सुप्रिय प्रसाद आजतक न्यूज चैनल के ‘दिमाग’ हैं!

आजतक के चैनल हेड सुप्रिय प्रसाद अब न्यूज डायरेक्टर हो गए हैं। इससे पहले उनका पद मैनेजिंग एडिटर (प्रबंध संपादक) का था। अब टीवी टुडे ग्रुप ने उन्हें प्रमोशन देकर न्यूज डायरेक्टर का पद दिया है। इससे पहले आजतक में सिर्फ कमर वहीद नकवी सर और उदयशंकर जी ही इस पद पर पहुंचे थे। सुप्रिय प्रसाद आजतक के ‘दिमाग’ हैं।

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मोदी की नीतियों से महिलाओं की सेविंग पर पड़ रही तगड़ी मार, पढ़िए ये खुलासा

Vikas Mishra : मेरी पत्नी का सेविंग अकाउंट था इंडियन ओवरसीज बैंक में। गुप्त खाता। जिसमें जमा रकम का मुझे घर में लिखित कानून के मुताबिक पता नहीं होना था, लेकिन श्रीमतीजी के मोबाइल में बैंक से अक्सर खातों से कुछ रुपये निकलने के मैसेज आने लगे। कभी एसएमएस चार्ज के नाम पर, कभी एटीएम चार्ज के नाम पर। बीवी आगबबूला। मैं बैंक पहुंचा तो पता चला कि सेविंग अकाउंट में ब्याज घटकर 3 फीसदी हो गया है। एसएमएस चार्ज हर महीने देना है, हर छह महीने में एटीएम चार्ज देना है। दूसरे बैंक के एटीएम से पैसे निकाले तो उसका चार्ज। चाहे एटीएम का इस्तेमाल हो या न हो उसका भी चार्ज। खैर, मैंने पत्नी का वो अकाउंट बंद करवा दिया।

खाता तो बंद हुआ, नए खाते के लिए बैंक की तलाश हुई। मैंने कहा पोस्ट ऑफिस में खुलवा लो। पोस्ट ऑफिस गए, वहां एक तो ब्याज 6 फीसदी से घटकर 4 फीसदी हो गया था। सर्वर ऊपर से डाउन। वहीं के एक कर्मचारी ने धीरे से कहा-भाई साहब कहां फंस रहे हो, झेल नहीं पाओगे। खैर, यस बैंक में सबसे ज्यादा 6 फीसदी ब्याज का विज्ञापन देखा था, वहां संपर्क किया, कंडीशन अप्लाई में देखा तो पता चला कि जो लोग एक करोड़ रुपये खाते में रखेंगे, उन्हें 6 फीसदी ब्याज मिलेगा। एक लाख रुपये से कम रखने वालों को 4 फीसदी। चार्जेज यहां भी कटेंगे। सभी बैंकों में कटेंगे। हां, एक शर्त और, दस हजार रुपये से कम हुआ बैलेंस तो भी चार्जेज कटेंगे। सभी बैंकों का ये नियम है।

इससे पहले कि आप गलत अनुमान लगा लें, मैं स्पष्ट कर दूं कि पत्नी की कुल जमा राशि 10 हजार रुपये से ऊपर है और 15 हजार से नीचे। बाकी तो मेरे ऊपर उन्हीं का उधार रहता है। उन्हें एक गुप्त अकाउंट रखने का शौक है, जिस पर अच्छा ब्याज मिले, पति को पता न हो कि कितना जमा है। अब वो पति को दौड़ा रही थीं, पति के पास दौड़ने के अलावा कोई चारा भी नहीं।

मैं अच्छा खासा कमाता हूं, मेरे लिए पत्नी का खाता खुलवाना एक मनोरंजक खेल हो सकता है, लेकिन मुझे फिक्र हो रही है करोड़ों उन महिलाओं की, जो बड़े जतन से कुछ सौ रुपये, सौ भी क्यों 40-50 रुपये तक बैंक में जमा करवाती हैं। उनकी फिक्र हो रही है, जिनके पास अकाउंट में 10 हजार रुपये मेंटेन कर पाने की क्षमता नहीं है। वो तो ये सोचकर बैंक में पैसे रखती होंगी कि ब्याज मिलेगा, जरूरत पड़ने पर पैसा काम आएगा, लेकिन बैंक ब्याज देना तो दूर, चार्जेज के नाम पर उनके खातों में दीमक छोड़ दे रहा है, जो एक रोज उनका अकाउंट चालकर जीरो बैलेंस पर छोड़ देगा। मेंटीनेंस चार्ज का नाम सुनकर ही मेरा खून खौलता है।

मेरी भानजी रुचि Ruchi Shukla का एचडीएफसी बैंक में खाता था। एक बार 10 हजार से कम बैलेंस हुआ, बैंक ने 1 हजार रुपये काट लिए। अगले महीने फिर कटे। उसने कुछ पैसे निकाल लिए। कुछ सौ रुपये छोड़े। अब हर महीने मैसेज आने लगा कि अकाउंट में माइनस इतने रुपये है। मैं बैंक मैनेजर से मिला। बताया कि सेविंग अकाउंट में माइनस 4 हजार रुपये का बैलेंस हो गया है। वो बोला- खाता चलाना हो तो इसे चुकाना पड़ेगा। नहीं चलाना, तो चुपचाप रहिए, एक रोज अपने आप बंद हो जाएगा।

बीए में अर्थशास्त्र मेरा विषय था। उसमें बैंकिंग का पाठ भी था। बताया गया था कि अगर आप 100 रुपये जमा करते हैं तो बैंक मानता है कि आप महीने में 15 रुपये से ज्यादा नहीं निकालेंगे, अब बैंक 85 रुपये को बाजार में लगाएगा, लोन देगा, ब्याज कमाएगा। आपको सेविंग अकाउंट पर ब्याज देगा। यही बैंकिंग है। यानी अगर बैंक में एक लाख करोड़ रुपये जमा हैं तो वो 85 हजार करोड़ रुपये का व्यापार करेगा, उधारी देगा, ब्याज से कमाएगा। दुनिया के किसी भी बैंक की इतनी औकात नहीं जो अपने सभी ग्राहकों का पूरा पैसा एक दिन में लौटा सके।

बैंक भी करें तो क्या करें। नोटबंदी के बाद बैंक तो मालामाल हैं, पैसे ठसे पड़े हैं, लेकिन कोई कर्ज लेने के लिए तैयार नहीं है। रियलिटी सेक्टर का भट्ठा बैठा हुआ है। लोन लेकर फ्लैट लेने वाले गूलर के फूल हो रहे है। पैसा उगलती जमीनों के ग्राहक गायब हो गए हैं। पर्सनल लोन तो होम लोन की दर पर मिल रहा है, लेने के लिए लोग तैयार नहीं हैं, बैंक वाले लोन के लिए फोन कर करके आजिज कर दे रहे हैं। और हां, जिन्हें वाकई लोन की जरूरत है, उनके पास इतनी संपत्ति नहीं, जिसे गिरवी रखकर लोन लें।

बैंकों में पैसा फंसा है, बैंक व्यापार कर नहीं पा रहे हैं। इसकी गाज गिर रही है उन गरीबों पर, जो एक एक पैसा जोड़कर बैंक में जमा कर रहे हैं। सरकारी हों या प्राइवेट बैंक, पीएफ हो या पीपीएफ, हर जगह जमा पर ब्याज दर घट चुकी है, घट रही है। सरकार चाहती ही नहीं कि कोई बैंक में पैसा जमा करे, लेकिन ये भी नहीं चाहती कि लोग नकद पैसा अपने पास रखें, क्योंकि उसे तो कैशलेस इंडिया बनाना है।

डिजिटल पेमेंट का हाल देखिए, एलपीजी गैस नकद खरीदने पर सस्ती है, क्रेडिट कार्ड से खरीदने पर महंगी। क्योंकि उसका अलग से चार्ज है। बिजली बिल क्रेडिट कार्ड से चुकाना, ट्रेन का टिकट कटाना महंगा हो गया है। नोटबंदी और जीएसटी ने व्यापारियों और दुकानदारों की बैंड बजा दी, लेकिन अब भी वो क्रेडिट कार्ड या किसी और माध्यम से डिजिटल पेमेंट लेने को तैयार नहीं हैं। कार्ड दो तो कहते हैं 2 फीसदी अलग से देना होगा। कोई रोकथाम नहीं। अब आपको गरज हो तो कैश दीजिए, सौदा लीजिए, वरना भाड़ में जाइए। कैश का हाल ये है कि छोटे शहरों और कस्बों में बैंकों ने सीमा रख दी है कि अकाउंट से बस इतनी ही रकम निकाल पाएंगे। मैं अर्थशास्त्र का ज्ञानी नहीं हूं, लेकिन मुझे लगता है कि कहीं कुछ गड़बड़ हो रही है। अर्थव्यवस्था तो अड़ियल घोड़ी की तरह अटकी सी दिख रही है।

आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार विकास मिश्र की एफबी वॉल से.

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रवीश कुमार और सुप्रिय प्रसाद वाले बैच के iimc स्टूडेंट्स का मिलन समारोह (देखें तस्वीरें)

Vikas Mishra : 6 अगस्त को हर साल की तरह इस साल भी हम दोस्त मिले। भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) में हम लोग पहली बार अगस्त 1994 में मिले थे। सारे संगी आज 40 साल की उम्र पार कर चुके हैं, लेकिन जब मिलते हैं तो फिर उम्र 22-23 साल पीछे चली जाती है। शेरो-शायरी, गाने बजाने के बीच चुटुकले और चुटकियों की बारिश में हर चेहरा खिला मिलता है और ठहाकों से पूरी महफिल गूंज उठती है।

इस बार के मिलन समारोह में खास बात ये थी कि अमरेंद्र किशोर का जन्मदिन था। इस आयोजन में सबसे प्रमुख भूमिका हमेशा की तरह राजीव रंजन की रही। जिसने दोस्तों को जुटाने के लिए क्या कुछ नहीं किया। अमरेंद्र उसके साथ रहा, कदम दर कदम। हर बार की तरह इस बार भी अमृता का कैमरा चमकता रहा। सबको पता था कि अमृता का कैमरा आएगा, फिर तो किसी ने ज्यादा तस्वीरें खींचने की कोशिश भी नहीं की।

इस बार हमारे कई मित्र नहीं आ पाए, एक तो रक्षा बंधन का त्योहार, ऊपर से उनकी कोई विवशता। खैर, अगली बार फिर मिलेंगे। ये हमारे लिए गौरव की बात है कि हमारे बैच के सभी मित्र जहां हैं, झंडे गाड़े हुए हैं। देश के नंबर वन चैनल आजतक के संपादक सुप्रिय प्रसाद हमारे बैच के हैं तो नंबर वन अखबार के मेरठ संस्करण के संपादक मुकेश सिंह भी इसी बैच के हैं।

अमरेंद्र, उत्पल, संगीता, रवीश कुमार, नलिन, अमृता, सतीश, अमन, रत्नेश, दो दो राजीव, सरोज, शालिनी, शिव कहां तक नाम गिनाएं, हमारे बैच के जितने भी मित्र हैं, सभी बैच का नाम चमचमाए हुए हैं, लेकिन जब हम मिलते हैं तो कौन कहां है, ये भूल जाते हैं, ऐसा ही तो हुआ 8 की रात। ये मेरे लिए बहुत आत्मीय पल रहे हैं, जिन्हें मैं अपने फेसबुक के मित्रों के साथ बांट रहा हूं। फोटो स्लाइड शो के लिए नीचे क्लिक करें :

आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार विकास मिश्र की एफबी वॉल से.

