सुब्रत राय पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, एंबी वैली बेचने और कोर्ट में हाजिर होने के आदेश

सुप्रीम कोर्ट से सुब्रत रॉय को तनिक भी राहत नहीं मिली. कोर्ट ने 34,000 करोड़ रुपये वाली एंबी वेली को बेचने का आदेश कर दिया है. सुप्रीम कोर्ट एंबी वैली की नीलामी की देखरेख के लिए ने बॉम्बे हाईकोर्ट को कहा है. कोर्ट ने सहारा को आदेश दिया है कि अगले 48 घंटों में एंबी वैली से जुड़ी सभी जानकारी सौंपे. कोर्ट आदेश में कहा गया है कि सेबी और बॉम्बे हाईकोर्ट कोर्ट सभी कागजात मिलते ही नीलामी प्रक्रिया शुरू कर दें. सुप्रीम कोर्ट ने सुब्रत रॉय सहारा को आदेश दिया है कि वह 28 अप्रैल को कोर्ट में पेश हों.

सहारा समूह के प्रमुख सुब्रत राय तथा दो अन्य निदेशकों रविशंकर दुबे और अशोक राय चौधरी को ग्रुप की दो कंपनियों सहारा इंडिया रीयल एस्टेट कॉरपोरेशन और सहारा हाउसिंग इन्वेस्टमेंट कॉर्प लिमिटेड द्वारा 31 अगस्त, 2012 तक निवेशकों का 24,000 करोड़ रुपये का रिफंड करने के आदेश का अनुपालन नहीं करने के लिए गिरफ्तार किया गया था. एक निदेशक वंदना भार्गव को हिरासत में नहीं लिया गया था. सुप्रीम कोर्ट ने 6 मई, 2016 को सुब्रत राय को अपनी मां की अंत्येष्टि में शामिल होने के लिए चार हफ्ते का पैरोल दिया था. उसके बाद से उनके पैरोल को बढ़ाया गया है.

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सहारा प्रबन्धन के खिलाफ जुलूस : सहारा टॉवर, सहारा शहर और ओपी श्रीवास्तव के घर के सामने हुआ प्रदर्शन

लखनऊ। सहारा प्रबन्धन के खिलाफ आज उत्पीड़ित और शोषित सैकड़ों कर्मचारियों ने अपनी मांगों को लेकर विरोध रैली निकालकर सहारा टावर कपूरथला, सहारा शहर और वायरलेस चैराहा स्थित ओ0पी0 श्रीवास्तव के आवास के समक्ष जोरदार प्रदर्शन किया। सहारियन कामगार संगठन उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष ऋषि कुमार त्रिवेदी के नेतृत्व में सहारा स्टेट जानकीपुरम से सैकड़ों की संख्या में कर्मियों की शुरू हुयी विरोध रैली जैसे ही कपूरथला स्थित सहारा कार्पोरेट कार्यालय पहंची, जोरदार प्रदर्शन शुरू कर दिया गया। इस विरोध प्रदर्शन के दौरान सहारा कार्यालय में मौजूद अन्य सभी कर्मी भी बाहर निकल आये और प्रदर्शनकारियों के साथ प्रबन्धन के खिलाफ जोरदार नारेबाजी शुरू कर दी।

इस विरोध प्रदर्शन में महिला कर्मियों ने भी बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया। कपूरथला में लगभग एक घण्टे के प्रदर्शन के बाद रैली वायरलेस चैराहा महानगर स्थित ओ0पी0 श्रीवास्तव के आवास के समक्ष प्रदर्शनकारियों की विरोध रैली जा पहुंची। वहां भी जमकर नारेबाजी हुयी और अपनी मांगों को पूरा करने की मांग करने लगे। काफी देर के तक यहां विरोध प्रदर्शन होने के बाद सहारा शहर, गोमतीनगर सहित विभिन्न मार्गों से होते हुये लक्ष्मण पार्क, के0डी0 सिंह बाबू स्टेडियम के समक्ष विरोध रैली का सम्पन्न हुयी।

रैली के समापन मौके पर संगठन के अध्यक्ष ऋषि कुमार त्रिवेदी ने बताया कि सहारा प्रबन्धन ने बीते ढाई वर्षों से अपने कर्मचारियों को वेतन का भुगतान नहीं कर रहा है और वेतन की मांग किये जाने पर सभी कर्मचारियों को असंवैधानिक एवं गैरकानूनी ढंग से विभिन्न राज्यों में स्थानान्तरित किया जा रहा है व ज्वाइन न करने पर नौकरी से निकाला जा रहा है व जबरन त्यागपत्र लिखवा लिया जा रहा है। श्री त्रिवेदी ने बताया कि कर्मचारियों के आर्थिक और मानसिक शोषण व उत्पीड़न तथा उनके संवैधानिक अधिकारों को दिलाने के लिये सहारियल कामगार संगठन ने अपर श्रम आयुक्त लखनऊ क्षेत्र को एक मांग पत्र बीते एक दिसम्बर-2016 को दे चुका है, और श्रम आयुक्त ने भी मांग पत्र को संज्ञान में लेते हुये सहारा प्रबन्धन को नोटिस जारी कर चुका है लेकिन सहारा प्रबन्धन बराबर अवहेलना करते हुये वार्ता के लिये मौजूद नहीं हुआ और न ही वेतन दिया।

इस मौके पर मीडिया प्रभारी श्री राम तिवारी ने बताया कि जब तक सहाराकर्मियों को पूर्णतयः न्याय नहीं मिल जाता तब तक सहारियन कामगार संगठन, लखनऊ उत्तर प्रदेश संघर्ष करता रहेगा, और जल्द ही बड़े स्तर पर सहारा प्रबन्धन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू किये जायेंगे।

मीडिया बन्धु अधिक जानकारी के लिये सम्पर्क करें:-
राम तिवारी
7668175977, 7985624100
राज कुमार श्रीवास्तवब
7985624100
मीडिया प्रभारी    
सहारियल कामगार संगठन
लखनऊ
उत्तर प्रदेश

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सुप्रीम कोर्ट हुआ सख्त- पैसे न दिए तो एंबी वैली नीलाम कर देंगे

सुप्रीम कोर्ट ने सहारा मामले में अपने फरवरी के आदेश को संशोधित कर दिया है… सहारा को अब सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री के मुकाबले सेबी-सहारा खाते में रकम जमा करानी होगी.. सुप्रीम कोर्ट ने सहारा को चेताते हुए कहा अगर उसने पैसे नहीं जमा कराए तो एंबी वैली को नीलाम कर देंगे… सहारा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फरवरी के आदेश को संशोधित करते हुए समूह के न्यूयॉर्क स्थित होटल की नीलामी से मिलने वाली रकम को सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री में जमा कराए जाने के बदले सेबी-सहारा के संयुक्त खाते में जमा कराने का आदेश दिया है…

