अरुण पुरी जी, आपने अपने पत्रकारों की आज़ादी छीनकर ठीक नहीं किया!

समरेंद्र सिंह-

आजतक और इंडिया टुडे ग्रुप के मालिक अरुण पुरी के नाम खुला पत्र

आदरणीय अरुण पुरी जी,

आप एक बड़ा मीडिया संस्थान चला रहे हैं। आपके पास तथाकथित तौर पर देश का नंबर वन हिंदी चैनल है। एक दो छुटभैये किस्म के दूसरे चैनल हैं। इंडिया टुडे नाम से हिंदी और अंग्रेजी की बड़ी सम्मानित पत्रिका है। अनेक वेबसाइट हैं। इनके अलावा सोशल नेटवर्क पर भी अनगिनत पेज हैं। यू-ट्यूब, फेसबुक और इंस्टाग्राम समेत सभी जगह आप लोग छाए हुए हैं। लल्लनटॉप के गुर्गे भी गदर काटे हुए हैं।

आपके इतने बड़े मीडिया संस्थान में हजारों की संख्या में लोग काम करते हैं। कुछ समय पहले तक वो सभी अपने-अपने सोशल नेटवर्क पेज पर लिखते भी थे। हालांकि 95-97 प्रतिशत तो जाहिल हैं और कूड़ा ही लिखते हैं, फिर भी वो लिखते थे। उन्हें इतनी आजादी थी कि अपने भीतर की कुठाएं अपने पेज पर उड़ेल सकें। मगर एक दिन आपने उनकी यह आजादी छीन ली।

फ्री स्पीच में यकीन रखने वाले संस्थान ने अपने ही कर्मचारियों की जुबान पर ताला लगा दिया। ये सरासर अन्याय है। इससे आपके यहां के पत्रकार और अधिक कुंठित हो गए हैं। धीमे-धीमे बढ़ती हुई ये कुंठा उनकी सोचने-समझने की रही सही शक्ति भी खत्म कर रही है। उनकी मूर्खता अब चरम पर है। वो पागल कुत्तों की तरह इधर-उधर लोगों को काटते फिर रहे हैं। ये सही नहीं है। मेरे जैसे आम लोगों की सेहत के लिए तो ये बड़ा हानिकारक है।

इसलिए आपसे हाथ जोड़ कर विनम्र निवेदन है कि आप अपने सभी कर्मचारियों को अपनी-अपनी प्रोफाइल पर लिखने की आजादी दीजिए। ताकि वो मेरे जैसे लोगों की जिंदगी में चरस बोना बंद करें।

वैसे तो चरस इतनी बुरी चीज भी नहीं। मेरे एक मित्र इसे बाबा की बूटी कहते हैं। सदियों पहले मैंने भी एक-दो बार दम लगाया है। दम मारो दम के बाद सच में मन सूफी हो जाता है। लेकिन जिंदगी में बोई जाने वाली चरस कहीं से अच्छी नहीं होती है। इसका नतीजा बहुत खराब निकलता है। उम्मीद है कि आप समझेंगे। और अपने कर्मचारियों को अपनी-अपनी वॉल पर लिखने की आजादी देंगे। अगर आप इतना साहस नहीं जुटा सके तो कम से कम उन्हें दूसरों की वॉल पर गंदगी फैलाने से रोकिएगा। बड़ी मेहरबानी होगी।

अभी बस इतना ही। अगली बार आपके संस्थान से मेरी वॉल पर आकर फिर कोई अश्लील हुआ तो मैं आपका दरवाजा दोबारा खटखटाऊंगा। आपकी कंपनी के ब्राह्मणवादी चरित्र और उसकी ब्राह्मणवादी नीतियों पर एक सीरीज भी लिखूंगा। अभी फिलहाल इतना ही।

सादर
समरेंद्र

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