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करप्शन किस कदर हमारे खून में समाया है, समझा रहे हैं आजतक के पत्रकार विकास मिश्र

Vikas Mishra : मेरे एक मित्र अभी एक शहर में एसपी सिटी हैं। एक रात जब हम मिले, चर्चा छिड़ी तो उन्होंने कहा-‘भाई मैं तो बस ईमानदारी से काम कर रहा हूं, कोई तीन-पांच नहीं।’ मुझे लगा कि शायद मोदी के प्रभाव में ईमानदार हो गए हैं। बात बढ़ी तो वो बोले-‘किसी को सताकर नहीं कमाना है भाई, बिना पैसे दिए पोस्टिंग मिली है, मैं तो बाहर का पैसा छूता नहीं हूं, बस महीने के जो ढाई-तीन लाख बंधे हुए आते हैं, उसी से काम चलाता हूं।’

ये यूपी के पुलिस अफसर की वो ‘ईमानदारी’ की कमाई है, जब वो कुछ भी न करे, तो तनख्वाह के अलावा महीने का ढाई-तीन लाख रुपये बन जाता है। ये सिस्टम है। पिछले साल 8 नवंबर को जब प्रधानमंत्री मोदी ने नोटबंदी का ऐलान किया तो मेरे एक बेहद करीबी सज्जन बड़ी परेशानी में आ गए। दिक्कत ये थी कि उन्होंने अपने छोटे भाई की एक स्कूल में सरकारी नौकरी की बात कर रखी थी। अफसर को 7 लाख रुपये रिश्वत में देना था। नोटबंदी आ गई। खातों से निकासी की नसबंदी हो गई। अफसर न तो चेक लेने को तैयार और न ही ऑनलाइन पेमेंट। आखिरकार उसने पूरा पैसा नकद लिया।

हैरान मत होइए। ताजा हाल सुनिए। मेरे एक परिचित का बहुत बड़ा मेडिकल कॉलेज है। एमबीबीएस की 150 सीटें थीं, लेकिन पिछले दिनों मेडिकल कौंसिल ऑफ इंडिया ने घटाकर 100 सीटें कर दीं। अब फिर से 50 सीटें बढ़ाने के लिए अफसरशाही ने कितनी रिश्वत की मांग की है, आप जानते हैं..? पूरे 6 करोड़ रुपये। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी भ्रष्टाचार-भ्रष्टाचार बोलते-बोलते मुंह से चाहे जितना झाग फेंक लें, लेकिन इस सिस्टम का दीमक ऐसा है, जिसके लिए उनके पास कोई पेस्ट-कंट्रोल नहीं है।

भ्रष्टाचार देश की आत्मा में बस चुका है। भ्रष्टाचार कायदा है, भ्रष्टाचार कानून है। कुछ साल पहले नौगढ़ में मैंने जमीन का छोटा सा टुकड़ा खरीदा था। रजिस्ट्री करवाने वाले वकील मेरे एक मामा ही थे। उन्होंने रजिस्ट्री चार्ज के अलावा 4 हजार रुपये की और डिमांड की। बताया कि रजिस्ट्रार को देना पड़ता है। मैंने कहा-कौन सा सरकारी अफसर है जो मुझसे रिश्वत ले लेगा? मामा बोले-ये रिश्वत नहीं, बस यूं ही मिठाई खाने के लिए लोग दे देते हैं। मैंने कहा, चलिए रजिस्ट्रार से बात मैं करूंगा। मामा बोले-तुम तो नहीं दोगे, चले जाओगे, दुकानदारी हमारी खराब होगी। खैर, मैंने रिश्वत नहीं दी, काम भी हो गया, रजिस्ट्रार साहब दांत निपोरे देखते रहे।

मैं एक पत्रकार के अलावा एक मध्यमवर्गीय गृहस्थ भी हूं। मेरा पासपोर्ट मेरे पते पर पहुंचा, डाकिया मिठाई के नाम पर 100 रुपये ले गया। इसके बाद मेरी पत्नी, मेरे बेटे और मेरी भानजी का पासपोर्ट बनने की बारी आई। मेरा मामला तो तत्काल का था, क्योंकि विदेश यात्रा पहले फाइनल हुई, पासपोर्ट बाद में बना। खैर, इन्क्वायरी के लिए पुलिस वाले आए, फिर एलआईयू वाले और आखिर में पासपोर्ट लेकर डाकिया आया। पुलिस वाले अगर पेपर में कुछ भी दाएं-बाएं लिख दें तो पासपोर्ट नहीं बनेगा, बनकर आ भी गया तो डाकिया गायब भी कर सकता है। कौन सी उस पर कार्यवाही हो जाएगी। सबका ‘मिठाई’ का रेट बंधा है। तो बाकी के तीनों पासपोर्ट में हर चुंगी पर मिठाई के लिए पैसे पकड़ाए गए, क्योंकि डर था कि अगर इन्हें पैसे नहीं मिले तो पासपोर्ट नहीं मिलेगा।

भ्रष्टाचार का हाल तो ये है कि जब तक अफसर, थानेदार पैसे न पकड़ ले, लोगों को भरोसा ही नहीं होता कि उसका काम हो जाएगा। कभी थाने में जाइए रिपोर्ट लिखाने तो आपको अनुभव होगा कि आप फरियादी नहीं बल्कि मुल्जिम है। अक्सर पुलिस वाले फरियादी को क्लाइंट समझते हैं, फरियादी अपनी व्यथा सुनाता है, पुलिस वाला सोचता है कि इससे पैसे कैसे ऐंठें, क्योंकि अक्सर जालिम पैसे वाला होता है और पीड़ित गरीब। ऐसे में गरीब पैसे कहां से लाएगा, लिहाजा पुलिस पैसे वाले से मिल जाती है। पत्रकारीय जीवन में मैंने ऐसी कई घटनाएं देखी हैं, कई लोगों को इंसाफ भी दिलाया है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक थाने में मेरे एक जानने वाले कुछ महीने पहले थानेदार बनकर आए हैं। पता नहीं किसकी कृपा से उन्हें वो थाना मिल गया, जहां से एक थानेदार ने तो 13 महीने में चार करोड़ रुपये कमा लिए थे। खैर, वो भाई साहब पुलिस में भी अनोखेलाल हैं, तनख्वाह से काम चलाना चाहते हैं। थाने से भाग निकलने की जुगत भिड़ा रहे हैं। उस थाने में होता ये था कि पहले एक पार्टी रिपोर्ट दर्ज करवाती थी, फिर दूसरी जबरन रिपोर्ट दर्ज करवाती थी। फिर थानेदार समझौता करवाता था, मोटी रकम पीटता था। वो इलाका है भी धन्नासेठों का। हमारे ये परिचित परेशान हैं, कहते हैं कि कमाई बहुत है यहां, लेकिन भाई साहब, मैं तो यहां से भागना चाहता हूं। कभी पॉलिटिकल प्रेशर बनाने वाले फोन आते हैं तो कभी पैसे लेकर गलत काम करने का ऑफर।

ये तो इस सिस्टम के चंद उदाहरण है, भ्रष्टाचार से तो हर किसी का रोजाना सामना होता रहता है। इस सड़े हुए सिस्टम को कौन कहां से सुधारेगा, डिजिटल क्रांति आई, ऐलान हुआ कि भ्रष्टाचार बंद हो जाएगा, डिजिटल सिस्टम नया है, लेकिन सिस्टम में बैठे लोग तो वही हैं। इस सिस्टम का समाज से बड़ा पुराना याराना है। आज भी पिता अपनी बेटियों की शादी करने के लिए लाखों की सैलरी पीटने वाले प्राइवेट सेक्टर वालों पर सरकारी नौकरी वाले क्लर्क को तरजीह देते हैं।

आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार विकास मिश्र की एफबी वॉल से.

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गोरखपुर लोकसभा सीट से बीजेपी शलभ मणि त्रिपाठी को देगी टिकट!

Vikas Mishra : योगी आदित्यनाथ तो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए। अब सवाल ये उठ रहा है कि गोरखपुर से सांसद कौन बनेगा। दरअसल सवाल ये उठना चाहिए था कि गोरखपुर से सांसद के उपचुनाव में बीजेपी का प्रत्याशी कौन होगा, लेकिन ये सवाल इस नाते नहीं उठ रहा, क्योंकि गोरखपुर में योगी के उत्तराधिकारी की जीत पक्की है। मेरी राय में तो बीजेपी को गोरखपुर लोकसभा सीट से शलभ मणि त्रिपाठी Shalabh Mani Tripathi को टिकट देना चाहिए। इसकी वजहें भी हैं।

शलभ योगी की तरह तेज तर्रार हैं, जरूरत पड़ने पर कड़क तो जरूरत पड़ने पर नरम हैं। पत्रकारों के बीच प्रचलित तमाम व्यसनों से शलभ कोसों दूर हैं। योगी और शलभ के बीच उम्र का फासला भी बहुत ज्यादा नहीं होगा, शलभ तीन-चार साल छोटे होंगे। योगी गोरखपुर के युवा सांसद रहे तो गोरखपुर को युवा सांसद ही मिलना चाहिए। शलभ मणि नेटवर्क 18 में एक दशक से ज्यादा वक्त तक उत्तर प्रदेश के प्रभारी रहे हैं। पूरे प्रदेश को जानते हैं। गोरखपुर के रहने वाले हैं, तो गोरखपुर को क्या चाहिए, उसे अच्छी तरह समझते हैं। उच्च शिक्षा प्राप्त हैं।

हाल ही में शलभ ने पत्रकारिता की पारी घोषित करके सियासत की दुनिया में नई पारी बीजेपी के साथ शुरू की है। इतिहास गवाह है कि तमाम पत्रकार अच्छे राजनेता साबित हुए हैं। अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर एमजे अकबर तक पत्रकारों के अच्छे राजनेता बनने की नजीर भी है। इसीलिए मेरी नजर में गोरखपुर लोकसभा सीट से शलभ मणि त्रिपाठी बेहतरीन उम्मीदवार हैं।

शलभ को मैं व्यक्तिगत रूप से भी जानता हूं। वो ऐसी जगह, ऐसे पद-पोजीशन में रहे, जहां दिमाग खराब हो जाने की गुंजाइश बहुत ज्यादा होती है, लेकिन शलभ हमेशा वैसे बने रहे, जैसे वो 12 साल पहले थे। उतने ही सभ्य, उतने ही विनम्र, उतने ही सौम्य और चेहरे पर उतनी ही मुस्कान। बड़ों को सम्मान, छोटों को स्नेह और हमउम्रों को सहयोग देने में शलभ ने कभी कोताही नहीं की। इसी नाते मेरी नजर में शलभ गोरखपुर से सांसद बनने के लिए सर्वथा योग्य हैं। गोरखपुर और आसपास के लोगों से मैं जानना चाहता हूं कि सांसदी के लिए शलभ मणि की उम्मीदवारी की दावेदारी पर उनकी क्या राय है..?

आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत और गोरखपुर के निवासी विकास मिश्र की एफबी वॉल से. उपरोक्त पोस्ट पर शलभ मणि त्रिपाठी का जो कमेंट आया है, वह इस प्रकार है…

Shalabh Mani Tripathi बहुत देर तक सोचता रहा लिखूँ या ना लिखूँ, कुछ कहूँ या ना कहूँ, पर लगा कि विकास भइया ने इतनी बडी बहस छेड़ दी है तो ख़ामोश रहना भी मुनासिब नहीं होगा……… विकास भइया आपकी इस पोस्ट के एक एक शब्द से मेरे लिए आपका अथाह प्यार टपक रहा है, और ऐसा ही प्यार-लगाव उन सभी दोस्तों की प्रतिक्रियाओं में भी साफ़ दिख रहा है जो विकास भइया की इस पोस्ट के पक्षधर हैं……मैं आप सबके प्यार से सच में अभिभूत हूं, पर सच तो यही है कि गोरखपुर की जिस लोकसभा सीट की गरिमा आदरणीय योगी जी ने देश और दुनिया में बढ़ाई है, मैं ख़ुद को उस सीट के क़ाबिल नहीं पाता, मुझे अभी बहुत काम करना है, बहुत कुछ सीखना है, मुझसे ज़्यादा क़ाबिल, कर्मठ और बेहतर लोग हैं गोरखपुर में इस सीट के लायक, मैं सौभाग्यशाली हूँ कि आप सबका इतना स्नेह और भरोसा है मुझ पर, और मेरा सबसे बड़ा दायित्व है इसे हमेशा बरक़रार रखना, इसीलिए आप सभी का हृदय से आभार जताते हुए उन सभी को प्रणाम करता हूँ जिन्होंने मेरा हौसला बढ़ाया या फिर मेरी कमियाँ बता कर भी, खुद को और बेहतर बनाने की मेरी मुहिम में अपना महती योगदान दिया, आप सबके प्यार का हमेशा आकांक्षी रहूंगा, धन्यवाद. 

