बिहार के सीएम नितीश कुमार को दिल्ली में बंगला आवंटन नियमों के परे

संपदा निदेशालय, भारत सरकार द्वारा लखनऊ स्थित एक्टिविस्ट डॉ नूतन ठाकुर को दी गयी सूचना के अनुसार बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को आवास पर मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीए) द्वारा आवश्यक अनुमोदन मिले बिना ही नयी दिल्ली स्थित के कामराज लेन में बंगला नंबर 6 आवंटित कर दिया गया.

उपनिदेशक, संपदा राजीव रंजन द्वारा दिए गए जवाब के अनुसार श्री कुमार को सीसीए से कार्योत्तर संस्तुति मिलने की शर्त पर बंगला आवंटित किया गया है और उनका प्रकरण सीसीए की संस्तुति हेतु भेजा गया है. नूतन के अनुसार बारी के बिना बंगला आवंटन हेतु सीसीए द्वारा अनुमोदन अनिवार्य है किन्तु ऐसा लगता है कि 31 जनवरी 2018 को नीतीश कुमार को बंगला दिए जाते समय इसकी अनदेखी की गयी.

Delhi Bungalow allotted to Nitish Kumar against Rules!

As per the information provided by Directorate of Estate, Government of India to Lucknow based activist Dr Nutan Takur, Bungalow No 6 in K Kamraj Lane, New Delhi has been allotted to Bihar Chief Minister Nitish Kumar without the requisite approval of the Cabinet Committee on Accommodation (CCA).

Reply by Rajeev Ranjan, Deputy Director, Estates says that the Bungalow has been allotted to Sri Kumar subject to ex-post facto approval of CCA and the matter has been placed before CCA for approval.

As per Nutan, the Rules says that any out of turn allotment of bungalow can be done only after the approval of CCA but it seems the Rules were ignored in this case while allotting the Bungalow on 31 January 2018.

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नोटबंदी के दौरान सभी दलों द्वारा जमा नकदी सार्वजनिक करने की बसपा की मांग खारिज

चुनाव आयोग ने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) द्वारा भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस, समाजवादी पार्टी सहित सभी महत्वपूर्ण राजनैतिक दलों द्वारा नोटबंदी की अवधि सहित वर्ष 2016-17 में जमा की गयी नकद धनराशि का विवरण सार्वजनिक करने का प्रस्ताव ठुकरा दिया था. ये तथ्य नोटबंदी के बाद बसपा द्वारा दिल्ली के करोल बाग़ स्थित यूनियन बैंक ऑफ़ इंडिया के पार्टी अकाउंट में 02 दिसंबर से 09 दिसंबर 2016 के बीच 104 करोड़ रुपये के पुराने नोट जमा कराये जाने के सम्बन्ध में इलाहाबाद हाई कोर्ट के जाँच के आदेश के संबंध में आरटीआई एक्टिविस्ट डॉ नूतन ठाकुर को आयोग द्वारा दिए गए अभिलेखों से सामने आया है. 

आयोग ने बसपा को 02 मार्च 2017 को नोटिस जारी किया था जिसपर पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा ने 03 मार्च के पत्र द्वारा आयोग से निवेदन किया था कि मीडिया की खबरों के अनुसार नोटबंदी के बाद सभी बड़े राजनैतिक दलों ने बसपा से कई गुणा ज्यादा नकद धनराशि बैंकों में जमा कराया है. मात्र बसपा को नोटिस देने को भेदभावकारी बताते हुए उन्होंने कहा था कि पार्टी फण्ड में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व लाने और सभी पार्टियों में समानता के लिए सभी बड़े राजनैतिक दलों से पिछले 12 महीने के नकद जमाराशि का हिसाब माँगा जाये.

आयोग ने इस प्रस्ताव को नज़रंदाज़ कर दिया और बाद में अपने आदेश दिनांक 04 मई 2017 द्वारा बसपा द्वारा व्यवहारिक परेशानी की बात कहे जाने को स्वीकार करते हुए प्रकरण को समाप्त कर दिया. नूतन ने कहा कि यह दुखद है कि आयोग ने एक राजनैतिक दल द्वारा लाये गए ऐसे प्रस्ताव को ठुकरा दिया जो चुनावी शुचिता में सहायक होता.

ECI ignored BSP plea for parties to disclose cash deposit

The Election Commission of India had completely ignored the request made by Bahujan Samaj Party (BSP) to issue formal notices to all major political parties like Bhartiya Janata Party, Congress and Samajwadi Party to disclose the details of their total Cash deposits in their party bank accounts during 2016-17, covering the demonetization period.

This fact has emerged from the Commission response to RTI activist Dr Nutan Thakur, who had sought the Commission’s documents related to the High Court order about enquiring into the Rs. 104 crores cash money deposit by BSP between 02 to 09 December 2016 in the Party’s bank account in Karol Bagh branch, New Delhi.

The Commission had issued notice to BSP on 02 March 2017 to which its National General Secretary Satish Chandra Mishra had responded on 03 March saying that as per Media reports large amount of case has been deposited by all major national and regional parties, which is many times more than the BSP deposit. Calling the move discriminatory, he had said that to ensure transparency and accountability in party funds and for fair treatment all major political parties must be asked to disclose the cash deposited by them during the last 12 months.

The Commission ignored this plea, and later through its order dated 04 May, it accepted the BSP’s explanation of peculiar circumstances and practical difficulties and dropped the matter. Nutan said it was worrisome that the Commission chose to ignore such an important point being raised by a political party itself.

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एयर इंडिया को खुद के निजीकरण और पीएमओ को पीएम की विदेश यात्रा के बारे में नहीं पता!

एयर इंडिया, जिसके निजीकरण के सम्बन्ध में पिछले दिनों लगातार चर्चा चल रही है, को अपने स्वयं के निजीकरण के सम्बन्ध में कोई जानकारी नहीं है. आरटीआई एक्टिविस्ट डॉ नूतन ठाकुर ने एयर इंडिया से उसके निजीकरण के सम्बन्ध में उसके तथा अन्य कार्यालयों में हुए पत्राचार सहित निजीकरण प्रस्ताव विषयक समस्त अभिलेख देने का अनुरोध किया था. एयर इंडिया के एजीएम (ओए) एस के बजाज ने 11 जुलाई 2017 के अपने पत्र द्वारा बताया कि एयर इंडिया ने किसी प्रस्तावित निजीकरण के सम्बन्ध में किसी भी कार्यालय से कोई पत्राचार नहीं किया है और न ही उसे इस सम्बन्ध में कोई भी पत्र प्राप्त हुआ है. अतः उसे प्रस्तावित निजीकरण के सम्बन्ध में कोई सूचना नहीं है. नूतन के अनुसार यह आश्चर्यजनक है कि जिस कंपनी का निजीकरण प्रस्तावित है, वह ही इस पूरी प्रक्रिया से अलग रखा गया दिख रहा है.  

Air India has no info on its disinvestment plan

Air India, whose proposed privatization is in news recently, does not have any information in this regards. RTI activist Dr Nutan Thakur had requested Air India to provide the documents related with its proposed disinvestment, including those exchanged between Air India and different offices. SK Bajaj, AGM (OA), Air India told through his letter dated 11 July 2017 that Air India has not made any communication to any other officers nor has it received any communication from any of the departments in respect of the proposed disinvestment of Air India. Hence, it has no information to provide in this regards. As per Nutan, it is truly strange that the Company whose privatization is being planned, seems to be out of the loop in the process.

पीआईएल पर कोई कानूनी रोक नहीं- डीओपीटी  

भारत सरकार के कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) से आरटीआई के अनुसार अखिल भारतीय सेवा आचरण नियमावली 1968 में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो आईएएस अथवा आईपीएस अफसर को जनहित याचिका (पीआईएल) दायर करने से रोकता हो. यूपी कैडर के आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर द्वारा दायर एक पीआईएल पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सरकारी सेवकों द्वारा पीआईएल दायर करने पर स्पष्ट नीति बनाने के आदेश दिए थे. अमिताभ ने डीओपीटी से हाई कोर्ट के आदेश के पालन के सम्बन्ध सूचना मांगी थी. डीओपीटी के नोटशीट में साफ अंकित है कि पीआईएल दायर करने पर कोई रोक नहीं है. इसमें वी एस पाण्डेय केस में सुप्रीम कोर्ट द्वारा सरकारी कर्मियों द्वारा पीआईएल दायर करने को उनका संवैधानिक अधिकार बताये जाने का भी उल्लेख है. साथ ही डीओपीटी न्यायिक उपचार के अधिकार और जन सेवा पर उसके प्रभाव में संतुलन बनाने के लिए पूर्वानुमति के बाद पीआईएल की नीति पर विचार कर रहा है किन्तु इस बात पर भी चिंतित है कि प्रभावित प्राधिकरण इस हेतु अनुमति क्यों देगा.

No prohibition on IAS to file PIL- DOPT

RTI information by Department of Personnel and Training (DOPT), Government of India has revealed that there is no provision in the All India Services (Conduct) rules 1968 that prohibits an IAS or IPS officer from filing Public Interest Litigations (PIL) before the Court. In a PIL filed by UP cadre IPS officer Amitabh Thakur, Allahabad High Court had directed to formulate policy as regards government servants filing PILs. Amitabh had sought information from the DOPT about the compliance of the High Court order. The DOPT notesheet clearly states that there is no restriction to file PIL. It also mentions the case of V S Pandey where the Supreme Court has upheld the right of public servants to file PILs. Yet, in order to have a balance between right to judicial remedy and its adverse effect on public service, DOPT is thinking of a policy of public servants taking permission to file PILs, while also worrying on why an affected authority grant permission against itself.

पीएम विदेश यात्रा की सूचना देने से पीएमओ ने मना कर दिया  

प्रधान मंत्री कार्यालय ने भारत के प्रधानमंत्री द्वारा किये गए विदेश यात्राओं में आये खर्च के सम्बन्ध में मांगी गयी सूचना देने से मना कर दिया है. आरटीआई एक्टिविस्ट डॉ नूतन ठाकुर ने 01 जनवरी 2010 के बाद से प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं में की गयी विभिन्न व्यवस्थाओं में हुए खर्चों से सम्बंधित प्रधानमंत्री कार्यालय के अभिलेख दिए जाने का अनुरोध किया था. प्रधानमंत्री कार्यालय के जन सूचना अधिकारी तथा अनु सचिव प्रवीन कुमार ने यह कह कर सूचना देने से मना कर दिया कि मांगी गयी सूचना अत्यंत अस्पष्ट और विस्तृत है.

Info on PM foreign visit denied as vague

The Prime Minister Office has denied the information sought as regards the various expenses incurred in the foreign trips made by the Prime Minister of India. RTI activist Dr Nutan Thakur had requested to provide the documents in the Prime Minister Office (PMO) as regards the various expenses incurred for various arrangements made for these foreign trips from 01 January 2010 onwards. Praveen Kumar, CPIO and Under Secretary in PMO, has denied the information saying that the information sought is too vague and wide.

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योग दिवस पर दो वर्षों में 34.50 करोड़ खर्च

आयुष मंत्रालय, भारत सरकार ने आरटीआई एक्टिविस्ट डॉ नूतन ठाकुर को उपलब्ध करायी गयी सूचना में बताया है कि वर्ष 2015 तथा 2016 में उसके द्वारा अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर कुल 34.50 करोड़ रुपये खर्च किये गाये थे. इनमे 16.40 करोड़ वर्ष 2015 तथा 18.10 करोड़ वर्ष 2016 में खर्च किये गए. जन सूचना अधिकारी बनमाली नायक द्वारा उपलब्ध करायी सूचना में कहा गया है कि अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 2017 में मंत्रालय के खर्च की अंतिम गणना नहीं हुई है. जन सूचना अधिकारी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह आयुष विभाग का खर्च है और योग दिवस पर हुआ पूरा खर्च उपलब्ध नहीं है. उन्होंने इन खर्चों से जुड़े पत्रावली के नोटशीट और अभिलेख सैकड़ों पृष्ठों में होने के आधार पर देने से मना कर दिया.

34.50 crores in 2 years on Yoga Day

As per the information provided by Ministry of AYUSH, Government of India to RTI activist Dr Nutan Thakur, a total of Rs. 34.50 crores has been spent by the Ministry on the celebration of International Yoga Day in 2015 and 2016.  This includes Rs. 16.40 crores for 2015 and Rs. 18.10 crores for 2016. The information provided by CPIO Banamali Naik says that the total expenditure on International Yoga Day 2017 has not been finalized as yet. The CPIO has made it clear that this is the expenditure incurred by the AYUSH Ministry and the total expenditure on Yoga Day is not available. He declined to provide the copy of the Notesheet and documents as regards these expenses saying they are too bulky and run in hundreds of pages.

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आईपीएस अफसरों पर मुकदमों की सूचना गृह मंत्रालय में नहीं है!

गृह मंत्रालय के पास आईपीएस अफसरों पर आपराधिक मुकदमों की सूचना नहीं है. यह तथ्य आईपीएस अफसरों के मामलों को देखने वाली गृह मंत्रालय की पुलिस डिवीज़न-एक द्वारा आरटीआई एक्टिविस्ट डॉ नूतन ठाकुर को आईपीएस अफसरों पर दर्ज आपराधिक मुकदमों की सूचना मांगे जाने पर बताया गया है. जहाँ गृह मंत्रालय ने यह प्रार्थनापत्र नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो को अपने स्तर से उचित उत्तर देने हेतु भेजा है, वहीँ उसने यह भी स्वीकार किया है कि आईपीएस अफसरों पर दर्ज होने वाले आपराधिक मुकदमों की सूचना की पत्रावली उसके द्वारा नहीं रखी जाती है. नूतन ने अनुसार आईपीएस अफसरों के कैडर नियंत्रण संस्था होने के बाद भी गृह मंत्रालय के पास यह बुनियादी सूचना उपलब्ध नहीं होना उनकी लापरवाही को दर्शाता है.

MHA has no record of FIRs on IPS

The Ministry of Home Affairs (MHA) has no records of criminal cases against IPS officers. This fact has been revealed by the response given by Police-I Division of MHA dealing with IPS officers,  to RTI Activist Dr Nutan Thakur as regards the various criminal cases registered against IPS officers in India.  While the MHA has forwarded the RTI application to National Crime Record Bureau to provide a suitable reply to Nutan, it has made it clear that the files in connection with registration of criminal cases against IPS officers is not maintained by it. As per Nutan, the lack of this important information by MHA which is Cadre controlling authority of IPS officers, shows the casualness of the Ministry.

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अखिलेश यादव को मेरी आह लग गई : नूतन ठाकुर

Nutan Thakur : मैंने 18 दिसंबर 2016 को लिखा था-

“मुख्यमंत्री अखिलेश यादव सत्ता में होने के नाते अभी अपनी जितनी भी तारीफ कर लें, पर उन्हें मेरी आह जरूर लगेगी. उन्होंने मेरे पति के खिलाफ लगातार फर्जी आधार पर कार्रवाई की. ईश्वर उन्हें इस बात का दंड अवश्य देगा.” मैंने कहा था-“अखिलेश के आगे पीछे घूम रहे जो अफसर मेरे पति को प्रताड़ित कर रहे हैं, कल सत्ता जाने के बाद वे कहीं नजर नहीं आएंगे. तब अखिलेश को अपने किये पर पछतावा होगा.”

आज मुझे अपनी कही हुई बात फिर याद आ गयी. अब सामने आयेंगे अखिलेश के भ्रष्टाचार के एक एक कारनामे…

यूपी के चर्चित आईजी अमिताभ ठाकुर की पत्नी और एडवोकेट नूतन ठाकुर की एफबी वॉल से.

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चुनाव आयोग बसपा द्वारा 104 करोड़ जमा कराने के मामले में तीन माह में निर्णय ले : हाईकोर्ट

बहुजन समाज पार्टी द्वारा नोटबंदी के बाद दिल्ली के करोल बाग़ स्थित यूनियन बैंक ऑफ़ इंडिया के अपने पार्टी अकाउंट में 02 दिसंबर से 09 दिसंबर 2016 के बीच 104 करोड़ रुपये के पुराने नोट जमा कराये जाने के सम्बन्ध में दायर जनहित याचिका पर इलाहाबाद हाई कोर्ट के लखनऊ बेंच ने निर्वाचन आयोग को तीन माह में निर्णय लेने के आदेश दिए हैं. यह आदेश जस्टिस अमरेश्वर प्रताप साही और जस्टिस संजय हरकौली की बेंच ने याचिकाकर्ता प्रताप चन्द्र की अधिवक्ता डॉ नूतन ठाकुर तथा निर्वाचन आयोग के अधिवक्ता मनीष माथुर को सुनने के बाद दिया.

