यूपी में आज़म खान के खिलाफ जांच करने में लोकायुक्त को भी पसीने छूटते हैं!

यूपी में लोकायुक्त को भी आजम खान के खिलाफ जांच शुरू करने में पसीने छूटने लगते हैं. वे नियम कानून और वैधता आदि का सवाल उठाने लगते हैं. जिनके पास जानकारों की पूरी फौज होती है, सरकारी संसाधन और संरक्षण होता है, वह भी शिकायत करने वाले से ही पूछता है कि किस नियम के तहत ये जांच करें. अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री आज़म खान द्वारा बिना किसी नियम, शर्त और प्रक्रिया के राज्य सरकार के अल्प संख्यक विभाग के मौलाना जौहर अली शोध संस्थान रामपुर की बेशकीमती भूमि और भवन स्वयं की निजी संस्था मौलाना जौहर अली ट्रस्ट को दिए जाने के खिलाफ सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर के परिवाद पर लोकायुक्त जस्टिस एन के मल्होत्रा द्वारा उठाई गयी आपत्तियों का आज उन्होंने उत्तर प्रस्तुत किया.

लोकायुक्त ने वादिनी से पूछा था कि मंत्रिमंडल या मुख्यमंत्री के खिलाफ लोकायुक्त अधिनियम के किस नियम में जांच की जा सकती है. इस पर डॉ ठाकुर ने लोकायुक्त से मिलकर लिखित अवगत कराया है कि उन्होंने मंत्रिमंडल या मुख्यमंत्री के खिलाफ जांच की मांग नहीं की है बल्कि आज़म खान और  अल्पसंख्यक विभाग के अधिकारियों के खिलाफ जांच की मांग की है. उन्होंने कहा कि उनका परिवाद इन अधिकारियों और श्री खान द्वारा करोड़ों की सरकारी जमीन और भवन कौड़ियों के मोल श्री खान की निजी संस्था को नियमों के खिलाफ दिए जाने की संस्तुति के खिलाफ है, इसके आधार पर लिए गए मंत्रिमंडल के निर्णय के खिलाफ नहीं. उन्होंने बताया कि लोकायुक्त को मात्र अंतिम निर्णय नहीं, गलत संस्तुति की जांच का भी अधिकार है, अतः यह परिवाद लोकायुक्त की परिधि में है.

Azam Khan complaint: Lokayukta has powers to enquire, says complainant

In the complaint regarding Minorities welfare minister Azam Khan getting prime government land and huge building of Maulana Jauhar Ali Shodh Sansthan at Rampur allotted to his private Maulana Jauhar Ali Trust, in blatant disregard to the rules and regulation, complainant activist Dr Nutan Thakur today answered the queries raised by Lokayukta Justice N K Malhotra

Lokayukta had asked the complainant under what provisions of law can he enquire against Chief Minister or the Cabinet. Dr Thakur met the Lokayukta and said that she has not sought enquiry against the CM or the Cabinet but against Azam Khan and concerned officers of the Minorities welfare department. She said that her complaint is as regards the recommendations made by Sri Khan and his officers and not against the Cabinet decision based on this recommendation.   She said that Lokayukta can enquire not only the final decision but also the recommendations and findings and hence the complaint comes under the Lokayukta’s purview.

मूल शिकायत…

सेवा में,
मा० लोकयुक्त महोदय,
उत्तर प्रदेश,
लखनऊ

विषय- श्री आज़म खान, मंत्री, अल्पसंख्यक कल्याण के विरुद्ध परिवाद विषयक

महोदय,

कृपया श्री आज़म खान, मंत्री, अल्पसंख्यक कल्याण की निजी संस्था को व्यक्तिगत लाभार्थ राज्य सरकार की भूमि और भवन को स्थापित नियमों और मा० सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के विपरीत आवंटित किये जाने सम्बंधित परिवाद दिनांक- 02/02/2015 के सम्बन्ध में आप द्वारा आदेशित पृच्छा दिनांक 19/02/2015 का सन्दर्भ ग्रहण करें.

