मुंबई | मुंबई के वर्सोवा स्थित RDX Studio में आयोजित विशेष संवाद “In Search of Truth” में वरिष्ठ फिल्मकार, लेखक और विचारक महेश भट्ट ने पटकथा लेखक एवं निर्देशक सुहृता दास के साथ जीवन, रिश्तों, संघर्षों और आत्मखोज पर एक बेहद आत्मीय और विचारोत्तेजक बातचीत की। यह कार्यक्रम केवल सिनेमा पर चर्चा नहीं था, बल्कि जीवन को समझने और उसे महसूस करने का एक दुर्लभ अनुभव साबित हुआ।
Moonlight Films & Theatre Studio द्वारा आयोजित इस संवाद की अवधारणा ही इस विचार पर आधारित थी कि बातचीत फिल्मों की सीमाओं से निकलकर जीवन के उन प्रश्नों तक पहुंचे, जिनसे हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में जुड़ा होता है। प्रेम, टूटन, महत्वाकांक्षा, असफलता, पुनर्निर्माण, मानसिक संघर्ष, रिश्ते और जीवन का अर्थ—इन सभी विषयों पर महेश भट्ट ने पूरी ईमानदारी और संवेदनशीलता के साथ अपने विचार साझा किए।
कार्यक्रम की शुरुआत कविता, स्मृतियों और जीवन के अनुभवों से हुई। सुहृता दास ने महेश भट्ट के जीवन, उनकी अप्रकाशित आत्मकथा के अंशों और उनके रचनात्मक सफर के माध्यम से बातचीत को आगे बढ़ाया। संवाद का यह अनोखा प्रारूप दर्शकों को महेश भट्ट के सार्वजनिक व्यक्तित्व के पीछे छिपे संवेदनशील इंसान से रूबरू कराने में सफल रहा।
संवाद का सबसे भावनात्मक क्षण तब आया जब महेश भट्ट ने अपनी माँ से जुड़ी बचपन की एक स्मृति साझा की। उन्होंने बताया कि एक बार अपनी बीमार माँ को मुस्कुराने के लिए उन्होंने उनके बालों में जुगनू सजाए थे। इस प्रसंग ने पूरे सभागार को भावुक कर दिया और अनेक दर्शकों की आँखें नम हो गईं। यह स्मृति केवल एक घटना नहीं थी, बल्कि माँ-बेटे के रिश्ते की उस कोमलता का प्रतीक थी, जो जीवनभर इंसान के भीतर जीवित रहती है।
अपने बचपन को याद करते हुए महेश भट्ट ने बताया कि किस तरह चार वर्ष की आयु में पहली बार सिनेमा के जादू ने उन्हें आकर्षित किया और कैसे चलती हुई तस्वीरों ने उनके भीतर कहानी कहने की आग जगाई। उन्होंने कहा कि जीवन में अक्सर हम भ्रम और वास्तविकता के बीच जीते हैं और सच्चाई को स्वीकार करना हमेशा आसान नहीं होता।
अपने शुरुआती संघर्षों को याद करते हुए उन्होंने फिल्म उद्योग में बिताए दिनों का ज़िक्र किया और वह सीख साझा की जो उन्हें प्रसिद्ध निर्देशक राज खोसला से मिली थी—“Zero is a great figure to begin with.” उन्होंने कहा कि शून्य से शुरुआत करना डरने की नहीं, बल्कि गर्व करने की बात है, क्योंकि हर बड़ी यात्रा वहीं से शुरू होती है।
बातचीत के दौरान उन्होंने अपने विद्रोही स्वभाव का भी ज़िक्र किया। उन्होंने कहा कि एक समय था जब वे भीड़ से अलग दिखना चाहते थे, लेकिन समय के साथ उन्होंने महसूस किया कि मनुष्य का वास्तविक विकास दूसरों से जुड़ने और जीवन को साझा करने में है।
रचनात्मकता पर बोलते हुए महेश भट्ट ने कहा कि महान कला अक्सर टूटे हुए दिल, असफलताओं और जीवन के गहरे अनुभवों से जन्म लेती है। उनके अनुसार कलाकार की सबसे बड़ी पूंजी उसका जीवन और उसकी संवेदनशीलता होती है। उन्होंने स्वीकार किया कि उनकी अधिकांश रचनात्मक ऊर्जा संघर्षों, असफलताओं और आत्ममंथन से निकली है।
सफलता और जीवन के अर्थ पर अपने विचार रखते हुए उन्होंने कहा कि हम अक्सर अपनी खुशियों और जीवन को भविष्य के किसी मुकाम के लिए टालते रहते हैं। हमें लगता है कि अगली सफलता, अगली उपलब्धि या अगला अवसर हमें संतुष्टि देगा, लेकिन जीवन का वास्तविक अनुभव इसी क्षण में मौजूद है।
अपने समापन वक्तव्य में उन्होंने कहा:-
“हम अपनी ज़िंदगी को लगातार टालते रहते हैं। सोचते हैं कि जब यह हासिल होगा, तब जीना शुरू करेंगे। लेकिन जीवन कहीं आगे नहीं है। जीवन इसी पल में है, इसी सांस में है, इसी बातचीत में है।”

इसके बाद आयोजित प्रश्नोत्तर सत्र में छात्रों, थिएटर कलाकारों, लेखकों, उद्यमियों और विभिन्न क्षेत्रों से आए प्रतिभागियों ने खुलकर सवाल पूछे। महेश भट्ट ने फिल्म निर्माण, रचनात्मकता, असफलता, मानसिक स्वास्थ्य, रिश्तों, बच्चों की परवरिश और जीवन के अनुभवों पर विस्तार से अपने विचार साझा किए।
पालन-पोषण पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि बच्चे माता-पिता की बातों से कम और उनके व्यवहार से अधिक सीखते हैं। उन्होंने माता-पिता से आग्रह किया कि वे बच्चों को केवल निर्देश न दें, बल्कि उन्हें समझें और उनकी बात सुनें।
युवा रचनाकारों के लिए उनका संदेश स्पष्ट था—असफलता से मत डरिए। कई बार जीवन की सबसे बड़ी सीख और सबसे सशक्त रचनात्मक ऊर्जा उन्हीं अनुभवों से निकलती है जिन्हें हम अपनी हार समझते हैं।
पूरे कार्यक्रम में महेश भट्ट के व्यक्तित्व का एक ऐसा पक्ष सामने आया जो केवल एक सफल फिल्मकार का नहीं, बल्कि एक संवेदनशील इंसान, विचारक और जीवन के विद्यार्थी का था। वहीं सुहृता दास की गहन तैयारी, आत्मीय प्रश्नों और संवाद शैली ने इस बातचीत को और अधिक सार्थक बना दिया।
कार्यक्रम के अंत में उपस्थित दर्शकों ने इसे केवल एक बातचीत नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, संवेदनशीलता और प्रेरणा से भरी एक जीवन यात्रा बताया। अपने शीर्षक के अनुरूप “In Search of Truth” सत्य की खोज से आगे बढ़कर जीवन को नए दृष्टिकोण से देखने और महसूस करने का अवसर बन गया।

