सिर हिलाया।

उन्होंने कहा- तुम्हें दिक्कत क्या है?

मैंने, दिक्कत गिनाई और उन्होंने हर एक का समाधान बताया। जो उन्होंने कहा, वो सब अगले छह महीने में पूरा हुआ, लेकिन उनका डर मेरे मन से कभी नहीं गया। मेरा डर इसलिए भी बढ़ गया जो आदमी दैनिक जागरण में भेजी गई मेरी एप्लीकेशन लिए बैठा हो, उसके हाथ कितने लंबे होंगे! मैंने दैनिक जागरण के संपादक अशोक पांडेय जी को शिकायत की कि एप्लीकेशन शशि जी के पास कैसे चली गई। वे मुस्करा दिए, कोई जवाब नहीं दिया, इतना जरूर कहा कि जागरण में तुम्हें नौकरी मिल जाएगी, जब चाहो, आ जाओ। लेकिन, इस एप्लीकेशन-कांड के बाद मेरी हिम्मत नहीं हुई दैनिक जागरण जाने के बारे में सोचने की।

शशि जी की मौजूदगी कभी आश्वस्ति का अहसास नहीं दिलाती थी। सार्वजनिक बैठकों में वे मुझे दुखी आत्मा कहते और मैं उस दिन की प्रत्याशा में दिन बिताता जब शशि जी के बाध्यकारी साये से आजाद हो जाउंगा और एक दिन हो भी गया, जिसका मैं अपनी पहली पोस्ट में जिक्र कर चुका हूं। हिन्दुस्तान ज्वाइन करने के बाद मुझे अपने सिकुड़े हुए पंख खोलने का सबसे अनुकूल अवसर मिला। मैं, इसका पहला श्रेय अविकल थपलियाल जी को देता हैं, जिन्हें हिन्दुस्तान का रास्ता दिखाया। दिनेश जुयाल जी के संपादकत्व में हिन्दुस्तान, देहरादून की टीम ने अपराजेय ताकत के साथ काम शुरु किया और कुछ ही समय में हम लोग उत्तराखंड में छा गए। रिपोर्टर होने का सुख पहली बार महसूस किया। मनीष ओली, अजीत राठी और मेरे नाम की बाइलाइन खबरों वाले होर्डिंग पूरे प्रदेश में लगे थे। लेकिन, ये सुख जल्द ही फिर परेशानी में तब्दील होने जा रहा था।

हिन्दुस्तान में आंतरिक उठापटक के क्रम में समूह-संपादक मृणाल पांडेय जी ने इस्तीफा दिया और फिर शशि जी समूह-संपादक बनकर आ गए। आप अंदाज लगा सकते हैं कि इस खबर को सुनकर मेरी क्या स्थिति हुई होगी! थोड़ी-सी राहत इस बात की थी कि दिनेश जी देहरादून में संपादक थे। ज्चाइनिंग के कुछ दिन बाद शशि जी का देहरादून दौरा तय हुआ। अखबार के साथी मुझ से पूछ रहे थे कि शशि जी के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहेगा ? मैं, अपनी झेंप मिटाने के लिए यही कह रहा था कि बहुत बढ़िया अनुभव रहेगा। मैंने उनके साथ काम किया है, वे मुझे व्यक्तिगत रूप से जानते हैं, काम को बड़ा सम्मान देते हैं। शशि जी दून आए और डेस्क, सिटी रिपोर्टिंग, स्टेट ब्यूरो की मीटिंग ली। स्टेट ब्यूरो की मीटिंग में शशि जी के अलावा अविकल थपलियाल जी, अजीत राठी, मनीष ओली, मैं और दिनेश जुयाल जी मौजूद थे। आरंभ में परिचय का दौर शुरू हुआ। पहले अविकल जी, फिर अजित राठी, मनीष और………मैं, उम्मीद कर रहा था कि मेरा नंबर आने पर शशि जी कहेंगे कि अच्छा तो तुम यहां भी पकड़ में आ गए या ऐसा ही कुछ और………लेकिन, उन्होंने कुछ नहीं कहा। मेरा नंबर आने पर बोले, आप….?

मैं, सन्न था और अपना नाम बता रहा था। शशि जी ने मुझे पहचानने से मना कर दिया था। और खुद का परिचय कराने के अलावा मेरे पास और कोई विकल्प नहीं था। मैं, काफी दिनों तक अखबार में दोस्तों के उपहास का पात्र बना रहा, क्योंकि मैं शशि जी से परिचय का दावा कर रहा था और वे मुझसे पूछ रहे थे कि आप…..?

…जारी…

सुशील उपाध्याय ने उपरोक्त संस्मरण फेसबुक पर लिखा है. सुशील ने लंबे समय तक कई अखबारों में विभिन्न पदों पर काम करने के बाद अब शिक्षण का क्षेत्र अपना लिया है. वे इन दिनों सीनियर असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में हरिद्वार के उत्तराखंड संस्कृत यूनिवर्सिटी में कार्यरत हैं. सुशील से संपर्क gurujisushil@gmail.com के जरिए किया जा सकता है. इसके पहले का पार्ट पढ़ने के लिए नीचे दिए गए शीर्षकों पर क्लिक करें.

प्रताप सोमवंशी ने रिपोर्टरों को बुलाकर कहा- जिन्हें विचार की राजनीति करनी है वे मीडिया छोड़ दें (किस्से अखबारों के : पार्ट-चार)

xxx

मैंने पहली बार अमर उजाला का कंपनी रूप देखा था (किस्से अखबारों के : पार्ट-तीन)

xxx

 

मीडिया का कामचोर आदमी भी सरकारी संस्था के सबसे कर्मठ व्यक्ति से अधिक काम करता है (किस्से अखबारों के – पार्ट दो)

xxx

 

 

सूर्यकांत द्विवेदी संपादक के तौर पर मेरे साथ ऐसा बर्ताव करेंगे, ये समझ से परे था (किस्से अखबारों के – पार्ट एक)

 

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

नेपाल भूकंप कवरेज : फुटेज दूसरों की और दावा एक्सक्लूसिव का

 

Sushil Upadhyay : नेपाल के भूकंप से दक्षिण एशिया अैर हिमालयी क्षेत्र में एक बार फिर गहरी चिंता का भाव पैदा हुआ है। भूकंप के बाद से मीडिया, खासतौर हिंदी टीवी चैनल जो कुछ और जिस अंदाज में परोस रहे हैं, उससे आम लोगों की चिंता में लगातार इजाफा हुआ है। तमाम बड़े, नामी और प्रसिद्ध चैनलों पर खबरों और भूकंप-विश्लेषण का एक खास पैटर्न नजर आ रहा है। इस पैटर्न की तुलना बड़ी आसानी से किसी फिल्म के साथ की जा सकती है। हरेक बुलेटिन या विश्लेषण में एक्टिंग, बैकब्राउंड म्यूजिक, प्रायोजक, स्टेज, ड्रामा और वर्चुअल एक्शन तक नजर आ रहा है। इन दिनों बुलेटिनों के साथ जो पार्श्व-संगीत सुनाई पड़ रहा है, वह पश्चिम की दुखांत फिल्मों से उठाया गया है।

मोटे तौर पर खबरिया चैनलों का मकसद लोगों को सूचित करना, जागरूक करना, परिस्थति का सामना करने लायक समझ पैदा करना ही होता है और होना भी चाहिए, लेकिन नेपाल भूकंप के मामले में ऐसा होता नहीं दिख रहा है। दो साल पहले जिस प्रकार उत्तराखंड आपदा में चैनलों ने लापरवाही और नाॅन-प्रोफेशनलिज्म दिखाई थी, इस बार भी वह प्रायः ज्यों की त्यों दिख रही है। भूकंप के दो घंटे बाद तक भी हिंदी के स्वनामधन्य टीवी चैनल ‘आज तक’, एबीपी न्यूज, एनडीटीवी आदि राॅयटर के हवाले से खबर दे रहे थे। इन चैनलों पर पहली फुटेज भी नेपाल के माउंटेन चैनल के सौजन्य से दिखाई गई। हद तो यह हो गई कि इंडिया न्यूज नाम का चैनल असम के नौगांव में भूकंप के झटके की खबर राॅयटर के हवाले दे रहा था। अब सवाल ये है कि एक-दूसरे तेज होने, सबसे पहले खबर देने, एक्सक्लूसिव खबर लाने का दावा कर रहे चैनलों को यदि नेपाल जैसे पड़ोसी और भारत के भीतर की खबरें भी विदेशी एजेंसियों के हवाले से देनी पड़ रही है तो फिर टीवी ब्राॅडकास्टिंग में इनकी अपनी हैसियत क्या है ?

