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सियासत

उत्तर भारत की राजनीति में फिल्मी सितारों की औकात दोयम दर्जे वाली!


राहुल सिंह शेखावत

भारतीय राजनीति में फिल्मी कलाकारों की दस्तक कोई अनोखी बात बिल्कुल भी नहीं है। दक्षिण भारत में तो फिल्मों से जुड़ी शख्शियतों ने इस कदर धाक जमाई कि पिछले कई दशकों से राजनीति की धुरी ही उनके इर्द गिर्द घूमती रही है।17 वी लोकसभा के चुनावी दौर में आधा दर्जन से ज्यादा सितारों की ‘पॉलिटिकल-एंट्री’ हुई है। जिनमें सबसे ज्यादा सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए हैं। इस कड़ी में फ़िल्म अभिनेता सनी देओल भाजपा और अभिनेत्री उर्मिला मातोंडकर कांग्रेस में शामिल हुई हैं। भोजपुरी स्टार रवि किशन और दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’ ने भाजपा का दामन थामा। उसी तरह मशहूर सूफी गायक हंसराज हंस ने बीजेपी में छलांग लगाई। हालांकि चुनाव तो नहीं लड़ रहे लेकिन मशहूर पंजाबी पॉप सिंगर दलेर सिंह मेहंदी भी भाजपा में शामिल हो गए हैं।

अभी अभिनेता और गायक अरुण बख्शी ने भी भाजपा का दामन थाम लिया। इसमें कोई शक नहीं है कि सेलेब्रिटीज़ की पैराशूट लैंडिंग और उनके चुनाव लड़ने से सियासी माहौल ग्लैमरस हो जाता है। साथ ही, सम्बंधित दलों के लिए आसान जीत की संभावनाओं का रास्ता खुल जाता है। कहने की जरूरत नहीं है कि फिल्मी सितारे जमीनी कार्यकर्ताओं के हक पर डाका डालते हुए सीधे चुनावी राजनीति में कूद जाते हैं। अहम सवाल ये है कि क्या ये सितारे अपने मतदाताओं अथवा लोकतंत्र की भावना की कसौटी पर खरा उतर पाते हैं?

इन सवालों पर चर्चा से पहले लोकसभा चुनाव लड़ रहे सितारों पर एक नजर डालते हैं। हाल ही में भाजपा में शामिल हुए सन्नी देओल पंजाब की गुरदासपुर, रविकिशन उत्तर प्रदेश की गोरखपुर, निरहुआ उत्तर प्रदेश की आजमगढ़ और हंसराज हंस उत्तर पश्चिमी दिल्ली लोकसभा सीट से उम्मीदवार हैं। जबकि उर्मिला मातोंडकर उत्तरी मुंबई से कांग्रेस के टिकट पर ताल ठोक रही हैं। पहले से ही राजनीति में सक्रिय फ़िल्म अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा बिहार के पटनासाहिब और राजबब्बर उत्तर प्रदेश की फतेहपुर सीकरी सीट से कांग्रेस उम्मीदवार हैं।

भाजपा में ड्रीमगर्ल हेमा मालिनी मथुरा से दुबारा चुनाव लड़ रही हैं। इस बार अभिनेत्री जयाप्रदा उत्तरप्रदेश में रामपुर सीट से बतौर भाजपा प्रत्याशी अपना भाग्य आजमा रही हैं। मशहूर गायक एवं केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो फिर से पश्चिम बंगाल की आसनसोल लोकसभा सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस ने उनके सामने पुराने जमाने की मशहूर अभिनेत्री मुनमुन सेन को उतारा है। भोजपुरी स्टार मनोज तिवारी फिर से उत्तर पूर्वी दिल्ली लोकसभा क्षेत्र से भाजपा के उम्मीदवार हैं।

ये तो आज की तस्वीर है लेकिन अतीत इस बात का गवाह है कि तमाम नामचीन फिल्मी सितारे ना सिर्फ सियासत के मैदान में कूदे बल्कि चुनाव भी जीते। सबसे बड़ा नाम फ़िल्म अभिनेता स्वर्गीय सुनील दत्त का है, जो मुंबई से सांसद निर्वाचित होकर पी वी नरसिम्हा राव सरकार में मंत्री भी बने। स्वर्गीय विनोद खन्ना पंजाब के गुरूदासपुर से सांसद बनकर अटल बिहारी सरकार में मंत्री बने। उसी तरह शत्रुघ्न सिन्हा भी अटल बिहारी सरकार में मंत्री रहे, हालांकि वो अब कांग्रेस में शामिल हो गए हैं।

