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शहरों के निर्माण में लगे मजदूरों का संकट के समय साथ छोड़ देता है शहर

सम्पूर्ण भारत में लॉक डाउन है। यह लॉक डाउन भारत में रहने वाले लोगों की जिंदगी को बचाने के लिए है। भारत में रहने वाले लोगों में एक ग्रामीण भारत है और एक शहरी भारत। रोजी – रोटी की तलाश में ग्रामीण भारत की एक बड़ी आबादी अब शहरी भारत मे तब्दील हो गई है। उस शहरी भारत में भी ग्रामीण लोगों की जिन्दगी में कोई तब्दीली नहीं आई है बल्कि शहरों में गाँव से भी बदत्तर जिंदगी बसर कर रहा है यह ग्रामीण भारत।

कोरोना वायरस निश्चित तौर पर कुछ लोगों की जिंदगी को ख़त्म करके जाने वाला है लेकिन इसके इतर ग्रामीण भारत के लोगों को एक दृष्टि भी देकर जाने वाला है। कोरोना ग्रामीण भारत को यह बता कर जाएगा कि जिस ग्रामीण भारत से निकलकर आप शहरों में जाते हैं वो शहर मुश्किल दौर में आपका साथ नहीं देता है|

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसे ही सम्पूर्ण भारत में 21 दिन के लॉक डाउन की घोषणा किये शहरों में रहने वाले इस ग्रामीण भारत में भयानक असुरक्षा का भाव दिखने लगा| नतीजा यह हुआ कि लॉक डाउन के दो दिन बाद ही दिल्ली के बस अड्डों से हजारों की संख्या में ग्रामीण भारत का मजदूर अपने गांव भागने के लिए मजबूर हो गया| लॉक डाउन में कंपनियां बंद हो गई| शहरों में रहने वाले ग्रामीण भारत के मजदूरों में रोटी की चिंता सताने लगी| उनके पास इतना तक का इंतजाम नहीं था कि वो 21 दिन बिना काम किये गुजारा कर सकें|

प्रधानमंत्री मोदी कंपनी मालिकों और मकान मालिकों से गुजारिश किये कि हो सके तो मजदूरों के मकान किराया न लिया जाये और कंपनी के मालिक मजदूरों का वेतन न रोकें बावजूद इसके ग्रामीण भारत के मजदूर शहरों में नहीं रुक सकें| हालत यह हो गयी कि लॉक डाउन में उनके घर जाने के साधन तक नसीब नहीं हो सके|

सैकड़ो मील पैदल यात्रा करने को मजबूर हुआ ग्रामीण भारत का मजदूर भूखे-प्यासे कभी सड़कों से तो कभी रेलवे लाइन को पकड़कर उसी गांव की तरफ चल पड़ा जहाँ से कभी रोजगार की तलाश में शहरों की तरफ भागा था| दिल्ली, मुंबई, राजस्थान, गुजरात जैसे शहरों से निकलकर यूपी और बिहार के लिए चल पड़े| कोई साइकिल पर परिवार समेत दिल्ली से उत्तर प्रदेश और बिहार के लिए निकल पड़ा है तो कोई पैदल ही छोटे और मासूम बच्चों को गोद में लिए चल पड़ा पड़ा है| यह ग्रामीण भारत का मजदूर बेतहाशा इस उम्मीद से भागे जा रहा था कि एक न एक दिन अपनी मिट्टी अपने, गांव जरूर पहुंच जाएंगे|

आर्थिक सर्वेक्षण 2019 के अनुसार देश में असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की कुल संख्या 93 प्रतिशत है। यह संख्या बताती है कि भारत की अर्थव्यवस्था इन्हीं मजदूरों के कंधो पर टिकी है| भारत की तमाम बड़ी – बड़ी कंपनियां इसी ग्रामीण भारत के मजदूरों के भरोसे चल रही हैं| बावज़ूद इसके कोरोना वॉयरस के डर से गाँवों की तरफ़ जाने वाले मजदूर वर्ग को इन शहरों में नहीं रोका जा सका| आज इनके लिए कंपनीयों के मालिक करोड़ो रूपये दे रहे हैं जगह – जगह लंगर लगवा रहे हैं लेकिन इसका अब क्या फ़ायदा|

अब इस ग्रामीण भारत का विश्वास शहरी लोगों पर नहीं हो पा रहा है| कोरोना के डर से मकान मालिकों ने इस ग्रामीण भारत को घरों से निकाल दिया है| विडंबना यह है कि जब यह ग्रामीण भारत सडकों पर आ गया तब उनके रहने के लिए स्कुल और टेंट की व्यवस्था की जाने लगी और खाने के पैकेट बाटे जाने लगें| शहरी भारत के लोग यह दरिया दिल अगर थोड़ी पहले दिखते तो यह ग्रामीण भारत इतना संकट नहीं झेलता|

भारत में कोरोना वॉयरस को फैलने से रोकने के लिए लॉक डाउन एलान किया गया था लेकिन जब यह मजदूर वर्ग गावों में जाने लगा तो सड़कों पर भीड़ जमा गयी| सोशल डिस्टेंशिग अनसोशल बनकर रह गया| सरकारें जगीं तो कुछ हज़ार बसों का इंतजाम इस उम्मीद से किया गया कि सब लोग लोग सकुशल घर पहुंच जाएंगे| 60 सीटों वाली बसों में सैकड़ो लोग भरे गए बावजूद इसके दिल्ली के बस अड्डे खाली नहीं सके| जैसे- तैसे यह ग्रामीण भारत अपने गांव पंहुचा तो तो गांव वालों ने भी इस डर से स्वीकार करने से मना कर दिया कि हो सकता सभी कोरोना वॉयरस से संक्रमित हो, लिहाज़ा कुछ दिन तक गांव के बाहर ही स्कूलों और टेंटों में रहने को कहा गया| सुरक्षात्मक दृष्टि से यह ठीक बात भी थी कि कुछ दिन तक उन्हें क्वारेंटाइन में रखा जाये| शहर को छोड़कर गांव की ओर चला ग्रामीण भारत का मजदूर दोनों जगहों से फ़िलहाल के लिए अलग-थलग हो चुका है|

लेखक पीयूष प्रधान महात्मा गांधी हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के जनसंचार विभाग से जुड़े हैं.

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