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उत्तर प्रदेश

यूपी की इकलौती आईटी सिटी नोएडा अपराधियों के निशाने पर है

Rajendra Tripathi : आईटी सिटी नोएडा में ठक-ठक गैंग ….. सावधान- यूपी की इकलौती आईटी सिटी नोएडा अपराधियों के निशाने पर है। अपराधियों का दुसाहस और नौकरशाहों की लापरवाही का अगर यही हाल रहा तो आईटी इंडस्ट्री में काम करने वाले लोग पलायन करने लगेगें। कम से कम प्रतीक तिवारी के साथ हुई घटना तो यही बताती है। साथ में यह भी बताती है कि पुलिस के कामकाज के रवैये में कोई फर्क नहीं आने वाला चाहे उनकों कितनी सुविधाएं दे दी जाएं।

Rajendra Tripathi : आईटी सिटी नोएडा में ठक-ठक गैंग ….. सावधान- यूपी की इकलौती आईटी सिटी नोएडा अपराधियों के निशाने पर है। अपराधियों का दुसाहस और नौकरशाहों की लापरवाही का अगर यही हाल रहा तो आईटी इंडस्ट्री में काम करने वाले लोग पलायन करने लगेगें। कम से कम प्रतीक तिवारी के साथ हुई घटना तो यही बताती है। साथ में यह भी बताती है कि पुलिस के कामकाज के रवैये में कोई फर्क नहीं आने वाला चाहे उनकों कितनी सुविधाएं दे दी जाएं।

प्रतीक मेरा भांजा है। वह नोएडा की एक नामचीन एमएनसी में साफ्टवेटर इंजीनियर है। उसके साथ जो घटना हुई वह दिमाग से डिलीट नहीं की जा सकती। कल रात वह रोजमर्रा के कामकाज निबटा कर घर लौट रहा था कि खोड़ा कालोनी के पास बाईक सवार दो युवकों ने उसके कार के दरवाजे पर टक्कर मार दी। और फिर लगे शोर मचाने मानों कार सवार ने कोई गलती कर दी हो। दोनों लड़कों ने उसकी कार की विंडो पीट पीट कर गालियां बकनी शुरू कर दी और कार का शीशा खोलने को मजबूर कर दिया। …पर यह क्या जब तक प्रतीक मामले को समझने की कोशिश करता बाईक सवार कार के डैस बोर्ड पर रखे आई फोन-6एस को झपट कर भाग निकले।

अमूमन खोड़ा के आसपास नंबर- 100 पुलिस की पेट्रोलिंग कार खड़ी रहती है,पर कल रात वहां कहीं दिखाई नहीं पड़ी। थक हार कर प्रतीक कार लेकर आगे बढ़ा तो पुलिस के एक अफसर की गाड़ी खड़ी दिखाई दी। कार रोक कर जब उसने आप बीती सुनाने की कोशिश की तो टका सा जवाब मिला कि घर जा कर ई-एफआईआर कर दे। मतलब ये कि तब तक उस उचक्के गैंग को लूटपाट की आजादी।

शायद ये सीमा रेखा का मामला हो। घटना स्थल नोएडा का था और साहब एनएच-24 के पार। पर अपराध तो प्रदेश में हुआ। क्या वे अपराधी एनएच-24 पार करके गाजियाबाद सीमा में वारदात नहीं कर सकते थे..क्या एक जिम्मेदार अफसर को पीडि़त को इसी तरह टरका देना चाहिए था या हरकत में आ कर वायरलेस पर सू़चना प्रसारित कर देनी चाहिए थी? अगर पुलिस इसी तरह सीमा विवाद में अपराधियों को बांटती रही तो वारदात पे वारदात होती रहेगी और ये कुछ नहीं कर पाएंगें। अभी पचास हजार कैश लुट जाता तो मामला संगीन हो जाता पर इतनी ही कीमत का मोबाईल लुट गया, अफसरशाही के कानों जूं नहीं रेंगी। शुक्र है कि ई-एफआईआर हो गई कहीं थाने जाना पड़ता तो वहां भी बेइज्जत होना पड़ता। अब सवाल उठता है कि हमारी उ. प्र. पुलिस कितनी टेक्नो है जो इस मोबाईल को बरामद कर के दिखाए….

अमर उजाला बनारस के संपादक राजेंद्र त्रिपाठी की एफबी वॉल से.

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