Vikas Mishra मैंने इसी सौम्यता का जिक्र अपनी पोस्ट में किया था Shalabh Mani Tripathi । आज जहां तुम हो, बेशक वहां से वैसा दिखता होगा, जहां की बात कर रहे हो, लेकिन मैं जहां पर हूं, वहां से देखता हूं तो वैसा दिखता है, जैसा मैंने अपनी पोस्ट में लिखा है। मैं सिर्फ ये कहना चाहता हूं कि जैसे टीवी 18 ग्रुप ने तुम्हारी पूरी प्रतिभा का उपयोग किया, बीजेपी भी तुम्हारे पूरे टैलेंट, कमिटमेंट और उत्तर प्रदेश में डेढ़ दशक की पत्रकारिता के अनुभव का पूरा इस्तेमाल करे। मैं बतौर पत्रकार किसी पार्टी का पक्षधर नहीं हो सकता, लेकिन व्यक्तिगत रूप से जो मेरे करीब है, उसकी उन्नति तो हमेशा चाहता हूं। मुझे यकीन है कि जो भी जिम्मेदारी तुम्हें मिलेगी, तुम साबित करोगे कि इसके लिए तुमसे बेहतर कोई और नहीं था।

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सईद अंसारी यानि एक अद्भुत एंकर, एक बेजोड़ इंसान

Vikas Mishra : सईद अंसारी…नाम तो सुना होगा..। जितने बढ़िया एंकर, उतने ही बेहतरीन इंसान भी। हमेशा हंसते हुए और गर्मजोशी के साथ मिलते हैं। हर किसी की मदद के लिए तैयार, पक्के यारबाज। मुझे नहीं लगता कि दुनिया में कोई ऐसा भी इंसान होगा, जिसने कभी ये शिकायत की हो कि सईद अंसारी ने मुझसे कोई गलत बात की, तल्ख आवाज में बात की। जमीन से बिल्कुल जुड़े हुए, बिल्कुल इगोलेस, कमाल के इंसान। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में अगर किसी एंकर का कोई स्लॉट तय है तो वो कभी भी बर्दाश्त नहीं कर सकता कि उस स्लॉट में कोई और एंकरिंग करे, लेकिन सईद भाई इस नियम से परे हैं।

न्यूज 24 में जब मैं शाम साढ़े सात बजे का न्यूज स्पेशल बनाता था, तब उसके एंकर एक रोज सईद भाई होते थे, अगले रोज अंजना। अगर कोई हल्का फुल्का या फिर किसी फिल्मी मसालेदार सब्जेक्ट पर शो होता था तो मैं सईद भाई से कह देता कि ये सब्जेक्ट आप लायक नहीं है, आप हमारे मुख्य एंकर हैं, तो मैं इसे किसी नए एंकर से करवा लेता हूं। सईद भाई बिल्कुल तैयार। बोलते-जी हां विकास भाई आप सही कह रहे हैं। सईद के इस दरियादिली में न्यूज 24 में कई नए एंकर भी तैयार हो गए। कई बार उनके साथ एंकरिंग में मैंने कुछ प्रयोग भी किए, सईद भाई हर बात के लिए तैयार मिलते।

सईद अंसारी के साथ बहुत सी खूबियां जुड़ी हैं। ये कुल दो- ढाई मिनट में कोट-टाई पहनकर तैयार हो जाते हैं। चलते कम हैं, दौड़ते ज्यादा हैं। न्यूजरूम में भी दौड़ते ही रहते हैं। हमेशा इनके चेहरे पर आपको ताजगी दिखेगी। सईद भाई तो स्टार न्यूज में लगातार 18 घंटे बिना ब्रेक के लाइव एंकरिंग करके वर्ल्ड रिकॉर्ड भी बना चुके हैं। जिसे लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में बाकायदा दर्ज किया गया है। काम के जुनून का एक मजेदार वाकया सुनिए। न्यूज 24 में सईद भाई घंटों से एंकरिंग कर रहे थे। कोई बड़ी घटना हो गई थी। उस वक्त चैनल पर विजुअल चल रहे थे, पीछे सईद अंसारी की आवाज आ रही थी। अचानक उनकी आवाज के साथ, वॉशरूम में फ्लश चलने की हल्की सी आवाज आई। दस सेकेंड में बंद भी हो गई। दरअसल हुआ ये था कि सईद भाई को जोरों से वाशरूम जाने की तलब लगी हुई थी, लेकिन वो मौका नहीं ढूंढ पाए थे। ईपी (इयरफोन) उनके कान में था, पैनल को उन्होंने इशारे में बता भी दिया था। वो मुतमईन थे कि इस दौरान उन्हें स्क्रीन पर दिखाया नहीं जाएगा, इस बीच वो वाशरूम चले गए, खबर के बारे में बोलते रहे, और वाशरूम से फारिग होकर लौट भी आए।

साल 2009 की बात है, तब मैं जब न्यूज 24 में था। मोटरसाइकिल छोड़कर कार खरीदने का मूड बना रहा था। कई बार मीटिंग में भी मेरी कार का मुद्दा उठ गया। मेरे सामने सवाल कुछ पेशगी की रकम का था, क्योंकि मेरे अकाउंट में कभी पैसे अमूमन न पहले रहे, न उस वक्त रहे, न आज रहते हैं। खैर, एक रोज मेरे मोबाइल में बैंक से एक मैसेज आया, जिसके मुताबिक मेर खाते में 60 हजार रुपये आए थे। मैं परेशान कि ये पैसे कहां से आए। मैंने चैनल की मीटिंग में भी कहा कि न जाने कहां से खाते में 60 हजार रुपये आए हैं, कहीं तनख्वाह दो बार तो नहीं आ गई। सईद भाई बोले-अरे विकास भाई, पैसे आ गए तो सोचिए मत, अब कार खरीद लीजिए। शाम को मेरी परेशानी भांपते हुए सईद भाई ने बताया-विकास भाई आपका अकाउंट नंबर पता करके ये मैंने ही भेजा है, अब कार खरीदिए। खैर, उस वक्त मैंने वैगन आर कार खरीदी, जिसे प्यार से मेरे घर में वैगू नाम दिया गया। कार आ गई, पैसे चुक गए। मजे की बात ये थी कि कई बार न्यूजरूम में जब सईद तेजी से पास से गुजरते तो मैं जोर से उनसे कहता-सईद भाई मुझसे पैसा उधार लिए हैं क्या जो नजर बचाकर निकल रहे हैं। सईद झेंप जाते, क्योंकि उन्होंने सख्ती से मना कर रखा था कि उनसे पैसे लेने वाली बात मैं किसी से न कहूं।

सईद भाई को बच्चों से बहुत प्यार है। किसी पार्टी वगैरह में जाते हैं तो सभी बच्चों का मजमा जुटा लेते हैं। उन्हें बाकी लोगों से मिलना जुलना उतना रास नहीं आता, जितना बच्चों के बीच वो रमते हैं। हमारे वरिष्ठ साथी कहते हैं-सईद अंसारी ही अगला चाचा नेहरू बनेगा। जो बच्चा सईद भाई से एक बार मिल ले, फिर उनका फैन हो जाता है। कोई भी सईद भाई को न्योता दे, सईद भाई पहुंचते जरूर हैं, हालांकि वो अक्सर पार्टी में पहुंचने वाले और पार्टी से जाने वाले सबसे आखिरी सदस्य होते हैं।

2009 में सईद भाई ने नई नई स्कॉर्पियो खऱीदी थी। न्यूज 24 की छत पर एक रोज यूं ही बातचीत में मैंने उनसे कहा कि इस बार गांव जाऊंगा तो आपकी स्कॉर्पियो ले जाऊंगा। सईद भाई ने चाबी जेब से निकाली, बोले-अभी लीजिए। मैंने कहा-जब जाऊंगा तो ले लूंगा। सईद बोले नहीं, अभी लीजिए, मैं आपकी वैगन आर ले लूंगा। संयोग देखिए, जब हम लोग छत पर रात में ये बातचीत कर ही रहे थे, उसी रात उनकी नई नवेली स्कॉर्पियो चोरी हो गई। सईद के चेहरे पर इसका मलाल नहीं था। वो पहले जैसे ही मस्त नजर आते रहे।
सईद एंकर हैं, उनके हजारों फैन हैं, जब वो चैनल की वेबसाइट पर फेसबुक लाइव में आते हैं तो पल भर में हजारों लाइक्स, शेयर और कमेंट आ जाते हैं। जब सईद बाहर जाते हैं, उनके साथ फोटो खिंचवाने और सेल्फी लेने वालों में होड़ मच जाती है।

सईद किसी को निराश भी नहीं करते। सईद जैसे हैं, वैसे ही रहना और दिखना चाहते हैं, किसी शोहरत की उन्हें दरकार नहीं, शायद यही वजह है कि लोगों के लाख कहने के बावजूद सईद ने न तो फेसबुक पर अपना अकाउंट बनाया और न ही ट्विटर पर। सईद से आप कभी किसी बड़े ओहदेदार से दोस्ती या रिश्तों का जिक्र नहीं सुनेंगे ( हालांकि उनके ऐसे कई लोगों से अच्छे रिश्ते हैं), लेकिन दफ्तर के गार्ड, हाउस ब्वाय, पैनल के स्टाफ, स्विचर और तमाम कनिष्ठ साथियों से सईद के हमेशा अच्छे रिश्ते रहते हैं। सईद रोजाना सबका हाल चाल पूछते हैं। सभी गार्ड्स से उनके अच्छे रिश्ते हैं, यही वजह है कि दफ्तर में उनकी गाड़ी के लिए कभी पार्किंग फुल नहीं होती। ऊंचाई पर पहुंचकर भी किस तरह इंसान विनम्रता बनाए रखे, ये पाठ सईद अंसारी अपने व्यक्तित्व से हमें रोज पढ़ाते रहते हैं।

आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत विकास मिश्र की एफबी वॉल से.

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आजतक की अहमदाबाद ब्यूरो चीफ गोपी घांघर को पता था यूपी में भाजपा 300 से उपर सीट लाएगी!

Vikas Mishra : ये हैं गोपी घांघर। अहमदाबाद में हमारे चैनल की ब्यूरो चीफ। लंबे वक्त से गुजरात की राजनीति को करीब से देख रही हैं। पिछले दिसंबर महीने में एजेंडा आजतक में आई थीं, तब गोपी ने उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सीटों का आकलन किया था। गोपी ने कहा था कि मोदी और अमित शाह यूपी में करामात करने वाले हैं, बीजेपी को तीन सौ के आसपास सीटें मिलेंगी।

मैंने कहा कि यहां तो बहुमत मिलता नहीं दिख रहा। कुछ तर्क भी रखे मैंने। गोपी बोली-आप तर्क की बात कर रहे हैं, मैंने मोदी को गुजरात में 12 साल देखा है, मैं मोदी को जानती हूं। खैर, चुनाव के बाद यहां मेरे दफ्तर में सीटों के आकलन को लेकर शर्तें लग रही थीं। गोपी मुझसे बार-बार कह रही थी कि आप कम से कम 280 सीटों पर दांव लगाइए। मैंने डरते-डरते बीजेपी को 209 सीटें दी थीं। अब नतीजे आए तो गोपी सौ फीसदी सही साबित हुई। मान गए गोपी Gopi Maniar आपके आकलन को।

आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत टीवी पत्रकार विकास मिश्र की एफबी वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से एक प्रमुख कमेंट इस प्रकार हैं….

Sanjay Dave गोपी मणीयार घांघर को मैं २००२ से जानता हूं, एक ही शहर के होने के नाते कई बार रीपोर्टिंग भी साथ साथ कि है, स्टोरी और स्थल कोई भी हो गोपी के अन्दर हंमेशा एक अलग सा आत्मविश्वास देखा है । मुझे बराबर याद है २००८ दिपेश-अभिषेक मौत मामला समय अहमेदाबाद स्थित आसाराम आश्रम कवरेज करने पहुंचे पत्रकारों के उपर आसाराम के गुंडों ने अचानक किए हमले समय प्रेग्रन्ट होने के बावजूद स्टोरी करने आई गोपी ने अपने शरीर के उपर लाठीया खाई लेकिन डटी रही पीछे नहीं हटी। हम सबको गोपी मणीयार-घांघर के उपर गर्व है ।

Vikas Mishra सही कहा आपने, गोपी हमारी जांबाज सेनानी है।

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आजतक में कार्यरत शम्स ताहिर खान, रेहान अब्बास, मुहम्मद अनस जुबैर और शादाब मुज्तबा की फेसबुक पर क्यों हो रही है तारीफ, आप भी पढ़िए

Vikas Mishra : मेरे दफ्तर में शम्स ताहिर खान, रेहान अब्बास, मुहम्मद अनस जुबैर, शादाब मुज्तबा हैं, उच्च पदों पर हैं ये लोग, बेहद जहीन। जानते हैं कि इनमें एक समानता क्या है, इन सभी की एक ही संतान है और वो भी बेटी। वजह क्या है, वजह है इनकी तालीम, इनकी शिक्षा। क्योंकि इन्हें पता है कि जिस संतान के दुनिया में आने के ये जरिया बने हैं, उसके पालन-पोषण में कोई कमी नहीं होनी चाहिए। इन्हें नहीं रटाना है कम संतान-सुखी इंसान।

मेरे गांव में मेरे हमउम्र दयाराम के आठ बच्चे हैं। मेरे खुद दो सगे भाई और तीन बहनें हैं। मेरे लखनऊ के एक साथी पत्रकार के 11 मामा और चार मौसियां हैं। सुभाष चंद्र बोस अपने पिता की नौवीं संतान थे। इसके बाद भी प्रोडक्शन जारी था, 14 भाई बहन थे। तो दूसरे की संतानों की तादाद गिनने से पहले जरा अपना भी इतिहास देख लेना चाहिए। अभी हाल में मैंने एक चुटकुला पढ़ा था कि एक कलेक्टर साहब गांव में नसबंदी के लाभ बताने पहुंचे थे। एक ग्रामीण ने पूछा-साहब आपने नसबंदी करवाई है? साहब बोले-नहीं, हम पढ़े-लिखे हैं। ग्रामीण बोला-तो साहब हमें भी पढ़ाओ-लिखाओ, नसबंदी करवाने क्यों आ गए।

फेसबुक पर लिखने वाले तमाम लोग विद्वान हैं, जानकार हैं, लेकिन अपनी विद्या का इस्तेमाल नफरत फैलाने में ज्यादा कर रहे हैं। हिंदू हो या मुस्लिम, दोनों समुदाय की मूल समस्या है शिक्षा। जो पढ़कर आगे बढ़ गए, वो भी शिक्षा के लिए प्रेरित नहीं करते, बल्कि अपने ही समुदाय के उन लोगों का इस्तेमाल करते हैं, जिन्हें अक्षर ज्ञान हो गया है और जो सोशल मीडिया पर फेंका उनका कचरा उठाकर अपने दिमाग में डालने के लिए अभिशप्त हैं। दो समुदाय जो इंसानियत के तकाजे से एक-दूसरे के करीब आ सकते हैं, उन्हें बरबस ये दूर करना चाहते हैं। मुस्लिम समुदाय के अच्छे लिखने वाले अपने ही सहधर्मियों को बरगला रहे हैं। उनके अपने घर में अपनी बेटी तो डॉक्टरी-इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रही है। लेकिन फेसबुक पर वो ‘मोदी की डियर’ पर मौज ले रहे हैं।