हिंदी टीवी चैनल, उनके प्रस्तोता और बुलेटिन निर्माता हमेशा ही ऐसी तेजी में होते कि तथ्य खुद-ब-खुद चैनलों की चुगली करने लगते हैं। 25 अप्रैल को दोपहर दो बजे के बुलेटिनों में कई चैनल जब वायुसेना के हरक्यूलिस को नेपाल रवाना होते दिखा रहे थे, ठीक उसी वक्त केंद्रीय गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजु नेपाल में एनडीआरएफ को भेजने की बात कह रहे थे। इस विरोधाभास से साफ है कि चैनलों ने हरक्यूलिस की रवानगी की पुरानी फुटेज दिखाई।

रात नौ बजे के बुलेटिन में ”आज तक“ पर एंकर दहाड़ रहा था कि ऐसा जलजला अब तक नहीं देखा। लेकिन, ये सब बताते वक्त वह भूल गया कि इसी स्तर के और इससे भी बड़े पांच भूकंप नेपाल की धरती पर पूर्व में रिकार्ड हो चुके हैं। ये चैनल दावा कर रहा था कि सबसे पहले ”आज तक“ मौके पर रिपोर्टिंग के लिए पहुंचा है। जबकि, दुनिया भर के चैनलों पर इससे पहले ही भूकंप की फुटेज और कवरेज दिखाई जा रही थी। या तो पुरानी फुटेज थी या ”आज तक“ दावा सच था!

चैनलों पर मौतों की संख्या को लेकर अजीब-सी भगदड़ मची थी। निजी चैनलों में एनडीटीवी-हिंदी को अपवाद मान लें तो ज्यादातर चैनल मौतों की संख्या को इस तरह प्रस्तुत कर रहे थे, जैसे लोकसभा चुनाव परिणाम में सीटों की संख्या बता रहे हों।  रात साढ़े नौ बजे तक एबीपी न्यूज और ”आज तक“ ने मरने वालों की संख्या 1457 पहुंचा दी, इंडिया टीवी 1500 लोगों के मारे जाने की बात कह रहा था, जबकि दूरदर्शन और एनडीटीवी इस संख्या को 876 बता रहे थे। यह सभी को पता है कि ऐसे हादसे मे मृतकों की संख्या की कोई अंतिम पुष्टि कभी नहीं हो पाती। ज्यादातर संख्या अनुमान पर आधारित होती हैं। यहां ध्यान देने वाली बात टीवी चैनलों का वो आकर्षण है जो मौतों के बढ़ते आंकड़े के साथ जुड़ा है। ये स्थिति चिंताजनक है।

हिंदी टीवी चैनल इस पूरे हादसे को लेकर कितने संवदेनशील हैं, इसका अनुमान भूकंप की खबरों के साथ प्रसारित होने वाले विज्ञापनों को देखकर लगाया जा सकता है। कई चैनलों पर जिस वक्त हादसे की फुटेज दिखाई जा रही थी, उसी वक्त उनके नीचे की पट्टी में रूपा फ्रंटलाइन के विज्ञापन में लिखा आ रहा था-ये आराम का मामला है। एक ओर एबीपी न्यूज पर भूकंप की विनाशलाला टाइटल के साथ खबरें चल रही और दूसरी ओर गोविंदा पान-ए-शाही विज्ञापन के जरिये लोगों को आकर्षित कर रहे थे। क्या इन विज्ञापनों को किसी दूसरे कार्यक्रम के साथ शिफ्ट करना संभव नहीं था?

निजी चैनल पुराने दिनों की तरह अंतहीन दौड़ का हिस्सा बने हुए थे, वहीं सरकारपोषित चैललों की काहिली अपनी जगह कायम थी। दूरदर्शन पर ज्यादातर सरकारी सूचनाएं ही प्रसारित हो रही थी, दूरदर्शन का फोकस प्रधानमंत्री और भारत सरकार की गतिविधियों पर था न कि नेपाल के भीतर के हालात पर। लोकसभा टीवी ने तो हद ही कर दी। जब, तमाम चैनल भूंकप पर फोकस कर रहे थे, लोकसभा टीवी के कर्ताधर्ता शनिवार को रात नौ बजे दिखाई जाने वाली फिल्म परोसकर गायब हो गए। आमतौर से सरकारी चैनल अपनी निर्धारित सीमाओं से आगे नहीं जाते, भले ही दर्शकों को खबर मिले या न मिले अथवा समय के बाद मिले। अलबत्ता, राज्यसभा टीवी ने रात के कार्यक्रमों में भूकंप को जगह दी।

दो साल पहले एक शोधपत्र के लिए मैंने उत्तराखंड आपदा के मामले में हिंदी टीवी चैनलों की कवरेज को ध्यान से देखा था। मुझे आश्चर्य हुआ कि इस बार की कवेरज की शब्दावली, कार्यक्रमों के नाम, एक्सपट्र्स की सूची में ज्यादा अंतर नहीं था। पिछली बार की तरह इस बार भी-चमत्कार, जाको राखे साइंया, बाबा की कृपा, भोले का कहर, यूं बचाया भगवान ने, जैसे जुमलों, शब्दों, कथनों की भरमार थी। पहले दिन की कवरेज में चैनलों ने धार्मिक एंगल पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया, लेकिन दूसरा दिन होते-होते धार्मिक पहलू उभर आया। 26 अप्रैल को न्यूज24 ग्राउंड-जीरो से एक्सक्लूसिव परोसते-परोसते इस बात पर आ गया कि पशुपतिनाथ मंदिर सुरक्षित कैसे बचा। चैनल ने बताया कि बाबा की कृपा से बचा। कमाल है, बाबा को केवल मंदिर की चिंता थी, उन हजारों लोगों की नहीं, जिनके परिजनों की जान चली गई है या जिनका सब-कुछ लुट पिट गया है। रात नौ और दस बजे के बुलेटिनों में एबीपी न्यूज और एनडीटीवी पर पशुपति नाथ मंदिर के सुरक्षित रहने की बात को पुरजोर ढंग से उठाया गया। इंडिया न्यूज ने दूसरों पर बढ़त के चक्कर में एकदम अनूठी स्टोरी गढ़ दी कि केदारनाथ ने बचाया पशुपति नाथ को!

इस मौके पर कई चैनल मोदी के प्रति अपनी निष्ठा का प्रदर्शन करने से भी नहीं चूके। न्यूज24 ने 25 अप्रैल की कवरेज में हेडिंग दिया-नेपाल के रक्षक मोदी। इंडिया न्यूज भी यह बताने में नहीं चूका कि नरेंद्र मोदी की पशुपति नाथ के साथ कितनी आस्था है। तथ्यों के साथ भी मनमानी हुई। 25 अप्रैल को रात नौ बजे के बुलेटिन में एबीपी न्यूज ने मीरा पीक को नेपाल की सबसे ऊंची चोटी बताया। पता नहीं, माउंट एवरेस्ट कहां है ? ”आज तक“ ने हिमालय को सिस्मिक जोन-4 में बता दिया, जबकि यह सबसे खतरनाक जोन-5 में है।

26 अप्रैल की कवरेज में चैनलों ने इस बात पर खासा जोर लगाया कि किस प्रकार दूसरों से बेहतर हैं। एबीपी न्यूज ने सबसे बड़ी कवरेज का दावा किया। मोतिहारी, बिहार से रिपोर्ट कर रहे इस चैनल के रिपोर्टर अंकित गुप्ता ने बताया कि गांवों के लोग दो दिन से घरों के बाहर हैं। फुटेज देखने से साफ पता चल रहा था कि ग्रामीणों को जबरन इकट्ठा किया गया है। टीवी18 नेटवर्क ने नेपाल में सबसे बड़ी टीम भेजने का दावा परोसा और ”आज तक“ भी ऐसे ही दावे का शिकार हो गया। सारे चैनल ग्राउंड जीरो पर होने का दावा कर रहे थे, लेकिन वे भूल गए कि काठमांडू 9/11 की तरह सपाट जमीन में तब्दील नहीं हुआ है। यहां ग्राउंड पर बहुत कुछ खड़ा हुआ है, इसलिए ये ग्राउंड जीरो तो नहीं ही है!

