जोगिया जनूबी गांव में लोकरंग के माध्यम से लोक जीवन को संवारने का प्रयास

कुशीनगर (उ.प्र.) : जिले के जोगिया जनूबी पट्टी गांव में हर वर्ष की तरह इस बार भी दो दिवसीय लोकरंग कार्यक्रम 12-13 अप्रैल को आयोजित हुआ। यह आयोजन का आठवां वर्ष रहा। इस बार का आयोजन असहयोग आंदोलन के दौरान अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंकने वाले कुशीनगर के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों हनुमान प्रसाद कुशवाहा, ब्रह्मदेव शर्मा, मुंशी तप्तीलाल और मोती भगत को समर्पित किया गया। इन चारों सेनानियों की खोज, सुभाष चन्द्र कुशवाहा ने 8 मई, 1921 के स्वदेश अखबार में प्रकाशित समाचार के आधार पर की थी। इस बार के आयोजन की खास बात यह रही कि भोजपुरी क्षेत्र की लोक कलाओं के साथ-साथ झारखंड, मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल के लोक कलाओं से भी लोगों को रूबरू होने का मौका मिला।  

वर्ष 2008 में इस गांव के निवासी कथाकार सुभाष चन्द्र कुशवाहा ने गांव के युवकों के सहयोग से इस समारोह को शुरू किया था। इसका उद्देश्य संस्कृति के नाम पर हो रहे फूहड़पन के खिलाफ सकारात्मक पहल करते हुए जन संस्कृति का संवर्धन करना था। इस समारोह के जरिए पूर्वांचल की जमीन पर यहां के लोक कलाओं को मंच देने के साथ-साथ दूसरे अंचलों के लोक कलाओं से एक दूसरे को जोड़ने का भी उद्देश्य था।

पहले वर्ष यह कार्यक्रम लोकरंग सांस्कृतिक समिति के सदस्य मंजूर अली के अहाते में आयोजित हुआ। तीन वर्ष बाद यह अहाता छोटा पड़ गया तो सुभाष चन्द्र कुशवाहा ने गांव की सीमा पर अपने खेत को लोकरंग परिसर बना दिया। यहां पर एक बड़ा मुक्ताकाशी मंच बना और यहीं पर लोक कलाकारों को ठहरने के लिए कमरे भी बने। वर्ष भर इस परिसर में खेती होती है तो मुक्ताकाशी मंच पर गांव के युवक नाटकों का रिहर्सल व मंचन करते हैं। वर्ष 2011 से इसी मंच पर यह आयोजन हो रहा है।

यह आयोजन गैर सरकारी प्रयास से आयोजित होने वाला पूर्वी उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा लोक उत्सव बन गया है। इस आयोजन ने जोगिया गांव की आज से एक दशक पहले बनी नकारात्मक छवि को भी बदल दिया है। इस गांव में मानसिक रूप से बीमार एक महिला को कुछ स्वार्थी तत्वों ने देवी घोषित कर दिया था और उसके हाथ से दिए गए पानी को चमत्कारिक बताते हुए तमाम लाइलाज रोगों के लिए साध्य बता कर खूब प्रचारित किया। परिणाम स्वरूप यहां पर अंधविश्वास का एक बड़ा मेला होने लगा और सैकड़ों की संख्या में यहां लोग कथित देवी के हाथ से जल ग्रहण करने आने लगे। लोकरंग सांस्कृतिक समिति ने अंधविश्वास के इस बाजार का न सिर्फ पर्दाफाश किया बल्कि लोकरंग का आयोजन शुरू कर सिर्फ इसी गांव के ही नहीं, बल्कि आस-पास के दर्जनों गांवों के सांस्कृतिक माहौल को बदल देने का काम किया। आज जोगिया गांव की पहचान पानी पिलाने वाली देवी के गांव के रूप में नहीं, लोक संस्कृति की चिंता और इसके संवर्द्धन का कार्य करने वाले गांव के रूप में हो रही है।

12 अप्रैल को कार्यक्रम का शुभारम्भ रात नौ बजे प्रसिद्ध कथाकार एवं समयान्तर पत्रिका के सम्पादक पंकज बिष्ट ने ‘लोकरंग 2015’ पत्रिका के लोकार्पण से किया । इस मौके पर कहानीकार ऋषिकेश सुलभ, लोक संस्कृति के मर्मज्ञ तैयब हुसैन, चित्रकार डा. लाल रत्नाकर, वरिष्ठ कथाकार मदन मोहन, डा. विजय चैरसिया, जितेन्द्र भारती, डा. महेश चन्द्र शांडिल्य, जनवादी लेखक संघ के प्रदेश सचिव नलिन रंजन सिंह, अरुण कुमार असफल आदि उपस्थित थे। 

