बलिया में सिपाही ने की अवैध वसूली की शिकायत तो एसपी ने किया सस्पेंड, आहत सिपाही ने दिया इस्तीफा (देखें वीडियो)

उत्तर प्रदेश के बलिया जनपद के नरही थाने के पिकेट पर हो रही अवैध वसूली की शिकायत करना एक सिपाही को महंगा पड़ गया. एसपी ने शिकायत करने वाले सिपाही को ही सस्पेंड कर दिया. इससे आहत निलम्बित सिपाही ने पुलिस हेड क्वार्टर इलाहाबाद को अपना त्याग पत्र भेज दिया है. उसने जान-माल की सुरक्षा की गुहार भी की है.

नरही थाने पर चंद दिनों पहले तैनात हुए सिपाही संतोष कुमार वर्मा का कहना है कि 03 जनवरी की रात 09 बजे से भरौली चेक पोस्ट पर उनकी ड्यूटी लगी थी. वे जब ड्यूटी पर पहुंचे तो वहां एक व्यक्ति द्वारा अवैध गाड़िया चेक पोस्ट से पार करायी जा रही थी. इसका विरोध करते हुए सिपाही संतोष कुमार ने उक्त व्यक्ति को पकड़कर थाने के एसएचओ को सूचित किया. एसएचओ मौके पर पहुंचे और उक्त व्यक्ति को आजाद करते हुए सिपाही संतोष को ही जबरिया थाने लेकर चले आये.

जब इसकी शिकायत सिपाही ने एसपी से की तो एसएचओ रामरतन सिंह भड़क गये. सिपाही का आरोप है कि एसएचओ ने उसे न सिर्फ गालियों से नवाजा, बल्कि उसके मुंह पर जबरदस्ती शराब गिराकर पीएचसी के चिकित्सक से मेडिकल भी करवाया. हद तो तब हो गयी जब एसपी अनीस अहमद अंसारी ने सिपाही को ही सस्पेंड कर दिया. सिपाही पर अनुशासनहीनता का आरोप लगा है. विभाग से मिले इस प्रतिदान से आहत और निलम्बित सिपाही ने अपना त्याग पत्र पुलिस हेड क्वार्टर को भेज दिया. सिपाही ने कहा कि वह रिक्शा चला कर अपने परिवार का पेट पाल लूँगा लेकिन पुलिस की नौकरी नही करूँगा क्योकि यहाँ सच्चाई की कोई कीमत नहीं.

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बलिया से संजीव कुमार की रिपोर्ट.

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उ.प्र. मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के चुनाव के लिए कमेटी गठित

लखनऊ : वर्षों बाद उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के चुनाव के लिए गत दिवस लखनऊ में आपसी सहमति हो जाने के बाद पांच सदस्यीय कमेटी का गठन किया गया है। 

गौरतलब है कि संगठन के अध्यक्ष एवं महासचिव समेत अन्य पदाधिकारियों एवं कमेटी सदस्यों द्वारा स्वयंभू तरीके से सारी प्रक्रिया संचालित की जा रही थी। सत्ता और शासन के बीच अपनी धमक के लिए येन-केन प्रकारेण अपना प्रभुत्व बनाए रखते हुए पदाधिकारी दो सत्र से संगठन पर मनमाना तरीके से हावी थे। इसके खिलाफ लगातार पत्रकारों में गुस्सा बढ़ता जा रहा था। 

यहां गत दिवस चुनाव के संबंध में हुई विजय शंकर पंकज की अध्यक्षता में हुई एक बैठक में कमेटी का गठन कर दिया गया। इस पांच सदस्यीय कमेटी में विजय शंकर पंकज, शिवशंकर गोस्वामी, किशोर निगम, संजय राजन महान एवं मनोज छाबड़ा को चुनाव प्रक्रिया संबंधी निर्णय लेने के लिए अधिकृत किया गया है। 

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फिल्मी पर्दे पर उतरेंगे ‘नेता जी – मुलायम सिंह यादव’, कास्टिंग 15 दिन में

समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव की जिंदगी अब रुपहले पर्दे पर उतरने वाली है. फिल्म में मुलायम के बचपन, उनके जीवन की जद्दोजहद तथा राजनीति संघर्ष को दिखाया जाएगा और वर्ष 1989 में सपा मुखिया द्वारा पहली बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के दृश्य के साथ फिल्म समाप्त हो जायेगी. ख़ास बात यह है कि अपने जीवन पर फिल्म बनाने की इजाजत मुलायम सिंह भी दे चुके हैं, जिसका मुहूर्त उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में हो रहा है. इसमें मुलायम सिंह के बेटे और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव शरीक होंगे. फिल्म का नाम है, ‘नेता जी – मुलायम सिंह यादव’। निर्देशन डॉक्यूमेंट्री फिल्म मेकर विवेक दीक्षित करेंगे और फ़िल्म का निर्माण संदीप शुक्ला और सर्वजीत सिंह करेंगे.

खबर है कि फिल्‍म में मुलायम सिंह का किरदार अभिनेता राहुल बोस निभाते नजर आ सकते हैं. वहीं फिल्‍म में राम मनोहर लोहिया का किरदार नसीरूद्दीन सिद्दिकी निभा सकते हैं. फिल्म की कहानी लिखने वाले दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री अशोक यादव ने बताया कि नेताजी के नाम से मशहूर वरिष्ठ समाजवादी नेता पूर्व रक्षामंत्री मुलायम सिंह यादव के जीवन संघर्ष को दर्शाने वाली बायोपिक ‘नेताजी-मुलायम सिंह यादव’ का निर्देशन विवेक दीक्षित करेंगे. अगले 15 दिनों में फिल्म की कास्टिंग का ऐलान कर दिया जाएगा और कास्टिंग पूरी होते ही फिल्म की शूटिंग शुरू कर दी जाएगी।

विवेक के अलावा संदीप शुक्ला और सर्वजीत सिंह भी इस फिल्म के निर्माता हैं. दूरसंवेदी एप्लीकेशन केंद्र के अध्यक्ष यादव ने बताया कि फिल्म के लिये सपा मुखिया से इजाजत ली गयी है और इसकी शूटिंग के लिये लखनउ के कुछ गांवों में से किसी एक को चुना जायेगा. उन्होंने बताया कि चूंकि सपा मुखिया का पैतृक गांव सैंफई अब पूरी तरह बदल गया है, लिहाजा मुलायम के बाल्यकाल के परिवेश जैसे दिखने वाले गांव में ही फिल्म की शूटिंग की जाएगी. 

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यूपी सरकार से पीड़ित आईएएस एसपी सिंह लड़ाई में उतरे, ‘जन चौपाल’ का बिगुल बजाया

लखनऊ : उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ आईएएस सूर्य प्रताप सिंह लगातार सत्ता की ज्यादतियों से आजिज आकर अब लड़ाई के मैदान में उतर चुके हैं। जन-चौपाल के माध्यम से वह सीधे जनता के बीच पहल कदमी करने चल पड़े हैं। उन्होंने बताया है कि शिकोहाबाद में सपा नगर अध्यक्ष दिलीप यादव और उसके गुर्गे हमारे वालंटियर लोगों को धमका रहे हैं और अपने गुंडों की मदद से हमारी ‘जन-चौपाल’ में व्यवधान करने की तैयारी कर रहे हैं। मैं अपने वालंटियर्स से शांतिपूर्वक काम करने की अपील करता हूँ। वह लिखते हैं कि यह सविनय निवेदन ‘जन-जागरण’ अभियान है।

वह लिखते हैं – दोस्तों, कृपया बताएं, आप किस-किस जनपदों में साथ रहेंगे व आयोजन में मदद करेंगे। लोग कह रहे है, फेसबुक पर बातें बहुत हो गयीं। अब कुछ ठोस काम हो जाये। चलो चुनौती स्वीकार करते हैं। हमारा साथ दें। निमंत्रण की प्रतीक्षा न करें। यह हम सब का काम है। आप को ख़ुशी होगी कि हमारा 75 जनपदों का जन-चौपाल कार्यक्रम शुरू हो गया है। विगत 30 जुलाई को रायबरेली जनपद के ‘ऊंचाहार’ स्थान पर NTPC हे प्रांगण में पहली सफल जन-चौपाल लगायी गयी। 

वह बताते हैं – अब अगली चौपालों का समय, स्थान व सम्बंधित आयोजक वालंटियर का फ़ोन नम्बर निम्न प्रकार है- आप लोग जो भी भाग लेना चाहते हैं, निम्न दिए फ़ोन नंबर पर सम्बंधित आयोजक-वालंटियर से संपर्क करें –

शिकोहाबाद(फिरोजाबाद): दिनांक ०८/०८/२०१५ , समय २.०० दोपहर, स्थान : लकी पब्लिक स्कूल (Lucky Public School), संपर्क: पुलकित 7275465203

आगरा: दिनांक ०८/०८/२०१५, समय ५.०० बजे सांय, स्थान: कमलानगर पार्क, संपर्क: पुलकित 7275465203

अलीगढ: ०९/०८/२०१५ , प्रातः ११.००, स्थान: साईं मुस्कान वाटिका, बरोला बाईपास, संपर्क: युवराज 09910217283 तथा दवेंद्र 09761338894

जौनपुर: १४/०८/२०१५ : समय, स्थान के लिए संपर्क करें: अश्वनी तिवारी ८९६०५४७२५४

विषय वस्तु: आपको ज्ञात ही है कि मैंने ‘वास्ट’ नामक संस्था के संरक्षक के रूप में उत्तर प्रदेश में ‘नकलमाफिया’ के विरुद्ध ‘नक़ल-रोको’ अभियान चलाया था। अब जन सामान्य की यह मांग है कि जिस तरह से ‘वास्ट’ ने ‘नक़ल रोको’ अभियान चलाया था, उसी भांति प्रदेश के बिगड़े हालात को देखते हुए अब एक ‘जन-जागरण’ अभियान चलाया जाये। जन मानस को जोड़कर प्रदेश के भविष्य पर चिंतन कर कोई ऐसा ‘प्लेटफार्म’ तैयार किया जाये जो जन सामान्य को ‘जातपात व धर्म’ से ऊपर उठकर ‘सर्व-जन हिताय’ ‘निष्ठावान’ व ‘कर्मठ’ नागिरिकों को अपना प्रतिनिधि चुनने के लिए तैयार करे। मैंने जनमानस की मौन स्वीकृति के वशीभूत होकर, सामाजिक व्यवस्था के दर्द व असंतोष को एक जन-सेवक के रूप में जन-हित में उठाया है | 

सूर्यप्रताप सिंह का कहना है कि जन मानस के सहयोग से अब तक कई मुख्य सार्वजनिक मुद्दे ‘जनहित’ में उठाए हैं, जिन पर व्यापक जन समर्थन मिला है। अब मैं जनहित में “जन-चौपाल” के माध्यम से जनपद/मंडल स्तरीय स्थानीय समस्याओं को संकलित करने तथा उन्हें उठाने के लिए 75 जनपदों के भ्रमणकर रहा हूँ। यह कार्यक्रम नितांत गैर-राजनैतिक व स्वैच्छिक है। इसका उदेश्य जन-मानस को जगाना तथा जन-समस्यायों से कैसे निबटा जाये या समाधान खोजा जाये, यह जन-क्रांति सन्देश बने, ऐसी ईश्वर-अल्लाह से प्रार्थना है। कुछ लोग पूछ रहे हैं कि उनके लिए कोई कार्य है क्या? यह सबका काम है। कृपया कोई निमंत्रण की प्रतीक्षा न करे। आगे आयें और इन चौपालों को सफल बनायें।

 

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पत्रकारों से यूपी के सूचना सचिव के खिलाफ सड़कों पर उतरने का आह्वान

लखनऊ : मेरे ईमानदार पत्रकार साथियों, मेरी आप से विनम्रता के साथ अपील है, नवनीत सहगल जैसे उत्तर प्रदेश की लूट के साम्राज्य के सरगना के जब मैंने दृष्टान्त मैग्ज़ीन में लगातार बेनकाब किए तो वह मेरी पत्रिका के टाइटल को कैंसिल कराने की कोशिश कर रहे हैं। प्रेस पर छापे डलवाए गए। अपने डिपार्टमेंट के तीन अधिकारियों की कमेटी बनाकर एक फर्जी रिपोर्ट बनवाई और उस प्रेस को दबाव डालकर उससे मेरी पत्रिका की छपाई बंद करवा दी.

मेरे ऊपर मानहानि का मुकदमा किया। एक आपराधिक मुकदमा दर्ज किया गया। कोर्ट के अन्दर जज के सामने पुलिस कस्टडी में मेरे ऊपर नवनीत सहगल के गुंडों ने हमला किया, फिर भी सकून नहीं मिला तो मेरे सरकारी मकान को कैंसिल करा दिया और में फुटपाथ पर आ गया। क्या ये सब सत्य के रास्ते पर चलने के कारण हो रहा है और मेरे जैसे ईमानदार पत्रकार ने नवनीत सहगल जैसे के आगे घुटने नहीं टेके, इसलिए ये हो रहा है?

नवनीत सहगल तू भूल गया है, मुझे भूखा मरना मंजूर है लेकिन तेरे जैसे गंदे आदमी के आगे घुटना टेकना मंजूर नहीं है और तेरी दबंगई मंजूर नहीं है। लगा ले तू जितना भी जोर, हम भी देखें तेरे बाजुओं में कितना जोर है। मेरी देश के सभी पत्रकार भाइयों से अपील है कि अब सड़कों पर बगावत होनी चाहिए। एक बड़ा आन्दोलन सड़कों पर होना चाहिए। इस तरह का सरकारी दमन हमारे साथ हो रहा है। कल आपकी बारी हो सकती है। इसलिए सड़कों पर उतरना अब जरूरी हो गया है। बगावत करना जरूरी हो गया है। अगर आप लोग इस आन्दोलन से जुड़ना चाहते हैं और पत्रकारिता की गरिमा को जीवित रखने के लिए अपना योगदान देना चाहते हैं तो इस आन्दोलन से जुड़ें। आप लोग अपना मोबाइल नंबर जरूर दें।

अनूप गुप्ता के एफबी वाल से

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महाभ्रष्टाचारी यादव सिंह को बचाने की यूपी सरकार की कोशिश नाकाम, एससी का झटका, सीबीआई जांच पर रोक से इनकार

दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने नोएडा के सस्पेंड इंजीनियर-इन-चीफ यादव सिंह मामले में सीबीआई जांच पर रोक लगाने से मना कर दिया है। अखिलेश सरकार को इससे तगड़ा झटका लगा है। गौरतलब है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि यादव ने पूरी व्यवस्था को अपना दास बना लिया है। पिछली 16 जुलाई को हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड और जस्टिस एसएन शुक्ला ने सीबीआई जांच कराने के आदेश किए थे। इसके बाद अखिलेश सरकार ने यादव सिंह पर लगे आरोपों की सीबीआई जांच के हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी।

गौरतलब हैं कि नोएडा अथॉरिटी में चीफ इंजीनियर के तौर पर तैनात यादव सिंह पर आय से ज्यादा संपत्ति रखने का आरोप था. घोटाले के आरोपी इंजीनियर यादव सिंह के ठिकानों से अरबों की संपत्ति का खुलासा हुआ था. प्रदेश सरकार ने  शुरुआत में यादव सिंह के खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई नहीं की.

सामाजिक कार्यकर्ता डॉ.नूतन ठाकुर का कहना है – ”मैं यादव सिंह केस में सुप्रीम कोर्ट के आदेश को सत्य और न्याय की जीत के रूप में स्वागत करती हूँ और उत्तर प्रदेश सरकार से इस अवांछनीय और गैर-जरुरी याचिका दायर करने वालों की जिम्मेदारी तय करने की मांग करती हूँ।”

अब उत्तर प्रदेश सरकार को यह जवाब देना होगा कि वह कौन सी वजह थी, जिसके लिए यादव सिंह को बचाने के प्रयास किए जा रहे। कानून और राजनीति के पंडितों का मानना है कि अगर सीबीआई ने यादव सिंह से ऐसा कुछ उगलवा दिया जिसमें सपा और बसपा दोनो के नेताओं का नाम हुआ तो 2017 विधानसभा चुनावों में इनको खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।

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यूपी का आबकारी मंत्र : खूब पिलाओ-पैसा कमाओ, डीएम बढ़ाएंगे शराब की बिक्री !