नूतन ठाकुर ने कोर्ट को बताया कि निर्वाचन आयोग ने 29 अगस्त 2014 द्वारा वित्तीय पारदर्शिता सम्बन्धी कई निर्देश पारित किये जिन्हें आयोग ने अपने आदेश दिनांक 19 नवम्बर 2014 द्वारा और अधिक स्पष्ट किया. इन निर्देशों में कहा गया है कि कोई भी राजनैतिक दल उन्हें चंदे में प्राप्त नकद धनराशि को प्राप्ति के 10 कार्यकारी दिवस के अन्दर पार्टी के बैंक अकाउंट में अवश्य ही जमा करा देगा. इन निर्देशों में कहा गया है कि यदि किसी पार्टी ने इन निर्देशों का उल्लंघन किया तो उसके खिलाफ निर्वाचन चिन्ह (आरक्षण एवं बटाई) आर्डर 1968 के प्रस्तर 16ए में पार्टी की मान्यता रद्द करने सहित तमाम कार्यवाही की जा सकती है.

चूँकि नोटबंदी का आदेश 08 नवम्बर को आया था, अतः इन निर्देशों के अनुसार अधिकतम 20 नवम्बर तक नकद धनराशि बैंक खाते में जमा कर देना चाहिए था पर बसपा ने 2 दिसंबर के बाद 104 करोड़ रुपये जमा कराये, जो सीधे-सीधे इन निर्देशों का उल्लंघन है. निर्वाचन आयोग के अधिवक्ता मनीष माथुर ने कहा कि आयोग को प्रताप चंद्रा की शिकायत मिल गयी है पर वर्तमान में विधान सभा चुनाव कराने की व्यवस्तता के कारण उसे इस पर निर्णय हेतु कुछ समय की आवश्यकता है. कोर्ट ने इन तथ्यों को सुनने के बाद इस शिकायत पर तीन महीने में कार्यवाही करने के आदेश देते हुए याचिका को निस्तारित कर दिया.

HC : Decide over BSP complaint of 104 crore deposit in 03 months 

In the Public Interest Litigation filed as regards the Rs. 104 crores cash money deposited  in old currency by Bahujan Samaj Party between 02 December 20 to 09 December 2016 in the Party’s bank account in Karol Bagh branch, New Delhi after the demonetization order, the  Lucknow bench of Allahabad High Court today directed the Election commission to decide over the complaint within a period of 03 months.

The bench of Justice Amreshwar Pratap Sahi and Justice Sanjay Harkauli passed this order after hearing petitioner Pratap Chandra’s counsel Dr Nutan Thakur and Election Commission counsel Manish Mathur. Nutan Thakur told the Court that the Election Commission had issued Guidelines for financial transparency on 29 August 2014 which had been further clarified through its order dated 19 November 2014. These Guidelines say that any political party must deposit its cash collections in its bank account within 10 working days of the fund collection. These directions say that if any political party violates these Guidelines, action including cancelling the recognition of the political party can be taken under the provisions of Para 16A of the Election Symbols (reservation and Allotment) Orders 1968.

Since the demonetization order came on 08 November 2016, hence as per these directions, the cash deposit in old currencies should necessarily have been undertaken by 20 November but BSP deposited Rs. 104 crores between 02 December to 20 December, which is a clear violation of these Guidelines. Election Commission counsel Manish Mathur said that the Commission has received Pratap Chandra’s complaint but it is presently busy in organizing the Assembly elections, hence it requires some time to decide over the complaint. Having heard the facts, the Court directed the Commission to decide the matter in 03 months, finally disposing the Petition.

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भारत सरकार ने कोर्ट में कहा- अगर अफसरों को मौलिक अधिकार चाहिए तो पहले इस्तीफा दें

इलाहाबाद हाई कोर्ट के लखनऊ बेंच में आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर द्वारा आईएएस, आईपीएस अफसरों द्वारा सरकारी कार्य और नीतियों की आलोचना पर लगे प्रतिबन्ध को ख़त्म करने हेतु दायर याचिका में भारत सरकार ने कहा है कि यह रोक लोक शांति बनाए रखने के लिए लगाई गयी है. राजीव जैन, उपसचिव, डीओपीटी द्वारा दायर हलफनामे के अनुसार प्रत्येक सेवा संविदा में कुछ मौलिक अधिकारों का हनन होता है.

इसके अनुसार यदि सरकारी सेवकों को सरकार की किसी हालिया नीति अथवा कार्य की आलोचना का अधिकार दे दिया गया तो इससे अनुशासन नहीं बचेगा, जो कार्यक्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगी जिससे प्रशासन में अराजकता आएगी और यह लोक शांति को प्रभावित कर सकता है.

हलफनामे के अनुसार हर व्यक्ति अपनी मर्जी से सेवा में आता है और उसे अधिकार है कि सेवा से अलग हो कर अपने मौलिक अधिकारों का उपयोग करें, फ्री-लांसर सरकारी सेवा में न आयें. याचिका में कहा गया था कि अखिल भारतीय सेवा आचरण नियमावली के नियम 7 में किसी भी प्रकार के मंतव्य पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगाया गया है जो संविधान के अनुच्छेद 19(2) में दिए किसी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का हनन है.

Govt in HC: Bureaucrats resign to exercise Fundamental Rights

In a petition filed by IPS Officer Amitabh Thakur in Lucknow Bench of Allahabad High Court challenging the prohibition of All India Services officers to criticize government policy, the Central government has said that such restriction is placed in interest of public order.

The counter reply filed through Rajiv Jain, Under Secretary, DOPT says that every contract of service involves invasion of Fundamental Rights. It says if government servants are permitted to make adverse criticism of any recent government policy or action, there will be no discipline, leading to lack of efficiency in work, chaos in administration and ugly situations which in final analysis may lead to public disorder.

The counter reply also says that every person voluntarily joins these services and it is open for them to exercise their fundamental rights by resigning from the service. Free lancers need not enter government service.

The petition had said that rule 7 of the All India Services Conduct Rules 1968 with blanket prohibition on any adverse criticism of any current government act or policy is against the right to freedom of expression under Article 19(2).

भारत सरकार द्वारा दाखिल किए गए जवाब को देखने के लिए नीचे क्लिक करें>

Counter reply by Govt of India

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नूतन ठाकुर पर लखनऊ की उर्वशी शर्मा ने दर्ज कराया मानहानि का मुकदमा

लखनऊ की सामजिक कार्यकत्री उर्वशी शर्मा ने आज शनिवार को उत्तर प्रदेश के निलंबित आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर की पत्नी और सामाजिक कार्यकत्री नूतन ठाकुर के खिलाफ अधिवक्ता त्रिभुवन कुमार गुप्ता के मार्फत मानहानि का मुकदमा दर्ज कराया है। उर्वशी ने लखनऊ की जुडिशिअल मजिस्ट्रेट दुर्गेश नंदिनी के समक्ष यह शिकायत दर्ज कराई है। अदालत ने उर्वशी का मुकदमा दर्ज कर लिया है और इस मामले में उर्वशी का बयान 05 जनवरी मंगलवार को दर्ज होगा। उर्वशी ने नूतन पर आईपीसी की धारा 499, 500, 501 और 502 में मानहानि करने वाला अपराध बताते हुए कार्यवाही की प्रार्थना की है।

बताते चलें कि लखनऊ स्थित सामाजिक संगठन येश्वर्याज सेवा संस्थान की सचिव, सामाजिक कार्यकत्री और आरटीआई एक्टिविस्ट उर्वशी शर्मा ने यूपी के निलंबित चल रहे आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर की पत्नी सामाजिक कार्यकत्री और आरटीआई एक्टिविस्ट नूतन ठाकुर को इससे पहले हाई कोर्ट के अधिवक्ता त्रिभुवन कुमार गुप्ता के माध्यम  से कानूनी नोटिस भेजकर नूतन पर कायराना एवं दूषित मानसिकता के तहत उनकी व उनकी संस्था येश्वर्याज की मानहानि करने का आरोप लगाया था ।

उर्वशी ने बताया कि उन्होंने बीते 5 नवम्बर को सामाजिक संस्था येश्वर्याज की सचिव की हैसियत से हाई कोर्ट इलाहाबाद की लखनऊ खंडपीठ में एक पी.आई.एल. दायर करके न्यायालय से यूपी के निलंबित आईपीएस अमिताभ  ठाकुर और उनकी पत्नी नूतन ठाकुर के विरुद्ध लंबित रेप और धोखाधड़ी की तथा अमिताभ ठाकुर के विरुद्ध भ्रष्टाचार की एफ.आई.आर. की त्वरित विवेचना कराने के साथ साथ लोकायुक्त द्वारा अमिताभ ठाकुर के विरुद्ध की गयी जांच की अनुशंषाओं पर त्वरित कार्यवाही हेतु उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश देने का आग्रह किया था। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने बीते 16 नवम्बर को येश्वर्याज की इस पीआइएल में किसी भी प्रकार का जनहित का मुद्दा नहीं बताते हुए इसे खारिज कर दिया था।

उर्वशी ने बताया कि पीआईएल खारिज होने के बाद नूतन ठाकुर ने समाचार पत्रों के माध्यम से उन पर और उनकी संस्था येश्वर्याज पर यह पीआइएल यूपी के खनन मंत्री गायत्री प्रसाद प्रजापति के इशारों पर दायर किये जाने का गलत और झूंठा और आधारहीन आरोप लगाया था। बकौल उर्वशी येश्वर्याज संस्था ने 2011-12 में पंजीकरण के बाद से आज तक किसी भी सरकारी या प्राइवेट संस्थान से किसी भी प्रकार की कोई भी मदद नहीं ली है और इसीलिये नूतन ठाकुर द्वारा उनकी संस्था पर सूबे के खनन मंत्री से मदद का आरोप लगाने से उनकी व उनके सामाजिक संगठन की घोर अपहानि कारित हुई थी।

उर्वशी ने इस नोटिस के माध्यम से नूतन पर येश्वर्याज के प्रति दुर्भावना का आरोप लगाया था और नूतन ठाकुर को 15 दिन का समय देते हुए नूतन के ‘गायत्री के इशारों पर पीआइएल किये जाने’ संबंधी वक्तव्य के सम्बन्ध में ठोस साक्ष्य एवं सबूतों की मांग की गयी थे। नूतन द्वारा सबूत न देने की स्थिति में नूतन के खिलाफ कानूनी कार्यवाही किये जाने की बात भी इस नोटिस में कही गयी  थी। उर्वशी के अधिवक्ता त्रिभुवन कुमार गुप्ता ने बताया कि नूतन ठाकुर की तरफ से कोई जबाब न आने पर आज उन्होंने वादिनी उर्वशी की ओर से यह मुकद्दमा न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया था जिसे न्यायालय ने स्वीकार कर लिया गया है।

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मुलायम से पंगा लेने वाले आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर की पत्नी नूतन ठाकुर भाजपा में शामिल होंगी

मैंने आज भाजपा में शामिल होने का फैसला लिया है. राजनीति में आने के मेरे फैसले का मुख्य कारण है कि मैंने अपने सामाजिक कार्यों के दौरान यह अनुभव किया कि वृहत्तर स्तर पर समाज की सेवा कर पाने और अधिक प्रभाव के सामने अपनी बात रख पाने के लिए एक राजनैतिक पार्टी के मजबूत संबल की बहुत अधिक जरुरत है. भाजपा में शामिल होने के मुख्य कारण यह हैं कि इस पार्टी में वंशवाद नहीं है, इसमें सर्वाधिक आतंरिक प्रजातंत्र है, यह विभिन्न वगों में विभेद नहीं करता है, एक अखिल भारतीय पार्टी है और राष्ट्रीयता की भावना पर आधारित है. जल्द ही मैं औपचारिक रूप से पार्टी की सदस्यता ग्रहण करुँगी.

Today I have decided to join BJP. The main reason for my joining politics is that I have understood during my social activities that there is an immense need for support of a strong political party to work more effectively and efficiently for the larger social goals. The reasons for joining BJP are that it does not have any dynastic politics, has the highest inner democracy, it does not discriminate between different classes, is an all India Party and is based on the concept of Nationality. Very soon I shall be taking formal membership of the Party.

यूपी कैडर के वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर की पत्नी डॉ नूतन ठाकुर के फेसबुक वॉल से.

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लोकायुक्त ने यूपी के मंत्री गायत्री प्रजापति को दोषमुक्त करार दिया, नूतन ठाकुर को धमकी मिली

Amitabh Thakur : जय हिन्द नूतन ठाकुर…  पत्नी नूतन ठाकुर को मंत्री श्री गायत्री प्रजापति के खिलाफ अवैध खनन की शिकायत के बाद लोकायुक्त द्वारा फटकार लगाने पर कोटिश सैल्यूट. मेरी दृष्टि में अवैध खनन और उसके द्वारा अवैध संपत्ति अर्जित करने की शिकायत की “बड़ी गलती” पर उन्हें यह दंड मिलना ही चाहिए था क्योंकि सच्चाई तो यही है कि प्रदेश में कहीं अवैध खनन नहीं हो रहा है और यदि किसी को ऐसा होता दिख रहा है तो यह उस व्यक्ति का दृष्टि-दोष और भ्रम है. नूतन द्वारा इस लम्बी लड़ाई को बहुत ईमानदारी से लड़ने और उसके बदले फटकार और दंड की धमकी पाने की स्थिति ने व्यवस्था-विषयक बहुत सारी बातें बिना कहे स्वयं कह दीं और हमें अपने पथ पर अविचलित चलने की एक नयी उर्जा और प्रेरणा भी दी.

Nutan Thakur Jai Hind… My thousand salutes to wife Nutan for strong indictment by the Lokayukta for having made a complaint against mining minister Sri Gayatri Prajapati. She deserves this punishment for the “big mistake” of raising issue of illegal mining and minting of money through this because the truth is that there is no illegal mining in the State and if someone feels so, it is his distorted opinion. The way Nutan fought this long battle with utmost honest and braveness and got indictment and possibility of getting punished states much about the system and gives us newer energy and reason to keep going on our chosen path.

यूपी कैडर के वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर के फेसबुक वॉल से.


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लखनऊ में साधना न्यूज के लाइव शो पर हमले के बाद की कुछ तस्वीरें

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‘Holiday politics’ challenged in HC

IPS officer Amitabh Thakur and social activist Dr Nutan Thakur today filed a Petition in Allahabad High Court, Lucknow Bench as regards the ‘holiday politics’ being played by the Uttar Pradesh government for the last few years. The petition says that the State government declares ‘public holidays’ under section 25 of Negotiable Instruments Act but for the last few years such holidays are being declared in a completely arbitrary manner solely for political considerations.

Thus the previous Mayawati government declared public holiday on birth and death anniversary of Kansi Ram which was changed by Akhilesh Yadav government to birth anniversaries of Chandrashekhar, Karpuri Thakur and Charan Singh. The petition says that these arbitrary declarations of holidays are badly affecting governance and hence need to be regulated immediately. Hence they have prayed for framing of a definite holiday policy and end the practice of declaring public holidays in name of political reasons, solely on caste or religious considerations.

छुट्टियों की राजनीति का मामला हाई कोर्ट पहुंचा

आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर ने पिछले कुछ सालों से उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा ‘छुट्टियों की राजनीति’ के सम्बन्ध में आज इलाहाबाद हाई कोर्ट, लखनऊ बेंच में एक याचिका दायर किया है. याचिका के अनुसार राज्य सरकार नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 25 में ‘सार्वजनिक अवकाश’ घोषित करता है पर पिछले कुछ सालों से उत्तर प्रदेश में पूरी तरह राजनैतिक कारणों से मनमाने तरीके से छुट्टियां घोषित की जा रही हैं.

अतः जहां पिछली मायावती सरकार ने कांशीराम के जन्म और पुण्य तिथि पर अवकाश घोषित किया था, मौजूदा अखिलेश सरकार ने उसकी जगह चंद्रशेखर, कर्पूरी ठाकुर और चरण सिंह के जन्मदिवस पर छुट्टी घोषित किया. याचिका के अनुसार इस प्रकार मनमाने तरीके से छुट्टियों की घोषणा से सरकारी काम बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं और उन पर तत्काल नियंत्रण की जरुरत है. अतः उन्होंने एक निश्चित “सार्वजनिक अवकाश” नीति बनाने और इस प्रकार जाति और धर्म के आधार पर राजनैतिक कारणों से छुट्टी घोषित करने के काम पर विराम लगाने की प्रार्थना की है.

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यूपी के दो परम भ्रष्टाचारियों यादव और प्रजापति को गुस्सा क्यों आता है?

Amitabh Thakur : मेरी पत्नी नूतन ठाकुर ने पिछले दिनों कई गलत काम किये हैं लेकिन उनमे सबसे गलत काम निश्चित रूप से नॉएडा के भले शेर अभियंता और देश के पूर्व युवराज के जिले के खनन बाबा के खिलाफ शिकायतें हैं. ये दोनों ऐसे लोग हैं जिनके सम्बन्ध में बच्चा-बच्चा यह मानता है कि उन पर साक्षात् लक्ष्मी की कृपा है, साथ ही यह भी मान्यता है कि इन दोनों ने तंत्र का मन्त्र पूरी तरह समझ लिया है और ऊपर से नीचे तक सभी जगह इनके पत्ते फिट हैं, और जो व्यवस्था में फिट है, जाहिर है वह हिट है. इसीलिए यादव प्रजापति बंधू पूरी तरह और बुरी तरह हिट हैं, सुपरहिट. इस तरह हिट कि इनके लिए स्वयं व्यवस्था खड़ी हो जाती है यह कहते हुए कि ये भोले हैं और भले भी.