इस होटल की बिक्री से कंपनी को करीब 750 करोड़ रुपये मिलने की उम्मीद है… साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने सहारा को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर वह तय समय पर पैसा जमा कराने में विफल होती है तो वह एंबी वैली को नीलाम कर देगी… सुप्रीम कोर्ट ने सहारा ग्रुप को 17 अप्रैल तक 5,000 करोड़ रुपये जमा कराए जाने का आदेश दिया था… इससे पहले सहारा समूह को बड़ा झटका देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने लोनावाला में सहारा की प्रॉप्रटी एंबी वैली को जब्त किए जाने का आदेश दिया था… सहारा ग्रुप के इस प्रॉपर्टी की कीमत 39,000 करोड़ रुपये है…

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब तक सहारा से रकम की वसूली नहीं होती है तब तक यह टाउनशिप सुप्रीम कोर्ट के पास ही रहेगी… सहारा ग्रुप का यह टाउनशिप मुंबई के पुणे में है… सहारा ने सुप्रीम कोर्ट में माना कि उसे मूलधन के तौर पर सेबी को 14,000 करोड़ रुपये का भुगतान करना है और कंपनी सेबी को अभी तक 11,000 करोड़ रुपये का भुगतान कर चुकी है।

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छेड़छाड़ में मनोज मनु, गौतम सरकार और रमेश अवस्थी के खिलाफ FIR के आदेश

सेक्सुअल हरासमेंट मामले में सहारा मीडिया को बड़ा झटका… मनोज मनु, गौतम सरकार और रमेश अवस्थी हैं बड़े पदों पर आसीन…

दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट ने सेक्सुअल हरासमेंट के केस में शुक्रवार 10.1.2017 को ऐतिहासिक फैसला सुना दिया है… सेक्सुअल हरासमेंट के एक मामले में सहारा मीडिया के मनोज मनु, गौतम सरकार और रमेश अवस्थी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिए हैं… इन पर आरोप है कि ये लोग अपनी घिनौनी करतूत छिपाने के लिए पीड़ित महिला को लगातार धमकाते रहे… साथ ही पुलिस को भी मैनेज करते रहे…

पीड़ित महिला अपने साथ हुए दुर्व्यवहार के प्रकरण को लेकर सहारा मीडिया के उच्च पदों पर बैठे मोस्ट सीनियर अधिकारियों से मिलती रही और न्याय की गुहार लगाती रही लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई थी. नोएडा स्थित सहारा समूह के न्यूज चैनल कैंपस में अपने साथ हुए अभद्र व्यवहार के खिलाफ महिला इंसाफ के लिए सहारा मीडिया के एचआर से लेकर महिला आयोग और पुलिस हर दरवाज़ा खटखटाती रही. मगर किसी ने इस मामले में जांच तक करना मुनासिब नहीं समझा. यहाँ तक कि पुलिस एफआईआर दर्ज करने को राजी नहीं थी…. तब महिला अंततः कोर्ट पहुँची.. कोर्ट ने जब महिला की आपबीती सुनी तो फ़ौरन 156 के तहत एफआईआर दर्ज करने और जांच के आदेश दिए.

घटना 2016 के जून महीने की है. तब उस समय के सहारा मीडिया के एमपी चैनल हेड रहे और बाद में नेशनल हेड बने मनोज मनु ने कैंपस में सीढ़ियों पर महिला के साथ अभद्र व्यवहार किया. ऐतराज़ दर्ज कराने पर उसे इतने जोर से पकड़ा कि उसकी बांहों पर नील निशान पड़ गए… हालाँकि मनोज मनु ज्वायनिंग के बाद से ही महिला के पीछे हाथ धो कर पड़ गए थे… महिला के ऑब्जेक्शन पर उसे तरह तरह की धमकियां देते थे… महिला ने इस बात की शिकायत गौतम सरकार और रमेश अवस्थी से भी की थी लेकिन उनका कहना था कि मीडिया में काम करना है तो ये सब तो बर्दाश्त करना ही पड़ेगा … मनोज मनु जो भी बोल रहा है उसकी डिमांड पूरी कर दो…

मनोज मनु द्वारा महिला के साथ हो रहे उस गंदे व्यवहार के गवाह उस समय के कुछ अन्य सीनियर्स और साथ में काम करने वाले कुछ साथी भी थे… जब उन्होंने मनोज मनु की हरकतों पर ऐतराज़ जताया तो गौतम सरकार और मनोज मनु ने उन्हें नौकरी से निकाल दिया था… पीड़ित महिला ने दिल्ली महिला आयोग और राष्ट्रीय महिला आयोग में इस बात की लिखित शिकायत की… महिला दिल्ली में रहती थी और उसे बार-बार धमकी दी रही थी लिहाज़ा महिला ने दिल्ली पुलिस को कंप्लेन भी. तुरंत एफआईआर दर्ज करने की गुहारिश की. मगर पुलिस ने एफआईआर दर्ज नहीं की… महिला को टाल मटोल करती रही… लेकिन कोर्ट ने सहारा की दबंगई व महिला के दर्द को समझा और एफआईआर दर्ज कर जांच के आदेश दिए.

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जेल न भेजा जाना सुब्रत रॉय की जीत है

सर्वोच्च अदालत ने भले ही ऐम्बी वैली टाउनशिप जब्त करने का आदेश दे दिया हो और मीडिया वाले इसे सहारा के लिए झटका बता रहे हैं पर सच्चाई ये है कि अगर सुब्रत राय को जेल नहीं भेजा गया है तो फिर यह कोर्ट की हार और सुब्रत राय की जीत है. हालांकि सुब्रतो रॉय को 27 फरवरी तक ही राहत मिली है. उस दिन फिर सुनवाई होगी. यानि फिर भी सहारा पर लटकी है तलवार. पर आज की सुनवाई को लेकर देश भर के लोगों की निगाह इस बात पर थी कि क्या सुप्रीम कोर्ट फिर से सुब्रत राय को जेल भेजेगा. जेल न भेजे जाने और ऐम्बी वैली टाउनशिप जब्त किए जाने की खबर सामने आने पर मिली जुली प्रतिक्रिया रही. कुछ लोगों ने इसे सुब्रत राय की जीत बताया क्योंकि वे जेल नहीं गए तो कुछ लोगों ने सबसे कीमती टाउनशिप को जब्त किए जाने को सहारा के लिए बड़ा झटका करार दिया.

सर्वोच्च अदालत ने सोमवार को सहारा चिटफण्ड मामले की सुनवाई करते हुए उसके मुम्बई स्थित ऐम्बी वैली टाउनशिप प्रॉजेक्ट को जब्त किये जाने का आदेश दिया। अदालत ने सहारा ग्रुप से कहा कि वह अपनी ऐसी सम्पत्तियों की सूची सौंपे, जिन पर किसी तरह का कर्ज नहीं लिया गया है।

सर्वोच्च अदालत ने कहा कि इन सम्पत्तियों की नीलामी कर लोगों के पैसों की वसूली की जाएगी और उसे जनता को दिया जाएगा। अदालत ने 14,799 करोड़ के बकाये के मामले की सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया है।

इसका अर्थ यह हुआ कि सहारा का ऐम्बी वैली प्रॉजेक्ट बकाया वसूली तक सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में होगा और वसूली के बाद समूह को सौंप दिया जाएगा। सहारा समूह ने बकाया राशि को जुलाई, 2019 तक चुकाने की बात कही, लेकिन जस्टिस दीपक मिश्रा के नेतृत्व वाली बेंच ने तेज रिकवरी के लिए ऐम्बी वैली प्रॉजेक्ट को ही जब्त करने का आदेश दिया।

हालांकि समूह के मुखिया सुब्रत रॉय सम्पत्तियों की सूची सौंपे जाने तक परोल पर जेल से बाहर रहेंगे। कोर्ट इस मामले में 27 फरवरी को अगली सुनवाई करेगा। अदालत में सुनवाई के दौरान सहारा समूह ने स्वीकार किया कि उसे 14,000 करोड़ रुपये का मूलधन सेबी को चुकाने थे, जिसमें से 11,000 करोड़ रुपये उसने अब तक चुका दिये हैं।

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मीडिया में छंटनी : एक-एक कर सबका नंबर आने वाला है, हक के लिए हुंकार भरें मीडियाकर्मी!