न्यज24 ने तो ये तक बता दिया-नेपाल में हजारों लोग मौत के मुंह में समा चुके हैं। चैनल ने दर्शकों पर छोड़ दिया कि वे चाहे तो इस संख्या को ढाई हजार मान लें या 99 हजार! ”आज तक“ के प्राइम टाइम बुलेटिनों में अंजना ओम कश्यप हास्यास्पद होने की हद तक नाटकीय दिख रही थीं। एक्सपट्र्स से वे ऐसे अंदाज में सवाल पूछ रही थीं, जैसे घर के भीतर सास-बहु टाइप बातें हो रही हों। मसलन, बार-बार कांप रही है धरती, मगर क्यूं ? ज्यादातर बातों का वे खुद ही जवाब भी दे रही थीं। कई चैनलों पर बुलेटिनों के टाइटल विशेषणों से बोझिल थे। ”आज तक“ ने कहा-नेपाल में धरती का गुस्सा! ये चैनल भूकंप को महातबाही और महाभूकंप भी बताता रहा। जैसे, ‘महा‘ लगाए बिना पूरी घटना ठीक से समझ नहीं आएगी। इसी चैनल ने एक और चिंताजनक प्रयोग किया-कांठमांडु का कब्रगाह! ठसी दौरान आईबीएन7 गुहार लगा रहा था-अब थम जाओ भूकंप!

26 अप्रैल की रात के बुलेटिनों में चैनलों ने अफवाहों को मोहरा बना लिया। इंडिया न्यूज तथाकथित उलटा चांद दिखाता रहा। इसे अफवाह भी बताता रहा और कथाकथित उलटे चांद को स्क्रीन से ओझल भी नहीं होने दिया। एबीपी न्यूज ने भी ठीक यही किया। जो बातें अफवाहों में हैं, उन्हें बार-बार दोहराया गया और साथ ही उपदेश भी दिया गया कि अफवाहों पर ध्यान न दें। अफवाहों के साथ-साथ चैनल ऐसे लोगों को ढूंढते रहे जो वैज्ञानिक हों, लेकिन भविष्यवाणी करने को तैयार हों।

…जारी…

लेखक सुशील उपाध्याय पत्रकार रहे हैं. इन दिनों अध्यापन के कार्य से जुड़े हुए हैं और हरिद्वार में पदस्थ हैं.


सुशील का लिखा ये भी पढ़ सकते हैं…

हरिद्वार का सच : इतने सारे बड़े बड़े अरबपति खरबपति बाबा और ठोस काम एक भी नहीं… भगवा पहन कर बस हवा हवाई!

xxx

प्रताप सोमवंशी ने रिपोर्टरों को बुलाकर कहा- जिन्हें विचार की राजनीति करनी है वे मीडिया छोड़ दें

xxx

मैंने पहली बार अमर उजाला का कंपनी रूप देखा था

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

हरिद्वार का सच : इतने सारे बड़े बड़े अरबपति खरबपति बाबा और ठोस काम एक भी नहीं… भगवा पहन कर बस हवा हवाई!

(सुशील उपाध्याय)

Sushil Upadhyay : मेरे ऐबी-मन की बेचैनी सुनिए…. मैं धर्मनगरी हरिद्वार में रहता हूं, लेकिन मेरे विचार इस शहर के चरित्र से भिन्न हैं। कोशिश करके देख ली, कोई जुड़ाव नहीं बन पाता। ये आचार्यों, धर्माचार्यों, शंकराचार्यों, परमाध्यक्षों, महंतों, श्रीमहंतों, मंडलेश्वरों, महामंडलेश्वरों, आचार्य महामंडलेश्वरों, मठाचार्यों, स्वामियों, महाराजों, संतों, श्रीसंतों, बाबाओं, नागाओं, उदासीनों, विरक्तों, साधुओं की नगरी है। आप चाहें तो इस सूची में भिखारियों को भी जोड़ सकते हैं। हर आठवें-पंद्रहवें दिन यह शहर किसी न किसी धार्मिक मेले, ठेले, सत्संग, धर्मोत्सव, जन्मोत्सव, वार्षिकोत्सव, अवतरण-दिवस और संत-महाप्रयाण का साक्षी बनता रहता है। सुबह-सवेरे शंख-ध्वनि, घंटे-घडि़यालों और यज्ञ-हवियों की धूम से एक ऐसा माहौल बनता है कि मेरे जैसा सांसारी अपनी अपात्रता पर जार-जार रोता है।

मन को खूब रोकता-टोकता और बरजता हूं कि धर्म के मामलों से अपने ऐबी-चरित्र को अलग रखना चाहिए, पर जेहन में कोई न कोई सवाल उठता रहा है और बेचैनी बढ़ती जाती है। ताजा सवाल ये है कि जिस शहर में पद्मभूषण स्वामी सत्यमित्रानंद, पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वामी चिन्मयानंद, एक और पूर्व केंद्रीय मंत्री सतपाल महाराज, आचार्य महामंडलेश्वर अवधेशानंद गिरि, शंकराचार्य राजराजेश्वराश्रम जैसे संत रहते हों, पायलट बाबा जैसे प्रभावशाली लोगों का ठिकाना यहां हो, वो शहर जौलीग्रांट और एसजीआरआर जैसे एक अदद मेडिकल काॅलेज के लिए तरस रहा है। इन दोनों संस्थाओं का नाम इसलिए लिया, क्योंकि इन मेडिकल कालेजों की स्थापना संतों द्वारा की गई है।

मेरे खुराफाती दिगाम में लगातार यह बात बनी हुई है कि तमाम दिग्गज संतों ने हरिद्वार के शैक्षिक-बौद्धिक, सामाजिक-आर्थिक जीवन में क्या योगदान किया है ? लोग कह सकते हैं कि संतों का काम तो धार्मिक-आध्यात्मिक है! मैं, इस तर्क को स्वीकार करते खुद से पूछता हूं कि क्या करोड़ों रुपये का आश्रम खड़ा करना और लाखों रुपये कीमत की गाड़ी का इस्तेमाल करना भी धार्मिक-आध्यामिक गतिविधि है ? मेरे पास यह अधिकार नहीं कि मैं सतों के निजी जीवन और ऐश्वर्य पर कोई टिप्पणी करूं, लेकिन शहर का बाशिंदा होने के नाते ये जानने का हक तो है कि वे स्वामी श्रद्धानंद और श्रीराम शर्मा आचार्य-प्रणव पंडया की तरह कोई बड़ी शैक्षिक संस्था ही इस शहर को क्यों नहीं दे जाते! कोई मेडिकल यूनिसर्सिटी, कोई टेक्नीकल यूनिवर्सिटी, कोई इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी या कोई वैदिक यूनिवर्सिटी ही खड़ी करके दिखा देते। साहित्य, संस्कृति के क्षेत्र में कोई अंतरराष्ट्रीय स्तर का पुरस्कार-सम्मान आरंभ कर देते या किसी विदेशी भक्त को प्रेरित कर देते कि हरिद्वार में कुछ अनूठा काम कर दे ताकि लोगों की जिंदगी कुछ बेहतर हो सके।

इस प्रसंग में बाबा रामदेव का नाम लेना कई लोगों को नहीं रुचेगा, उन पर तमाम सवाल खड़े किए जा सकते हैं, लेकिन एक बात के लिए तो उनकी तारीफ की जानी चाहिए कि उन्होंने योग और आयुर्वेद को इंडस्ट्री में बदल कर दिखा दिया। वे महज प्रवचनों तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने करके दिखाया, कोई और करके दिखाएगा! बीते दिन स्वामी सत्यमित्रानंद ने अपनी विरासत स्वामी अवधेशानंद गिरि को सौंप दी और इस विरासत को संभालने के साथ ही स्वामी अवधेशानंद गिरि ने देश भर में 300 भारत माता मंदिर खोलने का ऐलान कर दिया। कितना अच्छा होता ये वे पिछड़े इलाकों में भारत माता के नाम पर 300 विद्या मंदिर खोलते, 300 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र खोलते। इन स्कूलों और अस्पतालों से भारत माता को ज्यादा राहत मिलती, क्योंकि भारत माता पत्थर की मूर्तियों में नहीं, उन लोगों में है जिन्हें इस वक्त शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की सबसे अधिक जरूरत है।

और ये असंभव काम नहीं है, देहरादून के श्री गुरु राम राय दरबार ने पिछली आधी सदी में देश भर में कई सौ इंटर काॅलेज खोले और इन्हें संचालित करके भी दिखाया। भक्त लोग गुस्ताखी माफ करें, हरिद्वार में अक्सर भक्तों का मेला लगाने वाले सतपाल महाराज ने हरिद्वार को क्या दिया है ? इससे बेहतर तो उनके भाई भोले महाराज है जो एक बड़े आई-हास्पिटल की शुरुआत कर चुके हैं। संत और समर्थक अक्सर गिनाते हैं-संस्कृत पाठशाला शुरू की, धर्मार्थ डिस्पैंसरी आरंभ की, पुस्तकालय आरंभ किया, गरीबों की मदद की, कन्याओं का विवाह कराया और बहुत कुछ! माफ कीजिएगा, इनमें कोई भी ठोस काम नहीं है ये हवा-हवाई हैं! जिन्होंने भगवा पहन लिया है, उन्हें ऊपर वाले को कोई हिसाब नहीं देना होगा या नहीं?

