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सियासत

राहुल गांधी से क्या अब भी कोई उम्मीद बाकी है?

अमेठी से स्मृति इरानी का जीतना उतनी बड़ी खबर नहीं है। बड़ी खबर यह भी नहीं है कि उन्होंने राहुल गांधी को हरा दिया है। और बड़ी खबर तो यह भी नहीं है कि सोनिया गांधी एकमात्र कांग्रेसी है, जो कभी कांग्रेस के सबसे बड़े गढ़ रहे यूपी से जीतकर संसद में पहुंचेगी। लेकिन बड़ी खबर यह है कि देश की जनता ने देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस और उसके अध्यक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व को एक बार फिर सिरे से नकार दिया है। और बीजेपी भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा जनादेश लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनाने जा रही है। अब राहुल गांधी को यह समझना होगा कि राजनीति में जिन तौर तरीकों को लेकर वे अपनी विजय पताका फहराने निकले थे, वे भारतीय जनमानस को पसंद नहीं आते।

चलिए, सबसे पहले बात अमेठी की करते हैं, जो एकमात्र ऐसी सीट है, जिसे गांधी परिवार के लिए सबसे मजबूत सीट माना जाता था और कहा जाता था कि गांधी परिवार के सदस्य को यहां से हराना मुश्किल है। अमेठी सीट पर गांधी परिवार के खड़ाऊ रखकर उनका कोई भी व्यक्ति जीत सकता हैं। संजय गांधी और राहुल गांधी की इस सीट के बारे में याद करें, कभी कैप्टन सतीश शर्मा चहां के सांसद के रूप में जीते थे। हालांकि स्मृति इरानी ने गांधी परिवार के इस तिलिस्म को तोड़ दिया है। स्मृति मूल रूप से पंजाबी है, दिल्ली की रहनेवाली है। मुंबई में रहती है और गुजरात से राज्यसभा की सदस्य है। मतलब साफ है कि वह अमेठी के लिए बाहरी हैं। इसीलिए इस जीत को चमत्कारी कहा जा सकता है। इसीलिए अमेठी में किसी बाहरी उम्मीदवार से राहुल गांधी का हार जाना कांग्रेस के भविष्य पर काफी सवाल खड़े करता है। सही मायने में कहें, तो गांधी परिवार के लिए अमोठी की यह हार बेहद शर्मनाक हार हैं। क्योंकि कांग्रेस इस सीट से अपने सबसे बुरे वक्त में भी जीत हासिल करती रही है। लेकिन राहुल गांदी देश भर में घूम घूम कर चोकीदार चोर है, चोकीदार चोर है… ही कहते रह गए और चौकीदार पूरे सवा सौ करोड लोगों का दिल चुरा कर देश जीतकर दूसरा बार भी ऐतिहासिक बहुमत से आगे निकल गया।

राहिल गांधी जब कांग्रेस अध्यक्ष बने थे, तो कहा जा रहा था कि उनके आने से कांग्रेस में एक नया आत्‍मविश्‍वास आ गया है। बाद में अशोक गहलोत की कोशिशों से गुजरात में हुई उनकी जीत के बाद कहा जाने लगा कि राहुल गांधी अब पप्पू नहीं हैं, जैसा कि उन दिनों उन्हें ट्रेडिशनल और सोशल मीडिया में पेश किया जा रहा था। कुछ दिन पहले तक तक उन्हें अधिक गंभीरता से लिया जाने लगा था, अमेठी की हार और कांग्रेस के दूसरी बार लगातार शर्मानाक हार ने राहुल गांथी की नेतृत्व पर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। क्योंकि सन 2014 में हुई नरेंद्र मोदी और उनकी बीजेपी की प्रचंड़ जीत के पांच साल बाद आज राहुल गांधी की अध्‍यक्षता में लड़े गए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की स्थिति में कोई खास बदलाव देखने को नहीं मिला। उल्टे कांग्रेस को नुकसान ही हुआ है। कांग्रेस के लिए यह आत्म मंथन का दौर है, क्योंकि राजनीति में खारिज होने के बाद वैसे भी आत्म मंथन के अलावा बाकी क्या रहता है। कुछ सोचिये राहुल जी। लोग कह रहे है कि खुद के बारे में नहीं, तो उन करोड़ों कांग्रेसियों के बारे में तो राहुल गांधी को सोचना चाहिए, जो विचारधारा की राजनीति करते हैं। लेकिन अपना सवाल है कि विचार आखिर होता क्या है, यह पता नहीं राहुल गांधी को पता भी है या नहीं।

लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक हैं.

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