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उत्तर प्रदेश

भाजपा राज में अमेठी में पत्रकारों को जमीन पर बैठकर करना पड़ा कवरेज, देखें तस्वीर

यह नई अमेठी है। विकास के नए प्रतिमान गढ़ रही अमेठी। नए लोगों से सुसज्जित अमेठी। परिवर्तन का जनादेश और उद्घोष कर चुकी अमेठी। ऐसी अमेठी जहां पत्रकारों को नेताओं के चरणों में बैठा दिया जाता है। प्रशासन इस अभूतपूर्व दृश्य का जिम्मेदार है और प्रेस नोट भेजने के बाद फोन पर नाम देख लेने की गुजारिश करने वाले तमाम नेता इसके गवाह।

दरअसल यह पूरी प्रक्रिया पूरे प्रदेश या यूं कहें देश में बनाई जा रही उस परम्परा का हिस्सा है, जिसमें पत्रकारों को दबाव में लेने की कोशिश की जा रही है। मैं बार बार कह रहा कि प्रश्न पूछने की संस्कृति व्यवस्था ख़त्म कर देना चाहती है। यह उसी दिशा में बढ़ाया जा रहा सार्थक कदम है।

पिछले कुछ समय में प्रदेश के अलग अलग हिस्सों में तमाम ऐसी चीजें हो रही हैं जो अवांछनीय हैं। मुरादाबाद में मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में पत्रकारों को एक कमरे में बंद कर दिया गया था। नोएडा में कुछ दिन पूर्व ही गैंगस्टर लगा दिया गया। सुल्तानपुर में भी ऐसी किसी कार्यवाही की सूचना है। एक दिन पूर्व रायबरेली में पत्रकार नेता सभी को अपमानित किया गया। यह अफसरशाही द्वारा रचा जा रहा वह कुचक्र है, जो सरकार को डूबा देगा।

मैंने पहले भी कहा था और फिर कह रहा पत्रकारिता का चोला ओढ़कर गुमराह करने वाले, हर प्रकरण में पत्रकारों की ही औकात और कमी दिखाने वाले ही पत्रकारों के लिए इन अधिकारियों से ज्यादा खतरनाक है। वे अपने ढंग से इस अत्यन्त अपमानजनक प्रकरण को भी जस्टीफाई कर लेंगे।

बात इस दृश्य की। यह दृश्य पत्रकारिता से अपना जीवन शुरू करने वाले पूज्य अटल जी के आदर्शों पर चलने का दावा करने वाली पार्टी द्वारा आज चौहनापुर गांव में आयोजित विभिन्न योजनाओं के शिलान्यास व लोकार्पण कार्यक्रम का है। यहां जिला प्रशासन ने पत्रकारों को जमीन में बैठकर कवरेज करने का फरमान दिया। बाद में कहा सुनी हुई। मैं अत्यन्त श्रद्धवनत हूं आदरणीय विधायक तिलोई श्री मयंकेश्वर शरण सिंह जी का। वे स्वयं आकर हमारे साथ जमीन पर बैठ गए। आप वास्तव में हृदय से राजा हैं। हम आजीवन आपके कृतज्ञ रहेंगे। लगातार हमारे साथ बैठे रहे श्री गोविन्द सिंह जी का भी कृतज्ञ हूं। बाद में सांसद प्रतिनिधि श्री विजय गुप्ता जी की पहल पर कुछ कुर्सियां भिजवाई गई, लेकिन पत्रकारों ने हाथ जोड़ लिया। जमीन पर बैठे पत्रकारों ने पूरे कार्यक्रम में अन्न जल का बहिष्कार किया। दीगर है कि इससे पूर्व भी विकास भवन के एक कार्यक्रम में पत्रकारों को जमीन पर बैठना पड़ा था।

अमेठी के पत्रकारों चेत जाओ। अब आपके लिए कुर्सियां लगनी बन्द हो रही हैं। कुछ दिन बाद कार्यालयों में घुसना बन्द हो जाएगा। फोन उठाना लगभग बन्द ही है। नहीं चेते तो और क्या होगा राम जाने।

वरिष्ठ पत्रकार चिंतामणि मित्रा की फेसबुक वाल से.

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1 Comment

1 Comment

  1. rajesh

    August 30, 2019 at 12:30 am

    दो दशक पहले बसपा सुप्रीमो कांशीराम को कवर करने पहुंचे पत्रकार जब पिटे थे,उसके अगले ही दिन कुछ पत्रकार उनके बुलावे पर चाय पर चुस्कियां लेने पहुंचे थे। तब इस प्रकरण पर मैने एक अखबार की टिप्पणी पढ़ी थी,जिसमें गुलाम भारत के एक घटनाक्रम का जिक्र था। दरअसल उस दौर में भारतीय पत्रकारिता के स्तंभ माननीय श्री गणेश शंकर विद्यार्थी जी को तत्कालीन वायसराय ने चाय पर आमंत्रित किया था,लेकिन तब वे इस नाराजगीवश नहीं गये,क्योंकि कुछ ही दिन पहले पत्रकारिता के सम्मान पर चोट करने वाली घटना हो चुकी थी,.यानी ब्रिटिश वायसराय जैसी उस दौर की सुपर ताकत एक पत्रकार को निमंत्रण भेजे और उसका तिरस्कार, इसलिये कर दिया जाए कि उसने गुलाम भारत के पत्रकारों के सम्मान पर चोट की थी,मगर आजाद भारत में इन पत्रकारों ने अपना सम्मान कहां और क्यों गिरवी रख दिया ? अब तक यह सवाल भी होना बंद हो चुके हैं,क्योंकि अधिकांश पत्रकार नहीं,बस पत्तलपाड़ बन कर रह चुके हैं। असल में जब आका ही सफेदपोशों के आगे दरी की तरह बिछ जाएं, तो मातहतों का दरी पर बैठ जाना भी बडे़ सम्मान की बात है। मैं भी 20 साल से यह देख रहा हूं कि ये बड़े पत्रकार वो हैं,जो सचिवालयों में नौकरियों,तबादलों और अन्य कई तरह के दलाली वाले कामों की पर्चियां लेकर नेताओं के आगे पीछे ,तलवे चाटते दिखाई देते हैं। काश, यह काम दलाली के लिये ना सही,किसी सेवाभाव के लिये ही कर रहे होते या अपने काम पर फोकस करते तो इन नेताओं इतनी भी औकात नहीं की एेसे पत्रकारों को जमीन पर बैठा दे। खैर सुधरना तो है नहीं,इसी तरह करते रहो और जलालत का टौकरा सिर पर उठाकर ढोते रहो।
    जय

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