लेखक सुशील उपाध्याय पत्रकार रहे हैं और इन दिनों हरिद्वार में रहते हुए अध्यापन के कार्य से जुड़े हैं. उन्होंने उपरोक्त बातें फेसबुक पर प्रकाशित की हैं.


सुशील उपाध्याय का लिखा ये भी पढ़ सकते हैं…

प्रताप सोमवंशी ने रिपोर्टरों को बुलाकर कहा- जिन्हें विचार की राजनीति करनी है वे मीडिया छोड़ दें

xxx

मैंने पहली बार अमर उजाला का कंपनी रूप देखा था

xxx

सूर्यकांत द्विवेदी संपादक के तौर पर मेरे साथ ऐसा बर्ताव करेंगे, ये समझ से परे था

xxx

मीडिया का कामचोर आदमी भी सरकारी संस्था के सबसे कर्मठ व्यक्ति से अधिक काम करता है

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

प्रताप सोमवंशी ने रिपोर्टरों को बुलाकर कहा- जिन्हें विचार की राजनीति करनी है वे मीडिया छोड़ दें (किस्से अखबारों के : पार्ट-चार)

(सुशील उपाध्याय)


 

मीडिया में विचार की कद्र रही है, ऐसा हमेशा से माना जाता रहा है। इस धंधे में विचार कोई बुरी चीज नहीं रही। एक दौर रहा है जब पूंजीवादी मालिक अपनी दुनिया में रहते थे और अखबारों में वामपंथी रुझान के पत्रकार, संपादक अपना काम करते रहते थे। नई आर्थिक नीतियों के अमल में आने के बाद संभवतः पहली बार मालिकों का ध्यान विचार की तरफ गया। ये दक्षिणपंथ के उभार का दौर था। मालिकों और दक्षिणपंथ के बीच के गठजोड़ ने प्रारंभिक स्तर पर विचार के खिलाफ माहौल बनाना शुरु किया। इसके बाद धीरे-धीरे उन लोगों को दूर किया जाने लगा जो किसी विचार, खासतौर से प्रगतिशील विचार के साथ जुड़े थे। उन्हें सिस्टम के लिए खतरे के तौर पर चिह्नित किया जाने लगा। ढके-छिपे तौर पर पत्रकारों की पृष्ठभूमि की पड़ताल होने लगी। जो कभी जवानी के दिनों में किसी वामपंथी या प्रगतिशील छात्र संगठन से जुड़े रहे थे, उनकी पहचान होने लगी।

अयोध्या मंदिर आंदोलन के दौर में दक्षिणपंथी पत्रकारों की बड़ी संख्या मीडिया में आ गई थी और अखबारों का चरित्र बदलने का दौर आरंभ हो गया था। इसमें सरकारें भी भूमिका निभा रही थी। कांग्रेस सरकारें आमतौर से पत्रकारों को उनकी दुनिया में जीने के लिए छोड़कर रखती थी, लेकिन भाजपा का जोर उनके नियमन पर था। भाजपा इस काम को कर भी सकती थी, खासतौर से उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य में। उत्तराखंड में भाजपा के सत्ता में आने पर भुवनचंद्र खंडूड़ी मुख्यमंत्री बने तो उनके मीडिया सलाहकारों ने परोक्ष मीडिया नियमन पर जोर दिया। इसके लिए अचानक ही एक आधार भी मिल गया। पायनियर के पत्रकार प्रशांत राही को माआवादी गतिविधियों में शामिल होने के शक में गिरफ्तार किया गया और सरकारी तंत्र को यह प्रचार करने का अवसर प्राप्त हो गया कि माओवादी मीडिया में घुस आए हैं।

उस समय उत्तराखंड के पत्रकारों में यह आम चर्चा थी कि सरकार उन लोगों के बारे में छिपे तौर पर पड़ताल करा रही है जो किसी वामपंथी संगठन से जुड़े हैं या जुड़े हुए थे। किसी की पहचान के मामले में खबरों तक को आधार बनाया जाने लगा। उन दिनों अमर उजाला में अरविंद शेखर ने एक ब्रेकिंग-स्टोरी की जो ऑल एडिशन छपी थी। ये स्टोरी अतिवादी कम्युनिस्ट संगठनों के एकीकरण के जरिए अखिल भारतीय पार्टी बनाने को लेकर थी। तब एमसीसी के साथ दो अन्य संगठनों का विलय हुआ था। इस खबर के छपने के बाद अरविंद शेखर को काफी समय तक निशाने पर रखा गया। असल में सत्ता में बैठे लोग मीडियाकर्मी की लिखने की आजादी, विचार की आजादी को किसी पार्टी या दल विशेष के लिए कार्य करने के तौर पर परिभाषित कर रहे थे।

उन्हीं दिनों डीएवी पीजी कॉलेज में एक मामला हुआ। वामपंथी छात्र संगठनों ने मोर्चा बनाकर अभाविप के खिलाफ चुनाव लड़ा, चूंकि कॉलेज के प्राचार्य भाजपा के सक्रिय नेता थे इसलिए वे इस स्थिति से सहज नहीं थे। कॉलेज में छात्र राजनीति का संघर्ष वामपंथ और दक्षिणपंथ के बीच तय हो गया। उन दिनों जो खबरें छपी, उन्हें लेकर भाजपा के लोग सहज नहीं थे। अमर उजाला के तत्कालीन संपादक प्रताप सोमवंशी जी तक इस बारे में शिकायत पहुंची और उन्होंने रिपोर्टरों को बुलाकर कहा कि जिन्हें विचार की राजनीति करनी है वे मीडिया छोड़ दें। जबकि, प्रताप सोमवंशी जी खुद प्रगतिशील विचार से जुड़े रहे थे। असल में, ये पूरा वक्त संतुलन के संघर्ष का वक्त था। अयोध्या आंदोलन के पहले तक अमर उजाला के भीतर कोई बड़ा दक्षिणपंथी समूह नहीं था, लेकिन इसके बाद के दस सालों में विचार का संतुलन गायब हुआ और दक्षिणपंथी झुकाव साफ-साफ दिखने लगा था। मालिकों ने अपने संपादकों के जरिये सरकारों से सीधे रिश्ते बना लिए थे और उत्तराखंड में अखबारों को बिजनेस देने वाली सबसे बड़ी संस्था भी सरकार ही थी, इसलिए सरकार के संकेतों के अनुरूप ही ज्यादातर चीजें तय हो रही थी।

धीरे-धीरे ऐसी स्थिति आ गई थी जब अखबार के पूरे चरित्र पर इस बात का फर्क पड़ना भी बंद हो गया था कि अखबार का संपादक कौन है। दूसरे अखबारों के साथ-साथ अमर उजाला भी एक प्रॉडक्ट बनने की ओर आगे बढ़ चला था। जैसा कि कुछ बरस पहले नवभारत टाम्इस के मालिक समीर जैन ने अपने अखबार को प्रॉक्डट घोषित किया था, उसी राह पर सब चल पड़े थे। लेकिन, इस बंद दुनिया के बाहर पत्रकारों की एक और दुनिया थी जो किसी मालिक की मोहताज नहीं थी और जिसका कोई सरकार नियमन नहीं कर सकती थी। इसका नजारा प्रशांत राही की गिरफ्तारी के कुछ समय बाद हुई मुख्यमंत्री भुवनचंद्र खंडूड़ी की प्रेस वार्ता में देखने को मिला। सरकार की उपलब्धियां गिनाने के लिए बुलाई गई इस पत्रकार वार्ता में पूरे प्रदेश के दिग्गज पत्रकार जमा थे। मुख्यमंत्री आवास में पत्रकार वार्ता शुरु हुई।

राजीव लोचन शाह ने सवाल दागा कि सरकार ने प्रदेश में किन किबातों को प्रतिबंधित किया है, खासतौर से वामपंथ से जुड़ी किताबों को लेकर। ताकि, पत्रकारों को पता चल सके कि उन्हें अपनी निजी लाइब्रेरी में कौन-सी किताबें रखनी हैं और कौन-सी नष्ट कर देनी हैं! मौके पर मौजूद मुख्य सचिव और डीजीपी ने ऐसी किसी सूची से इनकार किया। इसके बाद राजीव नयन बहुगुणा और जयसिंह रावत ने मोर्चा संभाल लिया। उनके साथ राजू गुसाईं और दूसरे प्रगतिशील पत्रकार भी जुड़ गए। कुछ ही देर में पत्रकार वार्ता का सिराजा बिखर गया और मुख्यमंत्री उठकर चले गए। उन दिनों प्रो. देवेंद्र भसीन सरकार की ओर से मीडिया को संभाल रहे थे, लेकिन विचार का मुद्दा का इतना बड़ा साबित हुआ कि प्रो. भसीन भी कुछ नहीं कर सके।