इस फेहरिस्त में पुराने जमाने के सुपरस्टार स्वर्गीय राजेश खन्ना का नाम भी आता है, जो दिल्ली में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीतकर लोकसभा में पहुंचे थे। पुराने जमाने की मशहूर अभिनेत्री वैजयंती माला भी कांग्रेस की लोकसभा सदस्य रही। और भला बिग बी अमिताभ बच्चन को कैसे बुलाया जा सकता है, जिन्होंने अपने स्टारडम के दम पर 1984 के चुनाव में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे हिमालय पुत्र हेमवती नन्दन बहुगुणा को धराशायी कर दिया था।

लेकिन फिल्मों से जुड़ी शख्शियतों की धाक तो सिर्फ दक्षिण भारत में देखने को मिलती है। स्वर्गीय एम जे राम चंद्रन, जे जयललिता, एम करुणानिधि के नेतृत्व में द्रविड़ राजनीति के उभार ने तमिलनाडु में तो कांग्रेस को फ्रंट लाइन से ही अलग कर दिया। इसी तरह स्वर्गीय एन टी रामाराव ने आंध्र प्रदेश राज्य में कांग्रेस के एकतरफा वर्चस्व को खत्म करते हुए तेलगुदेशम पार्टी को स्थानीय राजनीति का एक प्रमुख धुव बना दिया था।

आलम ये है कि कांग्रेस-भाजपा आज वहां क्षेत्रीय पार्टियों की पिछलग्गू की भूमिका में हैं। मानो दक्षिण के इन चार नेताओं ने अपने-अपने राज्यों में राजनीति की धुरी को अपने तिलिस्म में कैद ही कर लिया हो। एम जे आर, करुणानिधि एवं जयललिता तमिलनाडु और रामाराव आन्ध्र प्रदेश के एक से ज्यादा बार मुख्यमंत्री रहे। रामाराव तो राष्ट्रीय राजनीति के सूत्रधार के रूप में 1989 में वीपी सिंह लहर में बने राष्ट्रीय मोर्चा के संयोजक भी बने। इसी तरह जयललिता और करुणानिधि ने केंद्र में पूर्ववर्ती अटल बिहारी बाजपेयी और डॉ मनमोहन सिंह की सरकारें गठित करके राष्ट्रीय राजनीति की धुरी भी अपने हाथों में रखी थी। हालांकि यह अच्छा नहीं है कि इनकी इस कदर लोकप्रियता रही कि उनके समर्थकों ने अप्रिय खबर सुनने के बाद आत्महत्या तक कर डाली।

ये सब बताने का आशय इतना भर है कि भले ही दक्षिण भारत के ये सितारे फिल्मी फिल्मी स्टारडम के सहारे राजनीति में आए हों। लेकिन उन्होंने पिछले तीन से चार दशकों के दौरान अपने-अपने राज्यों में लोगों के दिलों दिमाग पर जमकर राज किया। लेकिन उसके एकदम उलट ये कड़वी सच्चाई है कि फिल्मी सितारे देश के बाकी हिस्सों और खास तौर पर हिंदी बेल्ट की सियासत में दक्षिण भारत की तरह धाक नहीं जमा पाए।

चुनाव दर चुनाव फिल्म स्टार राजनीति में कूदते तो गए, लेकिन ज्यादातर एक कर्मठ अथवा जनाधार वाले राजनेता बनने की बजाय अपनी-अपनी पार्टियों के लिए या तो ग्लैमरस आइकन या फिर देशी भाषा में कहे तो भीड़ जुटाऊ नेता ही बन कर रह गए। बेशक आज मनोज तिवारी दिल्ली भाजपा के मुखिया और राजबब्बर उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रदेश अध्यक्ष भी हैं। लेकिन अभिनेता से नेता बने इन दोनों में कोई एक भी जनमानस में गम्भीर नेता की छवि नहीं बना सका। हां ये ठीक है कि वो अपने निर्वाचन क्षेत्रों में थोड़ा बहुत लोकप्रिय रहे हैं।