गलती इंसान से एक बार होती है, यदि कोई बार-बार वाही काम दुहराए तो उसे गलती नहीं कहते वह जानबूझ कर किया गया कुकृत्य है और नूतन ठाकुर यही कर रही हैं. तभी तो जैसे ही उन्होंने खनन बाबा के खिलाफ शिकायत दर्ज की, खनन बाबा ने चिल्लाते हुए कहा था कि नूतन ठाकुर को अपील करने की आदत हो गयी है, वे सस्ती लोकप्रियता के लिए इसी प्रकार से अपील करती रहती हैं. इस पर भी वे नहीं मानीं तो पहले एक खबरी बाबू से धमकी और उतने पर बात नहीं बनी तो रेप का गेम, अर्थात खलास करने का शानदार उपाय- वह भी अकेले नहीं पति-पत्नी को एक साथ निबटने का अचूक नुस्खा. यह अलग बात है कि रेप का खेल फ्लॉप हो गया और अब ये पति-पत्नी कहाँ बलात्कार-कहाँ बलात्कार कह कर चिल्लाते घूम रहे हैं पर व्यवस्था है कि इस कथित बलात्कार की घटना को उसी तरह भूल चुकी है जैसे गदहे के सिर से सिंह. 

नूतन की हरकतों से खफा खनन बाबा इतने पर नहीं माने थे और उन्होंने और उनके सभी मुंहबोले गदाधारियों ने एक-एक कर अपनी सत्यनिष्ठ और ईमानदारी की कहानी गाते हुए नूतन के खिलाफ एक के बाद एक मानहानि की नोटिस देनी शुरू की और फिर कोर्ट में मुकदमे. इस बीच पूरी दुनिया (और पूरी मीडिया) चिल्लाती रही, परत दर परत खोलती रही पर कहते हैं न कि मियाँ-बीवी राजी तो क्या करेगा काजी, या फिर सैयां भये कोतवाल तो अब डर काहे का. ऐसे में नूतन और तमाम खबरी नक्कारखाने में तूती की आवाज़ से अधिक कुछ नहीं साबित हुए, यह जरुर है कि इनकी दशा राणा सांगा की हो गयी कि अस्सी घाव लगे हैं तन पर. 

लगभग खनन बाबा के साथ-साथ ही जनमानस में एक और नायक का उदय हुआ- शेर अभियंता, नॉएडा वाले. सोना निकला, चांदी निकले, निकले कई-कई तार, पर जब ऊपर वाले का साया बाकी सब बेकार.  और, आज जब नूतन ने बताया कि शेर अभियंता डंके की चोट पर गीता की कसम खा कर कह रहे हैं कि उन्होंने कभी किसी मामले में भ्रष्टाचार नहीं किया और अपना सरकारी दायित्व पूरी निष्ठा और ईमानदारी से निभाया, तो मुझे पक्का विश्वास हो गया कि पक्का खलीफा सबसे पहले गीता की झूठी कसम खाना सीखता है, तभी उसे बाकी गलत कामों की शिक्षा दी जाती है. 

मुझे यह भी अच्छा लगा कि शेर अभियंता ने कहा है कि उनके बारे में सभी सूचनाएँ निर्मूल हैं और मीडिया ने इस मुद्दे को बिना तथ्यों के तोड़मरोड़ कर सनसनी फैलाई, क्योंकि यही बात लगभग हूबहू खनन बाबा ने भी कही थी. इसमें भी कोई शक नहीं कि यदि खनन बाबा और शेर अभियंता के कोई वाकई गुनाहगार हैं तो यह मीडिया ही है क्योंकि यदि नूतन जैसे चार-छह सिरफिरे इन मुद्दों को उठाते भी तो जिस प्रकार तंत्र के रखवाले पूरी बात समझ कर क्षीरसागर में अविचलित अवस्था में बने रहे, यदि ये मीडिया वाले भी वैसी ही शांति और निर्लिप्तता का प्रदर्शन करते तो ये मामले कत्तई नहीं फैलते. 

शेर अभियंता ने कहा है कि नूतन और मीडिया के लोगों ने उन पर अत्यंत आपत्तिजनक और मानहानिपरक आरोप लगाए हैं जिनपर वे कानूनी कार्यवाही करेंगे. इस रूप में भी वे खनन बाबा के ही सच्चे शिष्य जान पड़ते हैं. लब्बोलबाब यह कि देश-समाज को यादव प्रजापति राज की बहुत जरुरत है और सभी सच्चे देशभक्तों को इन लोगों के सहयोग में खड़े होना चाहिए और इनमे येन-केन-प्रकारेण खोट निकाले की अपनी बुरी आदत तो त्याग देना चाहिए. इसी में देश का सुख है, समाज का उत्थान है और स्वयं का भला भी. 

यूपी कैडर के वरिष्ठ और बेबाक आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर के एफबी वॉल से


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आरटीआई मांगने वालों की जांच नियमविरुद्ध, कड़ा ऐतराज़

लखनऊ : आरटीआई कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर ने सूचना आयुक्त हाफिज उस्मान द्वारा आरटीआई मांगने वाले लोगों पर सरकारी अधिकारियों द्वारा ब्लैकमैलिंग या रिश्वत मांगने के आरोपों की जांच कराये जाने पर कड़ा ऐतराज़ किया है.

उन्होंने श्री उस्मान को पत्र लिख कर कहा है कि ये आदेश आरटीआई एक्ट के खिलाफ हैं क्योंकि इस एक्ट में आयुक्त को सुनवाई की शक्तियां धारा 18 तथा धारा 19 में दी गयी हैं, जिसमे धारा 18 में सूचना नहीं मिलने अथवा गलत सूचना मिलने पर सूचना मांगने वाले द्वारा जन सूचना अधिकारी के खिलाफ शिकायत तथा धारा 19 में उसके द्वारा द्वितीय अपील की व्यवस्था है.

डॉ ठाकुर के अनुसार आरटीआई एक्ट में कहीं भी सूचना मांगने वाले की जांच करने अथवा जन सूचना अधिकारी की ऐसी शिकायतों को सुनने के अधिकार नहीं हैं, साथ ही उसके पास इस सम्बन्ध में पुलिस शिकायत सहित सभी विकल्प हमेशा उपलब्ध रहते हैं. 

अतः उन्होंने श्री हाफिज से भविष्य में आरटीआई एक्ट के विपरीत कार्यवाही कर उसे प्रचारित नहीं करने का निवेदन किया है क्योंकि नियमविरुद्ध होने के साथ यह सूचना अधिकारियों को सूचना नहीं देने और बाद में ऐसे आरोप लगा कर बचने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देगा.

समाचार अंग्रेजी में पढ़े – 

Probe of RTI seekers against RTI Act, strongly protested  

RTI activist Dr Nutan Thakur has strongly protested the enquiry orders issued by Information Commissioner Hafiz Usman regarding complaints of blackmail or bribe of Public Information Officers (PIOs) by RTI applicants.

In her letter to Sri Usman, she said that these orders are blatantly against the RTI Act because the Commission gets power of hearing in the Act only through sections 18 and 19 where section 18 is as regards the complaint made by applicants regarding or denial of information etc and section 19 is regarding second appeal by him.

Dr Thakur said that the RTI Act has no provisions for hearing the complaints of the PIOs or to enquire against the information seeker and the PIOs always have a right to make police complaint regarding any attempt of blackmail.

Hence she has requested Sri Usman not to act against the RTI Act and to publicize it because other than being illegal, these acts will also bolster the PIOs not to provide information and make such allegations later.

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रीता बहुगुणा जोशी के घर आगजनी मामले में डीजीपी एके जैन को भी बनाएं मुलजिम : नूतन ठाकुर

सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर ने मुख्य सचिव आलोक रंजन से रीता बहुगुणा जोशी के घर पर आगजनी मामले में डीजीपी ए के जैन को भी मुलजिम बनाने की मांग की है. उन्होंने कहा है कि सीबी-सीआईडी द्वारा 28 जुलाई 2014 को गृह विभाग को भेजे पत्र और 361 पृष्ठ के अंतिम प्रगति आख्या  से श्री जैन की आपराधिक संलिप्तता स्पष्ट हो जाती है. उन्होंने कहा कि जब श्री जैन रात 12.30 बजे किरायेदारी के मामले में ठाकुरगंज जा सकते हैं तो उनके जैसे तेजतर्रार अधिकारी के लिए यह संभव नहीं था कि यह घटना उनके संज्ञान में न आई हो. अतः अधीनस्थ पुलिस अफसरों पर कार्यवाही और मुख्य अभियुक्त को बचाने को गलत मानते हुए उन्होंने श्री जैन को अभियुक्त बनाते हुए तत्काल डीजीपी पद से हटाने की मांग की है.

सेवा में,
श्री आलोक रंजन,
मुख्य सचिव,
उत्तर प्रदेश,
लखनऊ
विषय- श्री ए के जैन, आईपीएस पर कार्यवाही विषयक
महोदय,

कृपया श्री पंकज कुमार, पुलिस अधीक्षक, अपराध शाखा, अपराध अनुसन्धान विभाग, उत्तर प्रदेश द्वारा श्री अरुण कुमार मिश्रा, विशेष सचिव, गृह (पुलिस) अनुभाग- 4, उत्तर प्रदेश शासन को प्रेषित पत्र संख्या सीबी-223/09 एनजीओ/(लखनऊ) दिनांक 28/07/2014 तथा उसके साथ संलग्न 361 पृष्ठ के अंतिम प्रगति आख्या  का सन्दर्भ ग्रहण करें, जो दिनांक 19/07/2009 को उत्तर प्रदेश शासन द्वारा सीबी-सीआईडी को संदर्भित किये गए मु०अ०स० 384/09 धारा 147/504/506/427/436 आईपीसी थाना हुसैनगांह, जनपद लखनऊ की विवेचना के पूर्ण करने के उपरांत शासनादेश दिनांक 21/03/2003 के अनुपालन में दिनांक 21/07/2014 को एडीजी, सीबी-सीआईडी द्वारा विवेचना की अंतिम प्रगति आख्या के अनुमोदित किये जाने के पश्चात् शासन को प्रेषित किये गए स्थिति विषयक है.

यह विवेचना सुश्री रीता बहुगुणा जोशी के सरोजिनी नायडू मार्ग, लखनऊ स्थित आवास के कतिपय आपराधिक तत्वों द्वारा जलाए जाने विषयक था.

इस आख्या में उस घटना में श्री ए के जैन, वर्तमान डीजीपी, यूपी और तत्कालीन आईजी, लखनऊ ज़ोन की भूमिका का विश्लेषण किया गया है. इसमें कहा गया है कि समस्त तथ्यों और साक्ष्यों की समीक्षा और विश्लेषण से पाया गया कि श्री जैन द्वारा वीआईपी क्षेत्र में सुश्री रीता बहुगुणा जोशी के आवास पर आगजनी और तोड़फोड़ की इतनी महत्वपूर्ण घटना को कम महत्व दे कर कनक सिटी, ठाकुरगंज स्थित किरायेदारी के विवाद के एक मामले में रात करीब 12 बजे फोन आते ही इससे पूर्व ही सुश्री जोशी के घर आगजनी की इतनी संवेदनशील घटना की सूचना मिलने के बाद भी स्पष्टतया कम संवेदनशील प्रकरण के सम्बन्ध में खुद रात 12.30 बजे घटनास्थल निरीक्षण करना और वहां जांच का कोई औचित्य नहीं होने पर भी अनायास भ्रमण करते रहना और लगभग सवा घंटे विलम्ब से सुश्री बहुगुणा के आवास पर पहुंचना प्रमाणित है.

रिपोर्ट में यह भी अंकित है कि श्री जैन को सुश्री जोशी के विवादित बयान के बाद उत्पन्न स्थिति का आकलन था, जैसा उन्होंने स्वयं स्वीकार किया. इस रिपोर्ट में श्री जैन के इस कृत्य को स्पष्टतया कटघरे में लाया गया है और कहा गया है कि जिस स्थान पर वे गए वहां आईजी स्तर के अधिकारी के पहुँचने का कोई औचित्य नहीं था. इतना ही नहीं सीबी-सीआईडी ने श्री जैन को घटना के उपरांत घटनास्थल से पकडे गए कथित अभियुक्तों और सुश्री जोशी के मकान में आवासित 8 लोगों को निकाल कर थाना हजरतगंज और महिला थाना में रखने के सम्बन्ध में और उनसे घटना कारित करने वाले व्यक्तियों के सम्बन्ध में न तो स्वयं पूछताछ करने और न ही किसी राजपत्रित अधिकारी से पूछताछ करवाने तथा पूछताछ आख्या तैयार करवाने का भी स्पष्ट रूप से दोषी पाया.

जब श्री जैन रात 12.30 बजे किरायेदारी के मामले में ठाकुरगंज जा सकते हैं तो उनके जैसे तेजतर्रार अधिकारी के लिए यह संभव नहीं था कि यह घटना उनके संज्ञान में न आई हो. अतः अधीनस्थ पुलिस अफसरों पर कार्यवाही और मुख्य अभियुक्त को बचाना पूरी तरह गलत है बल्कि तथ्यों से यही दिखता है कि मुख्य अभियुक्त स्वयं श्री ए के जैन थे. अतः निवेदन करती हूँ कि कल थाना हुसैनगंज में सीबी-सीआईडी द्वारा दर्ज कराये गए मुकदमे में न्याय की दृष्टि से श्री ए के जैन को मुख्य अभियुक्त बनाते हुए उनके खिलाफ भी तथ्यों के आलोक में विवेचना किये जाने के निर्देश देने की कृपा करें.

साथ ही इन तथ्यों की जानकारी के बाद श्री जैन की प्रदेश के डीजीपी जैसे अत्यंत न्यायपूर्ण, महत्वपूर्ण और जिम्मेदार पद, जिसपर पूरे प्रदेश के प्रत्येक नागरिक को निष्पक्ष भाव से न्याय देने की जिम्मेदारी होती है, से भी निष्पक्ष विवेचना के दृष्टिगत तत्काल हटाये जाने की कृपा करें.

पत्र संख्या- NT/Complaint/99/15
दिनांक- 21/03/2015                                     
भवदीय,

डॉ नूतन ठाकुर)
5/426, विराम खंड,
गोमती नगर, लखनऊ
# 094155-34525
nutanthakurlko@gmail.com

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Protest in arrest on FB comment on Azam Khan’s pressure

Social activists, led by Dr Nutan Thakur, today protested at Gandhi Statue, Hazratranj, Lucknow against arbitrary arrest of Class XI student for FB comment saying that this is complete State highhandedness undertaken purely on Azam Khan’s pressure. They included Devendra Dixit, Sharad Mishra, Anupam Pandey, Rohit Tripathi, Dr Praveen and others.

The activists said that this incidence has once again shown that in UP two kinds of law operate- one for the common people and one for the VIPs. They said that while Azam Khan’s buffaloes get searched on war-footing, even FIRs are not registered in crime on common men.

Dr Thakur said that this arrest shows the draconian face of State administration which has also defied the Supreme Court directions on application of section 66A of the IT Act. She said that the accused’ father has clearly stated that his son did not even know that what he did was a crime and yet the Rampur police arrested him, while every crime needs a motive and there was complete absence of any such motive in this case.

The activists said that this was among the latest examples of the powerful politicians using law to silence the freedom of expression and to satisfy their personal ego. They have demanded before the Governor, UP to immediate release of the boy and exonerating him from the artificially imposed crime.

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यादव सिंह पीआईएल : हलफनामे से सीबीसीआईडी जांच की सच्चाई खुली

यादव सिंह मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर की पीआईएल में देबाशीष पांडा, प्रमुख सचिव, गृह द्वारा दायर हलफनामे से श्री यादव के खिलाफ सीबीसीआईडी जांच की सच्चाई सामने आ जाती है. नॉएडा प्राधिकरण के आर पी सिंह ने सेक्टर-39, नॉएडा में दायर एफआईआर में श्री सिंह और श्री रामेन्द्र पर 8 दिनों में 954.38 करोड़ के बांड हस्ताक्षित करने के साथ तिरुपति कंस्ट्रक्शन और जेएसपी कंस्ट्रक्शन द्वारा 08 दिसंबर 2011 को भूमिगत 33/11 केवी केबल का 92.06 करोड़ का काम ठेका मिलने के पहले ही 60 फीसदी काम पूरा कर लेने में मिलीभगत का आरोपी बताया था.

इसके लिए गुणवत्ता जांचने वाली कंपनी राइट्स की 01 जून 2012  की रिपोर्ट के साथ इन गड्ढों को भरने के तीन अनुबंधों के पेमेंट 08 दिसंबर 2011  से पूर्व हो जाने और अख़बारों में छपी तमाम खबरों को साक्ष्य के रूप में बताया गया था. पर अब श्री पांडा ने हलफनामे पर कहा है कि यह सब आरोप गलत थे और इनके कोई साक्ष्य नहीं पाए गए. हलफनामे में उलटे राइट्स को ही दोषी ठहराते हुए सीबीसीआईडी जांच को पूरी तरह सही करार दिया गया है. हलफनामे से ज्ञात हुआ है कि वही आर पी सिंह, जिन्होंने यह मुक़दमा लिखवाया था, अदालत के सामने पलट गए और उनके अनुरोध पर स्पेशल जज, गौतम बुद्ध नगर ने 27 नवम्बर 2014 को सीबीसीआईडी रिपोर्ट स्वीकार कर ली.