पत्रकार मोटे तौर पर दो गुटों पर बंट गए थे। एक वे जिन्हें सरकार संदिग्ध मान रही थी ओर दूसरे वे जो वक्त की नजाकत भांपते हुए सरकार के साथ हो लिए थे। सरकार के साथ खड़े होने वालों की संख्या काफी बड़ी थी। इनमें कुछ ऐसे नाम भी थे जो पूर्व में प्रगतिशील विचारों के वाहक माने जाते रहे थे। इस घटना के बाद पत्रकारों, खासतौर से नए पत्रकारों को इस बात का संबल जरूर मिला कि उनके पीछे सीनियर पत्रकार भी खड़े हैं। यूं भी विचार को सामने रखकर जब बात करते हैं तो उत्तराखंड काफी आगे खड़ा नजर आता है। भले ही राज्य में भाजपा की दो-दो सरकारें और चार-चार मुख्यमंत्री रह चुके हैं, लेकिन प्रदेश की पत्रकारिता में विचार का सवाल अपने स्थान पर मजबूती के साथ जिंदा रहा।

भाजपा की सरकारों के दौर में पत्रकारों के लिहाज से सबसे मुश्किल दौर वही था जब खंडूड़ी मुख्यमंत्री थे, रमेश पोखरियाल निशंक के आने के बाद एक हद तक स्थितियां बदली क्योंकि निशंक निजी पसंद-नापसंद के आधार पर व्यक्तियों का चयन करते थे, सापेक्षिक तौर पर वे उदार भी थे। ऐसा ही एक किस्सा अमर उजाला में मेरे इंटरव्यू के साथ भी जुड़ा हुआ है। उन दिनों राधेश्याम शुक्ल जी अमर उजाला मेरठ में संपादकीय पृष्ठ के इंचार्ज थे। वे घोर ब्राह्मणवादी और पुराने विचारों के वाहक थे। मैं उनके कक्ष में इंटरव्यू के लिए हाजिर हुआ, मुझे उनके वैचारिक धरातल के बारे में कुछ भी जानकारी नहीं थी। उस साल उत्तर कोरिया के राष्ट्र-प्रमुख किम इल सुंग की मौत हुई थी और कम्युनिस्ट पार्टी उनके बेटे किम इल जोंग को उत्तराधिकारी घोषित किया था। मुझ से पहला सवाल इसी बारे में पूछा गया। मेरे उत्तर से शुक्ल जी खिन्न हुए और मुझे पांच मिनट में ही चलता कर दिया। शुक्ल जी ने मुझे रिजेक्ट कर दिया था, लेकिन वक्त कुछ और करने जा रहा था।

फर्जी इंटरव्यू बाइलाइन और असली……

अगर आप ये सोचते हैं कि रिपोर्टर हमेशा ताजी खबर परोसते हैं तो आपका सोचना गलत है। खबरों की दुनिया में कई तरह के फर्जीवाड़े हैं। ऐसा नहीं है कि रिपोर्टर इरादतन या साजिशन खबरों में फर्जीवाड़ा करते हैं, असल में हर रोज ताजी खबर लाने का दबाव इतना अधिक होता है कि पुराने मामलों को कुछ अंतराल के बाद नए छौंक के साथ प्रस्तुत किया जाना मजबूरी बन जाता है। कई बार किसी नामी हस्ती से बातचीत और साक्षात्कार में पुरानी सामग्री को लपेट लिया जाता है। हिंदी अखबारों में हरेक रिपोर्टर से यह उम्मीद की जाती है वह अपनी बीट की दैनिंदन गतिविधियों, कार्यक्रमों के अलावा ऐसी खबर भी निकालकर लाएगा जो दूसरे अखबारों के किसी रिपोर्टर के पास न हो। ऐसे लोगों के इंटरव्यू भी कर लेगा जो आसानी से संभव न हों। ऐसा हर रोज संभव नहीं होता, लेकिन जब कोई ऐसा नहीं कर पाता तो कुछ समय बाद उसकी गिनती नाकारा रिपोर्टरों में होेने लगती है। नामी लोगों के छोटी जगहों पर आगमन के वक्त आमतौर से खबरों, साक्षात्कारों में काफी गोलमाल किया जाता है। पाठक को इस गोलमाल के बारे में कभी पता नहीं चलता।

मेरे पत्रकारीय-कर्म के दौरान भी ऐसे कई वाकये हैं, तब मैंने अपने संपादकों के साथ पाठकों को भी ठगा। वैसे, इसे ठगना भी नहीं कह सकते, जो कुछ मैंने खबर के तौर पर परोसा था वो सब कुछ पुराना था, केवल पैकेजिंग नई थी। साल 1999 में रुड़की आईआईटी के दीक्षांत समारोह में डा. एपीजे अब्दुल कलाम मुख्य अतिथि के तौर पर आए थे। उस वक्त भारत परमाणु परीक्षण कर चुका था। डा. कलाम पूरे देश में हीरो बन चुके थे। वे प्रधानमंत्री के रक्षा सलाहकार भी थे। पोखरण परमाणु विस्फोट के बाद हर पत्रकार उनके इंटरव्यू के लिए लालायित रहता था, मेरे जैसे अदने पत्रकार के लिए तो उनके इंटरव्यू के बारे में सोचना भी प्रायः असंभव ही था। दीक्षांत समारोह के बाद डा. एपीजे अब्दुल कलाम ने छात्रों से मिलने का निर्णय लिया। दीक्षांत भवन के पास बने पांडाल में उन्हें ले जाया गया, मैं भी धीरे से साथ हो लिया। छात्रों से संवाद शुरु हुआ। मैंने भी हिम्मत की-सर पोखरन वाज रियली फॉर पीस ? वे बोले, व्हाट डू यू थिंक अबाउट महाभारता ? अचानक उन्हें लगा कि मैं यूनिवर्सिटी का छात्र नहीं हूं। उन्हें मेरे अंग्रेजी के अज्ञान के कारण ऐसा लगा होगा। मैं चुप रहा, खिसियानी से हंसी हंस दी। उन्होंने तो कुछ नहीं कहा, लेकिन कुछ ही देर सुरक्षा वाले और आईआईटी के अधिकारी मुझे पांडाल से बाहर कर चुके थे। मेरा काम हो गया था।

ऑफिस आकर मैंने डा. एपीजे अब्दुल कलाम के पूर्व में छपे इंटरव्यू इंटरनेट पर देखे, कुछ इधर से उठाया, कुछ उधर से और जो जवाब डा. कलाम ने दिया था वो अपने पास था ही, एक बढ़िया स्टोरी बन गई और पहले पेज पर नाम के साथ तन भी गई। पर, मन का चोर कभी-कभार परेशान करता रहा। मन के इस चोर से वर्ष 2004 में मुक्ति मिली। उस साल देहरादून में राष्ट्रीय नेहरू बाल विज्ञान कांग्रेस का आयोजन किया गया था। डा. एपीजे अब्दुल कलाम इस कान्फ्रेंस में मुख्य अतिथि के तौर पर आए थे। तब वे देश के राष्ट्रपति थे। मैं निर्धारित समय से पहले ही कवरेज स्थल पर पहुंच गया था। मेरे एक अधिकारी मित्र ने बताया था कि डा. कलाम राज्यों के पांडालों पर जाकर वहां के शिक्षकों छात्र-छात्राओं से बात करेंगे। मैं, झारखंड के पांडाल के किनारे पर जाकर खड़ा हो गया। मैंने, झारखंड के शिक्षकों को इस बात के लिए मना लिया कि वे मुझे अंदर की तरफ खड़ा होने दें ताकि मैं भी डा. कलाम से रूबरू हो सकूं। शिक्षकों ने मुझे इस उम्मीद में अंदर खड़ा कर लिया कि जब डा. कलाम अंग्रेजी में बच्चों से बात करें तो शायद मैं उनकी मदद कर सकूंगा। डा. कलाम आए, सभी से परिचय हुआ। अचानक डा. कलाम बच्चों से बात करने लगे और मैं हक्काबक्का रह गया। वजह, ये थी कि वे अच्छी-भली हिंदी में बात कर रहे थे। जबकि, इससे पहले उन्होंने सार्वजनिक जगहों पर शायद ही कभी हिंदी बोली हो। मैंने भी एक-दो साल पूछ लिए, उन्हांेने मेरे जिले और स्कूल का नाम पूछा तो इस बार मैंने सच बताया कि मैं शिक्षक नहीं, पत्रकार हूं।