सुना है कि एबीपी ग्रुप ने 700 मीडियाकर्मियों से इस्तीफा लिखवा लिया है। दैनिक भास्कर में भी पुराने कर्मचारियों से इस्तीफा लिखवाया जा रहा है। दमन का यह खेल पूरे मीडिया जगत में चल रहा है। मजीठिया वेज बोर्ड की वजह से प्रिंट मीडिया में कुछ ज्यादा ही कहर बरपाया जा रहा है। चाहे राष्ट्रीय सहारा हो, दैनिक जागरण हो, हिन्दुस्तान हो या फिर अमर उजाला लगभग सभी समाचार पत्रों में कर्मचारियों में आतंक का माहौल बना दिया गया है।

दूसरों की लड़ाई लड़ने का दम भरने वाले मीडियाकर्मी अपनी ही लड़ाई नहीं लड़ पा रहे हैं। सहमे हुए हैं। डरे हुए हैं। जो मीडियाकर्मी आगे बढ़कर कुछ साहस दिखाते हैं, उन्हें प्रबंधन का निशाना बना दिया जा रहा है। अखबार मालिकानों और प्रबंधनों ने चाटुकार, दलाल, बेगैरत और जमीर बेच चुके कर्मचारियों को अपना मुखबिर बना रखा है। मजीठिया न देना पड़े, इसलिए पुराने कर्मचारियों का टारगेट बनाया जा रहा है। दमन के इस खेल में सभी मीडियाकर्मी शांत होकर अपना भारी नुकसान कर रहे हैं। यह सोचकर कि ‘मैं तो बचा हूं, रहूंगा, खुश हो रहे हैं। यह नहीं समझ रहे हैं कि जल्द ही उनका भी नंबर आने वाला है।

दरअसल अखबार मालिकान किसी भी हालत में मजीठिया वेजबोर्ड के हिसाब से वेतन और एरियर देना नहीं चाहते। यही वजह है कि पुराने कर्मचारियों पर गाज गिर रही है। मालिकान किसी भी तरह से रेगुलर कर्मचारियों को निकालकर कांटेक्ट बेस पर कर्मचारी रखने की नीति बना रहे हैं। इसलिए जो कर्मचारी यह सोच रहे हैं कि वह बच जाएंगे, वह भारी भूल कर रहे हैं। कर्मचारियों को लामबंद होकर इस दमन के खिलाफ आवाज उठानी होगी। कर्मचारियों को यह समझना होगा कि यदि सबने मिलकर यह लड़ाई लड़ ली तो मजीठिया भी मिलेगा और नौकरी भी और ऐसे ही डरते रहे तो न नौकरी बचेगी और न ही पैसा मिलेगा। सुप्रीम कोर्ट में अखबार मालिकों को खिलाफ अवमानना का केस चल रहा है। ये लोग कब तक बचेंगे।

हम लोग हर हाल में जीतेंगे पर जो लोग कमजोर बने हुए हैं उन्हें तो मालिकान और प्रबंधन डरा-धमकाकर भगा ही देंगे। रोज बड़े स्तर पर कर्मचारी निकाले जा रहे हैं। एक-एक कर सबका नंबर आने वाला है। राष्ट्रीय सहारा सहारा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। जब मुकुल राजवंशी और उत्पल कौशिक को निकाला गया तो। कर्मचारी प्रबंधन का खुलकर विरोध न कर पाएं। यही वजह रही कि देहरादून में अरुण श्रीवास्तव को निकाल दिया गया। कुछ दिन बाद में हक की लड़ाई की अगुआई कर रहे 21 कर्मचारियों को बर्खास्त कर दिया गया। हाल ही में 25 कर्मचारियों को बर्खास्त किया गया है। इनका 17 महीने का बकाया वेतन संस्था पर है। न तो उनका पैसा दिया जा रहा है और न ही नौकरी पर लिया जा रहा है। जरा-जरा की बात पर पूरे दिन शोर मचाने वाले टीवी चैनल, व प्रिंट मीडिया में अपने बीच में सताये जा रहे साथियों के लिए कोई जगह नहीं है। अब समय आ गया है कि मीडियाकर्मी संगठित होकर अपने दमन के खिलाफ हुंकार भरें। यदि अब भी चुप रहे तो अपने तो दुर्गति करोगे ही साथ ही में अपने बच्चों से भी निगाह नहीं मिला पाओगे।

राष्ट्रीय सहारा और दैनिक जागरण समेत कई अखबारों से बर्खास्त किए गए कर्मचारी बेरोजगार होकर भी प्रिंट मीडियाकर्मियों के हक की लड़ाई लड़ रहे हैं। अंदर काम कर रहे कर्मचारियों को यह समझना होगा कि थोड़ा बहुत भय मालिकानों और प्रबंधनों में यदि है तो वह इस लड़ाई का ही है। कर्मचारियों में तालमेल का अभाव, नौकरी जाने का डर, लालच और चाटुकारिता का फायदा  उठाकर मालिकान और प्रबंधन कर्मचारियों का उत्पीड़न कर रहे हैं। सभी लामबंद होकर लड़ लिए तो मजीठिया वेजबोर्ड के हिसाब से वेतन भी मिलेगा और एरियर भी। यदि इसी तरह से डरते रहे।

एक-दूसरे से दूरियां बनाते रहे तो न तो पैसा मिलेगा और न ही नौकरी बचेगी। एक-एक कर सभी को निशाना बना दिया जाएगा। जब जागोगे तो समय निकल चुका होगा। जब उठोगे प्रबंधन उठने लायक नहीं छोड़ेगा। यह समझ लो कि मजीठिया की लड़ाई ऐसी लड़ाई है जो मीडियाकर्मियों की जिंदगी बदल कर रख देगी। इसे सब मिलकर मजबूती से लड़ें। सुप्रीम कार्ट का आदेश है तब भी डर रहे हो। यह जान लो कि मजीठिया मांगने पर जो साथी बर्खास्त किए गए हैं वे सभी ससम्मान अंदर जाएंगे तथा मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से पूरा वेतन और एरियर पाएंगे। इन कर्मचारियों का बाद में मालिकान और प्रबंधन भी कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगे। जो कर्मचारी अंदर बैठकर सेटिंग में लगे हैं, उनकी सबसे अधिक दुर्गति होगी। सोचे जो 700 कर्मचारी एबीपी समूह ने निकाले हैं। जो दैनिक भास्कर या अन्य अखबारों से निकाले जा रहे हैं। वे सभी हमारे ही बीच के हैं। क्या उनकी जरूरतें किसी से कम हैं। सोचो, जिस दिन आप निकाले जाओगे और आपके बीच के दूसरे कर्मचारी मूकदर्शक बने रहेंगे तो उनके बारे में आपकी क्या सोच होगी ?

