एक पत्रकार के आवाज उठाने पर यूं रुकी शनि शिंगणापुर में भक्तों से होने वाली लूट!

जनवरी 2009 की बात है। पहली बार साईं बाबा के दर्शन के लिए सपरिवार शिरडी गया था। वहां से शनि शिंगणापुर भी गया था, क्योंकि बहुत नाम सुना था। ये भी सुना था कि यहां किसी घर में ताला नहीं लगता। जब हमारी गाड़ी शनि शिंगणापुर पहुंची तो मंदिर के पास पार्किंग में रुकी। वहां …

मां विंध्यवासिनी धाम पहुंचे ‘आजतक’ के वरिष्ठ पत्रकार ने लिखा- यहां तो ‘गुंडों’ का कब्जा है!

मां विंध्यवासिनी के धाम पर ‘गुंडों’ का कब्जा.. जी हां, आपने सही पढ़ा है। विंध्याचल में मां विंध्यवासिनी के धाम पर गुंडों का कब्जा हो गया है। ये गुंडे कोई और नहीं यहां के कुछ अवैध पंडे हैं या पंडों के भेष में कुछ गुंडे हैं। माथे पर त्रिपुंड, गले में सोने की मोटी मोटी …

सुप्रिय प्रसाद आजतक न्यूज चैनल के ‘दिमाग’ हैं!

आजतक के चैनल हेड सुप्रिय प्रसाद अब न्यूज डायरेक्टर हो गए हैं। इससे पहले उनका पद मैनेजिंग एडिटर (प्रबंध संपादक) का था। अब टीवी टुडे ग्रुप ने उन्हें प्रमोशन देकर न्यूज डायरेक्टर का पद दिया है। इससे पहले आजतक में सिर्फ कमर वहीद नकवी सर और उदयशंकर जी ही इस पद पर पहुंचे थे। सुप्रिय …

मोदी की नीतियों से महिलाओं की सेविंग पर पड़ रही तगड़ी मार, पढ़िए ये खुलासा

Vikas Mishra : मेरी पत्नी का सेविंग अकाउंट था इंडियन ओवरसीज बैंक में। गुप्त खाता। जिसमें जमा रकम का मुझे घर में लिखित कानून के मुताबिक पता नहीं होना था, लेकिन श्रीमतीजी के मोबाइल में बैंक से अक्सर खातों से कुछ रुपये निकलने के मैसेज आने लगे। कभी एसएमएस चार्ज के नाम पर, कभी एटीएम चार्ज के नाम पर। बीवी आगबबूला। मैं बैंक पहुंचा तो पता चला कि सेविंग अकाउंट में ब्याज घटकर 3 फीसदी हो गया है। एसएमएस चार्ज हर महीने देना है, हर छह महीने में एटीएम चार्ज देना है। दूसरे बैंक के एटीएम से पैसे निकाले तो उसका चार्ज। चाहे एटीएम का इस्तेमाल हो या न हो उसका भी चार्ज। खैर, मैंने पत्नी का वो अकाउंट बंद करवा दिया।

रवीश कुमार और सुप्रिय प्रसाद वाले बैच के iimc स्टूडेंट्स का मिलन समारोह (देखें तस्वीरें)

Vikas Mishra : 6 अगस्त को हर साल की तरह इस साल भी हम दोस्त मिले। भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) में हम लोग पहली बार अगस्त 1994 में मिले थे। सारे संगी आज 40 साल की उम्र पार कर चुके हैं, लेकिन जब मिलते हैं तो फिर उम्र 22-23 साल पीछे चली जाती है। शेरो-शायरी, गाने बजाने के बीच चुटुकले और चुटकियों की बारिश में हर चेहरा खिला मिलता है और ठहाकों से पूरी महफिल गूंज उठती है।

करप्शन किस कदर हमारे खून में समाया है, समझा रहे हैं आजतक के पत्रकार विकास मिश्र

Vikas Mishra : मेरे एक मित्र अभी एक शहर में एसपी सिटी हैं। एक रात जब हम मिले, चर्चा छिड़ी तो उन्होंने कहा-‘भाई मैं तो बस ईमानदारी से काम कर रहा हूं, कोई तीन-पांच नहीं।’ मुझे लगा कि शायद मोदी के प्रभाव में ईमानदार हो गए हैं। बात बढ़ी तो वो बोले-‘किसी को सताकर नहीं कमाना है भाई, बिना पैसे दिए पोस्टिंग मिली है, मैं तो बाहर का पैसा छूता नहीं हूं, बस महीने के जो ढाई-तीन लाख बंधे हुए आते हैं, उसी से काम चलाता हूं।’

गोरखपुर लोकसभा सीट से बीजेपी शलभ मणि त्रिपाठी को देगी टिकट!