उत्तर प्रदेश के किसी बिजनेसमैन  को दिन दिन दूनी रात चैगनी कमाई करने का धंधा करना हो तो राज्य का आबकारी विभाग उसके लिये नजीर बन सकता है।कमाई के मामले मंे आबकारी महकमें ने बड़े-बड़े उद्योगपतियों को पछाड़ दिया है।आश्चर्य की बात यह है कि शराब के कारण प्रदेश की जनता के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव के साथ-साथ अन्य कई सामाजिक बुराइयों की चिंता सरकार में बैठे लोगों को रत्ती भर भी नहीं है।इसी लिये प्रति वर्ष हजारो करोड़ की आमदनी करने वाले महकमें के बड़े अधिकारी इतनी मोटी कमाई के बाद भी संतुष्ट नजर नहीं आ रहे हैं।वह  प्रदेश के तमाम जिलाधिकारियों को पत्र लिखकर अपने जिले में शराब की खपत बढ़ाने को कह रहे हैं।शराब से परिवार बिगड़ते हैं तो बिगड़े।अपराध बढ़ते हैं तो बढ़ा करें लेकिन आबकारी विभाग का इन बातों से कुछ लेना-देना नहीं है।ऐसा लगता है कि  यूपी के जिलाधिकारियों के पास कोई काम नहीं है।इसी लिये उनके कंधों पर शराब बेचने की जिम्मेदारी डाली जा रही है।सरकारी खजाना भरने के चक्कर में आबकारी विभाग के अधिकारी महापुरूषों की उस नसीहत को अनदेखा कर रहे हैं जिसमें वह कहा करते थे,‘ जो राष्ट्र नशे का शिकार होता है,विनाश उसकी तरफ मुंह बाय खड़ा रहता है।’ 

नशे के खिलाफ तमाम नसीहतें आज भी जगह-जगह पोस्टरों-बैनरों-होर्डिंग के माध्यम से सामने आ रही हैं,लेकिन हो इसके उलट रहा है।आश्चर्य की बात यह है कि यह नशा विरोधी होर्डिंग और बैनर-पोस्टर भी आबकारी विभाग के अधीन काम कर रहा मद्य निषेध विभाग ही लगाता है, ताकि लोग नशे में फंस कर घर बर्बाद न करें।मतलब एक ही विभाग जहां एक तरफ लोगों को अधिक से अधिक शराब पिलाने के चक्कर मंें अपनी हदें पार कर रहा है तो उसका ही उप-विभाग(मद्य निषेध विभाग)प्रदेशवासियों को नशे से दूर रखने के लिये करोड़ो रूपया विज्ञापन पर खर्च कर रहा है।

उत्तर प्रदेश में वाणिज्य कर विभाग के बाद सबसे अधिक सरकारी खजाना आबकारी विभाग के राजस्व से ही भरता है।वर्ष 2013-2014 के वित्तीय वर्ष में आबकारी विभाग ने शराब,बियर और भांग जैसी नशीली चीजों से 12 हजार पाॅच सौ करोड़ के लक्ष्य के साक्षेप में 11 हजार छहः सौ करोड़ रूपये का राजस्व एकत्र किया।इतनी राशि में किसी छोटे-मोटे देश का पूरा बजट तैयार हो जाता है।आबकारी विभाग की आमदनी साल दर साल आगे बढ़ रही है।वित्तीय वर्ष 2008 और 2009 में आबकारी विभाग ने 4 हजार 220 करोड़ रूपये का राजस्व जुटाया था जो वर्ष 2012-2013 में 9 हजार 782 करोड़ पहुंच गया।

राज्य में शराब की खपत की बात की जाये तो फुटकर अंग्रेजी शराब की दुकानों से वर्ष 2013-2014 में 08 करोड़ 25 लाख 53 हजार 9सौ चार बोतलें अंगे्रजी शराब की बिकी।ठर्रा यानी देशी पीने वालों की आदत तो इससे काफी अधिक थी।वित्तीय वर्ष 2013-2014 में 26 करोड़ 86 लाख 68 हजार 231 लीटर शराब पियक्कड़ गटक गये।इसी प्रकार बियर पीने वाले भी पीछे नहीं रहे।बीयर के शौकीन उक्त वित्तीय वर्ष में 15 करोड़ 43 लाख 8 हजार 748 बोतलें डकार गये।बात दारू पीने में रिकार्ड बनाने की कि जाये तो लखनऊ और कानपुर मंडल इस मामले में पहले और दूसरे पायदान पर रहे जबकि तीसरे नबंर पर बाबा भोलेनाथ की नगरी वाराणसी मंडल के लोग रहे।सबसे कम दारू पीने वालों में मुरादाबाद मंडल रहा।

उत्तर प्रदेश में यह शराब  पियक्कड़ों के पास करीब 23,175 फुटकर दुकानों के माध्यम से पहुंचती है।वित्तीय वर्ष 2013-2104 के अनुसार राज्य में देशी शराब की 13,640 अंगे्रजी शराब की 5,096 बियर की 4,043 के अलावा पूरे प्रदेश में 396 माॅडल शाॅप थीं जिसमें और वृद्धि ही हुई है।  

यह सुनकर और देखकर आश्चर्य होता है कि राज्य में जितने मयखाने हैं उतने तो ज्ञान के मंदिर (हाईस्कूल और इंटर कालेज) भी नहीं हैं।यूपी में कुल 23 हजार 175 शराब की दुकानों के मुकाबले मात्र 20,720 कालेज ही हैं।ऐसी ही स्थिति सरकारी अस्पतालों की है।यूपी की करीब 21 करोड़ आबादी के लिये प्रदेश में मात्र 5,095 अंग्रेजी (एलोपैथिक), 2114 आयुर्वेदिक,1,575 होम्योपैथिक और 253 यूनानी अस्पताल हैं।इसमें भी करीब 80 प्रतिशत खस्ता हालत में हैं।न तो प्रर्याप्त डाक्टर और अन्य स्टाफ तैनात हैं, न ही दवाएं मौजूद हैं।  

बहरहाल, शराब के धंधे से आबकारी विभाग भले ही हजारो करोड़ कमा रहे हो, परंतु तथ्य यह भी है कि उत्तर प्रदेश में अंग्रेजी दारू पीने वालों की संख्या लगातार घट रही है।उत्तर प्रदेश सरकार की आय घट रही है। सरकार के लिये यह बात चिंता जनक है,लेकिन वह जमीनी हकीकत को अनदेखा कर रही है।उत्तर प्रदेश में नंबर दो की शराब का धंधा खूब फल-फूल रहा है।प्रदेश में अंग्रेजी शराब की खपत या बिक्री कम हो रही है तो उसका सबसे बड़ा कारण है हरियाणा। यू पी के कई जिलों में हरियाणा की अवैध शराब धड़ल्ले से बिक रही है।पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तो हरियाणा की शराब छोटी-छोटी दुकानों और गली मोहल्ले में घरों से बेचीं जा रही है। ऐसा नहीं है की पुलिस या उत्तर प्रदेश के आबकारी विभाग को इस बात की जानकारी नहीं है।खाकी वर्दीधारी लोग इन अवैध शराब बेचने वालों से अपना हिस्सा वसूलते खुले आम देखे जा सकते हैं।अवैध कारोबार के पनपने का एक कारण और भी ह।ै जहां नंबर एक की शराब के दुकानों और मॉडल शापों पर दारू का एक पव्वा 150-160 रूपये में मिलता है वहीँ अवैध हरियाणा ब्रांड पव्वा केवल 60-70 रुपये में मिल जाता है। इस लिए प्रदेश में नंबर एक की अंग्रेजी शराब की बिक्री कम हो रही है।बताते चलें कि 2012 के विधान सभा चुनाव प्रचार के दौरान सपा नेता और मौजूदा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा था कि अगर उनकी सरकार बनी तो ‘शाम की दवा’ के दाम घटाये जायेंगे,लेकिन ऐसा हो नहीं पाया।यह स्थिति तब है जबकि आबकारी विभाग के मुखिया मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ही हैं।

प्रदेश में अवैध शराब का धंधा बढ़ रहा है।वहीं आबकारी विभाग अपनी मजबूरियों में उलझा है।आबकारी विभाग के नियमों के मुताबिक जिला आबकारी अधिकारी को हर माह पच्चीस फीसदी दुकानों का निरीक्षण करना चाहिए। इस दौरान शराब की गुणवत्ता, दुकान के मानक, रेट सूची आदि की जांच करनी होती है।नकली शराब की जांच के लिए जिला आबकारी अधिकारी और निरीक्षक को विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है। इसी तरह, आबकारी निरीक्षक को महीने में एक बार प्रत्येक दुकान का निरीक्षण करना चाहिए,लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है जिस कारण प्रदेश में हरियाणा की शराब की बिक्री और मिलावटी शराब का कारोबार खूब फल-फूल रहा है। आबकारी विभाग के ही एक रिटायर्ड अधिकारी का कहना था कि प्रतिमाह करोड़ों रुपये का राजस्व देने वाला आबकारी विभाग विकलांग है। विभाग के पास न ही पर्याप्त मात्रा में फोर्स है और न ही चलने के वाहन हैं। ऐसे में शराब का गलत कारोबार करने वालों के खिलाफ विभाग नाकाम हो रहा है। सरकार को सबसे ज्यादा राजस्व देने वाला यह विभाग अपने संसाधनों के लिए ही तरस रहा है। इतना ही नहीं यह विभाग संसाधन के साथ ही उन कड़े नियमों के लिए भी मोहताज है जो इसके पास नहीं हैं। 

बता दें कि मलिहाबाद कांड में जहरीली शराब से जब कई दर्जन लोगों की मौत हुई तो सरकार ने आनन-फानन में आबकारी विभाग के सभी अधिकारियों के ऊपर कार्रवाई करते हुए उनको पद से हटा दिया। जबकि दूसरी तरफ पुलिस विभाग के सीओ स्तर तक ही कार्रवाई की गई। सूत्र बताते हैं कि इस अवैध कारोबार में पुलिस की मोटी रकम प्रतिमाह बंधी हुई होती है। कभी-कभार आबकारी विभाग की टीम छापेमारी करती है तो उससे पहले अवैध कारोबार करने वालों को पता चल जाता है। ऐसे में इसकी जानकारी अधिकतर पुलिस ही देती है। 

बात यही खत्म नहीं होती है। प्रदेश में आबकारी विभाग के पास अवैध शराब का कारोबार करने वालों के खिलाफ कोई सख्त कानून नहीं है।विभाग कहीं भी अवैध शराब पकड़ता है तो उसे एक्साइज की धारा 60, 61 और 62 के तहत ही कार्रवाई करनी पड़ती है। कच्ची,देसी या फिर विदेशी, किसी भी तरह की अवैध मदिरा का व्यवसाय करने वालों के खिलाफ आबकारी विभाग सिर्फ उक्त धाराओं में ही कार्रवाई करता है। यह धाराएं जमानतीय तो होती ही हैं,अवैध करोबारियों पर जुर्माना भी नाम मात्र का लगता  है। सबसे बड़ी बात यह है कि सुबह विभाग इनको पकड़ कर कोर्ट में पेश करता है जबकि शाम तक यह आरोपी जमानत पर रिहा होकर फिर अपने धंधे में लग जाते हैं। अगर इससे भी ज्यादा कुछ होगा तो मात्र छह माह की कैद हो जायेगी।मोटे अनुमान के अनुसार अवैध शराब की बिक्रि से आबकारी विभाग को प्रति वर्ष करीब 500 सौ करोड़ का नुकसान हो रहा है।   

लेखक एवं वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार से संपर्क : ajaimayanews@gmail.com

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यादव सिंह प्रकरण : यूपी में ‘ठाकुर’ और ‘सिंह’ दहाड़ रहे, मीडिया समेत बाकी बने घुग्घू,!

लखनऊ (उ.प्र.) : आईपीएस अमिताभ ठाकुर हों या आईएएस सूर्य प्रताप सिंह, इन दोनो जुझारू वरिष्ठ प्रशासनिक अफसरों ने उत्तर प्रदेश में वो कर दिखाया है, जो उम्मीद मीडिया और राजनीतिक विपक्ष से, कथित ईमानदार संगठनों से, जुझारू लेखकों और पत्रकारों से की जानी चाहिए थी। उनके साथ साथ इन वर्गों के लोग हैं जरूर, लेकिन पीछे-पीछे, चुप-चुप। उनमें न उतना साहस दिख रहा है, न उतनी इच्छा शक्ति कि वे सत्ता के कोप का सामना कर सकें। मीडिया तो अपनी गंदी आदत के अनुसार हर उसके साथ हो ले रहा है, जो उसे विज्ञापन दे दे। ये कैसी नीचता की पराकाष्ठा है। सीबीआई के शिकंजे में फंसे यादव सिंह प्रकरण में इन सबकी भूमिका ने उनके चेहरे से पर्दा हटा दिया है। खुल्लमखुल्ला ललकार रहे, दहाड़ रहे हैं तो सिर्फ ठाकुर और सिंह…

आईपीएस अमिताभ ठाकुर लिखते हैं – ”मैं चाहता हूँ, मेरी पूरी जांच हो ताकि मेरी सच्चाई सामने आ सके। मैं यह भी चाहता हूँ, यादव सिंह और गायत्री प्रजापति की पूरी जांच हो ताकि बड़े-बड़े रसूखदारों की सच्चाई सामने आ सके। यदि मैंने गलत किया, मुझे न बख्शा जाए। यदि इन सत्ताधारी नकाबपोशों ने गलत किया तो उन्हें न बख्शा जाए। मैंने अपनी निजी हैसियत से प्रदेश सरकार को पत्र भेज कर यादव सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट में दायर एसएलपी का खुले तौर पर विरोध किया है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मेरी पत्नी एक्टिविस्ट डॉ नूतन ठाकुर की पीआईएल में 16 जुलाई 2015 को मामले के व्यक्तिगत भ्रष्टाचार से कहीं बहुत आगे बढ़ कर राज्य सत्ता में बैठे लोगों के संरक्षण में भ्रष्टाचार का उदाहरण मानते हुए सीबीआई जांच के आदेश दिए, जिस पर कार्यवाही भी शुरू हो गयी। इसके बाद सरकार ने तकनीकी पहलुओं पर मात्र सीबीआई जाँच रोकने की याचिका दी, जिसमे बड़े-बड़े अधिवक्ताओं पर लाखों रुपये खर्च होंगे, जो राजकोष का अपव्यय है। तत्काल इस प्रक्रिया को रोका जाना चाहिए। साथ ही निकट भविष्य में इस गैर-जरुरी याचिका में हुए अपव्यय के लिए उत्तरदायित्व नियत करने के लिए कोर्ट जाना होगा।”

गौरव पांडेय अपने एफबी वाल पर लिखते हैं – ”जिस यादव सिंह के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सीबीआई जांच का आदेश देते हुए टिप्पणी की थी कि इस व्यक्ति ने व्यवस्था और सरकार को अपना दास बना लिया है, उसी यादव सिंह को सीबीआई से बचाने के लिए यूपी सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई। हाईकोर्ट का कथन सच साबित हुआ, नहीं तो कोई भी सरकार इतनी गंभीर टिप्पणी के बाद शायद ही किसी व्यक्ति विशेष की पैरवी करती। इसके बाद तो सब कुछ साफ हो जाता है कि सरकार और यादव सिंह के नापाक रिश्ते कितने घनिष्ठ हैं। तो जांच की जरूरत ही क्या, जब यादव सिंह ही सरकार हैं !”

यादव सिंह प्रकरण पर ही प्रकाश सिंह अपने एफबी वाल पर लिखते हैं – ” युवा सपाई दिन-रात अखिलेश भैया करते-करते थक नहीं रहे, उन्हें दोबारा मुख्यमंत्री बनाने के लिए गांव-गांव साइकिल चला रहे, वही अखिलेश सरकार प्रदेश के महाभ्रष्ट अधिकारियों में टॉप पर बताये जा रहे यादव सिंह को बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंची है। अखिलेश सरकार को हाईकोर्ट द्वारा यादव सिंह की करायी जा रही सीबीआई जांच चुभ रही है। बड़ा सवाल यह है कि आखिर अखिलेश सरकार यादव सिंह की सीबीआई जांच क्यों नहीं चाहती है, जिसके पास से इतना कालाधन मिला हो, उसे बचाने वाली सरकार ईमानदार कैसे हो सकती है, उसके हाथों में प्रदेश सुरक्षित कैसे हो सकता है।

”आज देश में जब बहुत से जरूरतमंदों को सीबीआई जांच नसीब नहीं हो पा रही है, वैसे में जब यादव सिंह की जांच हो रही है तो उसमें अड़ंगा क्यों डाला जा रहा है। इससे तो फिर उत्तर प्रदेश में भ्रष्ट अधिकारियों व नेताओं का मनोबल सातवें आसमान पर चला जाएगा। हैरानी की बात यह है कि प्रदेश में मुख्य विपक्षी पार्टी बसपा भी यादव सिंह मामले में मौन धारण किये बैठी है।” 

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कथाकार काशीनाथ सिंह को उ.प्र. हिंदी संस्थान का ‘भारत भारती सम्मान’

लखनऊ : उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की ओर से आज वर्ष 2014 में प्रकाशित पुस्तकों पर सम्मान एवं पुरस्कारों की घोषणा कर दी गई। इसके अंतर्गत संस्थान ने सुप्रसिद्ध कथाकार काशीनाथ सिंह को भारत-भारती सम्मान, उपन्यासकार मृदुला गर्ग को लोहिया साहित्य सम्मान, विनोद कुमार शुक्ल को हिंदी गौरव सम्मान, डॉ.कृष्ण बिहारी मिश्र को महात्मा गांधी साहित्य सम्मान, प्रो.अभिराज राजेंद्र मिश्र को पं.दीनदयाल उपाध्याय साहित्य सम्मान, डॉ.रामकृष्ण राजपूत को अवंती बाई साहित्य सम्मान, कर्नाटक हिंदी प्रचार समिति, बैंगलूर को राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन सम्मान देने की घोषणा की है। 

इनके अलावा साहित्य भूषण सम्मान से प्रताप दीक्षित, डॉ.पुष्पा भारती, राजकृष्ण मिश्र, डॉ.रामकठिन सिंह, डॉ.रंगनाथ मिश्र सत्य, डॉ.रमा सिंह, कमल नयन पांडेय, मोहनदास नैमिशराय, बलराम एवं उमाशंकर सिंह यादव पथिक को सम्मानित किया जाएगा। सम्मानित होने वाले समस्त साहित्यकारों, रचनाकारों की सूची इस प्रकार है –

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यूपी सरकार ने जगेंद्र सिंह के परिवार को 30 लाख क्यों दिए!