आपसे बात करने की उम्मीद में शिक्षकों-छात्रों के साथ खड़ा हो गया। वे मुस्कुराये और मुझे अपने साथ ले लिया। हम लोग पूरा पांडाल साथ घूमे। उस दिन मैंने खुद को काफी बड़ा आदमी महसूस किया। मुझे लगा मेरा सीना इतना फूल गया है कि मेरी शर्ट फट जाएगी, मैंने अपने आकार को इतना बड़ा महसूस किया कि मेरे मरियल स्कूटर की सीट छोटी दिखने लगी। खैर, पूरे आवेग के साथ मैं अमर उजाला कार्यालय पहुंचा। संपादक प्रताप सोमवंशी जी को पूरा किस्सा बताया, उन्होंने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त किए बिना मुझे सुना। मैंने, पहले पेज के लिए दो स्टोरी की। एक टॉप-बॉक्स और दूसरी बॉटम। इस रिपोर्टिंग के लिए प्रतात जी मेरे साथी रिपोर्टरों हर्षवर्धन त्रिपाठी और प्रमोद कुमार को भेजना चाह रहे थे, लेकिन मेरी बीट का मामला होने के चलते उन्होंने मुझे कवरेज के लिए जाने दिया। मैंने, अपनी तरफ से बेहतरीन कवरेज की थी, लेकिन अगले दिन अखबार देखकर मन बुझ गया। मेरी किसी भी स्टोरी पर बाइलाइन नहीं दी गई थी। उस दिन सोचता रहा जिस फर्जी दिन ढंग से स्टोरी की थी, तब पहले पेज पर ऑल-एडिशन बाइलाइन मिली थी और जब ईमानदारी से काम किया तो संपादक ने नाम तक नहीं जाने दिया।

ऐसी घटनाएं पत्रकारों के साथ अक्सर होती रहती हैं। इन तथाकथित फर्जीवाड़े के पीछे नाम पाने और पहचान हासिल करने का दबाव भी रहता है। मैंने, ऐसा ही फर्जीवाड़ा एक बार दलाईलामा के साक्षात्कार को लेकर भी किया। वे भी एक समारोह में आईआईटी रुड़की आए थे। उनके व्याख्यान के बाद सभी श्रोताओं-दर्शकों को सवाल पूछने की अनुमति दी गई। पत्रकारों में से राष्ट्रीय सहारा के मुकेश यादव और मैंने सवाल पूछे। लेकिन, उन्होंने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया। मेरा सवाल ये था कि जब चीन ने तिब्बत को सब कुछ दिया है तो वे चीन का विरोध क्यों करते हैं ? अलबत्ता, मुकेश यादव के सवाल का लंबा उत्तर दिया, मुकेश का सवाल दलाई लामा के पुनर्जन्म को लेकर था। कुछ प्रोफेसरों और छात्रों ने भी सवाल किए। मैंने, सारे उत्तरों को प्रश्न-उत्तर के रूप में संयोजित किया और अपने नाम से छपने भी भेज दिया। उस छपे हुए इंटरव्यू को आज भी देखता हूं तो अजीब-सा ग्लानि का भाव होता है। लेकिन, उस समारोह का एक सुखद अनुभव भी याद है। जैसे ही दलाई लामा मंच से नीचे उतरे तो मैं उनके गुजरने के रास्ते में खड़ा हो गया। अचानक मैंने उनका नाम लेकर पुकारा-महामहिम दलाई लामा। वे ठिठके और मैंने हाथ बढ़ाया और उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया। वे मेरा हाथ पकड़े रहे और दूसरे लोगों से बात करते रहे, मैंने इतना स्नेहिल, सुदीप्त, तेजस्वी-ओजस्वी चेहरा इससे पहले नहीं देखा था। कभी दलाई लामा से इस तरह मिल पाने की बात तो कल्पनातीत थी। मैं, इस घटना के 15 साल बाद भी दलाई लामा के उस स्पर्श को प्रायः वैसा ही महसूस करता हूं। बाद के सालों में ऐसी और भी घटनाएं हुईं।

सुशील उपाध्याय ने उपरोक्त संस्मरण फेसबुक पर लिखा है. सुशील ने लंबे समय तक कई अखबारों में विभिन्न पदों पर काम करने के बाद अब शिक्षण का क्षेत्र अपना लिया है. वे इन दिनों सीनियर असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में हरिद्वार के उत्तराखंड संस्कृत यूनिवर्सिटी में कार्यरत हैं. सुशील से संपर्क gurujisushil@gmail.com के जरिए कर सकते हैं. इसके पहले का पार्ट पढ़ने के लिए इस शीर्षक पर क्लिक करें….

मैंने पहली बार अमर उजाला का कंपनी रूप देखा था (किस्से अखबारों के : पार्ट-तीन)

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मैंने पहली बार अमर उजाला का कंपनी रूप देखा था (किस्से अखबारों के : पार्ट-तीन)

(सुशील उपाध्याय)


भुवनेश जखमोला एक सामान्य परिवार से आया हुआ आम लड़का था। वैसा ही, जैसे कि हम बाकी लोग थे। वो भी उन्हीं सपनों के साथ मीडिया में आया था, जिनके पूरा होने पर सारी दुनिया बदल जाती। कहीं कोई शोषण, उत्पीड़न, गैरबराबरी न रहती। लेकिन, न ऐसा हुआ और न होना था। भुवनेश ने नोएडा में अमर उजाला ज्वाइन किया था। 2005 में उसे देहरादून भेज दिया गया, कुछ महीने बाद भुवनेश को ऋषिकेश जाकर काम करने को कहा गया। उस वक्त भुवनेश की शादी हो चुकी थी। अमर उजाला में काम करते हुए उसे लगभग पांच साल हो गए थे, उसे तब तक पे-रोल पर नहीं लिया गया था। पांच हजार रुपये के मानदेय में वो अपनी नई गृहस्थी को जमाने और चलाने की कोशिश कर रहा था। उसे उम्मीद थी कि एक दिन वह अपने संघर्षाें से पार पा लेगा और जिंदगी की गाड़ी पटरी पर आ जाएगा, लेकिन होना कुछ और था।

देहरादून में ज्यादातर रिपोर्टर अपनी मीटिंग्स के बाद प्रेस क्लब की राह पकड़ लेते थे। प्रेस क्लब में ज्यादातर सूचनाएं मिल जाती थी और दोपहर में क्लब की कैंटीन में दाल-भात खाने के बाद रिपोर्टर अपनी बीट में सूत्रों को टटोल लेते थे। इसकी एक वजह यह भी थी कि कोई भी अधिकारी, मंत्री-संतरी सुबह-सुबह पत्रकारों का मुंह देखना नहीं चाहता। इसलिए पत्रकारों के लिए दोपहर बाद का वक्त ही सही होता था। मैं अपने साथी पत्रकारों के साथ प्रेस क्लब में था, तभी जितेंद्र अंथवाल का फोन आया और वो बताते रो पड़ा कि भुवनेश जखमोला की मौत हो गई है। कहां, कैसे, कब… मैं सन्न था और कुछ कहने-समझने की स्थिति में नहीं था।

इसके बाद तय हुआ कि कुछ पत्रकार ऋषिकेश जाएंगे और कुछ अमर उजाला कार्यालय जाकर संपादक से बात करेंगे। उस दिन भुवनेश एक दूसरे रिपोर्टर के साथ रायवाला में किसी घटना की रिपोर्टिंग के लिए जा रहा था। पीछे से किसी ट्रक ने टक्कर मार दी और मौके पर ही उसकी मौत हो गई। उस वक्त भुवनेश की शादी को दो साल भी नहीं हुए थे और उसकी पत्नी मधु कुछ महीने बाद मां बनने वाली थी। भुवनेश चला गया और अपने पीछे ऐसे सवाल छोड़ गया जिनका कोई सीधा उत्तर आज भी किसी के पास नहीं है। भुवनेश के अंतिम संस्कार के बाद जब हम लोग अमर उजाला पहुंचे तो उम्मीद कर रहे थे कि संस्थान की ओर से किसी मुआवजे की घोषणा होगा और भुवनेश की पत्नी को कंपनी में नौकरी दी जाएगी। लेकिन, वहां कुछ दूसरी सूचनाएं हमारा इंतजार कर रही थी। हम लोगों को बताया गया कि भुवनेश अमर उजाला का कर्मचारी नहीं था, वह शौकिया तौर पर काम कर रहा था, उसका काम भी अंशकालिक था, इसलिए अमर उजाला का उससे कोई वास्ता नहीं है! और न ही उस दिन वह किसी घटना की कवरेज के लिए एसाइन किया गया था।

