तन्हाई ने ओम को बनाया शराबी

ओम पुरी एक ज़िंदा दिल इंसान थे। उनके अंदर वाकई में एक दिल धड़कता था, जो ग़रीबों, मज़लूमों और आम जन के लिए समर्पित था। वो बाक़ी सभी एक्टरों से जुदा थे। मेरी नज़र में वो सबसे बड़े एक्टर थे। वो नेताओं के पिछलग्गू नहीं थे। उनके अंदर पैसे का लालच नहीं था। इसलिए शायद वो किसी भी सरकार या पार्टी को रास नहीं आए और ब्रैंड एंबेसेडर नहीं बन पाए। ओम बेलाग थ। ओम बेलौस थे। ओम मुंहफट थे। शायद इसलिए भी वो कि दिल के बेहद साफ थे। नेकदिल इंसान थे।

ओम के साथ मेरा परिचय क़रीब तीन दशक पुराना है। मेरे पारिवारिक मित्र सिद्धार्थ उपाध्याय के स्वर्गीय पिता अक्षय उपाध्याय एक हिंदी फिल्म देबशिशु की पटकथा और संवाद लिख रहे थे। उस फिल्म में ओम पुरी के अलावा स्मिता पाटिल और साधु मेहर जैसे मंजे हुए कलाकार भी थे। कोलकाता में पूरी फिल्म की शूटिंग हुई थी। वो ओम से मेरी पहली मुलाक़ात थी। वो भी सरसरी और औपचारिक तौर पर।

मीडिया में आने के बाद उनसे संबंध प्रगाढ़ हुए। पत्रकार स्वर्गीय ओलाक तोमर के साथ भी उनका घनिष्ठ रिश्ता रहा और ओलाक जी के साथ मेरा भी बेहद निजी रिश्ता रहा है। इस लिहाज़ से हमारी मुलाक़ातों का सिलसिला बढ़ता गया। कभी दिल्ली तो कभी मुंबई में मेल मुलाक़ातें होती रहीं। इन मुलाक़ातो में वो मुझे वो खुली किताब की तरह लगने लगे। कोई दुराव नहीं। कोई छिपाव नहीं। जो था, पूरी दुनिया के सामने था। उन्होंने बाक़ी लोगों की तरह कभी झूठ नहीं बोला कि वो शराब नहीं पीते बल्कि गंगा जल का आचमन करते हैं।

मेरी निजी राय है कि जब प्रतिद्वंदी आपसे योग्यता में हारने लगता है तो वो आपके बेहद निजी और नितांत क्षणों और आदतों पर वार करने लगता है। उन बातों को घसीट कर पेशेवर ज़िंदगी में लाता है। ओम पुरी के बारे में ये अफवाह फैला दी गई कि वो शराबी हैं। जहां तक मैं जानता हूँ, वो शराबी नहीं थे। वो शराब के शौक़ीन थे। इसकी एक वजह ये भी थी कि वो उस इलाक़े में जन्मे थे, जहां पर मांस-मदिरा आम जीवन शैली का हिस्सा है। सिंगल मॉल्ट विस्की के अलाव वो रम के शौक़ीन थे। उन्ही से पहली बार पता चला था कि स्कॉच में आइसक्रीम मिला कर पीने से ज़ायका कैसा हो जाता है।  

ओम पुरी का जन्म अंबाला के एक पंजाबी परिवार में हुआ था। घर की माली बेहद ख़स्ता थी। गुज़र-बसर करना मुश्क़िल था। मजबूरी में उन्होंने कोयला बीनने का काम शुरु किया। उससे गाडी घिसटने लगी। लेकिन मामला जमा नहीं। लाचार होकर एक ढाबे पर मशालची यानी बर्तन धोने का काम किया। तब उनकी उम्र बेहद कम थी। ओम के शब्दों को उधार लेकर उनका एक संवाद पेश कर रहा हूं कि ज़िंदगी में बेईमानी के बहुतेरे सबूत मिल जाएंगे। लेकिन ईमानदारी का ना तो कोई सबूत मिलता है और ना ही गवाह। ये विशुद्ध तौर पर गंधर्व सिद्धांत है। ओम के साथ भी बचपन में ऐसा ही हुआ। ढाबे के मालिक ने चोरी का झूठा इल्ज़ाम लगाकर नौकरी से बाहर कर दिया। उनके पास ईमानदारी पेश करने के लिए ना तो कोई सबूत था और ना ही कोई गवाह।