कोई मुस्लिम अगर इस्लाम या कट्टरता के खिलाफ अगर कोई पोस्ट लिखता है तो उसमें कमेंट करने वालों में हिंदू लोगों की भरमार होती है, जो उस पोस्ट का स्वागत करते नजर आते हैं। उस पोस्ट के कमेंट्स में मुस्लिमों की तादाद भी होती है। या तो वो अपने उस साथी को गालियां दे रहे होते हैं या फिर कुछ ऐसे भी होते हैं जो पोस्ट का समर्थन कर रहे होते हैं। ठीक इसी तरह, जब कोई हिंदू कट्टर हिंदुत्व और धर्म के नाम पर फैले अंधविश्वास के विरोध में कुछ लिखता है तो उस पोस्ट पर मुस्लिम साथियों के कमेंट थोड़े से आते हैं, अगर पोस्ट पब्लिक है तो फिर उस पर हिंदू धर्म वालों की गालियां पड़नी तय है। मेरी फ्रेंडलिस्ट में भी ऐसे साथी हैं, जिनमें से कुछ कभी परशुराम के भक्त बन जाते हैं, तो कभी देखते ही शेयर करें वाली तस्वीरें भेजते हैं, बेवजह मोदी-मोदी करते रहते हैं।

व्हाट्सएप के ग्रुप में तो कई मूर्खतापूर्ण मैसेज चलते रहते हैं। और हां, फेसबुक पर कई मुस्लिम मित्र जान बूझकर बड़े शातिराना तरीके से पोस्ट लिखते हैं। आरएसएस पर हमला करने की आड़ में हिंदुओं की ‘बहन-महतारी’ करते हैं। कई लोग मुझसे फोन करके कह चुके हैं कि ये आदमी आपकी फ्रेंडलिस्ट में क्यों है ? दरअसल ऐसी पोस्ट का अंजाम क्या होता है, मैं बताता हूं। उसमें एक मुसलमान लिखता है, बाकी मुसलमान पढ़ते हैं, वाह-वाह करते हैं, कई हिंदू पढ़कर कुढ़कर रह जाते हैं, कुछ से रहा नहीं जाता तो पोस्ट पर पहुंचकर तर्क-वितर्क करना शुरू करते हैं, तो वहीं कुछ सीधे ‘मां-बहन’ पर उतारू होते हैं। ‘मां-बहन’ करने वाले दोनों तरफ हैं। कोई डायरेक्ट परखनली से पैदा नहीं हुआ है, सबके घर में मां-बहन हैं।

दरअसल सोशल मीडिया को कई लोग अपने अपने तरीके से यूज कर रहे हैं। असली मुद्दे पर कोई आना नहीं चाहता। अपने मजहब वाले सही बात नहीं सिखा रहे हैं, सिर्फ डरा रहे हैं। दूसरे मजहब वालों से वो सीखना-पढ़ना चाहेंगे नहीं। खासतौर पर ये मुस्लिम समुदाय के लोगों के साथ ज्यादा हो रहा है, यही वजह है कि भारत में पाकिस्तान से ज्यादा मुसलमान हैं, लेकिन एक भी मुसलमान उनका सर्वमान्य नेता नहीं बन पाया। क्षेत्रीय स्तर पर आजम, ओवैसी उभरे, लेकिन इन्होंने भी तो मुसलमानों का सिर्फ इस्तेमाल ही किया है।

आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार विकास मिश्र के एफबी वॉल से यह मैटर कापी कर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.

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डीएसपी मुकुल द्विवेदी का यूं जाना खल गया

Vikas Mishra : मुकुल द्विवेदी का यूं जाना खल गया। मेरठ में मैं जब दैनिक जागरण का सिटी इंचार्ज था तब मुकुल द्विवेदी वहां सीओ थे। बेहद मृदुभाषी, पुलिसिया ठसक से दूर। सहज ही अच्छी दोस्ती हो गई। अक्सर मुलाकात होती थी। कभी दफ्तर में तो कभी हम दोनों के साझा मित्र संजय सिंह Sanjay Singh के घर पर मुलाकात होती थी। मेरा एक कनेक्शन इलाहाबाद का भी था, मैं उनसे सीनियर था।

2003 की बात है, रात करीब ढाई बजे मेरे पास दफ्तर से फोन आया था। बताया कि बागपत का अखबार लेकर जा रही जीप को सिविल लाइन थाने में पुलिस ने बंद कर दिया है, ड्राइवर को गिरफ्तार कर लिया है। अब अखबार समय से बागपत पहुंचे, ये जिम्मेदारी मुझ पर डाली गई थी। मैंने थाने फोन किया, बता चला कि सीओ साहब गश्त पर थे, जागरण की गाड़ी ने उनकी गाड़ी में ठोंक दिया, जिसमें सीओ साहब घायल हो गए हैं। ये सीओ कोई और नहीं मुकुल द्विवेदी ही थे।

मैंने थानेदार हरिमोहन सिंह को फोन किया तो उन्होंने बताया कि साहब की गाड़ी ठोंकी है, सर, कैसे छोड़ सकता हूं, नौकरी चली जाएगी। जागरण की गाड़ी न होती तो ड्राइवर को कूट दिया जाता। मैंने कहा कि आप हैं कहां, बोले-अस्पताल में। मैंने कहा कि मुकुल का क्या हाल है। बोले सिर में चोट लगी है। मैंने कहा, बात करवा दीजिए। खैर, मुकुल से बात हुई। हाल-चाल हुआ, कुशल क्षेम हुआ। मैं सीधा अस्पताल गया, चोट ज्यादा नहीं थी, गनीमत थी।

हंसी मजाक हुआ, मैंने मजाक में कहा कि इतनी मुस्तैदी से ड्यूटी निभाएंगे तो ऐसी ही आफत आएगी, आधी रात के बाद गश्त लगाने की क्या जरूरत थी..।

मुकुल भी हंस पड़े। मुकुल ने खुद थानेदार से कहा कि गाड़ी छोड़ दो। मैंने कहा नहीं, एक कांस्टेबल भी साथ भेजिए। मेरी जिम्मेदारी सप्लाई पहुंचवाने की है, सिरफिरे ड्राइवर को बचाने की नहीं। मुकुल बोले-कोई बात नहीं, हो जाता है।

मुकुल की मुझसे ही नहीं, वहां कई पत्रकारों से दोस्ती थी। दोस्त आइटम थे। जब हाथरस में थे, तब मेरी उनसे बातचीत हुई थी। यहां कामकाज की आपाधापी में बरसों तक बात नहीं हो पाई थी। दो हफ्ते भर पहले मुझे पता चला था कि मुकुल मथुरा में एसपी सिटी हैं, सोचा था कि बात करूंगा, लेकिन मुहूर्त नहीं निकल पाया। और जब उनके बारे में खबर आई तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

मन कचोट रहा है, क्या कहूं, काश उन्हें फोन कर लिया होता, मथुरा है ही कितनी दूर, एक बार मिल आता, लेकिन अब क्या कहूं। कहते हैं कि वीरों का हो कैसा बसंत। यानी वीरों का बसंत तो मोर्चे पर ही होता है। मुकुल द्विवेदी मोर्चे पर मारे गए। उनकी शहादत को नम आंखों से मैं सलाम करता हूं। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे, उनके बुजुर्ग पिता, माता और पूरे परिवार को ये असीम दुख उठाने की क्षमता भी दे।

आजतक न्यूज चैनल में कार्यरत पत्रकार विकास मिश्र के एफबी वॉल से.

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‘आजतक’ के पत्रकार विकास मिश्र ने अपने बगल की सीट पर बैठने वाले अक्षय को यूं याद कर दी श्रद्धांजलि

Vikas Mishra : दफ्तर में मेरी ठीक बाईं तरफ की सीट खाली है। ये अक्षय की सीट है। अक्षय अब इस सीट पर नहीं बैठेगा, कभी नहीं बैठेगा। दराज खुली है। पहले खाने में कई खुली और कई बिन खुली चिट्ठियां हैं, जो सरकारी दफ्तरों से आई हैं, इनमें वो जानकारियां हैं, जो अक्षय ने आरटीआई डालकर मांगी थीं। करीब तीन महीने पहले ही दफ्तर में नई व्यवस्था के तहत, अक्षय को बैठने के लिए मेरे बगल की सीट मिली थी। वैसे दफ्तर में रोज दुआ सलाम हुआ करती थी, लेकिन पिछले तीन महीने से तो हर दिन का राफ्ता था। अक्षय…हट्ठा कट्ठा जवान। उसके हाथ इतने सख्त, मोटी-मोटी उंगलियां। मिलते ही हाथ, सिर तक उठाकर बोलता-‘सर, नमस्कार’ …और फिर हाथ बढ़ाता मिलाने के लिए। इतनी गर्मजोशी से हाथ मिलाता कि पांच मिनट तक मेरा हाथ किसी और से मिलाने लायक नहीं रहता।

बगल में सीट थी तो काफी बातें भी हुआ करती थीं। एक खोजी पत्रकार को क्या क्या झेलना पड़ता है, क्या क्या खतरे होते हैं, सब बताता था। एक चैनल में जब स्टिंग ऑपरेशन के दौरान पैसे के लेनदेन की खबरें उजागर हुईं तो अक्षय बहुत दुखी था। बोला- सर, यहां तो दुनिया दुश्मन बनी पड़ी है। हम लोग साख बनाने में जुटे रहते हैं, कुछ लोग बनी बनाई साख पर बट्टा मार देते हैं। अक्षय ने अपने करियर में कई सनसनीखेज खुलासे किए। अभी हाल ही में एडमिशन के सिंडीकेट को उसने उजागर किया था। ये संयोग ही है कि अभी 29 जून को उसके आखिरी स्टिंग-डॉगफाइट पर आजतक पर रात साढ़े आठ बजे का शो मैंने ही बनाया था। मैंने कहा-अक्षय पीटीसी कर दो। अक्षय बोला-नहीं सर, हम परदे के पीछे ही रहें तो ही अच्छा। वो शो अक्षय का आखिरी शो बनकर रह गया।

अभी हाल ही में अक्षय वैष्णोदेवी की यात्रा से लौटा था। माता-पिता को दर्शन करवाने गया था। वहां से प्रसाद लाया। प्रसाद में था-अखरोट। मुझे उसने कुछ अखरोट दिए, मैंने कहा-घर जाकर खाऊंगा। यहां किससे फोड़ूंगा। अक्षय ने अखरोट लिया, अंगुठे और तर्जनी के बीच रखा और अखरोट टूट गया। ये उसकी अंगुलियों की ताकत थी। इतने ताकतवर और बहादुर इंसान को यूं ही अचानक हॉर्ट अटैक आएगा..? दिल नहीं मानता। कल दोपहर ही अक्षय की मौत की खबर मिल चुकी थी। दफ्तर में ऐसा लग रहा था, जैसे अपनी लाश खुद ढोते हुए चल रहे हों। पत्रकार की जिंदगी का कोई मोल नहीं रह गया, कोई ठिकाना नहीं रह गया।

आज दफ्तर के लिए घर से निकल रहा था तो कई बातें जेहन में उमड़-घुमड़ रही थीं। बूढ़े माता-पिता और बहन का अकेला सहारा था अक्षय। पिता के हाथ कांपते हैं। जरा सोचिए, जिस बेटे को पिता ने गोद में खिलाया, कंधे पर बिठाया, मेले में घुमाने ले गया, उस बेटे को दिन ब दिन.. साल दर साल जवान होते देखा, उस बेटे को मुखाग्नि देने की जब नौबत आई, तब क्या बीती होगी उनके दिल पर। बच्चे को जरा सी आंच लग जाए तो पिता का कलेजा छलनी हो जाता है, लेकिन अपने जवान बेटे को चिता की आग के हवाले करते वक्त अक्षय के पिता के मन में पीड़ा की कैसी सूनामी उठी होगी। अक्षय के जाने से जब हम सब का कलेजा मुंह को आ रहा है तो उस मां के दर्द की तासीर क्या होगी, जिसने दूध पिलाकर बेटे को हट्ठा कट्ठा जवान बनाया। जिसके इंतजार में वो देर रात तक जागती थी, अब तो उस मां का इंतजार अनंत तक खिंच गया। छोटी बहन के लिए रक्षा बंधन और भाई दूज के मायने खत्म हो गए, क्या बीत रही होगी उस बहन पर। सुबह पदम सर Padampati Sharma का फोन आया था। भाव विह्वल होकर रोने लग गए थे। क्या कहें… हम सब का दुख बहुत छोटा है, अक्षय के परिवार वालों का दुख तो पहाड़ से भी भारी है।

आज हमारा जांबाज साथी अक्षय सिंह अनंत में विलीन हो गया, मिट्टी का तन मिट्टी में मिल गया, लेकिन उसकी यादों से कैसे पीछा छुड़ाएंगे हम। अपनी टेबल पर बैठकर ये पोस्ट लिख रहा हूं। बिल्कुल बगल वाली सीट खाली है, कई बार ऐसा एहसास हुआ कि हमेशा की तरह अक्षय बोलेगा- सर, आप कंप्यूटर पर टाइप करते हो या तबला बजाते हो..। नहीं अब कोई आवाज नहीं गूंजेगी। अक्षय अब कहां बोलेगा, वो तो उस दुनिया में चला गया, जहां से कभी कोई लौटकर नहीं आता।

आजतक न्यूज चैनल के वरिष्ठ पत्रकार विकास मिश्र के फेसबुक वॉल से.


