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सहारा की डायरी : नेताओं को अरबों रुपए रिश्वत देने वाले गलत तरीके से खुद कितने रुपए कमाते होंगे!

तोड़ना ही होगा सहारा व नेताओं का गठजोड़

कारपोरेट घरानों और नेताओं के गठजोड़ ने देश की राजनीति की ऐसी की तैसी कर दी है। कारपोरेट घरानों और नेताओं ने मिलकर व्यवस्था को ऐसे कब्जा रखा है कि आम आदमी सिर पटक-पटक कर रह जा रहा है। जनता के चंदे से चुनाव लड़ने वाले दल अब पूंजीपतियों के पैसों से चुनाव लड़ते हैं तथा चुनाव जीतकर उनके लिए ही काम करते हैं। जनता की भावनाओं से खिलवाड़ करने का खेल तो बहुत लंबे समय से चल रहा है पर सहारा की डायरी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गुजरात के मुख्यमंत्री के पद पर रहते हुए पैसा लेने की लिस्ट में नाम आने से मामला गरमाया है।

तोड़ना ही होगा सहारा व नेताओं का गठजोड़

कारपोरेट घरानों और नेताओं के गठजोड़ ने देश की राजनीति की ऐसी की तैसी कर दी है। कारपोरेट घरानों और नेताओं ने मिलकर व्यवस्था को ऐसे कब्जा रखा है कि आम आदमी सिर पटक-पटक कर रह जा रहा है। जनता के चंदे से चुनाव लड़ने वाले दल अब पूंजीपतियों के पैसों से चुनाव लड़ते हैं तथा चुनाव जीतकर उनके लिए ही काम करते हैं। जनता की भावनाओं से खिलवाड़ करने का खेल तो बहुत लंबे समय से चल रहा है पर सहारा की डायरी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गुजरात के मुख्यमंत्री के पद पर रहते हुए पैसा लेने की लिस्ट में नाम आने से मामला गरमाया है।

दिल्ली के मुख्मयंत्री अरविंद केजरीवाल और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील व स्वराज इंडिया पार्टी के नेता प्रशांत भूषण के बाद कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने सहारा-प्रधानमंत्री प्रकरण को जोर-शोर से उठाया है। मामला बिड़ला ग्रुप का भी है पर सहारा मामले का जोर मारने का कारण सहारा प्रमुख सुब्रत राय का राजनेताओं के साथ घनिष्ठ संबंध होना है। दरअसल सुब्रत राय पैसे के बल पर हर किसी को खरीदना चाहते हैं। निवेशकों का पैसा हड़पने का मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था तब भी उन्होंने समाचार पत्रों में पूरे के पूरे पेज विज्ञापन देकर सेबी को पैसा देने नहीं बल्कि उससे वसूलने की बात कही थी। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी हेकड़ी निकाली है कि जो पैसा वह सेबी से लेने की बात कर रहे थे चुपचाप देने की व्यवस्था में लगे हैं।

हां, सुप्रीम कोर्ट को यह भी देखना होगा कि निवेशकों की हड़पी रकम को वह कहीं फिर से निवेशकों से उगाहकर तो नहीं लौटा रहे हैं ? क्योंकि तमाम प्रतिबंधों के बावजूद सहारा की उगाही रुकी नहीं है। एक ओर संस्था अपने प्रचार-प्रसार करोड़ों रुपए खर्च कर रहे ही तो दूसरी ओर अपने कर्मचारियों का जमकर शोषण और उत्पीड़न कर रही है। राजनीतिक दलों के साथ संबंधों के दम पर संस्था के हर गलत काम को दबा दिया जाता है। प्रधानमंत्री का नाम लिखी जो डायरी जिस छापे में मिली थी, उस मामले में कोई कार्रवाई न होना कहीं न कहीं केंद्र सरकार से साठ-गांठ की बात दर्शा रहा है। जो संस्था अपने कर्मचारियों को कई महीने से वेतन नहीं दे रही थी, उस संस्था के कार्यालय में 134 करोड़ रुपए जब्त किए गए।

12 महीने का बकाया वेतन और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मजीठिया वेजबोर्ड मांगने वाले कर्मचारियों ने उत्तर प्रदेश सरकार से लेकर केंद्र सरकार और राष्ट्रपति महोदय तक को अपनी पीड़ा लिखी पर उनका कुछ भला न हो सका। उल्टे आंदोलन की अगुआई कर रहे 22 कर्मचारियों को बर्खास्त कर दिया गया। जिस संस्था में कर्मचारियों के साथ इस हद तक उत्पीड़न किया जा रहा हो और उसका कुछ न बिगड़ रहा हो कहीं न कहीं राजनीतिक दलों के साथ गठजोड़ को दर्शा रहा है। मुंबई और नोएडा दो जगह आयकर विभाग के छापे पड़ने के दो-तीन साल बाद भी मामले में कोई कार्रवाई न होना केंद्र सरकार को भी कटघरे में खड़ा कर रहा है। सहाराकर्मी और देशहित में सहारा प्रमुख और राजनीतिक दलों के संबंधों के राज से पर्दा उठना बहुत जरूरी है। जरूरी इसलिए भी क्योंकि यह व्यक्ति देशभक्ति का ढकोसला कर जनता के साथ अपने ही कर्मचारियों को ठगने में लगा है।