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Yadav Singh PIL : Affidavit exposes CBCID enquiry truth

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Yadav Singh PIL : Affidavit exposes CBCID enquiry truth

The affidavit filed by Principal Secretary Home Debashish Panda before Lucknow bench of Allahabad High Court in the PIL filed by social activist Dr Nutan Thakur in Yadav Singh scam, exposes the truth about CBCID enquiry against Sri Yadav. R P Singh of Noida Authority registered an FIR in Sector 39, Noida against Sri Singh and Sri Ramendra for executing bonds worth Rs. 954.38 crores in merely 8 days and for colluding with Tirupati Construction and JSP Construction, who completed 60 percent of Rs. 92.06 crore underground 33/11 KV cable work before actual execution of contract on 08 December 2011.

The FIR was based on report dated 01 June 2012 by quality control company RITES along with payment of three land-filling works before 08 December 2011 and the various newspaper articles about these activities. But now Sri Panda has said in his affidavit that all these allegations were found baseless during investigation. Instead the affidavit blames RITES and calls the CBCID enquiry perfectly correct. The affidavit also brings forth the fact that the same R P Singh who filed the FIR, took a U turn before the Court and on his request the Special Judge, Noida accepted the CBCID report on 27 November 2014.

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यादव सिंह पीआईएल : हलफनामे से सीबीसीआईडी जांच की सच्चाई खुली

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ये है अखिलेश यादव की नाक तले काम कर रही लखनऊ पुलिस की हकीकत

आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर ने आज डीआईजी लखनऊ आर के चतुर्वेदी को पत्र लिख कर लखनऊ पुलिस की हकीकत बताई है. पत्र में उन्होंने कहा है कि उनकी पत्नी डॉ नूतन ठाकुर ने स्वयं से सम्बंधित एक शिकायती पत्र थाना गोमतीनगर में भेजा पर थानाध्यक्ष और एसएसआई सहित सभी ने पत्र रिसीव करने तक से मना कर दिया. श्री ठाकुर ने इस सम्बन्ध में एसएसआई से फोन पर बात करना चाहा तो उन्होंने इससे भी मना कर दिया.

इसके बाद श्री ठाकुर ने डीआईजी को फोन कर गहरी नाराजगी जाहिर की जिसके तुरंत बाद डीआईजी ने थानाध्यक्ष को फोन किया जिन्होंने झूठ कह दिया कि पत्र पहले ही रिसीव हो गया है जबकि सच्चाई यह थी कि डीआईजी की डांट के बाद पत्र रिसीव करना शुरू किया गया था. श्री ठाकुर ने डीआईजी को इस सभी बातों से अवगत कराते हुए इस मामले को एक नजीर के रूप में देखते हुए कठोर कार्यवाही के लिए कहा है ताकि लखनऊ पुलिस में वास्तविक सुधार हो और जनता का वास्तविक भला हो.

सेवा में,
श्री आर के चतुर्वेदी,
डीआईजी रेंज,
लखनऊ

विषय- थाना गोमतीनगर में पत्र रिसीव नहीं करने, बात तक करने से इनकार करने, पत्र ले गए व्यक्ति से अनुचित आचरण किये जाने विषयक

महोदय,

कृपया आज समय 01.48 बजे मेरे सीयूजी नंबर 094544-00196 से आपके सीयूजी नंबर 094544-00212 पर किये गए फोन कॉल और इसके उत्तर में आप द्वारा 02.00 बजे किये गए कॉल का सन्दर्भ ग्रहण करें. आपको स्मरण होगा कि मैंने आपको कॉल कर अवगत कराया था कि मेरी पत्नी डॉ नूतन ठाकुर की ओर से एक प्रार्थनापत्र (प्रतिलिपि संलग्न) ले कर एक व्यक्ति थाना गोमतीनगर में रिसीव कराने गए थे जहां उपस्थित सभी लोगों ने पत्र रिसीव करने से साफ़ इनकार कर दिया था. मैंने यह भी बताया था कि जब पत्र ले गए व्यक्ति ने फोन मिला कर थाने के लोगों से मुझसे फोन से बात करने को कहा तो उन्होंने इससे तक इनकार कर दिया था. मैंने आपको निवेदन किया था कि थाने पर थानाध्यक्ष तथा एसएसआई बैठे हैं पर कोई भी व्यक्ति पत्र रिसीव नहीं कर रहा है.

मैंने आपसे निवेदन किया था कि आप और सभी वरिष्ठ अधिकारी लगातार कहते हैं कि थानों पर सभी पत्र तत्काल रिसीव होंगे पर यह उसकी वास्तविक स्थिति है. मैंने आपसे निवेदन किया था कि मैं मात्र अपना पत्र रिसीव करवाने हेतु यह फोन नहीं कर रहा, बल्कि इस मामले को एक नजीर के रूप में देखने के लिए कर रहा हूँ कि थाने पर इस प्रकार खुलेआम प्रार्थनापत्र रिसीव नहीं किये जा रहे हैं, क्या इस पर कोई कार्यवाही भी हुआ करती है और आप जैसा सक्षम अधिकारी क्या इस पर कोई कार्यवाही करेगा.

आपने मुझसे कहा था कि आप अभी मामले को देख रहे हैं और मुझे सूचित करेंगे. आपने कुछ देर बाद मुझे फोन कर बताया था कि वह पत्र तो पूर्व में रिसीव हो गया है जिस पर मैंने आपको बताया था कि मुझे अभी-अभी थाने पर मौजूद व्यक्ति ने बताया कि थानाध्यक्ष अभी-अभी किसी का फोन हाथ में लिए सर-सर करते निकले हैं और पत्र रिसीव करने के आदेश दिए हैं. मैंने यह भी बताया था कि अभी तक पत्र रिसीव नहीं हुआ है, बल्कि आपके फोन के बाद पत्र रिसीव करने की कार्यवाही शुरू हुई है. मैंने आपसे निवेदन किया था कि इस मामले को यूँ ही बीच में छोड़ने की जगह इसमें कोई ठोस कार्यवाही करें ताकि सही सन्देश जाए.

बाद में मेरी पत्नी डॉ नूतन ठाकुर ने भी आपसे फोन कर इस मामले में ठोस कार्यवाही का निवेदन किया था पर अब तक कुछ भी नहीं हुआ दिखता है. निवेदन है कि हमारे लिए यह एक अकेला मामला नहीं, एक उदहारण है कि किसी प्रकार स्वयं लखनऊ जनपद में पुलिस द्वारा थाने पर व्यवहार किया जा रहा है. जैसा मैंने आपको बताया था कि थाने के लोग जानते हैं कि मैं एक आईपीएस अफसर हूँ, तब उन्होंने उस समय तक पत्र रिसीव नहीं किया जबतक मैंने आपके समक्ष अपनी गहरी नाराजगी और भारी कष्ट व्यक्त नहीं किया था और जब तक आपने इसे पुनः थानाध्यक्ष गोमतीनगर को आगे संप्रेषित नहीं किया था.

निवेदन करूँगा कि यदि यह एक उस आदमी के साथ स्थिति हो जो मौजूदा समय में आईपीएस पद पर तैनात है तो आम आदमी की स्थिति का अनुभव स्वयं किया जा सकता है. अतः जैसा आपके विषय में आम शोहरत है और जैसा मैंने आपसे फोन पर भी कहा था कि आप एक सक्षम अधिकारी माने जाते हैं, मैं समझता हूँ यह आपका उत्तरदायित्व बनता है कि मात्र पत्र रिसीव होने को प्रकरण का अंत समझने की जगह इसे प्रकरण की शुरुआत मानते हुए इसे एक उदहारण के रूप में देखने की कृपा करें. तदनुसार यदि आपको मेरी बातों में कोई अर्थ दिख रहा हो तो न सिर्फ इस मामले में
आवश्यक जांच कर आवश्यक कार्यवाही कार्यवाही करने की कृपा करें बल्कि इस सम्बन्ध में भविष्य में किसी घटना की पुनरावृति को रोकने के लिए भी सभी आवश्यक निर्देश निर्गत करने की कृपा करें.

पत्र संख्या-AT/Complaint/85/15                                  
दिनांक- 26/02/2015
(अमिताभ ठाकुर)
5/426, विराम खंड,
गोमती नगर, लखनऊ
# 94155-34526
amitabhthakurlko@gmail.com

प्रतिलिपि- डीजीपी, यूपी, लखनऊ को कृपया आवश्यक कार्यवाही हेतु

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यूपी में आज़म खान के खिलाफ जांच करने में लोकायुक्त को भी पसीने छूटते हैं!

यूपी में लोकायुक्त को भी आजम खान के खिलाफ जांच शुरू करने में पसीने छूटने लगते हैं. वे नियम कानून और वैधता आदि का सवाल उठाने लगते हैं. जिनके पास जानकारों की पूरी फौज होती है, सरकारी संसाधन और संरक्षण होता है, वह भी शिकायत करने वाले से ही पूछता है कि किस नियम के तहत ये जांच करें. अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री आज़म खान द्वारा बिना किसी नियम, शर्त और प्रक्रिया के राज्य सरकार के अल्प संख्यक विभाग के मौलाना जौहर अली शोध संस्थान रामपुर की बेशकीमती भूमि और भवन स्वयं की निजी संस्था मौलाना जौहर अली ट्रस्ट को दिए जाने के खिलाफ सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर के परिवाद पर लोकायुक्त जस्टिस एन के मल्होत्रा द्वारा उठाई गयी आपत्तियों का आज उन्होंने उत्तर प्रस्तुत किया.

लोकायुक्त ने वादिनी से पूछा था कि मंत्रिमंडल या मुख्यमंत्री के खिलाफ लोकायुक्त अधिनियम के किस नियम में जांच की जा सकती है. इस पर डॉ ठाकुर ने लोकायुक्त से मिलकर लिखित अवगत कराया है कि उन्होंने मंत्रिमंडल या मुख्यमंत्री के खिलाफ जांच की मांग नहीं की है बल्कि आज़म खान और  अल्पसंख्यक विभाग के अधिकारियों के खिलाफ जांच की मांग की है. उन्होंने कहा कि उनका परिवाद इन अधिकारियों और श्री खान द्वारा करोड़ों की सरकारी जमीन और भवन कौड़ियों के मोल श्री खान की निजी संस्था को नियमों के खिलाफ दिए जाने की संस्तुति के खिलाफ है, इसके आधार पर लिए गए मंत्रिमंडल के निर्णय के खिलाफ नहीं. उन्होंने बताया कि लोकायुक्त को मात्र अंतिम निर्णय नहीं, गलत संस्तुति की जांच का भी अधिकार है, अतः यह परिवाद लोकायुक्त की परिधि में है.

Azam Khan complaint: Lokayukta has powers to enquire, says complainant

In the complaint regarding Minorities welfare minister Azam Khan getting prime government land and huge building of Maulana Jauhar Ali Shodh Sansthan at Rampur allotted to his private Maulana Jauhar Ali Trust, in blatant disregard to the rules and regulation, complainant activist Dr Nutan Thakur today answered the queries raised by Lokayukta Justice N K Malhotra

Lokayukta had asked the complainant under what provisions of law can he enquire against Chief Minister or the Cabinet. Dr Thakur met the Lokayukta and said that she has not sought enquiry against the CM or the Cabinet but against Azam Khan and concerned officers of the Minorities welfare department. She said that her complaint is as regards the recommendations made by Sri Khan and his officers and not against the Cabinet decision based on this recommendation.   She said that Lokayukta can enquire not only the final decision but also the recommendations and findings and hence the complaint comes under the Lokayukta’s purview.

मूल शिकायत…

सेवा में,
मा० लोकयुक्त महोदय,
उत्तर प्रदेश,
लखनऊ

विषय- श्री आज़म खान, मंत्री, अल्पसंख्यक कल्याण के विरुद्ध परिवाद विषयक

महोदय,

कृपया श्री आज़म खान, मंत्री, अल्पसंख्यक कल्याण की निजी संस्था को व्यक्तिगत लाभार्थ राज्य सरकार की भूमि और भवन को स्थापित नियमों और मा० सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के विपरीत आवंटित किये जाने सम्बंधित परिवाद दिनांक- 02/02/2015 के सम्बन्ध में आप द्वारा आदेशित पृच्छा दिनांक 19/02/2015 का सन्दर्भ ग्रहण करें.

इस सम्बन्ध में वांछित सूचना निम्नवत है-

1. डॉ देवेश चतुर्वेदी के सम्बन्ध में मैंने परिवाद में कहीं यह नहीं कहा था कि उन्होंने मुझे सूचना दी है. सत्यता यह है कि मुझे यह सूचना डॉ चतुर्वेदी से नहीं, अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के ही कतिपय अन्य अधिकारियों द्वारा गोपनीयता की शर्त पर दी गयी थी. हाँ मुझे यह अवश्य बताया गया था कि पूर्व में डॉ चतुर्वेदी ने इस मामले में संस्थान एक निजी संस्था को दिए जाने का पुरजोर विरोध किया था. स्पष्ट है कि डॉ चतुर्वेदी एक वरिष्ठ आईएएस अफसर हैं और मेरे कहने पर कदापि उत्तर प्रदेश लोक आयुक्त तथा उप लोक आयुक्त अधिनियम, 1975 की धारा 9 (2) के तहत शपथपत्र नहीं देंगे. मैंने अपने परिवाद में यह नहीं कहा था कि मैं डॉ चतुर्वेदी का शपथपत्र दूंगी. मैंने परिवाद के बिंदु संख्या 13 पर मात्र यह कहा था कि डॉ देवेश चतुर्वेदी ऐसे अन्य व्यक्ति हैं जिन्हें परिवाद से सम्बंधित तथ्यों के बारे में जानकारी हैं, जिन्हें लोक आयुक्त महोदय आवश्यक समझे जाने पर सम्मन करना चाहें.

मैं पुनः दुहराना चाहूंगी कि मेरी जानकारी के अनुसार डॉ चतुर्वेदी इस प्रकरण में काफी प्रकाश डाल सकते हैं और महोदय द्वारा उन्हें तलब करने पर इस परिवाद के सम्बन्ध में कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं. लेकिन साथ ही यह भी कहना चाहूंगी कि डॉ चतुर्वेदी मेरे कहने पर किसी भी दशा में शपथपत्र नहीं देंगे और न ही मैं उनकी ओर से शपथपत्र दिलाने की स्थिति में हैं और मैंने अपने परिवाद में ऐसा कोई भी दावा नहीं किया था.

2. मैंने अपने परिवाद में कैबिनेट के निर्णय या मुख्यमंत्री के निर्णय की जांच नहीं मांगी है बल्कि जैसा मैंने परिवाद के बिंदु संख्या 9 पर स्पष्ट किया है यह जांच श्री आज़म खान, मंत्री, अल्पसंख्यक कल्याण, उत्तर प्रदेश शासन, लखनऊ सहित उत्तर प्रदेश शासन के अन्य सम्बंधित अधिकारीगण के सम्बन्ध में प्रेषित किया गया है जिन्होंने गलत तरीके से एक राजकीय संपत्ति को नियमों के विपरीत और मा० न्यायालयों के स्पष्ट आदेशों की अवहेलना में एक निजी संस्था को बहुत ही कम मूल्य में दिए जाने की संस्तुति की.

निवेदन करुँगी कि उत्तर प्रदेश लोक आयुक्त तथा उप लोक आयुक्त अधिनियम, 1975 की धारा SECTION 7 के अनुसार- “Matters which may be investigated by Lokayukta or Up-Lokayukta-(1) Subject to the provisions of this Act and on a complaint involving a grievance or an allegation being made in that behalf the Lokayukta may investigate any action which is taken by or with the general or specific approval of – (i) a Minister or a Secretary ; and (ii) any public servant referred to in sub-clause (ii) or sub-clause (iv) of clause (j) of section 2; XXXX”

इसी अधिनियम की धारा 1(g) के अनुसार “Minister” means a member (other than the Chief Minister) of the Council of Minister, by whatever name called, for the State of Uttar Pradesh, that is to say a minister, Minister of State or Deputy Minister.