टाइम्स ऑफ इंडिया में एक खबर है कि शाहजहांपुर के पत्रकार जगेंद्र सिंह के बेटे ने कहा है कि उसे सीबीआई जांच नहीं करानी क्योंकि उसके पिता कन्फयूज्ड थे और इसी मतिभ्रम के कारण उन्होंने आत्मदाह किया था। उन्हें किसी ने जलाया नहीं और मंत्री एकदम निर्दोष है।

अच्छा है कि उनके बेटे को समय पर सद्बुद्घि आ गई। और यह भी बेहतर हुआ कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने मतिभ्रम के शिकार पत्रकार जगेंद्र सिंह के मजिस्ट्रेट के समक्ष मृत्युपूर्व बयान को सही नहीं माना और इसी वजह से मंत्री को बर्खास्त नहीं किया। अब मेरी मुख्यमंत्री से अपील है कि कृपा करके मृत पत्रकार के परिवार को जो तीस लाख रुपये दिए गए हैं, वे तत्काल प्रभाव से वापस लिए जाएं और उनके परिवार के दो युवकों को किसी दया के आधार पर नौकरी नहीं दी जाए। इससे तो फिर यह साबित होगा कि सरकार स्वयं लोगों को आत्महत्या के लिए उकसाती है। उलटे उनकी आत्महत्या की जांच होनी चाहिए और परिवार से कड़ाई से पूछताछ की जानी चाहिए ताकि दूध का दूध पानी का पानी हो सके। 

यह भी तो संभव है कि परिवार की कलह की वजह से शाहजहां पुर के इस पत्रकार ने आत्महत्या की हो। मुख्यमंत्री जी आत्महत्या के आरोपी के परिवार के साथ दया दिखाना संविधान का अपमान है और कोई आम नागरिक अगर इस आधार पर सीबीआई जांच की मांग करे और सुप्रीम कोर्ट जाए कि यूपी सरकार ने आत्महत्या करने वाले पत्रकार के परिवार को तीस लाख रुपये कैसे दिए, तो कोई बड़ी बात नहीं। अगर मुख्यमंत्री महोदय को धन देना ही था तो सरकारी खजाने की बजाय पार्टी फंड से देते।

शम्भूनाथ शुक्ल के एफबी वाल से

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अमिताभ ने गृह सचिव से पूछा – एनआरएचएम, खनन के आरोपी बहाल हो सकते हैं तो वह क्यों नहीं !

लखनऊ : नौकरी से निलंबित आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर ने उत्तर प्रदेश सरकार से उनका निलंबन समाप्त कर उन्हें बहाल किये जाने की मांग की है. प्रमुख सचिव गृह को भेजे पत्र में उन्होंने कहा है कि 13 जुलाई का आरोप पत्र मिलने के बाद उन्होंने 16 जुलाई को अपना जवाब भेज दिया था जिसमे उन्होंने सभी आरोपों को आधारहीन बताया था. 

उन्होंने बताया है कि 20 जुलाई के पत्र के माध्यम से निर्णयकर्ता अधिकारी के रूप में मुख्यमंत्री से मिने का समय माँगा था. उनसे बिना कोई सरकारी काम लिए 81,350 रुपये प्रति माह दिया जा रहा है, जो उनके कुल वेतन रुपये 1,45,477 के आधे से भी अधिक है। इसके अलावा 01 अप्रैल 2013 से अब तक उन्हें कार्य मूल्यांकन में दस में आठ से नौ अंक मिल रहे हैं, जो बताते हैं कि उनका सरकारी काम बहुत अच्छा रहा है। 

ऐसे में बिना काम लिए इतना पैसा देना देना और कोई काम नहीं लेना लोकहित के विरुद्ध है. ठाकुर ने कहा कि जब सरकार ने एनआरएचएम के आरोपी प्रदीप शुक्ला और अवैध खनन के आरोपी इलाहाबाद कमिश्नर बी के सिंह और फ़तेहपुर डीएम राकेश कुमार को पिछले दिनों ही बहाल कर दिया तो उन्हें भी बहाल होने का पूरा अधिकार है.

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दलित अधिकारियों, कर्मचारियों की पदावनति के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट जायेगा आइपीएफ – दारापुरी

लखनऊ : पूर्व आईजी एवं आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट (आइपीएफ) के राष्ट्रीय प्रवक्ता एस. आर. दारापुरी ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा आरक्षण और परिणामी ज्येष्ठता के आधार पर सभी विभागों में पदोन्नति पाए दलित अधिकारियों और कर्मचारियों को पदावनत करने के फैसले पर गहरा दुःख व्यक्त किया है. उन्होंने कहा है कि इससे प्रदेश में लभगग 5000 दलित अधिकारी और कर्मचारी प्रभावित होंगे. प्रदेश सरकार के फैसले के खिलाफ आईपीएफ सुप्रीम कोर्ट जाएगा.

उन्होंने प्रेस को जारी अपने बयान में कहा है कि दरअसल सुप्रीम कोर्ट में अखिलेश और मायावती दोनों की सरकारों की लचर पैरवी के कारण पदावनत होने की स्थिति बनी है. केंद्र की मोदी सरकार भी पूर्ववर्ती मनमोहन सरकार की तरह ही इस सम्बन्ध में संसद में लंबित विधेयक को पारित नहीं करा रही है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश का बहाना बना कर अखिलेश सरकार पूरे तौर पर दलित विरोधी कार्रवाइयां कर रही है.

उन्होंने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के नागराज केस में आये निर्णय में यह कहा गया था कि सरकार जिन दलित जातियों को पदोन्नति में आरक्षण का लाभ देना चाहती है, उस के लिए सरकार उनके सामाजिक-शैक्षिक पिछड़ेपन, सरकारी नौकरियों में वर्तमान प्रतिनिधित्व तथा इसकी कुशलता पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में आंकड़े प्रस्तुत करे। उसे न तो उत्तर प्रदेश में दलितों की तथाकथित रहनुमा बनने वाली मायावती और न ही अखिलेश सरकार समेत राष्ट्रीय स्तर पर मोदी और मनमोहन सरकार ने किया. इस के फलस्वरूप लगभग प्रदेश में 5000 दलित अधिकारी/कर्मचारी प्रभावित होंगे. उन्होंने कहा कि आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट (आइपीएफ) दलितों के हितों की रक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट में जायेगा और शीघ्र ही प्रदेश स्तरीय सम्मलेन आयोजित करेगा जिसमें इस सम्बन्ध में संसद में लंबित बिल को पारित कराने के लिए आन्दोलन की रणनीति तय की जाएगी.

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हमीरपुर के बिंवार गांव में जो घटित हुआ, जान लीजिए

12वीं क्लास में पढ़ रही एक बेटी सुबह 7 बजे गावं में ही कोचिंग जा रही थी। उ. प्र. सरकार के दो रिश्तेदारों ने उसे सरेराह रोककर छींटाकसी की। कपड़े खीचे। बाल पकड़ कर खींचा। बेटी को तरह-तरह से बेइज्जत किया। पास में रहने वाली एक मुस्लिम महिला ने अपनी जान जोखिम में डाल कर बेटी को बचाया। वहां से छूट कर वो किसी तरह घर भागी। पिता और चाचा ने उसकी दुर्दशा देखी और उन गुंडों का पता करने निकल पड़े। उनके पीछे माँ भी उलाहना देने चल दी। इधर भीषण अपमान से आहत बेटी को कोई रास्ता न सूझा। उसने अपने ऊपर किरोसिन डाल कर आग लगा ली। पड़ोसी चिल्लाये, दौड़े तो आग बुझाई। माँ-बाप-चाचा उलटे पांव लौटे और बेटी को लेकर थाने भागे। थानेदार ने वाकया और अभियुक्तों का नाम सुनते ही वहां से भगाया तो वो कोई साधन लेकर मौदहा तहसील और फिर हमीरपुर जिला अस्पताल पहुंचे। जिला अस्पताल के गेट पर पहुंचते पहुंचते बेटी ने दम तोड़ दिया। 

यह बात उस गांव के निवासी और प्रलेस इलाहाबाद के अध्यक्ष प्रो संतोष भदौरिया को पता चली तो उन्होंने मुझे बताया। मैंने अपने पुराने साथी और TIMES NOW के य़ू पी के ब्यूरो प्रमुख प्रान्शु मिश्रा को बताया तो उनके सन्देश पर स्थानीय मीडिया के लोग अस्पताल गेट पर पहुंचे। मीडिया कर्मियों के बताने पर ASP और SDM भी वहीँ पहुँच गए। इधर बिंवार के साथ ही बांधुर, निवादा और सायर गांवों के 2-3 हजार लोग बिवार थाने के सामने जमा हो गए और अभियुक्तों को पकड़ने की मांग करने लगे। लेकिन दोनों दरिन्दे जीतेन्द्र यादव और भूरा यादव तो थानेदार के दलाल और गावं के ठाकुर प्रधान के घर में सुरक्षित थे।

जब बेटी के पिता और चाचा बेटी की लाश लेकर घर पहुंचे तो ग्रामीणों के गुस्से को संभालना मुश्किल था और वो बेटी को लाश को लेकर थाने के पास आ गए और अभियुक्तों को पकड़ने की मांग दोहराने लगे। जिले से पहुंची कई ट्रक पुलिस को यह मांग बहुत बुरी लगी। उसने लाठी भांजनी शुरू कर दी । ग्रामीणों ने पत्थर उठाये तो पुलिस की बंदूकें बारूद उगलने लगीं। रोहित, कालू खां और मईधर को गोली लगी। रोहित ने अस्पताल पहुंचने से पहले दम तोड़ दिया और कालू की हालत काफी गंभीर है जबकि मईधर के पैर में गोली लगी।

उसके पहले पुलिस की एक गाड़ी बेटी की लाश औए पिता, चाचा,मामा को लेकर जिले की और निकल गई, जहाँ लाश को जला दिया और उन तीनों पीड़ित परिजनों को मार-मार कर बेदम कर नेतागिरी न करने का पाठ पढाया। इधर रोहित की लाश को भी लेजाकर पुलिस ने यमुना में बहा दिया। जीतेन्द्र और भूरा और उनका बहनोई सत्ता पार्टी के जिलाप्रमुख की सुरक्षा में रह रहे हैं। चित्रकूट धाम की कमिश्नर, हमीरपुर की डी एम, मौदहा की SDM तीनों महिलाएं भी हैं। एक बेटी की यह दशा-कथा हुई। कहीं कोई कुछ भी हो लेकिन स्वामिभक्ति सर्वोपरि है।

सुधीर कुमार के एफबी वाल से

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यूपी में एक और पत्रकार पुलिस की साजिश का शिकार, पीजीआई में भर्ती

सहारनपुर (उ.प्र.) : एसओ के खिलाफ खबर लिखना पत्रकार को इतना मंहगा पड़ गया कि उसे अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। दुष्कर्म का मुकदमा कायम होने के बावजूद थानाध्यक्ष ने आरोपी को छोड़ दिया था। पीड़ित पत्रकार की तहरीर पर पुलिस ने कार्रवाई नहीं की, उल्टे धमकाया कि नतीजा भुगतने के लिए तैयार रहना। पुलिस के इशारे पर कस्बे के एक नेता ने पत्रकार पर अटैक कर दिया। उनके दो दांत टूट गए, जबड़े में फ्रैक्चर हो गया, आंख घायल हो गई, खून की दो उल्टियां हुईं। वह पीजीआई में भर्ती हैं।  

प्रदेश में पत्रकारों के खिलाफ लगातार पुलिस का रवैया वहशियाना बना हुआ है। जिले में एक और पत्रकार पुलिसिया साजिश का शिकार हो गया। पिछले महीने 13 जून को सहारनपुर के कसबा नानौता में छेड़छाड़ की घटना हुई थी। दैनिक हिंदुस्तान के रिपोर्टर अरविन्द सिसोदिया ने घटना की खबर छाप दी। 18 जून के अंक में खबर छपी। 20 जून को इसकी रिपोर्ट दर्ज करा दी गई। नानौता थानाध्यक्ष ने आरोपी को छोड़ दिया। जब ये भी समाचार प्रकाशित हो गया तो एसओ ने उसी दिन सिसोदिया को देख लेने की धमकी दी। 

उसके बाद कसबे के ही एक कथित नेता ने सिसोदिया के साथ मारपीट की। काफी गंभीर चोटें आई हैं। वह इस समय पीजीआई में भर्ती हैं। पहले तो यह कथित नेता समझौते के प्रयास करता रहा, लेकिन बाद में जैसे ही इसकी मुलाकात एसओ से हुई तो पूरी कहानी ही बदलती चली गई।

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यादव प्रकरण : सीबीआई जांच से हड़कंप, सरकार और नौकरशाहों में शह-मात का खेल

उत्तर प्रदेश की नौकरशाही में एक बार फिर इतिहास दोहराया जा रहा है। खनन माफिया से मोर्चा लेने के लिये अखिलेश सरकार से भिड़ने वाली आईएएस अधिकारी दुर्गा नागपाल की तर्ज पर ही पीसीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर और आईएएस अफसर सूर्य प्रताप सिंह ने भी मोर्चा खोल दिया है। दोनों नौकरशाह तो अखिलेश सरकार का कुछ खास नहीं बिगाड़ पाये हैं लेकिन सरकार ने दोनों के लिये ही मुसीबत खड़ी करते हुए दोनों के निलंबन का तानाबाना बुन दिया। सरकार की तरफ से आरोप लगाया जा रहा है कि उक्त अधिकारियों ने सरकार के खिलाफ जाकर सेवा नियमावली की अवहेलना की है, जबकि नौकरशाह कुछ और ही दलील दे रहे हैं। इन अधिकारियों को लगता है कि उन्होंने जनता से जुड़े मुद्दों पर आवाज उठा कर कुछ गलत नहीं किया। 

यह सोचने का अलग-अलग नजरिया है। सरकार को लगता है कि आईएएस/पीसीएस सरकार के सेवक हैं। सरकार के अच्छे-बुरे सभी कामों में उनको भागीदार होना चाहिए जबकि अधिकारियों का मानना है कि वह सरकार नहीं जनता के सेवक हैं, जनता के हित में आवाज उठाना किसी भी तरह से सरकारी सेवा नियमावली के खिलाफ नहीं हो सकता है। सरकार और दोनों अधिकारियों के बीच चूहे-बिल्ली का खेल चल रहा है। कभी किसी का तो कभी किसी का पलड़ा भारी लगता है। हां, इस बीच राज्य सरकार को नोयडा अथार्रिटी के मुख्य अभियंता यादव सिंह प्रकरण में जरूर हाईकोर्ट से झटका लगा है। हाईकोर्ट ने यादव सिंह प्रकरण की जांच सीबीआई से कराने का आदेश दिया है। यादव सिंह पर अरबों रूपये के घोटाले का आरोप है। ऐसा लग रहा है कि सरकार और नौकरशाहों के बीच शतरंत की बिसात बिछी हो और शह-मात का खेल चल रहा है।

उक्त सभी मामलों बस फर्क इतना था, नोयडा अथार्रिटी के मुख्य अभियंता यादव सिंह के प्रति अखिलेश सरकार का रवैया नरम रहा, परंतु अदालत का रूख सख्त रहा। बात सरकार से भिड़ने वाले नौकरशाहों की है तो उनकी तकदीर कुछ खास नहीं रही। पूर्व में आईएएस दुर्गा शक्ति नागपाल जब खनन माफिया के खिलाफ मोर्चा खोलकर अखिलेश सरकार के निशाने पर आई थीं तो आईएएस एसोसियेशन ही नहीं, तब की यूपीए की केन्द्र सरकार ने भी उनका पूरा साथ दिया दिया था, लेकिन आज स्थिति यह है कि आईएएस सूर्य प्रताप सिंह और आईपीएस अमिताभ ठाकुर दोनों को अपनी लड़ाई अकेले लड़नी पड़ रही है। दोनों नौकरशाहों को भी कहीं से कोई ठोस आश्वासन नहीं मिल रहा है। सिवाय इसके कि सोशल नेटवर्किंग पर उनके समर्थन में कुछ लोग आये आये हैं।