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अब जहां-जहां वो पत्रकार नौकरी की बात करने जाता है, पहले चैनल वाला सीनियर उसकी कुचर्चा फैला दे रहा है

Vikas Mishra : करीब दो साल पहले की बात है। दिल्ली में ही एक मीडिया अवार्ड समारोह में मैं गया था, साथ में हमारे चैनल आजतक के कई और साथी भी थे। समारोह के बाद कॉकटेल और खाने का कार्यक्रम था। रात गहराई। मैं भी अपने खाने की प्लेट लेकर दूसरी तरफ निकला तो वहां मेरे चैनल की एक एंकर सोफे पर बैठी थीं। तीन सीट वाला सोफा था। उस एंकर ने मुझे देखते हुए बोला-विकास जी, यहीं बैठ जाइए। मैं बैठ गया। थोड़ी देर बाद वहां एक सज्जन जोर-जोर से अल्ल-बल्ल बक रहे थे। मैं कुछ देर तक समझ नहीं पाया। हमारी एंकर ने बताया कि उन साहब को कुछ ज्यादा चढ़ गई है। मुझसे पहले वे उस जगह बैठे थे, जहां अब मैं बैठा था। पहले उस एंकर के साथ तस्वीर खिंचवाने पर आमादा थे।

तस्वीर खिंची, फिर बैठकर बहकी-बहकी बातें करने लगे, प्लेट लेकर खाने के लिए कुछ और लेने आगे बढ़े थे, इसी बीच मैं वहां पहुंच गया था, मौका देखकर एंकर ने मुझे वहां बैठा लिया। अब साहबान के गुस्से की वजह पता चली। पूरे नशे में खूबसूरत एंकर की बगल में बैठने का जो सुख उन्हें हासिल हो रहा था, वो अचानक मेरी वजह से छिन गया। अब उनका आपे से बाहर होना जायज ही था। पूरी कहानी समझ में आई तो ये पता चला कि वो मुंह ऊपर करके जिस पर चिल्ला रहे हैं, वो मैं ही हूं। मैंने जानबूझकर उधर ध्यान नहीं दिया। इसके बाद उन भाई साहब ने धारा प्रवाह गालियां शुरू कर दीं, वो भी हवा में। सारी गालियां मेरे लिए ही थीं।

एंकर ने कहा-ये आपको गाली दे रहा है। मैंने कहा- हां पता है, ये दे रहा है, लेकिन मैं ले नहीं रहा हूं। उसकी गालियां चलती रहीं, कुछ लोग उसे समझाने में भी लगे दिखे, वो तो जामे से बाहर होता रहा, बस करीब नहीं आ रहा था। एंकर ने फिर मुझसे पूछा- ये कितनी गालियां दे रहा है आपको, आपको बुरा नहीं लग रहा है। मैंने फिर कहा-नहीं, अभी जो चीज ये मुझे दे रहा है, उसकी मुझे जरूरत नहीं है। इस पर हम दोनों हंस पड़े। ये हंसी उसको मिर्ची की तरह लगी। अपनी प्लेट जमीन पर पटककर तोड़ दी। माहौल थोड़ा तनावपूर्ण था, इससे पहले कोई गड़बड़ होती, हम लोगों ने एंकर को घर के लिए सुरक्षित रवाना कर दिया। अगले दिन उस एंकर ने मुझसे पूछा-वो गालियां दे रहा था, आप रिएक्ट नहीं कर रहे थे। मैंने तो पहले मजाक में वही दोहराया- हां वो दे रहा था, लेकिन मैं ले नहीं रहा था। फिर उसको असलियत. समझाई। मैंने कहा-दरअसल अगर मैं रिएक्ट करता तो हंगामा होता, वो नशे में था, वो कुछ भी कर सकता था, उसका शायद उतना नहीं बिगड़ता, लेकिन हम लोग वहां व्यक्ति रूप में नहीं थे, आजतक जैसे नंबर वन चैनल के प्रतिनिधि भी थे। कोई भी बखेड़ा होता, तो उससे आजतक बदनाम होता। वेबसाइट पर अगले दिन जाने क्या खबर छपी मिलती।

इस कहानी के जरिए मैं सिर्फ ये बताना चाहता हूं कि अगर आप बड़े हैं, किसी बड़े संस्थान का प्रतिनिधित्व करते हैं तो आपको इसकी कीमत भी चुकानी पड़ती है । बहुत कुछ नजर अंदाज करना पड़ता है। हर बात का जवाब देने वाला, हर इल्जाम पर सफाई देने वाला कभी भी बड़ा इंसान नहीं बन सकता है। पिताजी अक्सर एक फिल्म का किस्सा बताते हैं, फिल्म में एक शीशमहल है। परिवार के मुखिया की मौत हो जाती है, दुर्दिन में शीशमहल बिक जाता है। मजबूरी ये कि जिसका शीशमहल था, उसकी बेटी को शीशमहल के नए मालिक के घर ट्यूशन पढ़ाने जाना पड़ता था। एक दिन शीशमहल का नया मालिक उस लड़की को गलत नीयत से पकड़ लेता है। वो लड़की कहती है-आपको अभी सिर्फ शीशमहल खरीदने की तमीज आई है, शीशमहल में रहने की तमीज नहीं आई।

मैंने तमाम लोगों को थोड़ा ही मिल जाने पर इतराते देखा है, अकड़ते देखा है। थोड़ी ताकत मिली तो बस किसी को उजाड़ने में दिमाग लग जाता है। ऊंचे ओहदे पर बैठे तमाम लोगों से सरोकार रहे हैं, जो तू मेरा नहीं तो किसी और का भी नहीं रहने दूंगा वाली नीति पर चलते हैं।

एक न्यूज चैनल में एक पत्रकार की अपने सीनियर से नहीं पटी। बात इससे पहले बिगड़ती, उस पत्रकार ने इस्तीफा दे दिया। अब जहां-जहां वो पत्रकार नौकरी की बात करने जाता है, पहले चैनल वाला सीनियर वहां-वहां उसकी कुचर्चा फैला दे रहा है। एक जगह तो बात पक्की भी हो गई थी, लेकिन पुराने ने बनी बात बिगाड़ ही दी। वो सिर्फ बिगाड़ सकता है, बना नहीं सकता, अपने चैनल में उसकी इतनी भी औकात नहीं है कि वो चैनल में किसी को चपरासी भी रख सके।

मैं जब दैनिक जागरण में पहली बार वहां के डायरेक्टर से मिला था, तो करियर की बात चली, मैंने बताया कहां-कहां काम किया है। सूची में अमर उजाला के अलावा राष्ट्रीय स्वरूप अखबार, विचार मीमांसा पत्रिका, ईएमएस न्यूज एजेंसी का जिक्र आया। उन्होंने कहा-अमर उजाला को छोड़ दें तो आपने छोटे संस्थानों में काम किया है। मैंने जवाब दिया-हां मेरे संस्थान छोटे हो सकते हैं, लेकिन मैं इंसान छोटा नहीं हूं। मेरे इस जवाब से वे हड़बड़ा गए। हालांकि ये भी बताया कि सभी संस्थानों में मैं ब्यूरो चीफ पद पर ही रहा और छोटे संस्थानों में काम करना आसान नहीं होता, सीखने को भी बहुत कुछ मिलता है। खैर उनसे रिश्ता शानदार रहा। जागरण में मैं साढ़े तीन साल रहा। रहा क्या, राज किया।

कई बार नजर घुमाकर देखता हूं तो कई जगह बड़े पद पर बहुत छोटे इंसान बैठे दिखते हैं। इनमें से कई जीनियस हैं, कई विद्वान हैं। कई अपने काम के माहिर हैं, लेकिन इंसान कैसे हैं, ये सवाल तो बस छोड़ ही दीजिए। हफ्ता भर पहले एक वरिष्ठ पत्रकार मुझे लेकर एक धन्नासेठ से मिलने गए थे। उस धन्ना सेठ ने बताया कि वो तीन हजार करोड़ की कंपनी का मालिक है। तीन घंटे वहां रहे, बातें हुईं, तीन चार लोग और भी थे वहां। वो धन्ना सेठ खुद ही बताता रहा-मेरे पास इतनी मर्सडीज है, इतने ऑडी हैं। दो गाड़ियां वहां रखता हूं, जहां साल में दो बार से ज्यादा जाता नहीं। सुब्रत राय को मैंने ये कह दिया, वो कह दिया, अखिलेश यादव से हर हफ्ते बात होती है….वगैरह वगैरह। जब तक हम लोग बैठे रहे, वो बस अपने धनबल पर इतराता रहा। मुलाकात खत्म होने के बाद गदगद वरिष्ठ पत्रकार ने मुझसे पूछा-कैसा लगा मिलकर, इसके बारे में आपका क्या आकलन है। मैंने कहा- आदमी भले ही ये तीन हजार करोड़ का हो, लेकिन इंसान ये दो कौड़ी का भी नहीं है।

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वे चेहरे जो आजतक न्यूज चैनल चलाते हैं

Vikas Mishra :  गौर से देख लीजिए इन चेहरों को। यही हैं जो आजतक न्यूज चैनल चलाते हैं। सबसे किनारे मंद मंद मुस्कुरा रहे हैं हमारे मैनेजिंग एडिटर सुप्रिय प्रसाद। उनके बगल में हैं इनपुट हेड संजय ब्रागटा पीछे ठहाका मार रहे हैं हमारे आरसी भाई।

उनके बगल में हैं पीयूष पांडेय, फिर सईद अंसारी, उनके बगल में आउटपुट हेड मनीष कुमार और फिर स्वयंभू मैं हूं।

सबसे किनारे हैं हमारे ग्राफिक औड डिजायनिंग हेड नवीन बिष्ट। ये तस्वीर है हम लोगों के साथी आरसी शुक्ला की विदाई पार्टी की। आरसी अब आईबीएन-7 के एक्जीक्यूटिव एडिटर हैं।

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एलआईसी पालिसी और बोनस के नाम पर ठगने वालों के जाल में फंसते फंसते बच गए पत्रकार विकास मिश्र

Vikas Mishra : हफ्ते भर पहले किसी राज सिन्हा का फोन आया था। उन्होंने खुद को एलआईसी का सीनियर एक्जीक्यूटिव बताया। बोले-मुंबई से अभी ट्रांसफर होकर दिल्ली आया हूं। आपकी पॉलिसी का स्टेटस देखा, तो पता चला कि आपको सालाना बोनस अभी एक भी साल का नहीं मिला है। क्या आपको एजेंट ने बताया नहीं था कि हर साल साढ़े सात हजार रुपये बोनस मिलेगा..? मैंने कहा नहीं ये तो नहीं पता था। तब वे बोले कि ऐसा है कि आप दिसंबर की बजाय अक्टूबर के पहले हफ्ते प्रीमियम जमा करवा दें, हम आपका बोनस जो अब तक करीब 32 हजार हो चुका है, उसे आपको दिलवा देंगे। प्रीमियम भी आपको 36 हजार की जगह सिर्फ 34 हजार 610 रुपये देना होगा।

मैंने भरोसा कर लिया। दो बार और बात हुई थी, जिसके मुताबिक आज दशहरे के दिन मुझे वो किस्त कैश में देनी थी। कल ही एटीम से निकाले थे पैसे। आज सुबह उनकी कथित एक्जीक्यूटिव का फोन आया कि सर कब आ जाऊं पैसे लेने। मैंने पूछा कि क्या रसीद ले आएंगी..? बोली-नहीं वो तो मुंबई से आएगी। मैंने पूछा-फिर मेरे पास क्या प्रमाण होगा कि हमने प्रीमियम दे दिया है। वो बोली-सादे कागज पर लिखवा लीजिएगा। मैंने उसका नाम पूछा तो बोली-अनू। मैंने अनू क्या.. आगे पीछे भी तो कुछ होगा। उसने कहा नहीं सिर्फ अनू..। मुझे शक हुआ। एलआईसी की एक एजेंट से मेरा परिचय था, उसे फोन किया। वो बोली-सर ये बड़े स्तर पर फ्रॉड चल रहा है। बोनस के बहाने ये लोग कैश या ड्राफ्ट ले लेते हैं। जिनसे ड्रॉफ्ट लेते हैं, उस ड्रॉफ्ट से पॉलिसी खरीद लेेते हैं, फिर उसे सरेंडर करके पैसा लेकर चंपत हो जाते हैं। उसने उस कथित राज सिन्हा से बात की-थोड़ी ही देर में वो फंस गया और फोन काट दिया।

ये पोस्ट मैंने सभी दोस्तों को जागरूक करने के लिए लिखा है। अगर आपके पास भी किसी धोखेबाज का ऐसा फोन आए तो सावधान हो जाइए। एलआईसी आपका बोनस आपके एकाउंट में डालती है। न कि कोई आपको फोन करके बताएगा उसके बारे में। एक बात ये भी पता चली कि एलआईसी दफ्तर से जब भी कोई फोन आएगा तो वो लैंड लाइन से आएगा, मोबाइल से नहीं। इन ठगों का दुस्साहस देखिए, ये पता होने के बाद भी कि मैं आजतक चैनल में काम करता हूं, वो मुझे ठगने दफ्तर तक आ रहे थे। एक बार तो दिमाग में आया कि उन्हें दफ्तर में बुलाकर गिरफ्तार करवा दूं, लेकिन मौका चूक गया। बहरहाल आप सतर्क हो जाइए, ऐसे धोखेबाजों से बचकर रहिए। मित्रहित में जारी ।

आजतक चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार विकास मिश्रा के फेसबुक वॉल से.