इससे भी बड़ी दुखद बात यह थी कि अमर उजाला ने भुवनेश की मौत पर जो खबर छापी, उसमें उसे एक पत्रकार बताया गया था, कहीं दूर तक इस बात का उल्लेख नहीं था कि उसका अमर उजाला से कोई रिश्ता था। जबकि, नंगा सच यही था कि रिपोर्टिंग के लिए जाते वक्त मारा गया था। हम लोग गुस्से में भरे बैठे थे। जितेंद्र अंथवाल, विपिन बनियाल, सुधाकर भट्ट, देवेंद्र नेगी और मैंने संपादक से मिलकर स्थिति साफ करने को कहा। संपादक एलएन शीतल जी ने कहा-आप लोग अपना काम करो, कंपनी नहीं मानती कि भुवनेश उनका कर्मचारी था। हम पांचों ठगे हुए-से खड़े थे, मैंने पर्सनल लेवल पर शीतल जी से कहा-सर, आप सच में कुछ नहीं कर पाएंगे। शीतल जी ने कहा-कर सकता तो तुम्हारी इतनी ना सुनता। हम लोग समझ गए थे कि दिल्ली-मेरठ के निर्देश यही थे कि भुवनेश से अमर उजाला का कोई रिश्ता नहीं था। मामला यही खत्म नहीं हुआ। जितेंद्र अंथवाल और विपिन बनियाल की पहल पर यह कोशिश शुरु हुई कि सभी कर्मचारी एक दिन का वेतन एकत्र करके भुवनेश की पत्नी की मदद करेंगे। लेकिन, इससे भी इनकार कर दिया गया। तत्कालीन महाप्रबंधक अनिल शर्मा ने कहा कि जब तक उच्च स्तर से आदेश नहीं होंगे, वे एक दिन का वेतन काटकर इकट्ठा करने का आदेश नहीं देंगे। जबकि, कर्मचारी लिखित में देने को तैयार था कि हमारा एक दिन का वेतन काटकर भुवनेश के परिवार को दिया जाए। पूर्व में हमेशा ऐसा होता आया था। लेकिन, इस बार ऐसा नहीं हुआ।
हम सभी इस कदर आहत थे कि यदि हमारे पास कोई विकल्प होता तो हम उसी दिन अमर उजाला छोड़ देते। लेकिन, विकल्प नहीं था इसलिए मरघट के सन्नाटे जैसे माहौल में काम करते रहे। बाद में प्रेस क्लब के कुछ पदाधिकारियों ने और अमर उजाला के कुछ साथियों ने थोड़ी-सी राशि जुटाकर भुवनेश के परिवार को दी। इस मामले में प्रेस क्लब ने संवदेशील भूमिका निभाई, जबकि उस वक्त भुवनेश प्रेस क्लनब का सदस्य नहीं था, लेकिन तब भी उसके परिवार को आर्थिक मदद दिलाई गई।

मैंने पहली बार अमर उजाला का कंपनी रूप देखा था। जब 1994 में मैंने ज्वाइन किया था तो अमर उजाला एक परिवार था। उस वक्त हिंदी बेल्ट के क्षेत्रीय अखबारों में अकेला ऐसा अखबार था जो अपने कर्मचारियों की किसी भी हद तक जाकर मदद करता था। तब, किसी के पे-रोल पर होने या अंशकालिक होने से कोई फर्क नहीं पड़ता था। ऐसे तमाम किस्से थे, जब संस्थान ने किसी भी नियम से परे जाकर अपने लोगों की मदद की थी। एक घटना का साक्षी मैं भी हूं। 1996 में अमर उजाला मुजफ्फरनगर ऑफिस में राकेश नाम चपरासी था। उसे 1200 रुपये वेतन मिलता था। राकेश की मां गंभीर रूप से बीमार थी। मुजफ्फरनगर के तत्कालीन इंचार्ज जितेंद्र दीक्षित जी ने इस बारे में अतुल माहेश्वरी जी से बात की। उन दिनों किसी भी इंजार्ज का सीधे अतुल जी से बात करना सामान्य प्रैक्टिस थी, वे खुद भी सीधे ही बात करते थे, निजी तौर लिखे पत्रों का जवाब भी खुद ही देते थे। अतुल जी ने एकाउंट्स को निर्देश दे दिए कि राकेश की मां की ईलाज के खर्च का भुगतान अमर उजाला करेगा। उस एक साल में राकेश की मां पर 18-20 हजार रुपये खर्च हुए, सारा पैसा अमर उजाला ने दिया।

उस कर्मचारी की मां के लिए पैसा दिया जो केवल 1200 रुपये महीना पाता था ओर वो पे-रोल पर भी नहीं था। ये मदद किसी नियम का मोहताज नहीं थी। लोग कम पैसे में काम करके भी परेशान नहीं थे, क्योंकि उन्हें पता था कि संकट के वक्त अमर उजाला साथ देगा। लेकिन, भुवनेश तक आते-आते अमर उजाला एक परिवार की बजाय एक कंपनी बन गया था। निजी रिश्ते प्रोफेशनल हो गए थे। कोई मरता है तो मरे इससे कंपनी को कोई लेना-देना नहीं था। मेरे लिए यह बहुत बड़ा सदमा था। हर चीज को मैं अपने संदर्भ में समझने की कोशिश करता था। कल अगर मेरे साथ ऐसा हुआ तो…? इस तो का जवाब नहीं मिल पाया, क्योंकि मैं जिंदा हूं और उस दुनिया को छोड़कर आगे निकल आया। जब अमर उजाला में नौकरी शुरू की थी तो एक बड़े परिवार का हिस्सा बनने का सुख भी अनुभव किया था, लेकिन मेरठ से देहरादून के बीच के 11-12 साल के अंतराल में हर कोई एकाकी हो गया था, कंपनी-राज किसी के साथ नहीं था। कंपनी-राज में आपके स्किल के बदले पैसा दिया जाता था और रिश्ता खत्म हो जाता था। मैं न केवल यकीन के साथ, वरन दावे के साथ इस बात को कहता हूं कि अतीत बहुत आश्वस्तकारी था और वर्तमान परेशान करने वाला हो गया था।

भ्रम है, जब तक टिका रहे अच्छा है!

अगर आपके पास फाइनेंशियल बैकअप है तो फिर पत्रकारिता जैसा कोई दूसरा पेशा नहीं हो सकता। यकीनन, इस पेशे की तुलना किसी दूसरे पेशे से करना मुश्किल है। जो ताकत, हैसियत और निर्णायक स्थिति यह पेशा देता है, किसी दूसरे पेशे में उसकी कल्पना भी मुश्किल है। यह बात अलग है कि इस ताकत का उपयोग आप खुद के लिए करना चाहते हैं या दूसरों के लिए। पर, जब भी इस ताकत का दूसरों के लिए उपयोग करेंगे तो इसके परिणाम चमत्कारिक होंगे और जब इसका उपयोग खुद के लिए करेंगे तो जवाब देना भारी पड़ जाएगा। खासतौर से यदि पत्रकार सरकार और सिस्टम से लाभ लेने लगे तो उसे दुर्दिन देखने ही पड़ते हैं-कभी नौकरी गंवाकर तो कभी प्रतिष्ठा दंाव पर लगाकर। सच यही है कि सरकार कोई भी रियायत या सुविधा मुफ्त में नहीं देती और पत्रकार खुद को कितना भी समझदार क्यों न समझें, नौकरशाह और राजनेताओं का गठजोड़ उनसे कहीं अधिक शातिर और मारक होता है। ऐसे तमाम किस्से हैं जिनसे पता चलता किस प्रकार पत्रकारों को नाथा गया।
पत्रकारों द्वारा सूचना विभाग से गाड़ी की सुविधा लेना सामान्य प्रैक्टिस में है। सूचना विभाग को पता होता है कि पत्रकार निजी उपयोग के लिए गाड़ी ले रहे हैं और पत्रकारों को तो पता होता ही है कि वे किसी कवरेज के लिए नहीं, वरन निजी यात्राओं के लिए फ्री में गाड़ी ले रहे हैं। जबकि, सूचना के कागजों में यही दर्ज होता है कि अमुक पत्रकार को, अमुक तिथि में कवरेज के लिए गाड़ी मुहैया कराई गई। कई बार खुद को याद भी नहीं रहता कि कब गाड़ी ली थी, लेकिन सिस्टम याद दिला देता है। साल 2013 में उत्तराखंड के सूचना विभाग ने एडवांस-डिसक्लोजर के तहत उन पत्रकारों की सूची जारी कर दी जिन्होंने बीते सालों में फ्री फंड में टैक्सी ली थी। कुछ पत्रकार तो ऐसे थे जिन्हें एक साल के भीतर टैक्सी के लिए 20 से 30 हजार तक का भुगतान किया गया था। कुछ ऐसे भी जिन्होंने तीन-चार के भीतर एक लाख तक का भुगतान टैक्सी के लिए कराया था।