सबसे पहले बात आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर की, जिनकी सबसे अधिक चर्चा हो रही है। हमेशा  सुर्खियों में रहने वाले पुलिस अधिकारी अमिताभ ठाकुर 92 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं। 47 वर्षीय अमिताभ का जन्म उस वक्त बिहार के बोकारो में हुआ था। शुरूआती पढ़ाई बोकारो के केंद्रीय विद्यालय से पूरी करने के बाद आईआईटी कानपुर से इंजीनियरिंग किया। इसके बाद वह आईपीएस की परीक्षा में बैठे और उनका सेलेक्शन भी हो गया। आईपीएस बनने के बाद उन्हे यूपी के सात जिलों बस्ती, देवरिया,  बलिया, महाराजगंज, गोंडा ,ललितपुर और फीरोजाबाद में उन्हें एसपी के तौर पर तैनाती मिली। साल 2006 में फीरोजाबाद के एसपी रहे। इसी दौरान मुलयम सिंह यादव की नाराजगी के चलते इनका तबादला कर दिया गया। कभी किसी बड़े जिले में इन्हे कप्तान के तौर पर तैनाती नहीं मिली। साल 2006 में अमिताभ ठाकुर को डीआईजी और  2010 में आईजी के पद पर प्रमोशन मिलना था, लेकिन गोंडा में कप्तान रहते शस्त्र लाइसेंस में धांधली के मामले में विभागीय जांच इनके खिलाफ के चलते पिछले मायावती राज में इनको पांच साल तक कोई प्रमोशन नहीं दिया गया। 

इसके बाद अमिताभ मामले को साल 2011 में  कैट  में ले गए। एक लम्बी लड़ाई लड़ी और आखिरकार अखिलेश सरकार ने साल 2013 में इनका डाइरेक्ट प्रमोशन एसपी से आईजी के पद पर कर दिया। प्रमोशन के बाद ठाकुर को आईजी रूल्स मैन्युअल बनाया गया, जिसके बाद अमिताभ का तबादला आईजी सिविल डिफेंस के पद पर कर दिया गया। नौकरी के दौरान कई गैर विभागीय कामों में शामिल होने के आरोप ठाकुर पर बराबर ही लगते रहे। इन्होंने कई आरटीआई  सरकारी कार्यों के लिए दाखिल की, कई पीआईएल किये, जिनमें कुछ में कोर्ट की फटकार भी सुनने को मिली। अमिताभ ठाकुर पर आरोप लगता रहा है कि कई मामले जो इनके विभाग से जुड़े नहीं थे, उनमें खुद जांच करने चले जाते थे। कई विरोध प्रदर्शनों में भी इन्होंने जमकर हिस्सा लिया।

बात यहीं तक सीमित नहीं थी। अमिताभ ने सरकार की कार्यप्रणाली को लेकर भी कई शिकायतें की, अवैध खनन के मामले को लेकर इन्होंने यूपी सरकार के मंत्री गायत्री प्रजापति की शिकायत लोकायुक्त से की और बाद में कोर्ट के जरिये उनके खिलाफ मामला भी दर्ज करा दिया। परिवार में पत्नी नूतन ठाकुर, एक बेटा और बेटी हैं। नूतन खुद वकील, आरटीआई कार्यकर्ता और सामाजिक कार्य से भी जुड़ी रहती हैं। ठाकुर के बच्चे भी कई मामलों को लेकर अदालत का दरवाजा खटखटा चुके हैं। अमिताभ ठाकुर और अखिलेश सरकार के बीच लम्बे समय से रिश्तों में खटास पड़ी थी। यह खटास तब चरम पर पहुंच गई, जब अमिताभ ठाकुर ने सपा प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव का एक टेप ही जारी कर दिया, जिसमें मुलायम सिंह आईपीएस अमिताभ ठाकुर से सख्त लहजे में बात कर रहे थे। इस टेप के सामने आने के बाद ही अमिताभ ठाकुर के बुरे दिन शुरू हो गये। अमिताभ के विरूद्ध चल रहे एक पुराने रेप केस, जिसकी फाइल बंद कर दी गई थी, उसे दोबारा खोल दिया गया। वहीं सेवा नियमावली की अवहेलना करने के कारण उन्हें चार्ज शीट भी सौंप दी गई है। उम्मीद की जा रही है कि आईपीएस अमिताभ ठाकुर को अपनी लड़ाई लम्बे समय तक लड़नी पड़ सकती है।

आईएएस अफसर सूर्य प्रताप सिंह के खिलाफ भी अखिलेश सरकार ने शिकंजा कस दिया है। सूर्य प्रताप सिंह पर नौकरी के नियम तोड़ने का आरोप लगाते हुए राज्य सरकार ने उन्हें चार्जशीट थमा दी है। पिछले कुछ वक्त से आईएएस अफसर सूर्य प्रताप सिंह सामाजिक मुद्दों को लेकर सक्रिय हैं और कई बार सरकारी कामों को लेकर भी आवाज भी उठा चुके हैं। फिलहाल सूर्य प्रताप सिंह प्रमुख सचिव के पद पर हैं। पहले यूपी में नकल को लेकर भी इन्होंने आंदोलन चलाया था ताकि प्रदेश में नकल माफिया पर लगाम लगाकर यूपी में नकल रोकी जा सके। इसको लेकर कई बार सूर्य प्रताप ने यूपी के मंत्री, अधिकारियों को भी  कटघरे में खड़ा किया था। ये माना जा रहा है जिस प्रकार अमिताभ ठाकुर के खिलाफ कार्रवाई हुई है। ठीक वैसी ही कार्रवाई आईएएस सूर्य प्रताप सिहं के खिलाफ भी होगी।

उधर, यूपी कैडर के आईएएस सूर्य प्रताप सिंह ने  16 जुलाई 2015  को एक फेसबुक पोस्ट से सीधा सरकार पर हमला बोला। उन्होंने फेसबुक में अपनी वॉल पर लिखा, सुनो सर जी, मार डालो पर….. डराओ मत, सर जी….।सूर्य प्रताप ने साथ ही ये भी लिखा कि पूर्वाग्रह ग्रस्त प्रचार से उनका मानसिक उत्पीड़न हो रहा है और ये कलंकित करने की कोशिश है। उन्होंने इसे गंभीर दर्द भरा और पीड़ादायक भी करार दिया। 

बहरहाल, एक तरफ दो नौकरशाह अपनी कार्यशैली के चलते सरकार के निशाने पर हैं तो दूसरी तरफ जनता के लिये अच्छी खबर इलाहाबाद हाईकोर्ट से आई है, जिसने यादव सिंह प्रकरण की जांच सीबीआई से कराये जाने का आदेश दिया है। यादव सिंह प्रकरण की सीबीआइ जांच से नेता-नौकरशाहों के बीच बने नापाक रिश्तों का पर्दाफाश हो सकता है। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने 16 जुलाई 2015  को यादव सिंह प्रकरण में सीबीआइ जांच का आदेश दिया है। नोयडा अथार्रिटी के पूर्व मुख्य अभियंता यादव सिंह पर आरोप है कि उन्होंने सरकारी पदों पर रहते हुए छद्म नामों और कंपनियों को महंगे भूखंडों का सस्ते में आवंटन किया। बाद में भूखंड सहित कंपनियां बेचकर रकम बनाई। करीब तीन सौ भूखंडों की हेराफेरी की गई और 40 से अधिक फर्जी कंपनियां बनाई गईं। आयकर जांच में भी उनके पास आय से अधिक संपत्ति मिली है। सीबीआइ जांच को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यादव सिंह के सिर पर कई सफेदपोश लोगों का हाथ था। 

वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार से संपर्क : ajaimayanews@gmail.com

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पत्रकारों के सम्मान की रक्षा का संघर्ष जारी रहेगा : आईजेए

बिल्थरारोड (उ.प्र.) : पत्रकारों के सम्मान और उनकी रक्षा के लिए इंडियन जर्नलिस्ट एसोसिएशन सदैव संघर्ष करता रहेगा और मीडियाकर्मियों के हित में चलाये गए हर मिशन में हमें पूरी सफलता भी मिलेगी लेकिन यह तभी संभव है, जब क्षेत्र का हर पत्रकार अपना व्यक्तिगत द्वेष छोड़कर एक हो। 

बिल्थरारोड इंडियन जर्नलिस्ट एसोसिएशन की बैठक में मौजूद राष्ट्रीय अध्यक्ष सेराज अहमद कुरैशी व अन्य पत्रकार

ये बातें इंडियन जर्नलिस्ट एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष सेराज अहमद कुरैशी ने शाम कहीं। वह एसोसिएशन की बलिया इकाई के पदाधिकारियों के बीच आई कार्ड वितरण कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि बोल रहे थे। बैठक में एसोसिएशन के जिला इकाई एवं तहसील इकाई के सभी पदाधिकारियों को राष्ट्रीय अध्यक्ष सेराज अहमद कुरैशी ने आई कार्ड प्रदान किया और सभी पदाधिकारियों को एसोसिएशन की मजबूती हेतु पूरी निष्ठा के साथ कार्य करने की अपील की। 

एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने भी संगठन की मजबूती हेतु अपने-अपने सुझाव दिए। एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष को स्मृति चिह्न प्रदान कर बलिया के पदाधिकारियों ने सम्मानित किया। बैठक को जिला उपाध्यक्ष अंजनी राय व शीतल प्रसाद, सचिव नवीन मिश्र, संगठन सचिव डारु मोहन चंद्र गुप्त, तहसील अध्यक्ष चंद्रप्रताप सिंह बिसेन, वेद प्रकाश शर्मा, महेश बरनवाल, मृत्युंजय तिवारी, अमरनाथ गुप्त, धनंजय शर्मा आदि ने संबोधित किया। संचालन विजय मद्धेशिया ने किया।

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यादव सिंह मामले की सीबीआई जांच यूपी सरकार के भ्रष्टाचार की पोल खोलेगी

डॉ. नूतन ठाकुर : मेरे द्वारा इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में दायर पीआईएल पर नॉएडा के इंजीनियर यादव सिंह मामले की सीबीआई जाँच के आदेश हो गए. अखिलेश सरकार ने सीबीआई जांच रोकने को एड़ी-चोटी लगा लिया और स्वयं महाधिवक्ता कई दिन इसका विरोध करते रहे पर अंत में कोर्ट ने मेरी प्रार्थना स्वीकार की. यह स्थिति अखिलेश सरकार की वास्तविक भष्ट लोगों के प्रति सहानुभूति को दिखाता है. अब ये जांच यूपी सरकार के भ्रष्टाचार की पोल खोलेगी.

समाचार अंग्रेजी में पढ़ें –

Lucknow bench of Allahabad High Court in my PIL against Noida engineer Yadav Singh. Detailed order not obtained presently. Akhilesh government tried its best to avoid CBI enquiry and Advocate General himself opposed CBI transfer tooth and nail but Court agreed to my prayer. This shows the respect of Akhilesh government for corrupt officials. 

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लोहिया के सपनों को तोड़ता मुलायम का नव-समाजवाद

अजीब व्यवस्था है जिसमें कोई गायत्री प्रजापति  या कोई राममूर्ति वर्मा अवैध खनन के आरोप के बावजूद हमारा रहनुमा बना रहता है पर इनके गैर-कानूनी हरकतों के खिलाफ आवाज उठाने वाला आई आई टी से पढ़ा भारतीय पुलिस सेवा का अधिकारी अमिताभ ठाकुर बलात्कार का आरोप झेलता इस बात पर निलंबित हो जाता है कि राज्य छोड़ने के लिए राज्य के पुलिस प्रमुख से इजाजत नहीं ली थी. उत्तर प्रदेश के समाजवादी शासन में लगभग हर दूसरे मंत्री पर हत्या से लेकर बलात्कार, भ्रष्टाचार या अवैध खनन के मुकदमें हैं. पर यादव सिंह फलता –फूलता है और दुर्गा शक्ति नागपाल या अमिताभ ठाकुर सजा के हकदार होते हैं.     

हमने एक संविधान बनाया था. जिसके तहत “एक सम्पूर्ण प्रभुत्व संपन्न समाजवादी पंथ-निरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य ….. आत्मार्पित किया” था. अपने लगभग ३८ साल की पत्रकारिता के प्रथम १४ सालों तक मुलायम सिंह यादव को एक जिद्द की हद तक नैतिक और जुझारू समाजवादी नेता के रूप में देखा था. लेकिन बाद के २४ सालों में देखने की बाद आज समझ में नहीं आ रहा है कि समाजवाद के मूल सिद्धांत बदल गए या हमारी समझ दकियानूसी हो गयी और हमने प्रजापतियों, राजा भैय्याओं या अन्ना शुक्लाओं में महान डा. राम मनोहर लोहिया का अंश देखना बंद कर दिया. इन २४ सालों में ७५ वर्षीय मुलायम सिंह यादव का समाजवाद यहाँ तक पहुँच गया कि “नेताजी” को अमिताभ ठाकुर को रास्ते पर लाने के लिए प्रजापतियों वाले स्टाइल में “प्यार” से समझाना (जिसे अमिताभ ठाकुर समाजवाद की जानकारी न होने के कारण धमकाना मान रहे हैं) पडा. लोहिया के असफल होने और मुलायम के सफल होने में शायद यही मूल कारण है. समाजवाद को नए प्रयोगों से गुजरने की कला डॉ साहेब नहीं सीख पाए थे. लोहिया के ज़माने में संविधान की प्रस्तावना में समाजवादी और पंथ-निरपेक्ष शब्द नहीं जोड़े गए थे और इन शब्दों को आपातकाल के दौरान इंदिरा गाँधी ने ४२वें संशोधन के तहत जोड़ा. अगर लोहिया नौ साल और जिंदा रह गए होते तो जान पाते कि सेक्युलर (पंथ –निरपेक्ष) का नया मतलब क्या होता है. आरोपी किसी भी सम्प्रदाय का हो भेद –भाव न करते हुए उसे अगर “समर्थ” है तो मंत्री बनाया जा सकता है और समाजवाद का नया मतलब होता है किसी अनुसूचित जाति के यादव सिंह या किसी राममूर्ति वर्मा को मात्र आरोपों के आधार पर हटाना समाजवाद के नए सिद्धांतों के खिलाफ है. बल्कि नव-समाजवाद का मानना है कि अगर इसे परिपुष्ट करना है तो एक-दो  साल की नौकरी वाली आई ए एस अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल जैसे समाजवाद विरोधी अफसरों को जो बालू  माफियाओं के खिलाफ जिहाद छेड़ती हो, रास्ते से हटाओ , जो अमिताभ ठाकुर फिरोजाबाद का पुलिस अधीक्षक के रूप में पिटाई करने वाले समाजवादी पार्टी के विधायक और “नेताजी” के निकट रिश्तेदार के खिलाफ मात्र ऍफ़ आई आर करने की जुर्रत करता हो और  जिसकी एक्टिविस्ट पत्नी किसी मंत्री प्रजापति के खिलाफ अवैध खनन का केस लिखवाती हो उस अधिकारी को  “प्यार” से उस पिटाई की याद दिलाओ ताकि यह बेलगाम अफसर नए समाजवाद की ‘मुख्य-धारा” में लौट आये. आखिर भटकों को वापस लाना भी तो “नेताजी” के नव-समाजवादी वात्सल्य का हीं तो हिस्सा है.       

लोहिया ने अपनी पुस्तक “इंटरवल ड्यूरिंग पॉलिटिक्स” में व्यक्ति की प्रतिष्ठा को सर्वोपरि रखा है उसे हीं समाजवाद का स्रोत माना. फिर उनके खांटी अनुयायी के रूप में “नेताजी” ने मात्र एक उद्दंड अधिकारी को “प्यार” से डांटा हीं तो. आखिर पत्रकार को जला कर कर मारने के आरोपी मंत्री राममूर्ति वर्मा की भी तो कोई प्रतिष्ठा है! क्यूं डाला इस अफसर अमिताभ ठाकुर ने उस पत्रकार का मृत्यु-पुर्व बयान सोशल मीडिया पर ? क्या लोहिया की आत्मा दुखी नहीं होगी कि बगैर अंतिम अदालत के द्वारा दोषी कहे किसी मंत्री का मान-मर्दन किया जाये. यही समाजवाद तो लाया जा रहा है जिसमें सत्ता में बैठे हर मंत्री या सन्तरी का हर कुकर्म पहले “दूध का दूध , पानी का पानी “ के शाश्वत भाव वाली “एक जांच” की अग्नि परीक्षा से गुजरे और तब तक कोई अमिताभ या कोई मीडिया इस बात को न उठाये वर्ना नव समाजवाद के सिद्धांत के तहत जलाया भी जा सकता है और सेवा से निलंबित भी किया जा सकता है. और जब “नेताजी” का नव-उदारवाद के प्रति रुझान इतना दृढ है तो राज्य के पुलिस प्रमुख को भी बगैर बताये एक आई जी का राज्य छोड़ दिल्ली जा कर केन्द्रीय गृह मंत्रालय में अपनी रक्षा की गुहार लगना भी तो मर्यादा का उल्लंघन है. ऐसे हीं अफसरों की तो ज़रुरत है जो मर्यादा को नव-समाजवादी पैमाने के आधार पर समझें. यादव सिंह पर करोड़ों हडपने का आरोप पर निलंबन महीनों तक नहीं. लेकिन अमिताभ ठाकुर का दिल्ली जाना अक्षम्य अपराध. यहीं है नव-समाजवाद. 

