कोलकाता के तीन हिंदी अखबारों के स्थानीय संपादकों के नाम एक पूर्व मीडियाकर्मी का पत्र

आदरणीय
रेजिडेंट एडिटर्स जी

प्रभात खबर,
दैनिक जागरण
राजस्थान पत्रिका
कोलकाता

सबसे पहले तो मैं आप लोगों को प्रणाम करता हूँ। सामने होेते तो दिल पर पत्थर रखकर आपके पैर भी छू लेता। बाकी चीजें छूने में मेरी कोई रुचि नहीं है। मेरी वैसे कोई औकात नहीं है कि आप जैसे धुरंधर, पारखी और पत्रकारिता के क्षेत्र में नये मानदंड तय करने वाले महान लोगों को पत्र लिखूं। मैं एक मसिजीवी हूँ और मेरा परिचय बस इतना है कि भारतमित्र से मैंने अपना करियर शुरू किया था। बाद में सन्मार्ग, कलयुग वार्ता और फिर सलाम दुनिया में कलम घिसने का काम किया। फिलहाल दिल्ली में हूँ।

1995 में बिहार से कोलकाता पलायन किया और कोलकाता में 20 साल गुजारने के बाद अब दिल्ली पलायन करने पर मजबूर होना पड़ा।  आप समझते होंगे कि रवीश कुमार या रोहित सरदाना से प्रेरित होकर मैं यह पत्र लिख रहा हूं तो आपको बताना चाहता हूँ कि ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। अगरचे ये बड़े पत्रकार हैं इसलिए प्रेरित कर ही सकते हैं। पत्र लिखने को मैं इसलिए मजबूर हुआ हूँ कि जब से कोलकाता छोड़कर दिल्ली आया हूँ दिल में एक अकुलाहट है। कोलकाता में मैं पिछले 20 वर्षों से रह रहा था लेकिन अब घर-बार परिवार छोड़कर दिल्ली आ गया हूँ। कह लीजिए कि अपनी जड़ें उखाड़कर दिल्ली के बेदिल माहौल में पलने-बढ़ने आया हूँ। मन नहीं कर रहा था कि कोलकाता छोड़ूं लेकिन छोड़ना पड़ा। मजबूर होकर। दिल में खलिस लेकर।

जरा बताइये तो कभी आपको इस तरह अपना घर-बार छोड़कर पलायन करना पड़ा है ? कभी ऐसा हुआ है कि आपके काम की सराहना की गयी हो लेकिन कई दफ्तरों में घूमने के बावजूद आपको अच्छी तनख्वाह वाली नौकरी नहीं मिली हो और आपको अपना शहर छोड़ना पड़ा हो ? अगर ऐसा हुआ था तो कैसा महसूस किया था आपने? मैं जब आपको यह पत्र लिख रहा हूँ तो सिर्फ इसलिए नहीं कि मैं दुःखी हूँ। पिछले 4-5 वर्षों में कोलकाता से पलायन कर चुके पत्रकारों और संप्रति पलायन के लिए छटपटा रहे कोलकाता के दर्जनों पत्रकारों की व्यथा भी इसमें शामिल है। आपलोग तो रेजिडेंट एडिटर के पदों पर आसीन हैं। क्या आपको पता है कि कोलकाता से पत्रकार क्यों पलायन कर रहे हैं? क्या आपको जरा भी इल्म है कि कोलकाता में काम कर रहे ईमानदार पत्रकार अपना घर-बार छोड़कर क्यों दिल्ली, पटना या दूसरे शहरों में जाने के लिए छटपटा रहे हैं?

कोलकाता में हिन्दी पत्रकारिता का जन्म हुआ। सम्प्रति सन्मार्ग, प्रभात खबर, दैनिक जागरण, राजस्थान पत्रिका समेत छोटे बड़े लगभग एक दर्जन अखबार निकल रहे हैं। इसके बावजूद पत्रकार पलायन कर रहे हैं, कभी यह सोचकर आप शर्मिंदा हुए हैं कि नहीं? छोड़िये सर, आपको तो पता ही नहीं होगा कि आपके दफ्तर में काम करने वाले ईमानदार पत्रकारों के दिमाग में क्या चल रहा है। मैं बताता हूँ। वे इस इंतजार में हैं कि जितना उन्हें मिल रहा है उससे 2-3 हजार ज्यादा भी अगर दूसरे शहरों में मिल जाये तो वे कलेजे पर पत्थर रखकर कोलकाता छोड़ देंगे। जो पलायन कर चुके हैं उनका भी यही खयाल था।

आपको सुनने में खराब लग सकता है लेकिन मैं यह कहने के लिये मजबूर हूँ कि आपलोगों ने कोलकाता की हिन्दी पत्रकारिता का जो हाल कर दिया है, आने वाले दिनों में और भी ईमानदार और काबिल पत्रकार पलायन करेंगे क्योंकि आपलोग जीने-खाने लायक तनख्वाह नहीं दिलवाते हैं और जिन लोगों को मिल रही है उनसे गदहों की तरह काम करवा रहे हैं जबकि अपने दत्तक पुत्रों (जिन्हे खबर लिखने तक का सऊर नहीं है लेकिन चमचई कर रेजिडेंट एडिटर व चीफ रिपोर्टर के अजीज हो गये हैं) को आराम दिलवा रहे हैं। इनक्रीमेंट में आप मुहदिखौवल करते हैं। बेचारे काम करने वाले पत्रकारों को कुछ नहीं मिलता और आपके दत्तक पुत्र चांदी काट रहे हैं।