धारा 1(j) के अनुसार “public servant” denotes a person falling under any of the following descriptions, and includes, subject to the provisions of sub-section (4) of section 8, a person who at any time in the past fell under any of the following descriptions namely- (i) every Minister referred to in clause (g), XX (iii) every officer referred to in clause (h)” तथा धारा 1 (h) के अनुसार “officer” means a person appointed to a public service or post in connection with the affairs of the State of Uttar Pradesh,

अधिनियम की धारा 1 (a) के अनुसार “action”, means action taken by way of decision, recommendation or finding or in any other manner, and includes, failure to act and all other expressions connoting action shall be construed accordingly;

उपरोक्त विधिक प्रावधानों से स्पष्ट है कि-

1.    महोदय द्वारा मंत्री और अधिकारियों के action (कार्यवाही) के सम्बन्ध में लगाए गए grievance or an allegation (शिकायत या अभिकथन) की जांच की जा सकती है
2.    वर्तमान परिवाद एक अभिकथन है
3.    यह अभिकथन श्री आज़म खान (मंत्री) और अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के अफसर (लोक सेवकों) के विरुद्ध है
4.    इस अभिकथन में श्री खान और अन्य विभागीय अफसरों (लोक सेवकों) द्वारा अपने पद का दुरुपयोग कर स्पष्टतया त्रुटिपूर्ण संस्तुति किये जाने की शिकायत है
5.    अधिनियम की धारा 1 (a) के अनुसार कार्यवाही में recommendation or finding (सिफारिश और उपपत्ति) भी आता है और इतना ही नहीं इसमें इन सिफारिश और उपपत्ति के विलोप भी सन्नहित हैं और इनके अलावा in any other manner (किसी अन्य प्रकार से किये गए अनुचित कृत्य) भी सम्मिलत हैं
6.    वर्तमान परिवाद (अभिकथन) में अल्पसंख्यक विभाग द्वारा गलत और त्रुटिपूर्ण संस्तुति और उपपत्ति बेहेज जाने की शिकायत है
7.    परिवाद का मुख्य मुद्दा मत्री और उनके अधीन अधिकारियों द्वारा विधि के विरुद्ध नोटिंग के द्वारा अनुचित सिफारिश करना है
8.    परिवाद में मंत्रिमंडल के निर्णय की जांच की बात नहीं कही गयी है बल्कि अल्पसंख्यक विभाग के अधिकारी और मंत्री श्री आज़म खान के अनुचित कृत्य (त्रुटिपूर्ण संस्तुति) की शिकायत है

उपरोक्त कारणों से मेरे द्वारा प्रस्तुत परिवाद निश्चित रूप से लोकायुक्त अधिनियम में आता है क्योंकि परिवाद का बिंदु अधिकारियों के स्तर पर की गयी सिफारिश और उपपत्ति एवं कर्तव्य का विलोप है, न कि मंत्रिमंडल द्वारा किया गया निर्णय.

मैं महोदय से सहमत हूँ कि यदि इस प्रकरण में मंत्री तथा अधिकारियों के स्तर पर प्रस्तुत अभिकथन सही भी पाया जाता है तो भी मात्र उनके विरुद्ध ही कार्यवाही होगी और मंत्रीमंडल के निर्णय की समीक्षा महोदय के स्तर पर नहीं होगी.

निवेदन करुँगी कि अतः मैं मंत्रिमंडल या मुख्यमंत्री के निर्णय की समीक्षा या जांच की बात नहीं कर रही हूँ वरन अभिकथन में प्रस्तुत तथ्यों (नियम के विरुद्ध सिफारिश, हितों का स्पष्ट टकराव, पूर्व प्रमुख सचिव और कार्यालय की संस्तुति की जानबूझ कर अनदेखी, लगभग मुफ्त में भूमि आवंटित किये जाने की संस्तुति) की जांच का अनुरोध कर रही हूँ, जो निस्संदेह लोकायुक्त अधिनियम की परिधि में आता है.

अंत में मैं पुनः निवेदन करुँगी कि इस प्रकरण में मेरे पास मौजूद तथ्य मैंने प्रस्तुत कर दिए और शेष तथ्य महोदय द्वारा डॉ देवेश चतुर्वेदी तो तलब कर तथा/अथवा सम्बंधित पत्रावलियों के अवलोकन से ही स्पष्ट होगा जिससे साफ़ हो जाएगा कि मंत्रिमंडल के स्तर पर यह त्रुटिपूर्ण और विधिविरुद्ध निर्णय इसी कारण से हो क्योंकि अल्पोसंख्यक विभाग के अधिकारियों के अपने विभागीय मंत्री के दवाब में यह स्पष्टतया दोषपूर्ण संस्तुति कर राज्य सरकार को भारी वित्तीय हानि और क्षति पहुंचाते हुए मंत्री से जुडी निजी संस्था को लाभ पहुँचाने में प्रत्यक्ष मदद की.

मैं यह परिवाद मंत्री श्री आज़म खान और उनके अधीनस्थ अधिकारियों के विरुद्ध समझा जाए न कि मंत्रिमंडल के निर्णय के विरुद्ध क्योंकि मुख्य कार्य और समस्त संस्तुतियां तो विभागीय अधिकारियों और मंत्री के स्तर पर हुईं, मंत्रिमंडल द्वारा तो मात्र इन तथ्यों के आधार पर निर्णय लिया गया.

यही कारण है कि मैंने परिवाद में स्पश्य लिखा भी है कि यह परिवाद श्री आज़म खान और उनके अधीन अल्पसंख्यक विभाग के संबधित अधिकारियों के विरुद्ध है और मैं पुनः यह बात यहाँ दुहरा रही हूँ.

अतः कृपया इस मामले को शीघ्र संज्ञान में लेते हुए जांचोपरांत राज्य की बेशकीमती भूमि और भवन को राज्य सरकार के बड़े पदाधिकारियों द्वारा एक निजी संस्था को देने की प्रक्रिया को निरस्त कराते हुए जांच में दोषी पाए पाए गए सभी अधिकारियों के विरुद्ध नियमानुसार कठोर कार्यवाही करने की कृपा करें.

पत्र संख्या-NT/Complaint/70                               
दिनांक- 26/02/2015
(डॉ नूतन ठाकुर)
5/426, विराम खंड,
गोमती नगर, लखनऊ
# 94155-34525
nutanthakurlko@gmail.com

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आईपीएस अमिताभ ठाकुर पर लगातार निराधार आरोप लगा रहा लखनऊ का कथित सोशल एक्टिविस्ट संजय शर्मा

कंटेंट चोरी के आरोपों से घिरा लखनऊ का एक कथित सोशल एक्टिविस्ट संजय शर्मा लगातार अपने ब्लॉग पर मेरे पति अमिताभ ठाकुर को फ्रॉड, चोर, शातिर, छली, कूट रचना करने वाला और मुझे उनका समर्थन करने वाला बता कर लेख लिख रहा है जिसे अपने फेसबुक पर भी डाल रहा है और व्यक्तिगत आक्षेप वाली अनुचित टिप्पणी लिख रहा हैं. साथ ही वह तमाम मीडिया के साथियों को इनकी प्रतियाँ ईमेल कर रहा है जिस पर कई मीडिया के साथियों ने मुझसे भी स्थिति पूछा.

मैं इस प्रकार के व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप में नहीं उलझना चाह रही थी. लेकिन उनके आरोपों का दूसरी बार जवाब देना इसलिए जरूरी हो गया है क्योंकि उनके आरोप न सिर्फ निराधार बल्कि बे-बुनियाद हैं. छुट्टी लेकर सरकारी गाड़ी इस्तेमाल करने संबंधी आरोपों पर कुछ शब्दों में सही स्थिति बता दूँ.

बात इतनी सी है कि मेरे पति ने 15-04-14, 16-04-14 और 17-04-14 को कैजुवल लीव यानि सीएल लिया क्योंकि हम सुप्रीम कोर्ट जाना चाहते थे. कुछ ऐसा हुआ कि हमारा प्लान कैंसिल हो गया और हम नहीं गए. मेरे पति इस कारण अपनी ड्यूटी पर गए जहां अपने डीजी बृजलाल को इन्फॉर्म कर दिया. उस दिन कैट में भी एक मुकदमे में गए.

इस तरह चूँकि वे इस समय लखनऊ में थे, अतः जाहिर है उन्होंने अपनी गाड़ी का लॉगबुक भरा. इतनी सी बात है जिस पर श्री संजय लगातार अनुचित शब्दावलियों के सहारे कई बातें कह रहे हैं. हमारे पास श्री संजय से उलझने के अलावा कई अन्य काम हैं क्योंकि इसमें समय लगता है, पर चूँकि इस बार कई मीडिया कर्मियों ने मुझसे पूछा था, अतः इतना बताना मैंने अपना फर्ज समझा.

संलग्न- वापस आने पर डीजी को दिए पत्र की प्रति (सबसे उपर देखें)

डॉ नूतन ठाकुर
लखनऊ
# 094155-34525


संजय शर्मा द्वारा लगाए गया आरोप इस प्रकार है….

आरटीआई से उजागर यूपी सिविल डिफेन्स संयुक्त सचिव आईजी आईपीएस अमिताभ ठाकुर द्वारा किया गया छल, कूट रचना और लेखों का मिथ्याकरण. यदि मैं कहूँ कि यूपी के सिविल डिफेन्स के संयुक्त सचिव और आईजी आईपीएस अमिताभ ठाकुर द्वारा सरकार से छल करके कूट रचना द्वारा लेखों का मिथ्याकरण कर व्यक्तिगत लाभ लेने के दुरूद्देश्य से राजकीय कोष को क्षति पंहुचाई गयी है तो क्या आप मानेंगे ? शायद नहीं. पर मेरे द्वारा आरटीआई एक्ट के तहत सिविल डिफेन्स के निदेशालय से प्राप्त दस्तावेज़ों को देखने के बाद आपको मानना ही होगा कि अमिताभ ठाकुर द्वारा सरकार से छल करके कूट रचना द्वारा लेखों का मिथ्याकरण कर व्यक्तिगत लाभ लेने के दुरूद्देश्य से राजकीय कोष को क्षति पंहुचाने का आपराधिक कृत्य किया गया है.

दरअसल मैने दिनांक 26-08-14 को एक आरटीआई दायर कर यूपी के सिविल डिफेन्स के संयुक्त सचिव और आईजी आईपीएस अमिताभ ठाकुर के अवकाश प्रार्थना पत्रों और इनके सरकारी वाहनों की लॉग-बुक की सत्यापित प्रतियाँ माँगी थीं. दिनांक 30-01-15 को सिविल डिफेन्स के निदेशालय के जन सूचना अधिकारी सुरेंद्र सिंह नेगी ने जो सूचना दी है वह स्थापित कर रही है कि अमिताभ ठाकुर द्वारा उत्तर प्रदेश सरकार से छल करके कूट रचना द्वारा सरकारी वाहन की लॉग-बुक के लेखों का मिथ्याकरण कर व्यक्तिगत लाभ लेने के दुरूद्देश्य से राजकीय कोष को क्षति पंहुचाने का आपराधिक कृत्य किया गया है.

सिविल डिफेन्स के निदेशालय के जन सूचना अधिकारी सुरेंद्र सिंह नेगी द्वारा सत्यापित कर दी गयी सूचना से स्पष्ट हो रहा है कि :

1- अमिताभ ठाकुर के अवकाश प्रार्थना पत्र दिनांक 10-04-14 के अनुसार दिनांक 15-04-14, 16-04-14    और 17-04-14 को अमिताभ अवकाश पर थे और उच्च्तम न्यायालय में एक व्यक्तिगत विशेष अनुमति याचिका दायर करने और अन्य व्यक्तिगत कार्यों से भारत की राजधानी नई दिल्ली में थे.

2- अमिताभ ठाकुर के सरकारी वाहन के ड्राइवर हेमचंद और अमिताभ ठाकुर द्वारा हस्ताक्षरित वाहन लॉग-बुक के अनुसार दिनांक 15-04-14, 16-04-14 और 17-04-14 को अमिताभ ने इन तीनों दिनों में अपने आवास से वाहन पर सवार होकर सरकारी वाहन का सरकारी कार्य से उपयोग किया और इन तिथियों में यह सरकारी गाड़ी क्रमशः 76 किलोमीटर, 56 किलोमीटर और 61 किलोमीटर चली जबकि इन तिथियों में अमिताभ अवकाश पर थे और उच्च्तम न्यायालय में एक व्यक्तिगत विशेष अनुमति याचिका दायर करने और अन्य व्यक्तिगत कार्यों से लखनऊ से 500 किलोमीटर से भी अधिक दूर भारत की राजधानी नई दिल्ली में थे.

यह तो आप भी मानेंगे कि अवकाश पर लखनऊ से 500 किलोमीटर से भी अधिक दूर भारत  की राजधानी नई दिल्ली में बैठा आदमी किसी भी तरह इन तीनों दिनों में अपने आवास से वाहन पर सवार होकर सरकारी वाहन का सरकारी कार्य से उपयोग नहीं कर सकता है और यह अभिलेख स्वतः ही  स्थापित कर रहा है कि अमिताभ ठाकुर द्वारा उत्तर प्रदेश सरकार से छल करके कूट रचना द्वारा
सरकारी वाहन की लॉग-बुक के लेखों का मिथ्याकरण कर व्यक्तिगत लाभ लेने के दुरूद्देश्य से राजकीय कोष को क्षति पंहुचाने का आपराधिक कृत्य किया गया है.

यह खुलासे से वह कहावत एक बार फिर चरितार्थ हो रही है जो कहती है “चोर चोरी से जाए, हेराफेरी से नहीं.” और यह भी कि “चोर कितना भी शातिर को कुछ सुराग तो छोड़ ही जाता है”.

बड़ा सबाल यह भी है कि एक  दूसरे को क़ानूनी नोटिस-जबाब भेजकर अख़बारों की सुर्खियाँ बटोरने बाली सामाजिक रूप से सक्रिय  ठाकुर दंपत्ति के  एक सदस्य अमिताभ ठाकुर के विरुद्ध सिद्ध हो रहे इस अपराध के लिए अमिताभ ठाकुर की पत्नी पत्रकार, वकील और आरटीआई एक्टिविस्ट नूतन ठाकुर अमिताभ को सज़ा दिलाने को आगे आएँगी या आपराधिक कृत्य के  इस मामले में अमिताभ का ही साथ देंगीं.

Sanjay Sharma
سنجے شرما
संजय शर्मा
( Founder & Chairman)
Transparency, Accountability & Human Rights Initiative for Revolution
( TAHRIR )
101, Narain Tower,F Block, Rajajipuram
Lucknow, Uttar Pradesh-226017
Mobile : 9369613513


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लखनऊ का सामाजिक कार्यकर्ता संजय शर्मा कंटेंट चोर है!

 

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यूपी पुलिस के सीओ आशुतोष मिश्रा की कारस्तानी : पिच्चू मिश्रा की जगह धर्मेंद्र तिवारी को छह साल जेल कटवा दिया

04 सितम्बर 2009 को क़स्बा अनंतराम, थाना अजीतमल, जिला औरैया में महेंद्र कुमार की हत्या हुई जिसमे अनिल कुमार त्रिपाठी नामजद हुए और पिच्चू मिश्रा आरोपों के घेरे में आये. विवेचना के दौरान विवेचक सीओ अजीतमल आशुतोष मिश्रा ने जबरदस्ती पिच्चू मिश्रा की जगह धर्मेन्द्र कुमार तिवारी पुत्र चंद्रशेखर को पुच्ची मिश्रा बताते हुए 11 सितम्बर 2006 को गिरफ्तार कर इटावा जेल भेज दिया जबकि वे जानते थे कि यह पिच्चू मिश्रा नहीं है.

धर्मेन्द्र तिवारी के खिलाफ आरोप पत्र भी लग गया और वे छह साल से ऊपर जेल में रहे. वे 07 अक्टूबर 2012 को तब छूटे जब अपर सत्र न्यायाधीश, औरैया ने 06 अक्टूबर के अपने आदेश में यह स्पष्ट कर दिया कि वह पुच्ची मिश्रा नहीं, धर्मेन्द्र तिवारी हैं. जज ने तमाम बैनामे, परिवार रजिस्टर, रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट, ड्राइविंग लाइसेंस, मतदाता पहचान पत्र, राशन कार्ड जैसे ताम साक्ष्य को देखने के बाद यह आदेश दिया था.

जेल जाने के पहले धर्मेन्द्र तिवारी के पास 10 पहिये के दो ट्रक थे और 30-40 हज़ार प्रति माह की अच्छी आमदनी थी पर इस दौरान उनका पूरा कारोबार ख़त्म हो गया और आज वे पैसे-पैसे के मोहताज हैं. उनका घर गिर गया है और 11 साल का बच्चा मात्र तीसरे क्लास में है.

अब आईपीएस अमिताभ ठाकुर और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर ने उनकी लड़ाई को उठाते हुए इस पूरे प्रकरण को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को भेजा है और कोर्ट के आदेश के आधार पर श्री धर्मेन्द्र को पुलिस द्वारा फर्जी फंसाए जाने के सम्बन्ध में कम से कम पांच करोड़ मुआवजा और दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्यवाही की मांग की है.

Spent 6 years in jail on police action, 5 crore compensation sought  

One Mahendra Kumar was murdered on 04 September 2009in Anantram, police station Ajitmal, district Auraiya in which Anil Kumar Tripathi was named accused and Picchu Mishra’s name came in light. During investigation, then CO Ajitmal Ashutosh Mishra arrested Dharmendra Kumar Tiwari son of Chandrashekhar calling him Picchu Mishra on 10 September 2006, while definitely knowing that he is not Picchu, who was sent to Etawah jail.

Later Chargesheet was submitted against Picchu Mishra, with Dharmendra remaining in jail and facing trial for more than 6 years. He was released from jail on 07 October 2012 only after orders of ADJ Auraiya dated 06 October which clearly stated that this man was Dharmendra Tiwari and not Picchu Mishra. The Judge based his order on several sale deeds, family register, vehicle registration certificate, driving licence, voter identity card, ration card and such other fundamental documents.