 गाडी पर समाजवादी पार्टी का झंडा लगाये लोकल नेता कहीं बलात्कार कर रहे हैं तो कहीं पुलिस को मार रहे हैं, कहीं पुलिस थाने में बलात्कार कर रही है और कहीं बलात्कार का आरोप न लगे तो जला कर मार दे रही है. बलात्कार के बाद जला कर मारना आसन है क्योंकि मरने के बाद उसे पुलिस द्वारा ढूढ़ पानी अलग किया जाएगा और बलात्कारी पुलिस वाला बाख जाएगा. आज से २५ साल पहले तक समाजवाद का लम्पटीकरण या लम्पटों का समाजीकरण इस हद तक नहीं था बल्कि रिपोर्टर के रूप में हम लोग मुलायम सिंह में उभरता लोहिया देखते थे. आज का नव –समाजवाद यह तस्दीक करता है कि जन-धरातल पर अपने ज़माने के बेहद क्रांतिकारी सिद्धांत भी किस तरह घिनौनी राजनीति के बोझ तले  दम तोड़ते हैं और अपने ज़माने के युवा क्रांतिकारी नेता किस तरह अपने में धीरे –धीरे बदलाव कर सिद्धांत को अवनति की ओर ले जाता है. 

पुलिस अधिकारी अमिताभ को भी समझाना होगा कि एक सड़ गए सिस्टम से सिस्टम में रह कर लड़ना संभव नहीं है. ऐसा सिस्टम अपने बचाव के लिए प्रोटोकॉल या कंडक्ट रूल से उन सबको बांध देता है जो सिस्टम के अन्दर है. अमिताभ पत्रकार जागेन्द्र सिंह का मृत्यु –पूर्व बयान तो ले सकते है पर उसे सोशल मीडिया पर नहीं डाल सकते जब तक उनके कन्धों पर संप्रभुता का प्रतीक अशोक का  लाट रहता है. संवैधानिक व्यवस्था के तहत सरकार विधायिका के प्रति जवाबदेह है लेकिन अफसरशाही नहीं. लिहाज़ा दिन में तीन बार ट्वीट करके सरकार की बखिया उधेड़ना संवैधानिक रूप से गलत है. जब तक जनता प्रजापतियों को बहुमत देती रहेगी यह सिस्टम सड़ता रहेगा. अगर सुधार करना है तो जनता की उस समझ को जो अपराधियों में अपने राबिनहुड देखती है.     

अगर समाज बदलने का जज्बा है, अगर इस सड़े सिस्टम को बदलने के लिए कुछ भी करने की जिद है तो इस सिस्टम के बाहर आ कर हीं लड़ सकते हैं अन्दर रह कर नहीं. 

लेखक एन के सिंह वरिष्ठ पत्रकार एवं ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन (BEA) के महासचिव से हैं

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मुलायम को अमिताभ की पहली शह

अमिताभ ठाकुर की मुलायम सिंह यादव को पहली शह। अरबों रुपए के घोटाले में फंसे नॉएडा के इंजीनियर यादव सिंह को मुलायम सिंह और उन के पुत्र अखिलेश यादव लगातार बचाते रहे । पर अमिताभ ठाकुर की पत्नी नूतन ठाकुर द्वारा दायर पी आई एल पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने यादव सिंह मामले की सीबीआई जांच के आदेश जारी कर दिए । 

ज़िक्र ज़रूरी है कि अमिताभ ठाकुर को दी गई चार्ज शीट में एक आरोप यह भी है कि वह पी आई एल बहुत करते हैं । जनहित के मुद्दों पर अगर सरकार आंख मूंदेगी , भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे लोगों को बचाने के लिए सारी ताकत लगा देगी , अपने कुकर्मों पर परदे डालने के लिए मीडिया को खरीद लेगी तो अमिताभ ठाकुर जैसे लोगों को , सूर्य प्रताप सिंह जैसे लोगों को जिन की आत्मा अभी मरी नहीं है , सामने आना ही होगा । 

कोई सरकार , कोई सिस्टम इन को नहीं रोक सकता । ज़िक्र ज़रूरी है कि सूर्य प्रताप सिंह को भी अखिलेश सरकार ने कल चार्ज शीट थमा दी है। कहां तो सरकारों को ऐसे ईमानदार अफसरों को शासन में जगह दे कर , इज़्ज़त दे कर उन का बेस्ट लेना चाहिए । कहां इन को प्रताड़ित किया जा रहा है सच कहने के लिए । सूर्य प्रताप सिंह ने सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप खुल कर और प्रमाण सहित लगाए हैं । वह भी फेसबुक पर । सरकार के पास उन के सवालों का कोई जवाब नहीं है । कोई काट नहीं है तो उन पर बेवकूफी के बचकाने आरोप लगा कर सस्पेंड कर रही है , चार्ज शीट दे रही है। सरकार कटघरे में है , यह अधिकारी नहीं । बताईये कि अखिलेश सरकार कि नज़र में यादव सिंह पाक साफ लेकिन अमिताभ ठाकुर और सूर्य प्रताप सिंह दोषी ! अजब है यह भी !

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अमिताभ-मुलायम प्रकरण : वक्त है, संभल जाइए ‘सरकार’ !

सपा सरकार के साथ यह परेशानी शुरू से ही रही है कि जब-जब उसकी सरकार बनी है, तब-तब प्रदेश में क़ानून व्यवस्था बिगड़ने व उनकी ही पार्टी के लोगों के निरंकुश हो जाने के आरोप उस पर लगे हैं। साथ ही ‘अपनों’ को ‘उपकृत’ करने के आरोप भी लगते ही रहे हैं। युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से लोगों को उम्मीद थी कि वे हालात को कुछ काबू कर पाएंगे किन्तु दुर्भाग्यवश ऐसा हो न सका और उनका स्वागत भी प्रदेश में विभिन्न स्थानों पर सिलसिलेवार तरीके से हुई हिंसक घटनाओं ने किया, जिसमें जान-माल का ख़ासा नुकसान हुआ। प्रदेश की स्थिति सुधारने को युवा मुख्यमंत्री ने कई अच्छे प्रयास किए किन्तु उनके अपनों ने ही उनके अच्छे कामों पर पलीता लगाने का काम किया और उन्हें मुसीबत में डाल दिया। 

उत्तर प्रदेश के वर्तमान हालात किसी से छुपे नहीं हैं। पुलिस और प्रशासनिक निरंकुशता पर हाल ही में लगातार दो अलग-अलग मामलों पर सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने नाराजगी जताते हुए तल्ख टिप्पणी की है। राज्यपाल भी कई बार अपनी नाराजगी जता चुके हैं। अपनी धुन में लगे आईएएस सूर्यप्रताप सिंह और आईपीएस अमिताभ ठाकुर जैसे अफसर भी “खुलासा बम” फोड़-फोड़कर इनकी परेशानियों को कम नहीं होने दे रहे।

पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रम की बात करें तो शाहजहांपुर में पत्रकार की मौत पर गंभीर आरोपों के घेरे में आयी सरकार अभी संभल भी न पायी थी कि कोठी (बाराबंकी) में पुलिसकर्मियों द्वारा एक महिला के साथ लूट, बलात्कार का प्रयास व जलाकर हत्या कर दिए जाने की बात सामने आई, जिसने सरकार को फिर मुसीबत में डाल दिया। यह मामला सुलझ पाता, उससे पहले ही तेज-तर्रार आईपीएस अमिताभ ठाकुर को कथित रूप से सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह द्वारा कुछ पुराने वाकये याद दिलाते हुए “सुधर जाने” की सलाह वाले फोनकॉल ने एक नया बखेड़ा खड़ा कर दिया। 

जिस पुराने वाकये की याद दिलाई गयी, उसके बारे में कहा जाता है कि ये अमिताभ व सपा सुप्रीमो के एक बेहद नजदीकी के बीच की तनातनी से जुड़ा था, जिसमें सपा सुप्रीमो के नजदीकी द्वारा अमिताभ के साथ अभद्रता की गयी थी और पलटवार करते हुए अमिताभ ने भी सपा सुप्रीमो के उस नजदीकी के माथे पर पसीना ला दिया था। अमिताभ उस समय फिरोजाबाद के एसपी हुआ करते थे। बाद में सपा सुप्रीमो के हस्तक्षेप पर ही मामला शांत हुआ था। खैर, अपने बगावती तेवरों के लिए मशहूर आईजी ठाकुर अपने कमेंट और कामों को लेकर कई बार विवादों में रहे हैं और यूपी सरकार, प्रशासन से जुड़े कई मुद्दों पर अपनी बेबाक राय देकर सरकारी व्यवस्था पर कई बार उंगली उठा चुके हैं। अपने इन्ही तेवरों के कारण वे जनता की नज़र में हीरो व सरकार की आँखों की किरकिरी बनते हैं।

शाहजहांपुर के पत्रकार का मृत्युपूर्व बयान लेकर भी वे विवादों में घिरे और कहा गया कि आखिर वे किसके आदेशों पर वहाँ पहुंचे और बयान रिकॉर्ड किया। ताजा प्रकरण में भी सपा सुप्रीमो की फोनकॉल को अमिताभ ने रिकॉर्ड कर लिया और रिकॉर्डिंग मीडिया व सोशल मीडिया के माध्यम से लीक कर दी। अमिताभ यहीं नहीं रुके, बल्कि सपा सुप्रीमो के विरूद्ध खुद को धमकाने का आरोप लगाते हुए एफआईआर लिखाने थाने जा पहुँचे, जहाँ इनकी शिकायत लेकर जांचोपरांत कार्रवाई की बात कह इन्हें लौटा दिया गया। अमिताभ की एफआईआर तो नहीं लिखी गयी लेकिन इसी दिन अमिताभ के विरूद्ध एक महिला के साथ दुष्कर्म का मामला दर्ज कर लिया गया और साथ ही साथ इनकी पत्नी को भी इसमें साजिश रचने का आरोपी बनाया गया, जबकि इसी दुष्कर्म वाले मामले में कुछ दिन पहले ही स्वयं व अमिताभ को झूठा फंसाए जाने की साजिश रचने के आरोप में नूतन ठाकुर ने हाईकोर्ट लखनऊ में याचिका दायर कर मंत्री गायत्री प्रसाद प्रजापति व यूपी महिला आयोग की अध्यक्ष जरीना उस्मानी समेत आठ लोगों पर मुकदमा दर्ज करवाया था। 

ऐसे में अब नूतन ठाकुर का आरोप है कि चूँकि उन लोगों के द्वारा प्रदेश के खनन मंत्री के खिलाफ मोर्चा खोला गया है, इसलिए उन्हें प्रताड़ित करने के उद्देश्य से सपा सरकार द्वारा यह सब किया जा रहा है। अमिताभ का भी यही आरोप है कि सपा सुप्रीमो की उनसे नाराजगी की वजह यही प्रकरण है और इसी कारण उन्हें फोनकॉल आया था। अपनी व अपने परिजनों की सुरक्षा को लेकर चिंताग्रस्त अमिताभ अपनी व्यथा सुनाने गृहमंत्रालय के अधिकारियों के पास जा पहुँचे और जहाँ उन्होंने राज्य पुलिस के प्रति अविश्वास जातते हुए अपने लिए केन्द्रीय बल की सुरक्षा की अपील की। यह बात शायद राज्य सरकार को नागवार गुजरी और अमिताभ को अनुशासनहीनता, शासन विरोधी दृष्टिकोण, हाईकोर्ट के निर्देशों की अनदेखी, अपने पद से जुड़े कर्तव्यों एवं दायित्वों के प्रति उदासीनता तथा नियमों के उल्लंघन आदि जैसे आरोपों में तत्काल प्रभाव से निलंबित कर डीजीपी कार्यालय से सम्बद्ध कर बिना पूर्व अनुमति के मुख्यालय छोड़कर जाने पर रोक लगा दी गयी।

सुनने में यह सब बिलकुल फ़िल्मी कहानी की तरह लगता है लेकिन यह कहानी नहीं, सच है। एक ओर सपा मिशन-2017 के तहत प्रदेश में पुनः ‘साइकिल दौड़ाने’ की सोच रही है, वहीं दूसरी ओर इनके द्वारा दी जाने वाली एकतरफा अतिशीघ्र प्रतिक्रियायें जनता और अधिकारियों के बीच एक गलत सन्देश दे रही हैं। जैसे-जैसे 2017 नजदीक आ रहा है, सपाइयों द्वारा अराजक व्यवहार (अभद्रता, मारपीट, बेवजह हंगामा, आपराधिक गतिविधियों में संलिप्तता आदि) जैसी ख़बरें भी सुर्ख़ियों में आ रही हैं जोकि जनता में एक नकारात्मक सन्देश दे रही हैं। 

इसी प्रकार हत्या, हत्या के प्रयास, बलात्कार और जमीनों पर कब्जों जैसे गंभीर मामलों में भी पुलिस द्वारा उदासीन रवैया अपनाये जाने से भी जनता में आक्रोश बढ़ रहा है, जो 2017 में वोट के माध्यम से बाहर आता दिख सकता है। लेकिन यहाँ अधिकारी नेताओं से संपर्कों के सहारे मस्त से लगते हैं और नेता आलाकमान में अपनी पैठ के सहारे। बच गया वह आम इंसान, जो वोट देकर सरकार बनवाता है इस उम्मीद के साथ कि सरकार उसकी समस्याओं के निराकरण हेतु कुछ करेगी लेकिन तमाम योजनाओं और सुविधाओं में भी हिस्सा “पहुँच वाले” मार ले जाते हैं और यह आम इंसान ठगा सा रह जाता है। 

प्रदेश का हाल इसी से समझ लीजिए कि यहाँ स्वयं आईपीएस अधिकारी अपनी जान को खतरे में बताता है और अपने ही विभाग पर अविश्वास जताता है! अधिकारी अपनी एफआईआर कोर्ट के माध्यम से दर्ज करवा पाता है, जबकि उसके विरुद्ध आसानी से मुकदमा दर्ज हो जाता है। ऐसे में एक आम इंसान क्या झेलता होगा, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। आईएएस-आईपीएस लॉबी किसी भी सरकार के लिए रीढ़ की हड्डी की तरह काम करती है, जिससे प्रदेश में व्यवस्था ठीक-ठाक चलती रहे लेकिन अगर इस रीढ़ की हड्डी में ही चोट लग जाए तो व्यवस्था का चरमराना भी स्वाभाविक है। और ऐसे में सबकुछ जानते हुए भी अगर कोई स्वयं ही हथौड़ा लेकर अपने चोट मारने लगे तो क्या किया जाए? हम तो बस इतनी गुजारिश कर सकते हैं – वक्त है, संभल जाइए ‘सरकार’।

लेखक शिवम भारद्वाज से संपर्क : shivambhardwaj1989@gmail.com

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जगेंद्र के घर वालों को धमका रहे आरोपी, पीएम से गुहार, पूरा परिवार यूपी छोड़ने की फिराक में

शाहजहांपुर (उ.प्र.) : जिंदा जलाकर मारे गए पत्रकार जगेन्द्र सिंह के परिवार को धमकाया जा रहा है। घटना की सीबीआई जांच करने की मांग करते हुए जगेंद्र के बेटे राहुल ने पिछले दोनो सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है। तभी से परिवार पर दबाव डाला जा हा है कि वे समझौता कर लें अन्यथा उनके साथ अच्छा न होगा। बताया जा रहा है कि जगेंद्र के दोनो बेटे पिछले कई दिनो से लापता हैं। उनका कोई पता नहीं चल रहा है। जगेन्द्र के पिता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिख कर सुरक्षा और न्याय की गुहार लगाई है। 

गौरतलब है कि शाहजहांपुर के खुटार निवासी जुझारू पत्रकार जगेंद्र सिंह को अपनी निर्भीक पत्रकारिता के कारण जिंदा जलाकर मार दिया गया था। हत्याकांड में प्रदेश के मंत्री राममूर्ति वर्मा, थाना प्रभारी समेत कई लोग आरोपी हैं।

निर्ममतापूर्ण तरीके से मारे गए पत्रकार जगेंद्र सिंह का परिवार इन दिनो उत्तर प्रदेश में सत्तासीन पार्टी के स्थानीय नेताओं के आतंक में जी रहा है। मीडिया में मामला लगभग शांत हो जाने के बाद अब अपराधी फिर सिर उठाने लगे हैं। उनके परिवार को आरोपी धमका रहे हैं। परिवार इतनी दहशत में है कि उत्तर प्रदेश छोड़कर कहीं और जाकर बस जाने का मन बना रहा है। 

आंतक से सहमे जगेंद्र के पिता ने प्रधानमंत्री से गुहार लगाई है कि उनके परिवार को सुरक्षा देने के साथ ही उनके बेटे को मार डालने के मामले में न्याय दिलाया जाए। उनके बेटे ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई है कि घटना की सीबीआई जांच कराई जाए। मामले के आरोपी परिवार पर दबाव बनाते हुए कह रहे हैं कि समझौता कर लो वरना अच्छा न होगा। पूरा स्थानीय प्रशासन आरोपियों के इशारे पर चुप्पी साधे हुए है। इन्ही हालात में जगेंद्र दोनो बेटों ने डर कर गांव छोड़ दिया है। चार पांच दिनों से उनका कोई अता-पता नहीं चल रहा है। 

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सुप्रीम कोर्ट स्वत: संज्ञान लेकर अमिताभ ठाकुर को राज्य की प्रताड़ना से बचाए

सर्वोच्च न्यायालय से गुहार. यूपी के आईजी अमिताभ ठाकुर के मामले में दखल दीजिए. सरकार की प्रताड़ना से बचायें, वरना सभी जनवादी और लोकतंत्र के नायक कालकोठरी में होंगे. अब जरा भी देरी न्यायिक प्रक्रिया का मजाक बना देगी. यूपी सरकार से भरोसा उठ रहा है. सुप्रीम कोर्ट से आस है. पूरा मामला देश के लोकतंत्र और कानूनी प्रक्रिया का माखौल उड़ाते साफ दिख रहा है. अब तो हर पत्रकार और अफसर को डर लगने लगा है कि जो यूपी सरकार के खिलाफ आवाज उठायेगा, वो फर्जी मुकदमे झेलेगा, जेल जायेगा. ये देश की सबसे बड़ी अदालत, अब जनता इंसाफ के लिए आप की तरफ टकटकी लगाये बैठी है. दखल दीजिए. 

