दस-पंद्रह रुपये की पर्ची के चक्कर में बुरी तरह पिट गया ये ग्रामीण पत्रकार

निशान पंकज-

वैसे बेहतर तो ये था कि पत्रकारजी 10 या 15 रुपए खरचते, वनरक्षी को रसीद दिखाते और दो कॉलम की खबर बनकर छपने से बचते। क्योंकि इस पूरी घटना की जड़ में महज 10/15 रुपए हैं, जिसे पत्रकारजी को या तो ‘ अरे भाई हम पत्रकार हैं’ वाले ईगो ने नहीं खरीदने दिया होगा या फिर ‘कंजूसी का वर्ल्डकप’ जीतने की लालच ने?

Akhilesh K Singh
यहां आपसे असहमति है। शहर में बड़े संस्थान के पत्रकारों की तरह आंचलिक पत्रकारों को वेतन नहीं मिलता। वो मामूली मानदेय पर काम करते हैं। कवरेज के दौरान पार्क, जू में इंट्री और पार्किंग चुकाने के लिए छोटी मोटी सहूलियत मिली चाहिए। और इसमें कोई बुराई भी नहीं।

निशान पंकज
क्यों नहीं मिलता? कभी उन्होंने मांगा क्या? और अगर मांगने के बावजूद नहीं मिला, तो अंचल वालों को मिलकर एक आंदोलन इसके लिए करना चाहिए। वैसे भी कुछ अपवादों को छोड़ दे तो आप जिसे मामूली मानदेय वाले समझ रहे हैं, उनकी महीने की कमाई (सब कुछ मिला कर) उतनी भी मामूली नहीं है कि पार्किंग रसीद नहीं खरीद सकते हैं। और रही बात सार्वजनिक जगहों पर सहूलियत की, तो यह हर उस आदमी को मिलना चाहिए जिसे ESI मिलता है या जिसकी मासिक आमदनी कम है या नहीं के बराबर है? सिर्फ तथाकथित मामूली मानदेय वालों को क्यों?

Satyaprakash Pathak
हद है यार, बिना टिकट कोई गैर पत्रकार भी घुस जाए तो वनरक्षी उसकी पिटाई कर सकता है क्या? क्या पिटाई करने को आप जायज बता रहे हैं।

Sunil Badal
दिन भर में दस जगह कवरेज करेगा और रसीद दिखाएगा पत्रकार पर उसका पैसा कौन देगा ? कवरेज से संस्थान की लोकप्रियता बढ़ती है इसलिए मीडिया को सुविधा मिलती रही है। नियमानुसार चलें तो उद्घाटन करनेवाले नेता और निरीक्षण करनेवाले अधिकारी को भी रसीद दिखानी चाहिए।

Mangesh Jha
I am very sorry to say sir if it about rules then it’s applicable to all of us irrespective to which strata they belong to aisa bartav political party ke chamcho ke khilap thora karke dhekyie na kaya hota

Sunil Badal
so what have suggested that why not officials and neta should pay parking fee ?

Mangesh Jha
They won’t because we are the one who have chosen the weird and the wicked to be the flag bearers of the so called society

निशान पंकज
जिसने कवरेज करने का आदेश दिया है, वही पैसा भी देगा। और अगर नहीं दे रहा है, उनसे लड़िए। वनरक्षी से क्यों उलझिएगा? और बिल्कुल कवरेज से संस्थान की लोकप्रियता बढ़ती है, लेकिन लोकप्रियता बढ़ाने के लिए नियम-कानून की कुर्बानी देना भी तो सही नहीं है। दूसरी बात सुविधा और हक में अंतर होता है, और कम से कम पत्रकारों को यह अंतर पता होना चाहिए।

Shukoh Albadar
बिल्कुल दुरुस्त फरमाया हुजुर…ये पत्रकार वाला इगो है न, बड़ी खराब चीज है…



 

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