चरण सिंह राजपूत
charansraj12@gmail.com

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सहारा को झटका : सुप्रीम कोर्ट ने एंबी वैली अटैच करने का आदेश दिया

सहारा के मामले पर सुप्रीम ने बड़ा फैसला सुनाया है. सुब्रत राय को तगड़ा झटका देते हुए एंबी वैली अटैच करने का आदेश दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने 27 फरवरी को इस मामले की अगली सुनवाई की तारीख दी है. सुब्रत रॉय और सहारा ग्रुप को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है.

सर्वोच्च न्यायालय ने लोनावला में सहारा की प्राइम प्रॉपर्टी एंबी वैली को अटैच करने का आदेश सुनाया है. सुप्रीम कोर्ट ने 27 फरवरी को इस मामले की अगली सुनवाई की तारीख देते हुए कहा कि रकम की वसूली तक टाउनशिप सुप्रीम कोर्ट के पास रहेगी. सहारा की यह लग्जरी टाउनशिप एंबी वैली मुंबई के पास लोनावला में है और इसके खरीदार बहुत बड़े बड़े लोग हैं.

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सहारा प्रबंधन के दमन से दम तोड़ गया सहाराकर्मी!

राष्ट्रीय सहारा में दमनात्मक नीति का हाल यह है कि हक मांगने पर 47 कर्मचारियों को बर्खास्त किया जा चुका है। काम कर रहे कर्मचारियों को इतना प्रताड़ित किया जाता है कि वह मानसिक रूप से बीमार हैं। प्रबंधन कर्मचारियों को बुला-बुलाकर इस्तीफा लिखवाने की धमकी दे रहा है। नौकरी लेने की नीयत से बहुत सारे कर्मचारियों का दूर-दराज स्थानों पर स्थानांतरण कर दिया गया है। यह सब तब किया जा रहा है कि जब प्रबंधन कर्मचारियों को बकाया पैसा देने को तैयार नहीं। प्रबंधन के इस दमन के आगे प्रोसेस विभाग में काम कर रहा बी.एम. यादव दम तोड़ गया।

बताया जा रहा है कि एचआर विभाग ने उसे बुलाकर जाने क्या कहा कि वह डिप्रेशन में चला गया। गंभीर हालत होने पर जब उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया तो उसका निधन हो गया। लंबे समय का वेतन रुका होने की वजह से उसकी आर्थिक हालत इतनी खराब हो गई थी कि जब अस्पताल से उसके शव को घर लाया गया तो मकान मालिक ने शव को घर न लाने दिया। आनन-फानन में किसी तरह से उसका अंतिम संस्कार किया गया।

यह है देश के सबसे विशालतम परिवार की कहानी। इसी कड़ी में विज्ञापन विभाग के जेपी तिवारी का भी निधन हो गया। सहारा में ये कोई नई बात नहीं है कि गत दिनों सर्विस डिजीवन में काम कर रहे एक युवा ने इसलिए आत्महत्या कर ली थी कि क्योंकि किराया न देने पर उसके मकान मालिक ने उसके बच्चों के सामने ही उसे बहुत जलील कर दिया था।

गत वर्ष लखनऊ में एक कर्मचारी ने छत से गिरकर इसलिए आत्महत्या कर ली थी, क्योंकि लंबे समय से उसे वेतन न मिलने के कारण परिवार में रोज बेइज्जत होना पड़ता था। टीवी में काम कर रहे एक कर्मचारी की मौत इसलिए हो गई क्योंकि लंबे समय तक सेलरी न मिलने पर बीमारी की स्थिति में भी वह कई दिनों तक ब्रेड खाकर काम चलाता रहा। यह हाल देशभक्ति का ठकोसला करने वाले इस समूह का। अधिकारियों व मालिकान को देख लो तो खर्चे ऐसे कि राजा-महाराजा भी शर्मा जाएं।

दुखद तो यह है कि सहारा मीडिया में तीन बार आंदोलन करने के बावजूद कर्मचारियों का जमीर नहीं जागा। आज भी 10-15 महीने का बकाया वेतन संस्था पर है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद मजीठिया नहीं मिल रहा है। बर्खास्त कर्मचारी मजीठिया व कर्मचारियों के हक की लड़ाई लड़ रहे पर अभी भी ऐसे कितने कर्मचारी हैं कि जो प्रबंधन की चाटुकारिता में लगे हैं। यह हाल तब जब एक-एक कर सबका नंबर आ रहा है।

चरण सिंह राजपूत
charansraj12@gmail.com

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सेलरी और बकाया मांगने बीवी-बच्चों समेत सहारा आफिस पहुंचे बर्खास्त मीडियाकर्मियों ने जमकर लगाए नारे (देखें वीडियो)

गणतंत्र दिवस पर सहारा मीडिया के पीड़ित कर्मचारियों ने सहारा प्रबंधन को सरेआम ललकारा… ‘सुब्रत तेरी गुंडागर्दी नहीं चलेगी, नहीं चलेगी’। ‘जयब्रत तेरी गुंडागर्दी नहीं चलेगी, नहीं चलेगी’, ‘बेईमान प्रबंधन बाहर आओ’, ‘चोर प्रबंधन बाहर आओ’, ‘हर जोर-जुल्म की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है’, ‘अभी तो ली अंगड़ाई है, आगे और लड़ाई है’… ये नारे किसी रैली या जुलूस में नहीं लग रहे थे। ये नारे लग रहे थे गणतंत्र दिवस के दिन सुबह आठ बजे नोएडा के सेक्टर 11 स्थित राष्ट्रीय सहारा समाचार पत्र के मेन गेट पर.