इस सम्बन्ध में वांछित सूचना निम्नवत है-

1. डॉ देवेश चतुर्वेदी के सम्बन्ध में मैंने परिवाद में कहीं यह नहीं कहा था कि उन्होंने मुझे सूचना दी है. सत्यता यह है कि मुझे यह सूचना डॉ चतुर्वेदी से नहीं, अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के ही कतिपय अन्य अधिकारियों द्वारा गोपनीयता की शर्त पर दी गयी थी. हाँ मुझे यह अवश्य बताया गया था कि पूर्व में डॉ चतुर्वेदी ने इस मामले में संस्थान एक निजी संस्था को दिए जाने का पुरजोर विरोध किया था. स्पष्ट है कि डॉ चतुर्वेदी एक वरिष्ठ आईएएस अफसर हैं और मेरे कहने पर कदापि उत्तर प्रदेश लोक आयुक्त तथा उप लोक आयुक्त अधिनियम, 1975 की धारा 9 (2) के तहत शपथपत्र नहीं देंगे. मैंने अपने परिवाद में यह नहीं कहा था कि मैं डॉ चतुर्वेदी का शपथपत्र दूंगी. मैंने परिवाद के बिंदु संख्या 13 पर मात्र यह कहा था कि डॉ देवेश चतुर्वेदी ऐसे अन्य व्यक्ति हैं जिन्हें परिवाद से सम्बंधित तथ्यों के बारे में जानकारी हैं, जिन्हें लोक आयुक्त महोदय आवश्यक समझे जाने पर सम्मन करना चाहें.

मैं पुनः दुहराना चाहूंगी कि मेरी जानकारी के अनुसार डॉ चतुर्वेदी इस प्रकरण में काफी प्रकाश डाल सकते हैं और महोदय द्वारा उन्हें तलब करने पर इस परिवाद के सम्बन्ध में कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं. लेकिन साथ ही यह भी कहना चाहूंगी कि डॉ चतुर्वेदी मेरे कहने पर किसी भी दशा में शपथपत्र नहीं देंगे और न ही मैं उनकी ओर से शपथपत्र दिलाने की स्थिति में हैं और मैंने अपने परिवाद में ऐसा कोई भी दावा नहीं किया था.

2. मैंने अपने परिवाद में कैबिनेट के निर्णय या मुख्यमंत्री के निर्णय की जांच नहीं मांगी है बल्कि जैसा मैंने परिवाद के बिंदु संख्या 9 पर स्पष्ट किया है यह जांच श्री आज़म खान, मंत्री, अल्पसंख्यक कल्याण, उत्तर प्रदेश शासन, लखनऊ सहित उत्तर प्रदेश शासन के अन्य सम्बंधित अधिकारीगण के सम्बन्ध में प्रेषित किया गया है जिन्होंने गलत तरीके से एक राजकीय संपत्ति को नियमों के विपरीत और मा० न्यायालयों के स्पष्ट आदेशों की अवहेलना में एक निजी संस्था को बहुत ही कम मूल्य में दिए जाने की संस्तुति की.

निवेदन करुँगी कि उत्तर प्रदेश लोक आयुक्त तथा उप लोक आयुक्त अधिनियम, 1975 की धारा SECTION 7 के अनुसार- “Matters which may be investigated by Lokayukta or Up-Lokayukta-(1) Subject to the provisions of this Act and on a complaint involving a grievance or an allegation being made in that behalf the Lokayukta may investigate any action which is taken by or with the general or specific approval of – (i) a Minister or a Secretary ; and (ii) any public servant referred to in sub-clause (ii) or sub-clause (iv) of clause (j) of section 2; XXXX”

इसी अधिनियम की धारा 1(g) के अनुसार “Minister” means a member (other than the Chief Minister) of the Council of Minister, by whatever name called, for the State of Uttar Pradesh, that is to say a minister, Minister of State or Deputy Minister.

धारा 1(j) के अनुसार “public servant” denotes a person falling under any of the following descriptions, and includes, subject to the provisions of sub-section (4) of section 8, a person who at any time in the past fell under any of the following descriptions namely- (i) every Minister referred to in clause (g), XX (iii) every officer referred to in clause (h)” तथा धारा 1 (h) के अनुसार “officer” means a person appointed to a public service or post in connection with the affairs of the State of Uttar Pradesh,

अधिनियम की धारा 1 (a) के अनुसार “action”, means action taken by way of decision, recommendation or finding or in any other manner, and includes, failure to act and all other expressions connoting action shall be construed accordingly;

उपरोक्त विधिक प्रावधानों से स्पष्ट है कि-

1.    महोदय द्वारा मंत्री और अधिकारियों के action (कार्यवाही) के सम्बन्ध में लगाए गए grievance or an allegation (शिकायत या अभिकथन) की जांच की जा सकती है
2.    वर्तमान परिवाद एक अभिकथन है
3.    यह अभिकथन श्री आज़म खान (मंत्री) और अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के अफसर (लोक सेवकों) के विरुद्ध है
4.    इस अभिकथन में श्री खान और अन्य विभागीय अफसरों (लोक सेवकों) द्वारा अपने पद का दुरुपयोग कर स्पष्टतया त्रुटिपूर्ण संस्तुति किये जाने की शिकायत है
5.    अधिनियम की धारा 1 (a) के अनुसार कार्यवाही में recommendation or finding (सिफारिश और उपपत्ति) भी आता है और इतना ही नहीं इसमें इन सिफारिश और उपपत्ति के विलोप भी सन्नहित हैं और इनके अलावा in any other manner (किसी अन्य प्रकार से किये गए अनुचित कृत्य) भी सम्मिलत हैं
6.    वर्तमान परिवाद (अभिकथन) में अल्पसंख्यक विभाग द्वारा गलत और त्रुटिपूर्ण संस्तुति और उपपत्ति बेहेज जाने की शिकायत है
7.    परिवाद का मुख्य मुद्दा मत्री और उनके अधीन अधिकारियों द्वारा विधि के विरुद्ध नोटिंग के द्वारा अनुचित सिफारिश करना है
8.    परिवाद में मंत्रिमंडल के निर्णय की जांच की बात नहीं कही गयी है बल्कि अल्पसंख्यक विभाग के अधिकारी और मंत्री श्री आज़म खान के अनुचित कृत्य (त्रुटिपूर्ण संस्तुति) की शिकायत है