Before going to jail Dharmendra Tiwari had two 10-tyre trucks and his monthly income was Rs. 30-40,000. During this period, his income evaporated, his house got dilapidated and today his 11 year son is studying only in class 3.

Now IPS officer Amitabh Thakur and social activist Dr Nutan Thakur have taken up his cause, writing to National Human Rights Commission, to order a compensation of Rs. 5 crores for Sri Dharmendra and appropriate legal action and delinquent police officers.

Dear Amitabh Thakur,

The Commission has recieved your complaint and it has assigned diary number as 1519251

with the following details:-

Victim
Dharmendra Kumar Mishra
Address
s/o Late Chandrashekhar Tiwari, r/o Mandir Mahewa, ps Bakewar, district- Etawah
Incident dated
01/01/1900
Incident Type
ILLEGAL ARREST
Incident Place
Auria
AURIA , UTTAR PRADESH

NHRC, New Delhi, INDIA.

मूल पत्र….   

सेवा में,
मा० अध्यक्ष महोदय,
मा० राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग,
नयी दिल्ली

विषय- श्री धर्मेन्द्र कुमार तिवारी पुत्र स्व० चंद्रशेखर तिवारी निवासी मंदिर महेवा, थाना बकेवर, जनपद इटावा के साथ हुए घोर मानवाधिकार उल्लंघन में उन्हें समुचित मुआवजा देने और दोषी पुलिसकर्मियों को दण्डित करने विषयक  

महोदय,
हम आपके समक्ष एक ऐसा प्रकरण प्रस्तुत कर रहे हैं जिसमे हमें प्राप्त अभिलेखों और हमें बताये तथ्यों के अनुसार एक व्यक्ति को पुलिस अफसरों द्वारा जानबूझ कर दूसरा व्यक्ति दिखा कर हत्या जैसे गंभीर मामले में जेल भेज दिया गया और उसके खिलाफ आरोप पत्र भी प्रेषित कर दिया गया जिसका नतीजा यह रहा कि वह पूर्णतया निर्दोष व्यक्ति पुलिस अफसरों के जानने-समझने के बाद भी छः वर्ष से अधिक अवधि के लिए जेल में निरुद्ध रहा जिस दौरान उसका पूरा कारोबार नष्ट हो गया, उसकी बीवी और बच्चे सड़क पर आ गए और उस समय लाखों का वह आदमी आज पैसे-पैसे को मोहताज है.

यह व्यक्ति तब जेल से छूट पाया जब सत्र न्यायलय के सामने यह पूरी तरह साबित और स्थापित हो गया कि वह मुकदमे में प्रकाश में आया व्यक्ति नहीं है बल्कि एक दूसरा पूरी तरह अनजान आदमी है जिससे उस मुकदमे का दूर-दूर तक कोई भी वास्ता नहीं था बल्कि जिसे मात्र कुछ पुलिस अफसरों की व्यक्तिगत लालच ने जेल तक पहुंचा दिया था.

उपरोक्त अभिलेख और तथ्यों के आधार पर हमारी दृष्टि में यदि मा० आयोग ने इस मामले में संज्ञान लेकर इस पीड़ित व्यक्ति को मुआवजा दिलाने और दोषी पुलिसकर्मियों को दण्डित किये जाने का कार्य नहीं किया तो यह न्याय की दृष्टि से निश्चित रूप से घातक होगा.

प्रकरण यह है कि दिनांक 04/09/2005 को क़स्बा अनंतराम, थाना अजीतमल, जिला औरैया में श्री महेंद्र कुमार पुत्र श्री आशाराम निवासी रूपसाहब मुदैना, थाना अजीतमल, जनपद औरैया की हत्या हुई जिसके सम्बन्ध में मु०अ०स० 235/2005 धारा 302, 307, 504 आईपीसी तथा 3(2)(5) एससी एसटी एक्ट का मुक़दमा थाना अजीतमल पर श्री आशाराम द्वारा पंजीकृत कराया गया. इसमे श्री अनिल कुमार त्रिपाठी पुत्र श्री रामस्वरुप नामजद हुए. विवेचक सीओ अजीतमल श्री अजय प्रताप सिंह द्वारा प्रारंभ की गयी जिसमे लगातार कई विवेचक बदले और श्री वंशराज सिंह यादव, सीओ अजीतमल इसके विवेचक हुए.

श्री वंशराज ने वादी श्री आशाराम के बयान दिनांक 03/10/2005 (विवेचना का परचा संख्या VI) के आधार पर तीन अज्ञात व्यक्तियों के नाम प्रकाश में लाये- श्री पुच्ची मिश्रा पुत्र श्री चंद्रशेखर निवासी बम्हौरा,  थाना बकेवर, इटावा, श्री बृजेश मिश्रा पुत्र श्री बीर मिश्र निवासी निवासी बम्हौरा, थाना बकेवर, इटावा तथा श्री राजीव पुत्र श्री बदन निवासी बहेड़ा थाना बकेवर, इटावा.

इसके बाद श्री आशुतोष मिश्रा, सीओ अजीतमल ने दिनांक 01/11/2005 को इसकी विवेचना ग्रहण की. दिनांक 20/12/2005 को उपरोक्त चारों (श्री अनिल कुमार त्रिपाठी, श्री बृजेश मिश्रा, श्री राजीव चौधरी और श्री पुच्ची मिश्रा) के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया.
इस समय तक श्री धर्मेन्द्र तिवारी कहीं प्रकाश में नहीं थे और उनसे इस मामले का कोई साबका नहीं पड़ा था. श्री धर्मेन्द्र तिवारी के अनुसार उनको पहली बार इस मामले की जानकारी दिनांक 10/09/2006 को रात करीब दस बजे उस समय हुई जब ये अपने घर मंदिर महेवा, थाना बकेवर के बाहर खड़े थे. उसी समय अचानक पुलिस की जीप आई और श्री धर्मेन्द्र को पकड़ कर थाने ले गयी. घर पर पकड़ने के पहले कोई बात नहीं बताई. जीप में कहा कि थाने चलिए, आपके खिलाफ वारंट है. अजीतमल थाने पर पुलिसवालों ने बताया कि श्री पुच्ची मिश्रा पुत्र श्री चंद्रशेखर निवासी बम्हौरा के नाम से वारंट है, उसकी जगह आपको हाज़िर होना पड़ेगा. श्री धर्मेन्द्र ने इसका प्रतिवाद किया. उस समय तक उनके भाई श्री जीतेन्द्र तिवारी भी थाने आ गए थे. उन्होंने भी इसका प्रतिवाद किया तो पुलिसवालों ने उनको भी थाने पर बैठा लिया. कहा कि इसे थाने पर हाज़िर होना पड़ेगा नहीं तो श्री जीतेन्द्र को भी झूठा केस लगा कर बंद कर देंगे.

श्री धर्मेन्द्र का कहना है कि कोई विकल्प नहीं होने पर दोनों भाई थाने पर चुपचाप बैठे रहे. सुबह श्री धर्मेन्द्र को थाने की जीप पर बैठा पर औरैया कोर्ट ले गए और श्री पुच्ची मिश्रा दर्शा कर मा० न्यायालय में हाज़िर करा दिया. श्री धर्मेन्द्र ने मा० सीजेएम, औरैया से कहा कि वे पुच्ची मिश्रा नहीं हैं धर्मेन्द्र कुमार तिवारी हैं लेकिन उनकी बात नहीं सुनी गयी और श्री धर्मेन्द्र को जेल भेज दिया गया.

अभिलेखों के अनुसार पुलिस की यह कार्यवाही श्री आशुतोष मिश्रा, सीओ अजीतमल के कार्यकाल में उनके निर्देशों और आदेशों पर हुई. इसके बाद श्री धर्मेन्द्र इटावा जेल भेज दिए गए. श्री आशुतोष मिश्रा, सीओ ने एससीडी पर्चे (केस डायरी) में कहीं भी श्री धर्मेन्द्र को कहीं से भी गिरफ्तार करना नहीं दिखाया बल्कि केस डायरी में लिखा कि श्री पुच्ची मिश्र मा० न्यायालय में हाज़िर हुए और उनका बयान लिया जा रहा है जबकि श्री धर्मेन्द्र के अनुसार वास्तविकता यह थी कि उन्हें पिछली रात उनके घर से अजीतमल थाने की पुलिस उठा कर ले आई थी. श्री आशुतोष मिश्रा ने दिनांक 11/09/2006 के केस डायरी में लिखा कि पुच्ची मिश्र से अपराध के बारे में पूछा गया तो पुच्ची मिश्र ने कहा कि वे अपनी बात न्यायालय के समक्ष रखेंगे.

इस प्रकार तथ्य बताते हैं कि श्री आशुतोष मिश्र ने श्री पुच्ची मिश्र का जो नाम दिनांक 03/10/2005 को श्री वंशराज यादव के विवेचना के समय श्री आशाराम के बयान में आया था, उसे दिनांक 10/09/2006 को मनमर्जी श्री पुच्ची की जगह श्री धर्मेन्द्र को स्वतः ही श्री पुच्ची बना दिया गया और उन्हें स्थानीय पुलिस किए द्वारा गिरफ्तार करा कर मा० न्यायालय में पेश कर जेल भिजवा दिया गया. श्री धर्मेन्द्र को आज तक यह नहीं पता कि विवेचक श्री आशुतोष ने ऐसा क्यों किया और ऐसा करने के पीछे उनका क्या मकसद था या क्या मजबूरी थी पर श्री धर्मेन्द्र को इतना अवश्य ज्ञात है कि उन्हें श्री पुच्ची के स्थान पर पकड़ कर मा० न्यायालय लाया गया और उसके बाद वे जेल भी भेज दिए गए.

श्री आशुतोष ने दिनांक 16/09/2006 को इस मामले में श्री पुच्ची के नाम पर जेल में निरुद्ध श्री धर्मेन्द्र सहित सभी अभियुक्तगण के खिलाफ आरोपपत्र मा० न्यायालय में प्रस्तुत कर दिया और इसके बाद नतीजा यह रहा कि श्री धर्मेन्द्र छः साल तक बिना किसी कारण, बिना किसी दोष के जेल में सड़ते रहे और इस बीच उनका परिवार, उनका कारोबार और वे स्वयं पूरी तरह बर्बाद होते गए. इसके बाद ट्रायल के समय श्री धर्मेन्द्र बार-बार मा० न्यायालय आते रहे और उनकी पुकार भी धर्मेन्द्र तिवारी के रूप में होती रही और मा० न्यायालय के आर्डर शीट पर भी वे श्री धर्मेन्द्र कुमार तिवारी के नाम से ही हस्ताक्षर करते थे. इस प्रकार मा० न्यायाधीश सहित सभी अधिवक्तागण और पुलिस वाले यह जानते थे कि यह व्यक्ति श्री पुच्ची नहीं बल्कि श्री धर्मेन्द्र हैं पर इसके बाद भी उन्हें श्री पुच्ची के रूप में जेल में रहना पड़ा और दर्जनों बार मा० न्यायालय में सबों की जानकारी के बाद भी श्री पुच्ची के रूप में आना पड़ा.

इस मामले में सपूर्ण सत्यता तब सामने आई जब मा० न्यायालय अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश अ0एक्स कैडर, ।। औरैया श्री के पी सिंह, एचजेएस द्वारा सत्र परीक्षण सं0-155/2006 में दिनांक 06/10/2012 को आदेश पारित किया गया. मा० न्यायालय के आदेश ने दूध का दूध पानी का पानी कर दिया. मा० न्यायालय के आदेश ने यह पूरी तरह स्थापित और सिद्ध कर दिया कि जो व्यक्ति पिछले छः साल से जेल में निरुद्ध था वह श्री पिच्चु मिश्रा नहीं बल्कि श्री धर्मेन्द्र कुमार तिवारी है. उदहारण के लिए मा० न्यायलय ने अपने आदेश के पृष्ठ 24 के तीसरे प्रस्तर में कहा- “यहीं पर अब प्रश्न यह उठता है कि जो अभियुक्त पुच्ची मिश्रा के नाम से प्रकरण में परीक्षित हो रहा है क्या वह धर्मेन्द्र तिवारी है या पुच्ची मिश्रा है। बचाव पक्ष की ओर से जो भी साक्ष्य प्रस्तुत किये गये हैं उन साक्ष्यों के आधार पर यह साबित है कि अभियुक्त धर्मेन्द्र तिवारी है न कि पुच्ची मिश्रा है। अपने को धर्मेन्द्र तिवारी होने के तमाम दस्तावेजीय साक्ष्य उसके द्वारा प्रस्तुत भी किया गया है.”

आदेश के पृष्ठ 25 से लगायत पृष्ठ 27 तक कई ऐसे अभिलेखों और गवाहों का उल्लेख किया गया है जो निर्विवादित रूप से स्थापित कर देते हैं कि निरुद्ध व्यक्ति श्री पुच्ची नहीं श्री धर्मेन्द्र थे. उदहारण के लिए मा० न्यायालय ने कहा-“बचाव पक्ष (अभियुक्त पुच्ची मिश्रा) द्वारा अपने को धर्मेन्द्र तिवारी होने के निम्नलिखित दस्तावेजीय साक्ष्य प्रस्तुत किये हैं जिससे उसका नाम पुच्ची मिश्रा नहीं है बल्कि धर्मेन्द्र तिवारी लिखा है। परिवार रजिस्टर प्रदर्श ख-1 को डी0डब्लू0-2 केशव सिंह ने साबित किया है जिसमें परिवार की मुखिया बैकुण्ठी देवी दर्ज है। परिवार रजिस्टर के पेज संख्या-120 से लेकर 121 पर क्रम संख्या-416 पर बैकुण्ठी देवी व उनके बाद प्रेमादेवी, जितेन्द्र कुमार, सुषमा देवी, धर्मेन्द्र कुमार पुत्र चन्द्रशेखर, सागर पुत्र धर्मेन्द्र कुमार आदि दर्ज है। चन्द्रशेखर के दो लड़के धर्मेन्द्र कुमार व जितेन्द्र कुमार लिखा है। धर्मेन्द्र का उर्फियत में कोई नाम नहीं लिखा है। पुच्ची मिश्रा भी उर्फियत में दर्ज नहीं है। धर्मेन्द्र की पत्नी का उर्फियत में नाम रश्मि दर्ज है। डी0डब्लू0-2 ने यह भी कहा है कि उर्फियत में नाम यदि पुच्ची मिश्रा होता तो अवश्य दर्ज होता। गवाह ने आगे यह भी कहा है कि दौरान पड़ताल मैंने बैकुण्ठी देवी के परिवार के पुरूष सदस्यों के बारे में धर्मेन्द्र व जितेन्द्र के बारे में जानकारी की तो पता चला कि ये ब्राहम्ण जाति के त्रिपाठी लिखते हैं। मिश्रा लिखने की कोई जानकारी नहीं मिली। प्रदर्श ख-1 को अपने हस्तलेख, हस्ताक्षर में बैकुण्ठी देवी के परिवार रजिस्टर को जारी करना साबित किया है। इस परिवार रजिस्टर से भी धर्मेन्द्र का पुच्ची मिश्रा साबित होना नहीं पाया जाता। इसी प्रकार डी0डब्लू0-1 दिवाकर पाण्डेय ग्राम प्रधान, ग्राम पंचायत महेवा थाना बकेबर जिला इटावा ने भी अपनी शहादत में कहा है कि बैकुण्ठी देवी के चन्द्रशेखर लड़के थे जिनके दो लड़के जितेन्द्र व धर्मेन्द्र हैं। हाजिर अदालत अभियुक्त धर्मेन्द्र को पहचानता है। 10-15 दिन वर्ष पूर्व बृजेश मिश्रा का परिवार रहता था, उनके दो लड़के पुच्ची मिश्रा व गुड्डू मिश्रा थे। पुच्ची 12-13 साल का तथा गुड्डू 2-3 वर्ष का रहा होगा। हाजिर अदालत अभियुक्त धर्मेन्द्र तिवारी का नाम पुच्ची मिश्रा नहीं रहा न उन्हें पुच्ची मिश्रा कह कहर पुकारा जाता है। धर्मेन्द्र तिवारी व जितेन्द्र तिवारी का कोई उपनाम भी नहीं है। धर्मेन्द्र के पास ट्रक का व्यापार करते हैं। ग्राम प्रधान होने के नाते उनके व उनके परिवार के बारे में जानता हूं। डी0 डब्लू0-3 अतिबल सिंह रजिस्ट्रार कानूनगो ने भी भारत निर्वाचन आयेाग द्वारा जारी पहचाना पत्र (निर्वाचन कार्ड) नं0-यू0पी0/66/303/402113 प्रदर्श ख-4 एवं एस0डी0ए0म भर्थना द्वारा धर्मेन्द्र कुमार पुत्र चन्द्रशेखर के नाम दिनांक 01.05.1995 को जारी होना साबित किया है। इसी प्रकार डी0डब्लू-4 लाखन सिंह, वरिष्ठ लिपिक, ए0आर0टी0ओ0 कार्यालय इटावा ने भी एल0एम0वी0 लाइसेंस नंबर-44445 प्रदर्श ख-3 व धर्मेन्द्र कुमार पुत्र चन्द्रशेखर निवासी महेवा मन्दिर के नाम दिनांक 14.07.2000 को जारी होना साबित किया व उस पर धर्मेन्द्र कुमार की फोटो लगी होना भी साबित किया है। लाइसेन्स का नवीनीकरण दिनांक 09.05.06 से दिनांक 08.05.09 तक किया जाना व पुनः फोटो धर्मेन्द्र की लगवाना साबित किया है। नवीनीकरण पर तत्कालीन ए0आ0टी0ओ0 श्रीमती रचना यद्वंशी के हस्ताक्षर भी साबित किया। यह भी कहा कि धर्मेन्द्र कुमार की नई फोटो मिलाकर नवीनीकरण किये थे। इसी गवाह द्वारा लाइसेन्स बुक में लगी फोटो को हाजिर अदालत अभियुक्त की फोटो होना तथा गाड़ी पंजीयन रजि0 में गाड़ी नम्बर-यू0पी0 75एफ/8641 का पंजीकरण धर्मेन्द्र कुमार पुत्र चन्द्रशेखर निवासी महेवा मन्दिर तहसील भर्थना जिला इटावा के नाम होना आर0सी0 फार्म नंबर-23 में पंजीकृत स्वामी धर्मेन्द्र कुमार पुत्र चन्द्रशेखर व आर0सी0 प्रदर्श ख-5 उक्त ट्रक का मालिक धर्मेन्द्र कुमार पुत्र चन्द्रशेखर का होना पंजीयन रजिस्टर प्रदर्श ख-6 पर ट्रक का मालिक धर्मेन्द्र कुमार पुत्र चन्द्रशेख का नाम होना साबित यिा है। इसी प्रकार डी डब्लू0-5 मनोज कुमार अस्थाना निबन्धक लिपिक ने भूमिंख्या-354/2 में से 17 डिस0 का विक्रयनामा /24 भाग क अखिलेश कुमार के पक्ष में दिनांक 01.11.199 तहरीर किया जाना व बैनामे के दस्तावेज पर धर्मेन्द्र कुमार व जितेन्द्र कुमार पुत्रगण चन्द्रशेखर मूल निवासी टकरूपुरा की फोटो लगा होना साबित किया है। फोटो पर जिेन्द्र कुमार व धर्मेन्द्र कुमार के नाम अंकित होना कहा है। का0 सं0-100 ख/10 दस्तावेज की सतय प्रतिलिपि प्रदर्श ख-7 को साबित किया है। दस्तावेज में लगी फोटो धर्मेन्द्र कुमार वाला व्यक्ति आज न्यायालय में मेरे समक्ष उपस्थित है कहा है। गवाह ने दस्तावेज में लगी फोटो धर्मेन्द्र कुमार वाला व्यक्ति न्यायालय में मेरे समक्ष उपस्थित है, का कथन किया। गवाह ने दस्तावेज में लगी फोटो को देख कर अदालत में मौजूद अभियुक्त जो कस्टडी में जेल में लाया गया है, की धर्मेन्द्र कुमार के नाम पर पहचान की ओैर कहा कि मेरे दस्तावेज में धर्मेन्द्र कुमार की फोटो मुल्जिम धर्मेन्द्र से मेल खाती है। इसी प्रकार डी0डब्लू0-6 बाल भ्यासी जिसे अभियोजन के अनुसार घटना स्थल पर वरवक्त घटना मौजूद होना कहा जाता है, ने बयान में पुच्ची मिश्रा निवासी मोहल्ला नरायनपुर जिला औरैया द्वारा गोली चलाना कहा है। धर्मेन्द्र को भी जानता है, कहा है। हाजिर अदालत अभियुक्त की पहचान धर्मेन्द्र तिवारी के रूप में किया और प्रकरण में गोली चलाने वाले व्यक्ति को पुच्ची मिश्रा बताया जिसकी कद काठी धर्मेन्द तिवारी से भिन्न बताया।“