नारे लगाने वाले थे, राष्ट्रीय सहारा के प्रबंधन द्वारा बर्खास्त किए गए कर्मचारी व उनके बीवी-बच्चे। ये कर्मचारी अपने परिवार को साथ लेकर सहारा प्रबंधन से अपना 17 माह का बकाया वेतन, मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से बकाया सेलरी और बची नौकरी का हिसाब मांग रहे थे। सहारा प्रबंधन ने हाल ही में अवैधानिक रूप से 25 कर्मचारी बर्खास्त किए हैं। 22 कर्मचारियों की नौकरी मई माह में ले ली थी।

इस गणतंत्र दिवस को इन कर्मचारियों ने प्रबंधन की ऐसी हेकड़ी निकाली कि सहारा के किसी भी अधिकारी की मेन गेट से निकलने की हिम्मत न हुई। जब प्रबंधन ध्वजारोहण की तैयारी कर रहा था तो उसी समय इन कर्मचारियों ने प्रबंधन को ललकार दिया। जिस कार्यक्रम में घंटों देशभक्ति का ढकोसला चलता था, वह कार्यक्रम मात्र आधे घंटे में खत्म कर दिया गया। कर्मचारियों की इस ललकार से प्रबंधन की चूलें हिल गईं। आनन-फानन में मीडिया हेड अभिजीत सरकार ने गार्डों के माध्यम से संदेश भिजवाया कि वे लोग ये सब न करें, एक सप्ताह के अंदर उनका हिसाब कर दिया जाएगा। आंदोलनकारी कर्मचारी इस संदेश को नहीं माने। उन्होंने न्याय और हक मिलने तक लड़ाई लड़ने का ऐलान किया। इन कर्मचारियों ने सहारा मीडिया वर्कर्स यूनियन और फाइट फॉर राइट का बैनर लगा रखा है।

इस प्रदर्शन का अंदर काम कर रहे कर्मचारियों पर यह असर पड़ा है कि जो कर्मचारी प्रबंधन की कार्रवाई से डरे हुए थे अब वे निर्भीक होकर आंदोलनकारियों से बातें करते नजर आ आ रहे हैं। अगले माह यदि सहारा सुप्रीम कोर्ट में निवेशकों के हड़पे रुपए में से 600 करोड़ रुपए जमा नहीं करा पाया तो सुब्रत राय का जेल जाना निश्चित है। यह कर्मचारी भी बखूबी समझ रहे हैं कि यदि यह व्यक्ति जेल चला गया तो उन्हें आंदोलन के बल पर गत 10 महीने से जो नियमित रूप से वेतन मिल रहा है, वह भी आगे नहीं मिल पाएगा। वैसे भी लगभग सभी कर्मचारियों का 10-15 महीने का बकाया वेतन संस्था पर है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद प्रिंट मीडिया को मजीठिया वेजबोर्ड के हिसाब से वेतन नहीं मिल रहा है। यही सब वजह है कि सहारा मीडिया में फिर से बड़े आंदोलन की भूमिका बनने लगी है।

दरअसल सहारा प्रबंधन का रवैया बड़ा तानाशाह और गुंडागर्दी का रहा है। किसी समय इस प्रबंधन ने अपने कर्मचारियों को इतना डरा-धमका कर रखा था कि जहां चाहे हस्ताक्षर करवा लेता था। सुब्रत राय के जेल जाने के नाम पर अपने ही कर्मचारियों से जबर्दस्ती अरबों की उगाही कर ली गई। कारगिल के नाम पर 10 साल तक कर्मचारियों के वेतन से 100-500 रुपए काटा जाता रहा। उपर वाले के घर देर है, अंधेर नहीं। पाप का घड़ा जल्द भरने वाला है। बड़े बड़े साम्राज्य जब भरभरा कर गिर गए तो सहारा की क्या बिसात। यह समूह जिस तरह से अपने कर्मचारियों और उनके परिजनों का उत्पीड़न कर उनकी आह और श्राप हासिल कर रहा है, उससे इसका अंत नजदीक दिख रहा है। ऐय्याशी और समारोहों के नाम पर करोड़ों फूंकने वाले इस ग्रुप को अपने कर्मियों के जीवन की चिंता नहीं है। 

नोएडा में सहारा मीडिया के मेन गेट पर हुए प्रदर्शन का वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

सहारा मीडिया में काम कर चुके चरण सिंह राजपूत की रिपोर्ट. संपर्क : charansraj12@gmail.com

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सहारा का हाल : अय्याशी के लिए पैसा है पर कर्मचारियों के लिए नहीं!

चरण सिंह राजपूत

सुना है कि पैरोल पर जेल से छूटे सहारा के चेयरमैन सुब्रत राय ने 18 जनवरी की शाम को दिल्ली के मौर्य होटल में भव्य कार्यक्रम आयोजित कर अपनी शादी की वर्षगांठ मनाई। इस कार्यक्रम में करोड़ों का खर्च किया गया। जनता के खून-पसीने की कमाई पर मौज-मस्ती करना इस व्यक्ति के लिए कोई नयी बात नहीं है। गत दिनों लखनऊ में अपनी पुस्तक ‘थिंक विद मी’ के विमोचन पर भी करोड़ों रुपए बहा दिए। अखबारों में विज्ञापन छपवाया कि देश को आदर्श बनाओ, भारत को महान बनाओ। दुर्भाग्य देखिए, यह सुब्रत राय अपनी संस्था और अपने आप को तो आदर्श व महान बना नहीं पाए लेकिन देश को आदर्श और महान बनाने चल पड़े हैं। गरीब जनता को ठगेंगे। कर्मचारियों का शोषण और उत्पीड़न करेंगे पर देशभक्ति का ढकोसला करेंगे। यह व्यक्ति कितना बड़ा नौटंकीबाज है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यदि आप सहारा के कार्यालयों में जाएंगे तो आपको वहां पर भारत माता की तस्वीर दिखाई देगी।

कार्यक्रमों की शुरुआत में आप इस व्यक्ति को भारत माता की तस्वीर के सामने दीप प्रज्ज्वलित करते पाएंगे। दिखावे के लिए यह संस्था गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस को भारत पर्व के रूप में मनाती है। तिरंगे का इस्तेमाल ऐसे किया जाता है कि जैसे इनसे बड़ा देशभक्त कोई दूसरा हिन्दुस्तान में नहीं। देशभक्तों को लूटकर देशभक्ति का जो दिखावा ऐसे लोग कर रहे हैं। यह देश के लिए बहुत घातक है। ऐसे लोगों के चेहरे बेनकाब करने बहुत जरूरी है। कारगिल के नाम पर अपने ही कर्मचारियों से अरबों रुपए की उगाही करने वाला। जेल से छुड़ाने के नाम पर अपने ही कर्मचारियों से अरबों रुपए ठगने वाला यह व्यक्ति देश और समाज दोनों को बेवकूफ बना रहा है। सुप्रीम कोर्ट को बनाने चला था कि आ गया शिकंजे में। अपनी मां के निधन पर पैरोल पर जेल से छुटकर कर्मचारियों में आतंक का माहौल बना रहा है।

जिन कर्मचारियों के बल पर 2000 रुपए से दो लाख करोड़ रुपए की संपत्ति अर्जित कर पाया यह व्यक्ति, अब उन्हीं कर्मचारियों को बर्बाद करने में लगा है। कर्मचारियों को सच बोलने की शिक्षा देने वाले इस व्यक्ति को सच्चाई पसंद नहीं। जो जितना झूठ बोलता हो, चाटुकारिता करता हो। निर्लज्ज और बेशर्म हो। वह उतना ही इसे पसंद आता है। स्वाभिमानी, खुद्दार और ईमानदार कर्मचारी तो जैसे इसका सबसे बड़ा दुश्मन हो। प्रवचन ऐसे देता है कि बाबा आशाराम और रामपाल भी शर्मा  जाएं। कितना निरंकुश और तानाशाह है यह व्यक्ति। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब मीडिया में सहारा में चल रही अराजकता के खिलाफ मोर्चा खोल दिया गया तो जैसे इसके सीने पर पैर रख दिया गया हो। इस व्यक्ति ने आंदोलन की अगुआई कर रहे कर्मचारियों को जेल में बुलाकर धमकाना चाहा पर उन कर्मचारियों की दाद देनी पड़ेगी कि उन्होंने हर बात का मुंहतोड़ जवाब दिया। देशभक्ति का ढकोसला करने वाली संस्था पर जिस दिन सीबीआई जांच बैठेगी उस दिन लोगों को पता चल जाएगा कि इसमें कितने गड़बड़झाले हुए हैं।

