नार्वे के स्थानीय अखबारों की स्थानीयता

प्रवीण झा

Praveen Jha : नॉर्वे में एक ट्रेंड देखता हूँ कि कई लोग स्थानीय अखबार खरीदते हैं। वही पढ़ते हैं। उसमें मुश्किल से बीस कि.मी. परिधि की खबर रहती है। कि अपने गाँव-शहर में क्या हुआ? उसी पर बीस पेज। उसी में बच्चों के जन्मदिन, मृत्यु-शोक से लेकर जो भी कार्यक्रम हुए, कहीं कोई समस्या हुई आदि।

एक दिन मैं गाड़ी से जा रहा था कि सामने एक ट्रक बर्फ में फिसल गया। ऑफिस पहुँचा हूँ और आधे घंटे के अंदर अखबार के डिजिटल एडिशन में ट्रक की तस्वीर और पूरी खबर! ऐसे ही हर छोटी-बड़ी स्थानीय खबर। यहाँ के विधायक को भी टाइट किए रहते हैं।

मुझे लगता था कि यहाँ सब कूप-मंडुक होते जाएँगे, देश-दुनिया की खबर तो है ही नहीं। अब इस ट्रक के फिसलने से अधिक जरूरी तो ब्रिटेन का चुनाव है।

लेकिन, पता नहीं क्यों, लगने लगा कि अपना घर-दुआर भी बूझ कर रखने में बुराई नहीं। ब्रिटेन का वैसे भी यहाँ बैठे क्या उखाड़ लेंगे? अपना नाला ओवर-फ्लो नहीं करे, यह भी तो जरूरी है। हवाई-सुंदरी कहती है न कि अपने बच्चा को भी मास्क लगाने से पहले अपना लगा लीजिए। सुराज दरअसल यही था कि सब अपना-अपना गाँव देख ले, तो देश भी सुधरिए जाएगा। बाकी टीवी-इंटरनेट पर तो दुनिया भर का खबर है ही।

नार्वे में कार्यरत प्रवीण झा की एफबी वॉल से.

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