आपको स्ट्रिंगर चाहिए जो लगभग मुफ्त में आपको खबरें दे या आपको चमचे चाहिए जो आपकी दुकानदारी चलाने में हाथ बंटाये। आपके दफ्तरों में जगह तो खाली है लेकिन आप लोगों को रखेंगे नहीं क्यों? क्योंकि प्रबंधन को यह दिखाना है कि आप कम खर्चे में अखबार निकाल रहे हैं। आपने गिनती के पत्रकार रखे हैं उनसे रोज 10-12 खबर लिखवाते हैं। अप्रत्यक्ष तौर पर कहें तो आप पत्रकारों को भी खबर लिखने का टारगेट दे रहे हैं जैसे निजी कंपनियां मार्केटिंग के लोगों को माल बेचने का टारगेट देती हैं। आपने कभी अच्छी खबर लिखी है? आपको पता है कि एक अच्छी रिपोर्ट लिखने में कितना वक्त लगता है और कितने तथ्य जुटाने पड़ते हैं? अगर आपने कभी ऐसा किया होता तो आप समझ पाते। तब आप खबरों का टारगेट नहीं रखते।

आप ये सोचते हैं कि 20 हजार रुपये में एक अच्छे पत्रकार को रखने की जगह 5-6 हजार या उससे भी कम में 3 नये लोगों को रख लेंगे। सर आप अखबार चला रहे हैं कि बनियागीरी कर रहे हैं ? आपने पत्रकारिता की ट्रेनिंग कहाँ से ली है? आपके गुरू कौन थे सर? मुझे आश्चर्य होता है कि आप लोग ये सब कैसे सोच लेते हैं। ये सब सोचते हुए कभी खुद को रेजिडेंट एडिटर कहने में आपको शर्म नहीं आयी? आपको नहीं लगा कि आप रेजिडेंट एडिटर के नाम पर कलंक हैं? शायद आपलोग काम में इतने बिजी रहते होंगे कि इतना सोचने का वक्त ही नहीं मिलता होगा।

बहरहाल आपकी इस कारगुजारी से एक वक्त ऐसा आयेगा कि कोलकाता में कोई ढंग का पत्रकार नहीं बचेगा और तब आप कूड़े में फेंकने वाला अखबार निकालियेगा। आपलोगों से एक और बात पूछना चाहते हैं हम। कोलकाता में रहते हुए मेरे सामने ही 5 नये अखबार आये लेकिन आपलोगों को अपनी कुर्सी से डोलते नहीं देखा जबकि इनमें से कई अखबार अच्छा पैकेज दे रहे थे। आपकी यह अदा मुझे बार-बार चौंका रही है। आपलोग लम्बे से एक ही पद पर कैसे बने हुए हैं? रेजिडेंट एडिटर के ऊपर कोई पद नहीं है क्या अखबारों में? ये हुनर तो कम से कम बता दीजिए कैसे एक ही पदों पर इतने दिनों से बने हैं। साथ ही यह भी बता दीजिए कि एक ही पद पर इतने दिनों तक बने रहने को आपकी काबिलियत समझा जाये या प्रबंधन की चमचागिरी का ईनाम। हमलोग तो 1-2 साल काम करते ही अखबार बदलने की सोचने लगते हैं। लोगबाग कहते हैं कि प्रबंधन के पिट्ठू हैं आपलोग और अपनी नौकरी बचाने के लिए कुछ भी कर सकते हैं। लोग ये भी कहते हैं कि आप में वो काबिलियत ही नहीं है कि दूसरे अखबारों में काम कर सकें। मेरा मानना है कि आपलोगों को ये आशंकाएँ दूर करनी चाहिए। यह मेरा सुझाव है।

सर आप लोगों की कारिस्तानी का खामियाजा कोलकाता के ईमानदार पत्रकारों, हिन्दी पत्रकारिता और अंततः हिन्दी समाज को भुगतना पड़ेगा। आप ने तो अपना घर भर लिया है, रिटायरमेंट के बाद ऐश करेंगे लेकिन आप जिस तरह की पीढ़ी को तैयार कर रहे हैं वे भी आपकी तरह हिन्दी पत्रकारिता को डुबायेंगे ही। अभी भी वक्त है, यह खेल बंद कर दीजिए। नाकाबिल हैं तो पद छोड़ दीजिए, अच्छे लोगों को मौका मिलेगा।

अंत में यही कहना चाहता हूँ कि समय सबका इतिहास लिखता है। नहीं चेतियेगा तो 3-4 दशक बाद जब कोलकाता की हिन्दी पत्रकारिता का इतिहास दुबारा लिखा जायेगा तब आपका नाम जयचंदों में होगा। मैं जानता हूँ मैंने यह लिखकर कोलकाता में अपनी वापसी के अधिकतर रास्ते बंद कर दिये हैं लेकिन क्या करूँ, मेरे पास और कोई विकल्प नहीं था। पलायन का घाव पक गया था। उसमें मवाद भर गया था और घाव चुहचुहा रहा था। मवाद की निकासी जरूरी थी। आगे जो होगा इसके लिए तैयार हूँ।

आप सबको दुबारा प्रणाम!

आपका बदनसीब
उमेश राय


(लेखक उमेश राय सन्मार्ग के वरिष्ठ पत्रकार रहे हैं। इन दिनों दिल्ली में पानी की समस्या पर काम करने वाली एक एनजीओ के लिए काम कर रहे है। उन्होंने कोलकाता और सन्मार्ग को जिस लिजलिजेपन से जिया है, उसे बयां किया है। उन्होंने यह सब कुछ अपनी एफबी वॉल पर लिखा है।)

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