भारत-पाक में परमाणु युद्ध दिसंबर में तय है!

एटमी लड़ाई पर चौड़ा मुंह खोलने की बीमारी… भारत और पाकिस्तान, दोनों ही जगह राजनेताओं की गुणवत्ता अभी इतनी खराब है कि उनके किसी भी बयान को गंभीरता से लेने का कोई मतलब नहीं है। लेकिन पाकिस्तान के रेलमंत्री शेख राशिद अहमद के हालिया भाषण इस घटिया स्तर से भी काफी नीचे के जान पड़ते हैं। हफ्ते भर में वे भारत और पाकिस्तान के बीच परमाणु युद्ध हो जाने की बात कम से कम दो बार मंच से बोल चुके हैं। इसे उनकी अज्ञानता और बड़बोलापन मानकर दरकिनार भी कर दें तो इस आक्रामकता को इस्लाम और जिहाद से जोड़ने को लेकर पाकिस्तान में उनकी भर्त्सना जरूर होनी चाहिए।

इतिहास की यह कैसी बीमार समझ है कि अपने इस मूर्ख मंत्री के बयान की पुष्टि सी करते हुए पाकिस्तान ने 290 किलोमीटर रेंज वाली गजनवी मिसाइल दागने का फैसला कर लिया! नॉर्थ कोरियन मेक की यह मिसाइल अर्सा पहले टेस्ट की गई थी और पाकिस्तानी फौज द्वारा इसे कमीशन किए भी लंबा वक्त गुजर चुका है। जाहिर है, अपनी लंबी दूरी की मिसाइलों में सबसे छोटी रेंज वाली को दागकर पाकिस्तान मिसाइल परीक्षणों पर लगी अंतरराष्ट्रीय नजरदारी को धता बताते हुए दुनिया को यह संदेश देना चाहता है कि दोनों देशों के बीच माहौल अभी बहुत खराब है और कोई छोटी घटना भी दोनों के बीच परमाणु युद्ध का कारण बन सकती है।

उसके रेलमंत्री तो इस युद्ध का समय भी निश्चित कर चुके हैं कि नवंबर-दिसंबर में यह होकर रहेगा। शीतयुद्ध के चरम दौर में भी न तो रूस, न ही अमेरिका के केंद्रीय मंत्री स्तर के किसी व्यक्ति ने आपसी राजनय से जुड़े मुद्दे पर यों सीधे-सीधे परमाणु युद्ध का समय निश्चित किया था! इमरान खान पर और चाहे जो भी आरोप लगाए जाएं लेकिन उनके पढ़े-लिखे व्यक्ति होने पर कहीं कोई सवाल नहीं है। न्यूनतम राजनयिक शिष्टाचार का परिचय देते हुए उन्हें सिर्फ इस बात के लिए अपने मंत्रिमंडल से शेख राशिद अहमद की छुट्टी कर देनी चाहिए, कि जब भारत की तरफ से युद्ध की कोई बात ही नहीं हो रही, फिर यह एटमी बतोलेबाजी किसलिए?

पाकिस्तान में विद्वानों और संवेदनशील लोगों की कोई कमी नहीं है, लिहाजा कुछ विचार-विमर्श वहां व्यापक जनसंहार क्षमता वाली मिसाइलों के नामकरण को लेकर भी होना ही चाहिए। जिन गोरी, गजनवी वगैरह की याद दिलाने के लिए ऐसे नाम चुने गए हैं, उनके सबसे पहले और सबसे ज्यादा शिकार खैबर-पख्तूनख्वा और पश्चिमी पंजाब के लोग ही हुए थे। उनके आक्रमण के समय, यानी बारहवीं-तेरहवीं सदी में भी इन प्रांतों में मुस्लिम आबादी का अनुपात अच्छा-खासा था। इतिहास की यह कैसी समझ है जो अपने खतरनाक हथियारों को अपने ही दादा-परदादा को तबाह करने वालों का नाम देने के लिए पाकिस्तानी हुक्मरान को तैयार करती है?

इसमें कोई शक नहीं कि अभी भारत और पाकिस्तान के रिश्ते बहुत खराब दौर से गुजर रहे हैं। लेकिन कई बार इससे भी ज्यादा खराब होकर ये वापस पटरी पर आ चुके हैं। इसकी वजह दोनों देशों के शासकों की बुद्धिमत्ता नहीं, इस उपमहाद्वीप की जनता की समझदारी और ऐतिहासिक संवेदना है, जिसे अच्छी तरह पता है कि भीषण से भीषण तबाही के बावजूद भारत और पाकिस्तान की संस्कृति-सभ्यता को कभी पूरी तरह से अलगाया नहीं जा सकता। इतिहास के लंबे दौर में यह सिर्फ एक वक्फा है, जिसमें दोनों तरफ के छोटे, खोटे और बड़बोले लोग अपनी बातों से एक-दूसरे के हाथ मजबूत करने में जुटे हैं। आम हिंदुस्तानी-पाकिस्तानी धीरज से काम लें तो यह वक्फा और इसे बनाने वाले भी देर-सबेर अपने करतब दिखाकर किनारे हो जाएंगे।

नवभारत टाइम्स में उच्च पद पर कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार चंद्रभूषण की एफबी वॉल से.



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