पुस्तक समीक्षा : सत्य की खोज – डॉ. पी. श्रीराम

इन शब्दों को पढ़ते हुए जरा शब्दों की बनावट पर गौर करिए। अपने इर्दगिर्द के माहौल के प्रति सतर्क हो जाइए। अपनी श्वांस की गति पर जरा नजर दौड़ाइये। जरा अपने विचारों को देखने का प्रयास कीजिए। कुछ देर के लिए वर्तमान के प्रति सजग हो जाइए। विचारों को देखिए। कोई विवेचना नहीं। कुछ देर रुकिए और वर्तमान को महसूस कीजिए। जैसे ही आप वर्तमान के प्रति सजग होते हैं एक नवीन और बेहतर दुनिया आपके सामने होती है। आज के वक्त की सबसे बड़ी दिक्कत है मनुष्य का एक काल्पनिक दुनिया में जीना। वो जहां है उस पल को छोड़कर अपने विचारों से पूरी दुनिया का भ्रमण कर रहा है। वर्तमान के प्रति सजगता ही उसे सत्य जीवन के दर्शन करा सकती है। व्यव्हारिक जीवन में वह कई चुनौतियों को अपने समक्ष पाता है। इनमें चिंताएं, प्रतियोगितावादी संसार की भागदौड़, रिश्तों में कड़वाहट और अधिक पाने की दौड़, अप्राप्त परिस्थिति का चिंतन प्रमुख हैं। इस तरह का चिंतन किया गया है डॉ.पी.श्रीराम की पुस्तक ‘सत्य की खोज’ में।

इस पुस्तक में इन सभी विषयों पर प्रकाश डाल कर इनके कारण और निवारण पर विचार किया गया है। दुनिया में जितने भी सत्य को प्राप्त हुए लोग या संत दिखते हैं उनकी सत्य की खोज की विधियों में कोई अंतर नहीं था। सत्य की खोज का तरीका और सभी तरीकों में समानता पर भी इस पुस्तक में रौशनी डाली गई है। 

भारत में दुनिया के सबसे ज्यादा युवा निवास करते हैं। युवा ऊर्जा को सकारात्मक रूप से पल्लवित किया जाएगा तो हमें एक सुखद भविष्य मिलेगा। स्वामी विवेकानंद का स्वप्न था कि भारत विश्व गुरू बने। वे इस बात पर भी जोर देते थे कि आध्यात्म हमारी जड़ों में है और हमें इसे नहीं छोड़ना चाहिए। बड़ी तादाद में लोग अनैतिक बाबाओं के दरवाजों पर जा रहे हैं। इसकी बड़ी वजह है उनकी आध्यात्म के प्रति श्रद्धा और बेहतर विकल्प का सामने नहीं होना। इसी देश ने विवेकानंद, शरणानंद और जे कृष्णमूर्ती जैसे वैज्ञानिक सोच रखने वाले क्रांतिकारी संत दिए हैं। 

सही मायनों में गीता का ज्ञान, योग या सत्य क्या है, इस पर भी इस पुस्तक में विचार किया गया है। काम, क्रोध, लोभ, अनासक्ति ये सारी बातें हम सुनते तो हैं, इनके शाब्दिक अर्थ भी जानते हैं लेकिन जीवन में इनके व्यव्हारिक इस्तेमाल से हम अनभिज्ञ ही हैं। सरल भाषा और वर्तमान परिस्थितियों में इन विषयों पर प्रकाश डालने का भी प्रयास इस पुस्तक के माध्यम से किया गया है। भाग्य को लेकर कई मान्यताएं हैं आखिर भाग्य क्या होता है और सत्य की खोज में इसका क्या योगदान है। इस विषय पर भी सारगर्भित जानकारी इस पुस्तक के माध्यम से दी गई है।  अंत में निर्विचारता को प्राप्त कर वर्तमान में ही जीने की विभिन्न विधियों का विवेचन भी किया गया है। मन को काबू करना किसी मदमस्त हाथी को काबू करने से भी मुश्किल है एक बार उसे काबू कर लिया तो वर्तमान और आपके विचार आपकी मुठ्ठी में होते हैं। विचारो को काबू करने की असरदार विधियों पर भी इस पुस्तक में चर्चा की गई है। 

डॉ. प्रवीण तिवारी विगत 16 वर्षों से टीवी और प्रिंट पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं। वे स्वयं एक सत्यान्वेषी है और आध्यात्मिक विषयों पर सतत लेखन कर रहे हैं। कई अखबारों और पत्रिकाओं में उनके कॉलम सतत प्रकाशित होते हैं। वे नाद ब्रह्म योग धाम संस्थान के साथ जुड़े हुए हैं और देश भर में नाद ब्रह्म की ध्यान विधि पर जागरूकता फैलाने का कार्य भी कर रहे हैं। सेवादीप फाउंडेशन के जरिए वे देश के युवाओं और बच्चों को प्रेरित करने के लिए भी सक्रिय रूप से कार्यरत हैं।

संपर्क : drpsawakening@gmail.com

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