सहारा की डायरी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम आने पर कांग्रेस प्रधानमंत्री पर तो निशाना साध रही है पर मामले की जड़ सहारा के प्रति नरम रवैया क्यों अपनाए हुए है। सहारा की डायरी में 100 लोगों के नाम बताए जा रहे हैं। तो समझ लीजिए कि इस संस्था ने कितने काले कारनामों को छिपाने के लिए 100 लोगों को रिश्वत दी होगी। निश्चित रूप यह धनराशि अरबों में रही होगी। जो संस्था नेताओं को अरबों रुपए की रिश्वत दे रही हो। उसने गलत से ढंग कितने रुपए कमाए होंगे बताने की जरूरत नहीं है। निश्चित रूप से खेल खरबों का रहा होगा। यह सब पैसा गरीब जनता का ही रहा होगा। यह तो सहारा की बात है देश के कितने पूंजीपति नेताओं के साथ मिलकर अरबों-खरबों का खेल कर रहे हैं।

यही वजह है कि इस व्यवस्था में जनता को कीड़े-मकोड़े से ज्यादा नहीं  समझा जा रहा है। पैसे और सत्ता की ताकत के बल पर भ्रष्ट हो चुकी इस व्यवस्था के खिलाफ उठने वाली आवाज को दबा दिया जा रहा है। प्रधानमंत्री नोटबंदी और बेनामी संपत्ति पर प्रहार की बात तो कर रहे हैं। उनक कारपोरेट घरानों की बात नहीं कर रहे हैं, जिन्होंने नेताओं के जमीर को खरीद रखा है। जब तक राजनीतिक दलों और कारपोरेट घरानों की गठजोड़ नहीं टूटेगा तब तक गरीब किसान और मजदूर की भलाई की बात करना बेमानी है। गरीब और अमीर की खाई पाटने, स्वच्छ राजनीति लाने और देश के विकास के लिए पूंजीपतियों और राजनीतिक दलों का गठजोड़ बेनकाब कर इसे तोड़ना जरूरी हो गया है।

दरअसल राजनीतिक दलों के साथ मिलकर ये कारपोरेट घराने अपने कर्मचारियों का जमकर शोषण-उत्पीड़न करते हैं। यदि विरोध में कहीं से कोई आवाज उठती भी है तो उसे बलपूर्वक दबा दिया जाता है। वैसे तो लगभग हर पूंजीपति यह सब कर रहा है पर सहारा में कुछ ज्यादा नहीं बल्कि बहुत ज्यादा हो रहा है। हाल यह है कि यह संस्था जहां तरह-तरह के कार्यक्रम कर देशभक्ति का ढकोसला करती घूम रही है वहीं इसने संस्था को 2000 से दो लाख करोड़ तक पहुंचाने कर्मचारियों को तबाह कर मानसिक रोगी बना दिया है।

चरण सिंह राजपूत
[email protected]

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1 Comment

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  1. कुमार कल्पित

    January 1, 2017 at 4:42 pm

    राजपूत जी, छापे के दौरान पकड़ी गयी डायरी तो नमूना मात्र है। न जाने ऐसी कितनी डायरियां होंगी जिनमें हजारों लोगों का काला चिट्ठा होगा। ऐसा नहीं है कि सहारा निवेशकों का पैसा वापस करने की स्थिति में नहीं है या करना नही चाहता। छोटे-छोटे निवेशकों का तो कर दिया, बड़ों का (उदाहरण के लिए किसी नेता,मंत्री,नौकरशाह, खिलाड़ी या फिल्मी कलाकार का) करोड़ों-अरबों वापस करते हैं तो सेबी/ अदालत यह नहीं पूछेगी कि किसका है जिसे वापस करें तो किसका नाम बतायेंगे। जिसका नाम बतायेंगे फिर उसे पूछताछ होगी।
    सुब्रतो राय के दोनों बेटों की शादी में ऐसा कौन सा (वामपंथी पार्टियों को छोड़कर ) नेता, सांसद,विधायक मंत्री, फिल्मी सितारे, खिलाड़ी, नौकरशाह, व्यापारी, उद्योगपति-पूंजीपति है जो मत्था टेकने नहीं आया। ये सबके सब ऐसे नहीं आये सब अपना-अपना हित साधने के लिए आये। इनमें से 99% लोगों ने अपनी काली कमायी यहां लगा रखी होगी। लखन ऊ व आसपास के जिलों के सभी होटल सहारा ने बुक खर रखे थे। आपकी यूनिट से ही चमचों की ड्यूटी लगी थी कार्ड बांटने के लिए। सुना है अधिकारी ही नही उनके चिंटुओं ने भी हवाई यात्रा की थी, सबको अच्छा-खासा तोहफा भी मिला था। जिनका कोई नहीं था उन्हे एक लड्डू तक नहीं मिला। सहारा की आपनी पत्रिका (अपना परिवार) का दावा है कि बाँलीउड में पांच दिनों तक एक भी फिल्म की शूटिंग नहीं हुई यानी फिल्मी दुनिया के लोग सहारा शहर में मत्था टेकने आये थे।
    मित्र मेरे कहने का मतलब यह है कि ” जेकर बहिन अंदर वोकर भाई सिकंदर।
    ठीक इसके उलट ” देश की सारी नदियां बंगाल की खाड़ी में नहीं गिरतीं हैं।
    चूंकि मेरा मामला अदालत में प्रक्रियाधीन है इसलिए काल्पनिक नाम का इस्तेमाल करता हूं।

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