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पत्रकारिता में हिंदी का ‘नरक’ युग

Vikas Mishra : न्यूज चैनल देखूं या अखबार..। जैसे ही किसी शब्द में मात्रा, वर्तनी की अशुद्धि दिखती है तो लगता है जैसे पुलाव खाते हुए, अचानक दांतों के बीच मोटा सा कंकड़ पड़ गया हो। पत्रिकाओं, अखबारों में मैंने काम किया, न्यूज चैनल में काम कर रहा हूं और एक प्रवृत्ति भी देख रहा हूं कि वर्तनी और मात्रा को लेकर अब न बहस होती है और न ही लड़ाई। आठ साल से तो मैं खुद ‘नरक’ की लड़ाई लड़ रहा हूं। मैं जानता हूं कि सही शब्द है-नरक, लेकिन न्यूज चैनलों में अमूमन दिख जाता है-‘नर्क’। जैसे स्वर्ग लिखते हैं, वैसे ही ‘नर्क’ लिख देते हैं। एक चैनल में मोटे-मोटे अक्षरों में ‘नर्क’ चल रहा था, उनकी अपनी ब्रेकिंग न्यूज थी, घंटों चलना था और सेट पर मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा था-‘नर्क’ । उस चैनल में कई साहित्यप्रेमी, साहित्य मर्मज्ञ भी हैं।

मैंने फोन करके कहा-सर इस ‘नर्क’ को नरक करवा दीजिए। कम से कम आपके यहां नहीं चलना चाहिए। वो बोले- घंटे भर से यही चल रहा है, अब बदलना ठीक नहीं होगा। उन्होंने बदला नहीं, बदलवाया नहीं। चैनल पर ये ‘नर्क’ चलता ही रहा। मैंने फोन करके टोकने का काम नहीं छोड़ा। अपने ही एक सहयोगी चैनल पर जब ये ‘नर्क’ देखा तो चैनल हेड को टोका। बोले-चलता है, इतना ध्यान नहीं देना चाहिए। परसों रात इंडिया टीवी पर ये ‘नर्क’ आ गया। एक पुराने साथी से कहा ठीक करवा लीजिए। बोले- यहां तो गजब किस्म का राज है। एक वर्ग है जिसने कुछ शब्दों के गलत प्रयोग को ही सही बना रखा है। इसमें कोई दखल नहीं दे सकता। परसों रात मैं इंडिया टीवी के ‘नर्क’ को सुधारने चला था, लेकिन कल रात मुझे आजतक पर ही ये ‘नर्क’ दिख गया।

बात सिर्फ इस ‘नर्क’ की नहीं है। न्यूज चैनल के टिकर, ब्रेकिंग न्यूज, न्यूज फ्लैश में जो शब्द दिखता है, अखबार में जो शब्द छपता है, उसे ही लोग सही मानकर आगे बढ़ते हैं। हमारी जिम्मेदारी है कि शुद्ध और सही प्रयोग करें। गलत प्रयोग से हम अपनी पूरी पीढ़ी बिगाड़ेंगे। मैं अपनी नैतिक जिम्मेदारी समझते हुए जहां भी, जिस भी चैनल में गलत हिंदी चल रही होती है, वहां वरिष्ठ सदस्य को फोन करके बाकायदा कहता हूं कि इसे ठीक करवा लीजिए। यहां एक नाम मैं जरूर लेना चाहूंगा अजीत अंजुम सर का। न्यूज 24 छोड़ने के बाद किसी भी गलत हिंदी प्रयोग पर जब भी मैंने उन्हें फोन किया, उन्होंने बिजली की रफ्तार से वो गलती ठीक करवाई।

शब्दों के सही प्रयोग पर बहस होनी चाहिए। इसे किसी भी स्तर से शुरू किया जा सकता है। मुझे याद है कि 2006 में मैं नया नया आजतक में आया था। फिल्म ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ के गांधीगीरी शब्द का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा था। ज्यादातर लोग ‘गांधीगिरी’ लिख रहे थे। मैंने मेल किया कि सही शब्द है-‘गांधीगीरी’। उदाहरण भी दिया-जहांगीरी, आलमगीरी। मेल पर बहस छिड़ गई। उस वक्त चैनल हेड थे कमर वहीद नकवी जी। उनका जवाब आया-सही शब्द ‘गांधीगीरी’ ही है। दादा ने कह दिया तो सही प्रयोग होने लगा।

पांच साल मैंने मेरठ में अमर उजाला और दैनिक जागरण में काम किया। मेरठ में लिखने की भाषा की कुछ जानी पहचानी गलतियां हैं। वहां टैक्स को ‘टेक्स’ और ‘सेक्स’ को ‘सैक्स’ लिखा जाता है। वहां सड़क में ड के नीचे बिंदी नहीं लगती, लेकिन रोड के ड के नीचे लगती है। वहां दस में से 7 मेरठी पत्रकार ‘सडक’ और ‘रोड़’ लिखते थे। मैंने पांच साल तक ‘रोड’ के नीचे की बिंदी उठा उठाकर ‘सड़क’ के नीचे लगाई।

‘यद्यपि सिद्धम् लोकविरुद्धम्, नाचरणीयम् नाकरणीयम्।’ का हवाला देते हुए कुछ लोग कहते हैं कि जैसा चल रहा है, वैसा चलाना चाहिए। मैं इसका पक्षधर नहीं हूं। एक बार विद्यानिवास मिश्र जी ने कहा था-हमारा काम जनरुचि के हिसाब से चलना नहीं, बल्कि जनरुचि को मनाकर सही राह पर चलाना है।

पिछले साल की बात है। उस वक्त के रेल मंत्री पवन बंसल का भानजा घपले में पकड़ा गया था। जिस चैनल पर देखो-वहां भानजा की जगह-भांजा। मैंने समझाने की कोशिश की। कहा कि भांजा से लाठी भांजने की ध्वनि आती है। भानजा वस्तुतः बहनजाया और भगिना जैसे मूल से अपभ्रंश हुआ होगा। मैंने शो बनाया और उससे पहले मैंने नकवी सर से बात की। तब वो आजतक में नहीं थे। उनकी मुहर लगी और मैंने-सेट, शो ओपेन के लिए ‘भानजा’ शब्द दिया। लेकिन जैसे ही शो हिट हुआ-देखा सेट पर लिखा था-‘भांजा’। ग्राफिक्स वाले से पूछा-ये तुमने क्या कर डाला। बड़ी मासूमियत से बोला-सर वो ग्राफिक्स में आपने गलत लिखा था, हमने सही कर दिया। दरअसल मैंने गलत नहीं किया था। बरसों से ‘भांजा’ लिखने वालों ने उसके दिमाग में बिठा दिया था कि सही वही है । खैर मैंने तत्काल वो शब्द बदलवाया, बाद में हमारे कुछ और साथियों ने भी सही रूप चलाया।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में मेरे करियर का आगाज ही था। रमजान आ गए और चैनल में नमाज ‘अता’ होने लगी। मैंने टोका तो बहस हो गई कि अता ही सही है, लेकिन मैं टिका रहा कि नमाज अदा होती है, न कि अता। मैंने एक नामचीन शायर से एक वरिष्ठ की बात करवाई उन्होंने बखूबी अता और अदा का फर्क बताया। फिर नमाज ‘अदा’ होने लगी।

हिंदी चैनलों और अखबारों की एक मानक वर्तनी बने, उसके लिए मैं काम करने को भी तैयार हूं। और भी मित्र आगे आएं, हफ्ते भर में ये काम हो जाएगा। मैं अखबार में रहा, जिस चैनल में रहा या हूं। सही वर्तनी, सही शब्द को लेकर मैंने हमेशा बहस की है, वही प्रयोग किया है जो वास्तव में सही है। भाषा तो ऐसी चीज है, जिसमें कोई भी सर्वज्ञ नहीं हो सकता। जितना सीखिए, आगे सीखने को बहुत कुछ बच जाता है। मुझे भी जिस शब्द पर शंका होती है, उस पर दो तीन भाषाविदों से बात करता हूं, पूरा भरोसा हो जाता है तो प्रयोग करता हूं। दूसरे चैनलों से वर्तनी को लेकर फोन आते हैं तो बड़ी खुशी होती है। एक दिन घर में तनाव का माहौल था, फोन आया, एक साथी ने पूछा-सर, धुनाई में ध पर छोटे उ की मात्रा लगेगी या बड़े ऊ की। तनाव भरे चेहरे पर मुस्कान फैल गई।

मैं महुआ न्यूज में था, राणा यशवंत जी से भाषा-वर्तनी पर बात हो रही थी। तभी चैनल पर दाद-खाज-खुजली की दवा बी-टेक्स का विज्ञापन आ गया। देखकर हम दोनों ने माथा पीट लिया। (अब उसमें क्या गड़बड़ थी, आप खुद देख लीजिए, यहां लिखना ठीक नहीं है)

पुनश्च- फेसबुक पर किसी को पोस्ट, फोटो टैग करने का मैं घनघोर विरोधी हूं, फिर भी ये पोस्ट मैं कुछ वरिष्ठों-मित्रों को टैग कर रहा हूं, क्योंकि मेरी बात उन तक पहुंचनी जरूरी है। Qamar Waheed Naqvi, राहुल देव, Ajit Anjum, Rana Yashwant, Anant Vijay

आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार विकास मिश्र के फेसबुक वॉल से.

उपरोक्त स्टेटस पर आए प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Drigraj Madheshia भईया ! शब्द ही नहीं बहुत सारी चीजों के सही गलत होने का पैमाने दो ही होते हैं। एक मेज के इस पार दूसरा उस पार। बाकि जो है सो ….
 
Sharma Montu qamar waheed naqvi sir ki baat hi kuch or h. m hamesha un se ye sab jaanne or sikhne ki koshis karta rahta hu unke lekh ke dwaara….sir aapne sahi kaha agar koi sahi likhta h to upar waale use galat bata dete h ham kya kare manna padta.
 
Nalin Chauhan बहुत बढ़िया, बनारसी बतकही के साथ भाषा की चिंता, मजा आ गया विकास. मैं आज ही आईआईएमसी के दिनों की याद में एक साथी से कह रहा था कि हमारे बैच में कितने रथी थे और कुछ महारथी जिसमे विकास भी एक था. कितना कुछ सीखा एक दूसरे से बिना सिखाए-बताये.
 
पूर्णेन्दु शुक्ल लश्कर भी तुम्हारा है , सरदार तुम्हारा है ……… तुम झूठ को सच लिख दो , अखबार तुम्हारा है …
 
Naveen Negi बेहद ज्ञानवर्धक पोस्ट है सर हम जैसे नए पत्रकारों के लिए। सही भाषा लिखने की चिंता अक्सर होती है, परंतु फिर जल्दिबाजी के फेर में गलत शब्दों का प्रयोग हो जाता है। आपके मार्गदर्शन की जरूरत रहेगी हमेशा।
 
Amarendra A Kishore विकास ! मुझे तुम्हारे अंदर पंडित विद्यानिवास मिश्रा जी की छवि दिख रही है। अपने बैच में तो कई लोग हंस पत्रिका पढ़कर बुद्धिजीवी होने का ढकोसला करते थे। और बाद में कहने लगे कि अरे तुम भी लिखते हो ?अब उन बेहूदों को कौन समझाए कि तुम तो एसएससी के कनिष्ठ लिपिक में चयनित होने लायक नहीं थे।
 
संतोष उपाध्याय भांजा – भानजा के मध्य , का अंतर अभी आज समझा । ये बहुत बड़ी विडम्बना है । इसके पीछे का सबसे बड़ा कारण है , हम सीखने में अपनी तौहीन समझते है । कोशिश करते रहना चाहिए । जिन जिन चैनल्स में परिचय है , हम भी सुधार का प्रयास करते है । अर्थ का अनर्थ होते देर नहीं लगती । वर्तनी ही आपके समाचार की पहचान है । ग़लत वर्तनी वह छाप नहीं छोड़ पायेगी दर्शकों के हृदय पर । समाचार चैनल्स में उपस्थित विज्ञ महापुरुषों से करबद्ध अनुरोध है कि विकास भईया के इस मुहिम में आगे आयें ।
 
Kunal Deo Bhasha ki galati se bhav bhi mar rahe hain…

 
Gaurav Pandey Hindi ko hinglish bnnnane vale bhi khoob bantadhar kr rhe hain hindi ka….!!!
 
