आचार संहिता की चर्चा नहीं और मार्गदर्शक मिसाइल को ‘ठंडा’ करना…

भारतीय जनता पार्टी और उसके नेताओं ने आदर्श आचार संहिता की धज्जियां उड़ा रखी हैं और चुनाव आयोग उनसे अपने ढंग से निपट रहा है। वैसे तो यह खास बात है पर मीडिया की जो हालत है उसमें यह कोई मुद्दा ही नहीं है। इसी का असर हुआ है कि आचार संहिता के उल्लंघन में भाजपा नेता आपस में और मीडिया से भिड़ गए हैं। दिलचस्प यह है कि इस मामले को भी मीडिया में कायदे से जगह नहीं मिली है। मैं अखबारों के पहले पन्ने की ही बात करूंगा। खबर है कि रिटायर जनरल से चौकीदार बने भाजपा नेता, पूर्व सेनाध्यक्ष और विदेश राज्य मंत्री वीके सिंह ने कहा है कि भारतीय सेना को मोदी जी की सेना नहीं कहा जा सकता है और ऐसा कहने वाला कोई भी न सिर्फ गलत है बल्कि देशद्रोही भी।

आप जानते हैं कि वीके सिंह के लिए ही चुनाव प्रचार करते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सेना को ‘मोदीजी की सेना’, कहा था। चुनाव आयोग इस मामले की जांच कर ही रहा था कि एक और नेता, मुख्तार अब्बास नकवी ने उत्तर प्रदेश के रामपुर में कहा कि मोदी की सेना तो आतंकवादियों को घर में घुसकर मार रही है। चुनावी महासमर के जोश में नेताओं के बयान और उनकी तुकबंदी चर्चा में रहती आई है लेकिन इस बार आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के खास मामले सामने आ रहे हैं और इनपर कार्रवाई की अपनी रफ्तार व शैली है। इसी क्रम में एक चैनल शुरू हो जाना और बाद में पता चलना कि उसके लिए अनुमति ही नहीं ली गई है फिर भी उसके बारे में फैसला लिए जाने में समय लगना – आदर्श आचार संहिता की कमजोरियां भी बताता है।

अखबारों में यह सब चर्चा का विषय नहीं है। फिलहाल, योगी आदित्यनाथ का भाषण। उन्होंने कहा था, ‘कांग्रेस के लोग आतंकवादियों को बिरयानी खिलाते थे और मोदी जी की सेना उन्हें सिर्फ गोली और गोला देती है। यह अंतर है। कांग्रेस के लोग मसूद अजहर जैसे आतंकियों के लिए जी का इस्तेमाल करते हैं, मगर पीएम मोदी के नेतृत्व में बीजेपी सरकार आतंकियों के कैंप पर हमले कर उनका कमर तोड़ती है।’ सीएम योगी जिनके लिए प्रचार कर रहे थे, उन्होंने ही इसे गलत बताते हुए ‘देशद्रोह’ करार दिया है। कसाब को बिरयानी खिलाने का आरोप से संबंधित तथ्य मार्च 2015 की आजतक की एक खबर में है। इसके अनुसार मुंबई हमले के दोषी आतंकी आमिर अजमल कसाब ने जेल में कभी बिरयानी नहीं मांगी थी और इसे आतंकी के पक्ष में बनाई जा रही ‘भावनात्मक लहर’ को रोकने के लिए ‘गढ़ा’ गया था। यह दावा मामले के सरकारी वकील उज्ज्वल निकम ने किया है।

निकम ने जयपुर में आतंकवाद विरोधी अंतररराष्ट्रीय सम्मेलन से अलग, मीडिया से कहा था, ‘कसाब ने कभी भी बिरयानी की मांग नहीं की थी और न ही सरकार ने उसे बिरयानी परोसी थी। मुकदमे के दौरान कसाब के पक्ष में बन रहे भावनात्मक माहौल को रोकने के लिए मैंने इसे गढ़ा था।’ इस तरह योगी के आरोप का एक और हिस्सा तथ्यात्मक रूप से भी गलत हैं। यही हाल, इस दावे का भी है कि, भाजपी सरकार आतंकियों के कैंप पर हमले कर उनका कमर तोड़ती है – का भी है। अब केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी को चुनाव आयोग की तरफ से नोटिस मिला है। उधर वीके सिंह ने कहा ही है भारतीय सेना को मोदी जी की सेना नहीं कहा जा सकता है और ऐसा कहने वाला कोई भी न सिर्फ गलत है बल्कि देशद्रोही भी।

यह खबर देने वाले रिपोर्टर से वीके सिंह का विवाद छिड़ गया है। द टेलीग्राफ के अनुसार, इस संबंध में वीके सिंह ने कहा है, मैं नहीं जानता कौन ऐसी बातें कर रह है। ऐसे एक या दो लोग ही हैं जो ऐसे सोच सकते हैं। उनके पास (कहने के लिए) और कुछ नहीं है। पत्रकार दोहराता है कि यह बात पाकिस्तान को सीख देने के संदर्भ में कही गई है। सिंह जोर देकर कहते हैं, आइए, हम साफ-साफ जान लें, यह मोदी जी की सेना नहीं है। अगर आप भारतीय सेना की बात कर रहे हैं तो सिर्फ उसकी बात कीजिए। अगर आप राजनीतिक कार्यकर्ता की बात कर रहे हैं तो कई बार उन्हें हम मोदी जी की सेना कहते हैं। पर उसमें और भारतीय सेना में अंतर है। मैं नहीं जानता कि आप क्या कह रहे हैं। बीबीसी हिन्दी न्यूज ने इस ट्वीट के साथ वीडियो जारी किया है, बीबीसी हिन्दी को इंटरव्यू देने के बाद जनरल वीके सिंह ने एक ट्वीट में इंटरव्यू की रिपोर्टिंग को प्रेसटीट्यूट कहा है, यही भी कि उनके बयान को गलत ढंग से प्रस्तुत किया गया और आरोप लगाया कि पत्रकार ने पैसे लिए। यहां आप जनरल वीके सिंह के कहे का अनकट वीडियो देख सकते हैं।