Vikas Mishra : योगी आदित्यनाथ तो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए। अब सवाल ये उठ रहा है कि गोरखपुर से सांसद कौन बनेगा। दरअसल सवाल ये उठना चाहिए था कि गोरखपुर से सांसद के उपचुनाव में बीजेपी का प्रत्याशी कौन होगा, लेकिन ये सवाल इस नाते नहीं उठ रहा, क्योंकि गोरखपुर में योगी के उत्तराधिकारी की जीत पक्की है। मेरी राय में तो बीजेपी को गोरखपुर लोकसभा सीट से शलभ मणि त्रिपाठी Shalabh Mani Tripathi को टिकट देना चाहिए। इसकी वजहें भी हैं।

सईद अंसारी यानि एक अद्भुत एंकर, एक बेजोड़ इंसान

Vikas Mishra : सईद अंसारी…नाम तो सुना होगा..। जितने बढ़िया एंकर, उतने ही बेहतरीन इंसान भी। हमेशा हंसते हुए और गर्मजोशी के साथ मिलते हैं। हर किसी की मदद के लिए तैयार, पक्के यारबाज। मुझे नहीं लगता कि दुनिया में कोई ऐसा भी इंसान होगा, जिसने कभी ये शिकायत की हो कि सईद अंसारी ने मुझसे कोई गलत बात की, तल्ख आवाज में बात की। जमीन से बिल्कुल जुड़े हुए, बिल्कुल इगोलेस, कमाल के इंसान। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में अगर किसी एंकर का कोई स्लॉट तय है तो वो कभी भी बर्दाश्त नहीं कर सकता कि उस स्लॉट में कोई और एंकरिंग करे, लेकिन सईद भाई इस नियम से परे हैं।

आजतक की अहमदाबाद ब्यूरो चीफ गोपी घांघर को पता था यूपी में भाजपा 300 से उपर सीट लाएगी!

Vikas Mishra : ये हैं गोपी घांघर। अहमदाबाद में हमारे चैनल की ब्यूरो चीफ। लंबे वक्त से गुजरात की राजनीति को करीब से देख रही हैं। पिछले दिसंबर महीने में एजेंडा आजतक में आई थीं, तब गोपी ने उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सीटों का आकलन किया था। गोपी ने कहा था कि मोदी और अमित शाह यूपी में करामात करने वाले हैं, बीजेपी को तीन सौ के आसपास सीटें मिलेंगी।

आजतक में कार्यरत शम्स ताहिर खान, रेहान अब्बास, मुहम्मद अनस जुबैर और शादाब मुज्तबा की फेसबुक पर क्यों हो रही है तारीफ, आप भी पढ़िए

Vikas Mishra : मेरे दफ्तर में शम्स ताहिर खान, रेहान अब्बास, मुहम्मद अनस जुबैर, शादाब मुज्तबा हैं, उच्च पदों पर हैं ये लोग, बेहद जहीन। जानते हैं कि इनमें एक समानता क्या है, इन सभी की एक ही संतान है और वो भी बेटी। वजह क्या है, वजह है इनकी तालीम, इनकी शिक्षा। क्योंकि इन्हें पता है कि जिस संतान के दुनिया में आने के ये जरिया बने हैं, उसके पालन-पोषण में कोई कमी नहीं होनी चाहिए। इन्हें नहीं रटाना है कम संतान-सुखी इंसान।

डीएसपी मुकुल द्विवेदी का यूं जाना खल गया

Vikas Mishra : मुकुल द्विवेदी का यूं जाना खल गया। मेरठ में मैं जब दैनिक जागरण का सिटी इंचार्ज था तब मुकुल द्विवेदी वहां सीओ थे। बेहद मृदुभाषी, पुलिसिया ठसक से दूर। सहज ही अच्छी दोस्ती हो गई। अक्सर मुलाकात होती थी। कभी दफ्तर में तो कभी हम दोनों के साझा मित्र संजय सिंह Sanjay Singh के घर पर मुलाकात होती थी। मेरा एक कनेक्शन इलाहाबाद का भी था, मैं उनसे सीनियर था।

‘आजतक’ के पत्रकार विकास मिश्र ने अपने बगल की सीट पर बैठने वाले अक्षय को यूं याद कर दी श्रद्धांजलि