लोकरंग का आगाज गांव की महिलाओं के रोपनी गीत- ‘सातों ही भईया के एक बहिना रुनवा हो, ए रामा सातों भईया करेले रोपनिया हो ना’…. से हुआ। हर वर्ष गांव की महिलाओं द्वारा प्रस्तुत कार्यक्रम से ही लोकरंग का आगाज होता है। रोपनी गीत मतिरानी देवी, ज्ञानती, लालती, सुभागी, रूक्मीणा और सुशीला ने गाया। 

इसके बाद गाजीपुर से आए बंटी वर्मा ने महेश्वर के लिखे गीत ‘सृष्टि बीज का नाश न हो  …..’ और नरेन्द्र श्रीवास्व के भोजपुरी गीत ‘सारी जिनगी गुलामी में सिरान पिया, कहां गए विहान पिया ना’ प्रस्तुत किया। कुशीनगर जिले के लोक कलाकार ने निर्गुन प्रस्तुत किया और इसके बाद पश्चिम बंगाल के बर्द्धमान जिले से आए बरून दास बाउल, अजय दास, नयन अंकुश, काशीनाथ बायन, संजय मंडल और अनंत विश्वास ने प्रसिद्ध बाउल गान प्रस्तुत किया। बाउल गायकों के मधुर कंठ और उनके वाद्य यंत्रों की सम्मोहक धुन ने सबको अपने जादू में बांध लिया। बाउल गान की परम्परा भक्ति काल की परम्परा से जुड़ी हुई है। पूर्वी और पश्चिमी बंगाल से आने-जाने वाले नौकाओं और जहाजों पर बाउल गायक मुसाफिरों को अपने गायन से भक्ति भाव में डूबो देते थे। उनके गायन में एक ओर राम-कृष्ण की भक्ति तो दूसरी तरफ कबीर का फक्कड़पन होता है। 

बाउल के बाद मध्य प्रदेश के देवास से आए दयानन्द सारोलिया और उनके साथियों ने कबीर व मालवी गायन प्रस्तुत किया। उन्होंने पहला गीत-‘ मै वारी जाउं रे, बलिहारि जांउ रे , मोरा सतगुर आंगन आया रे … अरी निर्मल हो गई काया ’ प्रस्तुत किया। इसके बाद उन्होंने कबीर के दो और भजन सुनाए। 

पहली रात का आखिरी कार्यक्रम था, नाटक- सुपनवा का सपना । यह नाटक इप्टा पटना की टीम ने किया। शाहिद अनवर लिखित एवं तनवीर अख्तर निर्देशित यह नाटक सुपनवा का सपना, इतिहास की निष्पक्षता पर सवाल उठाता है। सुपना का सपना महज यह है कि उसके भी पुरखों और संतानों का इतिहास हो न कि सिर्फ राजा-रजवाड़ों का। उसका यही सपना उसके जीवन में तमाम मुसीबतें लेकर आता है और अंत में जमींदार के साजिश से उसे फांसी हो जाती है। फांसी पर चढ़ने के पहले भी वह आम लोगों से सत्ता के खिलाफ उठ खड़े होकर एक नया इतिहास रचने का सपना देखता है। 

लोकरंग की दूसरी रात खडि़या आदिवासी समूह के पारम्परिक नृत्य और इप्टा पटना की टीम द्वारा मंचित नाटक ‘ गबरघिचोरन के माई’ के नाम रही। इन दोनों कार्यक्रमों के बीच भोजपुरी इलाके के कलाकारों ने लुप्त हो रही लोक कला ‘हुड़का’, ‘बाकुम’, ‘लोरिकायन’ प्रस्तुत किया। 

झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा की महासचिव वंदना टेटे के नेतृत्व में आए कलाकारों ने खडि़या आदिवासी समुदाय का पारम्परिक करम नृत्य और बंदई नृत्य प्रस्तुत किया। करम नृत्य भादो एकादशी के समय मनाए जाने वाले त्योहार के समय होता है। इसमें आदिवासी करम राजा को मनाते हैं कि वह उनके घर आए और उन्हें सुख समृद्धि दें। इस नृत्य पर प्रस्तुत गीत का भाव था कि जैसे छोटी-छोटी नदिया समुद्र में मिलती हैं, उसी तरह हम अलग-अलग समुदाय से एक बड़े समुदाय और बड़े समाज का निर्माण करते हैं।  दूसरा बंदई नृत्य, कार्तिक पूर्णिमा के समय प्रस्तुत किया जाता है। इसमें आदिवासी समाज अपने पशु धन के प्रति आभार व्यक्त करता है कि उसने अनाज को खेत से खलिहान और फिर घर लाने में मदद की। इन दोनों नृत्यों में राजेश डुंगडुंग काबा खडि़या, गांधी खडि़या, गिरजा खडि़या, विक्रांत केरकेट्टा, बुधेश्वर कुल्लू, बुधवा पाहन, निर्मला कुल्लु, प्रमिला टेटे, सुनीता कल्लू, अणिमा, रूबेन खडि़या, फगन खडि़या, फगन खडि़या, संगीता कुल्लू, अणिमा कुल्लू, बंसती कुल्लू, शांति कुल्लू, मीना डुंगडुंग, करमी खडि़या, अणिमा बिलुंग, संपति कुल्लू, कलावती खडि़या और वंदना टेटे शामिल हुए। 

कार्यक्रम की शुरुआत इप्टा की टीम द्वारा प्रस्तुत तीन गीतों से हुआ। इसके बाद बिहार के गोपालगंज जिले के पोखरापुर गांव से आए किशुन यादव ने ’लोरिकायन’ प्रस्तुत किया। कुशीनगर जिले के दहारी पट्टी गांव से आए भोला, विश्वनाथ, छेदी प्रसाद, झेंगड़, अलगू, रामरूप, गजाधर, शारदा, शिवमूरत, बिन्दू प्रसाद ने हुड़का प्रस्तुत किया। ये दोनों लोक कलाएं अब लुप्त होने के कगार पर हैं। मंच पर जब तीन कलाकार बाकुम प्रस्तुत करने आए तो दर्शक उनके विचित्र वस्त्र विन्यास और वाद्य यंत्र देख हैरत में पड़ गए। तीनों कलाकारों ने अपने चेहरे को गुदरी, जिसमंे रंग-बिरंगी कौडि़यां टांकी गई थीं, से ढंक रखा था। हाथ में डंडा और झुनझुना जैसा खन-खन बजने वाला वाद्य यंत्र था। इन कलाकारों ने अपनी अनोखी लोक शौली में स्वरचित कविताएं पढते हुए भ्रष्टाचार और जाति व्यवस्था पर करारे तंज किए। कप्तानगंज, कुशीनगर से आए कौव्वाल असगर अली और उनके साथियों ने ‘छाप तिलक सब छीनी रे …’ और दो अन्य कव्वाली प्रस्तुत की।

कार्यक्रम की आखिरी प्रस्तुति थी इप्टा पटना का नाटक ‘गबरघिचोरन के माई’। यह नाटक निर्देशक तनवीर अख्तर ने भिखारी ठाकुर के दो नाटकों बिदेशिया और गबरघिचोर को मिलाकर तैयार किया है। नाटक गबरघिचोरन के माई की जानदार प्रस्तुति ने लोगों का दिल जीत लिया। इस नाटक में स्त्री पीड़ा की मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है। वरिष्ठ रंगकर्मी तनवीर अख्तर के निर्देशन में मंचित इस नाटक में युवक गलीच अपनी व्याहता को छोड़ कलकत्ता चला जाता है और 15 वर्ष तक कोई खोज-खबर नहीं लेता है।  इस बीच उसकी पत्नी बच्चे को जन्म देती है। जब गलीज लौटकर आता है तो किशोर हो चुके अपने बेटे को कलकत्ता ले जाने की कोशिश करता है लेकिन उसकी पत्नी उसका विरोध करती है। गबरघिचोर भी मां को छोड़कर परदेश जाने से मना करता है। तभी गांव का एक दूसरा व्यक्ति गड़बड़ी गबरघिचोर को अपना बेटा बताता है। इसको लेकर पंचायत होती है और पंच बने भिखारी ठाकुर गबरघिचोर पर मां का हक बताते हुए उसके पक्ष में फैसला देते हैं। नाटक के कई प्रसंग बहुत मार्मिक थे जिसने दर्शकों को भावुक कर दिया।