मा० न्यायालय ने स्पष्ट कहा- “जो कार्य अभियोजन द्वारा कार्यवाही शिनाख्त कराना चाहिये था उस कार्य का निर्वहन बचाव पक्ष की ओर से किया गया है, उसकी ओर से तमाम सबूत पेश किये गये हैं जो यह साबित करते ही नहीं बल्कि उससे स्पष्ट रूप से निर्विवाद रूप से यही साबित होता है कि प्रकरण में विचारित तथा कथित पुच्ची मिश्रा, धर्मेन्द्र तिवारी है। यही अभियोजन के चक्षुदर्शी साक्षी बाल भ्यासी जो डी0डब्लू-6 के रूपमें बचाव पक्ष ने परीक्षित कराया है, उसके साक्ष्य से भी साबित होता है।“

मा० न्यायलय ने कहा- “जब इस तथ्य का साक्ष्य अभियोजन ने प्रस्तुत किया है कि पुच्ची मिश्रा ने गोली चलायी थी तब अभियुक्त धर्मेन्द तिवारी नहीं पुच्ची मिश्रा ही है यह साबित करने का भार अभियोजन पर था जबकि अभियोजन के इस दायित्व को बचाव पक्ष द्वारा निर्वहन करते हुए साबित किया गया है कि अदालत में जिसका विचारण हो रहा है व व्यक्ति पुच्ची मिश्रा नहीं धर्मेन्द तिवारी है। धर्मेन्द तिवारी होने का तमाम दस्तावेजी साक्ष्य भी उसकी ओर से दाखिल करके साबित भी किया गया है।“

मा० न्यायलय के उपरोक्त समस्त टिप्पणी इस बात को निर्विवादित रूप से स्थापित करते हैं कि जेल में निरुद्ध व्यक्ति श्री पुच्ची नहीं बल्कि उनके नाम पर श्री धर्मेन्द्र थे. मा० आयोग के समक्ष प्रस्तुत इस वाद/शिकायत का मूल आधार भी मा० अपर जिला एवं सत्र न्यायालय, आर एक्स कैडर-II, औरैया का आदेश दिनांक 06/10/2012 है. उपरोक्त आदेश के आधार पर मा० न्यायलय द्वारा निकले गए निष्कर्ष की पृष्ठभूमि में यह स्पष्ट होता है कि एक व्यक्ति पुलिस की गलती (जानबूझ कर अथवा अनजाने) के कारण ही छः वर्ष तक प्रताड़ित हुआ, लगातार जेल में रहा, उसकी पत्नी और बेटा सड़क पर आ गए और उसका पूरा व्यवसाय चौपट हो गया.

श्री धर्मेन्द्र के अनुसार जिस समय वे गिरफ्तार किये गए थे उस समय उनकी उम्र 28-29 वर्ष की थी. वे एकदम युवा थे और उनके अनंत संभावनाएं थीं. उनके मन में काफी कुछ करने की तमन्ना और जज्बा था.उन्होंने हाल में दो नयी गाड़ियां दस पहिया ट्रक ख़रीदा था. उन्होंने महेवा कसबे का जिला पंचायत से तहबाजारी का ठेका भी 3.66 लाख रुपये में लिया था जिससे उन्हें लगभग 6-7 लाख रुपये साल की आमदनी की उम्मीद थी. वे हर माह लगभग 35-40 हज़ार रुपये कमा ले रहे थे. उस समय उनके एक ट्रक की कीमत 14 लाख रुपये थी जिसकी आज के समय कीमत पच्चीस लाख रुपये के आसपास होगी. इस तरह एक युवा आदमी, जिसकी युवा पत्नी और ढाई साल का बच्चा था,  उसे पुलिस ने दूसरा आदमी, जिससे उनका दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं था और न ही कोई लेना-देना था, बना कर उसके घर से फर्जी पकड़ कर हत्या का मुलजिम बना दिया और इसके साथ ही उसका सब कुछ बर्बाद हो गया. श्री धर्मेन्द्र, उसकी पत्नी और बच्चे का तीन लाख का बीमा जस का तस पड़ा रह गया क्योंकि घर में खाने के लाले पड़ गए थे, बीमा कौन जमा करता. आज श्री धर्मेन्द्र का बेटा ग्यारह साल का हो गया है पर पिता के गाइडेंस के बिना वह कक्षा तीन में पढने को मजबूर है. पत्नी भी इस हादसे से पूरी तरह से टूट चुकी है. इस बीच श्री धर्मेन्द्र का महेवा स्थित घर भी गिर गया, पूरा खंडहर हो गया, उसे बनाने वाला कोई नहीं था. आज श्री धर्मेन्द्र के बच्चे उसके कानपुर स्थित भाई श्री जितेन्द्र के घर में रहने को मजबूर हैं जबकि स्वयं श्री धर्मेन्द्र भाई श्री जितेन्द्र के महेवा स्थित घर में रहते हैं और वे स्वयं भी अर्ध-विक्षिप्त अवस्था में न्याय के लिए यहाँ-वहां भटक रहे हैं. इसी दौरान उन्हें कुछ लोगों ने हमारे बारे में भी बताया तो वे यहाँ चल कर आये हैं.

ऊपर लिखी सभी बातों के बाद हमारी दृष्टि में यह मा० आयोग का कर्तव्य हो जाता है कि श्री धर्मेन्द्र और उनके परिवार के साथ पूर्ण न्याय किया जाए. हमारी दृष्टि में इसके कम से कम दो अनिवार्य अंग होने चाहिए-

1. श्री धर्मेन्द्र को पुलिस के गलत कार्यों के कारण होने वाले समस्त कठिनाईयों, परेशानियों, अन्याय, कारावास आदि और उनके परिवार के साथ घटित समस्त दुर्व्यवस्थाओं और दुर्दशा के लिए उन्हें राज्य की ओर समुचित मुआवजा प्रदान किया जाए. जहां तक हम समझ पा रहे हैं और जहां तक उपरोक्त तथ्य इंगित कर रहे हैं, यह मुआवजा कम से कम पांच करोड़ रुपये होना चाहिए

2. श्री धर्मेन्द्र की इस दुर्दशा के लिए जिम्मेदार समस्त पुलिसकर्मियों के विरुद्ध समस्त आवश्यक विधिक और प्रशासनिक कार्यवाही की जाए

हमें विश्वास है कि मा० न्यायालय के उपरोक्त आदेश के आलोक में मा० आयोग इस प्रकरण की गंभीरता को समझते हुए इसमें तत्परता के साथ सम्पूर्ण न्याय करेगा क्योंकि यह मामला मानवाधिकार उल्लंघन का एक अत्यंत ज्वलंत प्रकरण दिख पड़ता है.

पत्र संख्या-AT/Complaint/86/15                                  
दिनांक- 27/02/2015

डॉ नूतन ठाकुर
अमिताभ ठाकुर)
5/426, विराम खंड,
गोमती नगर, लखनऊ
94155-34526
amitabhthakurlko@gmail.com

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हाई कोर्ट का आदेश- सहारा क्यू शॉप के खिलाफ शिकायत की सेबी जांच करे

चिटफंडियों के खिलाफ देश में चल रहे अभियान में एक बड़ी सफलता उस वक्त मिली जब इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने भारतीय प्रतिभूति एवं विनियम बोर्ड (सेबी) को आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर द्वारा सहारा क्यू शॉप अग्रिम तथा बॉण्ड जारी किये जाने के सम्बन्ध में दी गयी शिकायत की जांच के आदेश दिए हैं. Continue reading

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Yadav Singh Enquiry Commission : No paraphernalia yet, witnesses to wait

The one man Justice A N Verma enquiry commission, formed in Yadav Singh case, is presently not in a position to begin its work. Social activist Dr Nutan Thakur, who has filed a PIL in this matter, today contacted Justice Verma to get her statement recorded before the Commission, but she was told to wait because he has not got anything other than the notification.

Justice Verma told that he has not even got his charter of duty, nor has he been provided any paraphernalia or necessary infrastructure to carry forth his work. No one from the State government has contacted him in this regards. Justice Verma told Dr Thakur that she can witness before the Commission once it has got its charter of duty along with necessary infrastructure.

यादव सिंह जांच आयोग : अभी संसाधन नहीं, बयान में समय

यादव सिंह मामले में गठित एक-सदस्यीय जस्टिस ए एन वर्मा जांच समिति अभी अपना काम शुरू करने की स्थिति में नहीं है. इस मामले में पीआईएल करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर ने आज कमीशन के सामने अपना अभिकथन दर्ज कराने हेतु जस्टिस वर्मा से संपर्क किया तो उन्होंने साफ़ कहा कि अभी उन्हें मात्र अधिसूचना की प्रति मिली है.

जस्टिस वर्मा ने बताया कि अभी उन्हें अपना चार्टर भी नहीं मिला है जिससे उन्हें यह स्पष्ट नहीं है कि उनकी कमीशन का कार्यक्षेत्र क्या रहेगा. साथ ही उन्हें इस कार्य हेतु अभी कोई भी आवश्यक सुविधा या संसाधन उपलब्ध नहीं कराये गए हैं और न ही सरकार की ओर से किसी ने उनसे संपर्क कर इसके विषय में कुछ बताया है. जस्टिस वर्मा ने डॉ ठाकुर से कहा कि जब कमीशन को आवश्यक संसाधन और चार्टर प्राप्त हो जाएगा उसके बाद ही वे कमीशन के सामने अपना अभिकथन दर्ज करा सकती हैं.

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Yadav Singh PIL : State govt seeks more time, HC fixes 23 Feb

The UP government today sought more time to file its counter affidavit in the PIL filed by social activist Dr Nutan Thakur before Allahabad High Court in Yadav Singh case. Advocate General Vijay Bahadur Singh, personally present in the Court, requested for granting any date in first week of March which was objected by petitioner Dr Thakur as being far away. Hearing both the parties, the bench consisting of Justice S S Chauhan and Justice Rituraj Awasthi fixed 23 February as the next date of hearing.

 

यादव सिंह पीआईएल: सरकार ने माँगा समय, 23 तारीख को अगली सुनवाई

यादव सिंह मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट में सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर द्वारा दायर पीआईएल में आज उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रतिशपथपत्र दायर करने हेतु अतिरिक्त समय की मांग की. सरकार की ओर से स्वयं महाधिवक्ता विजय बहादुर सिंह ने कोर्ट से अतिरिक्त समय का निवेदन कर मार्च के प्रथम सप्ताह में तारीख लगाने की प्रार्थना की जिसे डॉ ठाकुर ने लम्बी अवधि बताते हुए प्रतिवाद किया. दोनों पक्षों की बात सुन कर जस्टिस एस एस चौहान और जस्टिस ऋतुराज अवस्थी की बेंच ने 23 फ़रवरी को सुनवाई की अगली तारीख तय की.

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Yadav Singh case : Noida Authority’s double face exposed

The counter affidavit filed by Noida Development Authority in the PIL filed by social activist Dr Nutan Thakur before Allahabad High Court in Yadav Singh case, completely exposes the leniency shown to him. The affidavit filed by General Manager Bipin Gaur tries to shield itself completely by stating that the PIL seeks steps solely from the State government and the Authority has nothing to do with it.

The Authority has said that it came to know of enquiry against Yadav Singh through Income Tax department letter dated 08 December 2014. Assistant Project Manager Ramendra and Accountant Pradeep Kumar Sharma were suspended on the basis of Income tax department letter of 08 December stating that illegal commission was taken in every contract award but this illegal commission was not mentioned either in Yadav Singh’s suspension order or in the enquiries ordered about his companies and his dubious promotions. Calling this an intentional move to save Yadav Singh, Dr Thakur said that she shall be raising this issue tomorrow 16 February before the Court, while seeking CBI enquiry in this case.

यादव सिंह मामला : नॉएडा प्राधिकरण की दोहरी नीति 

यादव सिंह मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट में सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर द्वारा दायर पीआईएल में नॉएडा विकास प्राधिकरण का हलफनामा यादव सिंह के प्रति प्राधिकरण के रियायत को पूरी तरह स्पष्ट कर देता है. प्राधिकरण की ओर से महाप्रबंधक बिपिन गौर द्वारा दायर हलफनामे में प्राधिकरण ने पीआईएल में उठाये बिन्दुओं से अपने आप को पूरी तरह बचाते हुए सारा जिम्मा प्रदेश सरकार पर थोपने का प्रयास किया है.

प्राधिकरण ने कहा है कि उन्हें यादव सिंह के खिलाफ इनकम टैक्स की कार्यवाही के बारे में उनके 08 दिसंबर 2014 के पत्र द्वारा जानकारी मिली. सहायक परियोजना अधिकारी रामेन्द्र और लेखाकार प्रदीप कुमार शर्मा को इनकम टैक्स विभाग के 08 दिसंबर 2014 के पत्र में लिखे इस बात के आधार पर निलंबित किया गया कि प्रत्येक अनुबंध अवार्ड पर अवैध कमीशन ली जाती थी किन्तु इस अवैध कमीशन का उल्लेख न तो यादव सिंह के के 08 दिसंबर के निलंबन आदेश में किया गया, न उनसे जुडी कंपनियों के जांच आदेश में और न ही उनकी पदोन्नति से जुड़े के जांच आदेश में. डॉ ठाकुर ने इसे सोची-समझी चाल बताते हुए कल 16 फ़रवरी को होने वाली सुनवाई में सीबीआई जांच की मांग करते समय उठाने की बात कही है.