Vikas Mishra : दफ्तर में मेरी ठीक बाईं तरफ की सीट खाली है। ये अक्षय की सीट है। अक्षय अब इस सीट पर नहीं बैठेगा, कभी नहीं बैठेगा। दराज खुली है। पहले खाने में कई खुली और कई बिन खुली चिट्ठियां हैं, जो सरकारी दफ्तरों से आई हैं, इनमें वो जानकारियां हैं, जो अक्षय ने आरटीआई डालकर मांगी थीं। करीब तीन महीने पहले ही दफ्तर में नई व्यवस्था के तहत, अक्षय को बैठने के लिए मेरे बगल की सीट मिली थी। वैसे दफ्तर में रोज दुआ सलाम हुआ करती थी, लेकिन पिछले तीन महीने से तो हर दिन का राफ्ता था। अक्षय…हट्ठा कट्ठा जवान। उसके हाथ इतने सख्त, मोटी-मोटी उंगलियां। मिलते ही हाथ, सिर तक उठाकर बोलता-‘सर, नमस्कार’ …और फिर हाथ बढ़ाता मिलाने के लिए। इतनी गर्मजोशी से हाथ मिलाता कि पांच मिनट तक मेरा हाथ किसी और से मिलाने लायक नहीं रहता।

अब जहां-जहां वो पत्रकार नौकरी की बात करने जाता है, पहले चैनल वाला सीनियर उसकी कुचर्चा फैला दे रहा है

Vikas Mishra : करीब दो साल पहले की बात है। दिल्ली में ही एक मीडिया अवार्ड समारोह में मैं गया था, साथ में हमारे चैनल आजतक के कई और साथी भी थे। समारोह के बाद कॉकटेल और खाने का कार्यक्रम था। रात गहराई। मैं भी अपने खाने की प्लेट लेकर दूसरी तरफ निकला तो वहां मेरे चैनल की एक एंकर सोफे पर बैठी थीं। तीन सीट वाला सोफा था। उस एंकर ने मुझे देखते हुए बोला-विकास जी, यहीं बैठ जाइए। मैं बैठ गया। थोड़ी देर बाद वहां एक सज्जन जोर-जोर से अल्ल-बल्ल बक रहे थे। मैं कुछ देर तक समझ नहीं पाया। हमारी एंकर ने बताया कि उन साहब को कुछ ज्यादा चढ़ गई है। मुझसे पहले वे उस जगह बैठे थे, जहां अब मैं बैठा था। पहले उस एंकर के साथ तस्वीर खिंचवाने पर आमादा थे।

वे चेहरे जो आजतक न्यूज चैनल चलाते हैं

Vikas Mishra :  गौर से देख लीजिए इन चेहरों को। यही हैं जो आजतक न्यूज चैनल चलाते हैं। सबसे किनारे मंद मंद मुस्कुरा रहे हैं हमारे मैनेजिंग एडिटर सुप्रिय प्रसाद। उनके बगल में हैं इनपुट हेड संजय ब्रागटा पीछे ठहाका मार रहे हैं हमारे आरसी भाई।

एलआईसी पालिसी और बोनस के नाम पर ठगने वालों के जाल में फंसते फंसते बच गए पत्रकार विकास मिश्र

Vikas Mishra : हफ्ते भर पहले किसी राज सिन्हा का फोन आया था। उन्होंने खुद को एलआईसी का सीनियर एक्जीक्यूटिव बताया। बोले-मुंबई से अभी ट्रांसफर होकर दिल्ली आया हूं। आपकी पॉलिसी का स्टेटस देखा, तो पता चला कि आपको सालाना बोनस अभी एक भी साल का नहीं मिला है। क्या आपको एजेंट ने बताया नहीं था कि हर साल साढ़े सात हजार रुपये बोनस मिलेगा..? मैंने कहा नहीं ये तो नहीं पता था। तब वे बोले कि ऐसा है कि आप दिसंबर की बजाय अक्टूबर के पहले हफ्ते प्रीमियम जमा करवा दें, हम आपका बोनस जो अब तक करीब 32 हजार हो चुका है, उसे आपको दिलवा देंगे। प्रीमियम भी आपको 36 हजार की जगह सिर्फ 34 हजार 610 रुपये देना होगा।

पत्रकारिता में हिंदी का ‘नरक’ युग

Vikas Mishra : न्यूज चैनल देखूं या अखबार..। जैसे ही किसी शब्द में मात्रा, वर्तनी की अशुद्धि दिखती है तो लगता है जैसे पुलाव खाते हुए, अचानक दांतों के बीच मोटा सा कंकड़ पड़ गया हो। पत्रिकाओं, अखबारों में मैंने काम किया, न्यूज चैनल में काम कर रहा हूं और एक प्रवृत्ति भी देख रहा हूं कि वर्तनी और मात्रा को लेकर अब न बहस होती है और न ही लड़ाई। आठ साल से तो मैं खुद ‘नरक’ की लड़ाई लड़ रहा हूं। मैं जानता हूं कि सही शब्द है-नरक, लेकिन न्यूज चैनलों में अमूमन दिख जाता है-‘नर्क’। जैसे स्वर्ग लिखते हैं, वैसे ही ‘नर्क’ लिख देते हैं। एक चैनल में मोटे-मोटे अक्षरों में ‘नर्क’ चल रहा था, उनकी अपनी ब्रेकिंग न्यूज थी, घंटों चलना था और सेट पर मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा था-‘नर्क’ । उस चैनल में कई साहित्यप्रेमी, साहित्य मर्मज्ञ भी हैं।