यह वह संस्था है जिसके मालिकान और अधिकारी अय्याशी करते हैं और कर्मचारियों को एक-एक पैसे के लिए तरसाया जाता है। भले ही आज की तारीख में कर्मचारियों को वेतन मिलने लगा हो पर आज भी 10-17 माह का बकाया वेतन संस्था पर है। जिन कर्मचारियों का रिटायरमेंट हुआ है। उन्हें पैसा नहीं दिया गया। जिन लोगों ने एक्जिट प्लॉन के तहत नौकरी छोड़ी है। उन्हें पैसा नहीं मिला है। हमेशा कोर्ट के सम्मान की बात करने वाला यह व्यक्ति सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद प्रिंट मीडिया को मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से वेतन देने को तैयार नहीं। जिंदगी के महत्पवूर्ण 20-25 साल संस्था को देने वाले कर्मचारी अब इसे बोझ लगने लगे हैं। किसी को तबादले के नाम पर तो किसी को बर्खास्त कर और किसी को तरह-तरह के तरीके अपनाकर परेशान कर नौकरी से निकालने में लगा है। वह भी बिना भुगतान किए बिना। मीडिया से 22 कर्मचारी मई माह में निकाल दिए गए थे कि हाल ही में 25 कर्मचारियों की नौकरी ले ली गई। यह कर्मचारी इस हाड़ कंपकपाती ठंड में राष्ट्रीय सहारा (नोएडा) के मेन गेट पर जमीन पर बैठकर अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं पर इन लोगों के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही है। इन सब बातों की ओर शासन-प्रशासन, उत्तर प्रदेश व केंद्र सरकारों के अलावा सुप्रीम कोर्ट का ध्यान आकृष्ट करना बहुत जरूरी हो गया है।

चरण सिंह राजपूत

पूर्व सहारा कर्मी

charansraj12@gmail.com

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हाड़ कंपाती ठंड में सहारा के मेन गेट पर बैठे ये बर्खास्त 25 कर्मी किसी को नहीं दिख रहे!

किसी को नहीं दिखाया दे रहा सहारा का यह अन्याय… नोएडा में बड़ी संख्या में राजनीतिक व सामाजिक संगठन हैं। ट्रेड यूनियनें भी हैं। देश व समाज की लड़ाई लड़ने का दंभ भरने वाले पत्रकार भी हैं। पर किसी को इस हाड़ कंपाती ठंड में गेट पर बैठे बर्खास्त 25 कर्मचारी नहीं दिखाई दे रहे हैं। 17 महीने का बकाया वेतन दिए बिना सहारा प्रबंधन ने इन असहाय कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया पर इनकी पीड़ा समझने को कोई तैयार नहीं।

नोएडा में श्रम मंत्रालय से लेकर जिला प्रशासन की पूरी व्यवस्था है पर कोई भी व्यक्ति इन कर्मचारियों को इनका हक नहीं दिलवा पा रहा है। किसान-मजदूरों की लड़ाई लड़ने की बात करने वाले दलों को क्या मेन गेट पर बैठे ये कर्मचारी दिखाई नहीं दे रहे हैं ? मजदूरों की लड़ाई लड़ने की बात करने वाली सीटू भी क्या इस अन्याय से अंजान है। बड़ी-बड़ी बातें लिखने वाले लेखकों को ये पीड़ित मीडियाकर्मी नहीं दिखाई दे रहे हैं? कौन बनेगा इन कर्मचारियों की आवाज? कौन समझगेगा इन कर्मचारियों के बीवी-बच्चों की पीड़ा। बच्चों को साक्षर और स्वस्थ बनाने की बात करने वाली सरकारें बताएं कि जिन कर्मचारियों का 17 महीने का बकाया वेतन न दिया गया हो और उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया हो। वे अपने बच्चों को कहां से पढ़ाएं? कहां से खिलाएं? कहां से बीमारी का इलाज कराएं?


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विज्ञापनों पर करोड़ों खर्च करने वाले सहारा प्रबंधन के पास इन कर्मचारियों को पैसा देने के लिए नहीं। सहारा मालिकान और अधिकारियों के किसी खर्चे में कोई कमी नहीं है। जमकर अय्याशी हो रहे ही है पर पीड़ित कर्मचारियों के लिए पैसा नहीं है। ऐसा नहीं है कि अंदर काम कर रहे कर्मचारी बहुत खुश हों। उनका भी 10-12 महीने का बकाया वेतन संस्था ने नहीं दिया है। स्थानांतरण के नाम पर इन्हें भी डराया हुआ है। देश को आदर्श बनाने और भारत को महान बनाने की बात करने वाला संस्था का चेयरमैन जिंदगी के 20-25 वर्ष संस्था को देने वाले कर्मचारियों की नौकरी ले लेता है पर इनके पक्ष में कोई आवाज नहीं उठती, इससे शर्मनाक बात और नहीं हो सकती है।

इस नपुंसक समाज में हर कोई ताकतवर व्यक्ति के साथ खड़ा हुआ दिखाई दे रहा है। गरीबों को सताकर नायक बन रहे हैं। मुझसे भी काफी लोग कह रहे हैं आप क्यों बिना वजह के इतनी बड़ी संस्था से दुश्मनी मोल ले रहे हो। मेरा कहना है कि मरा तो जन्म ही अन्याय के खिलाफ लड़ने के लिए हुआ है। दूसरों के लिए लड़ने के लिए हुआ है। अपने बच्चों की परवरिश तो मैं मजदूरी करके भी कर लूंगा पर किसी दमन के सामने नहीं झुकूंगा। जब हम अपनी ही लड़ाई नहीं लड़ सकते तो दूसरों की क्या खाक लड़ेंगे। जानवरों की खाल भी जूते बन जाते हैं पर आदमी की खाल के तो जूते भी नहीं बनते। क्या करेंगे हम इस शरीर का? कहां ले जाएंगे इन पैसों को? जितना हम दूसरों के काम आ जाएंगे वह ही हमारा असली पुरुषार्थ है। अपने लिए तो सब जीते हैं जरा दूसरों के लिए भी जी कर देखो।

मैंने तो सहारा के अन्याय के खिलाफ 2006 में ही मोर्चा खोल दिया था। हम लोग एक-एक पैसा सहारा से लेकर रहेंगे और एक बार ससम्मान अंदर भी जाकर दिखाएंगे। हमारे हौंसलों को कोई गेट कोई ताकत नहीं रोक सकती है। कानूनी रूप से हम सहारा को मुंह तोड़ जवाब देते रहेंगे।

