प्रांशु मिश्रा को चुनाव से डर क्यों लगता है?

आदरणीय अजय जी

लोकतंत्र में चुनाव एक प्रक्रिया है..मंजिल नहीं। वह साधन है..साध्य नहीं।

मेरा स्पष्ट मत है कि मौजूदा वक्त पर उप्र मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति का यह चुनाव, जो आप करा रहे हैं..वह एक जिद्द है, एक मशीनी प्रक्रिया सी है..लोकतंत्र कतई नहीं..

शुरुआत में आपने चुनाव कराने की जो मुहिम चलाई थी वह सराहनीय थी, लेकिन कहते हैं न कि ईमानदार आंदोलन भी कभी कभी आगे चलकर बेपटरी हो जाते हैं और उद्देश्य से भटक जाते हैं…

आपके आंदोलन के साथ वही हुआ है। लोकतंत्र बचाने के लिए शुरू हुआ आप का आंदोलन अब खुद लोकतंत्र..अपनी ही जनता से दूर नही हो गया है???

..आप सही हैं या गलत इस बहस को छोड़ भी दें तो यह अकाट्य सत्य है कि अध्य्क्ष महामंत्री से लेकर अन्य पदों तक पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे कई लोगों ने नामंकन न करके अपना अविश्वास जाहिर कर दिया है..

..तो सोचिए कि यह चुनाव आप में कुछ लोगों के विश्वास का है या एक बड़े जनमत के अविश्वास का..

मेरा साफ मत है कि यह चुनाव आप करा भी लें, जीते हुए लोग कभी भी वह नैतिक साहस नहीं जुटा पाएंगे कि खुद को चुना हुआ प्रतिननिधि बता सकें…

मेरा आप से अब भी यह अनुरोध है कि तमाम प्रक्रिया को स्थगित कर दें। व्यापक एकता स्थापित करने का प्रयास करें।

…नामांकन कर आए साथियों से भी अपील है कि शांत मन से सोचिए कि आप क्या कर रहे हैं…किनसे वोट मांगेंगे?।।किस मुद्दे पर मांग पाएंगे.?

…बहरहाल मुझसे तो न ही मांगियेगा। मैं आज भी सबके एकजुट होकर, सकरात्मक माहौल में होली के पहले ही चुनाव का पैरोकार हूँ और इस लक्ष्य के लिए प्रयासरत भी..

जाहिर है ऐसे में न वोट डालने जाऊंगा और न इस प्रक्रिया से कोई रिश्ता रखूंगा।

सादर
प्रांशु मिश्र, लखनऊ

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