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सुख-दुख

दुनिया में तारीफ करवाने की ‘डंकापति’ की तमन्ना अब क्रूर कुंठा में तब्दील हो गई है!

कृष्ण कांत-

गंगा-यमुना की धाराओं में लाशें तैर रही हैं, मगर ये चाहते हैं कि WHO और द टेलीग्राफ इनके नाम का कसीदा पढ़ें! तारीफ मिलनी चाहिए लेकिन किस बात के लिए? चुनावी रैली करके कोरोना फैलाने के लिए? कुंभ आयोजित करके आम लोगों को मौत के मुंह में झोंक देने के लिए?

बोगस वेंटिलेटर की सप्लाई के लिए जो अस्पतालों में भेज गए लेकिन किसी काम के नहीं हैं? डेढ़ साल तक आक्सीजन जैसी मामूली चीज का भी इंतजाम न करने के लिए? मरते हुए लोगों को छोड़कर ‘दीदी ओ दीदी’ जैसी घटिया हरकत करने के लिए?

किस बात के लिए तारीफ चाहिए? लेकिन उन्हें चाहिए, इसलिए कोई तारीफ नहीं करेगा तो वे बोगस वेबसाइट पर अपनी आईसेल से ही अपनी शान में कसीदे काढ़ लेंगे और उसे पूरा मंत्रिमंडल ट्वीट भी कर देगा. इधर मौत के मुंह में पांव लटकाए भक्त भी बैठे हैं हर बेसुरी ताल पर नाचने के लिए!

दुनिया में तारीफ करवाने की डंकापति की तमन्ना अब क्रूर कुंठा में तब्दील हो गई है. इस बर्बरता की कल्पना कीजिए कि हिंदुस्तान की विशाल नदियों में लाशें उफना रही हैं मगर सरकार में बैठे लोग किसी बोगस वेबसाइट पर प्रधानमंत्री की तारीफ में झूठ से भरा लेख लिख रहे हैं.


राहुल कोटियाल-

आप चाहे लाख कमियां खोज लीजिए. लेकिन कोई देश इससे ज़्यादा क्या ही आत्मनिर्भर होगा कि जब विदेशी मीडिया हमारे सुप्रीम लीडर की आलोचना करने लगा तो हमने अपना ही ‘विदेशी मीडिया’ चलाकर उनकी तारीफ़ों के क़िले बांध दिए.

ओ विदेशी आलोचकों! तुम भी सुन लो. ज़ी टीवी का नाम बदलकर ‘डेली बीबीसी’ रखने का विकल्प हमारे पास अभी बचा हुआ है. पत्रकारिता तुमने चाहे जितनी की हो, नंगई में हमसे जीत लोगे क्या??


सौमित्र रॉय-

आगरे वाला मसाला गधी के गू से बना था। गुजरात बीजेपी ने ये नया ब्रांड निकाला है।

दावा है कि इसको सूंघ लिया तो लाइफ झींगालाला। फोटू में नमो और रूपाणी दोनों हंस रहे हैं।

फिर भी मामला समझ न आए तो मर्ज़ी आपकी।

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