Vikas Mishra Naveen Negi 24 घंटे, 365 दिन…जब चाहें बात कर सकते हैं।
 
Pramod Shukla बहुत बहुत बधाई…… लगे रहिए…. बहुत जरूरी है…. हिन्दी न्यूज चैनलों में ई-मेल का आदान-प्रदान यदि हिन्दी में शुरू हो जाए तो बहुतो की भाषा धीरे-धीरे अपने-आप शुद्ध होती चली जाएगी….. चर्चा कीजिए…. शायद वरिष्ठों की समझ में ये बात आ जाए…..
 
Vikas Mishra Pramod Shukla मैं बरसों से ये काम कर रहा हूं। मैं हमेशा हिंदी में ही मेल भेजता हूं। ये काम पूरे गर्व के साथ करता हूं, किसी ने आपत्ति भी नहीं जताई है आजतक।
 
Amrita Maurya Vikas, tumne mera dard uker kar rakh diya, sachh mein, bilkul thik likha hai! Gandhi giree/geeree par meri bhi kaha-suni ho chuki hai….road ke niche bindi dekh kar aaj bhi mann hoto hai patthar utha kar maarun…
 
Shabnam Khan hindi bolne waalon ko sochte hain inhe kam knowledge hai par hamare jaise log vikas ji hindi ko hamesha zinda rakhenge
 
Ankit Kumar Sir, Bhasha basic chij hai aur vartani ki ashudhiyo ko ignore nahi kia ja sakta. kyonki galat najir pesh krti hai aur aankhon me khatakti hai. mai sachmuch chahunga aisi ek standard patrakarita dictionary bane. jo hamare liye bahut hi madadgar sabit hoga. is pr twarit dhyan dene ki jaroorat haiSee Translation
 
Ajay Pandey bilkul sahi kaha aapne sir…hindi ka patan Hota dikh rha hai.
 
Rahul Pandey यहां सिर्फ़ मात्रा और वर्तनी की अशुद्धि को छोड़ दिया जाए सर.. तो चैनलों पर होने वाले ग़लत उच्चारण से भी खीझ मचती है.. This is a big turn off for me.. और हां.. लोग कहते हैं कि चैनलों में ज़्यादा नुक्ताचीनी नहीं होनी चाहिए.. मैं इसका विरोधी हूं.. अरे भई ! हिंदी भाषा जैसी है उसको उसी तरह से ही लिखा जाना चाहिए। आम दर्शक बहुत समझदार है।
 
Dinesh Agrahari सर, मैं भी इससे परेशान रहता हूं। आधा दर्जन से ज्‍यादा संस्‍थानों में काम कर चुका हूं। समझ में नहीं आता हिन्‍दी मीडिया में एक मानक वर्तनी, शब्‍दावली क्‍यों नहीं बना ली जाती। ऐसी वर्तनी का एक वेबसाइट या ब्‍लॉग बनाया जा सकता है, जिसे देखकर सभी अखबार, चैनल, पत्रिकाएं इस्‍तेमाल करें। कोई इजरायल लिखता है कोई इस्राइल तो कोई इस्रायल । सबसे दुख होता है टीवी एंकर्स द्वारा धड़ल्‍ले से बोले जा रहे गलत शब्‍दों को देखकर। कार्यवाही की जगह कार्रवाई बोलते हैं, उबरने की जगह उभरना, इकट्ठा की जगह इखट्टा बोलते हैं और ऐसी दर्जनों हास्‍यास्‍पद गलतियां करते हैं।
 
Shikhar Chand Jain अपना मोबाइल नंबर इनबाक्स देँ ।कभी कभी सताऊंगा ।पोस्ट शेयर कर लूँ ?
 
Richa Srivastava Sir… ‘ek pyaali chai’/’ek pyaala chai’ aur ‘zameer’/’jameer’ jaise bahut saare shabdon par aksar behas hoti hai ! Ek standard reference book honi chahiye… … b-tex wala to maine bhi har baar notice kiya hai…
 
Sumit Jha सर, लिखने के साथ साथ उच्चारण करने के बारे में क्या कहेंगे, मसलन गृहमंत्री का ग्रह मंत्री, कई सारे एंकर महोदय या महोदया को बोलते सुनता हूं , इस पर भ बहस होनी चाहिए
 
JP Tripathi बिल्कुल ठीक बात कहा आपनेँ हम आपके साथ हैँ।
 
Naveen Upadhyay विकास जी आपके संस्मरण लाजवाब होते है ! हिंदी में बड़ते प्रदूषण पर आपने बड़ी बेबाक टिप्पणी की है ! आपको जब भी पड़ता हूँ,पंडित जी याद आ जाते है ! पंडित विध्यानिवास जी मिश्र, पंडित जी मेरे परिवार से गहराई से जुड़े थे ! जब भी उनसे चर्चा होती अशुद्ध हिंदी बोलने पर तुरंत बीच में ही टोक देते,मेरे बडे भैया नर्मदा प्रसाद उपाध्याय के साथ वे हरदा में हमारे पुश्तैनी घर पर आकर पूरे परिवार से मिलते थे ! पंडितजी से जीवन में बहुत कुछ सीखा और कोशिश की कि इसी पगडंडी पर आगे बड़ता रहूँ !

Alok Kumar सिर्फ वर्तनी ही क्यों व्याकरण के तमाम मापदंडों को शामिल कर लीजिए.. लिंग पर ग़ौर फरमाएंगे तो वहां भी निराशा हाथ लगेगी. कारक का इस्तेमाल भी विचित्र पाएंगे. उच्चारण भी निराश करेगा. लाख दिवस मनाएँ हिंदी पत्रकारिता अनुवाद के बिना नहीं चल सकती लेकिन कई बार अनूदित शब्दों-पदबंधों को देख शर्मसार होना पड़ता है.. लेकिन हिंदी उदार है.. उसे बलात्कार से भी गुरेज नहीं. क्योंकि हिंदी प्रगतिशील है. बहादुर शाह जफर मार्ग इसकी पराकाष्ठा है..
 
अधूरा ख़्वाब सिर्फ़ न्यूज़ चैनल में ही नहीं अखबार और पत्रिकाओं में भी ऐसी अशुद्धियाँ देखने को मिलती रहती हैं..इस तरह के सुधार के लिए आप जैसे लोगों की ज़रुरत है…. मेरी राय यह है कि इस तरह की संभावित; वर्तनी और भाषा सम्बन्धी अशिद्धियों की सूची तैयार करके उसको एक पुस्तक का रूप दिया जाए..और उसे सभी मीडिया स्कूलों में पढने वाले मीडिया छात्र-छात्राओं के लिए अनिवार्य कर दिया जाए…क्योंकि अगर आधार मजबूत रहेगा तो सुधार की ज्यादा गुंजाईस रहेगी…

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इस व्यवस्था में कितना मुश्किल है किसी गरीब का जी पाना… जानिए जानी आलम की कहानी

Vikas Mishra : हर इंसान में कहानी है। कई बार तो लगता है कि कहानियों से लैस इंसान अक्सर मुझसे टकरा जाता है। एक पेंटर है-जानी आलम, बिल्कुल दुबला-पतला। मेरे किराए वाले घर को उसी ने पेंट किया, बाद में अपने घर में भी उसी से पेंटिंग करवाई। कल तक उसके बारे में इतना ही जानता था- मेहनती है, ईमानदार है, जरूरतमंद है और गरीब भी। आज काम खत्म हो गया था। वो फाइनल पेमेंट लेने आया था। मैंने उसे पेमेंट के साथ जींस का पैंट और शर्ट दिया, कुछ इनाम भी। (ये मेरी मां का फरमान है कि अगर कोई दो दिन से ज्यादा घर में काम करता है, तो उसे कपड़ा और कुछ इनाम जरूर देना, मेहनतकश लोगों की दुआएं लगती हैं) कपड़े और इनाम पाकर जानी खुश बहुत हुआ, इतना कि रोने ही लगा। जींस नापा तो फिट था, कमर थोड़ी ढीली थी। मैं अंदाज से 30 नंबर का ले आया था, लेकिन उसकी कमर तो 28 इंच की निकली। खैर जानी बोला-कोई बात नहीं सर जी। हफ्ते भर ठीक से खाऊंगा तो टाइट हो जाएगी। वो तो परेशानियों ने मार रखा है, वरना मैं ऐसा नहीं था।

जानी ने अनोखी दास्तान सुनाई। सात साल पहले उसने एक लड़की से प्रेम विवाह किया था। हालांकि लड़की भी मुस्लिम थी, फिर भी घर वालों ने जानी का साथ छोड़ दिया। गाजियाबाद आकर मेहनत-मजदूरी करने लगा, पेंटिंग आती थी, काम भी मिलने लगा। शादी के एक साल बाद एक बेटी और पांच साल बाद एक बेटे का पिता बना। इस बीच उसकी बीवी की भाभी ने फांसी लगाकर खुदकुशी कर ली। उसके मायके वालों ने रिपोर्ट लिखाई तो जानी की बीवी का नाम भी लिखवा दिया, जिसका मायके से बरसों पहले नाता करीब करीब टूट चुका था, लेकिन कानून की माया..पुलिस ने उसे गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया। डेढ़ साल के बेटे के साथ वो जेल चली गई, छह साल की बेटी जानी के पास रह गई। दिन रात वो उसी के पास रहती। काम पर जाता तो साथ ले जाता। जानी कह रहा था-सर जी बेटी से ज्यादा ही मुहब्बत हो जाती है। वो मेरे बिना एक मिनट नहीं रह पाती थी। जहां जाता, साथ में चिपकी रहती थी। जानी की सबसे बड़ी चुनौती बीवी को जेल से छुड़ाने की थी। इंसाफ की अंधी देवी को जानी की हालत वैसे भी नहीं दिखाई देनी थी। कुछ पुलिस को चढ़ावा गया, कुछ वकीलों को और कुछ जेल में भी। कर्जा चढ़ता गया, लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। दिन रात मेहनत करता रहा, बचे वक्त में बीवी को जेल से छुड़ाने के लिए इस दर, उस दर भटकता था। आखिरकार इसी ईद के चार दिन पहले उसकी बीवी जेल से जमानत पर छूट गई, पूरे सात महीने बाद..। लेकिन इस सारी कवायद में जानी करीब दो लाख रुपये का कर्जदार हो गया। बोल रहा था-सर जी एक से कर्जा लिया था, कल आकर सिर पर सवार हो गया, मैंने कहा भाई मैं भागा नहीं जा रहा हूं, बिना चुकाए मरूंगा भी नहीं।

पड़ोस में एक चौधरी है, प्रॉपर्टी डीलर है। उसका प्लाट है, आधा बना हुआ है, आधा खाली है। उसमें वो भैंस और गाय रखे हुए है। जानी उसी में एक छोटी सी कोठरी में परिवार के साथ रहता है। चौधरी की गाय और भैंस की देखभाल करता है, गोबर उठाता है, साफ सफाई करता है। चौधरी उससे किराया नहीं लेता। जानी कहता है-सर जी, कर्जदारों के तकादों से ऊबकर कई बार मन करता है कहीं भाग जाऊं, खुद को खतम कर लूं, लेकिन जब बेटी का चेहरा देखता हूं, तो भीतर से आवाज आती है कि मेरे बिना इसका क्या होगा। बेटी के लिए ही जीना है सर जी। आप ये कहानी पढ़ रहे हैं और मैं ये कहानी उससे सुन रहता था, जिस पर ये बीती थी। अगर इसे पढ़कर आपके भीतर कुछ हुआ तो आप अंदाजा लगा सकते हैं मेरे भीतर कितना कुछ हुआ होगा।

आजतक न्यूज चैनल में कार्यरत पत्रकार विकास मिश्र के फेसबुक वॉल से.

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दैनिक जागरण, मेरठ के संपादक मनोज झा ज्योतिषी भी हैं!

