कविताः मैं पत्रकार हो गया हूं…….समझदार हो गया हूं

एक साथी ने भड़ासी कविता भेजी है। कविता साथी का ही नहीं हर उस पत्रकार का दर्द बयां करती जो कुछ करने, कुछ बदलने के लिए इस क्षेत्र में आया था लेकिन आज ‘भेड़-चाल में शुमार’ हो गया है। पढ़ें कविता:

सुना है कि अब मैं पत्रकार हो गया हूं
ना समझ था पहले अब समझदार हो गया हूं।

बहुत गुस्सा था इस व्यवस्था के खिलाफ
अब उसी का भागीदार हो गया हूं।

दिल पसीजता था राह चलते हुए पहले
कलम हाथ में आते ही दिमागदार हो गया हूं।

कभी नफरत थी कुछ छपी हुई खबरों से मुझे
आज उन्हीं खबरों का तलबगार हो गया हूं।

सोचा था अलग राह पकडूंगा पत्रकार बनकर
अब मैं भी भेड़ चाल में शुमार हो गया हूं।

लिखकर बदलने चला था दुनिया को मैं
नौकरी की वफादारी में खुद बदल गया हूं।

मुझे दिख रही है देश की तरक्की सारी
क्योंकि अब मैं नेताओं का यार हो गया हूं।

इंकबाल वंदे मातरम कई नारे आते हैं मुझे
पर क्या करूं विज्ञापनों के कारण लाचार हो गया हूं।

ढूंढता था पहले देश की बेहाली के जिम्मेदारों को
समझ गया हूं सब कुछ, अब मैं समझदार हो गया हूं,

सुना है कि अब मैं पत्रकार हो गया हूं।

 

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

Comments on “कविताः मैं पत्रकार हो गया हूं…….समझदार हो गया हूं

  • maliko se jyada dimag patrkaron k pas hota hai, fir ye unki gulami kyo karte hai. kai sawal hain mere man me aur kai honge apke man me bhi. kya tha hamare pas, n sadhan n sanpannta? bas tha to hosla aur ekta. in do chijo ne hame angrejo ki gulami se azad karaya. aaj hamare pas sab kuch, fir bhi gulam!!! kyon? kyon??
    ya to maliko ka chutiya banakar apna ullu seedha kijiye aur jo chal raha hai, use bin chhede chalte rahne dijiye. Aur agar samaj, mulq, achha-bura, sahi-galat sab ka dhyan aata hai to bhayya us patrkarita ki aaj bhi jaroorat hai jo 60-70 saal pahle k janooni log karte the.

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  • पीयूष मिश्रा says:

    कहते है, हम आजाद है ….
    कहते है, हम खुले असमान में उड़ सकते है …..
    कहते है, हम बेबाक बोल सकते है …..
    क्योंकि, कहते है, हम पत्रकारररररररर है …

    Reply

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