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लखनऊ का कथित सामाजिक कार्यकर्ता संजय शर्मा कंटेंट चोर है!

: ‘यूपी के आईपीएस अमिताभ ठाकुर के पास खाने और दिखाने के दाँत अलग अलग’ संबंधी आरोपों का जवाब : मैंने एक सज्जन संजय शर्मा द्वारा लिखा “यूपी के आईपीएस अमिताभ ठाकुर के पास खाने और दिखाने के दाँत अलग-अलग” शीर्षक लेख पढ़ा जिसमे सब-टाइटल है-“पारदर्शिता की बात करने बालों को ही पारदर्शिता से परहेज”.

इस लेख में लिखा है-“पर उपदेश कुशल बहुतेरे. शायद आपने सुना तो बहुत होगा पर अब देखना चाहें तो देख भी लीजिए. जनपक्षधर्ता की बात करने बाले आईपीएस अमिताभ ठाकुर को भी अचल संपत्ति की घोषणा से परहेज है. क्या यूपी आईपीएस अमिताभ ठाकुर के खाने और दिखाने के दाँत अलग अलग हैं? भारत सरकार के गृह मंत्रालय के अनुसार अमिताभ ठाकुर ने वर्ष 2012, 2013, 2014 में अचल संपत्ति की घोषणा नहीं की है. आख़िर ऐसा क्या है जिसकी बजह से अमिताभ अपनी अचल संपत्ति की घोषणा करने से डर रहे हैं और अपना मुँह छुपाते घूम रहे हैं. शायद ‘तहरीर’ द्वारा की गयी शिकायत के बाद चले सरकारी चाबुक के बाद ही अन्य बेशर्मों के साथ ठाकुर साहब को भी कुछ शर्म आए और वे सरकारी क़ायदे-क़ानूनों का खुद भी अनुपालन करना सीखें.”

फेसबुक पर इस लेख के बाद कई टिप्पणियाँ आयीं जिनमे वीसा यूरोप में कार्यरत चेतन कश्यप  ने कहा- “ऐसा हो ही नहीं सकता, कोई गलत धारणा नहीं पाली जाए, मैं उनको अच्छी तरह जानता हूँ, वो एक सच्चे, नेक और ईमानदार अधिकारी हैं. यह आपकी निजी धारणा है.”

इसके विपरीत लखनऊ के अधिवक्ता श्री सत्येन्द्र नाथ श्रीवास्तव ने कहा कि इनके अपने भाई यश ठाकुर के पास कानपुर में तीन पेट्रोल पम्प हैं. इस पर उत्साहित हो कर संजय शर्मा ने श्री श्रीवास्तव से पूछा-“अच्छा यश ठाकुर अमिताभ ठाकुर के अपने भाई हैं?”  श्री श्रीवास्तव ने उतने ही आत्मविश्वास के साथ कहा- “हाँ सर, मेरे एक क्लाइंट के पास काफी पेट्रोल पम्प हैं, उन्होंने मुझे यह सूचना दी है.” रंजन कुमार ने कहा- “ठाकुर जी पे इतने तल्खी की वजह?” श्री चेतन ने पुछा कि उन्हें पेट्रोल पम्प का पता दिया जा सकता है” लेकिन इसका कोई उत्तर नहीं आया.

एक निजी कंपनी में कार्यरत अनिल सिंह ने कहा कि जैसे अवाम ने “आप की पोल खोली, सबको वैसे ही एक दूसर की कमजोर नस पता है. बस प्रोपोगंडा है मैं ही नैतिक रूप से सही हूँ.” इस पर श्री संजय ने कहा-“क्या आपको लगता है अमिताभ ठाकुर क़ानून के ऊपर हैं?” दिल्ली के सामाजिक कार्यकर्ता जयकुमार झा ने कहा-“इस मामले में हमारा समर्थन है तहरीर को की पारदर्शिता की शुरुआत खुद से ही होनी चाहिए ,मैं अगर अपनी जाँच का अधिकार हर सच्चे -अच्छे नागरिक को दूंगा तभी मैं प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति की जाँच करने का अधिकार रखूँगा.”

श्री अंकित धन्विक ने कहा- “मैं किसी के समर्थन व विरोध में नहीं बल्कि यह कहना चाहता हूँ कि इस प्रकार का कदम देश भर में एक अच्छा साफ़सुथरा वातावरण स्थापित करेगा. इस प्रकार क़ी जानकारी जनता तक जरूर पहुंचनी चाहिए जिसके लिए मैं आदरणीय संजय शर्मा जी को धन्यवाद प्रकट करता हूं और पूर्व यूपीए सरकार का आभारी हूँ जिसने सूचना का अधिकार जनता के समक्ष लाया”. आशीष सागर ने इसे बेबाक बयानी बताया.

अब बात संजय शर्मा की. मैं संजय शर्मा को लम्बे समय से जानती हूँ. उनके और उनकी पत्नी उर्वशी शर्मा के कार्यों की मैंने सार्वजनिक और निजी रूप से प्रशंसा भी की है. वैसे भी सामाजिक क्षेत्र में बहुत कम लोग काम करते हैं, अतः हमने हमेशा इन्हें इस क्षेत्र में अपने से सीनियर मान कर उनका लिहाज किया. बाद में कई बातें ऐसी आयीं जिनसे मुझे लगा कि हमें संजय शर्मा से कुछ अलग ही रहना चाहिए. इनमें मुख्य रूप से सामने कुछ कहने और पीठ पीछे फेसबुक पर या अपने ब्लॉग पर दूसरी बातें लिखने और हमारे द्वारा की गयी शिकायतों और कार्यों को हूबहू उतार पर अपने नाम से अधिकारियों को भेज कर श्रेय लेने का प्रयास करने जैसी बातें शामिल थीं. इस सम्बन्ध में पूर्व में भी कई उदाहरण रहे हैं पर हाल में भी इसके कई उदहारण मैंने स्वयं देखे हैं.

मैंने दिनांक 25/01/2015 को समय 05:16 बजे शाम अधीक्षण अभियंता, सिंचाई, बहराइच की वित्तीय अनियमितता की शिकायत  की और संजय शर्मा के ब्लॉग http://tahririndia.blogspot.in/ पर यही शिकायत उनके द्वारा अपने स्तर पर करने की बात लगभग हूबहू उन्ही शब्दों में उसी रात समय 08:28 बजे अंकित हो गया.

मैंने 02/02/2015 को 03.05 बजे शाम जौहर ट्रस्ट भूमि मामले में आज़म खान की लोकायुक्त को शिकायत की बात फेसबुक पर लिखी और संजय शर्मा ने अगले दिन 03/02/2015 को समय 03:46 शाम लगभग शब्दशः वही शिकायत अपनी ओर से राज्यपाल, उत्तर प्रदेश को भेजने की बात लिखी.

मेरे पति अमिताभ ठाकुर ने अपने फेसबुक पर दिनांक 05/02/2015 01:17 बजे दिन में पूर्व केन्द्रीय गृह सचिव की सीवीसी में शिकायत भेजने की बात लिखी और संजय शर्मा ने अपने ब्लॉग पर ठीक वही शिकायत लगभग उन्ही शब्दों में सीवीसी को उसी रात 11:00 बजे भेजने की बात बतायी.

मैं यह मानती हूँ कि सामाजिक कार्यों और शिकायतों पर किसी का कॉपीराईट नहीं होता पर बार-बार किसी अन्य व्यक्ति द्वारा भेजी शिकायत को हूबहू नक़ल कर अपना बता कर भेजना भी तो अपने आप में कई सारे प्रश्न छोड़ जाता है.

उसके अलावा यहाँ एक और बात महत्वपूर्ण है. शिकायत एक बात होती है, अपनी व्यक्तिगत तल्खी का प्रदर्शन दूसरी बात. संजय शर्मा ने मेरे पति द्वारा कथित रूप से अपना प्रॉपर्टी रिटर्न नहीं दाखिल करने की बात अपने ब्लॉग में पांच बार पांच शीर्षक से लिखा-“यूपी : पारदर्शिता की बात करने बालों को ही पारदर्शिता से परहेज”, “यूपी के आईपीएस अमिताभ ठाकुर के पास खाने और दिखाने के दाँत अलग अलग”, “UP IPS Amitabh Thakur’s double faced approach exposed”, “तो दूध का धुला नहीं है यूपी का कथित समाजसेवी आईपीएस अमिताभ ठाकुर ! “, और “UP IPS Amitabh Thakur too a ‘Black’ Sheep of same ‘Black’ Flock”. सभी लेख में एक ही बात है पर अलग-अलग शीर्षक से उसमे मिर्च-मसाला भरने का पूरा प्रयास किया गया. साथ ही बेशर्म, दोहरा चरित्र, ब्लैक शीप जैसी टिप्पणी भी अपनी ओर से की गयी.

अब एक लाइन में इस मामले की सच्चाई- मेरे पति ने तीनों साल का अपना प्रॉपर्टी रिटर्न डीजीपी ऑफिस, जहां उन्हें अपना रिटर्न देना होता है, को 11/01/2013 , 27/01/2014 और 19/01/2015 को भेज दिया है. अब यदि डीजीपी ऑफिस से यह रिटर्न भारत सरकार नहीं पहुंचा है, इसके लिए मेरे पति तो कत्तई जिम्मेदार नहीं माने जा सकते.

कुछ और बातें. मैंने और मेरे पति ने एक बार भी अपने आप को विशिष्ट या खास या दूध का धुला नहीं कहा है. हमारा मात्र यह कहना रहता है कि यदि हम गलत हैं, हम पर कार्यवाही हो, यदि कोई और तो उस पर. हम उतने ही अच्छे या बुरे हैं जितना एक आम आदमी, हाँ यह जरुर है कि हम अच्छा बनने और अच्छे काम करने का प्रयास अवश्य कर रहे हैं.

अंतिम बात, मेरे पति के सिर्फ एक अपने भाई हैं, जो आईएएस अफसर हैं. कानपुर में उनका कोई भाई नहीं है. अतः मुझे श्री श्रीवास्तव, जो संभवतः अधिवक्ता हैं और इस तरह सुनी-सुनाई बात को हकीकत बता देते हैं, और उनकी बात सुन कर विश्वास कर लेने वालों से यही कहना है कि यह उदाहरण बताता है कि हमारे यहाँ कई लोग कैसे बिना आग के भी धुंआ पैदा करने में एक्सपर्ट हैं, जो एक बार भी नहीं सोचते कि वे कह क्या रहे हैं और इतने विश्वास के साथ गलत बात भी सही बता कर बेच देते हैं कि आदमी उसे सच मानने को बाध्य हो जाता है.

मैंने ये बातें इसीलिए लिखीं क्योंकि मैं जानती हूँ कि कई बार झूठ बार-बार बोले जाने पर सच माना जाने लगता है. साथ ही सामाजिक कार्यकर्ताओं से यह विनम्र आग्रह करने के लिए भी कि वे शिकायत सबों की करें, खूब करें पर इनमे व्यक्तिगत टिप्पणी और दुराग्रह से बचें. यदि आपके बातों में सत्यता और धार होगी तो उसके लिए तल्ख़ टिप्पणियों के बेजा इस्तेमाल की जरुरत नहीं होगी. अन्यथा वे व्यक्तिगत टिप्पणियाँ अर्थहीन हो जायेंगी और समस्त कार्यकर्ताओं के प्रति प्रतिकूल मंतव्य बनाने का काम करेंगी.

डॉ नूतन ठाकुर
पत्रकार, वकील और आरटीआई एक्टिविस्ट
लखनऊ

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गौरी हत्याकांड : यूपी पुलिस पर गंभीर मानवाधिकार हनन का आरोप

सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर ने कल अपने पति अमिताभ ठाकुर के साथ गौरी हत्याकांड के कथित घटनास्थल पर अभियुक्त की बहन डॉली से बातचीत के आधार पर उत्तर प्रदेश मानवाधिकार आयोग और यूपी के डीजीपी को अभियुक्त के परिवार वालों के मानवाधिकार उल्लंघन के सम्बन्ध में शिकायत की है. डॉली ने इन्हें बताया था कि पुलिस गिरफ़्तारी की रात 12 बजे और फिर 4 बजे सुबह बिना महिला पुलिस के आई थी और उन लोगों ने डॉली सहित महिलाओं से अभद्रता की थी.

यही नहीं वे डॉली और उसकी माँ के एक-एक सूटकेस भी बिना लिखापढ़ी के अपने साथ ले गए जिसमे उनके कपडे और गहने थे. डॉली के अनुसार उनके पास पहनने लायक कपडे तक नहीं हैं और वह लोगों से मांग कर कपडे पहन रही है. इसके अलावा अभियुक्त का मकान भी पुलिस ने बिना कोर्ट के आदेश के पूरी तरह सीलबंद कर दिया है, जिससे उसके परिवार के लोग बाहर रहने को मजबूर हैं. डॉ ठाकुर ने इन्हें गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन बताते हुए तत्काल इन्हें दूर कराये जाने की मांग की है.

Gauri murder- complaint about serious Human Right violation of accused family

After her visit, along with husband Amitabh Thakur, to alleged scene of crime of Gauri murder case, social activist Dr Nutan Thakur has registered a complaint before UP Human Rights Commission and DGP regarding serious human rights violation of accused’s family.

Dolly told them that in the night of arrest, the police came to their house at 12 midnight and again at 4 in the morning without any lady constables and misbehaved with the women in the house. They also took away one suitcase each consisting of their clothes and jewellery, from Dolly and her mother, without presenting a seizure memo. As per Dolly, they do not have clothes to wear and are forced to borrow clothes from others. The police have also sealed the accused house without any legal authority forcing the entire family to seek shelter in others’ house. Calling them serious human rights violation, Dr Thakur has immediate sought appropriate action.

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लैकफेड घोटाला : गलत विवेचना में सुब्रत त्रिपाठी जिम्मेदार

सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर ने लैकफेड घोटाले के कई अभियुक्तों के बरी होने और कोर्ट द्वारा लचर विवेचना साबित होने के सम्बन्ध में तत्कालीन एडीजी एसआईबी को-ऑपरेटिव सुब्रत त्रिपाठी की भूमिका की जांच की मांग की है. उन्होंने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को पत्र लिख कर कहा है कि यह सर्वविदित है कि इस घोटाले की विवेचना पूरी तरह से श्री त्रिपाठी के सीधे नियंत्रण में थी जैसा उस समय के समाचारपत्रों में प्रकाशित खबरों से भी प्रमाणित होता है.

श्री त्रिपाठी ने तत्कालीन डीएसपी आदित्य प्रकाश गंगवार को अपने स्तर से कार्यवाहक एसपी बना दिया था. साथ ही प्राप्त जानकारी के अनुसार इस मामले की फ़ाइल सीधे श्री गंगवार और श्री त्रिपाठी के बीच चलती थी क्योंकि उस समय को-ऑपरेटिव सेल में तैनात आईजी आनंद स्वरुप को इस विवेचना से पूरी तरह अलग रखा गया था. यह बात भी चर्चा में थी कि इस विवेचना के दौरान गलत फीडबैक दे कर श्री स्वरुप को मानवाधिकार प्रकोष्ठ में ट्रान्सफर करा दिया गया था.

डॉ ठाकुर ने कहा है कि श्री त्रिपाठी के एक भांजे द्वारा इस विवेचना के भारी दखलअंदाजी करने और कई बड़े लोगों को सम्मन भेज कर उनसे वसूली करने की बातें भी काफी चर्चा में रही थीं और यह भी कहा गया था कि इन शिकायतों के बाद ही श्री त्रिपाठी को वहां से हटाया गया था. इन तथ्यों के आधार पर डॉ ठाकुर ने लैकफेड घोटाले की लचर विवेचना और अभियुक्तों को लाभ पहुँचने के सम्बन्ध में विवेचक और श्री गंगवार के अलावा श्री त्रिपाठी की भूमिका की भी जांच कराने का अनुरोध किया है.

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यूपी के दो आईएएस अफसरों पर कार्मिक मंत्रालय की मेहरबानी

केन्द्रीय सतर्कता आयोग द्वारा सीबीआई जांच के बाद सम्बंधित कार्यालय को भेजे गए अभियोजन स्वीकृति के मामलों में 30 नवम्बर 2014 को 4 माह से अधिक समय तक स्वीकृति नहीं मिलने के जो 22 मामले दर्शाए गए हैं, उनमें 2 उत्तर प्रदेश के हैं. ये दोनों मामले वरिष्ठ आईएएस अफसरों के हैं जो कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग, भारत सरकार के सामने लंबित हैं.

इनमे पहला मामला गृह मंत्रालय में तत्कालीन संयुक्त सचिव सदाकांत शुक्ला के खिलाफ सीबीआई देहरादून द्वारा 09 नवम्बर 2012 को भेजा गया. दूसरा मामला तत्कालीन राजस्व परिषद सदस्य प्रदीप कुमार शुक्ल के खिलाफ सीबीआई लखनऊ द्वारा 18 मार्च 2014 को भेजा गया. सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर ने कार्मिक विभाग के सचिव को पत्र भेज कर इन दोनों मामलों में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के क्रम में तत्काल अभियोजन स्वीकृति देने का अनुरोध किया है.

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