यूपी के बेहद संवेदनशील आईपीएस के अफसर हैं अमिताभ ठाकुर. कसूर मात्र इतना कि नौकरी के अलावा भी समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी मानते हैं. गलत बातों को रोकने के लिए आम नागरिक की तरह आवाज उठाते हैं. इस काम में पत्नी, बेटा और बेटी भी शामिल है. लेकिन सरकार तो सरकार होती है. अपनी तौहीन कैसे बर्दाश्त करे. 

अपने काम से काम रखो, दुनिया जले तो जले. कुछ ऐसी ही छुपी नसीहत यूपी सरकार के सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने फोन के जरिए सीधे आईजी अमिताभ ठाकुर को दे डाली. जिसकी शिकायत जब आईजी ठाकुर पुलिस थाने में करने गये तो यूपी सरकार का भड़कना तय था. लाद दिया रेप का केस. आनन-फानन में पुराने मामले में एफआईआर दर्ज की. दिखा दिया एक आईजी को उसकी औकात.

वो केस, जिसमें तथाकथित पीड़ित महिला की बेटी ने एक न्यूज चैनल पर साफ-साफ बोली कि मेरा परिवार समाजवादी पार्टी से जुड़ा है. लेकिन इस पीड़ित महिला की बेटी को ना तो इतनी बड़ी घटना के बारे में मालूम था ना ही अमिताभ ठाकुर के बारे में. असल में ये मामला खनन मंत्री गायत्री प्रजापति के कथित संरक्षण में अवैध खनन से जुड़ा है. जिसके बारे में आईजी ठाकुर ने आम आदमी की तरह से आवाज उठाई. मामला सुर्खियां में आया तो करीब 3-4 महीने पहले षड़यंत्र के तहत एक तथाकथित पीड़ित महिला ने बलात्कार का आरोप लगाया जिसके वर्तमान पता-ठिकाने के बारे में केवल समाजवादी पार्टी के लोग ही जानते हैं. क्योंकि मामला सामने आते ही महिला गायब हो गई. लेकिन मीडिया में फर्जी मामले को तूल पकड़ते देख यूपी पुलिस ने भी महिला की शिकायत को एक किनारे कर दिया. 

लेकिन सत्ता के तेवर देखिए, सारे के सारे पुलिस अफसर पस्त हो गये. आईजी ठाकुर की शिकायत पर तो एफआईआर नहीं हुई, लेकिन आईजी ठाकुर पर एफआईआर जरूर हो गई. यूपी का पुलिस महकमा भी अंदर से शर्मिंदा हुआ होगा. यूपी में कैसा जंगलराज चल रहा है. किस कारण लोकतांत्रिक प्रक्रिया के कट्टर समर्थक मुलायम सिंह यादव एक आईजी को धमकाने लगे. एक बार भी लोक-लाज के चलते मुलायम सिंह यादव ने इस बात का भी खंडन नहीं किया कि उन्होंने अमिताभ ठाकुर को धमकी नहीं दी. और तो और धमकी-चेतावनी नहीं मानने आईजी पर जड़ दिया गया रेप का मुकदमा. 

अब आईजी अमिताभ ठाकुर किससे इंसाफ मांगे? क्या करें जब मेड़ ही खेत को खाने लगे. ठगे गये अमिताभ ठाकुर. कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी ढोने वाले ठाकुर अब उसी व्यवस्था की खामी के शिकार हो गये. इंसाफ की दरकार है कि सुप्रीम कोर्ट सारे मामले को स्वत: संज्ञान में लेते हुए राज्य की प्रताड़ना से एक संवेदनशील और समाज के प्रति जागरूक अफसर को बचाये. अन्यथा किसी भी बड़ी अनहोनी से इंकार नहीं किया जा सकता है.

वरिष्ठ पत्रकार प्रसून शुक्ला के फेसबुक वॉल से

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यूपी, बिहार के व्यापम की तस्वीर तो और अधिक भयावह

जो कुछ “व्यापम” नाम से मध्य प्रदेश में हुआ और जो अन्य प्रदेशों में भी दूसरे नामों, दूसरे प्रकारों, दूसरी सीमा तक हो रहा है वह भयावह है । बिहार में एक बार में ही चौदह सौ अध्यापक स्वयं नौकरी छोड़ ग़ायब हो गये । ये सब अवैध ढंग से नौकरी में आये थे । उत्तर प्रदेश में एक चौथाई प्राइमरी स्कूलों में डुप्लीकेट अध्यापक तैनात हैं (नौकरी किसी के नाम है पढ़ाने कोई और आता है)।

देश के सबसे मशहूर और प्रतिष्ठित दिल्ली के सेंट स्टीफ़न्स कालेज के प्रिसिंपल वालसन थम्पू की पी एच डी की डिग्री के जाली होने के आरोप हैं। वह इलाहाबाद के झूँसी स्थित किसी डीम्ड यूनिवर्सिटी से ली हुई है और theology पर है !

दिल्ली राज्य सरकार का क़ानून मंत्री जाली डिग्री के आरोप में जेल में हैं और केन्द्रीय मंत्रिमंडल समेत राजस्थान महाराष्ट्र के दर्जनों मंत्रियों की Affidavit पर दी गई शैक्षणिक सूचनाएँ ग़लत हैं !

देश की शिक्षा मंत्राणी (एच आर डी मिनिस्टर) कुल सेकंडरी स्तर की शिक्षित हैं और बाकी सब अंड बंड है । वे मोदी जी की “राष्ट्रभक्ति”की प्रतीक हैं कि मोदी जी को देश के जुवाओं की कितनी चिंता है !

देश के आध्यात्मिक नेता आसाराम हैं, उनका अपना व्यापम है जो राष्ट्रव्यापी है । उनके कुकर्मों के गवाह या तो स्वर्ग में ठेले जा चुके हैं या हड्डियाँ तुड़वा चुके हैं, कुछ छुपते घूम रहे हैं । इनकी चरित्र पंजिका डा० सुब्रह्मण्यम स्वामी की यूनिवर्सिटी से जारी हुई है ” आसाराम निर्दोष हैं !”

देश में 90% आबादी की प्राथमिक शिक्षा ऊपर वर्णित कारकुनों के हवाले है । क़रीब ७०% सेकंडरी शिक्षा का भी यही हाल है और क़रीब ९०% उच्च शिक्षा केन्द्र इस हाल में हैं कि वे न भी होते तो सिर्फ ये फ़रक पड़ता कि तमाम स्नातक/परास्नातक/पी एच डी सेकेंडरी पास कहलाते जैसे शिक्षा मंत्राणी !

प्रधानमंत्री परदेस गये हैं और मैं क्या अनाप शनाप भाख रहा हूँ भोरइ भोर ।

शीतल पी सिंह के एफबी वाल से

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पुलिस बर्बरता और अपराधियों को संरक्षण दे रही यूपी सरकार – रिहाई मंच

 लखनऊ : रिहाई मंच ने बाराबंकी में पत्रकार की मां के साथ थाने में बलात्कार करने के प्रयास में विफल होने के बाद एसओ राय साहब यादव और एसआई अखिलेश राय द्वारा जिंदा जला दिए जाने की घटना को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा बलात्कारी व अपराधी पुलिस अधिकारियों को खुला संरक्षण देने का नतीजा बताया है। मंच ने कानपुर में सपा उत्तर प्रदेश उद्योग व्यापार संगठन कानपुर ग्रामीण का बोर्ड लगे मकान के अंदर सेक्स रैकेट के खुलासे और उसमें सपा नेता दीपक गुप्ता की गिरफ्तारी के बाद सपा के मंत्रियों, सांसदों, विधायकों और नेताओं के फार्म हाउसों तथा रिसार्ट पर छापा मारने की मांग की है।

रिहाई मंच नेता राजीव यादव ने कहा कि शाहजहांपुर में पत्रकार को जिंदा जला देने के बाद बाराबंकी में पत्रकार की मां के साथ थाने में बलात्कार करने का प्रयास और जिंदा जला देने की घटना साफ करती है कि प्रदेश के थाने बलात्कार करने के सेंटर में तब्दील हो चुके हैं। प्रदेश की राजधानी लखनऊ में सपा से जुड़े कुछ प्रापर्टी डीलरों के लड़कों द्वारा कानपुर की कक्षा 10 की एक छात्रा के साथ 40 दिन तक बलात्कार होता है और जब 22 जून को लड़की बलात्कारियों अनिल यादव उर्फ पोलू यादव व उसके भाई अजित यादव पुत्र रामसिंह ग्राम कल्ली, व अनिल यादव के साले दिनेश यादव और पिंटू यादव पुत्र रामनरेश यादव उर्फ घुरू यादव ग्राम फत्तेखेड़ा, थाना मोहनलालगंज के ठिकानों से किसी तरह भागकर 100 नम्बर पर फोन करती है तब भी हफ्तों बाद एफआईआर दर्ज किया जाना और मेडिकल न होना साफ तौर से बलात्कारियों को बचाने का प्रदेश की पुलिस का खुला एलान लगता है। 

इसीलिए समाज देखता है कि कैसे सपा सरकार की पुलिस बलात्कार के आरोपियों को पकड़ने के बाद उनसे पैसे लेकर उन्हें छोड़ देती है। उन्होंने आरोप लगाया कि जो मुलायम सिंह यादव बलात्कार को बच्चों की भूल कहते हैं उनकी लखनऊ के एसएसपी कार्यालय में फोटो लगना ही पूरे प्रदेश के बलात्कारियों को बलात्कार करने की खुली छूट का संदेश है। उन्होंने कहा कि एसएसपी को पुलिस कार्यालय की गरिमा को धूमिल नहीं करना चाहिए और अगर वे मुलायाम सिंह यादव के प्रति इस ओहदे पर बैठाए जाने के कारण कृतज्ञता व्यक्त करना चाहते हैं तो उन्हें उनकी तस्वीर अपने घर में लगानी चाहिए न कि कार्यालय में। अखिलेश यादव को बताना चाहिए कि उनके सरकार के विज्ञापनों या सरकारी आफिसों में उनके पिता और पत्नी की तस्वीरें किस हैसियत से लगाई जा रही हैं। रिहाई मंच नेता ने पत्रकार की मां के हत्यारे पुलिस अधिकारियों की गिरफ्तारी की मांग करते हुए इस घटना समेत पूरे सूबे में हो रही महिलाओं के साथ हिंसा पर उच्च स्तरीय जांच आयोग गठित करने की मांग करते हुए आगामी मानसून सत्र में महिलाओं की सुरक्षा पर विवेश सत्र आहूत करने की मांग की।

रिहाई मंच प्रवक्ता शाहनवाज आलम ने मांग की कि प्रदेश के थानों, एसएसपी कार्यालय और मुख्यमंत्री कार्यालय समेत विभिन्न सरकारी दफ्तरों समेत सपा के कार्यलयों में सीसीटीवी कैमरा लगाकर सड़क पर स्क्रीन लगाई जाए। उन्होंने कहा कि अखिलेश यादव को यह भ्रम त्याग देना चाहिए कि स्वजातीय अराजक व अपराधी तत्वों का संरक्षण कर वे जातीय ध्रुवीकरण करने में सफल हो जाएंगे। हमारा समाज और संस्कृति  महिलाओं को सम्मान देता है इसलिए बलात्कार की ऐसी घटनाओं के खिलाफ पूरा समाज जाति और धर्म से ऊपर उठकर अपराधियों की इस सरकार का मुहतोड़ जवाब देगा। रिहाई मंच प्रवक्ता ने राज्य महिला आयोग व सपा की महिला विधायकों और सांसद डिंपल यादव की चुप्पी पर सवाल उठाते हुए कहा कि उन्हें स्पष्ट करना चाहिए कि वे सूबे की महिलाओं के मान-सम्मान के साथ खड़ी है या फिर सपा के लंपट और महिला विरोधी सरकार के साथ।

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पत्रकार मुझसे यूपी की खराब कानून व्यवस्था की शिकायत करते हैं : राज्यपाल नाइक

अजय कुमार : उत्तर प्रदेश के 28 वें राज्यपाल राम नाईक को कार्यभार ग्रहण किए एक वर्ष हो चुका है। अब तक उनके कई फैसलों पर विवाद भी हो चुका है। वह कहते हैं, पत्रकारों ने भी मुझसे यूपी की बिगड़ी कानून व्यवस्था की शिकायत की है। मैंने भी कई बार मुख्यमंत्री से कानून व्यवस्था पर शिकायत की है। 

उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाइक से बातचीत करते वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार

राज्यपाल का कहना है कि अखिलेश समझदार नेता हैं, उनसे कुछ अच्छा करने की उम्मीद हमेशा बनी रहती है। सरकार का करीब साढ़े तीन वर्षो का कार्यकाल बीत चुका है। इस आधार पर कहा जाये तो सरकार को कई मोर्चों पर सुधार करना होगा। मैंने कई बार मुख्यमंत्री से मुलाकात के दौरान प्रदेश की बिगड़ी कानून व्यवस्था पर शिकायत की है। वह भी चिंतित हैं। यह एक बड़ी समस्या है। कई बार पत्रकारों ने हमसे कानून व्यवस्थता की शिकायत की है। लखनऊ का ही बुरा हाल, पूरे प्रदेश के बारे में क्या कहा जाये। लूटपाट की बढ़ती घटनाएं, महिलाओं का उत्पीड़न,  बलात्कार, एसिड अटैक, हत्याओं के अलावा साम्प्रदायिक रूप से भी माहौल खराब हो रखा है। जाम की समस्या, फुटपाथों पर कब्जा, अतिक्रमण की खबरें आये दिन समाचार पत्रों की सुर्खियां बनती रहती हैं। शिकायत लिखाने के लिये सीधा-साधा व्यक्ति थाने जाने में डरता है। पुलिस को जनता का विश्वास हासिल करना होगा। मेरी सबसे बड़ी चिंता अपराधों में अवैध हथियारों को लेकर है। इस बारे में पुलिस को भी सोचना चाहिए।

सत्तारूढ़ दल के अपराधियों से निकटता के प्रश्न पर उन्होंने कहा कि मैं, इस पर कोई कमेंट नहीं करूंगा। यह राजनैतिक ज्यादा है। अपराधी, अपराधी होता है। समय-समय पर अपराध के खिलाफ व्यापक अभियान चलाये जाने की जरूरत है। जनता को विश्वास हो जाये कि अपराधी किसी भी पार्टी और यहां तक की सत्तारूढ़ दल के करीबी ही क्यों न हो, उसे सख्त से सख्त सजा होगी तो अपराधिक प्रवृति के लोगों के हौसले पस्त होंगे।

विधान परिषद सदस्यों के मनोनयन के संबंध में उन्होंने कहा कि सरकार ने मनोनयन के लिये जो नौ नाम भेजे हैं, उनमें से चार को मंजूरी दे दी है। बाकी पांच नामों को लेकर हमने चिंता जताई है। सरकार से दो बार स्पष्टीकरण मांग चुका हॅू। सरकार ने स्पष्टीकरण तो दिया, लेकिन मैं इससे संतुष्ट नहीं हूं। मैंने, जिन पांच नामों को मंजूरी नहीं दी है उनके खिलाफ अलग-अलग करीब दो सौ शिकायतें मिली हैं। राजभवन स्वयं इसकी जांच नहीं करा सकता है।

लोकायुक्त मामले पर राज्यपाल का कहना था कि मैं, काफी समय से यह मामला उठा रहा हॅू। सीएम को पत्र भी लिखा। पत्र के साथ सुप्रीम कोर्ट का वह आदेश भी लगाया था, जिसमें कोर्ट ने लोकायुक्त और उप लोकायुक्त की नियुक्ति छह वर्षों के लिये किये जाने के निर्देश दिये थे। अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया है। 

प्रदेश की नौकरशाही के तौर तरीकों पर उन्होंने कहा – यहां के नौकरशाहों के बारे में आम धारणा यही है कि वह सत्ता के इशारे पर काम करते हैं। अगर नौकरशाह कोई अच्छा सुझाव देता है तो उसे सरकार को मानने में परहेज नहीं करना चाहिए। शासन-प्रशासन में विरोध जरूरी है।  

प्रदेशवासियों के मंहगी बिजली-पानी के संकट से जूझने के सवाल पर राज्यपाल ने कहा कि बिजली की बहुत ज्यादा आवश्यकता है। बताते हैं कि बिजली विभाग में काफी भ्रष्टाचार फैला हुआ है। कई जगह बिजली वितरण में गड़बड़ी  है। जब तक कठोर निर्णय नहीं लिये जायेंगे, बिजली की समस्या हल नहीं होगी। बिजली चोरी को रोकना और उत्पादन बढ़ाना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए।

पत्रकार अजय कुमार से संपर्क : 9335566111, ajaimayanews@gmail.com

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जरा सुनो तो सर जी, हमे तो टीवी पर आने का चस्का है, मार ही डालोगे क्या !

