अब जहां-जहां वो पत्रकार नौकरी की बात करने जाता है, पहले चैनल वाला सीनियर उसकी कुचर्चा फैला दे रहा है

Vikas Mishra : करीब दो साल पहले की बात है। दिल्ली में ही एक मीडिया अवार्ड समारोह में मैं गया था, साथ में हमारे चैनल आजतक के कई और साथी भी थे। समारोह के बाद कॉकटेल और खाने का कार्यक्रम था। रात गहराई। मैं भी अपने खाने की प्लेट लेकर दूसरी तरफ निकला तो वहां मेरे चैनल की एक एंकर सोफे पर बैठी थीं। तीन सीट वाला सोफा था। उस एंकर ने मुझे देखते हुए बोला-विकास जी, यहीं बैठ जाइए। मैं बैठ गया। थोड़ी देर बाद वहां एक सज्जन जोर-जोर से अल्ल-बल्ल बक रहे थे। मैं कुछ देर तक समझ नहीं पाया। हमारी एंकर ने बताया कि उन साहब को कुछ ज्यादा चढ़ गई है। मुझसे पहले वे उस जगह बैठे थे, जहां अब मैं बैठा था। पहले उस एंकर के साथ तस्वीर खिंचवाने पर आमादा थे।

तस्वीर खिंची, फिर बैठकर बहकी-बहकी बातें करने लगे, प्लेट लेकर खाने के लिए कुछ और लेने आगे बढ़े थे, इसी बीच मैं वहां पहुंच गया था, मौका देखकर एंकर ने मुझे वहां बैठा लिया। अब साहबान के गुस्से की वजह पता चली। पूरे नशे में खूबसूरत एंकर की बगल में बैठने का जो सुख उन्हें हासिल हो रहा था, वो अचानक मेरी वजह से छिन गया। अब उनका आपे से बाहर होना जायज ही था। पूरी कहानी समझ में आई तो ये पता चला कि वो मुंह ऊपर करके जिस पर चिल्ला रहे हैं, वो मैं ही हूं। मैंने जानबूझकर उधर ध्यान नहीं दिया। इसके बाद उन भाई साहब ने धारा प्रवाह गालियां शुरू कर दीं, वो भी हवा में। सारी गालियां मेरे लिए ही थीं।

एंकर ने कहा-ये आपको गाली दे रहा है। मैंने कहा- हां पता है, ये दे रहा है, लेकिन मैं ले नहीं रहा हूं। उसकी गालियां चलती रहीं, कुछ लोग उसे समझाने में भी लगे दिखे, वो तो जामे से बाहर होता रहा, बस करीब नहीं आ रहा था। एंकर ने फिर मुझसे पूछा- ये कितनी गालियां दे रहा है आपको, आपको बुरा नहीं लग रहा है। मैंने फिर कहा-नहीं, अभी जो चीज ये मुझे दे रहा है, उसकी मुझे जरूरत नहीं है। इस पर हम दोनों हंस पड़े। ये हंसी उसको मिर्ची की तरह लगी। अपनी प्लेट जमीन पर पटककर तोड़ दी। माहौल थोड़ा तनावपूर्ण था, इससे पहले कोई गड़बड़ होती, हम लोगों ने एंकर को घर के लिए सुरक्षित रवाना कर दिया। अगले दिन उस एंकर ने मुझसे पूछा-वो गालियां दे रहा था, आप रिएक्ट नहीं कर रहे थे। मैंने तो पहले मजाक में वही दोहराया- हां वो दे रहा था, लेकिन मैं ले नहीं रहा था। फिर उसको असलियत. समझाई। मैंने कहा-दरअसल अगर मैं रिएक्ट करता तो हंगामा होता, वो नशे में था, वो कुछ भी कर सकता था, उसका शायद उतना नहीं बिगड़ता, लेकिन हम लोग वहां व्यक्ति रूप में नहीं थे, आजतक जैसे नंबर वन चैनल के प्रतिनिधि भी थे। कोई भी बखेड़ा होता, तो उससे आजतक बदनाम होता। वेबसाइट पर अगले दिन जाने क्या खबर छपी मिलती।

इस कहानी के जरिए मैं सिर्फ ये बताना चाहता हूं कि अगर आप बड़े हैं, किसी बड़े संस्थान का प्रतिनिधित्व करते हैं तो आपको इसकी कीमत भी चुकानी पड़ती है । बहुत कुछ नजर अंदाज करना पड़ता है। हर बात का जवाब देने वाला, हर इल्जाम पर सफाई देने वाला कभी भी बड़ा इंसान नहीं बन सकता है। पिताजी अक्सर एक फिल्म का किस्सा बताते हैं, फिल्म में एक शीशमहल है। परिवार के मुखिया की मौत हो जाती है, दुर्दिन में शीशमहल बिक जाता है। मजबूरी ये कि जिसका शीशमहल था, उसकी बेटी को शीशमहल के नए मालिक के घर ट्यूशन पढ़ाने जाना पड़ता था। एक दिन शीशमहल का नया मालिक उस लड़की को गलत नीयत से पकड़ लेता है। वो लड़की कहती है-आपको अभी सिर्फ शीशमहल खरीदने की तमीज आई है, शीशमहल में रहने की तमीज नहीं आई।