द टेलीग्राफ का पहला पन्ना

आज एक और मामला पांच साल बाद लिखा गया लाल कृष्ण आडवाणी का ब्लॉग है। उसकी खास बात यह थी कि आडवाणी ने इसे भारत की जनता और लाखों पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित किया है पर (मोदी) प्रधानमंत्री या शाह (पार्टी अध्यक्ष) का जिक्र नहीं है। अपने इस ब्लॉग का उद्देश्य उन्होंने भाजपा के आगमी स्थापना दिवस को बताया है और इसे मीडिया को भी मेल किया गया है। इसका शीर्षक था, पहले देश, फिर पार्टी और अंत में मैं खुद। अखबार ने लिखा है कि इसे मोदी के खिलाफ देखा जा रहा है जिनपर आरोप है कि पार्टी और सरकार की कीमत पर व्यक्तित्व निर्माण कर रहे हैं। यह भी महत्वपूर्ण है कि 92 साल के आडवाणी ने पांच साल में यह पहला ब्लॉग लिखा है पर ज्यादातर अखबार ये सब तथ्य पचा गए।

यही नहीं, इसे नरेन्द्र मोदी की प्रतिक्रिया या प्रशंसा के साथ छापा है। इससे इसका महत्व या तो समझ में नहीं आएगा या कम लगेगा। यह नरेन्द्र मोदी की चाल हो सकती है कि उन्होंने इसपर समय रहते प्रतिक्रिया जारी कर दी और अखबारों ने विवाद से दूर रहने के लिए उसे भी छाप दिया। सबसे दिलचस्प यह रहा कि राहुल गांधी ने इसपर सवाल उठाया जो मोदी की प्रतिक्रिया और ब्लॉग की खबर के साथ छपा है। दैनिक भास्कर ने अपने अभिव्यक्ति पन्ने पर इसे पूरा छापा है. शीर्षक है, भाजपा ने मतभेद रखने वालों को दुश्मन नहीं समझा, न अपने राष्ट्रवाद से असहमति रखने वालों को राष्ट्रविरोधी. दैनिक भास्कर में खबर पहले पन्ने पर ऊपर दो कॉलम में है। फ्लैग शीर्षक है, आडवाणी ने पांच साल बाद फिर लिखा ब्लॉग ….. शीर्षक है, जो हमसे सहमत नहीं उन्हें हमने कभी भी देशद्रोही नहीं माना : आडवाणी. अखबार ने पूरा ब्लॉग अंदर के पन्ने पर छापा है।

नवभारत टाइम्स में यह खबर लीड है. विशेष संवाददाता की इस खबर का शीर्षक है, गर्म लौह. उपशीर्षक है, आडवाणी ने चुप्पी तोड़ ब्लॉग में लिखी मन की बात. दो खास बातें कोट और हाइलाइट की गई हैं. बीजेपी ने राजनीतिक रूप से असहमत होने वालों को दुश्मन नहीं प्रतिद्वंद्वी माना. राष्ट्रवाद की हमारी धारणा में असहमत होने वालों को राष्ट्रविरोधी नहीं माना …. दूसरा है, …. मेरे जीवन का सिद्धांत, पहले देश, फिर पार्टी और आखिर में खुद रहा, हालात कैसे भी रहे मैंने इनके पालन की कोशिश की। दैनिक जागरण में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। आज खबरों का पहला पन्ना तीसरा है और इसपर आडवाणी की फोटो के साथ बताया गया है कि यह खबर अंदर के पन्ने पर है। शीर्षक है, आडवाणी बोले – मेरे लिए पहले देश, फिर पार्टी अंत में मैं। उपशीर्षक है, भाजपा ने राष्ट्रवाद की अवधारणा में विरोधियों को देश विरोधी नहीं माना। इसके साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रतिक्रिया भी है। पहले पन्ने पर इसी जगह जयराम रमेश की फोटो है और अंदर, राजग का सामना करेगा जनता का महागठबंधन होने की सूचना है।

हिन्दुस्तान ने आडवाणी के ब्लॉग को बहुत छोटे में निपटा दिया है और खबर भी एजेंसी से ली है जो रूटीन शीर्षक से छपी है। छोटी सी यह खबर दो कॉलम में है और अंदर के पन्ने पर जारी है। शीर्षक है, अलग राय रखने वाले देशद्रोही नहीं. अंदर के पन्ने पर भी यह दो कॉलम में टॉप पर है. शीर्षक है, पहले देश, फिर पार्टी और अंत में मैं खुद.

वरिष्ठ पत्रकार और अनुवादक संजय कुमार सिंह की रिपोर्ट।

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