हम पर कार्रवाई तो जरूर करें सर जी.. हम तैयार हैं, परन्तु ये तो बता दें कि 2011 के पीसीएस अंतिम परिणाम की संलग्न सूची में कुल चयनित 86 एसडीएम में 54 एक ही जाति के कैसे आ गए ? अनिल यादव पर करम और हम पर सितम, रहने दे अब थोडा सा धरम, सर जी ! हम तो सरकार के एक दीगर कारिन्दा है। हमें तो कभी भी कुचल सकते हो। चलो, हमे तो टीवी पर आने का चस्का है, मार ही डालोगे क्या। 

जनसामान्य तो ‘प्रेम चंद’ का ‘होरी’ है और रहेगा, न जाने आने वाली और कितनी सदियों तक परन्तु अनिल यादव पर इतनी मेहरबानी क्यों? उसके खिलाफ तो आपराधिक मामले हैं। पैसे लेकर व जाति विशेष की आँख मूंद कर भर्ती करने के आरोप हैं। जरा जांच तो करा लो सर जी। यादव सिंह पर इतना करम क्यों। जेल तो भेज देते, सर जी। आगरा में शैलेन्द्र अग्रवाल के खुलासे में दो पूर्व डीजीपी को भी जेल भिजवा देते।  शाहजहांपुर में पत्रकार को जलाने के आरोपी पापी आरोप मंत्री तथा एआरटीओ को पीटने वाले मंत्री को जरा सा बर्खास्त ही कर देते, सर जी।

खनन माफिया तो लोकायुक्त से भी छूट गए। उन्हें भी हटा देते। जरा सा, हां जरा सा, जरा सी ही तो कार्रवाई की मांग कर रहे हैं सर जी। रोज-रोज हो रहे बलात्कारों के आरोपियों को जेल भेज दो। छवि बन जाएगी ‘प्रेमचंद’ के होरी के भगवान की। सही बता रहे हैं सर जी। 

यह वार्तालाप पता है, किसका किससे से हो रहा है? ‘प्रेमचंद’ की कहानी ‘गुल्ली-डंडा’ के दो पात्रों के बीच उपरोक्त वार्तालाप हो रहा है। कोई और समझकर भ्रमित न हों। एक पात्र है शाहूकार का बेटा ‘गया’ प्रसाद (सत्ता पक्ष) तथा दूसरे का कोई नाम नहीं दिया। अतः मैंने उसको ‘बेनामी’ ( पीड़ित वर्ग) कहा है। साहित्य की भाषा समझो सर जी। एक काल्पनिक पात्र है। उपरोक्त वार्तालाप को अंग्रेजी में ‘Self-talking’ (Talking -to-Myself) भी कहते हैं, जो सामान्यतः विवशतावश अपने मन को समझाने के लिए किया जाता है, वही तो कर रहा हूँ, और क्या करूँ।

वरिष्ठ आईएएस सूर्यप्रताप सिंह के एफबी वाल से 

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यूपी में 12 आईपीएस और नौ पीपीएस अफसरों का स्थानांतरण

लखनऊ : उत्तर प्रदेश सरकार ने 12 आईपीएस और नौ पीपीएस अफसरों के तबादले किए हैं. इनमें डीजी स्तर के छह आईपीएस अफसर और इतने ही एडीजी स्तर के आईपीएस अधिकारी शामिल हैं. ट्रांसफर किए गए वरिष्ठ आईपीएस अफसरों में दो नाम ऐसे भी शामिल हैं जिन्हें अभी दो दिन पहले तक प्रदेश के डीजीपी पद का दावेदार गिना जाता था. बरेली के एसपी सिटी राजीव मल्होत्रा को हटा दिया गया है लेकिन उनके स्थान पर उन्हीं समीर सौरभ को लाया गया है जिन्हें अभी कुछ समय पहले ही एसपी सिटी आगरा के पद से एक स्पा सेंटर की संचालिका से लाखों रूपये की वसूली के विवादास्पद मामले में हटाया गया था.

आईपीएस अधिकारियों में उत्तर प्रदेश अग्निशमन सेवाओं के महानिदेशक प्रवीण सिंह को महानिदेशक सीबीसीआईडी बनाया गया है. पुलिस महानिदेशक (दूरसंचार) डॉ. सूर्य कुमार को पुलिस महानिदेशक अभियोजन के पद पर तैनात किया गया है. अब तक पुलिस महानिदेशक अभियोजन का काम देख रहे राम नारायण सिंह को पुलिस महानिदेशक भ्रष्टाचार निवारण संगठन में स्थानान्तरित कर दिया गया है. पुलिस महानिदेशक प्रशिक्षण सुबेश कुमार सिंह को आर्थिक अपराध शाखा (ईओ डब्ल्यू) में पुलिस महानिदेशक बनाया गया है.

भ्रष्टाचार निवारण संगठन में अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक जीपी शर्मा को उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन में अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक बनाया गया है.अग्निशमन सेवाओं में अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक वीरेन्द्र कुमार को अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक दूरसंचार बना दिया गया है.

आगरा के एएसपी क्राइम प्रेम चन्द्र को अलीगढ़ की 45 वीं वाहिनी पीएसी में उप सेनानायक बनाया गया है. अलीगढ़ की 45 वीं वाहिनी पीएसी में उप सेनानायक के पद पर तैनात आनन्द कुमार को आगरा में अपर पुलिस अधीक्षक (अपराध) बनाया गया है.

गाजियाबाद के माडर्न पुलिस कन्ट्रोल रूम में अपर पुलिस अधीक्षक कमलेश बहादुर को आगरा में क्षेत्रीय अभिसूचना का अपर पुलिस अधीक्षक बनाया गया है. उत्तर प्रदेश पुलिस भर्ती बोर्ड एवं प्रोन्नति बोर्ड लखनऊ के अपर पुलिस अधीक्षक तेज स्वरूप सिंह को मेरठ में एसपी (क्राइम) बनाया गया है.

इटावा की 28 वीं वाहिनी पीएसी में उप सेनानायक महात्मा प्रसाद को इटावा में एएसपी (क्राइम) बनाया गया है. पुलिस महानिदेशक कार्यालय से सम्बद्ध समीर सौरभ को बरेली में अपर पुलिस अधीक्षक (नगर) बनाया गया है. बरेली के एसपी सिटी राजीव मल्होत्रा को गाजियाबाद में पीएसी की 41 वीं वाहिनी का उप सेनानायक बनाया गया है.

पुलिस अकादमी मुरादाबाद में अपर पुलिस अधीक्षक देवेन्द्र भूषण को पीटीसी मुरादाबाद में अपर पुलिस अधीक्षक बनाया गया है. गाजियाबाद में 41 वीं वाहिनी पीएसी में उप सेनानायक श्रीमती किरन यादव को गाजियाबाद के माडर्न पुलिस कन्ट्रोल रूम में अपर पुलिस अधीक्षक बनाया गया है.

प्रतीक्षारत महानिदेशक आलोक प्रसाद को पुलिस महानिदेशक अग्निशमन सेवाओं का चार्ज दिया गया है. मानवाधिकार आयोग में पुलिस महानिदेशक श्रीमती सुतापा सान्याल को वहीं पर रोक दिया गया है.

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फेसबुक पर आपत्तिजनक टिप्पणी की बीएसपी ने की शिकायत, सात पर रिपोर्ट

बहराइच (उ.प्र.) : फेसबुक पर धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाली टिप्पणी लिखने पर पुलिस ने विपुल शाह सहित सात युवकों के खिलाफ आईटी अधिनियम और भारतीय दंड संहिता की धारा 153 बी , 295 ए के तहत प्राथमिकी दर्ज कर ली है। 20 जून को आरोपी के फेसबुक एकाउंट पर यह सामग्री पोस्ट की गई, जिसे छह अन्य युवकों ने पसंद किया या उस पर टिप्पणी की। 

बीएसपी नेता शारिक खान की अगुवाई में समुदाय विशेष के लोगों ने कोतवाली में फेसबुक पर पोस्ट सामग्री के खिलाफ शिकायत की थी। फेसबुक और ट्विटर पर कमेंट करने या लाइक करने की वजह से कई विवाद हुए । जिसमें गिरफ्तारियां भी हुई। ताजे मामले में यूपी के बहराइच में 7 युवकों को गिरफ्तार किया गया है। हालांकि पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में आईटी सेक्शन की धारा 66ए को रद्द कर दिया था। 

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि संविधान की धारा 19(1)(a) और 19(2) का उल्लंघन नहीं किया जा सकता है लिहाजा आईटी की धारा 66ए गैरसंवैधानिक है। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद बहराइच का मामला बेहद नया है। 

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पत्रकार जगेन्द्र की मौत की जांच रिपोर्ट जल्द, दोषी के खिलाफ कठोर कार्रवाई होगी : अखिलेश

समाजवादी पार्टी का युवा चेहरा अखिलेश यादव दोहरी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। वर्ष 2017 के विधान सभा चुनाव पार्टी अखिलेश को आगे करके ही लड़ने का मन बना रही है। प्रदेश में कानून व्यवस्था का बुरा हाल है। उनके मंत्रियों पर भी भ्रष्टाचार-दबंगई के आरोप लग रहे हैं। इन मुद्दों पर वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार की मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से बातचीत- 

उत्तर प्रदेश में पत्रकार त्रस्त हैं, आरोप आपके मंत्री पर हैं ?

मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। इसे कमजोर या फिर दबाया नहीं जा सकता है। अगर आपका इशारा शाहजहांपुर में जल कर मरे पत्रकार के मामले की तरफ है तो पीड़ित परिवार के साथ मेरी पूरी सहानुभूति है। जगेन्द्र के परिवार को तीस लाख की आर्थिक मदद, दो बच्चों को सरकारी नौकरी, पत्नी को समाजवादी पेंशन और उसकी जमीन को बाहुबलियों से कब्जा मुक्त कराने का आदेश दे दिया है। पत्रकारों का उत्पीड़न किसी भी दशा में बर्दाश्त नहीं किया जायेगा। राजनीति में इस तरह के आरोप लगते रहते हैं। जांच निष्पक्ष रूप से चल रही है। जांच से पहले केवल आरोप के आधार पर किसी को दंडित या गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है। पूर्व में भी आरोपों के चलते हमने अपने मंत्रियों राजा भैय्या और पंडित सिंह से इस्तीफा लिया था, लेकिन जांच में वह बेकसूर निकले। बदांयू कांड में भी ऐसा ही हुआ था। आरोप कुछ लगे थे और जांच में कुछ और खुलासा हुआ था। पत्रकार जगेन्द्र की मौत की जांच रिपोर्ट जल्द ही आयेगी, जो भी दोषी होगा, उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई होगी।

क्या सरकार सही दिशा में जा रही है ?

यह मैं कैसे बताऊं। मेरे संतुष्ट होने न होने से कोई बड़ा फर्क नहीं पड़ता है। वैसे सरकार की सफलता का पैमाना यही होता है कि जिस योजना का वह उदघाटन करे, उसे समय रहते पूरा कर ले।आज से पहले ऐसा कभी नहीं हुआ,लेकिन अब ऐसा हो रहा है।सरकार से अधिक जनता को सतुष्ट होना चाहिए। मैं मुख्यमंत्री बना था तब मेरे पास शासन-प्रशासन का कोई अनुभव नहीं था,सिवाय इसके की मैंने एक राजनैतिक परिवार में जन्म लिया था,लेकिन मैंने इस बात की परवाह नहीं की।मैं राजनीति में पाने के लिये नहीं, कुछ करने के लिये आया था।काम के प्रति मेरी निष्ठा में न तो तब कमी थी, न आज है।मैं अपना काम पूरी ईमानदारी से करता हूं। इसी लिये आधी बाधाएं तो वैसे ही दूर हो जाती हैं। मेरी नियत साफ है।मैं इसे ऊपर वाले का आशीर्वाद मानता हूं। जनता से किये गये वायदे पूरा करना मेरा कर्तव्य ही नहीं राजनैतिक धर्म भी है, जिसे मैं निभा रहा हूं।

जनता सतुष्ट है ?

इसका कोई पैमाना नहीं है। सर्वे सरकार के पक्ष में आ रहे हैं। इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है कि विरोधी भी सरकार के कामकाज की तारीफ कर रहे हैं।

आपका इशारा मोदी जी की तरफ?

मेरी कोई प्रशंसा नहीं कर रहा है। प्रशंसा मेरे काम की हो रही है। विरोधियों को मुझमें कोई कमी नहीं दिख रही है इसलिये उन्हें प्रशंसा तो करनी ही पड़ेगी। इसे अन्यथा नहीं लिया जाना चाहिए। केन्द्रीय उर्जा और स्वास्थ्य मंत्री ने भी प्रदेश में हो रहे विकास के काम की सराहना की है।

मोदी विदेश बहुत घूम रहे हैं ?

कुछ सोचते हुए,जब मैं कहता हॅू कि देश में निवेश को बढ़ावा देने के लिये इस तरह को विदेशी दौरे आवश्यक हैं तो हमारे विरोधी कहने लगते हैं कि वह(अखिलेश यादव)खुद विदेश में घूमते रहते हैं तो पीएम पर कैसे उंगली उठायेंगे। ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में हम अपने तक सिमट कर नहीं रह सकते हैं।दौरों के चलते ही देश और प्रदेश में विदेशी निवेश आ रहा है।बसपा राज में उद्योगपतियों ने यूपी से किनारा कर लिया था,अब ऐसा नहीं है।प्रदेश में आद्योगिक विकास का माहौल बन रहा है।मोदी जी भले ही मेरी तारीफ करते हों,लेकिन मै प्रधानमंत्री से संतुष्ट नही हॅू।

कारण ?

बहुत क्लीयर है। प्रधानमंत्री बनने के समय उन्होंने कहा था कि मैं न तो खाऊंगा,न खाने दूंगा। उनकी चार-चार ‘देवियों’ पर उंगली उठ रही है। जरा-जरा सी बात पर ट्वीट करने वाले मोदी से इस मुद्दे पर भी मैं ट्वीट की उम्मीद तो कर ही सकता हूं।

विधान सभा चुनाव का समय करीब आ रहा है ?

हमारे लिये चुनाव चिंता का विषय नहीं हैं। हमने काम करके दिखाया है। लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी की हालत खस्ता है। कई उप-चुनाव हार चुकी है।उसके पास कोई ऐसा चेहरा नहीं है जिसे वह सीएम के रूप में आगे कर सके,इसलिये मोदी के नाम पर राज्य में चुनाव लड़ने की बात हो रही है।

आपका मुकाबला किससे है ?

मुकाबले में कोई नजर नहीं आ रहा है। बसपा-भाजपा अपने नेताओं की तानाशाही के कारण रसातल में जा रही हैं। कांग्रेस का मनोबल टूटा हुआ है।

मिशन 2017 पर जल्दी काम शुरू हो गया ? 

इसमें बुराई क्या है। पिछले तीन-साढ़े तीन वर्षो में हम जनता के विश्वास पर खरे उतरे हैं।सरकार ने पढ़ाई, दवाई और सिंचाई मुफ्त की है। वूमेन पवर लाइन 1090, यमुना एक्सप्रेस वे, जन कल्याणकारी योजनाओं की जानकारी प्राप्त करने के लिये यूपीन्यूज.इन का पोर्टल, लखनऊ में मेट्रो, प्रतिभाशाली छात्र-छात्राओं को लैपटाप योजना, बेटियों की शिक्षा और विवाह लिये योजनाएं, गरीबों के लिये लोहिया आवास, समाजवादी पेंशन योजना, विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिभाशाली बच्चों का सम्मान, प्रदेश के बुजुर्गो के लिये समाजवादी श्रवण यात्रा,बेरोजगारों के लिये स्किल डेवलेपमेंट प्रोग्राम, नये मेडिकल कालेज, महिला सुरक्षा कोष का निर्माण, बिना केन्द्र की मदद के आपदाग्रस्त किसानों को चार हजार करोड़ रूपये बांटना जैसी तमाम कल्याणकारी और विकासपरक योजनाएं ही हमें पुनः सत्ता में वापस लायेंगी। शुरू में जो लोग हमारी लैपटाप योनना को झुनझुना बता रहे थे, वह ही लोग अब वाई-फाई की बात कर रहे हैं।

सीएम के ऊपर चार-साढ़े चार सीएम और सुपर सीएम की चर्चा…..?