दक्षिण भारत में फ़िल्म अभिनेता कमल हासन और रजनीकांत सियासत में कूद गए हैं। लेकिन ये आने वाला समय बताएगा कि क्या वो तमिलनाडू में एम जे आर, करुणानिधि और जयललिता सरीखा जादू पैदा करने में सफल हो पाएंगे या नहीं। पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी की दोस्ती के आह्वान पर अमिताभ बच्चन 1984 में इलाहाबाद से कांग्रेस से सांसद निर्वाचित तो हुए, लेकिन बोफर्स तोप घोटाले में नाम उछलने पर उन्होंने सियासत से तौबा कर ली थी।

बिग बी की पत्नी जया बच्चन समाजवादी पार्टी से राज्यसभा सांसद हैं, लेकिन पार्टी में इनकी भूमिका एक शोपीस से ज्यादा कभी नजर नहीं आई। इसी तरह गोविंदा कांग्रेस के टिकट पर उत्तर पश्चिम मुंबई में भाजपा के दिग्गज राम नाईक को हराकर 2004 में सांसद बने थे। धर्मेंद्र राजस्थान के बीकानेर से लोकसभा चुनाव जीते, लेकिन उसके बाद संसदीय क्षेत्र में हीमैन की गुमशुदगी के पोस्टर चिपकाए गए। उनकी पत्नी ड्रीमगर्ल हेमा मालिनी पहले राज्यसभा में रहीं और फिर 2014 में मथुरा से भाजपा सांसद निर्वाचित हुई।

आन्ध्र प्रदेश की तेलगुदेशम पार्टी से पॉलिटिकल एंट्री करने वाली जयाप्रदा पहले समाजवादी पार्टी गई, और मौजूदा चुनावी समर में भाजपा में शामिल हो गईं। इसी तरह छोटे पर्दे की अभिनेत्री स्मृति जुबिन ईरानी ने भाजपा में छलांग लगाई और मोदी सरकार में मंत्री भी हैं। लेकिन इन सभी नेताओं में आज भी कोई एक ये दावा नहीं कर सकता कि वो अपने दल में रहकर, दक्षिण भारत के फिल्मी सितारों की तरह एक प्रभावशाली जननेता की छवि गढ़ने करने में सफल रहा है।

वैसे सिर्फ फ़िल्म ही नहीं बल्कि स्पोर्ट्स ग्लैमर के सहारे भी कई खिलाड़ी सियासत में छलांग लगा चुके हैं। अगर मौजूदा लोकसभा चुनाव की बात करें तो क्रिकेटर गौतम गम्भीर भाजपा के टिकट पर पूर्वी दिल्ली और बॉक्सर विजेंदर सिंह दक्षिण दिल्ली से कांग्रेस के प्रत्याशी हैं। उधर, कांग्रेस ने राजस्थान की जयपुर ग्रामीण सीट पर राष्ट्रमंडल खेलों की ‘गोल्ड मेडलिस्ट’ और मौजूदा विधायक कृष्णा पूनिया को उतारा। जिनका ‘ओलंपिक-मेडलिस्ट’ केंद्रीय मंत्री मेजर राज्यवर्धन सिंह राठौड़ से सीधा मुकाबला है।

इनके पहले क्रिकेटर मोहम्मद अजहरुद्दीन 2009 में कांग्रेस के मुरादाबाद क्षेत्र और कीर्ति आजाद बिहार में दरभंगा से भाजपा के सांसद निर्वाचित हुए थे। पूर्व क्रिकेटर चेतन चौहान रामलहर में भाजपा के टिकट पर उत्तर प्रदेश के अमरोहा से लोकसभा सदस्य निर्वाचित हुए और फिलहाल योगी सरकार में मंत्री हैं। इसी तरह हॉकी खिलाड़ी असलम शेर खान मध्यप्रदेश में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीतकर मंत्री बने थे।

लब्बोलुआब इतना भर है कि ग्लैमर के सहारे फिल्म अथवा स्पोर्टस स्टार की पैराशूट एंट्री से सम्बंधित दलों के लिए (अपवाद छोड़कर) जीत तो आसान हो जाती है। लेकिन दक्षिण भारत छोड़कर देश के अन्य किसी हिस्से में ज्यादातर फिल्मी सितारे संजीदा राजनेता की छाप छोड़ने में नाकाम ही रहे हैं।

राहुल सिंह शेखावत

पूर्व संवाददाता-ई टीवी
ब्यूरो चीफ-समाचार प्लस
विशेष संवाददाता-न्यूज़18
एडिटर ‘हिंदी खबर’ न्यूज़ चैनल
[email protected]

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