मैंने तमाम लोगों को थोड़ा ही मिल जाने पर इतराते देखा है, अकड़ते देखा है। थोड़ी ताकत मिली तो बस किसी को उजाड़ने में दिमाग लग जाता है। ऊंचे ओहदे पर बैठे तमाम लोगों से सरोकार रहे हैं, जो तू मेरा नहीं तो किसी और का भी नहीं रहने दूंगा वाली नीति पर चलते हैं।

एक न्यूज चैनल में एक पत्रकार की अपने सीनियर से नहीं पटी। बात इससे पहले बिगड़ती, उस पत्रकार ने इस्तीफा दे दिया। अब जहां-जहां वो पत्रकार नौकरी की बात करने जाता है, पहले चैनल वाला सीनियर वहां-वहां उसकी कुचर्चा फैला दे रहा है। एक जगह तो बात पक्की भी हो गई थी, लेकिन पुराने ने बनी बात बिगाड़ ही दी। वो सिर्फ बिगाड़ सकता है, बना नहीं सकता, अपने चैनल में उसकी इतनी भी औकात नहीं है कि वो चैनल में किसी को चपरासी भी रख सके।

मैं जब दैनिक जागरण में पहली बार वहां के डायरेक्टर से मिला था, तो करियर की बात चली, मैंने बताया कहां-कहां काम किया है। सूची में अमर उजाला के अलावा राष्ट्रीय स्वरूप अखबार, विचार मीमांसा पत्रिका, ईएमएस न्यूज एजेंसी का जिक्र आया। उन्होंने कहा-अमर उजाला को छोड़ दें तो आपने छोटे संस्थानों में काम किया है। मैंने जवाब दिया-हां मेरे संस्थान छोटे हो सकते हैं, लेकिन मैं इंसान छोटा नहीं हूं। मेरे इस जवाब से वे हड़बड़ा गए। हालांकि ये भी बताया कि सभी संस्थानों में मैं ब्यूरो चीफ पद पर ही रहा और छोटे संस्थानों में काम करना आसान नहीं होता, सीखने को भी बहुत कुछ मिलता है। खैर उनसे रिश्ता शानदार रहा। जागरण में मैं साढ़े तीन साल रहा। रहा क्या, राज किया।

कई बार नजर घुमाकर देखता हूं तो कई जगह बड़े पद पर बहुत छोटे इंसान बैठे दिखते हैं। इनमें से कई जीनियस हैं, कई विद्वान हैं। कई अपने काम के माहिर हैं, लेकिन इंसान कैसे हैं, ये सवाल तो बस छोड़ ही दीजिए। हफ्ता भर पहले एक वरिष्ठ पत्रकार मुझे लेकर एक धन्नासेठ से मिलने गए थे। उस धन्ना सेठ ने बताया कि वो तीन हजार करोड़ की कंपनी का मालिक है। तीन घंटे वहां रहे, बातें हुईं, तीन चार लोग और भी थे वहां। वो धन्ना सेठ खुद ही बताता रहा-मेरे पास इतनी मर्सडीज है, इतने ऑडी हैं। दो गाड़ियां वहां रखता हूं, जहां साल में दो बार से ज्यादा जाता नहीं। सुब्रत राय को मैंने ये कह दिया, वो कह दिया, अखिलेश यादव से हर हफ्ते बात होती है….वगैरह वगैरह। जब तक हम लोग बैठे रहे, वो बस अपने धनबल पर इतराता रहा। मुलाकात खत्म होने के बाद गदगद वरिष्ठ पत्रकार ने मुझसे पूछा-कैसा लगा मिलकर, इसके बारे में आपका क्या आकलन है। मैंने कहा- आदमी भले ही ये तीन हजार करोड़ का हो, लेकिन इंसान ये दो कौड़ी का भी नहीं है।

आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार विकास मिश्र के फेसबुक वॉल से.



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Comments on “अब जहां-जहां वो पत्रकार नौकरी की बात करने जाता है, पहले चैनल वाला सीनियर उसकी कुचर्चा फैला दे रहा है

  • समीरकुमार त्रिपाठी says:

    सर , मैने आपकी आप बीती सुनी की आप किसी पार्टी में सबकुछ सह करके ये साबित कर दिया की हाथी चला जाता है कुत्ते भौंकते रहते हैं..मैंने भी इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में डिप्लोमा किया ,उसके बाद दैनिक भास्कर, हरिभूमि में रिपोर्टर पद पर काम किया पर मैं आपके चैनल में काम करना चाहता हूं कोई जगह होगी तो सम्पर्क नं.9170466063 पर फोन करने की कृपा करें

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