मुस्कुराते हुए। शुरूआती दौर में विरोधियों ने राजनैतिक फायदे के लिये ऐसा प्रचार किया था। उन्हें लगता था जरा सा लड़का क्या प्रदेश चलायेगा। इसी वजह से उन्हें यह कहने का मौका मिल गया कि मैं तो मुखौटा मात्र हॅूं, लेकिन अब क्या इस तरह की चर्चा होती है ? जो भी निर्णय लेता हॅू उस पर कठोरता से अमल करवाता हॅू। मैं मुख्यमंत्री हूं, इसका मतलब यह नहीं है कि मैं भी अन्य नेताओं की तरह अहंकारी हो जाऊं। मेरी विनम्रता को लोग कमजोरी समझते हैं तो समझते रहें।

सरकार पर आरोप लगते हैं कि वह गुंडे-माफिया को संरक्षण देती है? विरोधियों का नारा है,‘जिस गाड़ी पर सपा का झंडा, समझो बैठा उसमें…..?

यह सही नहीं है। विरोधी भ्रामक प्रचार कर रहे हैं। मैंने या मेरी सरकार ने कभी  अपराधियों को संरक्षण दिया, न कभी दूंगा। इस दौरान जितने अपराधी जेल की सलाखों के पीछे गये, वह एक रिकार्ड है। ऐसे आरोपों में सच्चाई कम, राजनीति ज्यादा होती है, जिनके दामन खुद दागदार हैं, वह ही दूसरों पर उंगली उठाते हैं। पिछले शासनकाल में एक आईएएस ने आत्महत्या की। चिकित्साधिकारियों की हत्याएं हुईं। उस समय के तमाम भ्रष्टाचारी आज जेल में हैं। इनके खिलाफ जांच चल रही है। तमाम अपराधिक किस्म के लोगों के पुलिस से बचने के लिये पार्टी के झंडे का दुरूपयोग करने की मुझ तक शिकायतें आई हैं। ऐसे लोगों के विरूद्ध कार्रवाई का आदेश जारी किये जा रहे हैं। अब केवल अधिकृत पदाधिकारियों के अलावा कोई नेता या कार्यकर्ता सपा का झंडा लगाकर गाड़ी में नहीं घूमेगा। अनधिकृत रूप से पार्टी का झंडा लगाकर घूमने वालों के खिलाफ अभियान चलाया जायेगा।

विरोधियों का कहना है कि प्रदेश में जंगलराज जैसे हालात हैं ?

हां, पहली नजर में ऐसा लगता है कि प्रदेश की कानून व्यवस्था कुछ खराब है। हमने पुलिस के आला अफसरों को सख्त हिदायत दी है कि किसी भी मामले में एफआईआर लिखने में जरा भी हीलाहवाली न की जाये। बसपा राज में क्या होता था, सब जानते हैं। भुक्तभोगी को रिपोर्ट लिखाने के लिये अदालत के चक्कर लगाने पड़ते थे। फिर भी हम निश्चिंत होकर नहीं बैठे हैं। अपराध कहां नहीं हो रहे हैं, लेकिन यूपी को लेकर ज्यादा ही चर्चा की जाती है। गुंडों-माफिया की पार्टी में कोई जगह नहीं है। ऐसी शिकायतें मिलने पर कई लोगों के खिलाफ कारवाई तो हो ही रही है, उन्हें पार्टी से बाहर का भी रास्ता दिखा दिया गया है।

कुछ दार्शनिक अंदाज में मुख्यमंत्री एक संत की कथा सुनाते हैं। संत महात्मा प्रवचन दे रहे थे। इसी बीच एक भक्त के सवाल का समाधान करने के लिये वह तेजी से खड़े हुए और मंच पर लगी सफेद चादर पर पेंसिल से एक छोटा सा गोला बिना दिया। इसके बाद उन्होंने बारी-बारी से कई भक्तों से प्रश्न किया,‘ उन्हें क्या दिखाई दे रहा है, ‘सब ने एक ही उत्तर दिया, चादर पर दाग लगा हैं। संत बोले, बस यही फर्क है। पूरी चादर सफेद है, यह किसी को नहीं दिखाई दे रहा है। ऐसा ही मेरे और मेरी सरकार के साथ हो रहा है। विकास के जो काम तेजी से हो रहे हैं वह सफेदी किसी को नहीं दिखाई दे रही है। टपुट घटनाओं की कालिख लगाई जा रही है। र भी हमारा प्रयास है कि इन घटनाओं पर अंकुश लगे। भियान चलाकर अपराधियों और माफिया के विरूद्ध जल्द ही कार्रवाई शुरू की जायेगी।

भ्रष्टाचार से सरकार की छवि पर बट्टा लगा है ?

जब भी कोई पार्टी सत्ता में आती है तो तमाम मौकापरस्त लोग उसी पार्टी का लबादा ओढ़ लेते हैं।ऐसा कमोवेश सभी सरकार के साथ होता रहा है।अपराधियों और भ्रष्टाचारियों का कोई दल या सिद्धांत नहीं होता है।भ्रष्टाचार के मामले में सामने आने वाले शैलेन्द्र अग्रवाल का मामला भी इसी तरह का है।सरकार की तत्परता के कारण ही वह जेल पहुंचा है,जिसने जो भी गुनाह किया है,उसे उसकी सजा जरूर मिलेगी।नोयडा अथार्रिटी के भ्रष्ट इंजीरियर यादव सिंह के खिलाफ भी कठोर कारवाई हुई है।

नेताजी आपकी सरकार की कई बार खिंचाई कर चुके हैं ? 

यही तो समस्या है।अगर नेताजी(मुलायम सिंह)चुप रहते हैं तो लोग कहते हैं पुत्र मोह में उन्होंने सरकार की तरफ से आंखे मूंद रखी हैं और जब वह हमें दिशा-निर्देश देते हैं तो कहा जाता है कि वे अपनी ही सरकार के कामकाज से संतुष्ट नहीं हैं।नेताजी,मेरे पिता के साथ-साथ पार्टी के मुखिया भी हैं।वे मन से मुलायम हैं,निर्णय लेने में कठोर।उनके(मुलायम) कट्टर विरोधी भी यह बात जानते हैं।पार्टी या सरकार में कहीं कोई मतभेद नहीं है।अब आप ही सोचिए,नेता जी अगर सार्वजनिक रूप से हमें नहीं डांटे तो लोग कहते हैं कि वो सुपर सीएम हैं और जब डांटते हैं तो साफ हो जाता है कि सरकार मैं ही चला रहा हूं। अब चार,साढ़े चार या सुपर सीएम की बात कहीं चर्चा में है।

कुछ मोदी सरकार का काम संतोषजनक है ?

मोदी सरकार को दिखावा करने की ज्यादा रूचि है।जो काम यूपी करता है,वह काम बाद में केन्द्र करता है। यह एक चालू पार्टी की सरकार है जिसका मुखिया भी चालू है।अच्छे दिन की बात करते थे, कहां गये अच्छे दिन।सब जानते हैं क्या हो रहा है।यूपी में भाजपा के 73 सांसद हैं,लेकिन इसमें से एक-दो को छोड़कर सब के सब सत्ता के नशे में चूर हैं।उमा भारती की मैं प्रशंसा करता हॅू।उनकी वजह से मध्य प्रदेश से पानी सहजता से मिल गया।बाकी सभी सांसद भी दलगत राजनीति से ऊपर उठकर यदि प्रदेश की 20 प्रतिशत भी मदद कर दें तो यूपी की तस्वीर बदल जायेगी।

योग के कारण मोदी चर्चा में हैं ?

मोदी की तरह चर्चा में रहने का गुण सबको नहीं आता है।योग पर विवाद गलत है।जब किसी काम को करते समय नियत में खोट होती है तो विवाद पैदा हो ही जाता है। योग का अभियान चलाने वाले लोग  हैवी वेटेड हैं। इसे धर्म से जोड़ने का काम भगवा खेमें ने किया, वर्ना तो कई सदियों से लोग शांतिपूर्वक योग कर रह  थे।

भाजपाई साम्प्रदाकिता का आरोप लगाते हैं। आजम खां के बयानों से खासकर उनको शिकायत है ?

हम लोहिया-जेपी के दिखाये समाजवाद के रास्ते पर चलते हैं।जहां सबका विकास तय होता है।भाजपा वाले जातिवादी,समाजघाती और साम्प्रदायिकता की राजनीति करते हैं।आजम खां पार्टी और सरकार के जिम्मेदार नेता हैं।वह बिना सोचे-समझे नहीं बोलते।वह अल्पसख्यकों का दुख-दर्द समझते हैं।अगर वह यह दर्द सार्वजनिक करते हैं तो इसमें बुराई क्या है।अल्पसंख्यकों का दिल जीतने का काम हमारी पार्टी और सरकार कर रही है।

आपके मन की बात ?

मैं न तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी आदि तमाम नेताओं की तरह अपने नाम और काम की मार्केंटिग कर पाया और न ही मीडिया मैनेजमेंट की कला मुझे आई।जिस वजह से प्रदेश के दूरदराज इलाकों की बात छोड़ भी दी जाये तो लखनऊ के ग्रामीण इलाको की भी बड़ी आबादी मेरे चेहरे और नाम से परिचित नहीं है।कुछ दिनों पहले की बात है।मैं लखनऊ के ग्रामीण इलाकों का दौरा करने गया था।दौरे के दौरान प्राथमिक और जूनियर स्कूलों का भी निरीक्षण किया।जूनियर स्कूल के निरीक्षण के दौरान मेरे साथ गये एक मंत्री ने आठवीं क्लास के बच्चे से मेरी तरफ इशारा करते हुए पूछा,‘जानते हो कौन है ?मंत्री का सवाल सुनते ही बच्चा तुरंत बोला,‘राहुल गांधी हैं।’यह जवाब सुनकर बच्चे के साथ खड़े टीचरों के चेहरे की हवाइयां उड़ गईं।मगर मैं समझ गया था कि यह बच्चे की नहीं मेरी गलती है।अगर मैं भी नरेन्द्र मोदी,राहुल गांधी,अरविंद केजरीवाल आदि की तरह अपने चेहरे और नाम का प्रचार करता तो यह स्थिति नहीं आती।इसी के साथ अखिलेश जोड़ देते हैं,’वैसे तो नाम में कुछ नहीं रखा है,लेकिन चुनावी राजनीति में चेहरे और नाम की महत्ता से इंकार भी नहीं किया जा सकता है। 

पत्रकार अजय कुमार से संपर्क : 9335566111, ajaimayanews@gmail.com

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संविधान के मौलिक अधिकारों का वजूद खतरे में, कसौटी पर नाकारा यूपी सरकार

अभी तक तो यूपी सरकार की किरकिरी कराने वाले चाचा जान ने कल्वे जव्वाद पर हमला बंद  भी नहीं किया था कि उत्तर प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री राम मूर्ति वर्मा का पत्रकार जगेंद्र सिंह हत्याकांड में नामजद होना यूपी सरकार के लिए एक चिंता का सवाल बन गया है । सरकार पत्रकार हत्याकांड में नामजद मंत्री पर कत्तई एक्शन न लेने के मूड में है । अगर नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आकड़ों पर गौर किया जाय तो प्रतिवर्ष जितने पत्रकारों के देश भर में उत्पीड़न के मामले  प्रकाश में आते हैं, उसके 72 % मामले अकेले यूपी के होते हैं, जो राज्य के वजीर ए आलम अखिलेश के लिए एक बड़ा सवाल खड़ा करते हैं। क्या अखिलेश के अंदर शासन व सत्ता को सुचारु रूप से चल़ाने का म़ाद्दा खत्म हो चुका है? क्या युवा शक्ति के आकलन में कोई सेंध है?

संविधान की दुहाई देने वाली यूपी सरकार अब पत्रकारों की हत्या में क्यों संवेदनहीनता दिखा रही है? क्योंकि मामला सत्ता पक्ष के मंत्री व पुलिस के हाकिमों से जुड़ा हुआ है? अगर कलमकारों पर हमलों में गिरावट नहीं आई तो समाज में फैले भ्रष्टाचार का खुलासा होना नामुमकिन हो जायेगा। इस घटना ने मानवता को शर्मसार करने के साथ ही साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कुठाराघात भी किया है। गौर किया जाय तो भारतीय संविधान के मौलिक अधिकारों में एक प्रेस की स्वतंत्रता भी है, जिस पर अपराध का आरा चलने लगा है। प्रेस की स्वतंत्रता पर आंच ही नहीं धधक भी आने लगी है जिससे विश्व पत्रकारिता जगत क्षुब्ध है।

 पत्रकार जगेन्द्र सिंह की जलाकर हत्या किये जाने से देशभर के पत्रकारों में जहां रोष व्याप्त है, वही प्रदेश सरकार की कुम्भकर्णी निद्रा व मंत्री शिवपाल सिंह यादव के अमर्यादित बयान की चौतरफा निंदा जारी है। जब एक सरकार का जिम्मेदार सिपहसलार यह बयान दे कि बिना जाँच नहीं हटेगा कोई मंत्री तो फिर जाँच किस बात की ? अगर अभियुक्त एक अहम ओहदे पर व्याप्त हो तो निष्पक्षता पर एक सीधा प्रहार होगा ? विगत डेढ़ वर्ष पूर्व प्रतापगढ़ के तत्कालीन सीओ हत्याकांड में नामजद अभियुक्त किये गए मंत्री रघुराज प्रताप सिंह उर्फ़ राजा भैया का नाम आने पर तत्कालीन मंत्री राजा ने अपने समस्त दायित्यों से त्याग पत्र दे दिया था । देश की सर्वोच्य जाँच एजेंसी सीबीआई की जाँच का सामना किया था और सीबीआई जाँच का प्रस्ताव अखिलेश की हुकूमत ने ही केंद्र के पास भेजा था । 

आखिर क्या कारण है कि प्रदेश की सरकार पत्रकार जगेंद्र सिंह हत्याकांड की सीबीआई जाँच की सिफारिश नहीं कर रही है ? कहीं दागदार तो नहीं है मंत्री ? लेकिन सीओ की हत्या में सीओ ने घटनास्थल पर ही दम तोड़ दिए थे लेकिन पत्रकार जगेंद्र सिंह प्रकरण में पत्रकार ने सात दिनों तक जीवन व मौत से संघर्ष करने के बाद प्राणों को त्याग दिया । एफआईआर पर गौर किया जाय तो सरकार के दबाव में नौकरशाहों ने तारीख पहली जून 2015 को दिए गए शिकायती पत्र को नजरअंदाज किया। पत्रकार की मौत के बाद नौ जून को दोपहर चार बजे पत्रकारों के दबाव में धारा 302, 504, 506, 120 बी आईपीसी के तहत मुकदमा पंजीकृत किया गया । 

ऐसी लचर प्रणाली से निष्पक्ष जाँच की उम्मीदें खत्म हो गई हैं । सर्वोच्य न्यायालय का सख्त आदेश है कि सात वर्ष की सजा वाले मामलों में अभियुक्त की गिरफ्तारी पुलिस कर सकती है । इस पर बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या राज्य सरकार सर्वोच्च न्यायालय से ऊपर है ? क्या संविधान को नाकारा मानती है अखिलेश सरकार ? बताना मुनासिब होगा कि पत्रकार हत्याकांड की चश्मदीद गवाह शालिनी का 164 सीआरपीसी का बयान गोपनीय ढंग से कराना भी सवालों के घेरे में है ? राज्य सरकार ने शालिनी के सुरक्षा के लिए दो महिला पुलिस व एक सशस्त्र पुलिस कर्मी लगाया गया है। उसकी जिंदगी भी खतरे से खाली नहीं हैं । पत्रकार के हत्यारे भी यही खाकी वर्दी के भेड़िये ही हैं ।

वही उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव उद्यम एसपी सिंह ने स्पष्ट बयान दिया है कि उत्तर प्रदेश सरकार की उदासीनता ने नौकरशाही के जमीर को झकझोरना शुरू कर दिया है । गिरफ्तारी में रोड़े की मुख्य वजह है वोट बैंक । पत्रकार बिरादरी को नसीहत देते हुए कहा है कि शोक सभा व कैंडल मार्च भर करने से काम नहीं बनने वाला। सरकार की समस्त खबरों का बहिष्कार करिए। सरकार के काले कारनामों को उजागर करने की जरुरत है । एसपी सिंह ने अफसोस जताया है कि यूपी में इस प्रकरण पर विपक्ष और प्रदेश की पूरी पत्रकार बिरादरी चुप है । अगर पत्रकार व पत्रकारिता आईएएस दुर्गा शक्ति नागपाल और अशोक खेमका जैसे निर्भीक व ईमानदार अफसरशाहों के पक्ष में खड़ी होती है तो पूरे अफसरशाहों को भी एक जुट होकर पत्रकारों के पक्ष में आगे आना चाहिए । अब देखना होगा कि सरकार का कब टूटता है तिलस्म ?

लेखक ज्ञानेंद्र तिवारी से संपर्क : 9454364181, gyanendra936@gmail.com

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