उपरोक्त कारणों से मेरे द्वारा प्रस्तुत परिवाद निश्चित रूप से लोकायुक्त अधिनियम में आता है क्योंकि परिवाद का बिंदु अधिकारियों के स्तर पर की गयी सिफारिश और उपपत्ति एवं कर्तव्य का विलोप है, न कि मंत्रिमंडल द्वारा किया गया निर्णय.

मैं महोदय से सहमत हूँ कि यदि इस प्रकरण में मंत्री तथा अधिकारियों के स्तर पर प्रस्तुत अभिकथन सही भी पाया जाता है तो भी मात्र उनके विरुद्ध ही कार्यवाही होगी और मंत्रीमंडल के निर्णय की समीक्षा महोदय के स्तर पर नहीं होगी.

निवेदन करुँगी कि अतः मैं मंत्रिमंडल या मुख्यमंत्री के निर्णय की समीक्षा या जांच की बात नहीं कर रही हूँ वरन अभिकथन में प्रस्तुत तथ्यों (नियम के विरुद्ध सिफारिश, हितों का स्पष्ट टकराव, पूर्व प्रमुख सचिव और कार्यालय की संस्तुति की जानबूझ कर अनदेखी, लगभग मुफ्त में भूमि आवंटित किये जाने की संस्तुति) की जांच का अनुरोध कर रही हूँ, जो निस्संदेह लोकायुक्त अधिनियम की परिधि में आता है.

अंत में मैं पुनः निवेदन करुँगी कि इस प्रकरण में मेरे पास मौजूद तथ्य मैंने प्रस्तुत कर दिए और शेष तथ्य महोदय द्वारा डॉ देवेश चतुर्वेदी तो तलब कर तथा/अथवा सम्बंधित पत्रावलियों के अवलोकन से ही स्पष्ट होगा जिससे साफ़ हो जाएगा कि मंत्रिमंडल के स्तर पर यह त्रुटिपूर्ण और विधिविरुद्ध निर्णय इसी कारण से हो क्योंकि अल्पोसंख्यक विभाग के अधिकारियों के अपने विभागीय मंत्री के दवाब में यह स्पष्टतया दोषपूर्ण संस्तुति कर राज्य सरकार को भारी वित्तीय हानि और क्षति पहुंचाते हुए मंत्री से जुडी निजी संस्था को लाभ पहुँचाने में प्रत्यक्ष मदद की.

मैं यह परिवाद मंत्री श्री आज़म खान और उनके अधीनस्थ अधिकारियों के विरुद्ध समझा जाए न कि मंत्रिमंडल के निर्णय के विरुद्ध क्योंकि मुख्य कार्य और समस्त संस्तुतियां तो विभागीय अधिकारियों और मंत्री के स्तर पर हुईं, मंत्रिमंडल द्वारा तो मात्र इन तथ्यों के आधार पर निर्णय लिया गया.

यही कारण है कि मैंने परिवाद में स्पश्य लिखा भी है कि यह परिवाद श्री आज़म खान और उनके अधीन अल्पसंख्यक विभाग के संबधित अधिकारियों के विरुद्ध है और मैं पुनः यह बात यहाँ दुहरा रही हूँ.

अतः कृपया इस मामले को शीघ्र संज्ञान में लेते हुए जांचोपरांत राज्य की बेशकीमती भूमि और भवन को राज्य सरकार के बड़े पदाधिकारियों द्वारा एक निजी संस्था को देने की प्रक्रिया को निरस्त कराते हुए जांच में दोषी पाए पाए गए सभी अधिकारियों के विरुद्ध नियमानुसार कठोर कार्यवाही करने की कृपा करें.

पत्र संख्या-NT/Complaint/70                               
दिनांक- 26/02/2015
(डॉ नूतन ठाकुर)
5/426, विराम खंड,
गोमती नगर, लखनऊ
# 94155-34525
nutanthakurlko@gmail.com

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