इस व्यवस्था में कितना मुश्किल है किसी गरीब का जी पाना… जानिए जानी आलम की कहानी

Vikas Mishra : हर इंसान में कहानी है। कई बार तो लगता है कि कहानियों से लैस इंसान अक्सर मुझसे टकरा जाता है। एक पेंटर है-जानी आलम, बिल्कुल दुबला-पतला। मेरे किराए वाले घर को उसी ने पेंट किया, बाद में अपने घर में भी उसी से पेंटिंग करवाई। कल तक उसके बारे में इतना ही जानता था- मेहनती है, ईमानदार है, जरूरतमंद है और गरीब भी। आज काम खत्म हो गया था। वो फाइनल पेमेंट लेने आया था। मैंने उसे पेमेंट के साथ जींस का पैंट और शर्ट दिया, कुछ इनाम भी। (ये मेरी मां का फरमान है कि अगर कोई दो दिन से ज्यादा घर में काम करता है, तो उसे कपड़ा और कुछ इनाम जरूर देना, मेहनतकश लोगों की दुआएं लगती हैं) कपड़े और इनाम पाकर जानी खुश बहुत हुआ, इतना कि रोने ही लगा। जींस नापा तो फिट था, कमर थोड़ी ढीली थी। मैं अंदाज से 30 नंबर का ले आया था, लेकिन उसकी कमर तो 28 इंच की निकली। खैर जानी बोला-कोई बात नहीं सर जी। हफ्ते भर ठीक से खाऊंगा तो टाइट हो जाएगी। वो तो परेशानियों ने मार रखा है, वरना मैं ऐसा नहीं था।

दैनिक जागरण, मेरठ के संपादक मनोज झा ज्योतिषी भी हैं!

Vikas Mishra : मेरठ में एक मुहल्ला है, उमेश नगर। 2000 में अमर उजाला में काम करने के दौरान वहां कमरा लिया था। पड़ोस में आसपास ही पुराने दोस्त मुकेश सिंह, सतीश सिंह, संजय श्रीवास्तव, दीपक सती, संजीव सिंह पुंडीर, दिनेश उप्रैती रहते थे। सभी अमर उजाला में काम करते थे। एक परिवार की तरह रहते थे। सुबह हो या शाम या दोपहर..कोई किसी के घर चला जाता था, चाय नाश्ता या भोजन कौन कहां करेगा, तय नहीं होता था। जहां पहुंच गए, वहीं धूनी रम गई। मनोज झा हम लोगों के खास मेहमान होते थे, वो रहते थोड़ी दूर थे, लेकिन आते रोज थे, शादी हुई नहीं थी तब उनकी। झा साहब पत्रकारिता के पुरुषार्थी तो थे ही, ज्योतिष और आयुर्वेद पर भी उनकी गहरी पकड़ है। आप पता नहीं कितना यकीन करें, लेकिन झा साहब हाथ देखकर गजब की चीजें बता देते थे।

वो चैनल हेड बगल में लड़कियों को बिठाकर जूनियर लड़कों को डांटता रहता था!

Vikas Mishra : कुछ लोग स्वभाव से परसंतापी होते हैं। परसंतापी मतलब वो जिन्हें दूसरों को पीड़ा पहुंचाकर बहुत मजा आता है। वो दूसरों को खुश देखकर कभी खुश नहीं होते, हां किसी को रुलाकर उन्हें अपरंपार खुशी मिलती है। ऐसे लोग हमारे आसपास भी हैं, आपके आसपास भी हैं। प्राइमरी स्कूल में एक ओपी मास्टरसाहब हुआ करते थे। जो भी बच्चा उन्हें हंसता हुआ मिलता था, उसे वो बुरी तरह पीटते थे। जब वो रोने लगता था, तो उसे छोड़ देते। मीडिया के कई धुरंधरों को मैं जानता हूं, जो बाहर अपनी छवि सभ्यता और संस्कृति के अग्रदूत की रखते हैं, लेकिन न्यूजरूम में बिना बात किसी की सरेआम इज्जत उतार लेने में उन्हें अपार आनंद मिलता है।