नागालैंड में ग्यारह पार्टियों ने चुनाव का बहिष्कार कर दिया

पूर्वोत्तर के उग्रवादग्रस्त नागालैंड में 27 फरवरी को होने वाले चुनावों के लिए अब तक किसी भी राजनीतिक दल के उम्मीदवार ने अपना नामांकन पत्र दायर नहीं किया है। नागालैंड के तमाम ग्यारह प्रमुख राजनीतिक दलों ने एकजुट होकर फैसला लिया है कि वे विधानसभा चुनाव में अपने प्रत्याशी खड़े नहीं करेंगी यानी सभी दल चुनाव का बहिष्कार करेंगे। उनके ऐसे सामूहिक फैसले से संवैधानिक संकट पैदा हो सकता है। राज्य विधानसभा की अवधि 13 मार्च को खत्म हो रही है।

चुनाव बहिष्कार का फैसला लेने वाले दलों का कहना है कि दशकों पुरानी नागा समस्या समाधान नहीं होने तक वह चुनावों में शामिल नहीं होंगे। इन दलों के साथ-साथ नागाओं के आदिवासी संगठनों, नागारिक अधिकार संगठनों और नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड सहित कई विद्रोही गुटों ने भी ऐसी साझा मांग सामने रखी है कि चुनावों से पहले नागा मुद्दे का समाधान किया जाए। पूर्वोत्तर का नागा समुदाय लंबे अर्से से नागालैंड, मणिपुर,असम,अरुणाचल प्रदेश और म्यांमार के नागा आबादी वाले इलाकों को मिलाकर एक स्वतंत्र देश बनाने की मांग कर रहा है।

इसी उद्देश्य से 1918 में कोहिमा में नागा क्लब का गठन हुआ था, ताकि तत्कालीन ब्रिटिश सरकार के सामने नागा लोगों के हितों से जुड़े मसले रखे जा सकें। यह धारणा इतनी मजबूत रही है कि सायमन कमीशन के सामने नागा नेताओं ने यह मांगपत्र रखा था कि उन्हें भारतीय संघ का हिस्सा न बनाया जाए और स्वतंत्र समूह के बतौर मान्यता दी जाए। इस दबाव का परिणाम हुआ कि 1935 के इंडिया एक्ट के तहत नागा आबादी वाले इलाकों को विशेष पिछ़डे इलाकों को वर्जित इलाकें के रूप में मान्यता दे दी गई। 1946 में यह नागा क्लब नागा नेशनलिस्ट कांउंसिल के नाम से जाना जाने लगा। 1947 में उसके नेता फीजो ने महात्मा गांधी से मुलाकात करी और कहा कि 14 अगस्त 1947 को वे अपनी स्वतंत्रता की घोषणा करेंगे और ऐसा उन्होंने किया भी। 1948 में फीजो को भारत सरकार ने गिरफ्तार कर लिया। 1952 में एक बार फिर फीजो और नेहरु के बीच वार्ता हुई, लेकिन कोई समाधान नहीं निकल सका।

1954 में फीजो ने समानांतर सरकार की घोषणा कर दी, लेकिन आगे चलकर इस आंदोलन के अंदर एक पक्ष ने भारतीय संघ के अंदर ही स्वायत्त राज्य की मांग पर गंभीरता से विचार करना शुरु कर दिया। जिसकी भारतीय राज्य के साथ कई दौर की नाकाम वार्ताएं होती रहीं। जिसकी पहल बैपटिस्ट चर्च ने की और एक ‘पीस मिशन’ का गठन किया गया, जिसमें नागा विद्रोहियों और भारत सरकार के तीन विश्वस्त लोगों को रखा गया। जिनमें बीपी चालिहा, जयप्रकाश नारायण और पादरी माइकल स्कॉट शामिल थे। साल 1964 में पीस मिशन युद्धविराम पर दस्तखत कराने में सफल रहा, जिसे 6 सितंबर 1964 की सुबह चर्च के घंटे की पहली आवाज के साथ लागू किया गया। इसके दो सप्ताह बाद भारत और नागा विद्रोहियों के बीच बातचीच की अंतहीन कहानी शुरु हुई जो आज-तक जारी है।

इस मांग को मान लेना आसान भी नहीं है। यदि ऐसी मांग स्वीकार की जाती है तो इससे सारे उत्तर पूर्व में नया बवाल खड़ा हो जाएगा। यह सही है कि राज्यों की सीमाएं दोबारा निर्धारित करना कोई समाधान नहीं होगा। इसलिए इस मसले पर पूर्वोत्तर राज्यों की जनता को असमंजस में रखना उचित नहीं है। गौरतलब है कि केंद्र सरकार आईजैक-मुइवा समेत कई संगठनों के साथ शांति प्रक्रिया में शामिल है। उनके बीच  2015 में एक शांति समझौते की रूपरेखा पर हस्ताक्षर भी हो चुके हैं, जिसमें उम्मीद जगी थी कि जल्दी नागा स्वायत्तता और राज्य के विस्तार से जुड़ी उनकी मांग का समाधान निकला लेकिन इस समझौते के बाद दोनों पक्षों के बीच बातचीत किसी नतीजे पर पहुंची।

इसके अलावा इस समझौते की रूपरेखा में शामिल शर्तों के बारे में इतनी गोपनीयता बरती गई कि किसी को कुछ पता नहीं है। लेकिन अब अंदाज लग रहा कि नागा शांति समझौते पर कोई ठोस बातचीत नहीं हुई है। अगर चुनाव से पहले स्पष्टता नहीं बनी तो शांति प्रक्रिया के साथ-साथ राज्य में कानून व्यवस्था के लिए भी कठिन चुनौती खड़ी हो सकती है। इस बार नागा संगठनों ने जिस प्रकार की एकजुटता का परिचय देते हुए चुनावों का बहिष्कार किया है,उससे तो नागा समस्या सुलझने की बजाए उलझने के अधिक आसार नजर  आते हैं। अतः केंद्र सरकार इस उभर रही समस्या पर तुरंत ध्यान देना चाहिए, वर्ना यह एक विकराल रूप अख्तियार कर सकता है।

कुशाग्र वालुस्कर

भोपाल, मध्यप्रदेश

kushagravaluskar@rediffmail.com



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