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परोपकारी पत्रकार पर 500 रुपये रिश्वत का आरोप लगा तो फौरन छोड़ दी कुर्सी! पढ़ें आगे क्या हुआ

RC Tripathi : क्या वाकई सत्य परेशान हो सकता है पर पराजित नहीं। आइए दोस्तों इससे जुड़ी सच घटना आपसे बताता हूं। बात 2008 की है। मेरी नई-नई ज्वाइनिंग दैनिक जागरण यमुनानगर हरियाणा में हई थी। मुझे स्वास्थ्य विभाग की बीट मिली थी। तेजतर्रार और व्यवहारकुशल होने से जल्द ही विभाग में मेरी काफी पकड़ हो गई। मेरी सिफारिश से टेढ़ा से टेढ़ा काम बिना हल्दी फिटकरी लगे बिना किसी खर्च के बेहद आसानी हो जाता था।

जरूरतमंद लोग नि:संकोच बोल देते थे। यहां तक कि स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारी तक जरूरमंदों को कह देते थे कि त्रिपाठी जी से बोलो तुरंत हो जाएगा। लोग मेरा नंबर अरेंज कर अपनी बात कहते और मैं भी बिना किसी आनाकानी के सिफारिश कर देता। किसी महिला को प्रसव है और बेड न मिल रहा हो तो मैं रात को 12बजे जाकर बेड का अरेंज करवाता, कोई घायल है उपचार में विलंब हो रहा तो दिन रात नहीं देखता निकल जाता था घर से मदद को। इससे मैं आमजन में काफी लोकप्रिय हो गया। दोस्तों लोकप्रियता अच्छी और बुरी दोनों है। इसका ख़ामियाजा भी भुगतना पड़ सकता है।

एक दिन रात को दो बजे एक अंजान कॉल आई। पत्नी ने फोन रिसीव कर मुझे जगाया। मैंने कॉल करने वाले से पूछा तो उसने बताया कि उसके पत्नी की हालत बेहद गंभीर है। अस्पताल में बेड नहीं मिल रहा। मैंने कहा पांच मिनट में पहुंच रहा। मैं कपड़े पहन मोटरसाइकिल ले अस्पताल निकल पड़ा। पत्नी भी नाराज हुईं कि लोग रात को भी चैन नहीं लेने दे रहे। खैर अस्पताल पहुंचा और उसकी पत्नी के लिए बेड अरेंज करवा सुबह 4:00बजे लौटा।

लौटते समय वह शख्स मुझे 500 रुपये पकड़ाने लगा। मैंने कहा इस सेवा के बदले मैं कुछ नहीं लेता। उसने अपने दोस्त के कार से बैगपाइपर की बड़ी बॉटल निकाली। मैंने कहा भई मैं पीता नहीं हूं और नाराज होते हुए बोला जिसने नंबर दिया उसने मेरे बारे में बताया नहीं क्या और मैं उसे खरी-खोटी सुनाकर घर चला आया।

अगले दिन मैं ऑफिस गया तो पता चला एक गुमनाम चिट्ठी आई है जिसमें किसी की मदद के लिए मैंने 500 रुपए रिश्वत ली है। मेरे आंखों के सामने रात की घटना घूम गई। मारे क्षोभ, गुस्से और विवशता से आंखें नम हो गई। मैं सोचने लगा क्या ईमानदारी और सच्चाई का यह ईनाम मिलता है। यह दुनिया शायद इसलिए बेईमान होती जा रही। बहरहाल मैंने तय किया कि मैं सही हूं तो अपना सच साबित करके रहूंगा। मैंने अपनी सीट छोड़ दी।

अपने ब्यूरो चीफ Brijesh Dwivedi से बोला कि इस मामले की जांच कराई जाए और मैं आज के बाद तब तक कार्यालय नहीं आउंगा जब तक मैं बेदाग साबित न हो जाऊं। इसके साथ ही मैं जहां बैठता था, वहां एक बड़े कागज पर लिखकर चिपका दिया ‘सत्य परेशान हो सकता है पर पराजित नहीं’। मैंने द्विवेदी जी से कहा, जिस दिन मैं दोबारा बेदाग साबित होकर कार्यालय आऊंगा तो मैं ही इसे दीवार से उखाड़ूंगा।

इतना कहकर मैं कार्यालय से जाने लगा। ऑफिस के सहयोगी अवाक थे, कोई कहे तो क्या। मैं तकरीबन एक माह घर पर रहा। मैंने कभी फोन कर नहीं पूछा कि क्या हुआ मेरे मामले में। एक दिन द्विवेदी जी ने फोन कर कहा त्रिपाठी जी काम पर लौट आइए। मैं ऑफिस आया तो द्विवेदी जी ने इस खुशी में कार्यालय सहयोगियों को एक छोटी सी पार्टी दी। मैं अपने कुर्सी पर जैसे ही बैठा, मेरे सहयोगी मेरा दोस्त, मेरा छोटा भाई Nitin Sharma ने कहा- “सर अब तो वह पोस्टर दीवार पर से उखाड़ दीजिए जिस पर आपने लिखा था सत्य परेशान हो सकता है पर पराजित नहीं। आप पराजित नहीं हुए।”

ऑफिस का माहौल कहकहों में डूब गया। मैं बेहद खुश था बेहद।

भूली-बिसरी एक कहानी, फिर आई इक याद पुरानी.

पत्रकार आरसी त्रिपाठी की फेसबुक वॉल से.

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