इस सूची में छोटे-बड़े, दागी-धुले हुए, सभी तरह के पत्रकार शामिल थे। कुछ ऐसे थे, जो कई साल से मौज करते आ रहे थे। एक बार इसी तरह एक सरकारी विभाग से मैंने भी फ्री में गाड़ी ली थी। तब, परिवार के साथ अल्मोड़ा-नैनीताल गया था। हालांकि, उस विभाग ने कभी उन पत्रकारों की सूची जारी नहीं की, जो ऐसे लाभ उठाते रहे हैं। कभी वो विभाग सूची जारी करेगा तो गाड़ी की सेवा पाने वालों में मेरा नाम भी होगा। जिस दिन सूचना विभाग ने सूची जारी की, पत्रकारों के चेहरे उतरे हुए थे, लेकिन वे कुछ नहीं कर सकते थे क्योंकि एडवांस डिसक्लोजर एक कानूनसम्मत और अनिवार्य प्रक्रिया है। ये भविष्य के लिए एक उदाहरण भी था।

दूसरा किस्सा भी ऐसा ही मजेदार है। मदन कौशिक उत्तराखंड में शिक्षा मंत्री थे। साल 2008 की बात है, तबादलों का सीजन चल रहा था। उत्तराखंड में शिक्षकों के तबादले पत्रकारों के लिए भी परीक्षा लेकर आते रहे हैं। कोई न कोई ऐसा परिचित, रिश्तेदार, दोस्त निकल ही आएगा जो बरसों से तबादले लिए भटक रहा है और आपके पास मदद के लिए आ पहुंचा है। आमतौर पर एक-दो तबादले पत्रकारों की सिफारिश पर हो भी जाते हैं। सत्ता और सिस्टम यही समझता है कि तबादले की सिफारिश के पीछे आपने कोई दक्षिणा प्राप्त की होगी, मलाई खाने का थोड़ा हक आपका भी बनता है, इसलिए एक-दो तबादला कर दिया जाए। मदन कौशिक ने पत्रकारों की सिफारिशों को पूरी तवज्जो दी और सीनियर, जूनियर श्रेणी में बांटकर पत्रकारों की क्रमशः दो और एक तबादला सिफारिश पर अमल किया गया। लेकिन, एक चालाकी की गई। उन सभी तबादलों के सामने इस बात का उल्लेख कर दिया गया कि कौन-सा तबादला किस पत्रकार की सिफारिश पर किया गया है। ये तमाम बातें सरकारी कागजों का हिस्सा बन गई। धीरे-धीरे करके सभी पत्रकारों को पता चल गया कि किसकी सिफारिश पर कौन-सा तबादला हुआ है। ये भी पता चल गया कि किन लोगों ने अपने परिजनों और किन्होंने गैरों के तबादले कराए थे। इसके बाद मदन कौशिक और पत्रकारांे के बीच खिंचवा का दौर चला, लेकिन एक मंत्री के तौर पर मदन कौशिक पत्रकारों की नस दबाए बैठे थे। ऐसे में, ईमानदारी के सवाल पर पत्रकारों के सामने खिसयाने के अलावा कुछ रह नहीं जाता है। इस तरह की चीजें वक्त के साथ समझ में आने लगती हैं और जिन्होंने बचकर रहना होता है वे भी बचे भी रहते हैं। लेकिन, कई बार कोई छोटी-सी चूक भी बरसों तक पीछा करती है।

बाहरी दुनिया में पत्रकारों के बारे में आम धारणा यही है कि ये लोग बहुत पैसा कमाते हैं, जहां भी हाथ रखते हैं वहां पैसों की बारिश होने लगती है। पर, सच्चाई इसके उलट होती है। अमर उजाला में मेरे एक सीनियर साथी थे, उमेश जोशी। सारी जिंदगी ईमानदारी से पत्रकारिता की। अमर उजाला से मिले वेतन से जैसे-तैसे परिवार चलता था। एक दिन अचानक नर्व संबंधी परेशानी हुई और उनके हाथों-पैरों ने काम करना बंद कर दिया। कुछ महीने जौलीग्रांट मेडिकल कॉलेज में भर्ती रहे। पत्रकार मित्रों ने थोड़ी-बहुत मदद, लेकिन इससे ने तो उनकी सेहत सुधर सकी और न ही परिवार चल सका। करीब दो साल तक ऐसे ही बुरे दिनों के बाद उमेश जोशी अपनी यात्रा पूरी कर गए। परिवार में पीछे तीन बच्चों की पढ़ाई और दो वक्त की रोटी का संकट आ गया। जोशी जी के परिवार ने बहुत बुरे दिन देखे। मुझ जैसे तमाम लोगों को अचानक ही अपने भविष्य का सच बेहद नंगे रूप में सामने दिखने लगा था।

मेरे जैसे जो भी पत्रकार मेन स्ट्रीम मीडिया में लंबे समय तक रिपोर्टिंग में रहे हैं, उनके बारे में भी यही भ्रम रहता है कि इन्होंने काफी माल बटोरा हुआ है। लेकिन, सच्चाई सामने आती है तो यशपाल की पर्दा कहानी यथार्थ में घटित होती दिखती है। बाकी पत्रकारों के साथ मैं भी संदिग्धों की सूची में रहा हूं। आम धारणा के लिहाज से ऐसा स्वाभाविक भी है। जबकि, मेरे द्वारा बटोरे गए माल की स्थिति का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि साल 2013 में उत्तराखंड सरकार ने एक आदेश जारी किया, जिसमें हरेक सरकारी कर्मचारी को अपनी संपत्ति की घोषणा करनी थी और इस बारे में शपथ-पत्र देना था। मेरे पुराने पत्रकार दोस्त और मौजूदा शिक्षक साथी उस शपथ-पत्र को लेकर उत्सुक थे, जिसमें मैं अपनी संपत्ति बताने वाला था। मैंने शपथ पत्र दिया-मेरे नाम कोई संपत्ति नहीं है, पत्नी, बच्चों के नाम भी नहीं है। मेरे भाई, उसकी पत्नी या बच्चे के नाम भी कोई चल-अचल संपत्ति नहीं है। कार नहीं है, किसी कंपनी का कोई शेयर नहीं हैं, किसी भी तरह का कोई निवेश नहीं किया हुआ है। दस हजार रूपये की एक एनएससी और पत्नी को अपने परिवार से मिले 20 ग्राम सोने के जेवर ही कुल जमा पूंजी हैं। दो बैंकों में खाते हैं, उनमें कुल जमा राशि 1300 रुपये है। गांव में एक पैतृक मकान है, जिसकी कीमत करीब दो लाख रुपये होगी। और हां, दोस्तों से हाथ उधार लिया गया 70 हजार का कर्ज भी है। उत्सुक लोगों की आंखे फटी हुई थी, क्योंकि जो भ्रम था वो सच्चाई के रूप में सामने आ गया था। कुल मिलाकर आर्थिक रूप से मैं भूखा-नंगा था, बहुत सारे आर्थिक-गड्ढे मेरे आगे-पीछे मौजूद थे। इस गुरबत की कहानी में कोई अतिश्योक्ति नहीं है और दो तिहाई पत्रकारों की स्थिति इससे भिन्न नहीं है। अनुकूलता इसी बात में है कि भ्रम जब तक बना रहे, अच्छा है!

…जारी…

सुशील उपाध्याय ने उपरोक्त संस्मरण फेसबुक पर लिखा है. सुशील ने लंबे समय तक कई अखबारों में विभिन्न पदों पर काम करने के बाद अब शिक्षण का क्षेत्र अपना लिया है. वे इन दिनों सीनियर असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में हरिद्वार के उत्तराखंड संस्कृत यूनिवर्सिटी में कार्यरत हैं. सुशील से संपर्क gurujisushil@gmail.com के जरिए किया जा सकता है. इसके पहले का पार्ट पढ़ने के लिए नीचे दिए गए शीर्षकों पर क्लिक करें.

सूर्यकांत द्विवेदी संपादक के तौर पर मेरे साथ ऐसा बर्ताव करेंगे, ये समझ से परे था (किस्से अखबारों के – पार्ट एक)

xxx

मीडिया का कामचोर आदमी भी सरकारी संस्था के सबसे कर्मठ व्यक्ति से अधिक काम करता है (किस्से अखबारों के – पार्ट दो)

 

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें: