सौरभ द्विवेदी और रवीश हमारे दौर के सबसे कुशल एंकरों में से एक हैं!

Shyam Meera Singh-

स्वतंत्र मीडिया में या Youtube पर कोई भी आदमी कोई नया शो करने की कोशिश करता है. तो उस पर आरोप लगाया जाने लगता है कि वो लल्लनटॉप के सौरभ द्विवेदी या रवीश कुमार की नक़ल कर रहा है. कई मर्तबा इन आरोपों में दम नहीं होता. दूसरी बात कि सौरभ द्विवेदी और रवीश हमारे दौर के सबसे कुशल एंकरों में से एक हैं. हज़ारों-लाखों लोग उन्हें देखते हैं. पत्रकारों की नई पीढ़ी भी उन्हें देखते हुए बड़ी हो रही है. अगर उनका प्रभाव नई पीढ़ी पर पड़ता है तो अचरज क्या है? ये तो अच्छी बात है कि जो लोग बोलने की कुशलता में बैंचमार्क हैं और लोग उन्हें देखकर अपनी कोशिशों को और माँझ रहे हैं, सीख रहे हैं, सही कर रहें.. ये तो अंततः अच्छी बात हुई.

इस तरह के आरोप निहायत निजी और हतोत्साहित करने वाले होते हैं. बहुत छोटी सी ज़िंदगी है जो किसी महामारी या दुर्घटना में भी समझौता कर जाती है. अधिक से अधिक तीस-पचास वर्षों की कुल कहानी है. इतना बोझ मत रखिए मन पर। लोगों को उनका काम करने दीजिए. कुछ अच्छा लगे तो उन्हें बताइए. बुरा लगे तो मन में रख लीजिए. आलोचनाओं ने कभी बेहतरी की ओर नहीं बढ़ाया. सिवाय इसके कि इसने लोगों में असंतोष और कमतरी का भाव भरा है. लेकिन प्रशंसाओं और हौंसला देने से कमजोर से कमजोर आदमी भी कई बड़े बड़े छज्जों और दरारों को पार कर गए हैं.

अपने समकक्षों की बोलने की कला का प्रभाव पड़ना बेहद बेहद बेहद स्वाभाविक है. मेरा निजी अनुभव तो ऐसा भी रहा है कि मैं जिनके साथ रहता हूँ कुछ दिन बाद मेरी हंसी भी उनके जैसी हो गई। मेरे बात करने का तरीक़ा भी उनके जैसा हो गया. फ़लाना, फ़लाना के जैसा लिखने की कोशिश कर रहा है, फ़लाना फ़लाने के जैसे बोलने की कोशिश कर रहा है…ये कैसे सवाल हैं? ये नितांत निजी लांछन हैं.

जयशंकर प्रसाद, प्रेमचंद, रागदरबारी के श्री लाल शुक्ल, सब अपने अपने समकक्षों पर प्रभाव छोड़ते हैं, सबके समकक्ष सीखते हैं, ये भी अपने समकक्षों से सीखते हैं. बोलचाल, चाल-ढलन के तरीक़ों को माँझने के लिए अपने आसपास के लोगों से ही सीखा-पढ़ा जाता हैं. लोगों को करने दीजिए, सीखने दीजिए. उपहास बनाकर क्या ही हांसिल कीजिएगा. थोड़ा दिल बड़ा करो महाराज!



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Comments on “सौरभ द्विवेदी और रवीश हमारे दौर के सबसे कुशल एंकरों में से एक हैं!

  • शिशिर says:

    सहमत नही आपसे। सौरभ द्विवेदी और रवीश कुमार की तुलना बेमानी है।
    सौरभ द्विवेदी एक निष्पक्ष पत्रकार है, बल्कि वो वास्तव में पत्रकार है। उन्हे पत्रकार की तरह सुनता हूँ, रोज सुनता हूँ।
    सौरभ द्विवेदी को सुनकर बड़े होने वाले तार्किक दृष्टि से निष्पक्ष बनेंगे, उनके अंदर किसी विशेष वर्ग, व्यक्ति या पार्टी के लिये समर्थन या घृणा नही पैदा होगी।
    रवीश कुमार एक एजेंडा धारक है, वो केवल एक पक्ष की बात करते हैं। उनका पक्ष और विरोध जगजाहिर है। रवीश कुमार को सुनकर बड़े होने वाले अपने मन में किसी खास वर्ग लिये जहर भरे होंगे। वो निष्पक्ष नही बन सकते, इतना निश्चित है।

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  • महेन्द्र'मनुज' says:

    क्या हर्ज है कि रवीश किसी एजेंडा पर काम कर रहे हैं।
    दशरथ माँझी का भी एक ही एजेंडा था।छेनी -हथौड़े से चट्टान काटकर सड़क/रास्ता बना डाला।
    रवीश का चेहरा न देखकर प्रामाणिकता/ परिश्रम देखा जाना चाहिये। स्वतंत्रता पूर्व की पत्रकारिता भी पक्षधर रही है। निष्यक्षता बकवास शब्द है।
    पहले पक्ष चुन लीजिये ,पक्षधर हो जाईये।खासकर तब , जब गोदी मीडिया डमरू पर नाच रहा हो।

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