देखें यह वीडियो, कैसे इस ठंढ में सहारा के बर्खास्त कर्मी मेन गेट पर जमे हैं और सहारा प्रबंधन के अन्याय के खिलाफ जमकर अपनी बात रख रहे हैं>>

चरण सिंह राजपूत
charansraj12@gmail.com

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सहारा मीडिया में सेलरी संकट से त्रस्त कर्मियों ने शुरू किया मेन गेट पर धरना-प्रदर्शन (देखें वीडियोज)

सहारा मीडिया के नोएडा स्थित मुख्य आफिस के गेट पर सहारा कर्मियों ने सेलरी के लिए धरना प्रदर्शन शुरू कर दिया है. कई महीने की सेलरी दबाए बैठे सहारा प्रबंधन ने अपने कर्मियों को भूखे मरने के लिए छोड़ दिया है. इससे परेशान कई कर्मचारी अब गेट पर धरना प्रदर्शन शुरू कर चुके हैं. दूसरे मीडिया हाउसेज इस आंदोलन को इसलिए कवर नहीं कर रहे क्योंकि चोर चोर मौसेरे भाई के तहत वे एक दूसरे के घर में चलने वाले उठापटक को इग्नोर करते हैं. धरना प्रदर्शन सात जनवरी से चल रहा है. धरने में करीब 25 कर्मचारी खुल कर हिस्सा ले रहे हैं.

देखें वीडियो>>

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सहारा की डायरी : नेताओं को अरबों रुपए रिश्वत देने वाले गलत तरीके से खुद कितने रुपए कमाते होंगे!

तोड़ना ही होगा सहारा व नेताओं का गठजोड़

कारपोरेट घरानों और नेताओं के गठजोड़ ने देश की राजनीति की ऐसी की तैसी कर दी है। कारपोरेट घरानों और नेताओं ने मिलकर व्यवस्था को ऐसे कब्जा रखा है कि आम आदमी सिर पटक-पटक कर रह जा रहा है। जनता के चंदे से चुनाव लड़ने वाले दल अब पूंजीपतियों के पैसों से चुनाव लड़ते हैं तथा चुनाव जीतकर उनके लिए ही काम करते हैं। जनता की भावनाओं से खिलवाड़ करने का खेल तो बहुत लंबे समय से चल रहा है पर सहारा की डायरी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गुजरात के मुख्यमंत्री के पद पर रहते हुए पैसा लेने की लिस्ट में नाम आने से मामला गरमाया है।

दिल्ली के मुख्मयंत्री अरविंद केजरीवाल और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील व स्वराज इंडिया पार्टी के नेता प्रशांत भूषण के बाद कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने सहारा-प्रधानमंत्री प्रकरण को जोर-शोर से उठाया है। मामला बिड़ला ग्रुप का भी है पर सहारा मामले का जोर मारने का कारण सहारा प्रमुख सुब्रत राय का राजनेताओं के साथ घनिष्ठ संबंध होना है। दरअसल सुब्रत राय पैसे के बल पर हर किसी को खरीदना चाहते हैं। निवेशकों का पैसा हड़पने का मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था तब भी उन्होंने समाचार पत्रों में पूरे के पूरे पेज विज्ञापन देकर सेबी को पैसा देने नहीं बल्कि उससे वसूलने की बात कही थी। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी हेकड़ी निकाली है कि जो पैसा वह सेबी से लेने की बात कर रहे थे चुपचाप देने की व्यवस्था में लगे हैं।

हां, सुप्रीम कोर्ट को यह भी देखना होगा कि निवेशकों की हड़पी रकम को वह कहीं फिर से निवेशकों से उगाहकर तो नहीं लौटा रहे हैं ? क्योंकि तमाम प्रतिबंधों के बावजूद सहारा की उगाही रुकी नहीं है। एक ओर संस्था अपने प्रचार-प्रसार करोड़ों रुपए खर्च कर रहे ही तो दूसरी ओर अपने कर्मचारियों का जमकर शोषण और उत्पीड़न कर रही है। राजनीतिक दलों के साथ संबंधों के दम पर संस्था के हर गलत काम को दबा दिया जाता है। प्रधानमंत्री का नाम लिखी जो डायरी जिस छापे में मिली थी, उस मामले में कोई कार्रवाई न होना कहीं न कहीं केंद्र सरकार से साठ-गांठ की बात दर्शा रहा है। जो संस्था अपने कर्मचारियों को कई महीने से वेतन नहीं दे रही थी, उस संस्था के कार्यालय में 134 करोड़ रुपए जब्त किए गए।

12 महीने का बकाया वेतन और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मजीठिया वेजबोर्ड मांगने वाले कर्मचारियों ने उत्तर प्रदेश सरकार से लेकर केंद्र सरकार और राष्ट्रपति महोदय तक को अपनी पीड़ा लिखी पर उनका कुछ भला न हो सका। उल्टे आंदोलन की अगुआई कर रहे 22 कर्मचारियों को बर्खास्त कर दिया गया। जिस संस्था में कर्मचारियों के साथ इस हद तक उत्पीड़न किया जा रहा हो और उसका कुछ न बिगड़ रहा हो कहीं न कहीं राजनीतिक दलों के साथ गठजोड़ को दर्शा रहा है। मुंबई और नोएडा दो जगह आयकर विभाग के छापे पड़ने के दो-तीन साल बाद भी मामले में कोई कार्रवाई न होना केंद्र सरकार को भी कटघरे में खड़ा कर रहा है। सहाराकर्मी और देशहित में सहारा प्रमुख और राजनीतिक दलों के संबंधों के राज से पर्दा उठना बहुत जरूरी है। जरूरी इसलिए भी क्योंकि यह व्यक्ति देशभक्ति का ढकोसला कर जनता के साथ अपने ही कर्मचारियों को ठगने में लगा है।

सहारा की डायरी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम आने पर कांग्रेस प्रधानमंत्री पर तो निशाना साध रही है पर मामले की जड़ सहारा के प्रति नरम रवैया क्यों अपनाए हुए है। सहारा की डायरी में 100 लोगों के नाम बताए जा रहे हैं। तो समझ लीजिए कि इस संस्था ने कितने काले कारनामों को छिपाने के लिए 100 लोगों को रिश्वत दी होगी। निश्चित रूप यह धनराशि अरबों में रही होगी। जो संस्था नेताओं को अरबों रुपए की रिश्वत दे रही हो। उसने गलत से ढंग कितने रुपए कमाए होंगे बताने की जरूरत नहीं है। निश्चित रूप से खेल खरबों का रहा होगा। यह सब पैसा गरीब जनता का ही रहा होगा। यह तो सहारा की बात है देश के कितने पूंजीपति नेताओं के साथ मिलकर अरबों-खरबों का खेल कर रहे हैं।