बाद में उनके ननिहाल ने उनका हाथ थामा तो ज़िंदगी पटरी पर आने लगी। शुरुआती पढ़ाई नाना-नानी के यहां रह कर की। उसी समय उनको फिल्में देखने का शौक़ हुआ। फिल्मों की तरफ रुझान भी हुआ। जानते थे कि मायनगरी उनके लिए बांहे फैलाए नहीं खड़ी है। इसलिए उन्होंने नाटक को अपना पहला पायदान बनाया। वो नाटकों में हिस्सा लेने लगे। तब तक वो कॉलेज की दहलीज पर पहुंच चुके थे। उन्हें अपने घर की ज़रुरतें पता थीं। इसलिए पढ़ाई के साथ साथ मुंशी का काम करने लगे, एक वकील के यहां।

थोड़े बहुत जब पैसे जमा हुए तो शौक़ के पर निकल आए। पुणे के फिल्म एंड टेलिविजन इंस्टिट्यूट में दाख़िला लिया। हालांकि इसके लिए भी ओम को बहुत पापड़ बेलने पड़े। लेकिन ये सच है कि इसी जगह ने उन्हें वो मुक़ाम और पहचान दिलाई, जिसके वो असली हक़दार थे।

ओम पुरी ऐसे एक्टरों में से थे, जिन्होंने पूरी दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बनाई। विक्टर बैनर्जी की तरह ओम भी हॉलीवुड का हिस्सा बन चुके थे। ईस्ट इज ईस्ट, सिटी ऑफ ज्वॉय, वुल्फ, द घोस्ट एंड डार्कनेस जैसी हॉलीवुड फिल्मों में उन्होंने अपने उम्दा अभिनय की छाप छोड़ी। साल 1980 में प्रदर्शित फिल्म ‘आक्रोश’ ओम पुरी के सिने करियर की पहली हिट फिल्म थी। गोविन्द निहलानी की इस फिल्म में ओम पुरी ने एक ऐसे शख्स का किरदार निभाया, जिस पर पत्नी की हत्या का आरोप है। फिल्म में अपने दमदार अभिनय के लिए ओमपुरी को सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता के फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

ओमपुरी का निजी जीवन कई बार विवादों में आया। उन्होंने दो शादियां की थीं। पहली पत्नी का नाम सीमा है। सीमा से उनकी बनी नहीं। शायद कारण विचारधारा और पारिवारिक पृष्ठभूमि थी। ये बातें उन्होंने कई बार होश में रहते हुए बताई थीं। सीमा से तलाक के बाद उन्होंने नंदिता पुरी से दूसरी शादी की। नंदिता से एक बेटा हुआ। उन्होंने उसका नाम बड़े प्यार और अरमान से ईशान रखा। जब मैंने एक बार उनसे इस नाम के यथार्थ के बारे में पूछा तो उन्होंने बेहद साफगोई से कहा कि मैं जिस मज़हब में पैदा हुआ हूं, उसमें सबसे पवित्र दिशा और कोण ईशान को ही माना जाता है। मेरा बेटा इसी पवित्रता की निशानी है। लेकिन नंदिता के साथ भी उनकी नहीं बनी। तलाक़ के लिए कोर्ट कचहरी का चक्कर लगाते रहे। आख़िरकार दोनों अलग भी हो गए। अन्ना हज़ारे के आंदोलन के समय मंच पर आकर सरकार को ललकारने से गुरेज़ भी नहीं किया। हालांकि इसके लिए उन्हें बहुत आलोचना झेलनी पड़ी। लेकिन एक बात मैंने जो महसूस की वो ये कि तलाक़ के बाद वो बेहद तन्हा हो गए थे। बोलना तक कम कर दिया था। उम्र के इस पड़ाव पर उन्हें सही साथी की तलाश थी लेकिन वो पवित्र कोना खाली था। शायद इसलिए वो ज़्यादा शराब पीने लगे थे।

चंदन प्रताप सिंह

प्रधान संपादक

सीएनएन हिंदी डॉट कॉम

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