लोकरंग के दूसरे दिन बाहर से आए अतिथि साहित्यकारों, कलाकारों और रंगकर्मियों को लोकरंग सांस्कृतिक समिति की ओर से स्मृति चिन्ह प्रदान कर सम्मान किया गया। 

लोकरंग कार्यक्रम के दूसरे दिन,  प्रति वर्ष विचार गोष्ठी का भी आयोजन किया जाता है । इस वर्ष की गोष्ठी का विषय था-लोक संस्कृति का वर्तमान और भविष्य’ । पंकज बिष्ट ने कहा कि लोक कलाओं का सम्बन्ध गांव और जीवन से है। लोक कलाएं जीवन के हर हिस्से से अभिव्यक्त होती हैं। उत्पादन के सम्बन्ध से कलाओं का घनिष्ठ सम्बन्ध है। जैसे-जैसे उत्पादन के साधन बदल रहे हैं, लोक कलाओं में भी बदलाव आ रहा है। पूंजीवादी व्यवस्था में लोक संस्कृति और लोक कलाओं को बचाना बहुत मुश्किल होता है। आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक नीतियों को बदले बिना हम लोक संस्कृति और लोक कलाओं के संरक्षण और विकास का काम नहीं कर पाएंगे। 

उन्होंने लोकरंग के उद्घाटन के समय कहे अपने वाक्य को दुहराते हुए कहा कि आज हम कई तरह के संकटों के दौर से गुजर रहे हैं। यह समय लोक कलाओं के पतन का है। लोक कलाओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह कृत्रिम रूप से गढ़ी नहीं जाती हैं बल्कि हमारी जीवन शैली से प्रेरणा पाकर हमारे जीवन और जीवन संघर्ष को अभिव्यक्त करती हैं। लोक कलाओं और लोक संस्कृति को बचाने का तात्पर्य है अपने जीवन और जीवन शैली को बचाना। 

गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे पटना से आए लोक संस्कृति के मर्मज्ञ तैयब हुसैन ने कहा कि लोक संस्कृति में हमें उस हर तत्व को लेना चाहिए जिसका आधार ऐतिहासिक हो और वैज्ञानिक दृष्टि से सम्पन्न हो। लोक संस्कृति में जो भी प्रगतिशील हो उसे ढूंढकर सामने लाने की जरूरत है। उन्होंने लोक संस्कृति में मिथकों के खतरे के प्रति आगाह किया। जनवादी लेखक संघ के प्रदेश सचिव नलिन रंजन सिंह ने लोक साहित्य के संकलन का काम न होने पर चिंता जताते हुए कहा कि बहुत नाउम्मीद होने की जरूरत नहीं है। लोक नृत्य, लोकगीत, लोक गाथा में नवोन्मेष भी दिखाई दे रहा है भले ही कम क्यों न हो। उन्होंने लोक साहित्य में स्त्री और दलित विमर्श को रेखांकित करते हुए कहा कि नए विमर्शो में नए पड़ताल के साथ लोक संस्कृति को जोड़ेंगे तो भविष्य उम्मीद भरी होगी। 

झारखंड से झारखंडी भाषा साहित्य, संस्कृति अखड़ा की वंदना टेटे ने झारखंड के पांच बड़े आदिवासी समूहों में से एक खडि़या आदिवासी समूह की संस्कृति का विस्तृत परिचय देते हुए कहा कि हमारे समाज में रंग औरा लिंग भेद नहीं है और यह जीवन दर्शन हमने सृष्टि के सानिध्य में पाया है। जंगल और जमीन हमारी संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है और इसको खत्म करना हमारी संस्कृति को खत्म करना है। रीवा विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष प्रो दिनेश कुशवाहा ने कहा कि लोक संस्कृति का विकास सत्ता की संस्कृति के प्रतिरोध में हुआ। लोक ने अपने किस्से-कहानियों, गीतों, नृत्यों के साथ-साथ लोक विश्वासों और लोक आस्थाओं में भी लोक संस्कृति प्रकट हुई। लोक अनुभव जन्य ज्ञान को शास्त्र और वेद से आगे माना गया है। इसके बावजूद लोक संस्कृति में सब कुछ अच्छा नहीं है। नब्बे फीसद लोक विश्वास झूठ पर आधारित हैं क्योंकि ये अनुभव जन्य लोक ज्ञान से अलग से आए हैं। इन लोक विश्वाासों, आस्थाओं की पुनव्र्याख्या करनी होगी और उनको वैज्ञानिक स्वरूप देना होगा। वरिष्ठ कथाकार मदन मोहन ने कहा कि लोक़ संस्कृति के वर्तमान में दुख-दर्द, पीडा, संघर्ष  का बयां तो है लेकिन मुक्ति का संकेत नहीं दिखायी देता। लोक संस्कृति की बात करते हुए कुछ लोग इसे जैसा है वैसा बने रहने की बात कर रहे जो बहुत घातक है। उन्होंने माक्र्सवादी विचारधारा से आंख नहीं चुराने की नसीहत देते हुए कहा कि लोक संस्कृति का निर्माण द्वंदात्मक है। 