यही वजह है कि इस व्यवस्था में जनता को कीड़े-मकोड़े से ज्यादा नहीं  समझा जा रहा है। पैसे और सत्ता की ताकत के बल पर भ्रष्ट हो चुकी इस व्यवस्था के खिलाफ उठने वाली आवाज को दबा दिया जा रहा है। प्रधानमंत्री नोटबंदी और बेनामी संपत्ति पर प्रहार की बात तो कर रहे हैं। उनक कारपोरेट घरानों की बात नहीं कर रहे हैं, जिन्होंने नेताओं के जमीर को खरीद रखा है। जब तक राजनीतिक दलों और कारपोरेट घरानों की गठजोड़ नहीं टूटेगा तब तक गरीब किसान और मजदूर की भलाई की बात करना बेमानी है। गरीब और अमीर की खाई पाटने, स्वच्छ राजनीति लाने और देश के विकास के लिए पूंजीपतियों और राजनीतिक दलों का गठजोड़ बेनकाब कर इसे तोड़ना जरूरी हो गया है।

दरअसल राजनीतिक दलों के साथ मिलकर ये कारपोरेट घराने अपने कर्मचारियों का जमकर शोषण-उत्पीड़न करते हैं। यदि विरोध में कहीं से कोई आवाज उठती भी है तो उसे बलपूर्वक दबा दिया जाता है। वैसे तो लगभग हर पूंजीपति यह सब कर रहा है पर सहारा में कुछ ज्यादा नहीं बल्कि बहुत ज्यादा हो रहा है। हाल यह है कि यह संस्था जहां तरह-तरह के कार्यक्रम कर देशभक्ति का ढकोसला करती घूम रही है वहीं इसने संस्था को 2000 से दो लाख करोड़ तक पहुंचाने कर्मचारियों को तबाह कर मानसिक रोगी बना दिया है।

चरण सिंह राजपूत
charansraj12@gmail.com

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सहारा-बिड़ला से मोदी द्वारा घूस लेने के मामले की सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट तैयार

नई दिल्ली : सहारा और बिड़ला से नरेन्द्र मोदी द्वारा घूस लिए जाने के मामले पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई के लिए तैयार हो गया है. इस मामले में अगली सुनवाई शुक्रवार को है. सहारा और बिड़ला ग्रुप की ओर से राजनेताओं को फंड देने के आरोप की याचिका सुनने के लिए सुप्रीम कोर्ट का तैयार हो जाना एक बड़ा घटनाक्रम है. दरअसल इन दो बड़ी कंपनियों पर पड़े छापों में बरामद दस्तावेजों की जांच के लिए गैर-सरकारी संगठन कॉमन कॉज ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी.

एनजीओ का आरोप है कि इन दोनों कंपनियों पर पड़े छापों में कई दस्तावेज बरामद हुए थे, जिनमें देश की अलग-अलग पार्टियों के नेताओं और अधिकारियों को फंडिंग देने का उल्लेख किया गया है.  कॉमन कॉज ने नेताओं को दी गई फंडिंग की जांच कराने के लिए एक विशेष जांच दल (एसआईटी) बनाने की अपील की थी. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने आरोप लगाया था कि आदित्य बिड़ला ग्रुप पर अक्टूबर 2013 में छापा मारा गया था. इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने सभी दस्तावेज जब्त किए थे.

उस वक्त बिड़ला ग्रुप के ग्रुप एक्जीक्यूटिव शुभेंदू अमिताभ के लैपटॉप और ब्लैकबेरी को चेक किया गया था. इसमें एक एंट्री गुजरात सीएम के नाम 25 करोड़ रुपए की पाई गई है. उन्होंने कहा, गुजरात के सीएम के आगे 25 करोड़ और ब्रैकेट में लिखा है ‘डन’. गुजरात का सीएम कौन थे उस टाइम, नरेंद्र मोदी जी थे. सहारा पर कई बड़े राजनेताओं को पेमेंट देने का आरोप है. इसमें 2013-14 में गुजराज, दिल्ली, छत्तीगढ़ और मध्य प्रदेश के सीएम को बड़ी राशि देने की एंट्री की गई है.

मूल खबर….

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सहारा मीडिया से रणविजय सिंह को टर्मिनेट किए जाने की खबर!

सहारा मीडिया से एक बड़ी सूचना है कि दशकों से वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे रणविजय सिंह को प्रबंधन ने टर्मिनेट कर दिया है. उन्हें काफी समय से अधिकार विहीन कर साइडलाइन कर दिया गया था. सूत्रों का कहना है कि रणविजय सिंह पर कई किस्म के आरोप थे जिसमें पद का दुरुपयोग करते हुए महिलाओं का शोषण करना भी शामिल है. उन पर अवैध संपत्ति बनाने और आर्थिक भ्रष्टाचार करने के भी आरोप हैं. उनको लेकर सहारा में आंतरिक जांच कराई गई जिसमें वह सहारा मीडिया के लिए अयोग्य पाये गये. उन पर स्टाफ में असंतोष को बढ़ावा देने का भी आरोप लगाया गया. बताया जा रहा है कि सुब्रत राय के खासमखास ओपी श्रीवास्तव उनसे इन दिनों सख्त नाखुश थे. चर्चा है कि तीन चार बड़े विकेट और गिरेंगे बहुत ज़ल्द. उधर, रणविजय खुद यह दावा कर रहे हैं कि उन्हें टर्मिनेट नहीं किया गया, बल्कि वह खुद हटे हैं. 

रणविजय सिंह पर गाज गिराए जाने के बाद कहा जा रहा है कि कई अन्य मोटी पगार वाले नाकार लोगों को सहारा मीडिया से हटाया जा सकता है. उधर भड़ास से बातचीत में रणविजय सिंह ने टर्मिनेट किए जाने की सूचना को गलत बताया. उन्होंने कहा कि वे महीने भर पहले ही इस्तीफा दे चुके हैं जिसे प्रबंधन ने अब स्वीकार किया है. रणविजय सिंह के मुताबिक उनके पास सहारा में करने के लिए कोई काम नहीं था इसलिए उन्हें सुब्रत राय से मिलकर या तो काम देने या फिर इस्तीफा स्वीकार करने का अनुरोध किया था.

आगे की योजना के बारे में रणविजय सिंह का कहना है कि 21 नवंबर को बिटिया की शादी है. शादी के बाद ही वह नए वेंचर के बारे में घोषणा करेंगे. ज्ञात हो कि रणविजय सिंह राष्ट्रीय सहारा लखनऊ के स्थानीय संपादक रहे. बाद में उन्हें ग्रुप एडिटर तक बनाया गया और नोएडा में बिठाया गया. अब उनकी सहारा से विदाई हो गई है.

फिलहाल पूरा सहारा मीडिया इन दिनों अभिजीत सरकार के नेतृत्व में ठीकठाक चल रहा है. सेलरी का संकट भी खत्म हो गया है. टाइम से लोगों को सेलरी मिलने लगी है. सहारा के चैनल्स जल्द ही टाटा स्काई पर लाए जा रहे हैं. सहारा मीडिया को आर्थिक रूप से दुरुस्त करने के क्रम में ही बड़े पदों पर आसीन निष्क्रिय लोगों को हटाया जा रहा है.

भड़ास के साथ कोई भी सूचना bhadas4media@gmail.com के जरिए शेयर कर सकते हैं. मेल भेजने वाले का नाम पहचान गोपनीय रखा जाएगा.

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