Vikas Mishra : मेरठ में एक मुहल्ला है, उमेश नगर। 2000 में अमर उजाला में काम करने के दौरान वहां कमरा लिया था। पड़ोस में आसपास ही पुराने दोस्त मुकेश सिंह, सतीश सिंह, संजय श्रीवास्तव, दीपक सती, संजीव सिंह पुंडीर, दिनेश उप्रैती रहते थे। सभी अमर उजाला में काम करते थे। एक परिवार की तरह रहते थे। सुबह हो या शाम या दोपहर..कोई किसी के घर चला जाता था, चाय नाश्ता या भोजन कौन कहां करेगा, तय नहीं होता था। जहां पहुंच गए, वहीं धूनी रम गई। मनोज झा हम लोगों के खास मेहमान होते थे, वो रहते थोड़ी दूर थे, लेकिन आते रोज थे, शादी हुई नहीं थी तब उनकी। झा साहब पत्रकारिता के पुरुषार्थी तो थे ही, ज्योतिष और आयुर्वेद पर भी उनकी गहरी पकड़ है। आप पता नहीं कितना यकीन करें, लेकिन झा साहब हाथ देखकर गजब की चीजें बता देते थे।

कई बार मेरे ही घर पर लोगों का हाथ देखा, जोर से बोलने की उनकी आदत, आवाज चारों तरफ जाती थी। मकान मालिक के बड़े बेटे राजेश उर्फ पिंकू ने एक दिन पकड़ लिया, बोला धंधा अच्छा नहीं चल रहा, झा साहब कल्याण कर दो। पिंकू क्रिकेट बॉल बनाने के बिजनेस में था, मेरे बगल वाले कमरे में रहता था। झा साहब ने हाथ देखा, बोले- अरे तुम्हारा मंगल तो पुत्तू हो गया है, धंधा क्या तुम भी डूब जाओगे। पिंकू डरा, उपाय पूछा। झा साहब ने कहा- अभिमंत्रित करके सात रत्ती का मूंगा पहन लो। खैर इसे संयोग कहें या झा साहब का हुनर, उसने मूंगा पहना और दो महीने के भीतर उसका धंधा चमक गया। धंधा चमका तो वो सातवें आसमान पर था। एक दिन पिंकू अपनी गर्लफ्रेंड को लेकर घर आया। वो उसके साथ ही कमरे में रुकी। रुकी क्या, रहने ही लगी। मकान मालिक ने बेटे को समझाने की कोशिशें कीं, लेकिन मां ने पिंकू की बजाय बहू को समझाना शुरू किया-अरे तू क्यों परेशान है, तू तो मेहनती है, जहां भी काम करेगी, वहीं खाने और पहनने को मिलेगा। हां बताना भूल गया था कि पिंकू शादीशुदा था, एक प्यारे से बच्चे का बाप था। बीवी बेहद सीधी, थोड़ी कम पढ़ी लिखी, लेकिन दिन भर काम में खटती रहती थी। दो गायों को चारा खिलाने से लेकर दूध दुहने तक की जिम्मेदारी उसी की थी। बस ससुर उसकी थोड़ी सी मदद कर देता था। बाकी वक्त भाभी का किचेन में खाना बनाने में जाता था। सबका ख्याल रखती थी। सितम की हद ये थी कि वो पिंकू और उसकी गर्लफ्रेंड को बेड टी पहुंचाने ऊपर आती थी। सलवार कुर्ता और सिर पर घूंघट सा बना दुपट्टा, यही उनकी हमेशा से पहचान थी। उस घूंघट के पीछे वो कितनी सुलग रही होगी, इसका तो बस अंदाजा ही लगाया जा सकता है। किराएदार की हैसियत में रहते हुए मैंने एक दिन कड़ाई दिखाई। गर्लफ्रेंड घर से बाहर हो गई, लेकिन पिंकू का अपनी पत्नी से रिश्ता कभी मियां बीवी का नहीं रहा।

एक दिन पिंकू की बीवी ने मेरी पत्नी से बात की, अपना दर्द बयान किया। कहा कि किसी तरह से झा साहब को बुलवाकर उसका हाथ दिखवा दें। बीवी ने मुझसे सिफारिश की। मैंने भाभी को समझाने की कोशिश की कि उससे कुछ फायदा नहीं होने वाला, लेकिन झा साहब पर भाभी को अटूट विश्वास था, उन्होंने अपने पति का धंधा चमकते हुए देखा था। ये काम मुश्किल नहीं था, मुश्किल ये थी कि ये मिशन बेहद गुप्त तरीके से निपटाना था। झा साहब ने हाथ देखा- बोले, अरे ये तो मुझसे गड़बड़ हो गई। जब तक उसके हाथ में मूंगा है, तब तक तो कुछ नहीं हो सकता। झा साहब ने भाभी को फिरोजा पहनने की सलाह दी। भाभी पैसे भी छिपाकर लाई थी, झा साहब को दिए, बोली- मैं कहां जाऊंगी, आप ही बनवा दिए। हुआ भी यही, खैर भाभी ने अंगूठी पहनी इस अटूट विश्वास के साथ कि अब उसका कल्याण हो जाएगा। अब झा साहब पिंकू की तलाश में थे, क्योंकि पिंकू अक्सर घर से गायब रहता था। एक दिन मिल गया, झा साहब बोले-अरे मैं तुम्हीं को खोज रहा था। तुमने मूंगा उतारा नहीं अभी तक..। पिंकू सकपकाया, पूछा- क्यों। झा साहब बोले- अरे जल्दी मूंगा उतारो नहीं तो एक्सीडेंट में मर जाओगे, इसे बस दो ही महीने पहनना था। आगे पहनना भी मत। डरके मारे पिंकू ने अंगूठी उतारकर रख दी।
संयोगों की कहानी विधाता लिख रहा था, झा साहब और अंगूठी का भी उस कहानी में किरदार था। हुआ ये कि पिंकू का अपनी गर्लफ्रेंड से झगड़ा हो गया। हाथापाई हुई। किसी का हाथ पैर या मुंह नहीं टूटा, वो रिश्ता टूट गया। मैंने और मुकेश जी ने मिलकर उस टूटे हुए मजनूं को दो घंटे तक ‘पत्नी और बच्चा ही तुम्हारी जिंदगी का सच है’ इस विषय पर लंबा ज्ञान दिया। मियां बीवी का मिलन करवाया। हैप्पी एंडिंग हुई। इसमें ज्योतिष की कितनी भूमिका थी, भगवान जाने, लेकिन एक सच्चे दिल की महिला की साधना और भरोसे का मामला था, उसके खिलाफ तो भगवान भी नहीं जा सकते थे। उसके उस भरोसे की जीत हुई थी।

इसके बाद भाभी की नजरों में मैं और मेरी पत्नी देवी देवता थे तो झा साहब भगवान बन गए थे। वो मौका ढूंढती रहती थी कि कुछ अच्छा बनाकर खिला दे, वो भी सास से छिपाकर। मेरे बेटे को बेइंतहा प्यार करती थी। कुछ महीने बाद वो मकान मुझे छोड़ना पड़ा, क्योंकि मैंने दैनिक जागरण ज्वाइन कर लिया था, मकान उसके आसपास ही लेना था। उमेश विहार से नया दफ्तर दूर था। मैं गया तो उसके बाद जाने वालों का सिलसिला बन गया। किसी का ट्रांसफर हुआ तो किसी ने नौकरी बदली। 13-14 साल बीत गए, बहुत कुछ बदल गया। मनोज झा दैनिक जागरण मेरठ के संपादक हैं तो मुकेश सिंह दैनिक जागरण अलीगढ़ के संपादक। सतीश जयपुर भास्कर में एक्ज़ीक्यूटिव एडिटर हैं। बाकी साथी भी इधर-उधर हैं। सोच रहा हूं, इस बार मेरठ जाऊं तो उमेश विहार भी जाऊं, जहां हम लोगों की न जाने कितनी कहानियां बिखरी पड़ी हैं।

आजतक चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार विकास मिश्र के फेसबुक वॉल से.

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वो चैनल हेड बगल में लड़कियों को बिठाकर जूनियर लड़कों को डांटता रहता था!

Vikas Mishra : कुछ लोग स्वभाव से परसंतापी होते हैं। परसंतापी मतलब वो जिन्हें दूसरों को पीड़ा पहुंचाकर बहुत मजा आता है। वो दूसरों को खुश देखकर कभी खुश नहीं होते, हां किसी को रुलाकर उन्हें अपरंपार खुशी मिलती है। ऐसे लोग हमारे आसपास भी हैं, आपके आसपास भी हैं। प्राइमरी स्कूल में एक ओपी मास्टरसाहब हुआ करते थे। जो भी बच्चा उन्हें हंसता हुआ मिलता था, उसे वो बुरी तरह पीटते थे। जब वो रोने लगता था, तो उसे छोड़ देते। मीडिया के कई धुरंधरों को मैं जानता हूं, जो बाहर अपनी छवि सभ्यता और संस्कृति के अग्रदूत की रखते हैं, लेकिन न्यूजरूम में बिना बात किसी की सरेआम इज्जत उतार लेने में उन्हें अपार आनंद मिलता है।

एक न्यूज चैनल हेड का प्रिय शगल था कि वो अपने केबिन में एक या दो जूनियर लड़कियों को बिठाए रहते थे। खुद कुर्सी पर और लड़की उनकी टेबल पर या बगल की कुर्सी पर होती थी। इसी बीच वो किसी दूसरे जूनियर स्टाफ को बुलाते थे, उसे बुरी तरह डांटते थे। एक तो डांट, दूसरे लड़कियों के सामने डांट। इस दोहरी मार से जब वो रुआंसा हो जाता था, तब उन सज्जन के चेहरे पर असीम सुख दिखाई देता था। हालांकि वो सज्जन कहीं भी टिके नहीं.. हां कभी खाली भी नहीं बैठे।

एक चैनल हेड तो कमाल के थे। अचानक उनके केबिन से चीखने की आवाज आती थी। किसी के सात पुश्तों को न्योत रहे होते थे। अंग्रेजी में एक से एक नई गालियां देते थे। बड़े समदर्शी भी थे। स्त्री-पुरुष का भेद नहीं करते थे। जैसी क्लास लड़कों की लगाते थे, वैसी ही लड़कियों की भी। बाद में जब वो केबिन से बाहर निकलते थे उनका चेहरा किसी संत की तरह शांत हो जाता था। आजकल वो मीडिया से दूर हैं, कुछ बिजनेस वगैरह कर रहे हैं। हमारे रिश्ते के एक मामाजी हैं, उन्हें छोटे बच्चों के गाल काटकर रुलाने में अनोखी खुशी मिलती है। मेरा बेटा साल भर का था, दोनों गाल काटकर उन्होंने निशान छोड़ दिए, फिर रोते हुए बच्चे के हाथ में दस रुपये का नोट पकड़ाकर हंसते हुए कहा-अरे बड़ा बहादुर बच्चा है। मैं गुस्से में था, लेकिन गुस्सा दबाकर मुस्कुराते हुए पूछा-मामा.. लड़के का गाल काटने के दस रुपये देते हो, जवान महिला के गाल का कितना दोगे। सही रेट लगाओ तो मैं अपनी बीवी को बुला दूं। मामाजी झेंप गए, भड़के भी।

एक महिला मेरी रिश्तेदार हैं। उनकी गजब आदत है, अपने भतीजे, भतीजी, भानजी, या दूसरे रिश्तेदारों के बेटे-बेटियों के साथ वो बहुत बुरा व्यवहार करती हैं। लात मारकर तो जगाती हैं। बस चले तो चौबीस घंटे काम करवा लें। लेकिन जब अपने पैदा किए बच्चों की बात आती है तो अगर छींक भी आ गई तो उन्हें दौरा पड़ जाता है। जमीन आसमान एक कर देती हैं। जब उनका बेटा-बेटी कहीं जाते हैं तो वहां के मेजबान को हिदायत भी जाती है कि उन्हें दूध-मलाई और घी कैसे खिलाना है, रात में च्यवनप्राश जरूर देना है।

मैं अपने एक जिगरी दोस्त के घर गया था। रईस और इज्जतदार परिवार था। शाम को अचानक एक कमरे से चीखने और थोड़ी देर बाद घुटी घुटी सी आवाज आई। मैंने दरवाजे पर धक्का दिया, दरवाजा खुला था। वहां मेरे दोस्त के भाई साहब कुर्सी पर इत्मिनान से बैठे थे। आठ लोग एक आदमी को डंडे से पीट रहे थे। उसके मुंह पर कपड़ा बंधा हुआ था। मैंने चीखते हुए कहा-ये क्या हो रहा है, भाई साहब हंसते हुए बोले-इलाज। मैंने अपने दोस्त को खोजा, बोला कि वो इसे रुकवाए। उसने लापरवाही से कहा-तुम्हें क्या परेशानी है, ये तो यहां आए दिन होता है।

मैंने ऐसी सासों को देखा है, जिन्हें हमेशा रोती हुई बहुएं ही रास आती हैं। ऐसे बॉसेज देखे हैं, जब तक वो अपने दो चार अधीनस्थों को रुला न ले, उसे चैन ही नहीं आता। मुझे हैरानी होती है कि आखिर कैसे उन्हें इस काम में मजा आता है।
कई बार मुझे लगता है कि ये एक बीमारी है। ऐसी बीमारी जो दिमाग से ही कहीं संचालित होती है। क्योंकि परपीड़क कभी उससे पंगा नहीं लेता, जो उस पर भारी पड़ जाए। जिससे उलझने में लेने के देने पड़ जाएं। उन्हें तो वो मित्र बनाकर चलता है। बस कमजोरों पर ही जोर आजमाइश करता है।

परपीड़कों, सैडेस्टिक अप्रोच वालों के लिए ही शास्त्रों में कहा गया है- अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम्। परोपकाराय पुण्याय पापाय परपीडनम्। (अठारह पुराणों में व्यास जी ने बस दो ही बात कही है, परोपकार ही पुण्य है और दूसरों को पीड़ा पहुंचाना ही पाप है।)

आचार्य तुलसीदास ने अवधी में समझाया है- परहित सरिस धरम नहीं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाही।

आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार विकास मिश्र के फेसबुक वॉल से.

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