वरिष्ठ पत्रकार दयानन्द पांडेय ने कहा लोक संस्कृति मंचों और समारोहों से नहीं बचेगी। इसे हमें अपने घरों में जगह देनी होगी। उन्होंने लोक भाषाओं के खत्म होने पर चिंता जताते हुए कहा कि लोकभाषा को विद्वान नहीं बनाते, बाजार और रोजगार बनाते हैं। लोकभाषा का सम्बन्ध रोजी-रोटी से जोड़ना होगा। उन्होंने बाजार और भूमण्डलीकरण का अंध विरोध करने के बजाय इसको साथ में लेने की जरूरत पर जोर दिया। कहानीकार ऋषिकेश सुलभ ने कहा कि जो हमारे काम का नहीं है उसे हम शव की तरह लादे नहीं रह सकते। हमारे समय का आख्यान बदल रहा है लेकिन जीवन का मौलिक भाव कभी नहीं बदलता। आज भी ऐसे गीत लिखे जा रहे हैं जो सत्ता, शोषण के प्रतिरोध में खड़े हैं। सुप्रसिद्ध चित्रकार डा. लाल रत्नाकर ने कहा कि उन्नत कला का लयात्मक स्वरूप लोक से आया है। पूर्वी उत्तर प्रदेश लोक कलाओं के लिए बहुत ही समृद्ध है। हमें लोक कलाओं के संरक्षण और विकास के लिए बहुत काम करने की जरूरत है। वरिष्ठ पत्रकार अशोक चैधरी ने कहा कि लोक जन में घनघोर निराशा है। लाखों की संख्या में किसान आत्महत्या रहे हैं फिर भी हुक्मरान कह रहे हैं कि देश विकास कर रहा है। हमारी चिंता इस बात की है कि जिसके बल पर हम लोक संस्कृति के विकास की बात कर रहे हैं वहीं संकट में है। 

आदिवर्त संग्रहालय खजुराहो के कार्यक्रम अधिकारी डा महेश चन्द्र शांडिल्य ने लोक संस्कृति के क्षरण के लिए मध्यवर्ग के उदासीनता को जिम्मेदार ठहराया। डा विजय चैरसिया ने बैगा आदिवासियों की संस्कृति की विस्तार से चर्चा की । पत्रकार मनोज सिंह ने कहा कि लोक संस्कृति को बचाने और उसके विकास की लड़ाई किसान, खेती, प्राकृतिक संसाधनों की कार्पोरेट लूट से बचाने की लड़ाई से अलग नहीं है। कार्पोरेट विकास में गांव, किसान, खेत, जल, जंगल, जमीन नहीं बचेंगे तो हम लोक संस्कृति को कैसे बचा पाएंगे। उन्होंने लोक संस्कृति के संरक्षण के कार्य में रूमानियत से बचने की सलाह देते हुए कहा कि लोककलाओं में बहुत से फार्म को बचाने की चिंता गैर जरूरी है क्योंकि ये स्त्रियों के शोषण से जुड़े हुए हैं। विचार गोष्ठी का विषय प्रवर्तन राम प्रकाश कुशवाहा ने किया। संचालन बलरामपुर से आए साहित्यकार पी.सी. गिरि ने किया। विचार गोष्ठी के प्रारम्भ में इप्टा पटना की टीम ने दो गीत प्रस्तुत किए। 

प्रस्तोता मनोज कुमार सिंह का मोबाइल संपर्क : 9415282206

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One comment on “जोगिया जनूबी गांव में लोकरंग के माध्यम से लोक जीवन को संवारने का प्रयास”

  • Suryendu Kumar says:

    अच्छी रिपोर्ट, लोक-कला को इस आयोजन से नया आयाम मिला है। इस आयोजन को सफल बनाने के लिए सभी महानुभाव बधाई के पात्र है। मेरा सुझाव है कि जोगिय। जनूबी को गूगल map पर प्रमुखता से लाया जाये।

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