‘रामचरितमानस’ को धर्मग्रंथ बनाने के नुक़सान!

वीरेंद्र यादव-

एक खामख्याली यूं ही। मुझे लगता है कि तुलसी की उत्कृष्ट साहित्यिक काव्य रचना ‘रामचरितमानस’ को धर्मग्रंथ बनाने का एक बड़ा नुकसान हिंदी कथा साहित्य को इस तरह झेलना पड़ा कि जो जनता अपने खाली समय में किस्सा कहानी पढ़ती वह रामचरित मानस में उलझी रही कि रामकथा पढ़ने के साथ उसे पुण्य लाभ भी मिलेगा। यह कबीर की कीमत पर भी हुआ।

विचार किया जाना चाहिए कि कबीरपंथ गांव के दक्खिन टोले और गैर सवर्ण जातियों में ही क्यों पनपा। निराला का ‘चतुरी चमार’ कबीर की उलटबांसियों की गिरह खोलने में दक्ष में है लेकिन रामचरितमानस उसके सरोकारों में शामिल नहीं है। सोचिए यदि प्रेमचंद के ‘गोदान’, नागार्जुन के ‘बलचनमा’ और रेणु के ‘मैला आंचल’ सरीखे कथा साहित्य को अपने दैनंदिन जीवन में रीडिंग टेक्स्ट के रूप में उत्तर भारत की जनता ने अपनाया होता तो हिंदी का साहित्यिक परिदृश्य कैसा होता और फिर यह गोबरपट्टी क्या इतनी ही कूढ़मगज होती !

दूसरा बड़ा नुकसान यह हुआ कि धर्मग्रंथ होने के कारण इसके पाठकों ने अपना विवेक इस कदर स्थगित कर दिया कि विचित्र , असंभव और पराभौतिक को कवि कल्पना की उड़ान न मानकर देवलीला मानने लगे। यह अकारण नहीं था कि प्रेमचंद ने इसे आद्योपांत पढ़ने की आवश्यकता नहीं समझी क्योंकि यह अतार्किकता को बढ़ावा देने वाला अंधविश्वासी पवित्र ग्रंथ के रूप में ढाल दिया गया था।

यहां तक कि अपवादों को छोड़कर एकेडमिक दुनिया भी उत्कृष्ट कवि कर्म और कर्मकांडी धर्मग्रंथ का अंतर मिटा कर तुलसी भक्ति में इस कदर डूबी कि असहमति के स्वर को अस्मितावाद का पर्याय मानकर स्वयं ही जाने अनजाने ब्राह्मणवादी चातुर्वर्ण्य की पैरोकार बन बैठी।

यह अकारण नहीं है कि इस दौर में तुलसी और रामचरितमानस को लेकर हिंदी एकेडमिक्स के बीच जितनी गहमागहमी है उतनी कबीर को लेकर नहीं। जबकि वास्तविकता यह है कि कबीर जितने आज प्रासंगिक और जरूरी हैं उतने इसके पहले कभी नहीं थे।

और इस काव्यग्रंथ ने धार्मिक ग्रंथ बनकर क्या क्या किया इसे विस्तार से समझने के लिए फिलहाल हिंदी का एक उपन्यास पर्याप्त है वह है दूधनाथ सिंह का उपन्यास ‘आखिरी कलाम’ . चाहें तो उसे पढ़िए।

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One comment on “‘रामचरितमानस’ को धर्मग्रंथ बनाने के नुक़सान!”

  • Abhishek shukla says:

    तुलसी और कबीर में अंतर रखने वाले मानसिक दिवलियो को न तो कबीर से मतलब है न तुलसी से। वो तो खुद जातिवाद से ग्रसित हैं। क्योंकि जिसने कबीर को पढ़ा होगा वो तुलसी को सम्मान देगा और जिसने तुलसी को पढ़ा है वह कबीर का सम्मान करेगा। इस दुनिया मे हर व्यक्ति अलग विचार रखता है और किसी को कुछ पढ़ने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। साहित्य अनंत है और उसका आनंद पाठक ही महसूस कर सकता है।

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